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अवन्ती खण्ड · अध्याय 27

अंकपादमाहात्म्य-वर्णनम्

अध्याय 26अध्याय-सूचीअध्याय 28

श्लोक 1 (skanda.5.27.1)

सनत्कुमार उवाच । योऽवंत्यामंकपादाख्ये पश्येद्रामजनार्दनौ । ययोर्दर्शनमात्रेण यमलोकं न पश्यति

sanatkumāra uvāca yo'vaṁtyāmaṁkapādākhye paśyedrāmajanārdanau yayordarśanamātreṇa yamalokaṁ na paśyati

सनत्कुमार ने कहा -- अवन्ती में अंकपाद नामक स्थान पर जो राम और जनार्दन का दर्शन करता है, उनके दर्शनमात्र से मनुष्य यमलोक नहीं देखता।

श्लोक 2 (skanda.5.27.2)

व्यास उवाच । कथं तावंकपादाख्ये यातावत्र महामुने । न पश्येद्यमलोकं स यद्यपि ब्रह्महा भवेत्

vyāsa uvāca kathaṁ tāvaṁkapādākhye yātāvatra mahāmune na paśyedyamalokaṁ sa yadyapi brahmahā bhavet

व्यास ने कहा -- हे महामुने! वे दोनों अंकपाद नामक स्थान पर कैसे पधारे, जहाँ ब्रह्महत्यारा होने पर भी मनुष्य यमलोक नहीं देखता?

श्लोक 3 (skanda.5.27.3)

सनत्कुमार उवाच । भारावतारणार्थाय देवौ रामजनार्दनौ । अवतीर्णौ यदोर्वंशे दिव्यरूपौ महाद्युतौ

sanatkumāra uvāca bhārāvatāraṇārthāya devau rāmajanārdanau avatīrṇau yadorvaṁśe divyarūpau mahādyutau

सनत्कुमार ने कहा -- पृथ्वी का भार उतारने हेतु दिव्यरूपधारी, महातेजस्वी राम और जनार्दन दोनों देव यदुवंश में अवतरित हुए।

श्लोक 4 (skanda.5.27.4)

कंसं हत्वा सचाणूरमुग्रसेनं नराधिपम् । अभिषिच्य स्वयं राज्ये यदुसिंह उवाच तम्

kaṁsaṁ hatvā sacāṇūramugrasenaṁ narādhipam abhiṣicya svayaṁ rājye yadusiṁha uvāca tam

चाणूर सहित कंस का वध कर, स्वयं उग्रसेन को राजपद पर अभिषिक्त कर, यदुसिंह ने उनसे कहा --

श्लोक 5 (skanda.5.27.5)

किं कार्यं ते मया ब्रूहि कर्तव्यं ते सुते हते । एवमुक्तः स राजा वां उग्रसेनोऽब्रवीदिदम्

kiṁ kāryaṁ te mayā brūhi kartavyaṁ te sute hate evamuktaḥ sa rājā vāṁ ugraseno'bravīdidam

-- 'तुम्हारे पुत्र के मारे जाने पर मुझसे क्या कार्य करना है, बताओ।' ऐसा पूछे जाने पर राजा उग्रसेन ने उन दोनों से यह कहा --

श्लोक 6 (skanda.5.27.6)

सर्वं संपत्स्यते कृष्ण भवतो हि न दुर्लभम् । विज्ञाताखिलविज्ञानौ भवितारावुभावपि

sarvaṁ saṁpatsyate kṛṣṇa bhavato hi na durlabham vijñātākhilavijñānau bhavitārāvubhāvapi

-- 'हे कृष्ण! तुम्हारे लिए सब कुछ सुलभ है, कुछ भी दुर्लभ नहीं। तुम दोनों समस्त विद्याओं के ज्ञाता बनो --

श्लोक 7 (skanda.5.27.7)

गच्छेतमुज्जयिन्यां वै कृतविद्यौ भविष्यथ । ततः सांदीपनिं विप्रं जग्मतू रामकेशवौ

gacchetamujjayinyāṁ vai kṛtavidyau bhaviṣyatha tataḥ sāṁdīpaniṁ vipraṁ jagmatū rāmakeśavau

-- उज्जयिनी जाओ, वहाँ विद्या-सम्पन्न बनोगे।' तत्पश्चात् राम और केशव ब्राह्मण सांदीपनि के पास गए।

श्लोक 8 (skanda.5.27.8)

कण्ठस्थांश्चक्रतुर्वेदानाचारमखिलं च तौ । सरहस्यं धनुर्वेदं ससंहारं तथैव च

kaṇṭhasthāṁścakraturvedānācāramakhilaṁ ca tau sarahasyaṁ dhanurvedaṁ sasaṁhāraṁ tathaiva ca

उन्होंने वेदों को कंठस्थ कर लिया, समस्त आचार, गुह्य सहित धनुर्वेद और संहार-विद्या भी।

श्लोक 9 (skanda.5.27.9)

अहोरात्रैश्चतुःषष्ट्या तदद्भुतमभूद्द्विज । सांदीपनिरसंभाव्यं तयोः कर्मातिमानुषम्

ahorātraiścatuḥṣaṣṭyā tadadbhutamabhūddvija sāṁdīpanirasaṁbhāvyaṁ tayoḥ karmātimānuṣam

चौंसठ दिन-रात में यह अद्भुत घटना घटी, हे द्विज! सांदीपनि को उन दोनों का यह अतिमानुषी कार्य अविश्वसनीय लगा।

श्लोक 10 (skanda.5.27.10)

विचिंत्य तौ तदा मेने प्राप्तौ चंद्र दिवाकरौ । ततः किंचित्स नोवाच स्नातुं तीर्थमथाययौ

viciṁtya tau tadā mene prāptau caṁdra divākarau tataḥ kiṁcitsa novāca snātuṁ tīrthamathāyayau

विचारकर उन्होंने उन्हें साक्षात् चन्द्र और सूर्य समझा। तब वे कुछ न कहकर स्नान हेतु तीर्थ को गए।

श्लोक 11 (skanda.5.27.11)

शिष्यैस्तु सहितो विप्रो महाकालवनेऽविशत् । शिष्यैः सह प्रविष्टौ द्वौ तदा तौ रामकेशवौ

śiṣyaistu sahito vipro mahākālavane'viśat śiṣyaiḥ saha praviṣṭau dvau tadā tau rāmakeśavau

शिष्यों सहित वह ब्राह्मण महाकालवन में प्रविष्ट हुआ; तभी राम और केशव भी शिष्यों के साथ वहाँ प्रविष्ट हुए।

श्लोक 12 (skanda.5.27.12)

वन्दमानौ महाकालं स तं केशवमव्रवीत् । त्वया नाथेन देवानां मानुष्यत्वे हि तिष्ठता

vandamānau mahākālaṁ sa taṁ keśavamavravīt tvayā nāthena devānāṁ mānuṣyatve hi tiṣṭhatā

महाकाल की वन्दना करते हुए उन दोनों को देखकर उन्होंने केशव से कहा -- 'हे नाथ! मनुष्यरूप में रहते हुए भी आपके द्वारा --

श्लोक 13 (skanda.5.27.13)

सुखमासीच्च साधूनामज्ञानानां च सर्वदा । जने पीडाकरा ये तु सदा वा बलदर्पिताः

sukhamāsīcca sādhūnāmajñānānāṁ ca sarvadā jane pīḍākarā ye tu sadā vā baladarpitāḥ

-- साधुजनों और अज्ञानियों को भी सदा सुख मिला है। जो लोग सदा प्रजा को पीड़ित करते हैं, बल के मद में चूर --

श्लोक 14 (skanda.5.27.14)

युवाभ्यां ते हताः सर्वे कंसप्रमुखतो नृपाः । । मुनिसिद्धसुरादीनां स्थितिः कार्या त्वयाऽनघ

yuvābhyāṁ te hatāḥ sarve kaṁsapramukhato nṛpāḥ munisiddhasurādīnāṁ sthitiḥ kāryā tvayā'nagha

-- वे सभी राजा, कंस-प्रमुख, तुम दोनों द्वारा मारे गए। हे निष्पाप! अब मुनि, सिद्ध, देव आदि की व्यवस्था तुम्हें करनी है।'

श्लोक 15 (skanda.5.27.15)

करिष्यामि तमित्युक्त्वा स नमस्य ततो ययौ । दृष्ट्वा सांदीपनिं शिष्या ऊचुरेवं दिनेदिने

kariṣyāmi tamityuktvā sa namasya tato yayau dṛṣṭvā sāṁdīpaniṁ śiṣyā ūcurevaṁ dinedine

'ऐसा करूँगा' कहकर उन्होंने प्रणाम किया और चले गए। सांदीपनि को देखकर उनके शिष्य प्रतिदिन ऐसा कहने लगे --

श्लोक 16 (skanda.5.27.16)

