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अवन्ती खण्ड · अध्याय 28

सोमवतीतीर्थमाहात्म्य-वर्णनम्

अध्याय 27अध्याय-सूचीअध्याय 29

श्लोक 1 (skanda.5.28.1)

सनत्कुमार उवाच । अथान्यं संप्रवक्ष्यामि देवं त्रैलोक्यविश्रुतम् । चंद्रादित्यमिति ख्यातं चंद्रादित्यार्चितं पुरा

sanatkumāra uvāca athānyaṁ saṁpravakṣyāmi devaṁ trailokyaviśrutam caṁdrādityamiti khyātaṁ caṁdrādityārcitaṁ purā

सनत्कुमार ने कहा -- अब मैं त्रिलोकविख्यात, पूर्वकाल में चन्द्र और सूर्य द्वारा पूजित चन्द्रादित्य नामक देव का वर्णन करता हूँ।

श्लोक 2 (skanda.5.28.2)

यस्तं समर्चयेद्देवं सुरासुरनमस्कृतम् । गंधपुपोस्तथा धूपैर्नैवेद्यैविविधैस्तथा

yastaṁ samarcayeddevaṁ surāsuranamaskṛtam gaṁdhapupostathā dhūpairnaivedyaivividhaistathā

जो देव-असुरों द्वारा नमस्कृत उस देव का गन्ध-पुष्प, धूप और विविध नैवेद्यों से पूजन करता है --

श्लोक 3 (skanda.5.28.3)

चंद्रादित्यादिसालोक्यं प्रयाति सर्वकामिकम् । विमानं सूर्यसंकाशैर्यावच्चंद्रदिवाकरौ

caṁdrādityādisālokyaṁ prayāti sarvakāmikam vimānaṁ sūryasaṁkāśairyāvaccaṁdradivākarau

-- वह चन्द्र और सूर्य के रहने तक सूर्य-समान विमान से चन्द्रादित्य के सालोक्य को प्राप्त होता है, जो सर्वकामनाप्रद है।

श्लोक 4 (skanda.5.28.4)

इति चन्द्रादित्यमाहात्म्यम् । सनत्कुमार उवाच । करभेशं ततो गच्छेद्देवदेवं महेश्वरम् । यस्य दर्शनमात्रेण कुयोनौ नैव जायते

iti candrādityamāhātmyam sanatkumāra uvāca karabheśaṁ tato gaccheddevadevaṁ maheśvaram yasya darśanamātreṇa kuyonau naiva jāyate

इस प्रकार चन्द्रादित्य का माहात्म्य कहा गया। सनत्कुमार ने कहा -- तत्पश्चात् देवाधिदेव महेश्वर करभेश के पास जाना चाहिए, जिनके दर्शनमात्र से मनुष्य नीच योनि में जन्म नहीं लेता।

श्लोक 5 (skanda.5.28.5)

व्यास उवाच । करभेशमहं देवं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । कथं देवः समुत्पन्नः करभेशेतिसंज्ञितः

vyāsa uvāca karabheśamahaṁ devaṁ śrotumicchāmi tattvataḥ kathaṁ devaḥ samutpannaḥ karabheśetisaṁjñitaḥ

व्यास ने कहा -- मैं करभेश देव के विषय में यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ; यह देव 'करभेश' नाम से कैसे विख्यात हुए?

श्लोक 6 (skanda.5.28.6)

सनत्कुमार उवाच । पुरा देवगणैः सार्धं देवदेवो महेश्वरः । वनेऽस्मिन्क्रीडयामास परमाह्लादसंयुतः

sanatkumāra uvāca purā devagaṇaiḥ sārdhaṁ devadevo maheśvaraḥ vane'sminkrīḍayāmāsa paramāhlādasaṁyutaḥ

सनत्कुमार ने कहा -- पूर्वकाल में देवगणों के साथ देवाधिदेव महेश्वर परम आह्लाद से युक्त होकर इस वन में क्रीड़ा करते थे।

श्लोक 7 (skanda.5.28.7)

क्रीडन्बहुतिथे काले शंकरः करभोऽभवत् । ज्ञायते च स नो देवैः शंकरः करभाकृतिः

krīḍanbahutithe kāle śaṁkaraḥ karabho'bhavat jñāyate ca sa no devaiḥ śaṁkaraḥ karabhākṛtiḥ

बहुत समय तक क्रीड़ा करते हुए शंकर करभ (ऊँट के बच्चे) के रूप में हो गए; उस करभ-रूप में हम देवों ने उन्हें पहचाना ही नहीं।

श्लोक 8 (skanda.5.28.8)

अन्वेषयंति ते देवास्ततो विस्मयसंयुताः । न पश्यंति यदा तत्र तं देवं शूलपाणिनम्

anveṣayaṁti te devāstato vismayasaṁyutāḥ na paśyaṁti yadā tatra taṁ devaṁ śūlapāṇinam

विस्मित हुए वे देव उन्हें खोजने लगे; जब वहाँ त्रिशूलधारी देव उन्हें दिखाई नहीं दिए --

श्लोक 9 (skanda.5.28.9)

देवैः पृष्टस्ततो ब्रह्मा क्वास्ति देवो महेश्वरः । ध्यात्वाथ ब्रह्मणा दृष्टो गुप्तो योगप्रभुर्हरः

devaiḥ pṛṣṭastato brahmā kvāsti devo maheśvaraḥ dhyātvātha brahmaṇā dṛṣṭo gupto yogaprabhurharaḥ

-- तब देवों ने ब्रह्मा से पूछा 'देव महेश्वर कहाँ हैं?' तब ध्यान लगाकर ब्रह्मा ने छिपे हुए योगेश्वर हर को देख लिया।

श्लोक 10 (skanda.5.28.10)

देवैः सार्धं ततो ब्रह्मा पप्रच्छ गणनायकम् । न दृष्टः शंकरोऽस्माभिर्गतः कुत्र विनायक

devaiḥ sārdhaṁ tato brahmā papraccha gaṇanāyakam na dṛṣṭaḥ śaṁkaro'smābhirgataḥ kutra vināyaka

तब देवों के साथ ब्रह्मा ने गणनायक (गणेश) से पूछा -- 'हे विनायक! हमने शंकर को नहीं देखा, वे कहाँ गए हैं?

श्लोक 11 (skanda.5.28.11)

कथयस्व नमस्तुभ्यं दास्यामो लड्डुकान्विभो । एवमुक्तस्तदा हृष्टः प्रोवाच गणनायकः

kathayasva namastubhyaṁ dāsyāmo laḍḍukānvibho evamuktastadā hṛṣṭaḥ provāca gaṇanāyakaḥ

बताइए, आपको नमस्कार है; हम आपको लड्डू देंगे, हे विभो!' ऐसा कहे जाने पर हर्षित गणनायक ने कहा --

श्लोक 12 (skanda.5.28.12)

करभोऽयं महाऽदेवो दृश्यते विबुधो त्तमाः । श्रुत्वा चैवं वचो देवाः प्रहृष्टाः करभं ययुः

karabho'yaṁ mahā'devo dṛśyate vibudho ttamāḥ śrutvā caivaṁ vaco devāḥ prahṛṣṭāḥ karabhaṁ yayuḥ

-- 'हे श्रेष्ठ देवो! यह करभ ही महादेव के रूप में दिखाई दे रहा है।' यह सुनकर देव अत्यन्त हर्षित होकर उस करभ के पास गए।

