Skip to main content

अवन्ती खण्ड · अध्याय 23

महाकालेश्वरयात्रामाहात्म्य-वर्णनम्

अध्याय 22अध्याय-सूचीअध्याय 24

श्लोक 1 (skanda.5.23.1)

सनत्कुमार उवाच । अथ यात्रां प्रवक्ष्यामि महाकालस्य यत्नतः । शिवां श्रेयस्करीं पुण्यां पुण्यलोकप्रदायिनीम्

sanatkumāra uvāca atha yātrāṁ pravakṣyāmi mahākālasya yatnataḥ śivāṁ śreyaskarīṁ puṇyāṁ puṇyalokapradāyinīm

सनत्कुमार ने कहा -- अब मैं यत्नपूर्वक महाकाल की यात्रा का वर्णन करता हूँ, जो कल्याणकारी, श्रेयस्कर, पुण्यमयी और पुण्यलोक प्रदान करने वाली है।

श्लोक 2 (skanda.5.23.2)

स्नात्वा सरसि रुद्रस्य दृष्ट्वा कोटेश्वरं शिवम् । नमस्कृत्य ततो गच्छेन्महाकालं सनातनम्

snātvā sarasi rudrasya dṛṣṭvā koṭeśvaraṁ śivam namaskṛtya tato gacchenmahākālaṁ sanātanam

रुद्रसरोवर में स्नान कर, शिव कोटेश्वर का दर्शन कर, नमस्कार करके तत्पश्चात् सनातन महाकाल के पास जाना चाहिए।

श्लोक 3 (skanda.5.23.3)

गन्धैः पुष्पैर्नमस्कारैः संपूज्य त्रिदशेश्वरम् । प्रणिपत्य ततो गच्छेद्देवं कपालमोचनम्

gandhaiḥ puṣpairnamaskāraiḥ saṁpūjya tridaśeśvaram praṇipatya tato gaccheddevaṁ kapālamocanam

गन्ध, पुष्प और नमस्कार से त्रिदशेश्वर की पूजा कर, प्रणाम करके तत्पश्चात् देव कपालमोचन के पास जाना चाहिए।

श्लोक 4 (skanda.5.23.4)

तत्रैव देवदेवेशः कपालं न्यस्तवान्क्षितौ । कपाले तत्क्षणान्न्यस्ते तत्राभूल्लिंगमुत्तमम्

tatraiva devadeveśaḥ kapālaṁ nyastavānkṣitau kapāle tatkṣaṇānnyaste tatrābhūlliṁgamuttamam

वहीं देवाधिदेव ने पृथ्वी पर कपाल रखा था; कपाल के रखे जाते ही उसी क्षण वहाँ एक उत्तम लिंग प्रकट हुआ।

श्लोक 5 (skanda.5.23.5)

कपालमोचनं नाम सर्वपापप्रणाशनम् । तत्र वै स्नपनं कुर्यादाज्यपलशतेन वै

kapālamocanaṁ nāma sarvapāpapraṇāśanam tatra vai snapanaṁ kuryādājyapalaśatena vai

उसका नाम 'कपालमोचन' है, जो सर्वपापों का नाश करने वाला है। वहाँ सौ पल घी से स्नपन करना चाहिए।

श्लोक 6 (skanda.5.23.6)

तदर्धार्धेन पादेन वित्तशाठ्यविवर्जितः । काले पूर्णे स विप्रेन्द्र शिवलोके महीयते

tadardhārdhena pādena vittaśāṭhyavivarjitaḥ kāle pūrṇe sa viprendra śivaloke mahīyate

अथवा उसके आधे या चौथाई भाग से भी, धन की कृपणता त्यागकर; समय पूर्ण होने पर, हे विप्रश्रेष्ठ, वह शिवलोक में महिमामण्डित होता है।

श्लोक 7 (skanda.5.23.7)