कस्य न श्रद्दधे तेषां वचस्त्वत्यद्भुतं यतः । स्वयं ययौ ततो द्रष्टुमाश्चर्यं शिष्यभाषितम्

kasya na śraddadhe teṣāṁ vacastvatyadbhutaṁ yataḥ svayaṁ yayau tato draṣṭumāścaryaṁ śiṣyabhāṣitam

-- ऐसे अद्भुत वचन कि किसे विश्वास न हो? स्वयं वे ही उस आश्चर्य को, जो शिष्यों ने बताया था, देखने गए।

श्लोक 17 (skanda.5.27.17)

ततस्तत्रोत्थितः शब्दः संश्लेषे च तथा तयोः । तावागतौ गृहं तत्र गुरुर्वचनमब्रवीत्

tatastatrotthitaḥ śabdaḥ saṁśleṣe ca tathā tayoḥ tāvāgatau gṛhaṁ tatra gururvacanamabravīt

तब उनके मिलन पर वहाँ महान कोलाहल हुआ। दोनों जब घर में आए, तब गुरु ने यह वचन कहा --

श्लोक 18 (skanda.5.27.18)

न वै ज्ञातौ मया वीरौ यदुवृष्णिकुलोद्भवौ । ततः सांदीपनिं कृष्णः कृतकृत्योऽब्रवीद्वचः

na vai jñātau mayā vīrau yaduvṛṣṇikulodbhavau tataḥ sāṁdīpaniṁ kṛṣṇaḥ kṛtakṛtyo'bravīdvacaḥ

-- 'मैंने यदु-वृष्णि कुल में उत्पन्न इन दोनों वीरों को नहीं पहचाना!' तब कृतकृत्य कृष्ण ने सांदीपनि से यह वचन कहा --

श्लोक 19 (skanda.5.27.19)

गुर्वर्थं किं ददामीति सह रामेण हर्षितः । तच्छुत्वा वचनं हृद्यं गुरुः प्रोवाच हर्षितः

gurvarthaṁ kiṁ dadāmīti saha rāmeṇa harṣitaḥ tacchutvā vacanaṁ hṛdyaṁ guruḥ provāca harṣitaḥ

-- 'गुरु के लिए मैं क्या दूँ?' राम के साथ हर्षित होकर उन्होंने ऐसा कहा। यह हृदयस्पर्शी वचन सुनकर गुरु ने प्रसन्न होकर कहा --

श्लोक 20 (skanda.5.27.20)

पुत्रमिच्छाम्यहं त्वत्तो यो मृतो लवणांभसि । पुत्र एको हि मे जातः स चापि तिमिना हृतः

putramicchāmyahaṁ tvatto yo mṛto lavaṇāṁbhasi putra eko hi me jātaḥ sa cāpi timinā hṛtaḥ

-- 'मैं तुमसे अपना वह पुत्र चाहता हूँ जो खारे समुद्र में मृत्यु को प्राप्त हुआ था। मेरा एक ही पुत्र जन्मा था, वह भी तिमि द्वारा हर लिया गया।

श्लोक 21 (skanda.5.27.21)

प्रभासे तीर्थयात्रायां त्वमेव तमिहानय । तथेति चाब्रवीत्कृष्णो रामस्यानुमते गतः

prabhāse tīrthayātrāyāṁ tvameva tamihānaya tatheti cābravītkṛṣṇo rāmasyānumate gataḥ

प्रभास तीर्थ की यात्रा में यह हुआ; तुम ही उसे यहाँ ले आओ।' 'ऐसा ही होगा' कहकर कृष्ण राम की अनुमति से चल पड़े।

श्लोक 22 (skanda.5.27.22)

तं समुद्र उवाचेदं दैत्यः पंचजनो महान् । तिमि रूपेण तं बालं ग्रस्तवान्मयि संस्थितः

taṁ samudra uvācedaṁ daityaḥ paṁcajano mahān timi rūpeṇa taṁ bālaṁ grastavānmayi saṁsthitaḥ

समुद्र ने उनसे कहा -- 'पंचजन नामक महादैत्य मेरे भीतर रहता है; उसी ने तिमि के रूप में उस बालक को निगल लिया था।'

श्लोक 23 (skanda.5.27.23)

ततः पंचजनं हत्वा ग्राहरूपं महाबलम् । तन्मध्यस्थं च जग्राह शंखं ग्रस्तो हि यः पुरा

tataḥ paṁcajanaṁ hatvā grāharūpaṁ mahābalam tanmadhyasthaṁ ca jagrāha śaṁkhaṁ grasto hi yaḥ purā

तब महाबली ग्राहरूपी पंचजन का वध कर, उसके भीतर स्थित शंख को उन्होंने ग्रहण किया, जो पहले उसके द्वारा निगला गया था।

श्लोक 24 (skanda.5.27.24)

जलेश्वरगृहात्तेन ग्राहेणातीव लीलया । तस्योदरे यदा बालं नाप्तवांस्तु जनार्दनः

jaleśvaragṛhāttena grāheṇātīva līlayā tasyodare yadā bālaṁ nāptavāṁstu janārdanaḥ

जब जनार्दन ने उस जल-निवासी ग्राह के उदर से, अत्यन्त सरलता से (शंख तो पाया, किन्तु) उस बालक को नहीं पाया --

श्लोक 25 (skanda.5.27.25)

यमालयगतं मत्वा तदा वरुणमब्रवीत् । भगवान्यादसामीश रथो मे दीयतां महान्

yamālayagataṁ matvā tadā varuṇamabravīt bhagavānyādasāmīśa ratho me dīyatāṁ mahān

-- तो यह मानकर कि वह यमलोक चला गया है, उन्होंने वरुण से कहा -- 'हे भगवन्! जलचरों के स्वामी! मुझे वह महान रथ दीजिए --

श्लोक 26 (skanda.5.27.26)

पुराजिरे हता दैत्या दानवा बलदर्पिताः । मया येन रथेनाद्य मह्यं स दीयतां रथः

purājire hatā daityā dānavā baladarpitāḥ mayā yena rathenādya mahyaṁ sa dīyatāṁ rathaḥ

-- जिस रथ से मैंने पूर्वकाल में युद्धभूमि में बलमदमत्त दैत्य-दानवों का वध किया था, वही रथ आज मुझे दिया जाए।

श्लोक 27 (skanda.5.27.27)

न्यासभूतो रथो यस्ते विधृतो निहतारिणा । मया धर्मं पुरस्कृ्त्य स दीयतामपांपते

nyāsabhūto ratho yaste vidhṛto nihatāriṇā mayā dharmaṁ puraskṛtya sa dīyatāmapāṁpate

शत्रुहन्ता मेरे द्वारा तुम्हारे पास न्यासरूप में रखा गया वह रथ, हे अपां-पते! धर्म को आगे रखकर मुझे लौटाइए --

श्लोक 28 (skanda.5.27.28)

येनाहवे प्रेतराजं जित्वा पश्यामि बालकम् । एतच्छ्रुत्वा प्रहृष्टात्मा ज्ञात्वा कार्यार्थिनं हरिम् । ददौ तं रथमक्षोभ्यं रणे तस्मै सुरासुरैः

yenāhave pretarājaṁ jitvā paśyāmi bālakam etacchrutvā prahṛṣṭātmā jñātvā kāryārthinaṁ harim dadau taṁ rathamakṣobhyaṁ raṇe tasmai surāsuraiḥ

-- जिससे युद्ध में यमराज को जीतकर मैं उस बालक को देख सकूँ।' यह सुनकर, हरि को कार्य-सिद्धि के लिए तत्पर जानकर, प्रसन्नचित्त वरुण ने देवताओं और असुरों द्वारा भी युद्ध में अकम्प्य उस रथ को उन्हें दे दिया।

श्लोक 29 (skanda.5.27.29)

ततो हरिः समालोक्य रथं रत्नपरिष्कृतम् । द्वीपिचर्मपरीधानं वैयाघ्रपरिवारितम्

tato hariḥ samālokya rathaṁ ratnapariṣkṛtam dvīpicarmaparīdhānaṁ vaiyāghraparivāritam

तब हरि ने रत्नजड़ित उस रथ को देखा, जो द्वीपिचर्म (चीते की खाल) से आच्छादित और व्याघ्रचर्म से परिवृत था --

श्लोक 30 (skanda.5.27.30)

नाना चित्रविचित्रांगं गरुडध्वजराजितम् । संयुक्तं शैब्यसुग्रीवपुष्पदंतबलाहकैः

nānā citravicitrāṁgaṁ garuḍadhvajarājitam saṁyuktaṁ śaibyasugrīvapuṣpadaṁtabalāhakaiḥ

-- विविध आश्चर्यजनक अंगों से युक्त, गरुड़-ध्वज से सुशोभित, शैब्य, सुग्रीव, पुष्पदन्त और बलाहक (अश्वों) से युक्त --

श्लोक 31 (skanda.5.27.31)