श्लोक 13 (skanda.5.28.13)

ज्ञातोऽस्माभिर्महादेव जल्पंत इति ते स्वयम् । गत्वा चैव ततः सर्व चतुर्दिक्षु स्थिताः स्वयम्

jñāto'smābhirmahādeva jalpaṁta iti te svayam gatvā caiva tataḥ sarva caturdikṣu sthitāḥ svayam

'हे महादेव! हमने आपको पहचान लिया है' -- ऐसा स्वयं कहते हुए वे सब वहाँ जाकर चारों दिशाओं में स्वयं खड़े हो गए।

श्लोक 14 (skanda.5.28.14)

विचिंत्येति कथं ज्ञातः शंकरो विस्मयं गतः । त्यक्त्वाथ कारभं रूपं देवदेवो महेश्वरः

viciṁtyeti kathaṁ jñātaḥ śaṁkaro vismayaṁ gataḥ tyaktvātha kārabhaṁ rūpaṁ devadevo maheśvaraḥ

'मैं कैसे पहचाना गया' -- यह सोचकर शंकर विस्मय को प्राप्त हुए; तब देवाधिदेव महेश्वर ने अपना करभ-रूप त्याग दिया।

श्लोक 15 (skanda.5.28.15)

लिंगमुत्पादयामास दिव्यं यत्करभे श्वरम् । ते दृष्ट्वाऽथ सुराः सर्वे साष्टांगप्रणतिस्थिताः

liṁgamutpādayāmāsa divyaṁ yatkarabhe śvaram te dṛṣṭvā'tha surāḥ sarve sāṣṭāṁgapraṇatisthitāḥ

उन्होंने एक दिव्य लिंग प्रकट किया, जो करभेश्वर कहलाया। उसे देखकर सभी देव साष्टांग प्रणाम में लीन हो गए।

श्लोक 16 (skanda.5.28.16)

ततःप्रभृति विख्यातः शंकरः करभेश्वरः । कोटितीर्थादुत्तरस्मिन्स्थापयामास विघ्नपम्

tataḥprabhṛti vikhyātaḥ śaṁkaraḥ karabheśvaraḥ koṭitīrthāduttarasminsthāpayāmāsa vighnapam

तभी से शंकर 'करभेश्वर' नाम से विख्यात हुए। कोटितीर्थ से उत्तर दिशा में उन्होंने विघ्नपति (गणेश) को स्थापित किया।

श्लोक 17 (skanda.5.28.17)

स्वनाम्ना प्रथितं चक्रे करभं चातिपूजितम् । स्नात्वा तत्र शुचिर्भूत्वा यस्तमर्चयते शिवम्

svanāmnā prathitaṁ cakre karabhaṁ cātipūjitam snātvā tatra śucirbhūtvā yastamarcayate śivam

उन्होंने अपने ही नाम से 'करभ' को प्रसिद्ध और अत्यन्त पूजित बनाया। जो वहाँ स्नान कर, शुद्ध होकर उस शिव का पूजन करता है --

श्लोक 18 (skanda.5.28.18)

गंधपुष्पैश्च नैवेद्यैः शृणु तेषां च यत्फलम् । सर्वमेधेषु यत्पुण्यं सर्वदानेषु यत्फलम्

gaṁdhapuṣpaiśca naivedyaiḥ śṛṇu teṣāṁ ca yatphalam sarvamedheṣu yatpuṇyaṁ sarvadāneṣu yatphalam

-- गन्ध, पुष्प और नैवेद्यों से, उसका फल सुनो -- समस्त यज्ञों में जो पुण्य है, समस्त दानों में जो फल है --

श्लोक 19 (skanda.5.28.19)

ततोऽधिकं स लभते नात्र कार्या विचारणा । महाकालं ततो गच्छन्संपूर्णं फलमाप्नुयात्

tato'dhikaṁ sa labhate nātra kāryā vicāraṇā mahākālaṁ tato gacchansaṁpūrṇaṁ phalamāpnuyāt

-- उससे भी अधिक वह प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं। तत्पश्चात् महाकाल जाने पर वह सम्पूर्ण फल प्राप्त करता है।

श्लोक 20 (skanda.5.28.20)

ततः प्रसिद्धो लोकेऽस्मिन्नृद्धिदः करभेश्वरः

tataḥ prasiddho loke'sminnṛddhidaḥ karabheśvaraḥ

इस प्रकार करभेश्वर इस लोक में समृद्धिदाता के रूप में विख्यात हुए।

श्लोक 21 (skanda.5.28.21)

इति करभेश्वरमाहात्म्यम् ।। ।। छ । सनत्कुमार उवाच । लइडुकैश्च ततो देवैर्विघ्ननाथः समर्चितः । तदाप्रभृति विख्यातो विश्वेशो लड्डुकप्रियः

iti karabheśvaramāhātmyam cha sanatkumāra uvāca laiḍukaiśca tato devairvighnanāthaḥ samarcitaḥ tadāprabhṛti vikhyāto viśveśo laḍḍukapriyaḥ

इस प्रकार करभेश्वर का माहात्म्य कहा गया। सनत्कुमार ने कहा -- तत्पश्चात् देवों द्वारा लड्डुओं से विघ्ननाथ का पूजन किया गया; तभी से वे 'लड्डुक-प्रिय विश्वेश' नाम से विख्यात हुए।

श्लोक 22 (skanda.5.28.22)

यः समर्चयते भक्त्या तस्य विघ्नो न जायते । तस्मै ददाति संतुष्टः सर्वान्कामान्विनायकः

yaḥ samarcayate bhaktyā tasya vighno na jāyate tasmai dadāti saṁtuṣṭaḥ sarvānkāmānvināyakaḥ

जो भक्तिपूर्वक उनका पूजन करता है, उसे कभी विघ्न नहीं होता; प्रसन्न होकर विनायक उसे सभी कामनाएँ प्रदान करते हैं।

श्लोक 23 (skanda.5.28.23)

निराहारश्चतुर्थ्यां च स्नात्वा शिप्रां विशेषतः । रक्तांबरधरोभूत्वा रक्तपुष्पैर्विनायकम्

nirāhāraścaturthyāṁ ca snātvā śiprāṁ viśeṣataḥ raktāṁbaradharobhūtvā raktapuṣpairvināyakam

चतुर्थी को निराहार रहकर, विशेष रूप से शिप्रा में स्नान कर, लाल वस्त्र धारण कर, लाल पुष्पों से विनायक का पूजन करना चाहिए --

श्लोक 24 (skanda.5.28.24)

रक्तचंदनतोयेन मंत्रैः स्नपनपूर्वकम् । चंदनेनापि रक्तेन तं विलेप्य प्रपूजयेत्

raktacaṁdanatoyena maṁtraiḥ snapanapūrvakam caṁdanenāpi raktena taṁ vilepya prapūjayet

-- मन्त्रों के साथ लाल चन्दन-जल से स्नपन कर, फिर लाल चन्दन से लेप कर उनका पूजन करना चाहिए।

श्लोक 25 (skanda.5.28.25)

धूपं दद्यात्तथा दिव्यं सुगंधं लड्डुकप्रिये । नैवेद्ये लड्डुका देया आज्यखंडपरिप्लुताः

dhūpaṁ dadyāttathā divyaṁ sugaṁdhaṁ laḍḍukapriye naivedye laḍḍukā deyā ājyakhaṁḍapariplutāḥ

