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अवन्ती खण्ड · अध्याय 30

अनरकेश्वरदीपदानमाहात्म्य-वर्णनम्

अध्याय 29अध्याय-सूचीअध्याय 31

श्लोक 1 (skanda.5.30.1)

व्यास उवाच । दीपेऽस्मिन्यत्फलं चास्ति विधिना येन दीयते । तत्सर्वं ब्रूहि मे तात दीपोत्पत्तिं च शोभनाम्

vyāsa uvāca dīpe'sminyatphalaṁ cāsti vidhinā yena dīyate tatsarvaṁ brūhi me tāta dīpotpattiṁ ca śobhanām

व्यास ने कहा -- हे तात! जिस विधि से दीप दिया जाता है, उसका जो फल है, वह सब मुझे बताइए, और दीप की सुन्दर उत्पत्ति-कथा भी।

श्लोक 2 (skanda.5.30.2)

सनत्कुमार उवाच । पुरा कृतयुगे व्यास पार्वतीं शंकरोऽग्रतः । अभिप्रयाचितुं यातस्तयापि सोऽभियाचितः

sanatkumāra uvāca purā kṛtayuge vyāsa pārvatīṁ śaṁkaro'grataḥ abhiprayācituṁ yātastayāpi so'bhiyācitaḥ

सनत्कुमार ने कहा -- हे व्यास! पूर्वकाल में सतयुग में शंकर पार्वती के समक्ष प्रेम-निवेदन करने गए, और उन्होंने भी उनसे कुछ याचना की।

श्लोक 3 (skanda.5.30.3)

पार्वत्युवाच । शरीरे कृष्णता शंभो ममास्ति रूपहारिणी । तस्माद्याचे भृशं शंभो प्रसीद दिव्य लोचन

pārvatyuvāca śarīre kṛṣṇatā śaṁbho mamāsti rūpahāriṇī tasmādyāce bhṛśaṁ śaṁbho prasīda divya locana

पार्वती ने कहा -- हे शम्भो! मेरे शरीर में जो श्यामलता है, वह मेरे रूप को हर लेती है; अतः हे दिव्यलोचन शम्भो! मैं आपसे अत्यन्त प्रार्थना करती हूँ, प्रसन्न होइए।

श्लोक 4 (skanda.5.30.4)

भवेन वर्णिता सा वै अतीव शोभना मम । लोचने पक्ष्ममालायाः शोभसेऽतितरां सदा

bhavena varṇitā sā vai atīva śobhanā mama locane pakṣmamālāyāḥ śobhase'titarāṁ sadā

(शिव ने कहा) -- मेरे द्वारा तो तुम अत्यन्त सुन्दर वर्णित की गई हो; तुम्हारे नेत्र, पलकों की माला सहित, सदा और भी अधिक शोभा पाते हैं।

श्लोक 5 (skanda.5.30.5)

सिताब्जसंस्थितो भृंगो यथा शोभयते च तम् । तया तथा याचितोसौ धूर्जटिर्वृषभासनः

sitābjasaṁsthito bhṛṁgo yathā śobhayate ca tam tayā tathā yācitosau dhūrjaṭirvṛṣabhāsanaḥ

जैसे श्वेत कमल पर बैठा भ्रमर उसे शोभित करता है (वैसे ही तुम्हारा यह वर्ण)। इस प्रकार याचना किए जाने पर वृषभासन धूर्जटि ने --

श्लोक 6 (skanda.5.30.6)

विरूपरूपकर्तासि न शृणोषि वचो यदा । तदा त्वहं सवै राग्या चरेयं दुष्करं तपः

virūparūpakartāsi na śṛṇoṣi vaco yadā tadā tvahaṁ savai rāgyā careyaṁ duṣkaraṁ tapaḥ

(पार्वती ने कहा) -- आप मेरे रूप को विरूप बना रहे हैं, आप मेरी बात नहीं सुनते; तो मैं वैराग्ययुक्त होकर दुष्कर तप करूँगी।

श्लोक 7 (skanda.5.30.7)

भवस्तयेति चोक्तस्तु तस्या वै पाणिमग्रहीत् । कदाचिच्छंकरो देवो रतिं याचितवान्प्रियाम्

bhavastayeti coktastu tasyā vai pāṇimagrahīt kadācicchaṁkaro devo ratiṁ yācitavānpriyām

'ऐसा ही हो' कहकर भव ने उनका हाथ पकड़ लिया। एक बार देव शंकर ने अपनी प्रिया से रति की याचना की।

श्लोक 8 (skanda.5.30.8)

रतिं दत्तवती सा तु जहास नाम कीर्तयन् । सुदुःखिताऽभवत्सा तु पराङ्मुखी विहाय तम्

ratiṁ dattavatī sā tu jahāsa nāma kīrtayan suduḥkhitā'bhavatsā tu parāṅmukhī vihāya tam

उन्होंने रति दी, परन्तु वे हँस पड़े, कोई नाम उच्चारते हुए। इससे वे अत्यन्त दुःखी होकर मुख फेरकर उन्हें छोड़कर चली गईं।

श्लोक 9 (skanda.5.30.9)

उवाच रोषसंयुक्ता संस्मृत्य देवभाषितम् । तपोवनं व्रजाम्यद्य सुगौरत्वोपलब्धये

uvāca roṣasaṁyuktā saṁsmṛtya devabhāṣitam tapovanaṁ vrajāmyadya sugauratvopalabdhaye

क्रोधयुक्त होकर, देव के वचन का स्मरण कर उन्होंने कहा -- 'मैं आज ही सुगौरत्व प्राप्ति हेतु तपोवन को जाती हूँ।

श्लोक 10 (skanda.5.30.10)

सुवर्णरूपरूपा च यदा पुनर्भवामि च । तदा तव सानुरागा भवामि चैव नान्यथा

suvarṇarūparūpā ca yadā punarbhavāmi ca tadā tava sānurāgā bhavāmi caiva nānyathā

जब मैं पुनः स्वर्णवर्ण रूपिणी बनूँगी, तभी तुम्हारे प्रति अनुरागवती होऊँगी, अन्यथा नहीं।'

श्लोक 11 (skanda.5.30.11)

इतीदमेव जल्पंती जगाम विंध्यपर्वतम् । हरः शुशोच ततस्तां क्व गता सा विहाय माम्

itīdameva jalpaṁtī jagāma viṁdhyaparvatam haraḥ śuśoca tatastāṁ kva gatā sā vihāya mām

ऐसा कहते हुए वे विंध्य पर्वत को चली गईं। तब हर शोकाकुल हो गए -- 'वह मुझे छोड़कर कहाँ चली गई?'