अजेयं देवदेवेंद्रदानवासुरराक्षसैः । अनेकायुधसंपूर्णं मणिविद्रुमभूषितम्

ajeyaṁ devadeveṁdradānavāsurarākṣasaiḥ anekāyudhasaṁpūrṇaṁ maṇividrumabhūṣitam

-- देव, इन्द्र, दानव, असुर और राक्षसों के लिए भी अजेय, अनेक आयुधों से पूर्ण, मणि-मूँगे से भूषित --

श्लोक 32 (skanda.5.27.32)

सहस्रसूर्यप्रतिमं चारुवक्त्रचतुर्युगम् । किंकिणीशतशोभाढ्यं घंटाचामरचं द्रिकम्

sahasrasūryapratimaṁ cāruvaktracaturyugam kiṁkiṇīśataśobhāḍhyaṁ ghaṁṭācāmaracaṁ drikam

-- सहस्र सूर्यों के समान, सुन्दर मुखयुक्त चार युगों (जुओं) वाला, सैकड़ों घंटियों की शोभा से युक्त, घंटा-चामर-चन्द्रिका से सज्जित --

श्लोक 33 (skanda.5.27.33)

संवर्ताकारविषमं खगेंद्रवरकेतनम् । दृष्ट्वा कृष्णः सरामस्तु मुमुदे वीतविस्मयात्

saṁvartākāraviṣamaṁ khageṁdravaraketanam dṛṣṭvā kṛṣṇaḥ sarāmastu mumude vītavismayāt

-- प्रलयाग्नि के समान विषम आकार वाला, गरुड़-पताका से युक्त उस रथ को देखकर राम सहित कृष्ण विस्मय त्यागकर हर्षित हुए।

श्लोक 34 (skanda.5.27.34)

प्रदक्षिणमुपाकृत्य देवताभ्यः प्रणम्य च । आरुरोह रथं विष्णुर्विमानं साग्रयोजनम्

pradakṣiṇamupākṛtya devatābhyaḥ praṇamya ca āruroha rathaṁ viṣṇurvimānaṁ sāgrayojanam

उसकी प्रदक्षिणा कर, देवताओं को प्रणाम कर, विष्णु उस एक योजन से अधिक विस्तृत विमानरूपी रथ पर आरूढ़ हुए।

श्लोक 35 (skanda.5.27.35)

ततो जगाम त्वरितो जनार्दनो जगन्निवासो यमलोकमाश्रिताम् । दिशं सहस्रैः किरणै र्वृतां पुरीं दध्मौ च शंखं परिगृह्य चाच्युतः

tato jagāma tvarito janārdano jagannivāso yamalokamāśritām diśaṁ sahasraiḥ kiraṇai rvṛtāṁ purīṁ dadhmau ca śaṁkhaṁ parigṛhya cācyutaḥ

तब जगन्निवास जनार्दन शीघ्रता से यमलोक की ओर गए, सहस्र किरणों से घिरी उस दिशा में; और अच्युत ने अपना शंख उठाकर उसे बजाया।

श्लोक 36 (skanda.5.27.36)

तत्र प्रध्यापयामास शंखं शार्ङ्गधनुर्धरः । तेन शब्देन वित्रस्ताः कृतांतालयवासिनः

tatra pradhyāpayāmāsa śaṁkhaṁ śārṅgadhanurdharaḥ tena śabdena vitrastāḥ kṛtāṁtālayavāsinaḥ

वहाँ शार्ङ्गधनुर्धारी ने शंख को गुंजायमान किया। उस ध्वनि से यमलोकवासी भयभीत हो उठे।

श्लोक 37 (skanda.5.27.37)

नरकांतर्गता मर्त्याः पापाचारपरायणाः । सुखमापुः प्रसन्नाश्च वह्नयः कृष्णदर्शनात्

narakāṁtargatā martyāḥ pāpācāraparāyaṇāḥ sukhamāpuḥ prasannāśca vahnayaḥ kṛṣṇadarśanāt

पापाचार में लीन मरणोपरान्त नरक में पड़े मनुष्यों को सुख प्राप्त हुआ और वे शांत हो गए; कृष्ण-दर्शन से नरक की अग्नियाँ भी शांत हो गईं।

श्लोक 38 (skanda.5.27.38)

शस्त्राणि कुंठतां प्रापुर्यंत्राणि विविधानि च । विदीर्णानि तदा चासुर्देवदेवस्य दर्शनात्

śastrāṇi kuṁṭhatāṁ prāpuryaṁtrāṇi vividhāni ca vidīrṇāni tadā cāsurdevadevasya darśanāt

देवाधिदेव के दर्शन से शस्त्र कुंठित हो गए और विविध यंत्र उस समय टूट गए।

श्लोक 39 (skanda.5.27.39)

असिपत्रवनंनाम शीर्णपर्णमजायत । रौरवनाम नरकमभैरवमभूत्तदा

asipatravanaṁnāma śīrṇaparṇamajāyata rauravanāma narakamabhairavamabhūttadā

असिपत्रवन नामक नरक के पत्ते झड़ गए; रौरव नामक नरक उस समय निर्भय हो गया।

श्लोक 40 (skanda.5.27.40)

अभैरवं भैरवाख्यं कुंभीपाकमवाचिकम् । शृंगाटं शृंगसदृशं लोहसूच्यप्यसूचिका

abhairavaṁ bhairavākhyaṁ kuṁbhīpākamavācikam śṛṁgāṭaṁ śṛṁgasadṛśaṁ lohasūcyapyasūcikā

भैरव नामक नरक भय-रहित हो गया, कुंभीपाक ध्वनिरहित हो गया; श्रृंगों जैसा शृंगाट और लोहसूची भी सुई-रहित हो गए।

श्लोक 41 (skanda.5.27.41)

दुस्तरा सुतरा जाता नदी वैतरणी नृणाम् । नरकांते तदा जाते गते विश्वेश्वरे विभौ

dustarā sutarā jātā nadī vaitaraṇī nṛṇām narakāṁte tadā jāte gate viśveśvare vibhau

मनुष्यों के लिए दुस्तर वैतरणी नदी सुतर हो गई। इस प्रकार विश्वेश्वर विभु के जाने पर नरक का अन्त हुआ --

श्लोक 42 (skanda.5.27.42)

पापक्षयात्ततः सर्वे ते मुक्ता नारका नराः । पदमव्ययमासाद्य दृष्ट्वा विष्णुं तमोऽपहम्

pāpakṣayāttataḥ sarve te muktā nārakā narāḥ padamavyayamāsādya dṛṣṭvā viṣṇuṁ tamo'paham

-- पापक्षय के कारण वे सभी नारकी मनुष्य मुक्त हो गए, अंधकार-नाशक विष्णु का दर्शन कर वे अविनाशी पद को प्राप्त हुए।

श्लोक 43 (skanda.5.27.43)

विमानेषु सहस्रेषु ह्यारूढास्ते समंततः । समीक्ष्य पुंडरीकाक्षं मुक्तास्ते सर्वपातकात्

vimāneṣu sahasreṣu hyārūḍhāste samaṁtataḥ samīkṣya puṁḍarīkākṣaṁ muktāste sarvapātakāt

सहस्रों विमानों पर आरूढ़ होकर, कमलनयन का दर्शन कर वे सभी पापों से मुक्त हो गए।

श्लोक 44 (skanda.5.27.44)

ततः शून्यं मुने जातं सर्वं निरयमंडलम् । दर्शनात्तस्य देवस्य विष्णोर्विश्वस्वरूपिणः

tataḥ śūnyaṁ mune jātaṁ sarvaṁ nirayamaṁḍalam darśanāttasya devasya viṣṇorviśvasvarūpiṇaḥ

हे मुने! विश्वस्वरूप देव विष्णु के दर्शन से इस प्रकार समस्त नरक-मंडल शून्य हो गया।

श्लोक 45 (skanda.5.27.45)

ततो दूताः कृतांतस्य कृष्णं च युद्धकारिणम् । वारयामासुरत्युग्रा विशंतं नरकान्प्रति

tato dūtāḥ kṛtāṁtasya kṛṣṇaṁ ca yuddhakāriṇam vārayāmāsuratyugrā viśaṁtaṁ narakānprati

तब यमराज के अत्यन्त उग्र दूतगण, युद्धरत नरक में प्रवेश करते कृष्ण को रोकने लगे।

श्लोक 46 (skanda.5.27.46)

किंकरा ऊचुः । मा वीरानेन मार्गेण रथमानय मानवन् । प्रयांत्यधोगतिं पापात्परस्त्रीस्वापहारकाः

kiṁkarā ūcuḥ mā vīrānena mārgeṇa rathamānaya mānavan prayāṁtyadhogatiṁ pāpātparastrīsvāpahārakāḥ

किंकरों ने कहा -- 'हे वीर! इस मार्ग से रथ मत ले जाओ! जो पापवश परस्त्री और परधन का अपहरण करते हैं, वे ही अधोगति पाते हैं।'

