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अवन्ती खण्ड · अध्याय 21

हनुमत्केश्वरमाहात्म्य-वर्णनम्

अध्याय 20अध्याय-सूचीअध्याय 22

श्लोक 1 (skanda.5.21.1)

सनत्कुमार उवाच । अथान्यत्संप्रवक्ष्यामि देवं त्रिदशपूजितम् । हनुमत्केश्वरंनाम भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्

sanatkumāra uvāca athānyatsaṁpravakṣyāmi devaṁ tridaśapūjitam hanumatkeśvaraṁnāma bhuktimuktiphalapradam

सनत्कुमार ने कहा -- अब मैं देवताओं द्वारा पूजित एक अन्य देव का वर्णन करता हूँ, जिनका नाम हनुमत्केश्वर है और जो भुक्ति तथा मुक्ति दोनों फल प्रदान करते हैं।

श्लोक 2 (skanda.5.21.2)

शैवे सरसि यः स्नात्वा पश्येद्धनुमत्केश्वरम् । कल्पकोटिसहस्राणि वायुलोके स मोदते

śaive sarasi yaḥ snātvā paśyeddhanumatkeśvaram kalpakoṭisahasrāṇi vāyuloke sa modate

जो शैव सरोवर में स्नान कर हनुमत्केश्वर का दर्शन करता है, वह हजारों करोड़ कल्पों तक वायुलोक में आनन्दित रहता है।

श्लोक 3 (skanda.5.21.3)

व्यास उवाच । हनुमत्केश्वरो यस्तु ह्युक्तः पूर्वं त्वयाऽनघ । कथां कथय ह्येतस्य वृत्तपूर्वां सनातनीम्

vyāsa uvāca hanumatkeśvaro yastu hyuktaḥ pūrvaṁ tvayā'nagha kathāṁ kathaya hyetasya vṛttapūrvāṁ sanātanīm

व्यास ने कहा -- हे निष्पाप! जिस हनुमत्केश्वर का वर्णन आपने अभी किया, उनकी वह प्राचीन सनातन कथा मुझे सुनाइए।

श्लोक 4 (skanda.5.21.4)

सनत्कुमार उवाच । त्रैलोक्यकण्टकः पूर्वं रावणो नाम राक्षसः । विष्णुना रामरूपेण लंकायां विनिपातितः

sanatkumāra uvāca trailokyakaṇṭakaḥ pūrvaṁ rāvaṇo nāma rākṣasaḥ viṣṇunā rāmarūpeṇa laṁkāyāṁ vinipātitaḥ

सनत्कुमार ने कहा -- पूर्वकाल में त्रिलोक के लिए कंटकस्वरूप रावण नामक राक्षस को रामरूपधारी विष्णु ने लंका में मार गिराया।

श्लोक 5 (skanda.5.21.5)

घातयित्वा तु तं दुष्टं सीतामादाय जानकीम् । वानरैः सह ऋक्षैश्च नगरीं स्वामुपागतः

ghātayitvā tu taṁ duṣṭaṁ sītāmādāya jānakīm vānaraiḥ saha ṛkṣaiśca nagarīṁ svāmupāgataḥ

उस दुष्ट का वध कर, जानकी सीता को लेकर, वानरों और ऋक्षों के साथ वे अपनी नगरी को लौट आए।

श्लोक 6 (skanda.5.21.6)

तत्र राज्यमनुप्राप्य ऋषिभिः परिवारितः । कथावसाने रामेण ह्यगस्त्यो मुनिसत्तमः

tatra rājyamanuprāpya ṛṣibhiḥ parivāritaḥ kathāvasāne rāmeṇa hyagastyo munisattamaḥ

वहाँ राज्य प्राप्त कर, ऋषियों से घिरे राम के समक्ष, कथा के अन्त में मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य ने --

श्लोक 7 (skanda.5.21.7)

पप्रच्छ च द्वयोर्वीर्यं शंभुवातजयोस्तदा । तदा दाशरथिं प्राह अग स्तिर्मुनिसत्तमः

papraccha ca dvayorvīryaṁ śaṁbhuvātajayostadā tadā dāśarathiṁ prāha aga stirmunisattamaḥ

-- शम्भु और वायुपुत्र के पराक्रम के विषय में प्रश्न किया। तब मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य ने दशरथनन्दन राम से कहा --

श्लोक 8 (skanda.5.21.8)

अनौपम्यो यथा देवो युद्धे शौर्ये महेश्वरः । ज्ञेयो वायुसुतस्तद्वत्सत्यमेतद्ब्रवीमि ते

anaupamyo yathā devo yuddhe śaurye maheśvaraḥ jñeyo vāyusutastadvatsatyametadbravīmi te

-- 'जैसे युद्ध में शौर्य में महेश्वर देव अनुपम हैं, वैसे ही वायुपुत्र को भी जानना चाहिए -- यह सत्य मैं तुमसे कहता हूँ।'

श्लोक 9 (skanda.5.21.9)