उन लड्डु-प्रिय देव को दिव्य सुगन्धित धूप अर्पित करना चाहिए; नैवेद्य में घी और खांड से युक्त लड्डू देने चाहिए।

श्लोक 26 (skanda.5.28.26)

न तस्य जायते व्याधिर्भयं विघ्नं कदाचन । लभते च सदाभीष्टं मृतः शिवपुरं व्रजेत्

na tasya jāyate vyādhirbhayaṁ vighnaṁ kadācana labhate ca sadābhīṣṭaṁ mṛtaḥ śivapuraṁ vrajet

उसे न कभी व्याधि होती है, न भय, न विघ्न; वह सदा अभीष्ट पाता है और मरणोपरान्त शिवपुर को जाता है।

श्लोक 27 (skanda.5.28.27)

अवतीर्णः पुनर्लोके जायते वसुधाधिपः । मतिमान्पुत्रवाञ्छूरो नात्र कार्या विचारणा

avatīrṇaḥ punarloke jāyate vasudhādhipaḥ matimānputravāñchūro nātra kāryā vicāraṇā

इस लोक में पुनः जन्म लेकर वह बुद्धिमान, पुत्रवान, शूरवीर पृथ्वीपति होता है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 28 (skanda.5.28.28)

इति गणेशमा हात्म्यम् । सनत्कुमार उवाच । कुसुमेशं सुरद्वारे सुरासुरनमस्कृतम् । श्रद्धया पूजयेद्यस्तु शिवलोके स मोदते

iti gaṇeśamā hātmyam sanatkumāra uvāca kusumeśaṁ suradvāre surāsuranamaskṛtam śraddhayā pūjayedyastu śivaloke sa modate

इस प्रकार गणेश का माहात्म्य कहा गया। सनत्कुमार ने कहा -- सुरद्वार में स्थित, देव-असुरों द्वारा नमस्कृत कुसुमेश का जो श्रद्धापूर्वक पूजन करता है, वह शिवलोक में आनन्दित होता है।

श्लोक 29 (skanda.5.28.29)

जयेश्वरं तु यः पश्येद्देवदेवं महेश्वरम् । जयी स्यात्सर्वकार्येषु शिवलोकं स गच्छति

jayeśvaraṁ tu yaḥ paśyeddevadevaṁ maheśvaram jayī syātsarvakāryeṣu śivalokaṁ sa gacchati

जो देवाधिदेव महेश्वर जयेश्वर का दर्शन करता है, वह सभी कार्यों में विजयी होता है और शिवलोक को जाता है।

श्लोक 30 (skanda.5.28.30)

शिवद्वारे शिवं लिंगमर्चयेन्मानवो यदि । त्रिदिवं याति यानेन गाणपत्यं च विंदति

śivadvāre śivaṁ liṁgamarcayenmānavo yadi tridivaṁ yāti yānena gāṇapatyaṁ ca viṁdati

यदि मनुष्य शिवद्वार में शिवलिंग का पूजन करे, तो वह विमान द्वारा स्वर्ग जाता है और गणपति-पद प्राप्त करता है।

श्लोक 31 (skanda.5.28.31)

अथान्यं संप्रवक्ष्यामि मार्कंडेश्वरमुत्तमम् । मार्कण्डेयो मुनिर्यत्र तप्तवान्सुमहत्तपः

athānyaṁ saṁpravakṣyāmi mārkaṁḍeśvaramuttamam mārkaṇḍeyo muniryatra taptavānsumahattapaḥ

अब मैं एक अन्य उत्तम देव मार्कण्डेश्वर का वर्णन करता हूँ, जहाँ मुनि मार्कण्डेय ने अत्यन्त महान तप किया था।

श्लोक 32 (skanda.5.28.32)

दृष्ट्वा तं शंकरं देवं वाजपेयफलं लभेत् । सर्वपापविशुद्धात्मा चिरायुर्जायते नरः

dṛṣṭvā taṁ śaṁkaraṁ devaṁ vājapeyaphalaṁ labhet sarvapāpaviśuddhātmā cirāyurjāyate naraḥ

उस शंकर देव का दर्शन करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है; सर्वपापों से शुद्धात्मा होकर मनुष्य दीर्घायु होता है।

श्लोक 33 (skanda.5.28.33)

शृणु व्यास महास्थानं यस्यां पुर्यामनुत्तमम् । यत्र तिष्ठति सा देवी ब्रह्माणी हंसवाहिनी

śṛṇu vyāsa mahāsthānaṁ yasyāṁ puryāmanuttamam yatra tiṣṭhati sā devī brahmāṇī haṁsavāhinī

हे व्यास! सुनो, उस नगरी में एक श्रेष्ठ महास्थान है, जहाँ हंसवाहिनी देवी ब्रह्माणी विराजमान हैं।

श्लोक 34 (skanda.5.28.34)

भक्तानां पूरयेदाशां पुत्रवत्परिपालयेत् । यथा माता तथा देवी दृष्टा शांतिपरैरपि

bhaktānāṁ pūrayedāśāṁ putravatparipālayet yathā mātā tathā devī dṛṣṭā śāṁtiparairapi

वे भक्तों की आशा पूर्ण करती हैं और पुत्रवत पालन करती हैं; शांतिपरायण जनों को भी वे देवी माता के समान दिखाई देती हैं।

श्लोक 35 (skanda.5.28.35)

अर्चिता ब्रह्मणा सा तु स्तुता देवी सुरोत्तमैः । अर्चयेद्गंधृपुष्पैश्च नैवेद्यैः सर्वसिद्धिदाम् । अपि या ब्रह्मणः पूर्वमभूदेव सुसिद्धिदा

arcitā brahmaṇā sā tu stutā devī surottamaiḥ arcayedgaṁdhṛpuṣpaiśca naivedyaiḥ sarvasiddhidām api yā brahmaṇaḥ pūrvamabhūdeva susiddhidā

ब्रह्मा द्वारा पूजित और श्रेष्ठ देवों द्वारा स्तुत वह देवी, गन्ध-पुष्प-नैवेद्यों से पूजन करने वाले को सर्वसिद्धि प्रदान करती हैं; वे तो पूर्वकाल में स्वयं ब्रह्मा को भी सिद्धि देने वाली रही हैं।

श्लोक 36 (skanda.5.28.36)

यः स्नात्वा ब्रह्मसरसि पश्ये द्ब्रह्मेश्वरं शिवम् । भवबंधविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके स मोदते

yaḥ snātvā brahmasarasi paśye dbrahmeśvaraṁ śivam bhavabaṁdhavinirmukto brahmaloke sa modate

जो ब्रह्मसरोवर में स्नान कर शिव ब्रह्मेश्वर का दर्शन करता है, वह संसार-बन्धन से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में आनन्दित होता है।

श्लोक 37 (skanda.5.28.37)

अथान्यां संप्रवक्ष्यामि यज्ञवापीमनुत्तमाम् । यत्र वै ब्रह्मणा पूर्वमिष्टो यज्ञः सदक्षिणः

athānyāṁ saṁpravakṣyāmi yajñavāpīmanuttamām yatra vai brahmaṇā pūrvamiṣṭo yajñaḥ sadakṣiṇaḥ

अब मैं एक अन्य उत्तम यज्ञवापी का वर्णन करता हूँ, जहाँ पूर्वकाल में ब्रह्मा ने दक्षिणा सहित यज्ञ किया था।

श्लोक 38 (skanda.5.28.38)

