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अवन्ती खण्ड · अध्याय 24

वाल्मीकेश्वरमाहात्म्य-वर्णनम्

अध्याय 23अध्याय-सूचीअध्याय 25

श्लोक 1 (skanda.5.24.1)

सनत्कुमार उवाच । वाल्मीकेश्वरमित्याख्यं यस्तु देवं प्रपूजयेत् । मौनी ध्यानपरो भूत्वा स कवित्वमवाप्नुयात्

sanatkumāra uvāca vālmīkeśvaramityākhyaṁ yastu devaṁ prapūjayet maunī dhyānaparo bhūtvā sa kavitvamavāpnuyāt

सनत्कुमार ने कहा -- जो कोई वाल्मीकेश्वर नामक देव का पूजन मौन रहकर एवं ध्यानपरायण होकर करता है, वह कवित्व-शक्ति प्राप्त करता है।

श्लोक 2 (skanda.5.24.2)

व्यास उवाच । कथमत्र समुत्पन्नः कोऽसौ वाल्मीकेश्वरः प्रभुः । यस्य दर्शनमात्रेण कवित्वमुपजायते

vyāsa uvāca kathamatra samutpannaḥ ko'sau vālmīkeśvaraḥ prabhuḥ yasya darśanamātreṇa kavitvamupajāyate

व्यास ने कहा -- यह प्रभु वाल्मीकेश्वर यहाँ किस प्रकार प्रकट हुए, जिनके दर्शनमात्र से कवित्व की प्राप्ति होती है?

श्लोक 3 (skanda.5.24.3)

सनत्कुमार उवाच । आसीद्व्यास पुरा विप्रः सुमतिर्भृगु वंशजः । रूपयौवनसंपन्ना तस्य भार्याथ कौशिकी

sanatkumāra uvāca āsīdvyāsa purā vipraḥ sumatirbhṛgu vaṁśajaḥ rūpayauvanasaṁpannā tasya bhāryātha kauśikī

सनत्कुमार ने कहा -- हे व्यास! पूर्वकाल में भृगुवंश में उत्पन्न सुमति नामक एक ब्राह्मण थे; उनकी पत्नी कौशिकी रूप-यौवन से सम्पन्न थीं।

श्लोक 4 (skanda.5.24.4)

तस्य पुत्रः समुत्पन्नो ह्यग्निशर्मेति नामतः । स पित्रा प्रोच्यमानोऽपि वेदाभ्यासं न मन्यते

tasya putraḥ samutpanno hyagniśarmeti nāmataḥ sa pitrā procyamāno'pi vedābhyāsaṁ na manyate

उनके अग्निशर्मा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो पिता द्वारा समझाए जाने पर भी वेदाभ्यास को महत्व नहीं देता था।

श्लोक 5 (skanda.5.24.5)

ततो बहुतिथे काले अनावृष्टिरजायत । तस्यां विपद्गतः सोऽथ दक्षिणामाश्रितो दिशम्

tato bahutithe kāle anāvṛṣṭirajāyata tasyāṁ vipadgataḥ so'tha dakṣiṇāmāśrito diśam

तत्पश्चात् बहुत समय बीतने पर एक भीषण अनावृष्टि (अकाल) हुई; उससे विपत्तिग्रस्त होकर वह दक्षिण दिशा की ओर चला गया।

श्लोक 6 (skanda.5.24.6)

ततोऽसौ सुमतिर्विप्रः सभार्यः स सुतस्तथा । विदेशं काननं प्राप्तः कृत्वा चाश्रममाश्रितः

tato'sau sumatirvipraḥ sabhāryaḥ sa sutastathā videśaṁ kānanaṁ prāptaḥ kṛtvā cāśramamāśritaḥ

तब वह ब्राह्मण सुमति, अपनी पत्नी और उस पुत्र के साथ, विदेश के एक वन में पहुँचकर वहाँ आश्रम बनाकर रहने लगा।