श्लोक 12 (skanda.5.30.12)

स्मरंस्तदेव चेष्टितं तदेव पूर्वभाषितम् । तदैव मे वृथा मतिर्मुदा यदा न मानिता

smaraṁstadeva ceṣṭitaṁ tadeva pūrvabhāṣitam tadaiva me vṛthā matirmudā yadā na mānitā

अपने ही उस व्यवहार और उन्हीं पहले के वचनों का स्मरण करते हुए (उन्होंने सोचा) -- 'तभी मेरी बुद्धि व्यर्थ हो गई, जब हर्षवश मैंने उसका सम्मान नहीं किया।'

श्लोक 13 (skanda.5.30.13)

यतो मया हिमाद्रिजा समस्तलोकसुन्दरी । पुरैव नाभिनंदिता गता विहाय मामिति

yato mayā himādrijā samastalokasundarī puraiva nābhinaṁditā gatā vihāya māmiti

'क्योंकि मैंने हिमालयकन्या को, जो समस्त लोकों में सुन्दरी हैं, पहले उचित सम्मान नहीं दिया, इसीलिए वह मुझे छोड़कर चली गई' -- यह उन्होंने कहा।

श्लोक 14 (skanda.5.30.14)

इतीदमेव सोऽवदद्गतस्त्वद्दर्शनं ततः । प्रियावियोगमीदृशं गुरुं न सोढुमुत्सहे

itīdameva so'vadadgatastvaddarśanaṁ tataḥ priyāviyogamīdṛśaṁ guruṁ na soḍhumutsahe

ऐसा कहते हुए वे उसके बाद तुम्हारी दृष्टि से ओझल हो गए -- 'अपनी प्रिया के इस प्रकार के भारी वियोग को मैं सहन नहीं कर सकता।'

श्लोक 15 (skanda.5.30.15)

ततो जगद्धि संकुलं महाभयेन संयुतम् । सुरासुरा महर्षयः परं विषादमभ्यगुः

tato jagaddhi saṁkulaṁ mahābhayena saṁyutam surāsurā maharṣayaḥ paraṁ viṣādamabhyaguḥ

तब सम्पूर्ण जगत महाभय से युक्त होकर व्याकुल हो गया; देव, दानव और महर्षि परम विषाद को प्राप्त हुए।

श्लोक 16 (skanda.5.30.16)

विहाय मंदिराणि ते परं विषादमागताः । हरस्तुतिं परां च ते प्रचक्रुरद्भुतोपमाः

vihāya maṁdirāṇi te paraṁ viṣādamāgatāḥ harastutiṁ parāṁ ca te pracakruradbhutopamāḥ

अपने-अपने भवन त्यागकर वे परम विषाद में पड़ गए और आश्चर्यचकित होकर हर की परम स्तुति करने लगे।

श्लोक 17 (skanda.5.30.17)

सनत्कुमार उवाच । न दृश्यते यदा देवो रुद्रो बालेंदुशेखरः । नष्टालोकं जगत्सर्वं कांतारमभवत्तदा

sanatkumāra uvāca na dṛśyate yadā devo rudro bāleṁduśekharaḥ naṣṭālokaṁ jagatsarvaṁ kāṁtāramabhavattadā

सनत्कुमार ने कहा -- जब बालचन्द्रशेखर देव रुद्र दिखाई नहीं दिए, तब सम्पूर्ण जगत का प्रकाश नष्ट होकर वह एक भयंकर वन के समान हो गया।

श्लोक 18 (skanda.5.30.18)

त्रीणि नेत्राणि रुद्रस्य यतः सूर्येंदुव ह्नयः । गते रुद्रे न ते भांति जगत्यस्मिंश्चराचरे

trīṇi netrāṇi rudrasya yataḥ sūryeṁduva hnayaḥ gate rudre na te bhāṁti jagatyasmiṁścarācare

रुद्र के तीन नेत्र ही सूर्य, चन्द्र और अग्नि हैं; रुद्र के चले जाने पर वे इस चराचर जगत में नहीं चमकते।

श्लोक 19 (skanda.5.30.19)

ततस्तमसि दुस्तारे संभूते लोमहर्षणे । अन्योन्यं हि न पश्यंति सुरासुरास्तमोवृताः

tatastamasi dustāre saṁbhūte lomaharṣaṇe anyonyaṁ hi na paśyaṁti surāsurāstamovṛtāḥ

तब जब दुस्तर, रोमांचकारी अन्धकार उत्पन्न हुआ, तब देव और दानव, अन्धकार से घिरे हुए, एक-दूसरे को नहीं देख पाए।

श्लोक 20 (skanda.5.30.20)

एषा बुद्धिस्ततस्तेषामुत्पन्ना कार्यसिद्धये । यया बुद्ध्या जगन्नाथो ज्ञायते पार्वतीपतिः

eṣā buddhistatasteṣāmutpannā kāryasiddhaye yayā buddhyā jagannātho jñāyate pārvatīpatiḥ

तब उनके कार्य-सिद्धि हेतु यह विचार उत्पन्न हुआ, जिस बुद्धि से पार्वतीपति जगन्नाथ को जाना जा सके।

श्लोक 21 (skanda.5.30.21)

न ह्यालोको विना तेन शशिसूर्याग्निच क्षुषा । परस्परं ब्रुवंति स्म दुःखितास्ते विसंज्ञया

na hyāloko vinā tena śaśisūryāgnica kṣuṣā parasparaṁ bruvaṁti sma duḥkhitāste visaṁjñayā

क्योंकि चन्द्र, सूर्य और अग्निनेत्र वाले उनके बिना कोई प्रकाश नहीं है। दुःखी और सुधबुध खोए हुए वे एक-दूसरे से कहने लगे --

श्लोक 22 (skanda.5.30.22)

हे देव हे मुने सिद्धे हे ऋषे हे निशाचर । हे दैत्य हे दनुश्रेष्ठ हे मनुष्यनिदेशक

he deva he mune siddhe he ṛṣe he niśācara he daitya he danuśreṣṭha he manuṣyanideśaka

-- 'हे देव! हे मुने! हे सिद्ध! हे ऋषे! हे निशाचर! हे दैत्य! हे दनुश्रेष्ठ! हे मनुष्यों के मार्गदर्शक!