यज्ञार्थं यत्कृतं कुंडं यज्ञवापी च सा स्मृता । पशुश्च पतितो यस्मात्तस्मात्पशुपतिः स्मृतः

yajñārthaṁ yatkṛtaṁ kuṁḍaṁ yajñavāpī ca sā smṛtā paśuśca patito yasmāttasmātpaśupatiḥ smṛtaḥ

यज्ञ हेतु बनाया गया वह कुंड 'यज्ञवापी' कहलाया; और जहाँ पशु गिरा, इसी कारण वहाँ के देव 'पशुपति' कहलाए।

श्लोक 39 (skanda.5.28.39)

तस्यां स्नात्वा शुचिर्भूत्वा पश्येत्पशुपतिं तु यः । उद्धरेत्स पितॄन्व्यास पशुयोनिगतानपि

tasyāṁ snātvā śucirbhūtvā paśyetpaśupatiṁ tu yaḥ uddharetsa pitṝnvyāsa paśuyonigatānapi

हे व्यास! जो वहाँ स्नान कर शुद्ध होकर पशुपति का दर्शन करता है, वह पशु-योनि में पड़े अपने पितरों का भी उद्धार कर देता है।

श्लोक 40 (skanda.5.28.40)

सुवर्णमणिमुक्ताद्यैर्विमानैः सर्वकामगैः । याति रुद्रपुरं दिव्यं यत्र देवो महेश्वरः

suvarṇamaṇimuktādyairvimānaiḥ sarvakāmagaiḥ yāti rudrapuraṁ divyaṁ yatra devo maheśvaraḥ

वह स्वर्ण, मणि, मुक्ता आदि से बने सर्वकामप्रद विमानों से उस दिव्य रुद्रपुर को जाता है, जहाँ देव महेश्वर विराजते हैं।

श्लोक 41 (skanda.5.28.41)

रूपकुंडे नरः स्नात्वा सुरूपो जायतेनरः । स्वर्गे स देवगंधर्वैः स्पृहणीयवपुर्भवेत्

rūpakuṁḍe naraḥ snātvā surūpo jāyatenaraḥ svarge sa devagaṁdharvaiḥ spṛhaṇīyavapurbhavet

रूपकुंड में स्नान करने वाला मनुष्य सुरूप हो जाता है; स्वर्ग में वह देव-गंधर्वों के लिए भी वांछनीय शरीर पाता है।

श्लोक 42 (skanda.5.28.42)

कुंडे स्नात्वाप्यनंगे यः शुचिर्भूत्वा समाहितः । पश्येच्च देवदेवेशमनंगेनार्चितं पुरा । कामं स लभतेऽभीष्टं मृतो याति शिवालयम्

kuṁḍe snātvāpyanaṁge yaḥ śucirbhūtvā samāhitaḥ paśyecca devadeveśamanaṁgenārcitaṁ purā kāmaṁ sa labhate'bhīṣṭaṁ mṛto yāti śivālayam

जो अनंग-कुंड में स्नान कर, शुद्ध और समाहितचित्त होकर, पूर्वकाल में अनंग द्वारा पूजित देवाधिदेव का दर्शन करता है, वह अभीष्ट कामना पाता है और मरणोपरान्त शिवधाम को जाता है।

श्लोक 43 (skanda.5.28.43)

आषाढे तु सिताष्टम्यां जागरं यस्तु कारयेत् । केदारे यत्फलं प्रोक्तं तत्समानमवाप्नुयात्

āṣāḍhe tu sitāṣṭamyāṁ jāgaraṁ yastu kārayet kedāre yatphalaṁ proktaṁ tatsamānamavāpnuyāt

जो आषाढ़ शुक्ल अष्टमी को रात्रि-जागरण करता है, उसे केदार में कहे गए फल के समान ही फल मिलता है।

श्लोक 44 (skanda.5.28.44)

करीकुंडे नरः स्नात्वा विश्वरूपं तु योऽर्चयेत् । मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति

karīkuṁḍe naraḥ snātvā viśvarūpaṁ tu yo'rcayet mucyate sarvapāpebhyo viṣṇulokaṁ sa gacchati

करीकुंड में स्नान कर जो विश्वरूप का पूजन करता है, वह सर्वपापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को जाता है।

श्लोक 45 (skanda.5.28.45)

अजागंधे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा ब्रह्मेश्वरं शिवम् । ब्रह्महत्यासमं पापं तत्क्षणात्संव्यपोहति

ajāgaṁdhe naraḥ snātvā dṛṣṭvā brahmeśvaraṁ śivam brahmahatyāsamaṁ pāpaṁ tatkṣaṇātsaṁvyapohati

अजागंध में स्नान कर शिव ब्रह्मेश्वर का दर्शन करने वाला मनुष्य तत्क्षण ब्रह्महत्या के समान पाप को दूर कर देता है।

श्लोक 46 (skanda.5.28.46)

चक्रतीर्थे नरः स्नात्वा चक्र स्वामिनमर्चयेत् । जायते स नरो व्यास चक्रवर्ती सदा भुवि

cakratīrthe naraḥ snātvā cakra svāminamarcayet jāyate sa naro vyāsa cakravartī sadā bhuvi

हे व्यास! चक्रतीर्थ में स्नान कर चक्रस्वामी का पूजन करने वाला मनुष्य पृथ्वी पर सदा चक्रवर्ती सम्राट होता है।

श्लोक 47 (skanda.5.28.47)

सिद्धेश्वरं यदा पश्येत्स्नात्वा सुविधिपूर्वकम् । कामिकेन विमानेन रुद्रलोकं स गच्छति

siddheśvaraṁ yadā paśyetsnātvā suvidhipūrvakam kāmikena vimānena rudralokaṁ sa gacchati

जब विधिपूर्वक स्नान कर सिद्धेश्वर का दर्शन किया जाता है, तब मनुष्य कामनापूर्ण विमान से रुद्रलोक को जाता है।

श्लोक 48 (skanda.5.28.48)

इति यज्ञवापीमाहात्म्यम् । सोमवत्यां नरः स्नात्वा यः सोमेश्वरमर्चयेत् । सोमवन्निर्मलो भूत्वा सोमलोके स मोदते

iti yajñavāpīmāhātmyam somavatyāṁ naraḥ snātvā yaḥ someśvaramarcayet somavannirmalo bhūtvā somaloke sa modate

इस प्रकार यज्ञवापी का माहात्म्य कहा गया। जो मनुष्य सोमवती में स्नान कर सोमेश्वर का पूजन करता है, वह चन्द्रमा के समान निर्मल होकर सोमलोक में आनन्दित होता है।

श्लोक 49 (skanda.5.28.49)

व्यास उवाच । तीर्थं सोमवतीनाम लिंगं सोमेश्वरं तथा । अभूदेतत्कथं नाम श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः

vyāsa uvāca tīrthaṁ somavatīnāma liṁgaṁ someśvaraṁ tathā abhūdetatkathaṁ nāma śrotumicchāmi tattvataḥ

व्यास ने कहा -- सोमवती नामक तीर्थ और सोमेश्वर नामक लिंग यथार्थ में कैसे उत्पन्न हुए, यह मैं सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 50 (skanda.5.28.50)

सनत्कुमार उवाच । शृणु व्यास यथोत्पन्नं सोमतीर्थं सुशोभनम् । सोमेश्वरं यथा लिंगमेतत्सत्यं वदामि ते

sanatkumāra uvāca śṛṇu vyāsa yathotpannaṁ somatīrthaṁ suśobhanam someśvaraṁ yathā liṁgametatsatyaṁ vadāmi te