श्लोक 7 (skanda.5.24.7)

आभीरैर्दस्युभिः सार्धं संगोऽभूदग्निशर्मणः । आगच्छति पथा तेन यस्तं हंति स पापकृत्

ābhīrairdasyubhiḥ sārdhaṁ saṁgo'bhūdagniśarmaṇaḥ āgacchati pathā tena yastaṁ haṁti sa pāpakṛt

अग्निशर्मा की संगति आभीर डाकुओं से हो गई; और उसका नियम बन गया कि जो भी उस मार्ग से आता, वह पापी उसे मार डालता।

श्लोक 8 (skanda.5.24.8)

स्मृतिर्नष्टा गता वेदा गतं गोत्रं गता श्रुतिः । कस्मिंश्चिदथ काले तु तीर्थयात्रा्प्रसंगतः

smṛtirnaṣṭā gatā vedā gataṁ gotraṁ gatā śrutiḥ kasmiṁścidatha kāle tu tīrthayātrāprasaṁgataḥ

उसकी स्मृति नष्ट हो गई, वेद विस्मृत हो गए, गोत्र भुला दिया गया, श्रुति खो गई। तभी किसी समय तीर्थयात्रा के प्रसंग में --

श्लोक 9 (skanda.5.24.9)

सप्तर्षयः पथा तेन सुव्रताः समुपस्थिताः । अग्निशर्माथ तान्दृष्ट्वा हन्तुकामोऽब्रवीदिदम्

saptarṣayaḥ pathā tena suvratāḥ samupasthitāḥ agniśarmātha tāndṛṣṭvā hantukāmo'bravīdidam

-- उसी मार्ग से सुव्रतधारी सप्तर्षि आ पहुँचे। अग्निशर्मा ने उन्हें देखकर, उन्हें मारने की इच्छा से यह कहा --

श्लोक 10 (skanda.5.24.10)

वस्त्राणीमानि मुच्यध्वं छत्रिकोपानहौ तथा । हन्तव्या हि मया यूयं गन्तारो यम सादने

vastrāṇīmāni mucyadhvaṁ chatrikopānahau tathā hantavyā hi mayā yūyaṁ gantāro yama sādane

-- 'ये वस्त्र, छाता और जूते उतार दो! तुम्हें मुझसे मरना ही है, तुम यमलोक जाने वाले हो!'

श्लोक 11 (skanda.5.24.11)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा अत्रिर्वचनमब्रवीत् । अस्मत्पीडनजं पापं कथं ते हृदि वर्तते । वयं तपस्विनो भूत्वा तीर्थयात्राकृतोद्यमाः

tasya tadvacanaṁ śrutvā atrirvacanamabravīt asmatpīḍanajaṁ pāpaṁ kathaṁ te hṛdi vartate vayaṁ tapasvino bhūtvā tīrthayātrākṛtodyamāḥ

उसका यह वचन सुनकर अत्रि ऋषि बोले -- 'हमें कष्ट पहुँचाने से उत्पन्न पाप तुम्हारे हृदय में कैसे टिका है? हम तो तपस्वी होकर तीर्थयात्रा में तत्पर हैं।'

श्लोक 12 (skanda.5.24.12)

अग्निशर्मोवाच । ममास्ति माताथ पिता सुतो भार्या गरीयसी । पोषयामि सदा तांस्तु एतन्मे हृदि संस्थितम्

agniśarmovāca mamāsti mātātha pitā suto bhāryā garīyasī poṣayāmi sadā tāṁstu etanme hṛdi saṁsthitam

अग्निशर्मा ने कहा -- 'मेरे माता, पिता, पुत्र और प्रिय पत्नी हैं; मैं सदा उनका पालन-पोषण करता हूँ, यही मेरे हृदय में बसा है।'

श्लोक 13 (skanda.5.24.13)