श्लोक 23 (skanda.5.30.23)

गतोऽसि कां दिशं तात को वा लब्धस्त्वया विभो । क्वचिद्विश्रामभूमिस्ते क्वचिदालंबनेऽपि वा

gato'si kāṁ diśaṁ tāta ko vā labdhastvayā vibho kvacidviśrāmabhūmiste kvacidālaṁbane'pi vā

हे तात! आप किस दिशा गए हैं? हे विभो! आपको क्या प्राप्त हुआ है? कहीं आपके लिए विश्राम-स्थल है, या कहीं कोई सहारा है?

श्लोक 24 (skanda.5.30.24)

पाथेयमस्ति किंचित्ते दिशि किं वाथ कुत्रचित् । प्रकाशं वाहनं छत्रमशनं शयनं गृहम्

pātheyamasti kiṁcitte diśi kiṁ vātha kutracit prakāśaṁ vāhanaṁ chatramaśanaṁ śayanaṁ gṛham

क्या आपके पास कोई पाथेय है? क्या कहीं दिशा में प्रकाश, वाहन, छत्र, भोजन, शय्या या घर है?

श्लोक 25 (skanda.5.30.25)

क्वचिद्वासि कथं तोयमथवा चित्तनिर्वृतिः । बन्धुः पुत्रोऽसि वा तात वृक्ष च्छाया सुशीतला

kvacidvāsi kathaṁ toyamathavā cittanirvṛtiḥ bandhuḥ putro'si vā tāta vṛkṣa cchāyā suśītalā

क्या आप कहीं रहते हैं? कैसे जल मिलता है, अथवा चित्त की शांति? हे तात! क्या आपके पास कोई बन्धु, पुत्र, या वृक्ष की शीतल छाया है?

श्लोक 26 (skanda.5.30.26)

एवं प्रकारं करुणं समाभाष्य परस्परम् । भूयश्चिन्तापराः सर्वे देवाश्चेंद्रपुरोगमाः

evaṁ prakāraṁ karuṇaṁ samābhāṣya parasparam bhūyaścintāparāḥ sarve devāśceṁdrapurogamāḥ

इस प्रकार करुणापूर्ण वचन एक-दूसरे से कहते हुए, इन्द्र के नेतृत्व वाले सभी देव पुनः चिंतामग्न हो गए।

श्लोक 27 (skanda.5.30.27)

भूमेर्विवरमाश्रित्य प्राणिनो ये वसंत्यपि । रसातले च दैतेयाः संस्थिताः पन्नगाश्च ये

bhūmervivaramāśritya prāṇino ye vasaṁtyapi rasātale ca daiteyāḥ saṁsthitāḥ pannagāśca ye

पृथ्वी के विवरों में रहने वाले जीव, तथा रसातल में स्थित दैत्य और सर्पगण --

श्लोक 28 (skanda.5.30.28)

न तेषां विद्यते सूर्यो नेन्दुर्नान्ये महाग्रहाः । नाग्निर्देवमुखं विद्युन्नैव तारकको टयः

na teṣāṁ vidyate sūryo nendurnānye mahāgrahāḥ nāgnirdevamukhaṁ vidyunnaiva tārakako ṭayaḥ

-- उनके लिए न सूर्य था, न चन्द्र, न अन्य महाग्रह; न अग्नि, न देवमुख विद्युत, न करोड़ों तारे।

श्लोक 29 (skanda.5.30.29)

केनालोकेन पश्यंति समानि विषमाणि च । नरकस्था नरा लोके न पश्यंत्यन्यलोकगाः

kenālokena paśyaṁti samāni viṣamāṇi ca narakasthā narā loke na paśyaṁtyanyalokagāḥ

किस प्रकाश से वे समतल और विषम भूमि को देखते? नरक में पड़े मनुष्य दूसरे लोकों में जाने वालों को नहीं देख पाते थे।

श्लोक 30 (skanda.5.30.30)

विचरन्तः समं को वा मनो रथशतप्रदः । तृष्णांभः क्षुधितान्नं च श्रांतानामथ वाहनम्

vicarantaḥ samaṁ ko vā mano rathaśatapradaḥ tṛṣṇāṁbhaḥ kṣudhitānnaṁ ca śrāṁtānāmatha vāhanam

समान रूप से विचरण करते हुए कौन सैकड़ों मनोरथ पूर्ण करे? कौन प्यासे को जल, भूखे को अन्न, थके को वाहन दे?

श्लोक 31 (skanda.5.30.31)

समे शय्या जले नौश्च रोगे सत्परिचारकः । श्रेष्ठौषधीभिः सन्मंत्रैः संपदो व्याधिसंकटे

same śayyā jale nauśca roge satparicārakaḥ śreṣṭhauṣadhībhiḥ sanmaṁtraiḥ saṁpado vyādhisaṁkaṭe

कौन समतल भूमि पर शय्या, जल में नौका, रोग में अच्छे परिचारक, व्याधि की विपत्ति में उत्तम औषधि और मन्त्रों की सम्पदा दे?

श्लोक 32 (skanda.5.30.32)

सुहृद्विदेशे च्छायोष्णे निर्धूमः शिशिरे शिखी । महाभये परित्राणं प्रकाशश्च महानिशि

suhṛdvideśe cchāyoṣṇe nirdhūmaḥ śiśire śikhī mahābhaye paritrāṇaṁ prakāśaśca mahāniśi

कौन विदेश में मित्र, धूप में छाया, शीत में धुआँरहित अग्नि, महाभय में रक्षा, और घोर रात्रि में प्रकाश दे?

श्लोक 33 (skanda.5.30.33)

सर्वदश्चैव सर्वेषां मनोरथशतप्रदः । एक एव भवान्द्योतस्त्वां च जानीमहे वयम्

sarvadaścaiva sarveṣāṁ manorathaśatapradaḥ eka eva bhavāndyotastvāṁ ca jānīmahe vayam

हे भगवन्! आप ही सर्वदा सबके सैकड़ों मनोरथ पूर्ण करने वाले हैं; आप ही एकमात्र प्रकाश हैं, हम आपको ऐसा ही जानते हैं।'

श्लोक 34 (skanda.5.30.34)

ब्रुवंत इति ते व्यास शुश्रुवुर्मधुरां गिरम् । श्रुतपूर्वां तमोमध्याद्विष्णोर तुलकर्मणः

bruvaṁta iti te vyāsa śuśruvurmadhurāṁ giram śrutapūrvāṁ tamomadhyādviṣṇora tulakarmaṇaḥ

हे व्यास! ऐसा कहते हुए उन्होंने अन्धकार के बीच से एक मधुर, पहले भी सुनी हुई वाणी सुनी -- वह अतुल कर्मा विष्णु की वाणी थी।

श्लोक 35 (skanda.5.30.35)