सनत्कुमार ने कहा -- हे व्यास! सुनो, वह सुशोभित सोमतीर्थ और सोमेश्वर लिंग किस प्रकार उत्पन्न हुए, यह सत्य मैं तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 51 (skanda.5.28.51)

यो देवो भगवान्सोमो लोकस्याप्यायनं परम् । आसीत्तस्य पुरा व्यास पिता विप्रो महातपाः

yo devo bhagavānsomo lokasyāpyāyanaṁ param āsīttasya purā vyāsa pitā vipro mahātapāḥ

जो भगवान सोम देव इस लोक को परम पोषण देने वाले हैं, हे व्यास! पूर्वकाल में उनके पिता महातपस्वी एक ब्राह्मण थे।

श्लोक 52 (skanda.5.28.52)

अवन्त्यां च महाभागो योऽत्रिर्नामा तपोनिधिः । वर्षाणां त्रीणि दिव्यानि सहस्राणि तपो महत्

avantyāṁ ca mahābhāgo yo'trirnāmā taponidhiḥ varṣāṇāṁ trīṇi divyāni sahasrāṇi tapo mahat

अवन्ती में अत्रि नामक महाभाग तपोनिधि ने तीन हजार दिव्य वर्षों तक महान तप किया।

श्लोक 53 (skanda.5.28.53)

ऊर्ध्वबाहुः स वै तेपे ब्रह्मध्यानपरायणः । ऊर्ध्वं गतं ततो व्यास ब्राह्म्यं तेजो महात्मनः

ūrdhvabāhuḥ sa vai tepe brahmadhyānaparāyaṇaḥ ūrdhvaṁ gataṁ tato vyāsa brāhmyaṁ tejo mahātmanaḥ

भुजाएँ ऊपर उठाए, ब्रह्मध्यान में तत्पर होकर वे तप करते रहे। हे व्यास! तब उस महात्मा का ब्राह्म तेज ऊर्ध्वगामी हो गया --

श्लोक 54 (skanda.5.28.54)

नेत्राभ्यां तेन सुस्राव भासयच्च दिशो दश । तेजस्तत्सहसा दृष्ट्वा दिशो दशोद्धतं स्वतः

netrābhyāṁ tena susrāva bhāsayacca diśo daśa tejastatsahasā dṛṣṭvā diśo daśoddhataṁ svataḥ

-- और उनकी दोनों आँखों से बहकर दसों दिशाओं को प्रकाशित करने लगा। उस तेज को अचानक फूटता देखकर, जो स्वतः दसों दिशाओं को अभिभूत कर रहा था --

श्लोक 55 (skanda.5.28.55)

दिशश्च तद्यदा व्यास सर्वा धर्तुं न चाशकन् । असुस्रवत्तदा दिग्भ्यस्तद्धि तेजोतिदुःसहम्

diśaśca tadyadā vyāsa sarvā dhartuṁ na cāśakan asusravattadā digbhyastaddhi tejotiduḥsaham

-- हे व्यास! जब वे सभी दिशाएँ उसे धारण न कर सकीं, तब वह अत्यन्त दुःसह तेज दिशाओं से बह निकला।

श्लोक 56 (skanda.5.28.56)

लोकांश्च भासयत्सर्वान्धरण्यां वै पपात ह । सोमो जातस्ततस्तेन शीतांशुश्च जनप्रियः

lokāṁśca bhāsayatsarvāndharaṇyāṁ vai papāta ha somo jātastatastena śītāṁśuśca janapriyaḥ

समस्त लोकों को प्रकाशित करता हुआ वह पृथ्वी पर गिर पड़ा; उससे शीतल किरणों वाले, जनप्रिय सोम उत्पन्न हुए।

श्लोक 57 (skanda.5.28.57)

वारि सोमात्समुत्पन्नं व्यास तेनैव तेजसा । प्रविष्टा सा नदी शिप्राममृतेनातिपूरिता

vāri somātsamutpannaṁ vyāsa tenaiva tejasā praviṣṭā sā nadī śiprāmamṛtenātipūritā

हे व्यास! उसी तेज से सोम से जल भी उत्पन्न हुआ, जो शिप्रा नदी में प्रविष्ट होकर उसे अमृत से परिपूर्ण कर गया।

श्लोक 58 (skanda.5.28.58)

ततः सोमवती शिप्रा विख्याता सर्वसि द्धिदा । सोमयुक्तां नदीं शिप्रां दृष्ट्वा पापं व्यपोहति

tataḥ somavatī śiprā vikhyātā sarvasi ddhidā somayuktāṁ nadīṁ śiprāṁ dṛṣṭvā pāpaṁ vyapohati

तभी से शिप्रा 'सोमवती' नाम से सर्वसिद्धिदायिनी विख्यात हुई; सोमयुक्त शिप्रा नदी का दर्शन करने से पाप दूर हो जाता है।

श्लोक 59 (skanda.5.28.59)

ख्याता च त्रिषु लोकेषु पापिनां पुण्यदायिनी । ब्रह्महा वा सुरापो वा स्तेयी वा गुरुतल्पगः

khyātā ca triṣu lokeṣu pāpināṁ puṇyadāyinī brahmahā vā surāpo vā steyī vā gurutalpagaḥ

यह तीनों लोकों में पापियों के लिए भी पुण्यदायिनी के रूप में विख्यात है -- ब्रह्महत्यारा, सुरापान करने वाला, चोर या गुरुपत्नीगामी --

श्लोक 60 (skanda.5.28.60)

चत्वारोऽप्यत्र पापेन मुच्यंते दर्शनाद्ध्रुवम् । अमासोमौ यदा युक्तौ सोमवत्यां तदा मुने

catvāro'pyatra pāpena mucyaṁte darśanāddhruvam amāsomau yadā yuktau somavatyāṁ tadā mune

-- ये चारों भी यहाँ दर्शनमात्र से निश्चित रूप से पाप से मुक्त हो जाते हैं। हे मुने! जब अमावस्या और सोमवार सोमवती में संयुक्त होते हैं --

श्लोक 61 (skanda.5.28.61)

स्नानं दानं च यो धीमाञ्जपं होमं समाचरेत् । अक्षयं तस्य तत्सर्वं यावच्चंद्रदिवाकरौ

snānaṁ dānaṁ ca yo dhīmāñjapaṁ homaṁ samācaret akṣayaṁ tasya tatsarvaṁ yāvaccaṁdradivākarau

-- तब बुद्धिमान मनुष्य जो भी स्नान, दान, जप और हवन करता है, वह सब चन्द्र-सूर्य के रहने तक अक्षय रहता है।

श्लोक 62 (skanda.5.28.62)

तिलोदकप्रदानेन पिंडदानेन कारिता । अकाले कालिकी तृप्तिः पितॄणां च यतो मता

tilodakapradānena piṁḍadānena kāritā akāle kālikī tṛptiḥ pitṝṇāṁ ca yato matā

तिलोदक और पिंडदान करने से, माना जाता है कि पितरों की तृप्ति अकाल में भी हो जाती है।

श्लोक 63 (skanda.5.28.63)

सर्वत्र दुर्लभा सिप्रा सोमं सोमग्रहस्तथा । सोमेश्वरः सोमवारः सकाराः पंच दुर्लभाः

sarvatra durlabhā siprā somaṁ somagrahastathā someśvaraḥ somavāraḥ sakārāḥ paṁca durlabhāḥ

