अवन्ती खण्ड · अध्याय 29
नरककथनम्
श्लोक 1 (skanda.5.29.1)
सनत्कुमार उवाच । तीर्थस्याऽनरकस्यास्य माहात्म्यं शृणु सांप्रतम् । तीर्थे चानरके स्नात्वा दृष्ट्वा देवं महेश्वरम् । न पश्येन्नरकं क्वापि यद्यपि ब्रह्महा भवेत्
sanatkumāra uvāca tīrthasyā'narakasyāsya māhātmyaṁ śṛṇu sāṁpratam tīrthe cānarake snātvā dṛṣṭvā devaṁ maheśvaram na paśyennarakaṁ kvāpi yadyapi brahmahā bhavet
सनत्कुमार ने कहा -- अब इस अनरक तीर्थ का माहात्म्य सुनो। अनरक तीर्थ में स्नान कर देव महेश्वर का दर्शन करने वाला, ब्रह्महत्यारा होने पर भी, कभी नरक नहीं देखता।
श्लोक 2 (skanda.5.29.2)
व्यास उवाच । कियंतो नरकास्तात कस्मिन्स्थाने प्रतिष्ठिताः । पतन्ति केन पापेन पापिनस्तेषु दुःखिताः
vyāsa uvāca kiyaṁto narakāstāta kasminsthāne pratiṣṭhitāḥ patanti kena pāpena pāpinasteṣu duḥkhitāḥ
व्यास ने कहा -- हे तात! कितने नरक हैं, वे किस स्थान में स्थित हैं? पापी लोग किस पाप से उनमें दुःखी होकर गिरते हैं?
श्लोक 3 (skanda.5.29.3)
तत्कथं प्राणिनस्तत्र गच्छन्ति पापकारिणः । एतत्सर्वं समाख्याहि यदि तुष्टोऽसि मे प्रभो
tatkathaṁ prāṇinastatra gacchanti pāpakāriṇaḥ etatsarvaṁ samākhyāhi yadi tuṣṭo'si me prabho
पापकर्मी प्राणी वहाँ किस प्रकार जाते हैं? हे प्रभो! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो यह सब बताइए।
श्लोक 4 (skanda.5.29.4)
सनत्कुमार उवाच । शृणुष्व नरकान्व्यास तावन्तो यत्र संस्थिताः । न लभ्यंते यथा चैते सत्यमेतद्वदामि ते
sanatkumāra uvāca śṛṇuṣva narakānvyāsa tāvanto yatra saṁsthitāḥ na labhyaṁte yathā caite satyametadvadāmi te
सनत्कुमार ने कहा -- हे व्यास! सुनो, नरक कितने हैं, वे कहाँ स्थित हैं, और इनसे कैसे बचा जा सकता है -- यह सत्य मैं तुम्हें बताता हूँ।
श्लोक 5 (skanda.5.29.5)
पातालनि लयाः सर्वे विख्याता दुःखदाः सदा । पुण्यप्लावेन ते सर्वे तिर्यग्यांति स्वकर्मभिः
pātālani layāḥ sarve vikhyātā duḥkhadāḥ sadā puṇyaplāvena te sarve tiryagyāṁti svakarmabhiḥ
सभी नरक पाताल में स्थित हैं, सदा दुःखदायी और विख्यात हैं। पुण्य की बाढ़ से वे सभी अपने-अपने कर्मों के अनुसार टल जाते हैं।
श्लोक 6 (skanda.5.29.6)
रौरवः सूकरो रौद्रस्तालो विनशकस्तथा । तप्तकुम्भस्तु तप्तायो महाज्वालस्तथैव च
rauravaḥ sūkaro raudrastālo vinaśakastathā taptakumbhastu taptāyo mahājvālastathaiva ca
रौरव, सूकर, रौद्र, ताल, विनशक, तप्तकुम्भ, तप्तायस और महाज्वाल --
श्लोक 7 (skanda.5.29.7)
कुंभीपाकः क्रकचनस्तथा देवातिदारुणः । कृमिभुक्तिश्च रक्ताख्यो लालाभक्षश्च गंडकः
kuṁbhīpākaḥ krakacanastathā devātidāruṇaḥ kṛmibhuktiśca raktākhyo lālābhakṣaśca gaṁḍakaḥ