अत्रिरुवाच । पित्रादीनाशु पृच्छस्व स्वकर्मोपार्जितं प्रति । यद्युष्मदर्थं क्रियते पापं तत्कस्य कथ्यताम्

atriruvāca pitrādīnāśu pṛcchasva svakarmopārjitaṁ prati yadyuṣmadarthaṁ kriyate pāpaṁ tatkasya kathyatām

अत्रि ने कहा -- 'तुरन्त जाकर अपने माता-पिता आदि से अपने इस कर्म के विषय में पूछो; तुम्हारे लिए जो पाप किया जा रहा है, वह किसका है, यह बताया जाए।'

श्लोक 14 (skanda.5.24.14)

यदि ते कथयंति स्म मा मृषा प्राणिनो वधीः

yadi te kathayaṁti sma mā mṛṣā prāṇino vadhīḥ

'यदि वे बता दें, तो ठीक; अन्यथा व्यर्थ ही प्राणियों का वध मत करो।'

श्लोक 15 (skanda.5.24.15)

अग्निशर्मोवाच । न कदाचिन्मया ते तु संपृष्टा ईदृशं वचः । युष्माकं वचसा मेऽद्य प्रतिबोधः प्रवर्तते

agniśarmovāca na kadācinmayā te tu saṁpṛṣṭā īdṛśaṁ vacaḥ yuṣmākaṁ vacasā me'dya pratibodhaḥ pravartate

अग्निशर्मा ने कहा -- 'मैंने उनसे कभी ऐसा प्रश्न नहीं पूछा। आज आपके वचन से मुझे यह प्रतिबोध हुआ है।

श्लोक 16 (skanda.5.24.16)

गत्वा पृच्छामि तान्सर्वान्कस्य भावश्च कीदृशः । यूयमत्रैव तिष्ठध्वं यावदागमनं मम

gatvā pṛcchāmi tānsarvānkasya bhāvaśca kīdṛśaḥ yūyamatraiva tiṣṭhadhvaṁ yāvadāgamanaṁ mama

मैं जाकर उन सभी से पूछता हूँ कि किसका क्या भाव है। आप यहीं ठहरें, जब तक मैं लौट न आऊँ।'

श्लोक 17 (skanda.5.24.17)

इत्युक्त्वा ताञ्जगामाशु पितरं स्वमुवाच ह । धर्मस्य प्रतिघातेन प्राणिनां पीडनेन च

ityuktvā tāñjagāmāśu pitaraṁ svamuvāca ha dharmasya pratighātena prāṇināṁ pīḍanena ca

ऐसा कहकर वह शीघ्र उनके पास गया और अपने पिता से बोला -- 'धर्म के विरुद्ध आचरण और प्राणियों को पीड़ा पहुँचाने से --

श्लोक 18 (skanda.5.24.18)

सुमहद्दृश्यते पापं कस्य तत्कथ्यतां मम । पिता प्राह तथा माता नापुण्यमावयोरिह

sumahaddṛśyate pāpaṁ kasya tatkathyatāṁ mama pitā prāha tathā mātā nāpuṇyamāvayoriha

-- मुझे महान पाप दिखाई देता है, बताइए यह किसका है?' पिता ने कहा, और माता ने भी -- 'इसमें हम दोनों का कोई पाप नहीं है।

श्लोक 19 (skanda.5.24.19)

त्वं जानासि यत्कुरुषे कृतं भाव्यं पुनस्त्वया । तयोस्तद्वचनं श्रुत्वा भार्या वचनमब्रवीत्

tvaṁ jānāsi yatkuruṣe kṛtaṁ bhāvyaṁ punastvayā tayostadvacanaṁ śrutvā bhāryā vacanamabravīt

तुम जो करते हो, वह तुम जानते हो; जो किया गया है, उसे तुम्हें ही भोगना होगा।' उनके ये वचन सुनकर उसने पत्नी से पूछा, तो वह भी बोली --

श्लोक 20 (skanda.5.24.20)