न जानंति स्थितः कुत्र भाषते केशवो विभुः । शृणुध्वमिति मे वाक्यं सर्वे चैव समाहिताः

na jānaṁti sthitaḥ kutra bhāṣate keśavo vibhuḥ śṛṇudhvamiti me vākyaṁ sarve caiva samāhitāḥ

वे नहीं जान पाए कि विभु केशव कहाँ खड़े होकर बोल रहे हैं -- 'तुम सब मेरा यह वचन समाहितचित्त होकर सुनो।

श्लोक 36 (skanda.5.30.36)

दानमेकं सदा सम्य क्चिंतामणिसमं स्मृतम् । सर्वेषामेव दानानां दीपदानं प्रशस्यते

dānamekaṁ sadā samya kciṁtāmaṇisamaṁ smṛtam sarveṣāmeva dānānāṁ dīpadānaṁ praśasyate

एक दान सदा ही चिंतामणि के समान सम्यक स्मरण किया जाता है; सभी दानों में दीपदान सबसे श्रेष्ठ माना गया है।

श्लोक 37 (skanda.5.30.37)

तच्च देयमतः सर्वैः शृणुध्वं तत्त्वतो भृशम् । मया रसातले पूर्वं नागा नामनुकंपया

tacca deyamataḥ sarvaiḥ śṛṇudhvaṁ tattvato bhṛśam mayā rasātale pūrvaṁ nāgā nāmanukaṁpayā

अतः वही दान सबके द्वारा दिया जाना चाहिए; ध्यानपूर्वक सुनो। मैंने पूर्वकाल में रसातल में नागों पर अनुकम्पा करते हुए --

श्लोक 38 (skanda.5.30.38)

उत्पादितो दीपवरो येन ध्वस्तमिदं तमः । एवंभूतस्तु वायूनामप्रधृष्यो महाप्रभः

utpādito dīpavaro yena dhvastamidaṁ tamaḥ evaṁbhūtastu vāyūnāmapradhṛṣyo mahāprabhaḥ

-- एक उत्तम दीप उत्पन्न किया, जिससे यह अन्धकार नष्ट हुआ। ऐसा वह दीप वायु से अकम्प्य, महातेजस्वी --

श्लोक 39 (skanda.5.30.39)

निष्कंपो निर्मलो हृद्यः सुस्थिरो भास्करप्रभः । नात्युष्णो नातिशीतश्च देव्या योगसमुद्भवः । तेन दीपप्रकाशेन गोकर्णो निर्वृतिं ययौ

niṣkaṁpo nirmalo hṛdyaḥ susthiro bhāskaraprabhaḥ nātyuṣṇo nātiśītaśca devyā yogasamudbhavaḥ tena dīpaprakāśena gokarṇo nirvṛtiṁ yayau

-- निष्कम्प, निर्मल, हृदयस्पर्शी, अत्यन्त स्थिर, सूर्यसमान तेजस्वी, न अधिक गर्म न अधिक शीतल, देवी की योगशक्ति से उत्पन्न था। उस दीप के प्रकाश से गोकर्ण को शांति प्राप्त हुई।

श्लोक 40 (skanda.5.30.40)

नागाः शेषादयः सर्वे नोद्यमानाश्च संघशः । दीपाद्दीपसहस्राणि ददुस्ते वै शिवाग्रतः

nāgāḥ śeṣādayaḥ sarve nodyamānāśca saṁghaśaḥ dīpāddīpasahasrāṇi daduste vai śivāgrataḥ

शेष आदि समस्त नागगण, समूहों में उल्लसित होकर, उस दीप से सहस्रों दीप जलाकर शिव के समक्ष अर्पित किए।

श्लोक 41 (skanda.5.30.41)

पर्वतेषु समुद्रेषु वनेषूपवनेषु च । नदीतीरेषु सर्वत्र दीपान्प्रज्वाल्य रेमिरे

parvateṣu samudreṣu vaneṣūpavaneṣu ca nadītīreṣu sarvatra dīpānprajvālya remire

पर्वतों पर, समुद्रों में, वनों और उपवनों में, नदी-तटों पर, सर्वत्र दीप जलाकर वे आनन्दित हुए।

श्लोक 42 (skanda.5.30.42)

भुंजानाः पञ्च मूलानि दिव्यानि क्षीरसंयुतम् । परमान्नं च मांसानि मकरंदं घृतौदनम्

bhuṁjānāḥ pañca mūlāni divyāni kṣīrasaṁyutam paramānnaṁ ca māṁsāni makaraṁdaṁ ghṛtaudanam

पाँच प्रकार के दिव्य कन्दमूल दूध सहित, परमान्न, मांस, मकरन्द, घृतयुक्त भात का भोग करते हुए --

श्लोक 43 (skanda.5.30.43)

चन्द्रशालिभवं भक्तं तांबूलं सप्तधा गतम् । मद्यमष्टप्रकारं तु भार्यापीतावशेषकम्

candraśālibhavaṁ bhaktaṁ tāṁbūlaṁ saptadhā gatam madyamaṣṭaprakāraṁ tu bhāryāpītāvaśeṣakam

-- चन्द्रशाली से बना भोजन, सात प्रकार से बना पान, आठ प्रकार की मदिरा, जिसे पहले पत्नियाँ पी लेती थीं --

श्लोक 44 (skanda.5.30.44)

शयनेषु महार्हेषु हृद्यासु वनराजिषु । वृक्षमूलेषु सर्वेषु वनच्छायोपशोभिषु

śayaneṣu mahārheṣu hṛdyāsu vanarājiṣu vṛkṣamūleṣu sarveṣu vanacchāyopaśobhiṣu

-- बहुमूल्य शय्याओं पर, हृदयहारी वनपंक्तियों में, वनछाया से सुशोभित समस्त वृक्षों के मूल में --

श्लोक 45 (skanda.5.30.45)

रमन्ते स्म च ते सर्वे ह्युद्वेष्टंतः परस्परम् । कामतन्त्रोपदिष्टैस्तु शास्त्रैश्च चुंबनादिभिः

ramante sma ca te sarve hyudveṣṭaṁtaḥ parasparam kāmatantropadiṣṭaistu śāstraiśca cuṁbanādibhiḥ

-- वे सब एक-दूसरे का आलिंगन करते हुए, कामशास्त्र में बताए चुम्बन आदि से क्रीड़ा करने लगे।

श्लोक 46 (skanda.5.30.46)

सूर्यतापभयान्मुक्ताश्चंद्ररश्मिभयाच्च ते । विमुक्ताश्च भयाद्धोरात्पिपीलिकोद्भवात्तथा

sūryatāpabhayānmuktāścaṁdraraśmibhayācca te vimuktāśca bhayāddhorātpipīlikodbhavāttathā

