अवन्ती खण्ड · अध्याय 22
रुद्रसरोमाहात्म्य-वर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.5.22.1)
श्रीसनत्कुमार उवाच । यमेश्वरं तु यः पश्येत्स्नापयित्वा तिलांभसा । कुंकुमेन समालिप्य पूजयेदुत्पलैस्ततः
śrīsanatkumāra uvāca yameśvaraṁ tu yaḥ paśyetsnāpayitvā tilāṁbhasā kuṁkumena samālipya pūjayedutpalaistataḥ
श्री सनत्कुमार ने कहा -- जो मनुष्य तिल मिश्रित जल से स्नान कराकर, कुंकुम से अनुलिप्त कर, फिर उत्पल-कमलों से यमेश्वर का पूजन करता है --
श्लोक 2 (skanda.5.22.2)
दहेत्कृष्णागरुं धूपं दापयेत्तिलतण्डुलान् । य एवमर्चयेद्देवमीश्वरं शूलहस्तकम्
dahetkṛṣṇāgaruṁ dhūpaṁ dāpayettilataṇḍulān ya evamarcayeddevamīśvaraṁ śūlahastakam
-- कृष्णागुरु का धूप जलाए, तिल और तण्डुल अर्पित करे -- जो इस प्रकार त्रिशूलधारी ईश्वर देव का पूजन करता है --
श्लोक 3 (skanda.5.22.3)
यत्र कुत्र मृतस्यापि यमः पितृसमो भवेत्
yatra kutra mṛtasyāpi yamaḥ pitṛsamo bhavet
-- उसके लिए, वह जहाँ कहीं भी मरे, यमराज पिता के समान (सौम्य) हो जाते हैं।
श्लोक 4 (skanda.5.22.4)
इति यमेश्वरमाहात्म्यम् । सनत्कुमार उवाच । कथयामि परं व्यास तीर्थं तीर्थेषु चोत्तमम् । नाम्ना रुद्रसरः प्रोक्तं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्
iti yameśvaramāhātmyam sanatkumāra uvāca kathayāmi paraṁ vyāsa tīrthaṁ tīrtheṣu cottamam nāmnā rudrasaraḥ proktaṁ triṣu lokeṣu viśrutam
इस प्रकार यमेश्वर का माहात्म्य कहा गया। सनत्कुमार ने कहा -- हे व्यास! अब मैं तीर्थों में उत्तम, परम तीर्थ का वर्णन करता हूँ, जो 'रुद्रसर' नाम से तीनों लोकों में विख्यात है।
श्लोक 5 (skanda.5.22.5)
तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा पश्येत्कोटेश्वरं शिवम् । मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति
tatra snātvā śucirbhūtvā paśyetkoṭeśvaraṁ śivam mucyate sarvapāpebhyo rudralokaṁ sa gacchati
वहाँ स्नान कर, शुद्ध होकर जो शिव कोटेश्वर का दर्शन करता है, वह सर्वपापों से मुक्त होकर रुद्रलोक को जाता है।
श्लोक 6 (skanda.5.22.6)
श्राद्धं तत्रैव कृत्वा तु शृणु यत्फलमाप्नुयात् । दशानामश्वमेधानां वाजपेयशतस्य च
śrāddhaṁ tatraiva kṛtvā tu śṛṇu yatphalamāpnuyāt daśānāmaśvamedhānāṁ vājapeyaśatasya ca
वहीं श्राद्ध करने पर जो फल मिलता है, वह सुनो -- दस अश्वमेध यज्ञों और सौ वाजपेय यज्ञों के समान।
श्लोक 7 (skanda.5.22.7)
फलं कोटिगुणं व्यास लभते नात्र संशयः । पितॄनुद्दिश्य यत्किंचित्कोटितीर्थे प्रदीयते
phalaṁ koṭiguṇaṁ vyāsa labhate nātra saṁśayaḥ pitṝnuddiśya yatkiṁcitkoṭitīrthe pradīyate
हे व्यास! वह करोड़गुना फल पाता है, इसमें संशय नहीं। पितरों के उद्देश्य से कोटितीर्थ में जो कुछ भी दिया जाता है --
श्लोक 8 (skanda.5.22.8)
तत्सर्वं कोटिगुणितं जायते नात्र संशयः । कोटितीर्थे नरः स्नात्वा ध्यायेद्यः परमाक्षरम्