नमस्कृत्य ततो गच्छेत्कपिलेश्वरमुत्तमम् । दर्शनादस्य देवस्य मुच्यते ब्रह्महत्यया

namaskṛtya tato gacchetkapileśvaramuttamam darśanādasya devasya mucyate brahmahatyayā

नमस्कार कर तत्पश्चात् उत्तम कपिलेश्वर के पास जाना चाहिए। इस देव के दर्शनमात्र से ब्रह्महत्या से मुक्ति मिलती है।

श्लोक 8 (skanda.5.23.8)

हनुमत्केश्वरं देवं ततो गच्छेत्समाहितः । ऐश्वर्यमतुलं व्यास दर्शनादस्य जायते

hanumatkeśvaraṁ devaṁ tato gacchetsamāhitaḥ aiśvaryamatulaṁ vyāsa darśanādasya jāyate

तत्पश्चात् समाहितचित्त होकर देव हनुमत्केश्वर के पास जाना चाहिए। हे व्यास! इनके दर्शन से अतुल ऐश्वर्य प्राप्त होता है।

श्लोक 9 (skanda.5.23.9)

ततो गच्छेन्महादेवं पैप्पलाख्यं सनातनम् । यस्य दर्शनमात्रेण मुक्तिः स्याद्द्विजसत्तम

tato gacchenmahādevaṁ paippalākhyaṁ sanātanam yasya darśanamātreṇa muktiḥ syāddvijasattama

तत्पश्चात् सनातन 'पैप्पल' नामक महादेव के पास जाना चाहिए। हे द्विजश्रेष्ठ! इनके दर्शनमात्र से मुक्ति प्राप्त होती है।

श्लोक 10 (skanda.5.23.10)

स्वप्नेश्वरं ततो गच्छेद्भक्तिश्रद्धासमन्वितः । दर्शनादस्य देवस्य दुःस्वप्नं च विनश्यति

svapneśvaraṁ tato gacchedbhaktiśraddhāsamanvitaḥ darśanādasya devasya duḥsvapnaṁ ca vinaśyati

तत्पश्चात् भक्ति और श्रद्धा सहित स्वप्नेश्वर के पास जाना चाहिए। इस देव के दर्शन से दुःस्वप्न नष्ट हो जाता है।

श्लोक 11 (skanda.5.23.11)

ततो गच्छेन्महादेवमीशानं विश्वतोमुखम् । यस्य दर्शनमात्रेण विश्वस्यैव पतिर्भवेत्

tato gacchenmahādevamīśānaṁ viśvatomukham yasya darśanamātreṇa viśvasyaiva patirbhavet

तत्पश्चात् विश्वतोमुख महादेव ईशान के पास जाना चाहिए। इनके दर्शनमात्र से मनुष्य समस्त विश्व का स्वामी बन जाता है।

श्लोक 12 (skanda.5.23.12)

सोमेश्वरं ततो गच्छेज्जितक्रोधो जितेंद्रियः । कुष्ठरोगादिदोषेभ्यो दर्शनादस्य मुच्यते

someśvaraṁ tato gacchejjitakrodho jiteṁdriyaḥ kuṣṭharogādidoṣebhyo darśanādasya mucyate

तत्पश्चात् क्रोध और इन्द्रियों को जीतकर सोमेश्वर के पास जाना चाहिए। इनके दर्शन से कुष्ठ आदि रोग-दोषों से मुक्ति मिलती है।

श्लोक 13 (skanda.5.23.13)

वैश्वानरेश्वरं व्यास ततो गच्छेत्समाहितः । तस्य वृद्धिः सदा लोके जायते तस्य दर्शनात्

vaiśvānareśvaraṁ vyāsa tato gacchetsamāhitaḥ tasya vṛddhiḥ sadā loke jāyate tasya darśanāt

हे व्यास! तत्पश्चात् समाहितचित्त होकर वैश्वानरेश्वर के पास जाना चाहिए। इनके दर्शन से लोक में सदा वृद्धि होती रहती है।

श्लोक 14 (skanda.5.23.14)