वे सूर्य के ताप के भय से मुक्त थे, चन्द्र-किरणों के भय से भी मुक्त, और भयंकर चींटियों से उत्पन्न भय से भी मुक्त थे --

श्लोक 47 (skanda.5.30.47)

सूर्यतापेन दाहः स्याच्छीतं चंद्रमरीचिभिः । मयूरनकुलाद्यैश्च पिपीलीमरणाद्भयम्

sūryatāpena dāhaḥ syācchītaṁ caṁdramarīcibhiḥ mayūranakulādyaiśca pipīlīmaraṇādbhayam

-- (सामान्यतः तो) सूर्यताप से दाह, चन्द्रकिरणों से शीत, और मयूर-नकुल आदि तथा चींटियों से मृत्यु का भय होता है।

श्लोक 48 (skanda.5.30.48)

सौवर्णान्दीपका न्कृत्वा द्विजेभ्यस्ते ददुः पुनः । तेन पातालमाश्रित्य कृत्वा भोगवतीं पुरीम्

sauvarṇāndīpakā nkṛtvā dvijebhyaste daduḥ punaḥ tena pātālamāśritya kṛtvā bhogavatīṁ purīm

स्वर्ण के दीपक बनाकर उन्होंने पुनः द्विजों को दिए। इस प्रकार पाताल में आश्रय लेकर, भोगवती नगरी बसाकर --

श्लोक 49 (skanda.5.30.49)

वसंति सुखिनस्तत्र स्वर्गादष्टगुणैः सुखैः । एवमंधं तमो देवाः पातालाद्दीपतो गतम्

vasaṁti sukhinastatra svargādaṣṭaguṇaiḥ sukhaiḥ evamaṁdhaṁ tamo devāḥ pātālāddīpato gatam

-- वे वहाँ स्वर्ग से आठगुने सुखों के साथ सुखपूर्वक निवास करते हैं। हे देवो! इस प्रकार वह अंध अन्धकार दीप के द्वारा पाताल से दूर हुआ।

श्लोक 50 (skanda.5.30.50)

एतद्गुह्यं मया ख्यातं भवतां चानुकम्पया । दीपदानमतोयूयं कुरुध्वं सुसमाहिताः

etadguhyaṁ mayā khyātaṁ bhavatāṁ cānukampayā dīpadānamatoyūyaṁ kurudhvaṁ susamāhitāḥ

यह रहस्य मैंने तुम्हारे प्रति अनुकम्पावश प्रकट किया है; अतः तुम सब समाहितचित्त होकर दीपदान करो।

श्लोक 51 (skanda.5.30.51)

दीपाग्निना विना नैव तमोदारु प्रदह्यते । नारायणपरा देवा निशम्याथ समाहिताः

dīpāgninā vinā naiva tamodāru pradahyate nārāyaṇaparā devā niśamyātha samāhitāḥ

दीप की अग्नि के बिना अन्धकाररूपी काष्ठ कभी नहीं जलता।' यह सुनकर नारायणपरायण देव समाहितचित्त होकर --

श्लोक 52 (skanda.5.30.52)

पप्रच्छुस्ते पुनः सर्वे हृष्टा दामोदरं विभुम् । ब्रूहि नोग्निं जगन्नाथ स दीपो येन जायते

papracchuste punaḥ sarve hṛṣṭā dāmodaraṁ vibhum brūhi nogniṁ jagannātha sa dīpo yena jāyate

-- हर्षित होकर विभु दामोदर से पुनः पूछने लगे -- 'हे जगन्नाथ! हमें वह अग्नि बताइए, जिससे वह दीप बनता है।

श्लोक 53 (skanda.5.30.53)

घोरे तमसि वै मग्ना नाग्निं जानीमहे वयम् । देवानां मानसो वह्निरथ कृष्णेन कीर्तितः

ghore tamasi vai magnā nāgniṁ jānīmahe vayam devānāṁ mānaso vahniratha kṛṣṇena kīrtitaḥ

हम तो घोर अन्धकार में डूबे हुए हैं, हमें कोई अग्नि ज्ञात नहीं।' तब कृष्ण ने देवताओं के मन में स्थित अग्नि का वर्णन किया।

श्लोक 54 (skanda.5.30.54)

तेन दीपं प्रतिज्वाल्य देवाः शिवपरायणाः । ददुस्ते शिवमुद्दिश्य सर्वाभीष्टफलप्रदम्

tena dīpaṁ pratijvālya devāḥ śivaparāyaṇāḥ daduste śivamuddiśya sarvābhīṣṭaphalapradam

उससे दीप प्रज्वलित कर शिवपरायण देवों ने शिव को उद्दिष्ट कर वह दीप अर्पित किया, जो सर्वाभीष्ट फल देने वाला है।

श्लोक 55 (skanda.5.30.55)

दत्ते दीपे ततो देवैर्दृष्टो हृष्टो महेश्वरः । तिमिरं तद्गतं चापि जगद्येन जडीकृतम्

datte dīpe tato devairdṛṣṭo hṛṣṭo maheśvaraḥ timiraṁ tadgataṁ cāpi jagadyena jaḍīkṛtam

देवों द्वारा दीप अर्पित किए जाने पर हर्षित महेश्वर के दर्शन हुए; और जिस अन्धकार से जगत जड़ीभूत हो गया था, वह भी दूर हो गया।

श्लोक 56 (skanda.5.30.56)

ततो देवाः सुखं प्रापुः स्वर्गे सेन्द्रपुरोगमाः । राज्यं भोगान्वितं प्राप्य सार्धं स्त्रीभिश्च रेमिरे

tato devāḥ sukhaṁ prāpuḥ svarge sendrapurogamāḥ rājyaṁ bhogānvitaṁ prāpya sārdhaṁ strībhiśca remire

तब इन्द्र सहित देवगणों ने स्वर्ग में सुख प्राप्त किया; भोगयुक्त राज्य पाकर वे अपनी पत्नियों सहित आनन्दित हुए।

श्लोक 57 (skanda.5.30.57)

दीपदानफलं ज्ञात्वा दैतेयाश्चापि विस्मिताः । तथैव तत्फलं ज्ञात्वा व्यास यक्षाश्च विस्मिताः

dīpadānaphalaṁ jñātvā daiteyāścāpi vismitāḥ tathaiva tatphalaṁ jñātvā vyāsa yakṣāśca vismitāḥ