तयाप्युक्तं न मे पापं पापमेतत्तवैव हि । तद्वाक्यमब्रवीत्पुत्रं बालोऽहमितिसोऽब्रवीत्

tayāpyuktaṁ na me pāpaṁ pāpametattavaiva hi tadvākyamabravītputraṁ bālo'hamitiso'bravīt

-- उसने भी कहा 'मेरा कोई पाप नहीं, यह पाप तुम्हारा ही है।' यही प्रश्न उसने पुत्र से पूछा, तो पुत्र ने कहा 'मैं तो बालक हूँ।'

श्लोक 21 (skanda.5.24.21)

तज्ज्ञात्वा हृदयं तेषां चेष्टितं चैव तत्त्वतः । नष्टोऽहमिति मन्वानः शरणं मे तपस्विनः

tajjñātvā hṛdayaṁ teṣāṁ ceṣṭitaṁ caiva tattvataḥ naṣṭo'hamiti manvānaḥ śaraṇaṁ me tapasvinaḥ

उन सबका हृदय और आचरण यथार्थ रूप से जानकर, 'मैं नष्ट हो गया' ऐसा मानते हुए उसने सोचा कि अब तपस्वीजन ही मेरी शरण हैं।

श्लोक 22 (skanda.5.24.22)

क्षिप्त्वाथ लगुडं कृष्णं येन वै जंतवो हताः । प्रकीर्य केशांस्त्वरित ऋषीणामग्रतः स्थितः

kṣiptvātha laguḍaṁ kṛṣṇaṁ yena vai jaṁtavo hatāḥ prakīrya keśāṁstvarita ṛṣīṇāmagrataḥ sthitaḥ

जिस काले डंडे से उसने जीवों को मारा था, उसे फेंककर, बाल बिखेरकर, वह शीघ्र ऋषियों के सामने जा खड़ा हुआ।

श्लोक 23 (skanda.5.24.23)

प्रणम्य दंडपातेन ततो वचनमव्रवीत् । न मे माता न च पिता न भार्या न च मे सुतः

praṇamya daṁḍapātena tato vacanamavravīt na me mātā na ca pitā na bhāryā na ca me sutaḥ

दण्ड के समान भूमि पर गिरकर प्रणाम कर उसने कहा -- 'न मेरी माता, न पिता, न पत्नी, न ही मेरा पुत्र (यह पाप स्वीकारते हैं) --

श्लोक 24 (skanda.5.24.24)

सर्वैस्तैः परिमुक्तौऽहं भवतां शरणं गतः । सुष्ठूपदेशदानान्मां नरकात्त्रातुमर्हथ

sarvaistaiḥ parimuktau'haṁ bhavatāṁ śaraṇaṁ gataḥ suṣṭhūpadeśadānānmāṁ narakāttrātumarhatha

-- इन सबके द्वारा त्यागे जाने पर मैं आपकी शरण में आया हूँ। सम्यक् उपदेश देकर आप मुझे नरक से बचाइए।'

श्लोक 25 (skanda.5.24.25)

एवं तं वादिनं दृष्ट्वा ऋषयोऽत्रिमथाब्रुवन् । भवतो वचनादस्य प्रतिबोधः समागतः

evaṁ taṁ vādinaṁ dṛṣṭvā ṛṣayo'trimathābruvan bhavato vacanādasya pratibodhaḥ samāgataḥ

इस प्रकार उसे बोलते देख ऋषियों ने अत्रि से कहा -- 'आपके वचन से ही इसे यह प्रतिबोध प्राप्त हुआ है।

श्लोक 26 (skanda.5.24.26)

भवताऽयमनुग्राह्यः शिष्यो भवतु ते मुने । तथेत्युक्ताथ तान्प्राह चाग्निं ध्यानं समाचर

bhavatā'yamanugrāhyaḥ śiṣyo bhavatu te mune tathetyuktātha tānprāha cāgniṁ dhyānaṁ samācara