श्लोक 47 (skanda.5.27.47)

यमादिष्टा नराः पापा येऽमोच्या वर्षकोटिभिः । दृष्ट्वा त एव सद्यस्त्वां गताः स्वर्गमपावृताः

yamādiṣṭā narāḥ pāpā ye'mocyā varṣakoṭibhiḥ dṛṣṭvā ta eva sadyastvāṁ gatāḥ svargamapāvṛtāḥ

'यमराज द्वारा दंडित वे पापी मनुष्य, जो करोड़ों वर्षों में भी मुक्त न होते, आपको देखते ही तत्काल खुले स्वर्ग को चले गए।'

श्लोक 48 (skanda.5.27.48)

एतच्छ्रुत्वा वचस्तेषां कृपया पीडितो भृशम् । पुनः प्रोवाच मधुहा मोक्षायाहमुपागतः

etacchrutvā vacasteṣāṁ kṛpayā pīḍito bhṛśam punaḥ provāca madhuhā mokṣāyāhamupāgataḥ

उनका यह वचन सुनकर करुणा से अत्यन्त द्रवित हुए मधुसूदन ने पुनः कहा -- 'मैं मोक्ष के लिए ही यहाँ आया हूँ।

श्लोक 49 (skanda.5.27.49)

सर्वेषां स्वर्गदाताहं यमलोकनिवारकः । अंजसा यमराड्दूता यमायाख्यात मे वचः

sarveṣāṁ svargadātāhaṁ yamalokanivārakaḥ aṁjasā yamarāḍdūtā yamāyākhyāta me vacaḥ

मैं सबको स्वर्ग देने वाला, यमलोक का निवारण करने वाला हूँ। हे यमराज के दूतो! तुरन्त जाकर यमराज से मेरा यह वचन कह दो।'

श्लोक 50 (skanda.5.27.50)

एतच्छ्रुत्वा वचो दूताः सत्वरा यममागताः । सर्वमाचक्षिरे वृत्तं यथा नारकमोक्षणम्

etacchrutvā vaco dūtāḥ satvarā yamamāgatāḥ sarvamācakṣire vṛttaṁ yathā nārakamokṣaṇam

यह वचन सुनकर वे दूत शीघ्रता से यमराज के पास आए और नारकियों की मुक्ति सहित समस्त वृत्तान्त उन्हें सुनाया।

श्लोक 51 (skanda.5.27.51)

ततो यमो रुषाविष्टः प्राह तान्यमकिंकरान् । यः कश्चिदागतो मर्त्यो मर्यादाभेदकृन्नरः

tato yamo ruṣāviṣṭaḥ prāha tānyamakiṁkarān yaḥ kaścidāgato martyo maryādābhedakṛnnaraḥ

तब क्रोध से भरे यमराज ने अपने किंकरों से कहा -- 'जो भी मर्त्य यहाँ आया है, मर्यादा भंग करने वाला वह मनुष्य --

श्लोक 52 (skanda.5.27.52)

तं गत्वा वारयध्वं वै गृहीत्वानीयतामिति । अयं नरांतको यातु किंकरः सह किंकरैः

taṁ gatvā vārayadhvaṁ vai gṛhītvānīyatāmiti ayaṁ narāṁtako yātu kiṁkaraḥ saha kiṁkaraiḥ

-- जाकर उसे रोको, पकड़कर यहाँ ले आओ।' 'यह नरांतक किंकरों सहित जाए' -- ऐसा उन्होंने आदेश दिया।

श्लोक 53 (skanda.5.27.53)

एवमुक्तो यमेनाथ किंकरः स नरांतकः । गत्वा तं वारयामास वाग्भिरुग्राभिरच्युतम्

evamukto yamenātha kiṁkaraḥ sa narāṁtakaḥ gatvā taṁ vārayāmāsa vāgbhirugrābhiracyutam

यमराज द्वारा ऐसा आदेशित वह किंकर नरांतक, वहाँ जाकर उग्र वचनों से अच्युत को रोकने लगा।

श्लोक 54 (skanda.5.27.54)

यदा न वारितस्तस्थौ तदा क्रुद्धो नरांतकः । तदा शरैरतीवोग्रैस्ताडितस्तेन केशवः

yadā na vāritastasthau tadā kruddho narāṁtakaḥ tadā śarairatīvograistāḍitastena keśavaḥ

जब वे रुके नहीं, तब क्रुद्ध नरांतक ने अत्यन्त उग्र बाणों से केशव पर प्रहार किया।

श्लोक 55 (skanda.5.27.55)

बलदेवोपि समरे ताडितो विविधैः शरैः । तावुभौ ताडितौ घोरैः समंताद्यमकिंकरैः

baladevopi samare tāḍito vividhaiḥ śaraiḥ tāvubhau tāḍitau ghoraiḥ samaṁtādyamakiṁkaraiḥ

युद्ध में बलदेव पर भी विविध बाणों से प्रहार हुआ; उन दोनों पर सभी ओर से यमकिंकरों ने घोर प्रहार किया।

श्लोक 56 (skanda.5.27.56)

आदाय धनुषी दिव्ये जघ्नतुर्यमकिंकरान् । बाणैरनेकसाहस्रैः क्रुद्धौ रामजनादर्नौ

ādāya dhanuṣī divye jaghnaturyamakiṁkarān bāṇairanekasāhasraiḥ kruddhau rāmajanādarnau

अपने दिव्य धनुष उठाकर क्रुद्ध राम-जनार्दन ने हजारों बाणों से यमकिंकरों का संहार किया।

श्लोक 57 (skanda.5.27.57)

नरांतकोऽपि समरे बलेन बलिनार्दितः । पपात गदया भिन्नो मूर्ध्नि निर्यातलोचनः

narāṁtako'pi samare balena balinārditaḥ papāta gadayā bhinno mūrdhni niryātalocanaḥ

युद्ध में बलशाली बलदेव द्वारा पीड़ित नरांतक भी मुद्गर से सिर फटकर, आँखें बाहर निकलकर, गिर पड़ा।

श्लोक 58 (skanda.5.27.58)

ततो नरांतके वीरे पतिते यमकिंकरे । किंकराणामभूत्सैन्यमार्तं रणपराङ्मुखम्

tato narāṁtake vīre patite yamakiṁkare kiṁkarāṇāmabhūtsainyamārtaṁ raṇaparāṅmukham

यमकिंकर वीर नरांतक के गिरने पर किंकरों की सेना व्यथित होकर युद्ध से विमुख हो गई।

श्लोक 59 (skanda.5.27.59)

रामकृष्णाभ्यां ते दूता हन्यमाना भयातुराः । यमाय कथयामासुर्नरांतकस्तु पातितः

rāmakṛṣṇābhyāṁ te dūtā hanyamānā bhayāturāḥ yamāya kathayāmāsurnarāṁtakastu pātitaḥ

राम और कृष्ण द्वारा मारे जाते हुए, भयातुर उन दूतों ने यमराज को नरांतक के पतन का समाचार सुनाया।

श्लोक 60 (skanda.5.27.60)

ततो यमो ययौ क्रुद्धः समंतात्किंकरैर्वृतः । प्राह ततो यमः क्रुद्धो नो जितोहं पुरा परैः

tato yamo yayau kruddhaḥ samaṁtātkiṁkarairvṛtaḥ prāha tato yamaḥ kruddho no jitohaṁ purā paraiḥ

तब क्रुद्ध यमराज किंकरों से घिरे हुए स्वयं युद्ध को गए; क्रोधित यमराज बोले -- 'मैं पहले कभी शत्रुओं द्वारा पराजित नहीं हुआ।'

श्लोक 61 (skanda.5.27.61)

ततो वादित्रनिर्घोषैस्तुमुलानकगोमुखैः । नानाडमरुकैश्चैव चित्रगुप्तैश्च गच्छति

tato vāditranirghoṣaistumulānakagomukhaiḥ nānāḍamarukaiścaiva citraguptaiśca gacchati

तब बाजों, नगाड़ों और शंखों की तुमुल ध्वनि तथा विविध डमरुओं के साथ, चित्रगुप्त सहित वे चल पड़े।

श्लोक 62 (skanda.5.27.62)

देवा विद्याधराः सिद्धा दृष्ट्वा यांतं महाबलम् । कृतांतस्य रणेऽक्षोभ्यं कामपालं जगत्पतिम्

devā vidyādharāḥ siddhā dṛṣṭvā yāṁtaṁ mahābalam kṛtāṁtasya raṇe'kṣobhyaṁ kāmapālaṁ jagatpatim

देव, विद्याधर और सिद्धगण ने युद्धभूमि में अकम्प्य, जगत्पति, कामरक्षक उस महाबली यमराज को जाते देखा।

श्लोक 63 (skanda.5.27.63)