-- कुम्भीपाक, क्रकचन, देवातिदारुण, कृमिभुक्ति, रक्ताख्य, लालाभक्ष, गण्डक --
श्लोक 8 (skanda.5.29.8)
अधोमुखश्चास्थिभंगो यंत्रपीडनकस्तथा । संदंशो रुधिरांगश्च श्वभोज्यश्च कुभोजनः
adhomukhaścāsthibhaṁgo yaṁtrapīḍanakastathā saṁdaṁśo rudhirāṁgaśca śvabhojyaśca kubhojanaḥ
-- अधोमुख, अस्थिभंग, यन्त्रपीड़नक, संदंश, रुधिरांग, श्वभोज्य, कुभोजन --
श्लोक 9 (skanda.5.29.9)
इत्येवमादयः सर्वे नरका भृशदारुणाः । यमस्य विषये संति स्तुता हि भयदायिनः
ityevamādayaḥ sarve narakā bhṛśadāruṇāḥ yamasya viṣaye saṁti stutā hi bhayadāyinaḥ
-- इत्यादि सभी अत्यन्त भयंकर नरक यमराज के क्षेत्र में स्थित हैं, जो भय देने वाले कहे गए हैं।
श्लोक 10 (skanda.5.29.10)
पतंति पुरुषास्तेषु पापकर्मरताश्च ये । पतिताश्च प्रपच्यंते नराः कर्मानुरूपतः
pataṁti puruṣāsteṣu pāpakarmaratāśca ye patitāśca prapacyaṁte narāḥ karmānurūpataḥ
पापकर्मरत मनुष्य उनमें गिरते हैं; गिरे हुए मनुष्य अपने-अपने कर्मों के अनुसार पकाए जाते हैं।
श्लोक 11 (skanda.5.29.11)
यातनाभिर्विचित्राभी रौद्रकर्म क्षयाद्भृशम् । सुगाढं हस्तयोर्बद्धास्तप्तशृंखलया नराः
yātanābhirvicitrābhī raudrakarma kṣayādbhṛśam sugāḍhaṁ hastayorbaddhāstaptaśṛṁkhalayā narāḥ
विचित्र यातनाओं से, अपने भयंकर कर्मों के क्षय हेतु, मनुष्य तपे हुए लोहे की शृंखलाओं से दोनों हाथ कसकर बाँधे जाते हैं --
श्लोक 12 (skanda.5.29.12)
महावृक्षाग्रशृंगेषु लंब्यंते यमकिंकरैः । शोचंतः स्वानि कर्माणि तूष्णीं तिष्ठंति निश्चलाः
mahāvṛkṣāgraśṛṁgeṣu laṁbyaṁte yamakiṁkaraiḥ śocaṁtaḥ svāni karmāṇi tūṣṇīṁ tiṣṭhaṁti niścalāḥ
-- और यमकिंकरों द्वारा विशाल वृक्षों की चोटियों पर लटकाए जाते हैं; अपने कर्मों पर शोक करते हुए वे मौन, निश्चल खड़े रहते हैं।
श्लोक 13 (skanda.5.29.13)
अग्निवर्णैः शंकुभिश्च लोहदंडैः सकंटकैः । हन्यंते किंकरैर्घोरैः समंतात्पापकारिणः
agnivarṇaiḥ śaṁkubhiśca lohadaṁḍaiḥ sakaṁṭakaiḥ hanyaṁte kiṁkarairghoraiḥ samaṁtātpāpakāriṇaḥ
अग्नि-वर्ण की कीलों और काँटेदार लौह-दंडों से घोर किंकरों द्वारा पापकर्मी सब ओर से मारे जाते हैं।
श्लोक 14 (skanda.5.29.14)
तत्तत्क्षणात्प्रदीप्तेन वह्निना च विशेषतः । समंततः प्रक्षिप्यंते कृत्ताश्च जर्जरीकृताः
tattatkṣaṇātpradīptena vahninā ca viśeṣataḥ samaṁtataḥ prakṣipyaṁte kṛttāśca jarjarīkṛtāḥ
क्षण-क्षण में विशेष रूप से प्रज्वलित अग्नि द्वारा, वे सब ओर फेंके जाते हैं, काटे जाते हैं और चूर-चूर कर दिए जाते हैं।
श्लोक 15 (skanda.5.29.15)
कूटसाक्षी तथाऽसम्यक्पक्षपातेन यो वदेत् । यश्चान्यदनृतं ब्रूयात्स नरो याति रौरवम्
kūṭasākṣī tathā'samyakpakṣapātena yo vadet yaścānyadanṛtaṁ brūyātsa naro yāti rauravam
