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अवन्ती खण्ड · अध्याय 26

मन्दाकिनीक्षेत्रमाहात्म्य-वर्णनम्

अध्याय 25अध्याय-सूचीअध्याय 27

श्लोक 1 (skanda.5.26.1)

व्यास उवाच । गुह्यस्थाने पवित्राणि कीर्तितानि त्वया मुने । प्रमाणं कथयस्वाद्य महाकालवनस्य मे

vyāsa uvāca guhyasthāne pavitrāṇi kīrtitāni tvayā mune pramāṇaṁ kathayasvādya mahākālavanasya me

व्यास ने कहा -- हे मुने! आपने गुह्य स्थान में स्थित पवित्र तीर्थों का वर्णन किया; अब आज मुझे महाकालवन का विस्तार (प्रमाण) बताइए।

श्लोक 2 (skanda.5.26.2)

सनत्कुमार उवाच । यथाश्रुतं मया पूर्वं गदतो ब्रह्मणः स्वयम् । तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि शृणु त्वं गदतो मम

sanatkumāra uvāca yathāśrutaṁ mayā pūrvaṁ gadato brahmaṇaḥ svayam tatte'haṁ saṁpravakṣyāmi śṛṇu tvaṁ gadato mama

सनत्कुमार ने कहा -- जैसा मैंने पूर्वकाल में स्वयं ब्रह्मा के मुख से सुना था, वही मैं तुम्हें बताता हूँ; सुनो, मैं कहता हूँ।

श्लोक 3 (skanda.5.26.3)

योजनस्यैव पर्यंतं चतुर्दिक्षूपशोभितम् । सौवर्णैस्तोरणैश्चैव मुक्तादामविलंबिभिः

yojanasyaiva paryaṁtaṁ caturdikṣūpaśobhitam sauvarṇaistoraṇaiścaiva muktādāmavilaṁbibhiḥ

वह वन एक योजन तक विस्तृत है, चारों दिशाओं में सुशोभित, मोतियों की झालरों से युक्त सुवर्ण-तोरणों से अलंकृत है।

श्लोक 4 (skanda.5.26.4)

द्वाराणि तत्र शोभंते कांचनैः कलशैः स्थितैः । सितपद्ममुखैर्द्वारैरनेकमणिमंडितैः

dvārāṇi tatra śobhaṁte kāṁcanaiḥ kalaśaiḥ sthitaiḥ sitapadmamukhairdvārairanekamaṇimaṁḍitaiḥ

वहाँ के द्वार स्वर्ण-कलशों से सुशोभित हैं, श्वेत कमलों से चिह्नित प्रवेश-द्वार अनेक मणियों से मंडित हैं।

श्लोक 5 (skanda.5.26.5)

महेश्वरप्रयुक्ताश्च द्वाराध्यक्षा महाबलाः । द्वारेषु तेषु शोभंते लोकानुग्रहकारकाः

maheśvaraprayuktāśca dvārādhyakṣā mahābalāḥ dvāreṣu teṣu śobhaṁte lokānugrahakārakāḥ

महेश्वर द्वारा नियुक्त महाबली द्वारपाल उन द्वारों पर शोभा पाते हैं, जो लोक-कल्याण करने वाले हैं।

श्लोक 6 (skanda.5.26.6)

पिंगलेशः स्थितः पूर्वे बालरूपो विभावसुः । तीर्थस्याभिमुखो गौरो गुरुर्गणैरथानुगः

piṁgaleśaḥ sthitaḥ pūrve bālarūpo vibhāvasuḥ tīrthasyābhimukho gauro gururgaṇairathānugaḥ

पूर्व दिशा में पिंगलेश स्थित हैं, बाल-रूप में, अग्नि के समान तेजस्वी, गौरवर्ण, गुरुस्वरूप, तीर्थ की ओर मुख किए, अपने गणों से अनुगत।

श्लोक 7 (skanda.5.26.7)

दक्षिणेऽपि महायोगी कायावरोहणेश्वरः । वित्तेशः पश्चिमे द्वारे क्षेत्रस्याभिमुखः स्थितः

dakṣiṇe'pi mahāyogī kāyāvarohaṇeśvaraḥ vitteśaḥ paścime dvāre kṣetrasyābhimukhaḥ sthitaḥ

दक्षिण में महायोगी कायावरोहणेश्वर हैं; पश्चिम द्वार पर वित्तेश (धनाधिपति) क्षेत्र की ओर मुख किए स्थित हैं।

श्लोक 8 (skanda.5.26.8)

नियुक्तो वै महेशेन वारुणीं दिशमास्थितः । उत्तरां दिशमाश्रित्य स्थितश्चैवोत्तरेश्वरः

niyukto vai maheśena vāruṇīṁ diśamāsthitaḥ uttarāṁ diśamāśritya sthitaścaivottareśvaraḥ

महेश द्वारा नियुक्त होकर वे वारुणी दिशा में स्थित हैं; उत्तर दिशा में उत्तरेश्वर स्थित हैं।

श्लोक 9 (skanda.5.26.9)

साधकः सर्वकार्याणामादिष्टः शंकरेण सः । मानवा ये वसंत्यत्र क्षेत्रमध्ये सुधार्मिकाः

sādhakaḥ sarvakāryāṇāmādiṣṭaḥ śaṁkareṇa saḥ mānavā ye vasaṁtyatra kṣetramadhye sudhārmikāḥ

शंकर द्वारा आदेशित वे सभी कार्यों के सिद्धकर्ता हैं। इस क्षेत्र के मध्य जो सुधार्मिक मनुष्य निवास करते हैं --

श्लोक 10 (skanda.5.26.10)

मृता रुद्रपुरं यांति विमानैः सार्वकामिकैः । कृष्णपक्षे चतुर्दश्यामथ वार्केन्दुसंगमे

mṛtā rudrapuraṁ yāṁti vimānaiḥ sārvakāmikaiḥ kṛṣṇapakṣe caturdaśyāmatha vārkendusaṁgame

-- वे मरणोपरान्त सर्वकामप्रद विमानों से रुद्रपुर को जाते हैं। कृष्णपक्ष चतुर्दशी को, अथवा शनिवार और चन्द्रमा के योग में --

श्लोक 11 (skanda.5.26.11)

पंचेशानीं नमस्कृत्य प्रतिलोमानु लोमतः । उपोषितो दिनैकेन ध्यायमानो महेश्वरम्

paṁceśānīṁ namaskṛtya pratilomānu lomataḥ upoṣito dinaikena dhyāyamāno maheśvaram

-- पंचेशानी को अनुलोम-विलोम क्रम से नमस्कार कर, एक दिन उपवास रखकर, महेश्वर का ध्यान करते हुए --

श्लोक 12 (skanda.5.26.12)

मुच्यते सर्वपापैस्तु बहुजन्मकृतैरपि । एवं च विप्र यो यात्रां पंचेशानीं समारभेत्

mucyate sarvapāpaistu bahujanmakṛtairapi evaṁ ca vipra yo yātrāṁ paṁceśānīṁ samārabhet

-- मनुष्य अनेक जन्मों में किए गए पापों से भी मुक्त हो जाता है। हे विप्र! इस प्रकार जो पंचेशानी की यात्रा आरम्भ करता है --

श्लोक 13 (skanda.5.26.13)

अनेनैव स्वदेहेन रुद्रलोकं स गच्छति । पंचेशानीमथान्यां ते सुखेन क्रियते यथा

anenaiva svadehena rudralokaṁ sa gacchati paṁceśānīmathānyāṁ te sukhena kriyate yathā

-- वह इसी देह से रुद्रलोक को जाता है। अब सुनो, दूसरी पंचेशानी-यात्रा भी जिस सुगम विधि से की जाती है --

श्लोक 14 (skanda.5.26.14)

तथा शृणु प्रवक्ष्यामि सर्वपापप्रणाशिनीम् । प्रातः स्नात्वा रुद्रसरस्येकादश्यां समाहितः

tathā śṛṇu pravakṣyāmi sarvapāpapraṇāśinīm prātaḥ snātvā rudrasarasyekādaśyāṁ samāhitaḥ

-- वह सर्वपापनाशिनी विधि मैं बताता हूँ, सुनो। एकादशी को प्रातःकाल रुद्रसरोवर में स्नान कर समाहितचित्त होकर --

श्लोक 15 (skanda.5.26.15)

श्राद्धं कृत्वा महाकालं नत्वा चेशानमीश्वरम् । पिंगलेशं ततः प्राप्य स्नात्वा श्राद्धं समाचरेत्

śrāddhaṁ kṛtvā mahākālaṁ natvā ceśānamīśvaram piṁgaleśaṁ tataḥ prāpya snātvā śrāddhaṁ samācaret

-- श्राद्ध कर, महाकाल और ईशान को प्रणाम कर, तत्पश्चात् पिंगलेश के पास जाकर वहाँ स्नान कर श्राद्ध करना चाहिए।