आपके द्वारा ही यह अनुगृहीत होने योग्य है; हे मुने! यह आपका शिष्य बने।' 'ऐसा ही हो' कहकर अत्रि ने उससे कहा -- 'अग्नि का ध्यान करो --

श्लोक 27 (skanda.5.24.27)

अनेन ध्यानयोगेन महामंत्रजपेन च । अनेकदुस्तरात्युग्रपापकृज्जनघातकः । संस्थितो वृक्ष मूले त्वं परा सिद्धिं गमिष्यसि

anena dhyānayogena mahāmaṁtrajapena ca anekadustarātyugrapāpakṛjjanaghātakaḥ saṁsthito vṛkṣa mūle tvaṁ parā siddhiṁ gamiṣyasi

-- इस ध्यान-योग और महामन्त्र-जप से; हे अनेक दुस्तर घोर पापों के कर्ता, जनघातक! वृक्ष के मूल में स्थिर होकर तुम परम सिद्धि को प्राप्त करोगे।'

श्लोक 28 (skanda.5.24.28)

इत्युक्त्वा ते ययुः सर्वे संकामं सोऽपि तत्र वै । तद्ध्यानस्थोऽभवद्योगी वत्सराणि त्रयोदश

ityuktvā te yayuḥ sarve saṁkāmaṁ so'pi tatra vai taddhyānastho'bhavadyogī vatsarāṇi trayodaśa

ऐसा कहकर वे सब अपने-अपने मार्ग को चले गए; और वह भी वहीं रहकर तेरह वर्षों तक उस ध्यान में योगीरूप में स्थित रहा।

श्लोक 29 (skanda.5.24.29)

तस्योपर्यभवत्तत्र वल्मीकोऽविचलस्य च । निवृत्तास्तु पथा तेन मुनयस्तत्र शुश्रुवुः

tasyoparyabhavattatra valmīko'vicalasya ca nivṛttāstu pathā tena munayastatra śuśruvuḥ

निश्चल रूप से स्थित उसके ऊपर वहाँ एक बाँबी (वल्मीक) बन गई। लौटते हुए उसी मार्ग से जाते ऋषियों ने वहाँ --

श्लोक 30 (skanda.5.24.30)

उदीरितं ध्वनिं तेन वल्मीके विस्मयान्विताः । ततः खनित्वा वल्मीकं काष्ठीभूतोरुशंकुभिः

udīritaṁ dhvaniṁ tena valmīke vismayānvitāḥ tataḥ khanitvā valmīkaṁ kāṣṭhībhūtoruśaṁkubhiḥ

-- उस बाँबी में से निकलती हुई ध्वनि सुनी और आश्चर्यचकित हो गए। तब मोटी लकड़ी की कीलों से बाँबी को खोदकर --

श्लोक 31 (skanda.5.24.31)

तं दृष्ट्वोत्थापयामासुर्मुनयो नयसंयुतम् । नमश्चक्रेऽथ तान्सर्वान्स विप्रो मुनिपुंगवान्

taṁ dṛṣṭvotthāpayāmāsurmunayo nayasaṁyutam namaścakre'tha tānsarvānsa vipro munipuṁgavān

-- ऋषियों ने उसे देखकर सावधानीपूर्वक ऊपर उठाया। उस ब्राह्मण ने प्रणत होकर उन सभी श्रेष्ठ मुनियों को प्रणाम किया।

श्लोक 32 (skanda.5.24.32)

तान्प्राह प्रणतो भूत्वा तपसा दीप्ततेजसः । प्रसादाद्भवतामद्य ज्ञानं लब्धं मया शुभम्

tānprāha praṇato bhūtvā tapasā dīptatejasaḥ prasādādbhavatāmadya jñānaṁ labdhaṁ mayā śubham

तपस्या से देदीप्यमान तेजयुक्त होकर, प्रणाम करते हुए उसने उनसे कहा -- 'आपकी कृपा से आज मुझे शुभ ज्ञान प्राप्त हुआ है।