झूठा साक्षी, पक्षपातवश असम्यक बोलने वाला, और जो अन्य किसी प्रकार का असत्य बोलता है, वह मनुष्य रौरव को जाता है।
श्लोक 16 (skanda.5.29.16)
सुरापो ब्रह्महा हर्ता सुवर्णस्य च सूचकः । प्रयांति नरकांश्चैव तैः संसर्गमुपैति यः
surāpo brahmahā hartā suvarṇasya ca sūcakaḥ prayāṁti narakāṁścaiva taiḥ saṁsargamupaiti yaḥ
सुरापायी, ब्रह्महत्यारा, स्वर्ण-चोर और उसकी सूचना देने वाला भी नरकों में जाते हैं, और जो उनसे संसर्ग रखता है वह भी।
श्लोक 17 (skanda.5.29.17)
भ्रूणहा गुरुहंता च गोघ्नश्च मुनिसत्तम । यांत्येते नरकं रौद्रं ये च विश्वासघातकाः
bhrūṇahā guruhaṁtā ca goghnaśca munisattama yāṁtyete narakaṁ raudraṁ ye ca viśvāsaghātakāḥ
हे मुनिश्रेष्ठ! भ्रूणहत्यारा, गुरुहत्यारा और गोहत्यारा, तथा विश्वासघाती -- ये सभी घोर नरक को जाते हैं।
श्लोक 18 (skanda.5.29.18)
तप्तलोष्ठेषु पच्यंते यस्तु भक्तं परित्यजेत् । स्नुषां सुतां च यो गच्छेन्महा ज्वाले स पात्यते
taptaloṣṭheṣu pacyaṁte yastu bhaktaṁ parityajet snuṣāṁ sutāṁ ca yo gacchenmahā jvāle sa pātyate
जो भक्त को त्याग देता है, वह तपे हुए लोहे के पिंडों पर पकाया जाता है; जो पुत्रवधू या अपनी पुत्री के पास जाता है, वह महाज्वाल में गिराया जाता है।
श्लोक 19 (skanda.5.29.19)
कुंभीपाके प्रयात्येव पादैरूर्ध्वैरधोमुखः । करोति कर्म वै नित्यं यश्च गां प्रतिषेधयेत्
kuṁbhīpāke prayātyeva pādairūrdhvairadhomukhaḥ karoti karma vai nityaṁ yaśca gāṁ pratiṣedhayet
जो निषिद्ध कर्म नित्य करता है और जो गौ का निषेध करता है, वह सिर नीचे और पैर ऊपर किए हुए कुम्भीपाक को जाता है।
श्लोक 20 (skanda.5.29.20)
स्वामिद्रोही च यो रौद्रस्तप्तकुंभे स पात्यते । देवदूषयिता यश्च वेदविक्रयिकस्तथा
svāmidrohī ca yo raudrastaptakuṁbhe sa pātyate devadūṣayitā yaśca vedavikrayikastathā
स्वामी से द्रोह करने वाला भयंकर मनुष्य तप्तकुम्भ में गिराया जाता है; देव को दूषित करने वाला और वेद बेचने वाला --
श्लोक 21 (skanda.5.29.21)
परस्त्रीगामिनो ये च यांति क्रकचने तु ते । चौरोऽतिदारुणे याति मर्यादाभेदकस्तथा
parastrīgāmino ye ca yāṁti krakacane tu te cauro'tidāruṇe yāti maryādābhedakastathā
-- परस्त्रीगामी क्रकचन को जाते हैं। चोर अत्यन्त भयंकर नरक को जाता है, और मर्यादा-भंजक भी।
श्लोक 22 (skanda.5.29.22)
देवद्विजपितृद्वेष्टा रत्नदूषयिता च यः । स याति कृमिभक्षे वै रक्ताख्ये च पतंति ते
devadvijapitṛdveṣṭā ratnadūṣayitā ca yaḥ sa yāti kṛmibhakṣe vai raktākhye ca pataṁti te
देव, द्विज और पितरों से द्वेष करने वाला, तथा रत्नों में मिलावट करने वाला कृमिभक्ष को जाता है, और वे रक्ताख्य में गिरते हैं।
श्लोक 23 (skanda.5.29.23)
पितृदेवगुरूणां च सपर्यां न करोति यः । लालाभक्षे स यात्युग्रे कूटकर्म करोति यः
