अवन्ती खण्ड · अध्याय 25
शुक्रेश्वर-भीमेश्वर-गर्गेश्वर-कामेश्वर-चूडामणीश्वर-चण्डीश्वरादि-तीर्थमाहात्म्य-वर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.5.25.1)
सनत्कुमार उवाच । शुक्रेश्वरं समभ्यर्च्य सितपुष्पैर्विलेपनैः । प्रणिपत्य ततो भक्त्या रुद्रलोके महीयते
sanatkumāra uvāca śukreśvaraṁ samabhyarcya sitapuṣpairvilepanaiḥ praṇipatya tato bhaktyā rudraloke mahīyate
सनत्कुमार ने कहा -- श्वेत पुष्पों और लेपों से शुक्रेश्वर की पूजा कर, फिर भक्तिपूर्वक प्रणाम करने वाला रुद्रलोक में महिमामण्डित होता है।
श्लोक 2 (skanda.5.25.2)
भीमेश्वरं नरो दृष्ट्वा भक्त्या संपूज्य यत्नतः । न भयं लभते व्यास रणे रात्रौ जलेऽनले
bhīmeśvaraṁ naro dṛṣṭvā bhaktyā saṁpūjya yatnataḥ na bhayaṁ labhate vyāsa raṇe rātrau jale'nale
हे व्यास! जो मनुष्य यत्नपूर्वक भक्ति से भीमेश्वर का दर्शन और पूजन करता है, उसे युद्ध में, रात्रि में, जल में अथवा अग्नि में कहीं भी भय नहीं होता।
श्लोक 3 (skanda.5.25.3)
गर्गेश्वरं स्नापयित्वा तिलतैलेन मानवः । बिल्वपत्रैस्तु संपूज्य धर्मवृद्धिमवाप्नुयात्
gargeśvaraṁ snāpayitvā tilatailena mānavaḥ bilvapatraistu saṁpūjya dharmavṛddhimavāpnuyāt
जो मनुष्य तिल के तेल से गर्गेश्वर का स्नपन कर बिल्वपत्रों से उनका पूजन करता है, वह धर्म में वृद्धि प्राप्त करता है।
श्लोक 4 (skanda.5.25.4)
उपोषितश्चतुर्दश्यां तिलप्रस्थतिलांभसा । स्नापयित्वा तिलैरिष्ट्वा सदा सौख्यमवाप्नुयात्
upoṣitaścaturdaśyāṁ tilaprasthatilāṁbhasā snāpayitvā tilairiṣṭvā sadā saukhyamavāpnuyāt
चतुर्दशी को उपवास रखकर एक प्रस्थ तिल मिश्रित जल से स्नपन कर तिलों से पूजा करने वाला सदा सुख प्राप्त करता है।
श्लोक 5 (skanda.5.25.5)
गोसहस्रं नरो दत्त्वा भावं कृत्वा विशेषतः । भवबंधविनिर्मुक्तो रुद्रलोकं स गच्छति
gosahasraṁ naro dattvā bhāvaṁ kṛtvā viśeṣataḥ bhavabaṁdhavinirmukto rudralokaṁ sa gacchati
विशेष रूप से शुद्ध भाव रखकर सहस्र गौओं का दान करने वाला मनुष्य संसार-बन्धन से मुक्त होकर रुद्रलोक को जाता है।
श्लोक 6 (skanda.5.25.6)
कामेश्वरं समभ्यर्च्य कुंकुमादिविलेपनैः । कामिकेन विमानेन याति स्वर्गं न संशयः
kāmeśvaraṁ samabhyarcya kuṁkumādivilepanaiḥ kāmikena vimānena yāti svargaṁ na saṁśayaḥ
कुंकुम आदि लेपों से कामेश्वर की पूजा करने वाला निःसंदेह कामनापूर्ति करने वाले विमान से स्वर्ग को जाता है।
श्लोक 7 (skanda.5.25.7)
चूडामणिं नमस्कृत्य नवम्यां कार्तिके सिते । न वियोनिं नरो याति धर्मबुद्धिः स जायते
cūḍāmaṇiṁ namaskṛtya navamyāṁ kārtike site na viyoniṁ naro yāti dharmabuddhiḥ sa jāyate
कार्तिक शुक्ल नवमी को चूडामणि को नमस्कार करने वाला मनुष्य कभी नीच योनि को प्राप्त नहीं होता, वह धर्मबुद्धि युक्त हो जाता है।
श्लोक 8 (skanda.5.25.8)
चंडीश्वरं समभ्यर्च्य कृष्णाष्टम्यामुपोषितः । निर्माल्योल्लंघनोत्थेन न शोकेनापि लिप्यते
caṁḍīśvaraṁ samabhyarcya kṛṣṇāṣṭamyāmupoṣitaḥ nirmālyollaṁghanotthena na śokenāpi lipyate
कृष्ण अष्टमी को उपवास रखकर चण्डीश्वर की पूजा करने वाला निर्माल्य के उल्लंघन से उत्पन्न शोक से भी लिप्त नहीं होता।
श्लोक 9 (skanda.5.25.9)
इत्यादितीर्थानि महेश्वरस्य पुण्यानि सर्वाणि नरोऽभिगम्य । विशुद्धचित्तो भुवि भावितात्मा प्रयाति शंभोर्भुवनं सुरम्यम्
ityāditīrthāni maheśvarasya puṇyāni sarvāṇi naro'bhigamya viśuddhacitto bhuvi bhāvitātmā prayāti śaṁbhorbhuvanaṁ suramyam
इस प्रकार महेश्वर के इन आदि सभी पुण्य तीर्थों में जाकर, पृथ्वी पर विशुद्धचित्त और भावित-आत्मा मनुष्य शम्भु के अत्यन्त रमणीय भुवन को प्राप्त होता है।