ततस्ते किंकराः सर्वे चित्रगुप्तेन नोदिताः । रथमावृत्य बाणौघैः प्रविव्यधुः समंततः

tataste kiṁkarāḥ sarve citraguptena noditāḥ rathamāvṛtya bāṇaughaiḥ pravivyadhuḥ samaṁtataḥ

तब चित्रगुप्त द्वारा प्रेरित वे सभी किंकर, रथ को घेरकर सभी ओर से बाणों की वर्षा करने लगे।

श्लोक 64 (skanda.5.27.64)

बलं च केशवं संख्ये जघ्नतुस्तावुभावपि । रणे च विविधैर्बाणैश्चित्रगुप्तस्य पश्यतः

balaṁ ca keśavaṁ saṁkhye jaghnatustāvubhāvapi raṇe ca vividhairbāṇaiścitraguptasya paśyataḥ

युद्ध में उन्होंने बल और केशव दोनों पर विविध बाणों से प्रहार किया, चित्रगुप्त के सामने ही --

श्लोक 65 (skanda.5.27.65)

विदार्य च सहस्राणि किंकराणां समंततः । कृतांतानीकिनीमध्ये कृतांत इव केशवः । चचार रणदुर्धर्षः कामपालेन पालितः

vidārya ca sahasrāṇi kiṁkarāṇāṁ samaṁtataḥ kṛtāṁtānīkinīmadhye kṛtāṁta iva keśavaḥ cacāra raṇadurdharṣaḥ kāmapālena pālitaḥ

-- सहस्रों किंकरों को सर्वत्र विदीर्ण करते हुए, साक्षात् काल के समान केशव यमराज की सेना के मध्य युद्ध में अजेय होकर, बलदेव द्वारा रक्षित, विचरण करने लगे।

श्लोक 66 (skanda.5.27.66)

ततश्चित्रगुप्तो रणे किंकराद्यं विदीर्णं निरीक्ष्यार्तनादं चकार

tataścitragupto raṇe kiṁkarādyaṁ vidīrṇaṁ nirīkṣyārtanādaṁ cakāra

तब चित्रगुप्त ने युद्ध में अपने प्रमुख किंकर को विदीर्ण देखकर करुण क्रन्दन किया।

श्लोक 67 (skanda.5.27.67)

शरैः पंचभिः कृष्णमायांतमाजौ जघानाष्टभिर्वक्त्रदेशे स भिन्नः । शरार्तो रथोपस्थ आसीत्तदार्तस्तमालोक्य भिन्नं रणे नष्टसंज्ञम्

śaraiḥ paṁcabhiḥ kṛṣṇamāyāṁtamājau jaghānāṣṭabhirvaktradeśe sa bhinnaḥ śarārto rathopastha āsīttadārtastamālokya bhinnaṁ raṇe naṣṭasaṁjñam

उसने पाँच बाणों से आते हुए कृष्ण पर और आठ बाणों से उनके मुख पर प्रहार किया; बाणों से पीड़ित होकर वह अपने रथ में गिर पड़ा; उसे इस प्रकार बेहोश देखकर कृष्ण को दया आई।

श्लोक 68 (skanda.5.27.68)

रथं स्वं समादाय यातः कृतांतस्ततश्चित्रगुप्ते शरार्ते प्रसुप्ते । रणे कीर्तिलुप्ते भयक्षोभयुक्तः स्वसैन्यैश्च युक्तो भयार्तो निषण्णः

rathaṁ svaṁ samādāya yātaḥ kṛtāṁtastataścitragupte śarārte prasupte raṇe kīrtilupte bhayakṣobhayuktaḥ svasainyaiśca yukto bhayārto niṣaṇṇaḥ

तब चित्रगुप्त के बाणों से घायल होकर मूर्च्छित हो जाने पर, युद्ध में कीर्ति खोकर, यमराज अपने रथ को लेकर हट गए; भय से व्याकुल होकर वे अपनी सेना सहित बैठ गए।

श्लोक 69 (skanda.5.27.69)

प्रधानाश्च भग्ना विचित्राश्च भग्रास्ततश्चित्रगुप्तं निशम्याथ भग्नम् । स कालस्तमायांतमालोक्य दूराद्वरसैन्यमादाय देवारि शत्रुम्

pradhānāśca bhagnā vicitrāśca bhagrāstataścitraguptaṁ niśamyātha bhagnam sa kālastamāyāṁtamālokya dūrādvarasainyamādāya devāri śatrum

उनके प्रमुख योद्धा भग्न हो गए, विचित्र सेना भी भग्न हो गई। तब चित्रगुप्त को भग्न सुनकर, दूर से आते हुए कृष्ण को देखकर, काल ने अपनी श्रेष्ठ सेना लेकर उस देवशत्रु के विरुद्ध --

श्लोक 70 (skanda.5.27.70)

विनाशाय युध्यद्युगांते प्रजानां यथा वाडवो ज्वालवृद्धः प्रवृत्तः । तमायांतमालोक्य कालं करालं शरैरावृणोदंतकं कालकल्पैः

vināśāya yudhyadyugāṁte prajānāṁ yathā vāḍavo jvālavṛddhaḥ pravṛttaḥ tamāyāṁtamālokya kālaṁ karālaṁ śarairāvṛṇodaṁtakaṁ kālakalpaiḥ

-- प्रजा के विनाश हेतु युद्ध को प्रस्थान किया, मानो प्रलय के अन्त में ज्वालाओं से बढ़ता हुआ बड़वानल हो। उस भयंकर काल को आते देखकर कृष्ण ने उसे कालरूपी बाणों से आच्छादित कर दिया।

श्लोक 71 (skanda.5.27.71)

स कालः करालं समादाय दंडं मुमोचाच्युते पश्यतां देवतानाम् । ततः कालदंडः प्रजानां विनाशो हरेः संनिकाशं समभ्याजगाम

sa kālaḥ karālaṁ samādāya daṁḍaṁ mumocācyute paśyatāṁ devatānām tataḥ kāladaṁḍaḥ prajānāṁ vināśo hareḥ saṁnikāśaṁ samabhyājagāma

उस काल ने अपना भयंकर दंड उठाकर देवताओं के देखते-देखते अच्युत पर छोड़ दिया; तब प्रजाओं का विनाशक वह कालदंड हरि की ओर उड़ता हुआ आया।

श्लोक 72 (skanda.5.27.72)

ततो देवगंधर्वयक्षा मुनींद्राः परं विस्मयं प्रापुरावीक्ष्य रामम् । ज्वलंतं च जग्राह कालस्य दंडं स रामो वरलीलयाऽनंतमूर्तिः

tato devagaṁdharvayakṣā munīṁdrāḥ paraṁ vismayaṁ prāpurāvīkṣya rāmam jvalaṁtaṁ ca jagrāha kālasya daṁḍaṁ sa rāmo varalīlayā'naṁtamūrtiḥ

यह देखकर देव, गंधर्व, यक्ष और मुनीन्द्र परम विस्मय को प्राप्त हुए; और अनन्तरूपी राम ने अनायास ही उस जलते हुए कालदंड को पकड़ लिया।

श्लोक 73 (skanda.5.27.73)

गृहीते बलेनाहवे कालदंडे मोक्तुकामे पुनः कालनाशाय वै। । तूर्णमभ्येत्य तत्रांतरे रणे वारयामास कृष्णं तदा

gṛhīte balenāhave kāladaṁḍe moktukāme punaḥ kālanāśāya vai tūrṇamabhyetya tatrāṁtare raṇe vārayāmāsa kṛṣṇaṁ tadā

युद्ध में बल द्वारा वह कालदंड पकड़े जाने पर, काल जब उसे कृष्ण के विनाश हेतु पुनः छोड़ना चाहता था, तभी ब्रह्मा ने शीघ्र वहाँ आकर युद्ध में कृष्ण को रोका।

श्लोक 74 (skanda.5.27.74)

मा मुंचेत्यब्रवीद्वेधाः कालं कालायुधं बल । त्वया बलवता वीर चराचरधरा धरा

mā muṁcetyabravīdvedhāḥ kālaṁ kālāyudhaṁ bala tvayā balavatā vīra carācaradharā dharā

ब्रह्मा ने काल से कहा -- 'इसे मत छोड़ो।' और कालरूपी शस्त्रधारी बल से कहा -- 'हे वीर! तुम बलवान हो, चराचरधारिणी यह पृथ्वी --

श्लोक 75 (skanda.5.27.75)

धार्यते शिरसा देव संसारे नास्ति ते समः । त्वया विश्वपतिर्विष्णुरुत्संगेन सदोह्यते । कोऽन्योस्ति त्वत्समो राम यो जगद्दहने क्षमः । जगत्स्रष्टा जगद्गोप्ता जगद्धर्ता जगत्पतिः

dhāryate śirasā deva saṁsāre nāsti te samaḥ tvayā viśvapatirviṣṇurutsaṁgena sadohyate ko'nyosti tvatsamo rāma yo jagaddahane kṣamaḥ jagatsraṣṭā jagadgoptā jagaddhartā jagatpatiḥ

-- तुम्हारे मस्तक पर धारण की जाती है, हे देव! संसार में तुम्हारे समान कोई नहीं। तुम्हारी गोद में ही विश्वपति विष्णु सदा वहन किए जाते हैं। हे राम! तुम्हारे समान जगत्-दहन में समर्थ और कौन है? जगत् का स्रष्टा, रक्षक, धर्ता और स्वामी --

श्लोक 76 (skanda.5.27.76)

पाल्यते यत्त्वया सोपि विष्णुर्विश्वैकनायकः । कस्ते स्तुतिकरोऽस्तीह को गुणान्वक्तुमर्हति

pālyate yattvayā sopi viṣṇurviśvaikanāyakaḥ kaste stutikaro'stīha ko guṇānvaktumarhati

-- वह विष्णु भी, विश्व का एकमात्र स्वामी होकर भी, तुम्हारे द्वारा ही रक्षित है। तुम्हारी स्तुति कौन कर सकता है? तुम्हारे गुणों का वर्णन कौन करने योग्य है?