बीजपूरकहस्तं तु लकु लीशं ततो व्रजेत् । रुद्रत्वं दर्शनात्तस्य जायते नात्र संशयः

bījapūrakahastaṁ tu laku līśaṁ tato vrajet rudratvaṁ darśanāttasya jāyate nātra saṁśayaḥ

तत्पश्चात् हाथ में बीजपूरक (बिजौरा) लिए लकुलीश के पास जाना चाहिए। इनके दर्शन से रुद्रत्व की प्राप्ति होती है, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 15 (skanda.5.23.15)

ततो गच्छेन्महादेवं गद्याणेश्वरमुत्तमम् । यस्य दर्शनमात्रेण जायंते सर्व सिद्धयः

tato gacchenmahādevaṁ gadyāṇeśvaramuttamam yasya darśanamātreṇa jāyaṁte sarva siddhayaḥ

तत्पश्चात् उत्तम महादेव गद्याणेश्वर के पास जाना चाहिए। इनके दर्शनमात्र से सर्व सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

श्लोक 16 (skanda.5.23.16)

अभ्यर्थितः सदा देवैः पूजितः सिद्धिकारणात् । तेनाभ्यर्थितेश्वरोऽयं विख्यातो विघ्ननायकः

abhyarthitaḥ sadā devaiḥ pūjitaḥ siddhikāraṇāt tenābhyarthiteśvaro'yaṁ vikhyāto vighnanāyakaḥ

सिद्धि की कामना से देवताओं द्वारा सदा प्रार्थित और पूजित होने के कारण, यह देव 'अभ्यर्थितेश्वर' नाम से विख्यात विघ्ननायक हैं।

श्लोक 17 (skanda.5.23.17)

वयोवृद्धं ततो गच्छेन्महाकालं सनातनम् । न रोगो न जराव्याधिर्दर्शनान्नात्र संशयः

vayovṛddhaṁ tato gacchenmahākālaṁ sanātanam na rogo na jarāvyādhirdarśanānnātra saṁśayaḥ

तत्पश्चात् सनातन महाकाल के रूप में वयोवृद्ध देव के पास जाना चाहिए। दर्शनमात्र से न रोग होता है, न बुढ़ापे की व्याधि, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 18 (skanda.5.23.18)

विघ्ननाशं ततो गच्छेत्प्राणीशं बलमुत्तमम् । स्नानं घटशतैस्तस्य कुर्याद्भक्त्या समाहितः

vighnanāśaṁ tato gacchetprāṇīśaṁ balamuttamam snānaṁ ghaṭaśataistasya kuryādbhaktyā samāhitaḥ

तत्पश्चात् प्राणियों के स्वामी, उत्तम बलशाली विघ्ननाश के पास जाना चाहिए। भक्तिपूर्वक समाहित होकर उनका सौ घड़ों से स्नान कराना चाहिए।

श्लोक 19 (skanda.5.23.19)

तस्य चैव कृते स्नाने लभ्यंते सर्वसिद्धयः । स्वर्गश्चापि सदा व्यास दर्शनादस्य जायते

tasya caiva kṛte snāne labhyaṁte sarvasiddhayaḥ svargaścāpi sadā vyāsa darśanādasya jāyate

उनका इस प्रकार स्नान करने से सर्व सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। हे व्यास! इनके दर्शन से सदा स्वर्ग भी प्राप्त होता है।

श्लोक 20 (skanda.5.23.20)

तनयं तमनूल्लंघ्य दंड पाणिं ततो व्रजेत् । यस्य दर्शनमात्रेण यमलोको न दृश्यते

tanayaṁ tamanūllaṁghya daṁḍa pāṇiṁ tato vrajet yasya darśanamātreṇa yamaloko na dṛśyate

उनको न लाँघते हुए फिर उनके पुत्र दण्डपाणि के पास जाना चाहिए। इनके दर्शनमात्र से यमलोक कभी दिखाई नहीं देता।

श्लोक 21 (skanda.5.23.21)