श्लोक 33 (skanda.5.24.33)

दीनोऽहमुद्धृतः सर्वैर्मग्नोऽहं पापकर्दमे । तस्येति ते वाक्यमूचुः परमधार्मिकाः

dīno'hamuddhṛtaḥ sarvairmagno'haṁ pāpakardame tasyeti te vākyamūcuḥ paramadhārmikāḥ

मैं दीन, पाप के दलदल में डूबा हुआ था, आप सबने मुझे उससे उबार लिया।' तब उन परम धार्मिक ऋषियों ने उससे कहा --

श्लोक 34 (skanda.5.24.34)

वल्मीकेऽस्मिन्स्थितः पुत्र यतस्त्वमेकचित्ततः । वाल्मीकिरिति ते नाम भुवि ख्यातं भवि ष्यति

valmīke'sminsthitaḥ putra yatastvamekacittataḥ vālmīkiriti te nāma bhuvi khyātaṁ bhavi ṣyati

-- 'हे पुत्र! चूँकि तुम एकाग्रचित्त होकर इस बाँबी (वल्मीक) में स्थित रहे, इसलिए संसार में तुम्हारा नाम वाल्मीकि के रूप में विख्यात होगा।'

श्लोक 35 (skanda.5.24.35)

इत्युक्त्वा मुनयो जग्मुः स्वां दिशां तपसान्विताः । गतेषु मुनिमुख्येषु वाल्मीकिस्तपतां वरः । कुशस्थल्यामथागम्य समाराध्य महेश्वरम्

ityuktvā munayo jagmuḥ svāṁ diśāṁ tapasānvitāḥ gateṣu munimukhyeṣu vālmīkistapatāṁ varaḥ kuśasthalyāmathāgamya samārādhya maheśvaram

ऐसा कहकर तपस्वी मुनि अपने-अपने स्थान को चले गए। मुख्य मुनियों के जाने पर तपस्वियों में श्रेष्ठ वाल्मीकि कुशस्थली आकर महेश्वर की आराधना कर --

श्लोक 36 (skanda.5.24.36)

तस्मात्कवित्वमासाद्य चक्रे काव्यं मनोरमम् । रामायणं च यत्प्राहुः कथां सुप्रथमस्थिताम्

tasmātkavitvamāsādya cakre kāvyaṁ manoramam rāmāyaṇaṁ ca yatprāhuḥ kathāṁ suprathamasthitām

-- उनसे कवित्व-शक्ति प्राप्त कर उसने मनोहर काव्य की रचना की -- रामायण, जिसे कथाओं में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त बताया जाता है।

श्लोक 37 (skanda.5.24.37)

ततः प्रभृति देवेशो वाल्मीकेश्वरसंज्ञकः । ख्यातोऽवंत्यां ततो व्यास नृणां कवित्वदायकः

tataḥ prabhṛti deveśo vālmīkeśvarasaṁjñakaḥ khyāto'vaṁtyāṁ tato vyāsa nṛṇāṁ kavitvadāyakaḥ

तभी से देवेश 'वाल्मीकेश्वर' नाम से विख्यात हुए। हे व्यास! इस प्रकार अवन्ती में वे मनुष्यों को कवित्व प्रदान करने वाले देव के रूप में प्रसिद्ध हुए।

श्लोक 38 (skanda.5.24.38)

इति ते कथितं लिंगं वाल्मीकेश्वरमुत्तमम् । यस्य दर्शनमात्रे ण कवित्वमुपपद्यते

iti te kathitaṁ liṁgaṁ vālmīkeśvaramuttamam yasya darśanamātre ṇa kavitvamupapadyate

इस प्रकार तुम्हें यह उत्तम लिंग वाल्मीकेश्वर बताया गया, जिसके दर्शनमात्र से कवित्व की प्राप्ति होती है।

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