श्लोक 16 (skanda.5.26.16)

उपगम्य ततो देवं गणेशं पिंगलेश्वरम् । गन्धैः पुष्पैश्च धूपैश्च तमभ्यर्च्य निवर्तयेत्

upagamya tato devaṁ gaṇeśaṁ piṁgaleśvaram gandhaiḥ puṣpaiśca dhūpaiśca tamabhyarcya nivartayet

तत्पश्चात् देव गणेश पिंगलेश्वर के पास जाकर गन्ध, पुष्प और धूप से उनका पूजन कर विदा लेनी चाहिए।

श्लोक 17 (skanda.5.26.17)

महाकालेश्वरं प्राप्य भूयः स्नातो जितेंद्रियः । अर्चयेद्देवदेवेशं स्वयंभुवं सनातनम्

mahākāleśvaraṁ prāpya bhūyaḥ snāto jiteṁdriyaḥ arcayeddevadeveśaṁ svayaṁbhuvaṁ sanātanam

पुनः महाकालेश्वर के पास आकर, इन्द्रियसंयमी होकर पुनः स्नान कर, सनातन स्वयंभू देवाधिदेव का पूजन करना चाहिए।

श्लोक 18 (skanda.5.26.18)

ईशाने गमयेद्रात्रिं कृत्वा वै नक्तभोजनम् । ध्यायमानो महेशानं भूमौ विन्यस्य विग्रहम्

īśāne gamayedrātriṁ kṛtvā vai naktabhojanam dhyāyamāno maheśānaṁ bhūmau vinyasya vigraham

ईशान में रात्रि व्यतीत करनी चाहिए, केवल रात्रि में भोजन कर, महेशान का ध्यान करते हुए, पृथ्वी पर ही शयन कर।

श्लोक 19 (skanda.5.26.19)

द्वादश्यां पूर्ववत्सर्वं प्रातः स्नात्वा व्रजेन्नरः । कायावरोहणं गत्वा पिंगलेश्वरवद्यजेत्

dvādaśyāṁ pūrvavatsarvaṁ prātaḥ snātvā vrajennaraḥ kāyāvarohaṇaṁ gatvā piṁgaleśvaravadyajet

द्वादशी को पूर्ववत् सब विधि कर, प्रातः स्नान कर मनुष्य को आगे बढ़ना चाहिए; कायावरोहण जाकर पिंगलेश्वर की भाँति पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 20 (skanda.5.26.20)

त्रयोदश्यामथाप्येवं बिल्वेशं पश्चिमेऽर्चयेत् । चतुर्दश्यां तथा सौम्ये पूजयेदुत्तरेश्वरम्

trayodaśyāmathāpyevaṁ bilveśaṁ paścime'rcayet caturdaśyāṁ tathā saumye pūjayeduttareśvaram

त्रयोदशी को इसी प्रकार पश्चिम में बिल्वेश की पूजा करनी चाहिए; चतुर्दशी को सौम्य विधि से उत्तरेश्वर का पूजन करना चाहिए।

श्लोक 21 (skanda.5.26.21)

अमावास्यां शुचिः स्नातो महाकालेश्वरं यजेत् । गन्धैः पुष्पैश्च धूपैश्च नैवेद्यैर्विविधैस्तथा

amāvāsyāṁ śuciḥ snāto mahākāleśvaraṁ yajet gandhaiḥ puṣpaiśca dhūpaiśca naivedyairvividhaistathā

अमावास्या को शुद्ध होकर स्नान कर गन्ध, पुष्प, धूप और विविध नैवेद्यों से महाकालेश्वर का पूजन करना चाहिए।

श्लोक 22 (skanda.5.26.22)

गीतनृत्यादिकं कृत्वा प्रणिपत्य क्षमापयेत् । यात्रां कृत्वा तु पूर्वोक्तां ततो निजगृहं व्रजेत्

gītanṛtyādikaṁ kṛtvā praṇipatya kṣamāpayet yātrāṁ kṛtvā tu pūrvoktāṁ tato nijagṛhaṁ vrajet

गीत-नृत्य आदि कर, प्रणाम कर क्षमा माँगनी चाहिए। इस प्रकार पूर्वोक्त यात्रा पूर्ण कर तत्पश्चात् अपने घर लौटना चाहिए।

श्लोक 23 (skanda.5.26.23)

ब्राह्मणान्भोजयेत्पञ्च शिवभक्तिपरायणान् । प्रणम्य देवतारूपान्महाकालोषितान्द्विजान्

brāhmaṇānbhojayetpañca śivabhaktiparāyaṇān praṇamya devatārūpānmahākāloṣitāndvijān

शिवभक्तिपरायण पाँच ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए, महाकाल में निवास करने वाले द्विजों को देवस्वरूप मानकर प्रणाम करना चाहिए।

श्लोक 24 (skanda.5.26.24)

पूजयित्वा हिरण्येन सूक्ष्मवस्त्रगुणैर्नवैः । रथं पिंगलके दद्याद्गजं कायावरोहणे

pūjayitvā hiraṇyena sūkṣmavastraguṇairnavaiḥ rathaṁ piṁgalake dadyādgajaṁ kāyāvarohaṇe

उन्हें सुवर्ण और नवीन सूक्ष्म वस्त्रों से पूजकर, पिंगलक के निमित्त रथ और कायावरोहण के निमित्त गज दान करना चाहिए।

श्लोक 25 (skanda.5.26.25)

दत्त्वा बिल्वेश्वरे चाश्वं वृषं दत्त्वा तु चोत्तरे । धेनुं दत्त्वा महाकाले सर्वोपस्करसंयुतम्

dattvā bilveśvare cāśvaṁ vṛṣaṁ dattvā tu cottare dhenuṁ dattvā mahākāle sarvopaskarasaṁyutam

बिल्वेश्वर के निमित्त अश्व और उत्तर के निमित्त वृषभ दान करना चाहिए; महाकाल के निमित्त सर्व उपकरणों सहित गौ का दान करना चाहिए।

श्लोक 26 (skanda.5.26.26)

य एवं कुरुते व्यास तस्य पुण्यफलं शृणु

ya evaṁ kurute vyāsa tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu

हे व्यास! जो इस प्रकार करता है, उसका पुण्यफल सुनो।

श्लोक 27 (skanda.5.26.27)

पितृकैर्मातृकैः सार्धं कुलैः स दिवि मोदते । अप्सरोगीतनृत्याद्यैर्विमानैः सार्वकामिकैः

pitṛkairmātṛkaiḥ sārdhaṁ kulaiḥ sa divi modate apsarogītanṛtyādyairvimānaiḥ sārvakāmikaiḥ

वह अपने पितृ-कुल और मातृ-कुल के साथ स्वर्ग में आनन्दित रहता है, अप्सराओं के गीत-नृत्य से युक्त सर्वकामप्रद विमानों में।

श्लोक 28 (skanda.5.26.28)

इति पंचेशानीयात्रामाहात्म्यम् । यस्तु प्रदक्षिणां कुर्यान्नियमेन कुशस्थलीम् । प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा वसुन्धरा

iti paṁceśānīyātrāmāhātmyam yastu pradakṣiṇāṁ kuryānniyamena kuśasthalīm pradakṣiṇīkṛtā tena saptadvīpā vasundharā

इस प्रकार पंचेशानी-यात्रा का माहात्म्य कहा गया। जो नियमपूर्वक कुशस्थली की प्रदक्षिणा करता है, उसके द्वारा सप्तद्वीपवती सम्पूर्ण पृथ्वी की प्रदक्षिणा हो जाती है।

श्लोक 29 (skanda.5.26.29)

यस्तु पद्मावतीं पश्येद्दर्चयेत्पंकजैर्नरः । दत्त्वा धूपं सनैवेद्यं मृतो ब्रह्मपुरं व्रजेत्

yastu padmāvatīṁ paśyeddarcayetpaṁkajairnaraḥ dattvā dhūpaṁ sanaivedyaṁ mṛto brahmapuraṁ vrajet

जो मनुष्य कमलों से पद्मावती का दर्शन-पूजन कर धूप और नैवेद्य अर्पित करता है, वह मरणोपरान्त ब्रह्मपुर को जाता है।

श्लोक 30 (skanda.5.26.30)

स्वर्णशृंगाटिकां व्यास कुसुमैः स्वर्णसंनिभैः । समभ्यर्च्य महाभक्त्या स याति शिवमन्दिरम्

svarṇaśṛṁgāṭikāṁ vyāsa kusumaiḥ svarṇasaṁnibhaiḥ samabhyarcya mahābhaktyā sa yāti śivamandiram

हे व्यास! स्वर्ण-वर्ण पुष्पों से महाभक्तिपूर्वक स्वर्णशृंगाटिका का पूजन करने वाला शिवमन्दिर को जाता है।