पुष्पदन्तं ततो गच्छेद्भक्तिश्रद्धासमन्वितः । यस्य दर्शनमात्रेण मुच्यते सर्वपातकैः

puṣpadantaṁ tato gacchedbhaktiśraddhāsamanvitaḥ yasya darśanamātreṇa mucyate sarvapātakaiḥ

तत्पश्चात् भक्ति और श्रद्धा सहित पुष्पदन्त के पास जाना चाहिए। इनके दर्शनमात्र से सर्व पापों से मुक्ति मिलती है।

श्लोक 22 (skanda.5.23.22)

गुह्यं चैव महाकालं ततो गच्छेत्समाहितः । यस्य दर्शनमात्रेण गुह्यपापैः प्रमुच्यते

guhyaṁ caiva mahākālaṁ tato gacchetsamāhitaḥ yasya darśanamātreṇa guhyapāpaiḥ pramucyate

तत्पश्चात् समाहितचित्त होकर गुह्य-महाकाल के पास जाना चाहिए। इनके दर्शनमात्र से गुप्त पापों से मुक्ति मिलती है।

श्लोक 23 (skanda.5.23.23)

ततो गच्छेत्समाधिस्थो दुर्वासेश्वरमुत्तमम् । यस्य दर्शनमात्रेण कृतकृत्यो नरो भवेत्

tato gacchetsamādhistho durvāseśvaramuttamam yasya darśanamātreṇa kṛtakṛtyo naro bhavet

तत्पश्चात् समाधिस्थ होकर उत्तम दुर्वासेश्वर के पास जाना चाहिए। इनके दर्शनमात्र से मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।

श्लोक 24 (skanda.5.23.24)

श्वासावरोधनं कृत्वा दुर्वाससः समीपतः । गौरीं गत्वा महादुर्गां त्यजेच्छ्वासमनंतरम्

śvāsāvarodhanaṁ kṛtvā durvāsasaḥ samīpataḥ gaurīṁ gatvā mahādurgāṁ tyajecchvāsamanaṁtaram

दुर्वासेश्वर के समीप श्वास रोककर, फिर महादुर्गा गौरी के पास जाकर, उसके पश्चात् श्वास त्यागना चाहिए।

श्लोक 25 (skanda.5.23.25)

तत्रोच्छ्वासो विमोक्त्यस्तामभ्यर्च्य तु सर्वथा । कालेश्वरं ततो गच्छेद्देवदेवं महेश्वरम्

tatrocchvāso vimoktyastāmabhyarcya tu sarvathā kāleśvaraṁ tato gaccheddevadevaṁ maheśvaram

वहीं उन्हें भलीभाँति पूजकर श्वास छोड़ना चाहिए। तत्पश्चात् देवाधिदेव महेश्वर कालेश्वर के पास जाना चाहिए।

श्लोक 26 (skanda.5.23.26)

यस्य दर्शनमात्रेण यमलोकं न पश्यति । विधीशं च ततो गच्छेद्देवदेवं महेश्वरम्

yasya darśanamātreṇa yamalokaṁ na paśyati vidhīśaṁ ca tato gaccheddevadevaṁ maheśvaram

इनके दर्शनमात्र से मनुष्य यमलोक नहीं देखता। तत्पश्चात् देवाधिदेव महेश्वर विधीश के पास जाना चाहिए।

श्लोक 27 (skanda.5.23.27)

यस्य दर्शनमात्रेण बधिरत्वं न जायते । कीर्तयेदात्मनो नाम स्थानं गोत्रं च तस्य वै

yasya darśanamātreṇa badhiratvaṁ na jāyate kīrtayedātmano nāma sthānaṁ gotraṁ ca tasya vai

इनके दर्शनमात्र से बहरापन कभी नहीं होता। इसके पश्चात् अपना नाम, स्थान और गोत्र स्पष्ट रूप से कहना चाहिए।

श्लोक 28 (skanda.5.23.28)