शिप्रा, सोम, सोम-ग्रह, सोमेश्वर और सोमवार -- 'स' अक्षर से युक्त ये पाँचों एक साथ मिलना सर्वत्र दुर्लभ है।

श्लोक 64 (skanda.5.28.64)

शिप्रासोमजलं व्यास कोटितीर्थफलप्रदम् । अमासोमसमायोगे पितृतीर्थसमं स्मृतम्

śiprāsomajalaṁ vyāsa koṭitīrthaphalapradam amāsomasamāyoge pitṛtīrthasamaṁ smṛtam

हे व्यास! शिप्रा और सोम का जल कोटितीर्थ के समान फलदायी है; अमावस्या और सोमवार के योग में यह पितृतीर्थ के समान माना गया है।

श्लोक 65 (skanda.5.28.65)

अमायां सोमवारश्चेद्व्यतीपातो यदा भवेत् । शतगुणं गयायास्तु सोमवत्यां प्रकीर्तितम्

amāyāṁ somavāraścedvyatīpāto yadā bhavet śataguṇaṁ gayāyāstu somavatyāṁ prakīrtitam

यदि अमावस्या को सोमवार और व्यतीपात योग भी हो जाए, तो सोमवती में यह गया से भी सौगुना फलदायी कहा गया है।

श्लोक 66 (skanda.5.28.66)

एवं सोमवतीतीर्थं जातमत्र महामुने । सोमं दृष्ट्वाथ पतितं क्षितौ ब्रह्मा जगद्गुरुः

evaṁ somavatītīrthaṁ jātamatra mahāmune somaṁ dṛṣṭvātha patitaṁ kṣitau brahmā jagadguruḥ

हे महामुने! इस प्रकार यहाँ सोमवती तीर्थ उत्पन्न हुआ। तत्पश्चात् जगद्गुरु ब्रह्मा ने भूमि पर गिरे हुए सोम को देखकर --

श्लोक 67 (skanda.5.28.67)

रथे तं स्थापयामास लोकानां हितकाम्यया । सं तु वेदमयो व्यास धर्माक्षः सत्यसंग्रहः

rathe taṁ sthāpayāmāsa lokānāṁ hitakāmyayā saṁ tu vedamayo vyāsa dharmākṣaḥ satyasaṁgrahaḥ

-- लोकों के कल्याण की कामना से उसे रथ में स्थापित किया। हे व्यास! वह रथ वेदमय था, धर्म उसका धुरा था, और वह सत्य का संग्रह था।

श्लोक 68 (skanda.5.28.68)

युक्तो वाजिसहस्रेण ब्रह्मणा प्रेरितस्तदा । दृष्ट्वा सोमं ततो देवा रथे तं ब्रह्मणा युतम्

yukto vājisahasreṇa brahmaṇā preritastadā dṛṣṭvā somaṁ tato devā rathe taṁ brahmaṇā yutam

सहस्र अश्वों से युक्त उस रथ को ब्रह्मा ने तब हाँका। तब सोम को उस रथ पर ब्रह्मा के साथ देखकर देवगण --

श्लोक 69 (skanda.5.28.69)

तुष्टुवुः सर्वभावेन हृष्टाः सर्वे समाहिताः । तस्य संस्तूयमानस्य तेजः सोमस्य भास्वरम्

tuṣṭuvuḥ sarvabhāvena hṛṣṭāḥ sarve samāhitāḥ tasya saṁstūyamānasya tejaḥ somasya bhāsvaram

-- सर्वभाव से हर्षित और समाहितचित्त होकर उनकी स्तुति करने लगे। इस प्रकार स्तुत होते हुए सोम का देदीप्यमान तेज --

श्लोक 70 (skanda.5.28.70)

आप्यायमानं त्रीँल्लोकान्पपात धरणीतले । ब्रह्मा तेन रथेनाथ सागरांतां वसुन्धराम्

āpyāyamānaṁ trī~llokānpapāta dharaṇītale brahmā tena rathenātha sāgarāṁtāṁ vasundharām

-- तीनों लोकों को पुष्ट करता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा। तब ब्रह्मा ने उस रथ से समुद्र-अन्त तक फैली पृथ्वी की --

श्लोक 71 (skanda.5.28.71)

त्रिःसप्तकृत्वोऽतिशयाच्चकाराब्धिप्रदक्षिणम् । तस्य तत्पतितं तेजो व्यास सोमस्य शीतलम्

triḥsaptakṛtvo'tiśayāccakārābdhipradakṣiṇam tasya tatpatitaṁ tejo vyāsa somasya śītalam

-- इक्कीस बार अतिशयपूर्वक समुद्र-प्रदक्षिणा की। हे व्यास! सोम का वह गिरा हुआ शीतल तेज --

श्लोक 72 (skanda.5.28.72)

तदेवौषधयो दिव्या जाता भुवि सुनिर्मलाः । याभिर्धार्यो ह्ययं लोकः प्रजाश्चैव चतुर्विधाः

tadevauṣadhayo divyā jātā bhuvi sunirmalāḥ yābhirdhāryo hyayaṁ lokaḥ prajāścaiva caturvidhāḥ

-- ही पृथ्वी पर उत्पन्न वे परम पवित्र दिव्य औषधियाँ बन गईं, जिनसे यह लोक और चारों प्रकार की प्रजाएँ धारण की जाती हैं।

श्लोक 73 (skanda.5.28.73)

तुष्टोऽथ भगवान्सोमो जगतेः सर्वदा मुने । दशवर्षसहस्राणि तेपेऽतिदुःसहं तपः

tuṣṭo'tha bhagavānsomo jagateḥ sarvadā mune daśavarṣasahasrāṇi tepe'tiduḥsahaṁ tapaḥ

हे मुने! सदा जगत को पुष्ट करने से प्रसन्न होकर भगवान सोम ने दस हजार वर्षों तक अत्यन्त दुःसह तप किया।

श्लोक 74 (skanda.5.28.74)

ततस्तस्मै ददौ वाक्यं ब्रह्मा लोकपितामहः । बीजौषधानि विप्राणां सोमो राजा बभूव ह

tatastasmai dadau vākyaṁ brahmā lokapitāmahaḥ bījauṣadhāni viprāṇāṁ somo rājā babhūva ha

तब लोकपितामह ब्रह्मा ने उन्हें वरदान दिया; सोम विप्रों और बीज-औषधियों के राजा बन गए।

श्लोक 75 (skanda.5.28.75)

सप्तविंशतिं सोमाय दाक्षायणीर्महाव्रताः । पत्नीः प्राचेतसो दक्षो ददौ नक्षत्रसंज्ञकाः

saptaviṁśatiṁ somāya dākṣāyaṇīrmahāvratāḥ patnīḥ prācetaso dakṣo dadau nakṣatrasaṁjñakāḥ

प्राचेतस दक्ष ने सोम को नक्षत्रों के नाम वाली अपनी सत्ताईस महाव्रता दाक्षायणी कन्याएँ पत्नीरूप में दीं।

श्लोक 76 (skanda.5.28.76)

स तत्प्राप्य महद्राज्यं सोमो भार्यायुतस्तदा । समारेभे राजसूयं सहस्रशतदक्षिणम्

sa tatprāpya mahadrājyaṁ somo bhāryāyutastadā samārebhe rājasūyaṁ sahasraśatadakṣiṇam