श्लोक 31 (skanda.5.26.31)

अवन्तिनीं तु यः पश्येद्देवीं त्रैलोक्यविश्रुताम् । कामिकेन विमानेन याति पौरंदरं पुरम्

avantinīṁ tu yaḥ paśyeddevīṁ trailokyaviśrutām kāmikena vimānena yāti pauraṁdaraṁ puram

जो त्रिलोकविख्यात देवी अवन्तिनी का दर्शन करता है, वह कामनापूर्ण विमान से इन्द्रपुरी को जाता है।

श्लोक 32 (skanda.5.26.32)

अर्चयेत्पंकजैर्भक्त्या यो देवीममरावतीम् । अमरैः सह संहृष्टो मोदते दिवि सर्वदा

arcayetpaṁkajairbhaktyā yo devīmamarāvatīm amaraiḥ saha saṁhṛṣṭo modate divi sarvadā

जो भक्तिपूर्वक कमलों से देवी अमरावती का पूजन करता है, वह देवताओं के साथ हर्षित होकर सदा स्वर्ग में आनन्दित रहता है।

श्लोक 33 (skanda.5.26.33)

देवीमुज्जयनीं भक्त्या यः पश्यति समाहितः । सर्वैश्वर्यसमायुक्तो रुद्रलोके महीयते

devīmujjayanīṁ bhaktyā yaḥ paśyati samāhitaḥ sarvaiśvaryasamāyukto rudraloke mahīyate

जो समाहितचित्त होकर भक्तिपूर्वक देवी उज्जयनी का दर्शन करता है, वह सर्व ऐश्वर्य से युक्त होकर रुद्रलोक में महिमामण्डित होता है।

श्लोक 34 (skanda.5.26.34)

विशालां चैव यः पश्येद्रुद्रभक्त्या समाहितः । मुच्यते त्रिविधैः पापैर्नात्र कार्या विचारणा

viśālāṁ caiva yaḥ paśyedrudrabhaktyā samāhitaḥ mucyate trividhaiḥ pāpairnātra kāryā vicāraṇā

जो समाहितचित्त होकर रुद्रभक्ति से विशाला का दर्शन करता है, वह त्रिविध पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 35 (skanda.5.26.35)

इति श्रीकल्पसप्तकमहिमा । शृणु व्यास महातीर्थं पुरा यद्ब्रह्मणार्चितम् । अकूरेश्वरमित्याख्यं यत्र सिद्धः पितामहः

iti śrīkalpasaptakamahimā śṛṇu vyāsa mahātīrthaṁ purā yadbrahmaṇārcitam akūreśvaramityākhyaṁ yatra siddhaḥ pitāmahaḥ

इस प्रकार सप्त कल्पों की महिमा कही गई। हे व्यास! सुनो, पूर्वकाल में ब्रह्मा द्वारा पूजित एक महातीर्थ है, जिसे अक्रूरेश्वर कहते हैं, जहाँ पितामह को सिद्धि प्राप्त हुई थी।

श्लोक 36 (skanda.5.26.36)

तत्र देवार्चनं कृत्वा कृष्णाष्टम्यामुपोषितः । जितेंद्रियः शुचिर्दांतो रुद्रलोकमवाप्नुयात्

tatra devārcanaṁ kṛtvā kṛṣṇāṣṭamyāmupoṣitaḥ jiteṁdriyaḥ śucirdāṁto rudralokamavāpnuyāt

वहाँ देव का पूजन कर, कृष्ण अष्टमी को उपवास रख, इन्द्रियसंयमी, शुद्ध और संयत होकर मनुष्य रुद्रलोक प्राप्त करता है।

श्लोक 37 (skanda.5.26.37)

न वदेत्केनचित्सार्धं नरः प्रातर्गृहे स्थितः । दृष्ट्वाऽक्रूरेश्वरं देवं हेमदानफलं लभेत्

na vadetkenacitsārdhaṁ naraḥ prātargṛhe sthitaḥ dṛṣṭvā'krūreśvaraṁ devaṁ hemadānaphalaṁ labhet

प्रातःकाल घर में रहकर किसी से भी वार्तालाप न करने वाला मनुष्य, अक्रूरेश्वर देव का दर्शन कर स्वर्णदान का फल पाता है।

श्लोक 38 (skanda.5.26.38)

इत्यक्रूरेश्वरमाहात्म्यम् ।। । यस्तु पश्यति ब्रह्माणं शुचिः स्नातो जितेंद्रियः । मुच्यते पातकाद्धोराद्ब्रह्मलोकं मृतो व्रजेत्

ityakrūreśvaramāhātmyam yastu paśyati brahmāṇaṁ śuciḥ snāto jiteṁdriyaḥ mucyate pātakāddhorādbrahmalokaṁ mṛto vrajet

इस प्रकार अक्रूरेश्वर का माहात्म्य कहा गया। जो शुद्ध, स्नात, इन्द्रियसंयमी होकर ब्रह्मा का दर्शन करता है, वह घोर पाप से मुक्त होकर मरणोपरान्त ब्रह्मलोक को जाता है।

श्लोक 39 (skanda.5.26.39)

पद्मासनस्थितो ब्रह्मा ध्यायमानः परं पदम् । वसिष्ठाद्यैर्मुनिवरैर्विज्ञप्तः कर्मसंभवान्

padmāsanasthito brahmā dhyāyamānaḥ paraṁ padam vasiṣṭhādyairmunivarairvijñaptaḥ karmasaṁbhavān

पद्मासन पर स्थित ब्रह्मा परम पद का ध्यान कर रहे थे, तभी वसिष्ठ आदि श्रेष्ठ मुनियों ने उनसे कर्म से उत्पन्न विषयों के बारे में निवेदन किया।

श्लोक 40 (skanda.5.26.40)

ऋषय ऊचुः । आदित्या मरुतः साध्यास्तथा चैवाश्विनावुभौ । पितरो ये च लोकानां पूज्यंते भुवि मानवैः

ṛṣaya ūcuḥ ādityā marutaḥ sādhyāstathā caivāśvināvubhau pitaro ye ca lokānāṁ pūjyaṁte bhuvi mānavaiḥ

ऋषियों ने कहा -- आदित्यगण, मरुद्गण, साध्यगण तथा दोनों अश्विनीकुमार, और लोकों के जो पितरगण मनुष्यों द्वारा पृथ्वी पर पूजे जाते हैं --

श्लोक 41 (skanda.5.26.41)

ग्रहार्कतारका यक्षा दिग्गजाश्च्यानलानिलाः । अमी देवा वयं सर्वे त्वदंशाः परिपठ्यते

grahārkatārakā yakṣā diggajāścyānalānilāḥ amī devā vayaṁ sarve tvadaṁśāḥ paripaṭhyate

-- ग्रह, सूर्य, तारे, यक्ष, दिग्गज, अग्नि और वायु -- ये सब देवगण, हम सब भी, आपके ही अंश कहे जाते हैं।

श्लोक 42 (skanda.5.26.42)

कथं ध्यायसि देवेश एतत्सर्वं ब्रवीहि नः

kathaṁ dhyāyasi deveśa etatsarvaṁ bravīhi naḥ

हे देवेश! आप किसका ध्यान करते हैं? यह सब हमें बताइए।

श्लोक 43 (skanda.5.26.43)

ब्रह्मोवाच । द्वे विद्ये तत्त्वरूपे ये परा चैवापरा तथा । ते द्वे च मम रूपे द्वे नित्ये मूर्तात्मिके मम

brahmovāca dve vidye tattvarūpe ye parā caivāparā tathā te dve ca mama rūpe dve nitye mūrtātmike mama

ब्रह्मा ने कहा -- दो विद्याएँ हैं, परा और अपरा, तत्त्वरूपिणी; वे दोनों मेरे ही रूप हैं, नित्य, मेरी मूर्तिमान आत्मा।

श्लोक 44 (skanda.5.26.44)

ऋषय ऊचुः । पितामह कथं विद्मो भवंतं परमं विभुम् । येनास्माकं परा सिद्धिर्जायते तव दर्शनात्

ṛṣaya ūcuḥ pitāmaha kathaṁ vidmo bhavaṁtaṁ paramaṁ vibhum yenāsmākaṁ parā siddhirjāyate tava darśanāt

ऋषियों ने कहा -- हे पितामह! हम आप परम विभु को किस प्रकार जानें, जिनके दर्शन से हमें परम सिद्धि प्राप्त हो?