न कीर्तयेद्यदा नाम सा यात्रा विफली भवेत् । देवस्याग्रे ततो व्यास उपविश्य समाहितः

na kīrtayedyadā nāma sā yātrā viphalī bhavet devasyāgre tato vyāsa upaviśya samāhitaḥ

यदि नाम न कहा जाए तो वह यात्रा निष्फल हो जाती है। हे व्यास! तत्पश्चात् देव के सामने समाहितचित्त होकर बैठकर --

श्लोक 29 (skanda.5.23.29)

भक्तियुक्तस्ततो ब्रूयान्नमस्कृत्वा पुनःपुनः । मया समर्पिता यात्रा त्वत्प्रसादान्महेश्वर

bhaktiyuktastato brūyānnamaskṛtvā punaḥpunaḥ mayā samarpitā yātrā tvatprasādānmaheśvara

-- भक्तियुक्त होकर बार-बार नमस्कार करते हुए कहना चाहिए -- 'हे महेश्वर! आपकी कृपा से मैंने यह यात्रा सम्पन्न कर आपको समर्पित की है।

श्लोक 30 (skanda.5.23.30)

संसारसागराद्धोरान्मामुद्धर जगत्पते । अनेन विधिना यस्तु महाकालं प्रदक्षयेत्

saṁsārasāgarāddhorānmāmuddhara jagatpate anena vidhinā yastu mahākālaṁ pradakṣayet

हे जगत्पते! मुझे इस भयंकर संसार-सागर से उद्धार कीजिए।' इस विधि से जो कोई महाकाल की प्रदक्षिणा करता है --

श्लोक 31 (skanda.5.23.31)

प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा वसुंधरा । गोलक्षं द्विजलक्षाय दत्त्वा यल्लभते फलम्

pradakṣiṇīkṛtā tena saptadvīpā vasuṁdharā golakṣaṁ dvijalakṣāya dattvā yallabhate phalam

-- उसके द्वारा सप्तद्वीपवती समस्त पृथ्वी की प्रदक्षिणा हो जाती है। एक लाख गौओं को एक लाख ब्राह्मणों को दान देने से जो फल मिलता है --

श्लोक 32 (skanda.5.23.32)

तत्फलं देवदेवस्य सकृद्दत्त्वा प्रदक्षिणम् । भक्त्या परमया युक्तो महाकालं प्रदक्षयेत्

tatphalaṁ devadevasya sakṛddattvā pradakṣiṇam bhaktyā paramayā yukto mahākālaṁ pradakṣayet

-- वही फल देवाधिदेव की एक बार प्रदक्षिणा करने मात्र से मिलता है। परम भक्ति से युक्त होकर महाकाल की प्रदक्षिणा करनी चाहिए।

श्लोक 33 (skanda.5.23.33)

पदेपदे यज्ञफलमिति मे शंकरोऽब्रवीत् । षष्टिकोटि सहस्राणि षष्टिकोटिशतानि च

padepade yajñaphalamiti me śaṁkaro'bravīt ṣaṣṭikoṭi sahasrāṇi ṣaṣṭikoṭiśatāni ca

'हर पग पर यज्ञ का फल मिलता है' -- ऐसा स्वयं शंकर ने मुझसे कहा। साठ हजार करोड़ और साठ सौ करोड़ (देवगण) --

श्लोक 34 (skanda.5.23.34)

पूजितानि भवंत्यत्र यात्रेश्वरसमर्चनात् । य एवं कुरुते यात्रां शिवध्यानपरायणः

pūjitāni bhavaṁtyatra yātreśvarasamarcanāt ya evaṁ kurute yātrāṁ śivadhyānaparāyaṇaḥ

-- यात्रेश्वर की पूजा से यहाँ पूजित हो जाते हैं। जो इस प्रकार शिवध्यान में तत्पर होकर यात्रा करता है --

श्लोक 35 (skanda.5.23.35)