दीपदान का फल जानकर दैत्य भी विस्मित हुए; हे व्यास! उसी प्रकार वह फल जानकर यक्ष भी विस्मित हो गए।

श्लोक 58 (skanda.5.30.58)

पूजयित्वा महादेवं पुष्पैश्च निर्मलैर्जलैः । ददुर्दीप सहस्राणि सर्वे शिवपरायणाः

pūjayitvā mahādevaṁ puṣpaiśca nirmalairjalaiḥ dadurdīpa sahasrāṇi sarve śivaparāyaṇāḥ

पुष्पों और निर्मल जल से महादेव का पूजन कर, शिवपरायण होकर सभी ने सहस्रों दीप अर्पित किए।

श्लोक 59 (skanda.5.30.59)

स्वस्थाने चाभवन्सर्वे दीपदानाच्च शोभनाः । स्वेच्छया भुंजते भोगान्बन्धुभृत्यादिसंयुताः

svasthāne cābhavansarve dīpadānācca śobhanāḥ svecchayā bhuṁjate bhogānbandhubhṛtyādisaṁyutāḥ

दीपदान से शोभित होकर वे सब अपने-अपने स्थान पर लौट गए; वे इच्छानुसार बन्धु-भृत्यों सहित भोगों का उपभोग करते हैं।

श्लोक 60 (skanda.5.30.60)

निराहारास्ततो व्यास पिशाचा वै निराश्रयाः । दीपदानफलं ज्ञात्वा सर्वे तेऽतीव विस्मिताः

nirāhārāstato vyāsa piśācā vai nirāśrayāḥ dīpadānaphalaṁ jñātvā sarve te'tīva vismitāḥ

हे व्यास! निराहार और निराश्रय पिशाच भी दीपदान का फल जानकर सभी अत्यन्त विस्मित हुए।

श्लोक 61 (skanda.5.30.61)

चंडालादग्निमानीय ददुर्दीपं शिवे रताः ।। । । दीपदानफलं ते वै पुत्रदारसमन्विताः

caṁḍālādagnimānīya dadurdīpaṁ śive ratāḥ dīpadānaphalaṁ te vai putradārasamanvitāḥ

चाण्डाल से अग्नि लाकर, शिव में अनुरक्त होकर उन्होंने दीप अर्पित किया; दीपदान के फल से वे पुत्र-पत्नी सहित (सुखी) हुए।

श्लोक 62 (skanda.5.30.62)

लीढमन्नं गतरसं पूति पर्युषितं तथा । उच्छिष्टं सूतिकास्पृष्टं न मेध्यं चातिलंघितम्

līḍhamannaṁ gatarasaṁ pūti paryuṣitaṁ tathā ucchiṣṭaṁ sūtikāspṛṣṭaṁ na medhyaṁ cātilaṁghitam

जो पहले चाटा हुआ, स्वादहीन, दुर्गन्धित, बासी, जूठा, प्रसूता-स्पर्शित, अपवित्र और अत्यन्त अनुचित काल का अन्न ग्रहण करते थे --

श्लोक 63 (skanda.5.30.63)

भुंजानास्ते सदा हृष्टा रमंते दुष्टभूमिषु । विद्याधरास्तथा मर्त्याः सिद्धाश्च शिवमानसाः

bhuṁjānāste sadā hṛṣṭā ramaṁte duṣṭabhūmiṣu vidyādharāstathā martyāḥ siddhāśca śivamānasāḥ

-- वे अब सदा हर्षित होकर भोग करते हुए दुष्ट भूमियों में भी आनन्दित होते हैं। विद्याधर, मनुष्य और शिव-मन वाले सिद्धगण --

श्लोक 64 (skanda.5.30.64)

दीपदानफलं ज्ञात्वा ददुर्दीपं शिवाग्रतः । दीपदानात्ततः सर्वे सर्वभोगसमन्विताः

dīpadānaphalaṁ jñātvā dadurdīpaṁ śivāgrataḥ dīpadānāttataḥ sarve sarvabhogasamanvitāḥ

-- दीपदान का फल जानकर शिव के समक्ष दीप अर्पित करते हैं; तत्पश्चात् दीपदान से सभी सर्वभोगों से युक्त होकर --

श्लोक 65 (skanda.5.30.65)

स्थानेषु मुदितास्तेषु रमंते सुखिनस्तदा । तिमिरं तद्गतं चैव व्यास लोकेषु दीपतः

sthāneṣu muditāsteṣu ramaṁte sukhinastadā timiraṁ tadgataṁ caiva vyāsa lokeṣu dīpataḥ

-- अपने-अपने स्थानों में हर्षित सुखी होकर आनन्दित होते हैं। हे व्यास! इस प्रकार लोकों से वह अन्धकार दीप द्वारा दूर हो गया।

श्लोक 66 (skanda.5.30.66)

ततो घोरं स्थितं सम्यक्प्रेतलोकेषु सर्वदा । प्रेतलोकं तदा दृष्ट्वा घोरेण तमसा वृताः

tato ghoraṁ sthitaṁ samyakpretalokeṣu sarvadā pretalokaṁ tadā dṛṣṭvā ghoreṇa tamasā vṛtāḥ

तब यह प्रेतलोकों में सदा घोर रूप से पूर्णतः बना रहा। तब उस घोर अन्धकार से आवृत प्रेतलोक को देखकर --

श्लोक 67 (skanda.5.30.67)

दामोदरं जगन्नाथमूचुः सर्वे सुरोत्तमाः । घोरं चैव तमो हत्वा प्रसन्नास्ते सदा विभो

dāmodaraṁ jagannāthamūcuḥ sarve surottamāḥ ghoraṁ caiva tamo hatvā prasannāste sadā vibho

-- सभी श्रेष्ठ देव जगन्नाथ दामोदर से बोले -- 'हे विभो! घोर अन्धकार को नष्ट कर हम सदा प्रसन्न हैं --

श्लोक 68 (skanda.5.30.68)

गंधर्वाश्च तथा यक्षाः सिद्धा विद्याधरोरगाः । वयं चैव तथा मर्त्याः सर्वभोगैश्च संयुताः

gaṁdharvāśca tathā yakṣāḥ siddhā vidyādharoragāḥ vayaṁ caiva tathā martyāḥ sarvabhogaiśca saṁyutāḥ

-- गंधर्व, यक्ष, सिद्ध, विद्याधर, नाग, और हम तथा मनुष्य भी सर्वभोगों से युक्त होकर --

श्लोक 69 (skanda.5.30.69)