श्लोक 45 (skanda.5.26.45)

ब्रह्मोवाच । माहेश्वरं परं क्षेत्रं कुशस्थलीति शब्दितम् । यज्ञार्थिना मया देवः श्रीकंठः पार्वती पतिः

brahmovāca māheśvaraṁ paraṁ kṣetraṁ kuśasthalīti śabditam yajñārthinā mayā devaḥ śrīkaṁṭhaḥ pārvatī patiḥ

ब्रह्मा ने कहा -- कुशस्थली नामक महेश्वर का एक परम क्षेत्र है। यज्ञ की इच्छा से मैंने पार्वतीपति देव श्रीकंठ से --

श्लोक 46 (skanda.5.26.46)

याचितस्तेन देवेन उक्तोऽहं परमेष्ठिना । समंताद्योजनं साग्रं क्षेत्रमेतत्पितामहः

yācitastena devena ukto'haṁ parameṣṭhinā samaṁtādyojanaṁ sāgraṁ kṣetrametatpitāmahaḥ

-- याचना की, और उस परमेष्ठि देव ने मुझसे कहा -- 'हे पितामह! यह एक योजन से कुछ अधिक विस्तृत क्षेत्र --

श्लोक 47 (skanda.5.26.47)

मया दत्तं तव विभो महाकालवनादृते । वारितः स मया तत्र वने गुप्तो हि रोषतः । कपर्दिना च तत्रोक्तो यास्यामो न तवांतिकम्

mayā dattaṁ tava vibho mahākālavanādṛte vāritaḥ sa mayā tatra vane gupto hi roṣataḥ kapardinā ca tatrokto yāsyāmo na tavāṁtikam

-- महाकालवन को छोड़कर, हे विभु, मैंने तुम्हें दे दिया है।' मैं वहाँ उस वन में क्रोधवश छिपे हुए उनके द्वारा रोका गया; और कपर्दी ने वहीं कहा -- 'हम तुम्हारे समीप नहीं जाएँगे।'

श्लोक 48 (skanda.5.26.48)

आरब्धो वै ततो यज्ञो नारायणपरिग्रहात् । ज्ञातस्तथापि मे यज्ञो देवदेवेन शंभुना

ārabdho vai tato yajño nārāyaṇaparigrahāt jñātastathāpi me yajño devadevena śaṁbhunā

तब नारायण के सहयोग से वह यज्ञ आरम्भ हुआ। फिर भी देवाधिदेव शम्भु को मेरे यज्ञ का ज्ञान हो गया।

श्लोक 49 (skanda.5.26.49)

यज्ञवाटं कपर्दीशस्ततो भिक्षार्थमागतः । याज्ञिकैः सोऽथ तत्रोक्तो मात्र तिष्ठ जुगुप्सितः

yajñavāṭaṁ kapardīśastato bhikṣārthamāgataḥ yājñikaiḥ so'tha tatrokto mātra tiṣṭha jugupsitaḥ

कपर्दीश तब यज्ञशाला में भिक्षा माँगने आए। यज्ञकर्ता ब्राह्मणों ने वहाँ उनसे कहा -- 'यहाँ मत ठहरो, हे घृणित!'

श्लोक 50 (skanda.5.26.50)

कपर्दिना च ते तत्र उक्ता यास्याम्यहं पुनः । एवमुक्त्वा कपालं स भूमौ संस्थाप्य तत्र हि

kapardinā ca te tatra uktā yāsyāmyahaṁ punaḥ evamuktvā kapālaṁ sa bhūmau saṁsthāpya tatra hi

कपर्दी ने वहाँ उनसे कहा -- 'मैं फिर चला जाऊँगा।' ऐसा कहकर उन्होंने वहीं भूमि पर अपना कपाल रख दिया,

श्लोक 51 (skanda.5.26.51)

स्नातुं नदीं ययौ शिप्रां कपर्दी परमेश्वरः । उक्तं तस्मिन्गते शिप्रां कपर्दिनि द्विजातिभिः

snātuṁ nadīṁ yayau śiprāṁ kapardī parameśvaraḥ uktaṁ tasmingate śiprāṁ kapardini dvijātibhiḥ

और परमेश्वर कपर्दी स्नान करने शिप्रा नदी को चले गए। उनके शिप्रा चले जाने पर द्विजों ने वहाँ कहा --

श्लोक 52 (skanda.5.26.52)

कथं हि क्रियते होमः कपाले सदसि स्थिते । अकपालानि शौचानि पुरा प्रोक्तं मनीषिभिः

kathaṁ hi kriyate homaḥ kapāle sadasi sthite akapālāni śaucāni purā proktaṁ manīṣibhiḥ

-- 'सभा में कपाल के रखे रहते होम कैसे किया जाए? कपालरहित वस्तुएँ ही शुद्ध होती हैं, यह पूर्वकाल में विद्वानों ने कहा है।'

श्लोक 53 (skanda.5.26.53)

तत्कपालं सदस्येन उक्षिप्तं पाणिना स्वयम् । तस्मिन्क्षिप्तेऽभवच्चान्यत्पुनः क्षिप्तेऽभवत्पुनः

tatkapālaṁ sadasyena ukṣiptaṁ pāṇinā svayam tasminkṣipte'bhavaccānyatpunaḥ kṣipte'bhavatpunaḥ

एक सभासद ने अपने हाथ से उस कपाल को उठाकर फेंक दिया; उसके फेंकते ही वहाँ दूसरा प्रकट हुआ, उसे फिर फेंकने पर फिर एक और प्रकट हो गया।

श्लोक 54 (skanda.5.26.54)

एवं नांतं कपालानां प्राप्यते मुनिसत्तमाः । रुद्रं कपर्दिनं मत्वा शरणं तं समागताः

evaṁ nāṁtaṁ kapālānāṁ prāpyate munisattamāḥ rudraṁ kapardinaṁ matvā śaraṇaṁ taṁ samāgatāḥ

हे मुनिश्रेष्ठो! इस प्रकार कपालों का अन्त नहीं मिला। तब उसे रुद्र कपर्दी ही जानकर वे उनकी शरण में आए।

श्लोक 55 (skanda.5.26.55)

ततः स दर्शनं प्रादाद्भक्त्या तुष्टो महेश्वरः । कपालपाणिर्भगवान्मामुवा च ततः प्रभुः

tataḥ sa darśanaṁ prādādbhaktyā tuṣṭo maheśvaraḥ kapālapāṇirbhagavānmāmuvā ca tataḥ prabhuḥ

तब उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर महेश्वर ने दर्शन दिया; कपाल-हस्त भगवान प्रभु ने मुझसे कहा --

श्लोक 56 (skanda.5.26.56)

वरं वरय भो ब्रह्मन्यत्ते मनसि वर्तते । नास्त्यदेयं मया तुभ्यं सर्वं दास्यामि तत्त्वतः

varaṁ varaya bho brahmanyatte manasi vartate nāstyadeyaṁ mayā tubhyaṁ sarvaṁ dāsyāmi tattvataḥ

-- 'हे ब्रह्मन्! जो तुम्हारे मन में हो, वह वर माँगो; मेरे लिए कुछ भी अदेय नहीं है, मैं तत्त्वतः तुम्हें सब कुछ दूँगा।'

श्लोक 57 (skanda.5.26.57)

ब्रह्मोत्तरमिदं स्थानं मया दत्तं चतुर्मुख । कारयस्व यथाकामं यथावर्णचतुष्टयम्

brahmottaramidaṁ sthānaṁ mayā dattaṁ caturmukha kārayasva yathākāmaṁ yathāvarṇacatuṣṭayam

'हे चतुर्मुख! यह ब्रह्मोत्तर स्थान मैंने तुम्हें दिया है; अपनी इच्छानुसार, चारों वर्णों के अनुरूप इसकी रचना करो।'

श्लोक 58 (skanda.5.26.58)

एवं वदंतं वरदमीशानं परमेश्वरम् । तथेति चोक्त्वा सदसि न मयाऽन्यो वरो वृतः

evaṁ vadaṁtaṁ varadamīśānaṁ parameśvaram tatheti coktvā sadasi na mayā'nyo varo vṛtaḥ

इस प्रकार वर देने वाले परमेश्वर ईशान से मैंने 'ऐसा ही हो' कहकर उस सभा में अन्य कोई वर नहीं माँगा।

श्लोक 59 (skanda.5.26.59)

उज्जयिनीति वै नाम कुशस्थल्या निवेशितम् । कुंडं मंदाकिनी तत्र मया कृतमनंतरम्

ujjayinīti vai nāma kuśasthalyā niveśitam kuṁḍaṁ maṁdākinī tatra mayā kṛtamanaṁtaram

तभी से कुशस्थली का नाम 'उज्जयिनी' रखा गया। और वहाँ तत्पश्चात् मैंने मंदाकिनी नामक कुंड की रचना की।

श्लोक 60 (skanda.5.26.60)

तत्र विप्राः कृते स्नाने सर्वपापैः प्रमुच्यते । तस्यां संस्थापयेद्दिक्षु चतुरोऽर्थघटाञ्छुभान्

tatra viprāḥ kṛte snāne sarvapāpaiḥ pramucyate tasyāṁ saṁsthāpayeddikṣu caturo'rthaghaṭāñchubhān