इस प्रकार महान राज्य प्राप्त कर, पत्नियों सहित सोम ने सौ हजार दक्षिणाओं वाला राजसूय यज्ञ आरम्भ किया।

श्लोक 77 (skanda.5.28.77)

होता च भगवानत्रिरध्वर्युर्भगवान्भृगुः । हिरण्यगर्भश्चोद्गाता ब्रह्मा ब्रह्मत्वमेयिवान्

hotā ca bhagavānatriradhvaryurbhagavānbhṛguḥ hiraṇyagarbhaścodgātā brahmā brahmatvameyivān

भगवान अत्रि होता थे, भगवान भृगु अध्वर्यु; हिरण्यगर्भ उद्गाता थे, और ब्रह्मा ने स्वयं ब्रह्म-पद ग्रहण किया।

श्लोक 78 (skanda.5.28.78)

सदस्यो भगवान्विष्णुः सनकादिमुखैर्युतः । ददौ स दक्षिणां सोमस्त्रीँल्लोकान्सुसमाहितः

sadasyo bhagavānviṣṇuḥ sanakādimukhairyutaḥ dadau sa dakṣiṇāṁ somastrī~llokānsusamāhitaḥ

सनक आदि सहित भगवान विष्णु सदस्य थे; समाहितचित्त सोम ने तीनों लोकों को ही दक्षिणा के रूप में दे दिया।

श्लोक 79 (skanda.5.28.79)

सिनीवाली कुहूश्चैव धृतिः पुष्टिः प्रभा वसुः । कीर्तिर्धृतिश्च लक्ष्मीस्तं देव्यो दिव्याः सिषेविरे

sinīvālī kuhūścaiva dhṛtiḥ puṣṭiḥ prabhā vasuḥ kīrtirdhṛtiśca lakṣmīstaṁ devyo divyāḥ siṣevire

सिनीवाली, कुहू, धृति, पुष्टि, प्रभा, वसु, कीर्ति, धृति और लक्ष्मी -- ये दिव्य देवियाँ उनकी सेवा में रहीं।

श्लोक 80 (skanda.5.28.80)

प्राप्यावभृथमव्यग्रः सर्वदेवर्षिपूजितः । अतीव राजते चन्द्रो दशधा भासयन्दिशः

prāpyāvabhṛthamavyagraḥ sarvadevarṣipūjitaḥ atīva rājate candro daśadhā bhāsayandiśaḥ

अवभृथ-स्नान प्राप्त कर, निश्चिन्त होकर, सर्व देव-ऋषियों से पूजित चन्द्रमा दसों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए अत्यन्त शोभायमान हुए।

श्लोक 81 (skanda.5.28.81)

तस्य तत्प्राप्य दुष्प्राप्यमैश्वर्यमृषिसंस्कृतम् । विबभ्राम मतिर्व्यास विनयाद्यमपास्य च

tasya tatprāpya duṣprāpyamaiśvaryamṛṣisaṁskṛtam vibabhrāma matirvyāsa vinayādyamapāsya ca

हे व्यास! उस दुर्लभ, ऋषि-संस्कृत ऐश्वर्य को पाकर उनका मन विनय और संयम त्यागकर भटक गया।

श्लोक 82 (skanda.5.28.82)

बृहस्पतेस्तदा भार्यां तारानाम्नीं यशस्विनीम् । जहार तमसा साध्वीमवमान्यां गिरःसुतम्

bṛhaspatestadā bhāryāṁ tārānāmnīṁ yaśasvinīm jahāra tamasā sādhvīmavamānyāṁ giraḥsutam

उन्होंने बृहस्पति की यशस्विनी पत्नी तारा का, अपमानपूर्वक और छल से, बृहस्पति के प्रति अनादर करते हुए हरण कर लिया।

श्लोक 83 (skanda.5.28.83)

वाच्यमानस्तदा सोमो देवदेवर्षिभिस्तथा । नैव व्यसर्जयत्तारां तस्मा आंगिरसाय च

vācyamānastadā somo devadevarṣibhistathā naiva vyasarjayattārāṁ tasmā āṁgirasāya ca

देव-ऋषियों द्वारा समझाए जाने पर भी सोम ने तारा को अंगिरा-पुत्र बृहस्पति को नहीं लौटाया।

श्लोक 84 (skanda.5.28.84)

बृहस्पतेस्ततः पक्षं शक्रो जग्राह कोपतः । स हि शिष्यो महातेजा गुरोः पूर्वं वृहस्पतेः

bṛhaspatestataḥ pakṣaṁ śakro jagrāha kopataḥ sa hi śiṣyo mahātejā guroḥ pūrvaṁ vṛhaspateḥ

तब क्रोधवश इन्द्र ने बृहस्पति का पक्ष लिया; क्योंकि वे स्वयं पहले महातेजस्वी गुरु बृहस्पति के शिष्य रह चुके थे।

श्लोक 85 (skanda.5.28.85)

ततो युद्धमभूत्तत्र सुघोरं शक्रसोमयोः । देवानां दानवानां च व्यास त्रासकरं महत्

tato yuddhamabhūttatra sughoraṁ śakrasomayoḥ devānāṁ dānavānāṁ ca vyāsa trāsakaraṁ mahat

हे व्यास! तब इन्द्र और सोम के बीच अत्यन्त घोर युद्ध हुआ, जो देवों और दानवों दोनों के लिए महान भयकारी था।

श्लोक 86 (skanda.5.28.86)

सर्वे भीतास्ततो देवा ब्रह्माणं शरणं गताः । अग्रतो ब्रह्मणो युद्धं कथितं शक्रसोमयोः

sarve bhītāstato devā brahmāṇaṁ śaraṇaṁ gatāḥ agrato brahmaṇo yuddhaṁ kathitaṁ śakrasomayoḥ

सभी भयभीत देव ब्रह्मा की शरण में गए; ब्रह्मा के समक्ष इन्द्र-सोम युद्ध का वृत्तान्त सुनाया गया।

श्लोक 87 (skanda.5.28.87)

देवानां वचनं श्रुत्वा सार्द्धं देवैः पितामहः । आगत्य युद्धभूमिं सोऽवारयद्देवदानवान्

devānāṁ vacanaṁ śrutvā sārddhaṁ devaiḥ pitāmahaḥ āgatya yuddhabhūmiṁ so'vārayaddevadānavān

देवों का वचन सुनकर पितामह देवों सहित युद्धभूमि में आए और देव-दानवों को रोक दिया।

श्लोक 88 (skanda.5.28.88)

वारितास्ते स्थितास्तत्र युद्धं त्यक्त्वा सुरासुराः । तारामादाय स तदा ददा वांगिरसे द्विजे

vāritāste sthitāstatra yuddhaṁ tyaktvā surāsurāḥ tārāmādāya sa tadā dadā vāṁgirase dvije

रोके गए वे सुर-असुर युद्ध त्यागकर वहीं खड़े रहे; तब ब्रह्मा ने तारा को लेकर अंगिरा-पुत्र द्विज को लौटा दिया।

श्लोक 89 (skanda.5.28.89)

तामंतःप्रसवां दृष्ट्वा प्राह भार्यां बृहस्पतिः । मदीयायां न ते योन्यां गर्भो धार्यः कथंचन

tāmaṁtaḥprasavāṁ dṛṣṭvā prāha bhāryāṁ bṛhaspatiḥ madīyāyāṁ na te yonyāṁ garbho dhāryaḥ kathaṁcana