स्थानेषु च सदा ह्येषु सुखिनश्च रमामहे । प्रेतलोके नरा ये वै घोरेण तमसा वृताः

sthāneṣu ca sadā hyeṣu sukhinaśca ramāmahe pretaloke narā ye vai ghoreṇa tamasā vṛtāḥ

-- अपने-अपने स्थानों में सदा सुखी होकर आनन्दित होते हैं। परन्तु जो मनुष्य प्रेतलोक में घोर अन्धकार से आवृत हैं --

श्लोक 70 (skanda.5.30.70)

वसंति च जगन्नाथ वर्तंते तेऽतिदुःखिताः । यैर्नो कृतं हि तत्कर्म कृष्णालं पापमोहितैः

vasaṁti ca jagannātha vartaṁte te'tiduḥkhitāḥ yairno kṛtaṁ hi tatkarma kṛṣṇālaṁ pāpamohitaiḥ

-- हे जगन्नाथ! वे वहाँ रहते हुए अत्यन्त दुःखी हैं -- क्योंकि हमने अपने कृष्णवर्ण पाप से मोहित उनके लिए वह (दीपदान) कर्म नहीं किया।

श्लोक 71 (skanda.5.30.71)

न तेषां विद्यते किंचिद्यत्प्रकाशं करोति च । घोरे तमसि ते मग्नास्तत्र नार्केन्दुवह्नयः

na teṣāṁ vidyate kiṁcidyatprakāśaṁ karoti ca ghore tamasi te magnāstatra nārkenduvahnayaḥ

उनके लिए कुछ भी ऐसा नहीं है जो प्रकाश करे; घोर अन्धकार में डूबे उनके लिए न सूर्य, न चन्द्र, न अग्नि है।

श्लोक 72 (skanda.5.30.72)

न सहायो न जायेयं नालंबो न च देशिकाः । न वाहनं न शय्या च केवलं तु महत्तमः

na sahāyo na jāyeyaṁ nālaṁbo na ca deśikāḥ na vāhanaṁ na śayyā ca kevalaṁ tu mahattamaḥ

न सहायक, न पत्नी, न सहारा, न मार्गदर्शक, न वाहन, न शय्या -- केवल घोरतम अन्धकार ही है।

श्लोक 73 (skanda.5.30.73)

तत्राष्टाविंशतिः ख्याता घोरा नरककोटयः । तमोमयाश्च ताः सर्वाः पापिनां भयदाः सदा

tatrāṣṭāviṁśatiḥ khyātā ghorā narakakoṭayaḥ tamomayāśca tāḥ sarvāḥ pāpināṁ bhayadāḥ sadā

वहाँ अट्ठाईस करोड़ भयंकर नरक विख्यात हैं; वे सभी अन्धकारमय, पापियों के लिए सदा भयदायक हैं।

श्लोक 74 (skanda.5.30.74)

सुखं तत्र कथं कृष्ण लभंते दुःखिता नराः । दारिद्र्यदुःखरोगैश्च मायामोहैश्च सर्वदा

sukhaṁ tatra kathaṁ kṛṣṇa labhaṁte duḥkhitā narāḥ dāridryaduḥkharogaiśca māyāmohaiśca sarvadā

हे कृष्ण! वे दुःखी मनुष्य वहाँ सुख कैसे पाएँ, जो सदा दरिद्रता, दुःख, रोग, माया और मोह से घिरे रहते हैं?

श्लोक 75 (skanda.5.30.75)

सनत्कुमार उवाच । इति श्रुत्वा तु देवानां प्रार्थनां गरुड ध्वजः । उवाच वचनं हृद्यं मनोरथफलप्रदम्

sanatkumāra uvāca iti śrutvā tu devānāṁ prārthanāṁ garuḍa dhvajaḥ uvāca vacanaṁ hṛdyaṁ manorathaphalapradam

सनत्कुमार ने कहा -- देवताओं की यह प्रार्थना सुनकर गरुड़ध्वज ने मनोरथ पूर्ण करने वाला हृदयस्पर्शी वचन कहा --

श्लोक 76 (skanda.5.30.76)

शृणुध्वं त्रिदशाः सर्वे यत्प्रवक्ष्यामि वो वचः

śṛṇudhvaṁ tridaśāḥ sarve yatpravakṣyāmi vo vacaḥ

-- 'हे त्रिदशो! तुम सब मेरा जो वचन मैं कहूँगा, उसे सुनो।

श्लोक 77 (skanda.5.30.77)

अवंत्यां वर्तते तीर्थं सद्यः पापहरं परम् । अनरकाख्यं महापुण्यं सर्वतीर्थोत्तमोत्तमम्

avaṁtyāṁ vartate tīrthaṁ sadyaḥ pāpaharaṁ param anarakākhyaṁ mahāpuṇyaṁ sarvatīrthottamottamam

अवन्ती में तत्काल पापहर, परम, अनरक नामक महापुण्य तीर्थ है, जो समस्त तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ है।

श्लोक 78 (skanda.5.30.78)

कार्तिकस्यासिते पक्षे चतुर्दश्यां समाहितः । तत्र स्नात्वा नरो यस्तु यमध्यानपरायणः

kārtikasyāsite pakṣe caturdaśyāṁ samāhitaḥ tatra snātvā naro yastu yamadhyānaparāyaṇaḥ

कार्तिक कृष्णपक्ष चतुर्दशी को समाहितचित्त होकर जो मनुष्य वहाँ स्नान करता है, यमराज के ध्यान में तत्पर होकर --

श्लोक 79 (skanda.5.30.79)

संगृह्य वै तिलान्कृष्णान्पितृभक्तो जितेंद्रियः । दक्षिणाभिमुखो भूत्वा मध्याह्ने सुरसत्तमाः

saṁgṛhya vai tilānkṛṣṇānpitṛbhakto jiteṁdriyaḥ dakṣiṇābhimukho bhūtvā madhyāhne surasattamāḥ

-- काले तिल एकत्र कर, पितृभक्त और इन्द्रियसंयमी होकर, दक्षिणाभिमुख होकर, मध्याह्न में, हे देवश्रेष्ठो! --

श्लोक 80 (skanda.5.30.80)

अपसव्यं तथा कृत्वा मंत्रैः संतर्प येद्यमम् । यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चांतकाय च

apasavyaṁ tathā kṛtvā maṁtraiḥ saṁtarpa yedyamam yamāya dharmarājāya mṛtyave cāṁtakāya ca

-- अपसव्य क्रिया करते हुए मन्त्रों से यमराज को तर्पित करे -- यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक के लिए --

श्लोक 81 (skanda.5.30.81)