वहाँ स्नान करने से ब्राह्मण सर्वपापों से मुक्त हो जाते हैं। उसके चारों दिशाओं में चार शुभ धन-कलश स्थापित करने चाहिए।

श्लोक 61 (skanda.5.26.61)

सतिलास्तान्सवस्त्रांश्च सफलान्मंडकैः सह । कार्तिक्यामथ माघ्यां च चातु र्विद्ये प्रदापयेत्

satilāstānsavastrāṁśca saphalānmaṁḍakaiḥ saha kārtikyāmatha māghyāṁ ca cātu rvidye pradāpayet

उन्हें तिल, वस्त्र और फल-मंडकों सहित, कार्तिक अथवा माघ मास में चारों वेदों के ज्ञाताओं को दान करना चाहिए।

श्लोक 62 (skanda.5.26.62)

प्रथमं च ऋग्वेदाय यजुर्वेदाय दक्षिणम् । पश्चिमं सामवेदाय अथर्वणे तथोत्तरम्

prathamaṁ ca ṛgvedāya yajurvedāya dakṣiṇam paścimaṁ sāmavedāya atharvaṇe tathottaram

पहला ऋग्वेदी को, दक्षिण दिशा वाला यजुर्वेदी को, पश्चिम वाला सामवेदी को, और उत्तर वाला अथर्ववेदी को।

श्लोक 63 (skanda.5.26.63)

वेदानुद्दिश्य चाप्येवं प्रीयतां मे पितामहः । कृते चैवं हि यत्पुण्यं तच्छृणुध्वं समाहिताः

vedānuddiśya cāpyevaṁ prīyatāṁ me pitāmahaḥ kṛte caivaṁ hi yatpuṇyaṁ tacchṛṇudhvaṁ samāhitāḥ

'वेदों को उद्दिष्ट कर इससे मुझ पितामह की प्रसन्नता हो' -- ऐसा कहना चाहिए। समाहितचित्त होकर इसका जो पुण्य मिलता है, वह सुनो।

श्लोक 64 (skanda.5.26.64)

सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं मंदाकिन्यां तथा भवेत् । सहस्रगुणितं स्नानं जाप्यं लक्षगुणं भवेत्

sarvatīrtheṣu yatpuṇyaṁ maṁdākinyāṁ tathā bhavet sahasraguṇitaṁ snānaṁ jāpyaṁ lakṣaguṇaṁ bhavet

समस्त तीर्थों में जो पुण्य है, वही मंदाकिनी में भी है; वहाँ स्नान सहस्रगुणा और जप लाखगुणा फलदायी है।

श्लोक 65 (skanda.5.26.65)

दानं कोटिगुणं ज्ञेयं मंदाकिन्यां न संशयः । कौमुदे मासि संप्राप्ते गोदानं तत्र कारयेत्

dānaṁ koṭiguṇaṁ jñeyaṁ maṁdākinyāṁ na saṁśayaḥ kaumude māsi saṁprāpte godānaṁ tatra kārayet

मंदाकिनी में दान करोड़गुना जानना चाहिए, इसमें संशय नहीं। कौमुद (कार्तिक) मास आने पर वहाँ गोदान करना चाहिए।

श्लोक 66 (skanda.5.26.66)

घृतधेनुं च कार्तिक्यां माघ्यां तिलमयीं तथा । जलधेनुं तु वैशाख्यां दत्त्वा मुच्येत पातकैः

ghṛtadhenuṁ ca kārtikyāṁ māghyāṁ tilamayīṁ tathā jaladhenuṁ tu vaiśākhyāṁ dattvā mucyeta pātakaiḥ

कार्तिक में घृत-धेनु, माघ में तिल-धेनु, वैशाख में जल-धेनु दान करने वाला पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 67 (skanda.5.26.67)

वाचिकं मानसं पापं कर्मजं यच्च दुष्कृ तम् । विनश्येत्किल्बिषं सर्वं मंदाकिन्यास्तु दर्शनात्

vācikaṁ mānasaṁ pāpaṁ karmajaṁ yacca duṣkṛ tam vinaśyetkilbiṣaṁ sarvaṁ maṁdākinyāstu darśanāt

वाचिक, मानसिक और कर्मजनित जो भी पाप या दुष्कर्म हो, वह सब मंदाकिनी के दर्शनमात्र से नष्ट हो जाता है।

श्लोक 68 (skanda.5.26.68)

मंदाकिनीसमं तीर्थं पृथिव्यां नैव दृश्यते । यस्य दर्शनमात्रेण ब्रह्मलोके स मोदते

maṁdākinīsamaṁ tīrthaṁ pṛthivyāṁ naiva dṛśyate yasya darśanamātreṇa brahmaloke sa modate

मंदाकिनी के समान तीर्थ पृथ्वी पर कहीं नहीं देखा जाता; इसके दर्शनमात्र से मनुष्य ब्रह्मलोक में आनन्दित होता है।

श्लोक 69 (skanda.5.26.69)

मंदाकिन्यां तु यः स्नानं कृत्वा श्राद्धं प्रदास्यति । दर्शे च पूर्णिमायां वा पितृलोके स मोदते

maṁdākinyāṁ tu yaḥ snānaṁ kṛtvā śrāddhaṁ pradāsyati darśe ca pūrṇimāyāṁ vā pitṛloke sa modate

जो मंदाकिनी में स्नान कर अमावस्या या पूर्णिमा को श्राद्ध करता है, वह पितृलोक में आनन्दित होता है।

श्लोक 70 (skanda.5.26.70)

पितामहं तु यो भक्त्या नित्यं पश्यति मानवः । अश्वमेधसहस्रेण राजसूयशतेन च

pitāmahaṁ tu yo bhaktyā nityaṁ paśyati mānavaḥ aśvamedhasahasreṇa rājasūyaśatena ca

जो मनुष्य भक्तिपूर्वक नित्य पितामह का दर्शन करता है, वह सहस्र अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञों के तुल्य फल पाता है --

श्लोक 71 (skanda.5.26.71)

युज्यते नात्र संदेहः सत्यमेतत्तपोधनाः । ततो मन्वंतरेऽतीते प्राप्ते वैवस्वते पुनः

yujyate nātra saṁdehaḥ satyametattapodhanāḥ tato manvaṁtare'tīte prāpte vaivasvate punaḥ

-- इसमें संशय नहीं, हे तपोधनो! यह सत्य है। तत्पश्चात् वह मन्वन्तर बीत जाने पर, पुनः वैवस्वत मन्वन्तर आने पर --

श्लोक 72 (skanda.5.26.72)

तेनैवोन्मत्तवेषेण ऊर्ध्वशेषो महेश्वरः । प्रविष्टो ब्रह्मणः सत्रे दृष्टस्तैर्द्विज सत्तमैः

tenaivonmattaveṣeṇa ūrdhvaśeṣo maheśvaraḥ praviṣṭo brahmaṇaḥ satre dṛṣṭastairdvija sattamaiḥ

-- उसी उन्मत्त वेष में, बिखरे केशों वाले महेश्वर ब्रह्मा के यज्ञसत्र में प्रविष्ट हुए और उन श्रेष्ठ द्विजों ने उन्हें देखा।

श्लोक 73 (skanda.5.26.73)

ते ब्राह्मणाः शपंति स्म निन्दां कुर्वंति चापरे । अपरे पांशुभिः शिश्नं घ्नंति तस्याशपन्द्विजाः

te brāhmaṇāḥ śapaṁti sma nindāṁ kurvaṁti cāpare apare pāṁśubhiḥ śiśnaṁ ghnaṁti tasyāśapandvijāḥ

उन ब्राह्मणों ने उन्हें शाप दिया, कुछ ने निन्दा की; कुछ ने धूल से उनके लिंग पर प्रहार किया और शाप दिया।

श्लोक 74 (skanda.5.26.74)

लोष्ठैर्लगुडकैश्चा न्ये घ्नंति तं बलगर्विताः । जटामुकुटकं केचिद्धृत्वा कर्षंति चापरे

loṣṭhairlaguḍakaiścā nye ghnaṁti taṁ balagarvitāḥ jaṭāmukuṭakaṁ keciddhṛtvā karṣaṁti cāpare

बल के मद में चूर कुछ ने ढेले और डंडों से उन्हें मारा; कुछ ने उनके जटा-मुकुट को पकड़कर घसीटा।

श्लोक 75 (skanda.5.26.75)

पृच्छंति व्रतचर्यां वै केन व्रतं च दर्शितम् । अत्र चैव स्त्रियः संति कथमेतत्त्वया कृतम्

pṛcchaṁti vratacaryāṁ vai kena vrataṁ ca darśitam atra caiva striyaḥ saṁti kathametattvayā kṛtam

वे उनके व्रताचरण के विषय में पूछने लगे -- 'यह व्रत तुम्हें किसने बताया? यहाँ स्त्रियाँ भी उपस्थित हैं, यह तुमने कैसे किया?'