pitṛdevagurūṇāṁ ca saparyāṁ na karoti yaḥ lālābhakṣe sa yātyugre kūṭakarma karoti yaḥ
जो पितरों, देवों और गुरुओं की सेवा-पूजा नहीं करता, वह भयंकर लालाभक्ष को जाता है, और जो कपटपूर्ण कर्म करता है वह भी।
श्लोक 24 (skanda.5.29.24)
अंत्यजेभ्यो ग्रहीता च नरके यात्यधोमुखे । अस्थिभंगे प्रयात्येव एको मिष्टान्नभुङ्नरः
aṁtyajebhyo grahītā ca narake yātyadhomukhe asthibhaṁge prayātyeva eko miṣṭānnabhuṅnaraḥ
अंत्यजों से (अनुचित) दान लेने वाला अधोमुख नरक को जाता है; अकेले मिष्टान्न खाने वाला मनुष्य अस्थिभंग को जाता है।
श्लोक 25 (skanda.5.29.25)
कृतघ्नः पिशुनः क्रूरः कूटमानी विडंबकः । यंत्रपीडनके याति परगुह्यप्रकाशकः
kṛtaghnaḥ piśunaḥ krūraḥ kūṭamānī viḍaṁbakaḥ yaṁtrapīḍanake yāti paraguhyaprakāśakaḥ
कृतघ्न, चुगलखोर, क्रूर, मिथ्याभिमानी, उपहासक और दूसरों का गुह्य प्रकट करने वाला यंत्रपीड़नक को जाता है।
श्लोक 26 (skanda.5.29.26)
लाक्षामांसरसानां च तिलानां रसकस्य च । विक्रयी ब्राह्मणो याति श्वदंशे नात्र संशयः
lākṣāmāṁsarasānāṁ ca tilānāṁ rasakasya ca vikrayī brāhmaṇo yāti śvadaṁśe nātra saṁśayaḥ
लाख, मांस, मदिरा, तिल और नमकीन रस बेचने वाला ब्राह्मण श्वदंश को जाता है, इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 27 (skanda.5.29.27)
मधुहा ग्रामहंता च याति वैतरणीं नरः । वर्णाश्रमविरुद्धं च कर्म कुर्वंति ये नराः
madhuhā grāmahaṁtā ca yāti vaitaraṇīṁ naraḥ varṇāśramaviruddhaṁ ca karma kurvaṁti ye narāḥ
अतिथि-हत्यारा और ग्रामनाशक मनुष्य वैतरणी को जाता है; और जो मनुष्य वर्णाश्रम के विरुद्ध कर्म करते हैं --
श्लोक 28 (skanda.5.29.28)
कर्मणा मनसा वाचा महानद्यां प्रयांति ते । गुरूणामवमंता च शास्त्रदूषयिता च यः
karmaṇā manasā vācā mahānadyāṁ prayāṁti te gurūṇāmavamaṁtā ca śāstradūṣayitā ca yaḥ
-- कर्म, मन और वाणी से, वे महानदी (वैतरणी) को जाते हैं। गुरुओं का अनादर करने वाला और शास्त्र को दूषित करने वाला --
श्लोक 29 (skanda.5.29.29)
असिपत्रे प्रयात्येव तथा पर्वविलंघकः । धनयौवनमत्ता ये मर्यादाभेदिनो नराः
asipatre prayātyeva tathā parvavilaṁghakaḥ dhanayauvanamattā ye maryādābhedino narāḥ
-- असिपत्र नरक को जाता है, और पर्व-दिनों की मर्यादा तोड़ने वाला भी। धन और यौवन के मद में चूर, मर्यादा-भंजक मनुष्य --
श्लोक 30 (skanda.5.29.30)
ते यांति नरके घोरे कृष्णसूत्रेऽतिदारुणे । असंस्कृतश्च यो विप्रो वृषलीं सेवते तु वै
te yāṁti narake ghore kṛṣṇasūtre'tidāruṇe asaṁskṛtaśca yo vipro vṛṣalīṁ sevate tu vai
-- अत्यन्त भयंकर घोर कृष्णसूत्र नरक को जाते हैं। और जो संस्कारहीन ब्राह्मण नीच कुल की स्त्री का सेवन करता है --
श्लोक 31 (skanda.5.29.31)