श्लोक 77 (skanda.5.27.77)

ततो वयं त्वदंकस्थविष्णुनाभिभवा यतः । इत्युक्त्वा बलदेवं च वासुदेवं पुनर्वचः

tato vayaṁ tvadaṁkasthaviṣṇunābhibhavā yataḥ ityuktvā baladevaṁ ca vāsudevaṁ punarvacaḥ

अतः हम भी, तुम्हारी गोद में स्थित विष्णु से ही उत्पन्न हैं।' ऐसा बलदेव से कहकर, फिर वासुदेव से --

श्लोक 78 (skanda.5.27.78)

उवाच चतुरास्यस्तु स्तुतिश्च वृतः सुरैः । कृष्णकृष्ण करालस्य कालस्यास्य कृपां कुरु

uvāca caturāsyastu stutiśca vṛtaḥ suraiḥ kṛṣṇakṛṣṇa karālasya kālasyāsya kṛpāṁ kuru

-- देवताओं से घिरे चतुर्मुख ब्रह्मा ने स्तुतिपूर्वक कहा -- 'हे कृष्ण, कृष्ण! इस भयंकर काल पर दया कीजिए।

श्लोक 79 (skanda.5.27.79)

यतो भवंतमायांतं विष्णुं विश्वैकनायकम् । वेत्ति नायं जगन्नाथं नरकार्णवतारकम्

yato bhavaṁtamāyāṁtaṁ viṣṇuṁ viśvaikanāyakam vetti nāyaṁ jagannāthaṁ narakārṇavatārakam

क्योंकि यह आपको, विश्व के एकमात्र स्वामी विष्णु को, आते हुए नहीं पहचानता -- जगन्नाथ, नरकसागर से तारने वाले को।

श्लोक 80 (skanda.5.27.80)

त्वया वै भगवन्पूर्वं यमः संस्थापितः पदे । नृणां दुष्कृतकर्तॄणां नरकाय यमः प्रभो

tvayā vai bhagavanpūrvaṁ yamaḥ saṁsthāpitaḥ pade nṛṇāṁ duṣkṛtakartṝṇāṁ narakāya yamaḥ prabho

हे भगवन्! पूर्वकाल में आपने ही यमराज को उनके पद पर स्थापित किया था -- दुष्कर्म करने वाले मनुष्यों को नरक देने के लिए, हे प्रभो!

श्लोक 81 (skanda.5.27.81)

तस्मादस्य जगन्नाथ क्षम्यतां पुरुषोत्तम । विभो कृपां कुरुष्वास्य ब्रूहि यत्ते विवक्षितम्

tasmādasya jagannātha kṣamyatāṁ puruṣottama vibho kṛpāṁ kuruṣvāsya brūhi yatte vivakṣitam

अतः हे जगन्नाथ, पुरुषोत्तम! इसे क्षमा कीजिए; हे विभो! इस पर कृपा कीजिए; बताइए, आप क्या कहना चाहते हैं।'

श्लोक 82 (skanda.5.27.82)

एतच्छुत्वाऽब्रवीत्कृष्णो धातः शृणु गुरोर्मम । सांदीपनेः समानीतः सुतस्तेनागताविह

etacchutvā'bravītkṛṣṇo dhātaḥ śṛṇu gurormama sāṁdīpaneḥ samānītaḥ sutastenāgatāviha

यह सुनकर कृष्ण ने कहा -- 'हे ब्रह्मन्! सुनिए, यह मेरे गुरु के कारण है; सांदीपनि के पुत्र को लाने हेतु हम दोनों यहाँ आए हैं।

श्लोक 83 (skanda.5.27.83)

समर्प्यतां गुरुश्रेष्ठ श्रेष्ठाय गुरुदक्षिणा । आवाभ्यां वै प्रतिज्ञातो तस्मात्सा पाल्यतां विभो

samarpyatāṁ guruśreṣṭha śreṣṭhāya gurudakṣiṇā āvābhyāṁ vai pratijñāto tasmātsā pālyatāṁ vibho

हे गुरुश्रेष्ठ! श्रेष्ठ को गुरु-दक्षिणा दी जानी है; हमने यह प्रतिज्ञा की थी, अतः हे विभो! उसे पूर्ण किया जाए।'

श्लोक 84 (skanda.5.27.84)

एतत्पितामहः श्रुत्वा यमं समरनिर्जितम् । समाहूयाब्रवीद्विष्णुर्यद्ब्रवीति कुरुष्व तत्

etatpitāmahaḥ śrutvā yamaṁ samaranirjitam samāhūyābravīdviṣṇuryadbravīti kuruṣva tat

यह सुनकर पितामह ने युद्ध में पराजित यमराज को बुलाकर कहा -- 'जो विष्णु कहते हैं, वही करो।'

श्लोक 85 (skanda.5.27.85)

तच्छ्रुत्वा धर्मराजस्तु विरंचिमिदमब्रवीत् । भगवन्विश्वकृल्लोके नैष मार्गस्त्वया कृतः

tacchrutvā dharmarājastu viraṁcimidamabravīt bhagavanviśvakṛlloke naiṣa mārgastvayā kṛtaḥ

यह सुनकर धर्मराज ने ब्रह्मा से कहा -- 'हे भगवन्! विश्व के रचयिता! यह मार्ग आपने स्वयं नहीं बनाया है।

श्लोक 86 (skanda.5.27.86)

यमलोकमनुप्राप्य कायहीनः शरीरवान् । यत्कायरहितो याति नैतदत्र प्रपद्यते

yamalokamanuprāpya kāyahīnaḥ śarīravān yatkāyarahito yāti naitadatra prapadyate

यमलोक में पहुँचकर देहधारी जीव कायहीन हो जाता है; कायरहित होकर पुनः लौट जाए, यह यहाँ सम्भव नहीं है।'

श्लोक 87 (skanda.5.27.87)

तच्छुत्वा हि पुनर्ब्रह्मा विश्वस्यास्य विभुः स्वयम् । विश्वकृद्विश्वहद्यस्माद्यदिच्छति करोतु तत्

tacchutvā hi punarbrahmā viśvasyāsya vibhuḥ svayam viśvakṛdviśvahadyasmādyadicchati karotu tat

यह सुनकर, इस विश्व के स्वयं स्वामी ब्रह्मा ने पुनः कहा -- 'चूँकि वे विश्व के रचयिता और संहारक हैं, वे जो चाहें वही करें।'

श्लोक 88 (skanda.5.27.88)

तस्मादर्पय पुत्रं त्वं मुनेः सांदीपनेश्च यः । नरके यं पुनः कृत्वा तं चानय महामते

tasmādarpaya putraṁ tvaṁ muneḥ sāṁdīpaneśca yaḥ narake yaṁ punaḥ kṛtvā taṁ cānaya mahāmate

'अतः हे महामते! सांदीपनि मुनि के पुत्र को, नरक में पुनः रचकर, उसे यहाँ लाकर सौंपो।'

श्लोक 89 (skanda.5.27.89)

तच्छुत्वा धर्मराजस्तु पुत्रं सांदीपनेस्तथा । ससर्ज बाल रूपं च तदात्मानं तदुद्भवम्

tacchutvā dharmarājastu putraṁ sāṁdīpanestathā sasarja bāla rūpaṁ ca tadātmānaṁ tadudbhavam

यह सुनकर धर्मराज ने सांदीपनि के पुत्र को उसी बाल-रूप में, अपने ही उससे उत्पन्न किया।

श्लोक 90 (skanda.5.27.90)

अर्पयामास कृष्णस्य बालं रूपसमन्वितम् । स सर्वदेवतानां च तदद्भुतमिवाभवत्

arpayāmāsa kṛṣṇasya bālaṁ rūpasamanvitam sa sarvadevatānāṁ ca tadadbhutamivābhavat