श्लोक 76 (skanda.5.26.76)

ब्रह्मणा चेदृशी चर्या विष्णुना वा कृता स्वयम् । गिरिशेनापि देवेन केनेदं दुष्कृतं कृतम्

brahmaṇā cedṛśī caryā viṣṇunā vā kṛtā svayam giriśenāpi devena kenedaṁ duṣkṛtaṁ kṛtam

'क्या ऐसा आचरण कभी ब्रह्मा ने, अथवा स्वयं विष्णु ने, अथवा देव गिरीश ने भी किया है? यह दुष्कर्म किसने किया है?'

श्लोक 77 (skanda.5.26.77)

मा विडम्बय देवेशं वध्यो हि नस्त्वमद्य वै । एवं तैर्हन्यमानस्तु ब्राह्मणैस्तत्र शंकरः

mā viḍambaya deveśaṁ vadhyo hi nastvamadya vai evaṁ tairhanyamānastu brāhmaṇaistatra śaṁkaraḥ

'देवेश का उपहास मत करो, आज तुम हमारे वध्य हो!' इस प्रकार उन ब्राह्मणों द्वारा मारे जाते हुए शंकर --

श्लोक 78 (skanda.5.26.78)

स्मितं कृत्वाऽब्रवीत्सर्वान्ब्राह्मणान्परमेश्वरः । किं यूयं मामभि हथ ह्युन्मत्तं नष्टचेतसम्

smitaṁ kṛtvā'bravītsarvānbrāhmaṇānparameśvaraḥ kiṁ yūyaṁ māmabhi hatha hyunmattaṁ naṣṭacetasam

-- मुस्कुराते हुए सभी ब्राह्मणों से बोले -- 'तुम मुझ उन्मत्त, बुद्धिनष्ट पर क्यों प्रहार कर रहे हो?

श्लोक 79 (skanda.5.26.79)

यूयं कारुणिकाः सर्वे मैत्रभावे व्यवस्थिताः । तमेवं वादिनं देवं जाल्मरूपधरं हरम्

yūyaṁ kāruṇikāḥ sarve maitrabhāve vyavasthitāḥ tamevaṁ vādinaṁ devaṁ jālmarūpadharaṁ haram

तुम सब तो करुणाशील और मैत्रीभाव में स्थित हो।' इस प्रकार बोलते हुए, दीन-रूपधारी उस देव हर को --

श्लोक 80 (skanda.5.26.80)

मायया तस्य देवस्य मोहितास्ते द्विजातयः । पुनः कपर्दिनं जघ्नुः पाणिपादेन वै द्विजाः

māyayā tasya devasya mohitāste dvijātayaḥ punaḥ kapardinaṁ jaghnuḥ pāṇipādena vai dvijāḥ

-- उस देव की माया से मोहित हुए उन द्विजों ने पुनः हाथों-पैरों से कपर्दी पर प्रहार किया।

श्लोक 81 (skanda.5.26.81)

ताड्यमानस्तु तैर्विप्रैः परं कोपमुपागमत् । ततो देवेन ते शप्ता यूयं वेदविवर्जिताः

tāḍyamānastu tairvipraiḥ paraṁ kopamupāgamat tato devena te śaptā yūyaṁ vedavivarjitāḥ

उन ब्राह्मणों द्वारा पीटे जाने पर वे अत्यन्त क्रोधित हो गए। तब देव ने उन्हें शाप दिया -- 'तुम वेदविहीन हो जाओगे --

श्लोक 82 (skanda.5.26.82)

ऊर्ध्वजूटाः सलगुडाः परदारोपजीविनः । रता द्यूते च वेश्यायां पितृमातृविवर्जिताः

ūrdhvajūṭāḥ salaguḍāḥ paradāropajīvinaḥ ratā dyūte ca veśyāyāṁ pitṛmātṛvivarjitāḥ

-- ऊर्ध्व-जटाधारी, दंडधारी, परस्त्रीगामी, जुए और वेश्या में लिप्त, माता-पिता से रहित हो जाओगे।

श्लोक 83 (skanda.5.26.83)

न पुत्रे पितृ वित्तं च विद्या वापि भविष्यति । शेषो मम हतो यैश्च ते सर्वेंद्रियवर्जिताः

na putre pitṛ vittaṁ ca vidyā vāpi bhaviṣyati śeṣo mama hato yaiśca te sarveṁdriyavarjitāḥ

तुम्हारे पुत्रों को न पैतृक धन मिलेगा, न विद्या। और जिन्होंने मेरे शेष (सर्परूप) पर प्रहार किया, वे सर्व इन्द्रियों से रहित होंगे।

श्लोक 84 (skanda.5.26.84)

रौद्रां भिक्षां तु भिक्षंतः परपिंडोपजीविनः । आत्मानं वर्णयिष्यंति धनधान्यविवर्जिताः

raudrāṁ bhikṣāṁ tu bhikṣaṁtaḥ parapiṁḍopajīvinaḥ ātmānaṁ varṇayiṣyaṁti dhanadhānyavivarjitāḥ

वे भयंकर भिक्षा माँगते हुए, दूसरों के अन्न पर जीवित रहते हुए, अपने को महान बताएँगे किन्तु धन-धान्य से रहित रहेंगे।

श्लोक 85 (skanda.5.26.85)

यैश्च तत्र कृता विप्रैर्हन्यमाने कृपा मयि । तेषां धनं च पुत्राश्च दासीदासादयश्च वै

yaiśca tatra kṛtā viprairhanyamāne kṛpā mayi teṣāṁ dhanaṁ ca putrāśca dāsīdāsādayaśca vai

किन्तु जिन ब्राह्मणों ने मुझ पर प्रहार होते समय दया दिखाई, उनके धन, पुत्र, दास-दासी आदि --

श्लोक 86 (skanda.5.26.86)

कुलोत्पन्नाश्च वै नार्यो भविष्यंति वरान्मम । एवं शापं वरं दत्त्वा गतोंऽतर्धानमीश्वरः

kulotpannāśca vai nāryo bhaviṣyaṁti varānmama evaṁ śāpaṁ varaṁ dattvā gatoṁ'tardhānamīśvaraḥ

-- और उनके कुल में जन्मी स्त्रियाँ भी, मेरे वरदान से सम्पन्न होंगी। इस प्रकार शाप और वर देकर ईश्वर अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 87 (skanda.5.26.87)

ततो द्विजा गते देवे मत्वा तं शंकरं विभुम् । अन्वेषयंतो यत्नेन महाकालवनं गताः

tato dvijā gate deve matvā taṁ śaṁkaraṁ vibhum anveṣayaṁto yatnena mahākālavanaṁ gatāḥ

तब देव के अन्तर्धान होने पर द्विजों ने समझा कि वे स्वयं शंकर प्रभु थे; प्रयत्नपूर्वक उन्हें खोजते हुए वे महाकालवन गए।

श्लोक 88 (skanda.5.26.88)

स्नात्वा सरसि रुद्रस्य जपतः शतरुद्रियम् । जाप्यावसाने तान्देवोऽशरीरिण्या गिराऽब्रवीत्

snātvā sarasi rudrasya japataḥ śatarudriyam jāpyāvasāne tāndevo'śarīriṇyā girā'bravīt

रुद्रसरोवर में स्नान कर शतरुद्रीय का जप करते हुए, जप के अन्त में देव ने उन्हें अशरीरवाणी से कहा --

श्लोक 89 (skanda.5.26.89)

अनृतं न मया प्रोक्तं स्वैरेष्वेपि कुतः सुखम् । भूयोऽप्यनुग्रहं विप्रा युष्माकं करवाण्यहम्

anṛtaṁ na mayā proktaṁ svaireṣvepi kutaḥ sukham bhūyo'pyanugrahaṁ viprā yuṣmākaṁ karavāṇyaham

-- 'मैंने कोई झूठ नहीं कहा; स्वेच्छाचारियों को सुख कहाँ मिलता है? हे विप्रो! मैं तुम पर पुनः अनुग्रह करूँगा।

श्लोक 90 (skanda.5.26.90)

शांता दांताश्च ये विप्रा भक्तिमंतो मयि स्थिताः । न तेषां छिद्यते वंशो न धनं न च संततिः

śāṁtā dāṁtāśca ye viprā bhaktimaṁto mayi sthitāḥ na teṣāṁ chidyate vaṁśo na dhanaṁ na ca saṁtatiḥ

जो शान्त, संयमी ब्राह्मण मुझमें भक्तियुक्त होकर स्थित रहते हैं, उनका न वंश कटता है, न धन, न सन्तति।

श्लोक 91 (skanda.5.26.91)