उन्हें गर्भवती देखकर बृहस्पति ने अपनी पत्नी से कहा -- 'यह गर्भ किसी भी प्रकार मेरे वंश में धारण नहीं किया जा सकता।'

श्लोक 90 (skanda.5.28.90)

उत्ससर्ज ततस्तारा कुमारं देवरूपिणम् । इषीकास्त्रं समासाद्य ज्वलंतमिव पावकम्

utsasarja tatastārā kumāraṁ devarūpiṇam iṣīkāstraṁ samāsādya jvalaṁtamiva pāvakam

तब तारा ने देवरूपधारी उस कुमार को जन्म दिया, जो मानो प्रज्वलित अग्नि के समान इषीका-अस्त्र के समान तेजस्वी था।

श्लोक 91 (skanda.5.28.91)

स तेजो जातमात्रोऽपि देवानामाक्षिपच्छिशुः । ततः संशयमापन्ना ऊचुस्तारां दिवौकसः

sa tejo jātamātro'pi devānāmākṣipacchiśuḥ tataḥ saṁśayamāpannā ūcustārāṁ divaukasaḥ

जन्म लेते ही उस तेज ने देवताओं की दृष्टि को अभिभूत कर दिया। तब संशयग्रस्त देवताओं ने तारा से पूछा --

श्लोक 92 (skanda.5.28.92)

कस्यायं ब्रूहि सुभगे सोमस्याथ बृहस्पतेः । नाचचक्षे तु देवानां वेधाः पप्रच्छ तां पुनः

kasyāyaṁ brūhi subhage somasyātha bṛhaspateḥ nācacakṣe tu devānāṁ vedhāḥ papraccha tāṁ punaḥ

-- 'हे सुभगे! बताओ, यह किसका पुत्र है -- सोम का या बृहस्पति का?' उसने देवों को नहीं बताया; ब्रह्मा ने उससे पुनः पूछा --

श्लोक 93 (skanda.5.28.93)

यदत्र सत्यं तद्ब्रूहि तारे कस्य सुतो ह्ययम् । सा प्रांजलिरुवाचेदं ब्रह्माणं वरदं विभुम्

yadatra satyaṁ tadbrūhi tāre kasya suto hyayam sā prāṁjaliruvācedaṁ brahmāṇaṁ varadaṁ vibhum

-- 'हे तारे! जो सत्य हो वह बताओ, यह किसका पुत्र है?' उसने हाथ जोड़कर वरदायक विभु ब्रह्मा से यह कहा --

श्लोक 94 (skanda.5.28.94)

सोमस्येति रहः सोऽयं कुमारो देवसंनिभः । सोमस्य तं सुतं ज्ञात्वा परिष्वज्य पितामहः

somasyeti rahaḥ so'yaṁ kumāro devasaṁnibhaḥ somasya taṁ sutaṁ jñātvā pariṣvajya pitāmahaḥ

-- 'यह सोम का ही है' -- इस प्रकार गुप्त रहस्य प्रकट हुआ, कि यह देवतुल्य कुमार सोम का पुत्र है। यह जानकर पितामह ने उसे गले लगाकर --

श्लोक 95 (skanda.5.28.95)

बुध इत्यकरोन्नाम तस्य पुत्रस्य वै तदा । परदारापहाराच्च यत्पापं तेन दुःसहम्

budha ityakaronnāma tasya putrasya vai tadā paradārāpahārācca yatpāpaṁ tena duḥsaham

-- उस पुत्र का नाम 'बुध' रखा। परन्तु दूसरे की पत्नी के अपहरण से उत्पन्न जो दुःसह पाप था --

श्लोक 96 (skanda.5.28.96)

तेन सोमोऽभवत्कुष्ठी क्षयरोगयुतस्तदा । ततो राज्ये स्वकं पुत्रं स्थापयित्वा यथाविधि

tena somo'bhavatkuṣṭhī kṣayarogayutastadā tato rājye svakaṁ putraṁ sthāpayitvā yathāvidhi

-- उससे सोम कुष्ठरोगी और क्षयरोगयुक्त हो गए। तब विधिपूर्वक अपने पुत्र को राज्य पर स्थापित कर --

श्लोक 97 (skanda.5.28.97)

अवन्तीमाजगामाशु सोमो देवदिदृक्षया । सोमाहे सोमवत्यां च अमायोगे जितेंद्रियः

avantīmājagāmāśu somo devadidṛkṣayā somāhe somavatyāṁ ca amāyoge jiteṁdriyaḥ

-- सोम देव-दर्शन की इच्छा से शीघ्र अवन्ती आए। सोमवार को सोमवती में, अमावस्या के योग में, इन्द्रियसंयमी होकर --

श्लोक 98 (skanda.5.28.98)

स्नात्वा संपूजयामास सोमः सोमेश्वरं ततः । तस्य भक्त्या च सन्तुष्टः प्राह सोमं महे श्वरः

snātvā saṁpūjayāmāsa somaḥ someśvaraṁ tataḥ tasya bhaktyā ca santuṣṭaḥ prāha somaṁ mahe śvaraḥ

-- सोम ने स्नान कर सोमेश्वर का पूजन किया। उनकी भक्ति से सन्तुष्ट होकर महेश्वर ने सोम से कहा --

श्लोक 99 (skanda.5.28.99)

मत्प्रसादाद्वपुः कांतं तव सोम भविष्यति । सोमेश्वरमिति ख्यातं भुक्तिप्रदायकम्

matprasādādvapuḥ kāṁtaṁ tava soma bhaviṣyati someśvaramiti khyātaṁ bhuktipradāyakam

-- 'हे सोम! मेरी कृपा से तुम्हारा शरीर पुनः सुन्दर हो जाएगा।' तभी से यह लिंग भोगप्रदायक 'सोमेश्वर' नाम से विख्यात हुआ।

श्लोक 100 (skanda.5.28.100)

एवं व्यास तु तत्तीर्थं लिंगं चैवाति दुर्लभम् । कथितं तथ्यभावेन मया तुष्टेन सांप्रतम्

evaṁ vyāsa tu tattīrthaṁ liṁgaṁ caivāti durlabham kathitaṁ tathyabhāvena mayā tuṣṭena sāṁpratam

हे व्यास! इस प्रकार वह तीर्थ और अत्यन्त दुर्लभ वह लिंग, मैंने प्रसन्न होकर अभी तुम्हें यथार्थ रूप में बता दिया।

श्लोक 101 (skanda.5.28.101)

श्रावणं प्राप्य यो मासं सोमनाथं जितेंद्रियः । नित्यं पश्येन्नरो व्यास तस्य पुण्यफलं शृणु

śrāvaṇaṁ prāpya yo māsaṁ somanāthaṁ jiteṁdriyaḥ nityaṁ paśyennaro vyāsa tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu

हे व्यास! श्रावण मास में जो इन्द्रियसंयमी मनुष्य नित्य सोमनाथ का दर्शन करता है, उसका पुण्यफल सुनो।

श्लोक 102 (skanda.5.28.102)

सौराष्ट्रे सोमनाथस्य पूजायाः प्रत्यहं फलम् । लभते स नरो व्यास नात्र कार्या विचारणा

saurāṣṭre somanāthasya pūjāyāḥ pratyahaṁ phalam labhate sa naro vyāsa nātra kāryā vicāraṇā

हे व्यास! वह मनुष्य सौराष्ट्र में सोमनाथ की प्रतिदिन पूजा का फल प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं।

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