उन्होंने वह रूपसम्पन्न बालक कृष्ण को सौंप दिया। यह समस्त देवताओं के लिए भी एक अद्भुत घटना जैसा लगा।

श्लोक 91 (skanda.5.27.91)

ततः प्राप्य गुरोः पुत्रं प्रभुः प्रीतः प्रजापतिम् । प्राह प्राप्तो मया ब्रह्मन्स्वरूपो द्विजदारकः

tataḥ prāpya guroḥ putraṁ prabhuḥ prītaḥ prajāpatim prāha prāpto mayā brahmansvarūpo dvijadārakaḥ

तब गुरु-पुत्र को पाकर प्रसन्न प्रभु ने प्रजापति से कहा -- 'हे ब्रह्मन्! मुझे यह द्विज-बालक अपने स्वरूप में प्राप्त हो गया है।'

श्लोक 92 (skanda.5.27.92)

श्रीकृष्ण उवाच । अद्यप्रभृति लोकेश देशे मच्चरणां किते । अवंत्यामंकपादाख्ये मृता नेक्षंति ते यमम्

śrīkṛṣṇa uvāca adyaprabhṛti lokeśa deśe maccaraṇāṁ kite avaṁtyāmaṁkapādākhye mṛtā nekṣaṁti te yamam

श्रीकृष्ण ने कहा -- हे लोकेश! आज से मेरे चरण-चिह्नों से अंकित अवन्ती के इस अंकपाद नामक क्षेत्र में मरने वाले यमराज को नहीं देखेंगे।

श्लोक 93 (skanda.5.27.93)

महाकालपुरे देवमाद्यं वै पुरुषोत्तमम् । विश्वरूपं च गोविंदं शंखोद्धारं च केश वम्

mahākālapure devamādyaṁ vai puruṣottamam viśvarūpaṁ ca goviṁdaṁ śaṁkhoddhāraṁ ca keśa vam

महाकालपुर में आद्य देव पुरुषोत्तम, विश्वरूप, गोविंद, और शंखोद्धार में केशव --

श्लोक 94 (skanda.5.27.94)

ये पश्यंति कुशस्थल्यामेतेषां मूर्तिपंचकम् । ते नरा न गमिष्यंति विरंचे निरयं क्वचित्

ye paśyaṁti kuśasthalyāmeteṣāṁ mūrtipaṁcakam te narā na gamiṣyaṁti viraṁce nirayaṁ kvacit

-- कुशस्थली में जो लोग इन पाँचों मूर्तियों का दर्शन करते हैं, हे विरंचे! वे मनुष्य कभी नरक को नहीं जाएँगे।

श्लोक 95 (skanda.5.27.95)

तथैवागमनादत्र मम रामस्य ना रकाः । विमुक्तास्ते त्वघाद्घोरात्प्राप्नुवंत्वखिला दिवम्

tathaivāgamanādatra mama rāmasya nā rakāḥ vimuktāste tvaghādghorātprāpnuvaṁtvakhilā divam

इसी प्रकार यहाँ मेरे और राम के आगमन के कारण नारकी जन घोर पाप से मुक्त होकर सम्पूर्ण रूप से स्वर्ग को प्राप्त हों।

श्लोक 96 (skanda.5.27.96)

इत्युक्ते वचने वेधाः प्रोवाच प्रीतिमान्हरिम् । यत्त्वयोक्तं वचः कृष्ण तदस्तु सकलं सदा

ityukte vacane vedhāḥ provāca prītimānharim yattvayoktaṁ vacaḥ kṛṣṇa tadastu sakalaṁ sadā

यह वचन सुनकर प्रीतिमान ब्रह्मा ने हरि से कहा -- 'हे कृष्ण! आपने जो कुछ कहा है, वह सब सदा वैसा ही हो।'

श्लोक 97 (skanda.5.27.97)

ये च त्वामादिपुरुषं प्रथमं पुरुषोत्तमम् । प्रणम्य पश्चाद्रक्ष्यंति स्नात्वा शिवसरस्यपि

ye ca tvāmādipuruṣaṁ prathamaṁ puruṣottamam praṇamya paścādrakṣyaṁti snātvā śivasarasyapi

और जो आपको आदिपुरुष, प्रथम पुरुषोत्तम मानकर प्रणाम कर, शिव-सरोवर में स्नान कर इस व्रत का पालन करेंगे --

श्लोक 98 (skanda.5.27.98)

अधोज्वालं महाकालं सोऽश्वमेधफलं लभेत् । एवमुक्तो हरिः पुत्रमादाय बलिना सह

adhojvālaṁ mahākālaṁ so'śvamedhaphalaṁ labhet evamukto hariḥ putramādāya balinā saha

-- और नीचे की ओर ज्वाला वाले महाकाल का दर्शन करेंगे, वे अश्वमेध यज्ञ का फल पाएँगे।' ऐसा कहे जाने पर हरि उस बालक और बलदेव को लेकर --

श्लोक 99 (skanda.5.27.99)

संमान्य वेधसं कालं समारोहद्रथं ततः । शंखमापूरयामास कृतकार्यो जनार्दनः

saṁmānya vedhasaṁ kālaṁ samārohadrathaṁ tataḥ śaṁkhamāpūrayāmāsa kṛtakāryo janārdanaḥ

-- ब्रह्मा और काल का सम्मान कर, फिर रथ पर आरूढ़ हुए; कृतकार्य जनार्दन ने अपना शंख फूँका --

श्लोक 100 (skanda.5.27.100)

मोक्षाय निरयस्थानां नृणां वै पापकर्मणाम् । ततस्ते शंखशब्देन स्मरणेनाच्युतस्य च

mokṣāya nirayasthānāṁ nṛṇāṁ vai pāpakarmaṇām tataste śaṁkhaśabdena smaraṇenācyutasya ca

-- पापकर्मी नारकी मनुष्यों की मुक्ति के लिए। तब उस शंखध्वनि और अच्युत के स्मरणमात्र से --

श्लोक 101 (skanda.5.27.101)

दिव्यान्विमानानारुह्य दिवमेवाखिला गताः । शून्यं तन्मंडलं जातं नारायणसमागमे

divyānvimānānāruhya divamevākhilā gatāḥ śūnyaṁ tanmaṁḍalaṁ jātaṁ nārāyaṇasamāgame

-- दिव्य विमानों पर आरूढ़ होकर वे सभी सीधे स्वर्ग को चले गए; नारायण के इस आगमन से वह नारकी मंडल शून्य हो गया।

श्लोक 102 (skanda.5.27.102)

कालोऽपि दंडमासाद्य बलदेवात्पुनः पुरम् । प्रविवेश ततो धाता तत्रैवांतरधीयत

kālo'pi daṁḍamāsādya baladevātpunaḥ puram praviveśa tato dhātā tatraivāṁtaradhīyata

काल ने भी बलदेव से अपना दंड वापस लेकर पुनः अपनी नगरी में प्रवेश किया; और ब्रह्मा भी वहीं अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 103 (skanda.5.27.103)

कृष्णोपि बलवान्धीरः प्राप्त उज्जयिनीं पुरीम् । बलदेवसहायस्तु सत्वरेणाशुगामिना

kṛṣṇopi balavāndhīraḥ prāpta ujjayinīṁ purīm baladevasahāyastu satvareṇāśugāminā

बलशाली धीर कृष्ण भी बलदेव के सहयोग से, अति शीघ्रगामी वेग से उज्जयिनी नगरी पहुँचे।

श्लोक 104 (skanda.5.27.104)

ततः सांदीपनेः पुत्रमर्पयामास केशिहा । गुरवे यत्प्रतिज्ञातं स तस्मादनृणोऽभवत्

tataḥ sāṁdīpaneḥ putramarpayāmāsa keśihā gurave yatpratijñātaṁ sa tasmādanṛṇo'bhavat

तब केशिनिसूदन ने सांदीपनि के पुत्र को उन्हें सौंप दिया; जो प्रतिज्ञा गुरु से की थी, उससे वे ऋणमुक्त हो गए।

श्लोक 105 (skanda.5.27.105)

एवं सांदीपनिः पुत्रं दृष्ट्वा च पुनरागतम् । नागरास्तत्र राजा च विस्मयं परमं ययुः

evaṁ sāṁdīpaniḥ putraṁ dṛṣṭvā ca punarāgatam nāgarāstatra rājā ca vismayaṁ paramaṁ yayuḥ

इस प्रकार अपने पुत्र को पुनः लौटा हुआ देखकर सांदीपनि, नगरवासी और राजा -- सभी परम विस्मय को प्राप्त हुए।

श्लोक 106 (skanda.5.27.106)

तौ वीरावर्चयामासुर्मत्वा देवोत्तमोत्तमौ । सांदीपनिरुवाचेदं तौ च रामजनार्दनौ

tau vīrāvarcayāmāsurmatvā devottamottamau sāṁdīpaniruvācedaṁ tau ca rāmajanārdanau