अग्निहोत्ररता ये च भक्तिमंतो जनार्दने । पूजयंति च ब्रह्माणं तेजोराशिं दिवाकरम्

agnihotraratā ye ca bhaktimaṁto janārdane pūjayaṁti ca brahmāṇaṁ tejorāśiṁ divākaram

और जो अग्निहोत्र में रत, जनार्दन के भक्त हैं, तथा तेजोराशि सूर्यरूप ब्रह्मा का पूजन करते हैं --

श्लोक 92 (skanda.5.26.92)

नाशुभं विद्यते तेषां येषां सख्ये स्थिता मतिः । एतावदुक्त्वा देवेशस्तूष्णीमासीज्जगत्प्रभुः

nāśubhaṁ vidyate teṣāṁ yeṣāṁ sakhye sthitā matiḥ etāvaduktvā deveśastūṣṇīmāsījjagatprabhuḥ

-- जिनकी बुद्धि सबके प्रति मित्रभाव में स्थित है, उनका कभी अशुभ नहीं होता।' इतना कहकर जगत्प्रभु देवेश मौन हो गए।

श्लोक 93 (skanda.5.26.93)

एवं शापं वरं लब्ध्वा देवदेवान्महेश्वरात् । आजग्मुः सहिताः सर्वे यत्र देवः पितामहः

evaṁ śāpaṁ varaṁ labdhvā devadevānmaheśvarāt ājagmuḥ sahitāḥ sarve yatra devaḥ pitāmahaḥ

इस प्रकार देवाधिदेव महेश्वर से शाप और वर दोनों पाकर, वे सब मिलकर वहाँ आए जहाँ देव पितामह थे।

श्लोक 94 (skanda.5.26.94)

विरंचिमथ ते जाप्यैस्तोषयन्तोऽग्रतः स्थिताः । तुष्टस्तानब्रवीद्ब्रह्मा मत्तोऽपि व्रियतां वरः

viraṁcimatha te jāpyaistoṣayanto'grataḥ sthitāḥ tuṣṭastānabravīdbrahmā matto'pi vriyatāṁ varaḥ

जप द्वारा विरंचि (ब्रह्मा) को प्रसन्न करते हुए वे उनके सामने खड़े हुए। प्रसन्न ब्रह्मा ने उनसे कहा -- 'मुझसे भी वर माँगो।'

श्लोक 95 (skanda.5.26.95)

ब्रह्मणस्तेन वाक्येन तुष्टाः सर्वे द्विजोत्तमाः । को वरो याच्यतां विप्राः परितुष्टे पितामहे

brahmaṇastena vākyena tuṣṭāḥ sarve dvijottamāḥ ko varo yācyatāṁ viprāḥ parituṣṭe pitāmahe

ब्रह्मा के इस वचन से सभी श्रेष्ठ द्विज प्रसन्न हुए -- 'हे विप्रो! पितामह के प्रसन्न होने पर कौन-सा वर माँगा जाए?'

श्लोक 96 (skanda.5.26.96)

एके तत्राब्रुवन्विप्रा वेदान्वै वृणवामहै । ततोऽन्ये च धनं धान्यं व्रियतामविशंकितैः

eke tatrābruvanviprā vedānvai vṛṇavāmahai tato'nye ca dhanaṁ dhānyaṁ vriyatāmaviśaṁkitaiḥ

कुछ ब्राह्मणों ने कहा -- 'हम वेदों को ही चुनें।' फिर अन्य बोले -- 'निःशंक होकर धन-धान्य ही माँगा जाए।'

श्लोक 97 (skanda.5.26.97)

अन्ये प्राहुः किमस्माकं धनैस्तुष्टे पितामहे । अग्निहोत्राणि वेदाश्च शास्त्राणि विविधानि च

anye prāhuḥ kimasmākaṁ dhanaistuṣṭe pitāmahe agnihotrāṇi vedāśca śāstrāṇi vividhāni ca

अन्य बोले -- 'पितामह के प्रसन्न होने पर धन से हमें क्या? अग्निहोत्र, वेद और विविध शास्त्र ही --

श्लोक 98 (skanda.5.26.98)

शांता आढ्याश्च लोकाश्च वरदानाद्भवंतु नः । एवं प्रजल्पतां तत्र विप्राणां कोप आविशत्

śāṁtā āḍhyāśca lokāśca varadānādbhavaṁtu naḥ evaṁ prajalpatāṁ tatra viprāṇāṁ kopa āviśat

-- तथा शान्त, समृद्ध लोक इस वरदान से हमें प्राप्त हों।' इस प्रकार परस्पर वाद-विवाद करते ब्राह्मणों में क्रोध उत्पन्न हो गया।

श्लोक 99 (skanda.5.26.99)

परस्परं वरार्थेऽथ युद्धं कर्तुं समुद्यताः । युध्यंते सायुधाः केचित्केचित्तत्रोपसर्पकाः

parasparaṁ varārthe'tha yuddhaṁ kartuṁ samudyatāḥ yudhyaṁte sāyudhāḥ kecitkecittatropasarpakāḥ

वे परस्पर वर के लिए युद्ध करने को उद्यत हो गए; कुछ शस्त्रधारी होकर लड़ने लगे, कुछ छिपकर वार करने लगे।

श्लोक 100 (skanda.5.26.100)

केचिद्विप्रा उदासीनाः केचिद्वै मौनमास्थिताः । दृष्ट्वैवं भगवान्प्राह विप्रान्युद्धं प्रकुर्वतः

kecidviprā udāsīnāḥ kecidvai maunamāsthitāḥ dṛṣṭvaivaṁ bhagavānprāha viprānyuddhaṁ prakurvataḥ

कुछ ब्राह्मण उदासीन रहे, कुछ मौन धारण किए रहे। यह देखकर भगवान ने युद्धरत ब्राह्मणों से कहा --

श्लोक 101 (skanda.5.26.101)

यस्मात्कुमंत्रिता विप्राः शालाया बाह्यसंस्थिते । तस्मादामूलतो विप्रा गुल्मे युद्धोपसर्पकाः

yasmātkumaṁtritā viprāḥ śālāyā bāhyasaṁsthite tasmādāmūlato viprā gulme yuddhopasarpakāḥ

-- 'चूँकि तुम विप्रगण, यज्ञशाला के बाहर खड़े होकर कुमन्त्रणा करते रहे, इसलिए हे विप्रो, जो झुरमुट में छिपकर युद्ध के लिए बढ़े --

श्लोक 102 (skanda.5.26.102)

उदासीनस्तु यो गुल्मो वृत्तिहीनो भविष्यति । वेदास्तस्य भवेयुर्वै यस्त्वस्ति मौनसंस्थितः

udāsīnastu yo gulmo vṛttihīno bhaviṣyati vedāstasya bhaveyurvai yastvasti maunasaṁsthitaḥ

-- वह उदासीन गुट आजीविकाहीन होगा; और जो मौन धारण किए रहा, उसे ही वेदों की प्राप्ति होगी।

श्लोक 103 (skanda.5.26.103)

तृतीयः सायुधो गुल्मो योद्धुकामस्तु यः स्थितः । परदारेषु वेश्यायां द्यूते चौर्ये सदा रतः

tṛtīyaḥ sāyudho gulmo yoddhukāmastu yaḥ sthitaḥ paradāreṣu veśyāyāṁ dyūte caurye sadā rataḥ

तीसरा शस्त्रधारी, युद्धेच्छुक गुट परस्त्री, वेश्या, जुए और चोरी में सदा लिप्त रहेगा।

श्लोक 104 (skanda.5.26.104)

चतुर्विधः स वै विप्रो वृत्तिहीनो भविष्यति । एवमुक्त्वा ययौ ब्रह्मा वैराजं भवनोत्तमम्

caturvidhaḥ sa vai vipro vṛttihīno bhaviṣyati evamuktvā yayau brahmā vairājaṁ bhavanottamam

इस प्रकार वे चार प्रकार के ब्राह्मण आजीविकाहीन हो जाएँगे।' ऐसा कहकर ब्रह्मा वैराज नामक श्रेष्ठ भवन को चले गए।

श्लोक 105 (skanda.5.26.105)

एवं मे परमं क्षेत्रं मुनयोऽवंतिमंडले । यां देवनगरीं लोके प्रवदन्तीह मानवाः

evaṁ me paramaṁ kṣetraṁ munayo'vaṁtimaṁḍale yāṁ devanagarīṁ loke pravadantīha mānavāḥ

हे मुनियो! इस प्रकार अवन्ति-मंडल में यह मेरा परम क्षेत्र है, जिसे लोक में मनुष्य 'देवनगरी' कहते हैं।

श्लोक 106 (skanda.5.26.106)