सहस्रदक्षिणां दद्यात्तस्य पुण्यफलं शृणु । सप्तजन्मकृतात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः

sahasradakṣiṇāṁ dadyāttasya puṇyaphalaṁ śṛṇu saptajanmakṛtātpāpānmucyate nātra saṁśayaḥ

-- मानो उसने सहस्र दक्षिणाएँ दी हों; उसका पुण्यफल सुनो -- वह सात जन्मों में किए गए पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 36 (skanda.5.23.36)

एवं यात्रां समाप्याथ गत्वा निजगृहं नरः । यात्रादैवत संख्यान्वै षड्विंशतिद्विजोत्तमान्

evaṁ yātrāṁ samāpyātha gatvā nijagṛhaṁ naraḥ yātrādaivata saṁkhyānvai ṣaḍviṁśatidvijottamān

इस प्रकार यात्रा समाप्त कर अपने घर लौटकर मनुष्य को यात्रा के देवताओं की संख्या के बराबर छब्बीस श्रेष्ठ द्विजों को --

श्लोक 37 (skanda.5.23.37)

भोजयेच्छिवभक्तांश्च शिवध्यानपरायणान् । सवस्त्रां दक्षिणां दत्त्वा प्राप्यानुज्ञां विसर्जयेत्

bhojayecchivabhaktāṁśca śivadhyānaparāyaṇān savastrāṁ dakṣiṇāṁ dattvā prāpyānujñāṁ visarjayet

-- शिवध्यानपरायण शिवभक्तों को भोजन कराना चाहिए। वस्त्र-सहित दक्षिणा देकर, उनकी अनुमति प्राप्त कर उन्हें विदा करना चाहिए।

श्लोक 38 (skanda.5.23.38)

यात्राक्रमेण चैकैकं द्वारांतरमनुव्रजेत् । धर्मोपदेशके पश्चात्सर्वोपस्करसंयुताम्

yātrākrameṇa caikaikaṁ dvārāṁtaramanuvrajet dharmopadeśake paścātsarvopaskarasaṁyutām

यात्रा-क्रम के अनुसार प्रत्येक द्वार पर बारी-बारी जाना चाहिए। इसके पश्चात् धर्मोपदेशक (गुरु) को सर्व उपकरणों से युक्त --

श्लोक 39 (skanda.5.23.39)

धेनुं पयस्विनीं दद्याद्वित्तशाठ्यविवर्जितः । भुञ्जीताथ स्वयं व्यास सर्वभृत्यसमन्वितः

dhenuṁ payasvinīṁ dadyādvittaśāṭhyavivarjitaḥ bhuñjītātha svayaṁ vyāsa sarvabhṛtyasamanvitaḥ

-- दूध देने वाली गाय धन की कृपणता त्यागकर देनी चाहिए। हे व्यास! फिर स्वयं अपने समस्त सेवकों के साथ भोजन करना चाहिए।

श्लोक 40 (skanda.5.23.40)

दीनानाथदरिद्रांधविकलाद्यांश्च भोजयेत् । यदत्र फलमुद्दिष्टं तद्वदामि शृणुष्व मे

dīnānāthadaridrāṁdhavikalādyāṁśca bhojayet yadatra phalamuddiṣṭaṁ tadvadāmi śṛṇuṣva me

दीन, अनाथ, दरिद्र, अंधे, अपंग आदि को भी भोजन कराना चाहिए। इससे जो फल कहा गया है, वह मैं बताता हूँ, मुझसे सुनो।

श्लोक 41 (skanda.5.23.41)

कुलानां शतमुद्धृत्य मातापित्रोः समाहितः । कल्पकोटिसहस्राणि शिवलोके स मोदते

kulānāṁ śatamuddhṛtya mātāpitroḥ samāhitaḥ kalpakoṭisahasrāṇi śivaloke sa modate

समाहितचित्त होकर माता और पिता के सौ-सौ कुलों का उद्धार करके, वह मनुष्य हजारों करोड़ कल्पों तक शिवलोक में आनन्दित रहता है।

अध्याय 22अध्याय-सूचीअध्याय 24