उन्हें महादेवों में श्रेष्ठतम जानकर उन दोनों वीरों की पूजा की गई; सांदीपनि ने राम और जनार्दन से यह कहा --

श्लोक 107 (skanda.5.27.107)

इह स्थास्यति वां कीर्तिर्यावदाभूतसंप्लवम् । स्थाने मदीय एतस्मिंस्तिष्ठंतौ यदुनंदनौ

iha sthāsyati vāṁ kīrtiryāvadābhūtasaṁplavam sthāne madīya etasmiṁstiṣṭhaṁtau yadunaṁdanau

-- 'हे यदुनन्दनो! जब तक सृष्टि रहेगी, तुम्हारा कीर्ति यहाँ मेरे इस स्थान में स्थित रहते हुए बनी रहेगी।

श्लोक 108 (skanda.5.27.108)

न विज्ञातौ मया वीरौ यदुवृष्णिकुलोद्भवौ । नरनारायणौ देवौ देवकार्यार्थमागतौ

na vijñātau mayā vīrau yaduvṛṣṇikulodbhavau naranārāyaṇau devau devakāryārthamāgatau

मैं तुम्हें यदु-वृष्णि कुल में उत्पन्न वीर नहीं समझा, तुम तो नर-नारायण देव हो, देवकार्य के लिए यहाँ आए हो।'

श्लोक 109 (skanda.5.27.109)

नाल्पमृत्युर्भवेत्तस्य न व्याधिर्न च दुर्गतिः । प्राप्य ह्यत्र च यः स्नाति स्वर्गलोके स मोदते

nālpamṛtyurbhavettasya na vyādhirna ca durgatiḥ prāpya hyatra ca yaḥ snāti svargaloke sa modate

जिसकी अकाल मृत्यु न हो, न व्याधि, न दुर्गति, ऐसा मनुष्य यहाँ आकर स्नान करने से स्वर्गलोक में आनन्दित होता है।

श्लोक 110 (skanda.5.27.110)

शंखिनं विश्वरूपं च गोविदं चक्रिणं तथा । चत्वारि विष्णुक्षेत्राणि अंकपादस्तु पंचमः

śaṁkhinaṁ viśvarūpaṁ ca govidaṁ cakriṇaṁ tathā catvāri viṣṇukṣetrāṇi aṁkapādastu paṁcamaḥ

शंखी, विश्वरूप, गोविंद और चक्री -- ये चार विष्णु-क्षेत्र हैं, और अंकपाद पाँचवाँ है।

श्लोक 111 (skanda.5.27.111)

एषां यात्रां प्रवक्ष्यामि यथा कार्या मनीषिभिः । मंदाकिन्यां कृतस्नानो दृष्ट्वा रामजनार्दनौ

eṣāṁ yātrāṁ pravakṣyāmi yathā kāryā manīṣibhiḥ maṁdākinyāṁ kṛtasnāno dṛṣṭvā rāmajanārdanau

इनकी यात्रा जिस विधि से विद्वानों द्वारा की जानी चाहिए, वह मैं बताता हूँ। मंदाकिनी में स्नान कर राम और जनार्दन का दर्शन कर --

श्लोक 112 (skanda.5.27.112)

शंखोद्धारे ततः स्नात्वा प्रपश्येद्बलकेशवौ । स्नानं कृत्वा ततः कुंडे गोविंदं च समर्चयेत

śaṁkhoddhāre tataḥ snātvā prapaśyedbalakeśavau snānaṁ kṛtvā tataḥ kuṁḍe goviṁdaṁ ca samarcayeta

-- तत्पश्चात् शंखोद्धार में स्नान कर बल और केशव का दर्शन करना चाहिए; स्नान कर कुंड में गोविंद का पूजन करना चाहिए।

श्लोक 113 (skanda.5.27.113)

चक्रिणं च ततो दृष्ट्वा देवदेवं च शंखिनम् । अंकपादौ ततो दृष्ट्वा विश्वरूपं ततो व्रजेत्

cakriṇaṁ ca tato dṛṣṭvā devadevaṁ ca śaṁkhinam aṁkapādau tato dṛṣṭvā viśvarūpaṁ tato vrajet

फिर चक्री देवाधिदेव और शंखी का दर्शन कर, अंकपाद में उन दोनों का दर्शन कर, फिर विश्वरूप के पास जाना चाहिए।

श्लोक 114 (skanda.5.27.114)

तस्याग्रतः करीकुंडे स्नानं कृत्वा यथाविधि । पुनस्तेन प्रकारेण प्रपश्येद्बलकेशवौ

tasyāgrataḥ karīkuṁḍe snānaṁ kṛtvā yathāvidhi punastena prakāreṇa prapaśyedbalakeśavau

उसके सामने करीकुंड में विधिपूर्वक स्नान कर, पुनः उसी विधि से बल और केशव का दर्शन करना चाहिए।

श्लोक 115 (skanda.5.27.115)

स्नानं कृत्वा ततः कुंडे गोविंदं च समर्चयेत् । तथैव चक्रिहलिनौ दृष्ट्वा तं केशवं व्रजेत्

snānaṁ kṛtvā tataḥ kuṁḍe goviṁdaṁ ca samarcayet tathaiva cakrihalinau dṛṣṭvā taṁ keśavaṁ vrajet

स्नान कर कुंड में गोविंद का पूजन करना चाहिए; इसी प्रकार चक्री और हलधर का दर्शन कर केशव के पास जाना चाहिए।

श्लोक 116 (skanda.5.27.116)

शिप्रांभसि नरः स्नात्वा भक्त्या संपूज्य केशवम् । परावृत्यांकपादे तु तां रात्रिं गमयेच्छुचिः

śiprāṁbhasi naraḥ snātvā bhaktyā saṁpūjya keśavam parāvṛtyāṁkapāde tu tāṁ rātriṁ gamayecchuciḥ

शिप्रा-जल में स्नान कर, भक्तिपूर्वक केशव का पूजन कर, अंकपाद लौटकर वहीं शुद्ध होकर वह रात्रि व्यतीत करनी चाहिए।

श्लोक 117 (skanda.5.27.117)

प्रातर्वै भोजयेत्तत्र पंच विप्रांश्च सुव्रतान् । गोदक्षिणां शंखिने तु विश्वरूपाय वै हयम्

prātarvai bhojayettatra paṁca viprāṁśca suvratān godakṣiṇāṁ śaṁkhine tu viśvarūpāya vai hayam

प्रातःकाल वहाँ पाँच सुव्रत ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए; शंखी के निमित्त गौ, विश्वरूप के निमित्त अश्व दक्षिणा देनी चाहिए।

श्लोक 118 (skanda.5.27.118)

गोविंदाय गजं दद्यात्सर्वं दद्याच्च केशवे । उपोष्य द्वादशीं विप्र योंऽकपादं समर्चयेत्

goviṁdāya gajaṁ dadyātsarvaṁ dadyācca keśave upoṣya dvādaśīṁ vipra yoṁ'kapādaṁ samarcayet

गोविंद के निमित्त गज देना चाहिए, और सर्वस्व केशव को अर्पित करना चाहिए। हे विप्र! जो उपवास कर द्वादशी को अंकपाद का पूजन करता है --

श्लोक 119 (skanda.5.27.119)

गंधपुष्पैश्च धूपैश्च नैवेद्यैर्विविधैस्तथा । श्राद्धं यः कुरुते सर्वं तस्य पुण्यफलं शृणु

gaṁdhapuṣpaiśca dhūpaiśca naivedyairvividhaistathā śrāddhaṁ yaḥ kurute sarvaṁ tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu

-- गन्ध, पुष्प, धूप और विविध नैवेद्यों से, और वहाँ समस्त श्राद्ध सम्पन्न करता है, उसका पुण्यफल सुनो।

श्लोक 120 (skanda.5.27.120)

कुलानां शतमुद्धृत्य विमानैः सर्वकामिकैः । गीतनृत्यादिभोगैश्च वैकुंठे सुचिरं वसेत्

kulānāṁ śatamuddhṛtya vimānaiḥ sarvakāmikaiḥ gītanṛtyādibhogaiśca vaikuṁṭhe suciraṁ vaset

अपने सौ कुलों का उद्धार कर वह वैकुंठ में सर्वकामप्रद विमानों तथा गीत-नृत्य आदि भोगों के साथ दीर्घकाल तक निवास करता है।

श्लोक 121 (skanda.5.27.121)

पुनर्लोक मिमं प्राप्य पवित्रे जायते कुले । प्राप्नोत्यनंतसंतानं विष्णुलोकं पुनर्व्रजेत्

punarloka mimaṁ prāpya pavitre jāyate kule prāpnotyanaṁtasaṁtānaṁ viṣṇulokaṁ punarvrajet

पुनः इस लोक को प्राप्त होकर वह पवित्र कुल में जन्म लेता है, अनन्त सन्तति पाता है, और फिर विष्णुलोक को प्राप्त होता है।

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