वृषलीमिथुनो यश्च पततस्तावुभावपि । उच्छिष्टा ये स्पृशंतीह गावोऽग्निं जननीं द्विजान्
vṛṣalīmithuno yaśca patatastāvubhāvapi ucchiṣṭā ye spṛśaṁtīha gāvo'gniṁ jananīṁ dvijān
-- और जो नीच स्त्री से संगम करता है, वे दोनों ही गिरते हैं। जो यहाँ जूठे रहते हुए गौ, अग्नि, माता या ब्राह्मण को छूते हैं --
श्लोक 32 (skanda.5.29.32)
ते पच्यंते कुभोज्ये च मित्र द्वेषी विशेषतः । पंक्तिभेदे दिवास्वप्रे ये नरोऽब्रह्मचारिणः
te pacyaṁte kubhojye ca mitra dveṣī viśeṣataḥ paṁktibhede divāsvapre ye naro'brahmacāriṇaḥ
-- वे कुभोज्य में पकाए जाते हैं, और विशेष रूप से मित्र से द्वेष करने वाला भी। पंक्ति-भेद करने वाले दिवास्वप्न को जाते हैं, तथा जो ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करते --
श्लोक 33 (skanda.5.29.33)
पुत्रैरध्यापिता ये तै ते पतंति श्वभोजने । एते चान्ये च नरकाः शतशोऽ थ सहस्रशः
putrairadhyāpitā ye tai te pataṁti śvabhojane ete cānye ca narakāḥ śataśo' tha sahasraśaḥ
-- और जो अपने ही पुत्रों से वेदाध्ययन कराए जाते हैं, वे श्वभोजन में गिरते हैं। ये और अन्य सैकड़ों-हजारों नरक हैं --
श्लोक 34 (skanda.5.29.34)
तत्र दुष्कृतकर्माणः पच्यंते यातनागताः । नृणां स्वर्गाश्च यावंतस्तावंतो निरयास्तथा
tatra duṣkṛtakarmāṇaḥ pacyaṁte yātanāgatāḥ nṛṇāṁ svargāśca yāvaṁtastāvaṁto nirayāstathā
-- वहाँ दुष्कर्मी लोग यातना पाकर पकाए जाते हैं। मनुष्यों के जितने स्वर्ग हैं, उतने ही नरक भी हैं।
श्लोक 35 (skanda.5.29.35)
पापं कृत्वा तु बहुलं प्रायश्चित्तपराङ्मुखाः । कृते पापे च वै तापो यस्य पुंसः प्रजायते
pāpaṁ kṛtvā tu bahulaṁ prāyaścittaparāṅmukhāḥ kṛte pāpe ca vai tāpo yasya puṁsaḥ prajāyate
बहुत पाप करके भी जो प्रायश्चित्त से विमुख नहीं होता -- जिस पुरुष को पाप करने पर पश्चाताप होता है --
श्लोक 36 (skanda.5.29.36)
प्रायश्चित्तं तु तस्यैकं शिवसंस्मरणं परम् । तस्मादहर्निशं शंभुं संस्मरन्पुरुषोत्तमः
prāyaścittaṁ tu tasyaikaṁ śivasaṁsmaraṇaṁ param tasmādaharniśaṁ śaṁbhuṁ saṁsmaranpuruṣottamaḥ
-- उसके लिए एक ही परम प्रायश्चित्त है -- शिव का स्मरण। अतः दिन-रात शम्भु का स्मरण करने वाला श्रेष्ठ पुरुष --
श्लोक 37 (skanda.5.29.37)
न याति नरकं शुद्धः संक्षीणाखिलपातकः । कार्तिकस्यासिते पक्षे कृष्णा या च चतुर्दशी । तस्यां दीपः प्रदातव्यो देवदेवस्य चाग्रतः
na yāti narakaṁ śuddhaḥ saṁkṣīṇākhilapātakaḥ kārtikasyāsite pakṣe kṛṣṇā yā ca caturdaśī tasyāṁ dīpaḥ pradātavyo devadevasya cāgrataḥ
-- शुद्ध होकर, अपने समस्त पापों का क्षय कर, नरक नहीं जाता। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की जो चतुर्दशी है, उस दिन देवाधिदेव के समक्ष दीपदान करना चाहिए।