तस्यां तु ये द्विजाः शांता वसंति क्षेत्रवासिन । न तेषां दुर्लभं किंचिन्म म लोके भविष्यति

tasyāṁ tu ye dvijāḥ śāṁtā vasaṁti kṣetravāsina na teṣāṁ durlabhaṁ kiṁcinma ma loke bhaviṣyati

उस क्षेत्र में जो शान्त द्विज निवासी बनकर रहते हैं, उनके लिए मेरे लोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहेगा।

श्लोक 107 (skanda.5.26.107)

कोलामुखे कुरुक्षेत्रे नैमिषे पुष्करेषु च । वाराणस्यां प्रभासे च तथा बदरिकाश्रमे

kolāmukhe kurukṣetre naimiṣe puṣkareṣu ca vārāṇasyāṁ prabhāse ca tathā badarikāśrame

कोलामुख, कुरुक्षेत्र, नैमिष, पुष्कर, वाराणसी, प्रभास तथा बदरिकाश्रम में --

श्लोक 108 (skanda.5.26.108)

गंगाद्वारे प्रयागे च गंगासा गरसंगमे । रुद्रकोट्यां विरूपाक्षे मित्रस्यापि तथा वने

gaṁgādvāre prayāge ca gaṁgāsā garasaṁgame rudrakoṭyāṁ virūpākṣe mitrasyāpi tathā vane

गंगाद्वार, प्रयाग, गंगा-सागर संगम, रुद्रकोटि, विरूपाक्ष तथा मित्रवन में भी --

श्लोक 109 (skanda.5.26.109)

तीर्थेष्वेतेषु क्षेत्रेषु या सिद्धिर्द्वादशाब्दिका । प्राप्यते मानवैर्लोके सा मासेनेह लभ्यते । उज्जयिन्यां न संदेहो ब्रह्मचर्ये मनो यदि

tīrtheṣveteṣu kṣetreṣu yā siddhirdvādaśābdikā prāpyate mānavairloke sā māseneha labhyate ujjayinyāṁ na saṁdeho brahmacarye mano yadi

-- इन तीर्थों और क्षेत्रों में मनुष्यों को जो सिद्धि बारह वर्षों में प्राप्त होती है, वह यहाँ एक ही मास में प्राप्त हो जाती है -- उज्जयिनी में, यदि मन ब्रह्मचर्य में लगा हो, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 110 (skanda.5.26.110)

तीर्थानां प्रवरं तीर्थं क्षेत्राणामपि चोत्तमम् । सदाभिरुचितं मह्यमेतद्वै मुनिसत्तमाः

tīrthānāṁ pravaraṁ tīrthaṁ kṣetrāṇāmapi cottamam sadābhirucitaṁ mahyametadvai munisattamāḥ

यह तीर्थों में श्रेष्ठ तीर्थ है, और क्षेत्रों में भी उत्तम है; हे मुनिश्रेष्ठो! यह मुझे सदा अत्यन्त प्रिय है।

श्लोक 111 (skanda.5.26.111)

मंदाकिन्यास्तु माहात्म्यं क्षेत्रस्योत्पत्तिरुत्तमा । भूयः किमन्यदिच्छास्ति श्रोतुं वै द्विजसत्तमाः

maṁdākinyāstu māhātmyaṁ kṣetrasyotpattiruttamā bhūyaḥ kimanyadicchāsti śrotuṁ vai dvijasattamāḥ

इस प्रकार मंदाकिनी की महिमा और क्षेत्र की उत्तम उत्पत्ति-कथा कही गई। हे द्विजश्रेष्ठो! अब और क्या सुनने की इच्छा है?

श्लोक 112 (skanda.5.26.112)

सनत्कुमार उवाच । एतत्ते ब्रह्मणो वाक्यं श्रुत्वा व्यास तथाविधम् । वसिष्ठाद्याश्च मुनयः परं ध्यानमथो गताः

sanatkumāra uvāca etatte brahmaṇo vākyaṁ śrutvā vyāsa tathāvidham vasiṣṭhādyāśca munayaḥ paraṁ dhyānamatho gatāḥ

सनत्कुमार ने कहा -- हे व्यास! ब्रह्मा का यह वचन सुनकर वसिष्ठ आदि मुनि परम ध्यान में लीन हो गए।

श्लोक 113 (skanda.5.26.113)

ध्यात्वा तु सुचिरं कालं तत्र वासे मनो दधुः । साग्निहोत्राः सपत्नीका गताश्चावंतिमंडले

dhyātvā tu suciraṁ kālaṁ tatra vāse mano dadhuḥ sāgnihotrāḥ sapatnīkā gatāścāvaṁtimaṁḍale

बहुत काल तक ध्यान कर उन्होंने वहाँ निवास करने का मन बना लिया; अग्निहोत्र और पत्नियों सहित वे अवन्ति-मंडल गए।

श्लोक 114 (skanda.5.26.114)

महाकालवनं दृष्ट्वा शिप्रां चैव महानदीम् । श्मशानमूषरं चैव नदीं गन्धवतीं तथा

mahākālavanaṁ dṛṣṭvā śiprāṁ caiva mahānadīm śmaśānamūṣaraṁ caiva nadīṁ gandhavatīṁ tathā

महाकालवन, महानदी शिप्रा, श्मशान ऊषर, तथा गन्धवती नदी को देखकर --

श्लोक 115 (skanda.5.26.115)

कोटितीर्थमुपस्पृश्य चकुर्वासं च तत्र वै । स्मृत्वा तद्ब्रह्मणो वाक्यं रुचिस्तेषां तदाऽभवत्

koṭitīrthamupaspṛśya cakurvāsaṁ ca tatra vai smṛtvā tadbrahmaṇo vākyaṁ rucisteṣāṁ tadā'bhavat

-- और कोटितीर्थ का स्पर्श कर उन्होंने वहीं निवास किया; ब्रह्मा के उस वचन का स्मरण कर उनकी वहाँ रुचि हो गई।

श्लोक 116 (skanda.5.26.116)

अरुन्धत्या वसिष्ठश्च गमनं प्रति नोदितः । उवाच तां महात्मासौ स्वां भार्यां मुनिसत्तमाः

arundhatyā vasiṣṭhaśca gamanaṁ prati noditaḥ uvāca tāṁ mahātmāsau svāṁ bhāryāṁ munisattamāḥ

अरुन्धती द्वारा अन्यत्र जाने हेतु प्रेरित किए जाने पर महात्मा वसिष्ठ ने अपनी पत्नी से कहा --

श्लोक 117 (skanda.5.26.117)

महाकालः सरिच्छिप्रा गतिश्चैव सुनिर्मला । उज्जयिन्यां विशालाक्षि वासः कस्य न रोचते

mahākālaḥ saricchiprā gatiścaiva sunirmalā ujjayinyāṁ viśālākṣi vāsaḥ kasya na rocate

-- 'महाकाल, नदी शिप्रा, और अत्यन्त निर्मल जीवनचर्या -- हे विशाल-नयना! उज्जयिनी में निवास किसे न भाएगा?

श्लोक 118 (skanda.5.26.118)

स्नानं कृत्वा नरो यस्तु महानद्यां हि दुर्लभम् । महाकालं नमस्कृत्य नरो मृत्युं न शोचयेत्

snānaṁ kṛtvā naro yastu mahānadyāṁ hi durlabham mahākālaṁ namaskṛtya naro mṛtyuṁ na śocayet

इस महानदी में स्नान करना मनुष्य के लिए दुर्लभ है; महाकाल को नमस्कार कर मनुष्य को मृत्यु का शोक नहीं करना चाहिए।

श्लोक 119 (skanda.5.26.119)

मृतः कीटः पतंगो वा रुद्र स्यानुचरो भवेत् । यत्रैषा श्रूयते मुक्तिः कथं सा त्यजते मया

mṛtaḥ kīṭaḥ pataṁgo vā rudra syānucaro bhavet yatraiṣā śrūyate muktiḥ kathaṁ sā tyajate mayā

यहाँ कीड़ा या पतंगा बनकर मरने वाला भी रुद्र का अनुचर बन जाता है। जहाँ ऐसी मुक्ति सुनी जाती है, उसे मैं कैसे त्याग सकता हूँ?

श्लोक 120 (skanda.5.26.120)

एवं प्रजल्प्याथ मुनिप्रधानस्तत्रैव वासं सहसा चकार । वनस्य व्युष्टिं परिकीर्तयंस्तु स्थितः सहैवात्र मुनिप्रधानैः

evaṁ prajalpyātha munipradhānastatraiva vāsaṁ sahasā cakāra vanasya vyuṣṭiṁ parikīrtayaṁstu sthitaḥ sahaivātra munipradhānaiḥ

इस प्रकार कहकर मुनिप्रधान वसिष्ठ ने तत्काल वहीं निवास कर लिया; और वे वहाँ अन्य श्रेष्ठ मुनियों के साथ रहते हुए उस वन की उत्तमता का बखान करते रहे।

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