tatsarvaṁ koṭiguṇitaṁ jāyate nātra saṁśayaḥ koṭitīrthe naraḥ snātvā dhyāyedyaḥ paramākṣaram
-- वह सब करोड़गुना हो जाता है, इसमें संशय नहीं। जो मनुष्य कोटितीर्थ में स्नान कर परम अक्षर का ध्यान करता है --
श्लोक 9 (skanda.5.22.9)
मुच्यते सर्वपापेभ्यो निर्मोकेन यथोरगः । प्रातरुत्थाय यो विप्र तत्र स्नानं करोति वै
mucyate sarvapāpebhyo nirmokena yathoragaḥ prātarutthāya yo vipra tatra snānaṁ karoti vai
-- वह वैसे ही सर्वपापों से मुक्त हो जाता है जैसे सर्प केंचुली से। जो ब्राह्मण प्रातःकाल उठकर वहाँ स्नान करता है --
श्लोक 10 (skanda.5.22.10)
दृष्ट्वा देवं महाकालं गोसहस्रफलं लभेत् । कोटितीर्थे नरः स्नात्वा सप्तरात्रोषितः शुचिः
dṛṣṭvā devaṁ mahākālaṁ gosahasraphalaṁ labhet koṭitīrthe naraḥ snātvā saptarātroṣitaḥ śuciḥ
-- और महाकाल देव का दर्शन करता है, वह सहस्र गौओं के दान का फल पाता है। जो मनुष्य कोटितीर्थ में स्नान कर सात रात्रि तक शुद्ध रहकर उपवास करता है --
श्लोक 11 (skanda.5.22.11)
चांद्रायणसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः । जागरं तत्र कुर्याद्यो ह्यनंतफलमश्नुते
cāṁdrāyaṇasahasrasya phalaṁ prāpnoti mānavaḥ jāgaraṁ tatra kuryādyo hyanaṁtaphalamaśnute
-- वह सहस्र चान्द्रायण व्रतों का फल पाता है। जो वहाँ रात्रि-जागरण करता है, वह अनन्त फल का भागी बनता है।
श्लोक 12 (skanda.5.22.12)
गन्धपुष्पार्चनं कृत्वा महास्नपनपूर्वकम् । य एवं नयते रात्रिं सोपवासो जितेंद्रियः
gandhapuṣpārcanaṁ kṛtvā mahāsnapanapūrvakam ya evaṁ nayate rātriṁ sopavāso jiteṁdriyaḥ
जो मनुष्य महास्नान-पूर्वक गन्ध-पुष्पों से अर्चना कर, इस प्रकार उपवास और इन्द्रियसंयम सहित रात्रि व्यतीत करता है --
श्लोक 13 (skanda.5.22.13)
लभते सर्वकामित्वं यत्सुरैरपि दुर्लभम् । कार्तिक्यामथ वैशाख्यां देवं तत्र प्रपूजयेत्
labhate sarvakāmitvaṁ yatsurairapi durlabham kārtikyāmatha vaiśākhyāṁ devaṁ tatra prapūjayet
-- वह सभी कामनाओं की सिद्धि पाता है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। कार्तिक अथवा वैशाख मास में वहाँ देव का पूजन करना चाहिए --
श्लोक 14 (skanda.5.22.14)
गंधपुष्पैश्च कालीनैस्तथा वस्त्रैः सुशोभनैः । कर्पूरं कुंकुमं चैव श्रीखण्डमगरुं तथा
gaṁdhapuṣpaiśca kālīnaistathā vastraiḥ suśobhanaiḥ karpūraṁ kuṁkumaṁ caiva śrīkhaṇḍamagaruṁ tathā
-- ऋतु-अनुकूल पुष्पों और सुन्दर वस्त्रों के साथ गन्ध से; तथा कर्पूर, कुंकुम, श्रीखण्ड (चन्दन) और अगुरु से भी --
श्लोक 15 (skanda.5.22.15)
समभागानि कृत्वा तु शिलापृष्ठे च पेषयेत् । अनुलिप्य महाकालं रुद्रस्यानुचरो भवेत्
samabhāgāni kṛtvā tu śilāpṛṣṭhe ca peṣayet anulipya mahākālaṁ rudrasyānucaro bhavet
-- इन सबको समान भाग में लेकर शिला पर पीस लेना चाहिए; इस लेप से महाकाल का अनुलेपन करने वाला रुद्र का अनुचर बन जाता है।