एतच्छुत्वाथ हनुमान्यद्धरेणो पमा मम । कृता मुनिवरेणेह प्रत्यक्षं राघवस्य ह

etacchutvātha hanumānyaddhareṇo pamā mama kṛtā munivareṇeha pratyakṣaṁ rāghavasya ha

यह सुनकर हनुमान ने सोचा -- 'यहाँ राघव के प्रत्यक्ष इस श्रेष्ठ मुनि ने मेरी तुलना हर से की है --'

श्लोक 10 (skanda.5.21.10)

गमिष्ये नगरीं लंकां लिंगमेकं प्रयाचितुम् । राक्षसेन्द्रं महाभागं विभीषणमकल्म षम्

gamiṣye nagarīṁ laṁkāṁ liṁgamekaṁ prayācitum rākṣasendraṁ mahābhāgaṁ vibhīṣaṇamakalma ṣam

-- 'मैं लंका नगरी जाकर महाभाग निष्पाप राक्षसराज विभीषण से एक शिवलिंग की याचना करूँगा।'

श्लोक 11 (skanda.5.21.11)

ततो गतः स लंकायां विभीषणमुवाच ह । देहि मे त्वं महाभाग लिंगमेकं च शोभनम्

tato gataḥ sa laṁkāyāṁ vibhīṣaṇamuvāca ha dehi me tvaṁ mahābhāga liṁgamekaṁ ca śobhanam

तब वे लंका जाकर विभीषण से बोले -- 'हे महाभाग! मुझे एक सुन्दर शिवलिंग दीजिए।'

श्लोक 12 (skanda.5.21.12)

उक्तं च राक्षसेन्द्रेण गृहाणैतद्यथा रुचि । एतानि षट् च लिंगानि रावणस्थापितानि वै

uktaṁ ca rākṣasendreṇa gṛhāṇaitadyathā ruci etāni ṣaṭ ca liṁgāni rāvaṇasthāpitāni vai

राक्षसराज ने कहा -- 'जैसी रुचि हो, इनमें से ग्रहण कीजिए; ये छह लिंग रावण द्वारा स्थापित किए गए हैं --

श्लोक 13 (skanda.5.21.13)

त्रैलोक्यविजयात्पूर्वं मम भ्रात्रा महात्मना । एतेषु यदभीष्टं ते लिंगं कथय सुव्रत । तत्प्रयच्छामि तेऽद्यैव सत्यमेतत्प्लवंगम

trailokyavijayātpūrvaṁ mama bhrātrā mahātmanā eteṣu yadabhīṣṭaṁ te liṁgaṁ kathaya suvrata tatprayacchāmi te'dyaiva satyametatplavaṁgama

-- मेरे महात्मा भ्राता द्वारा त्रिलोक-विजय से पूर्व। हे सुव्रत! इनमें से जो लिंग तुम्हें अभीष्ट हो, बताओ; हे वानर, आज ही मैं वह तुम्हें दूँगा, यह सत्य है।'

श्लोक 14 (skanda.5.21.14)

ततो जग्राह हनुमाँल्लिंगं मौक्तिकसंनिभम् । यदेतद्दृश्यते वीर तत्प्रयच्छ ममानघ

tato jagrāha hanumā~lliṁgaṁ mauktikasaṁnibham yadetaddṛśyate vīra tatprayaccha mamānagha

तब हनुमान ने मोतियों के समान शोभित लिंग को चुनते हुए कहा -- 'हे वीर निष्पाप! यह जो लिंग दिखाई दे रहा है, वही मुझे दीजिए।'

श्लोक 15 (skanda.5.21.15)

श्रुत्वा हनुमतो वाक्यमथोवाच विभीषणः । दत्तमेतन्महावीर लिंगं यद्धृतवानसि

śrutvā hanumato vākyamathovāca vibhīṣaṇaḥ dattametanmahāvīra liṁgaṁ yaddhṛtavānasi

हनुमान के वचन सुनकर विभीषण ने कहा -- 'हे महावीर! जिस लिंग को तुमने धारण किया है, वह अब तुम्हें दिया जा चुका।

श्लोक 16 (skanda.5.21.16)

श्रूयते हि पुरावृत्तं लिंगमेतद्धनेश्वरः । रुद्र भक्त्या समायुक्तस्त्रिकालमप्यपूजयत्

śrūyate hi purāvṛttaṁ liṁgametaddhaneśvaraḥ rudra bhaktyā samāyuktastrikālamapyapūjayat

यह सुना जाता है कि पूर्वकाल में इसी लिंग की, रुद्र-भक्ति से युक्त होकर, धनेश्वर (कुबेर) त्रिकाल पूजा किया करते थे।

श्लोक 17 (skanda.5.21.17)

रावणेन यदा बद्धस्तदानीं हि धनेश्वरः । लिंगस्यास्य प्रभावेन विमुक्तः समपद्यत

rāvaṇena yadā baddhastadānīṁ hi dhaneśvaraḥ liṁgasyāsya prabhāvena vimuktaḥ samapadyata

जब रावण द्वारा धनेश्वर बन्दी बनाए गए थे, तब इसी लिंग के प्रभाव से ही वे मुक्त हो पाए थे।

श्लोक 18 (skanda.5.21.18)

प्रसादात्तस्य लिंगस्य धनेशो धनरक्षकः । गृहीत्वा तन्महालिंगं स्वस्थो जातोऽथ वानरः

prasādāttasya liṁgasya dhaneśo dhanarakṣakaḥ gṛhītvā tanmahāliṁgaṁ svastho jāto'tha vānaraḥ

उसी लिंग की कृपा से धन-रक्षक धनेश (मुक्त हुए)। उस महालिंग को ग्रहण कर वानर (हनुमान) स्वस्थ (संतुष्ट) हो गए।

श्लोक 19 (skanda.5.21.19)

सनत्कुमार उवाच । गृहीत्वा तु ततो लिंगं प्रस्थितो विमलेंऽबरे । सप्तमे दिवसे चैव संप्राप्तोऽवंतिकां पुरीम्

sanatkumāra uvāca gṛhītvā tu tato liṁgaṁ prasthito vimaleṁ'bare saptame divase caiva saṁprāpto'vaṁtikāṁ purīm

सनत्कुमार ने कहा -- लिंग को लेकर तब वे निर्मल आकाश-मार्ग से चल पड़े, और सातवें दिन अवन्तिका नगरी पहुँचे।

श्लोक 20 (skanda.5.21.20)

तत्र रुद्रसरस्तीरे स्थाप्य स्नानमथाकरोत् । महाकालस्य पूजार्थं गमनं प्रत्यचिंतयत्

tatra rudrasarastīre sthāpya snānamathākarot mahākālasya pūjārthaṁ gamanaṁ pratyaciṁtayat

वहाँ रुद्रसर के तट पर उसे स्थापित कर उन्होंने स्नान किया, और महाकाल की पूजा हेतु आगे जाने का विचार किया।

श्लोक 21 (skanda.5.21.21)

उद्धर्तुकामस्तल्लिगमुद्धर्तुं न शशाक सः

uddhartukāmastalligamuddhartuṁ na śaśāka saḥ

(लौटकर) उसे पुनः उठाने की इच्छा करने पर भी वे उस लिंग को उठा न सके।

श्लोक 22 (skanda.5.21.22)

ततो व्यवस्थितो देवः प्राह तं वायुनन्दनम् । अस्मिन्क्षेत्रे हनूमन्मां त्वन्नाम्नैव प्रतिष्ठापय

tato vyavasthito devaḥ prāha taṁ vāyunandanam asminkṣetre hanūmanmāṁ tvannāmnaiva pratiṣṭhāpaya

तब वहीं स्थिर हो गए देव ने वायुनन्दन से कहा -- 'हे हनुमान! इस क्षेत्र में मुझे अपने ही नाम से स्थापित करो।

श्लोक 23 (skanda.5.21.23)

हनुमत्केश्वरं चाथ लोके ख्यातं भविष्यति । शैलवच्चोन्नतं लिंगं स्थापितं वायुसूनुना

hanumatkeśvaraṁ cātha loke khyātaṁ bhaviṣyati śailavacconnataṁ liṁgaṁ sthāpitaṁ vāyusūnunā

अब से मैं लोक में हनुमत्केश्वर नाम से विख्यात होऊँगा।' इस प्रकार वायुसुत द्वारा पर्वत के समान ऊँचा वह लिंग स्थापित किया गया।

श्लोक 24 (skanda.5.21.24)

शनौ पश्येन्नरो यस्तु हनुमत्केश्वरं शिवम् । तस्य शत्रुभयं नास्ति संग्रामे जयमाप्नुयात्

śanau paśyennaro yastu hanumatkeśvaraṁ śivam tasya śatrubhayaṁ nāsti saṁgrāme jayamāpnuyāt

जो मनुष्य शनिवार को शिव हनुमत्केश्वर का दर्शन करता है, उसे शत्रु का भय नहीं होता और वह युद्ध में विजय प्राप्त करता है।

श्लोक 25 (skanda.5.21.25)

न च चौरभयं तस्य न दारिद्र्यं न दुर्गतिः । तैलाभिषेकं यः कुर्याद्धनुमत्केश्वरे शिवे

na ca caurabhayaṁ tasya na dāridryaṁ na durgatiḥ tailābhiṣekaṁ yaḥ kuryāddhanumatkeśvare śive

उसे न चोर का भय होता है, न दरिद्रता, न दुर्गति। जो शिव हनुमत्केश्वर का तैलाभिषेक करता है --

श्लोक 26 (skanda.5.21.26)

तस्य रोगाः प्रलीयन्ते ग्रहपीडा न जायते । ये द्रक्ष्यंति नराः भक्त्या तेषां मोक्षो भविष्यति

tasya rogāḥ pralīyante grahapīḍā na jāyate ye drakṣyaṁti narāḥ bhaktyā teṣāṁ mokṣo bhaviṣyati

-- उसके रोग नष्ट हो जाते हैं और उसे ग्रह-पीड़ा नहीं होती। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक उनका दर्शन करेंगे, उन्हें मोक्ष प्राप्त होगा।

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