वैवस्वताय कालाय दक्षाय मनवे तथा । कृष्णाय कृष्णगुप्ताय प्रेतलोकपराय च

vaivasvatāya kālāya dakṣāya manave tathā kṛṣṇāya kṛṣṇaguptāya pretalokaparāya ca

-- वैवस्वत, काल, दक्ष, मनु के लिए भी; कृष्ण, कृष्णगुप्त, प्रेतलोकपति के लिए --

श्लोक 82 (skanda.5.30.82)

हरये रविपुत्राय कालिंदीसोदराय च । तथा वै श्राद्धदेवाय पितृणां पतये तथा

haraye raviputrāya kāliṁdīsodarāya ca tathā vai śrāddhadevāya pitṛṇāṁ pataye tathā

-- हरि, सूर्यपुत्र, कालिन्दी के भ्राता के लिए भी; तथा श्राद्धदेव, पितरों के स्वामी के लिए भी --

श्लोक 83 (skanda.5.30.83)

मंत्रैरेभिर्नमःप्रोक्तैरोंकाराद्यैः सुशोभनैः । जलांजलिं सदर्भं वै दद्याच्च तिलसंयुतम्

maṁtrairebhirnamaḥproktairoṁkārādyaiḥ suśobhanaiḥ jalāṁjaliṁ sadarbhaṁ vai dadyācca tilasaṁyutam

-- इन ओंकारादि नमस्कारपूर्वक शोभित मन्त्रों से, तिल-सहित, दर्भ-सहित जलांजलि देनी चाहिए।

श्लोक 84 (skanda.5.30.84)

संतर्पयेद्यमं देवं तिलपात्रं समाहितः । प्राज्ञो विप्राय वै दद्याद्वित्तशाठ्यविवर्जितः

saṁtarpayedyamaṁ devaṁ tilapātraṁ samāhitaḥ prājño viprāya vai dadyādvittaśāṭhyavivarjitaḥ

समाहितचित्त होकर तिल-पात्र से देव यमराज को तर्पित करना चाहिए; विवेकी मनुष्य को धन की कृपणता त्यागकर वह ब्राह्मण को देना चाहिए।

श्लोक 85 (skanda.5.30.85)

अनेन विधिना यस्तु संतर्पयेद्यमं विभुम् । पितरस्तस्य मुच्यंते निरये ये गता अपि

anena vidhinā yastu saṁtarpayedyamaṁ vibhum pitarastasya mucyaṁte niraye ye gatā api

इस विधि से जो विभु यमराज को तर्पित करता है, उसके पितर, नरक में गए हुए भी, मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 86 (skanda.5.30.86)

रात्रिं तत्राथ संप्राप्य मानवः कामसंयुतः । नमः पितृभ्यः प्रेतेभ्यो नमो धर्माय विष्णवे

rātriṁ tatrātha saṁprāpya mānavaḥ kāmasaṁyutaḥ namaḥ pitṛbhyaḥ pretebhyo namo dharmāya viṣṇave

उस रात्रि को प्राप्त कर, कामनायुक्त मनुष्य -- 'पितरों को नमस्कार, प्रेतों को नमस्कार, धर्म और विष्णु को नमस्कार --

श्लोक 87 (skanda.5.30.87)

नमः सूर्याय रुद्राय कालांतपतये नमः । एभिर्मंत्रैर्यमे दीपं यो दद्याद्धृतपूरितम्

namaḥ sūryāya rudrāya kālāṁtapataye namaḥ ebhirmaṁtrairyame dīpaṁ yo dadyāddhṛtapūritam

-- सूर्य, रुद्र को नमस्कार, काल और अन्त के स्वामी को नमस्कार' -- इन मन्त्रों से यमराज को घी से भरा दीप जो देता है --

श्लोक 88 (skanda.5.30.88)

कार्तिकं हि समग्रं तु वर्धंते तस्य संपदः । संपूर्णे कार्तिके चैव दीपोद्यापनमाचरेत्

kārtikaṁ hi samagraṁ tu vardhaṁte tasya saṁpadaḥ saṁpūrṇe kārtike caiva dīpodyāpanamācaret

-- उसकी सम्पत्ति सम्पूर्ण कार्तिक मास में बढ़ती है। कार्तिक पूर्ण होने पर दीप का उद्यापन करना चाहिए।

श्लोक 89 (skanda.5.30.89)

दिवाकराह्नेऽस्तमिते च सूर्ये दीपस्य वर्त्तिं पुरुष प्रमाणाम् । यूपाकृतौ दारुमये करोति यया च धीमान्यमभक्तिचित्तः

divākarāhne'stamite ca sūrye dīpasya varttiṁ puruṣa pramāṇām yūpākṛtau dārumaye karoti yayā ca dhīmānyamabhakticittaḥ

दिन के अस्त होने पर, सूर्यास्त पर, यम-भक्ति में तत्पर मन वाला विवेकी मनुष्य, यूप के आकार की काष्ठ-रचना पर पुरुष-प्रमाण की दीप-बत्ती बनाए --

श्लोक 90 (skanda.5.30.90)

निक्षिप्य भूमावथ हस्तमात्रं मूर्ध्नि द्विहस्ताष्टदलान्वितस्य । धार्याश्चतस्रः शुभपट्टिकाश्च च्छिद्रेण युक्ताश्चतुरंगुलेन

nikṣipya bhūmāvatha hastamātraṁ mūrdhni dvihastāṣṭadalānvitasya dhāryāścatasraḥ śubhapaṭṭikāśca cchidreṇa yuktāścaturaṁgulena

-- भूमि पर एक हाथ रखकर, शीर्ष पर दो हाथ के आठ-दल कमल सहित; चार शुभ पट्टिकाएँ चार अंगुल के छिद्र सहित धारण करनी चाहिए।

श्लोक 91 (skanda.5.30.91)

तत्कर्णिकायां तु महाप्रकाशो देयो हि दीपः परया च भक्त्या । उदङ्मुखान्दीपवरांस्त थाष्टौ दलेषु तस्या घृतपूर्यमाणाः

tatkarṇikāyāṁ tu mahāprakāśo deyo hi dīpaḥ parayā ca bhaktyā udaṅmukhāndīpavarāṁsta thāṣṭau daleṣu tasyā ghṛtapūryamāṇāḥ

उसके कर्णिका (मध्य भाग) में परम भक्ति से महाप्रकाशमान दीप देना चाहिए; तथा दलों पर उत्तराभिमुख आठ उत्तम घृत-पूरित दीप भी।

श्लोक 92 (skanda.5.30.92)

अनंगलग्नं धवलं च वस्त्रं नवं सुरक्तं ह्यथवा सुशुक्लम् । वर्त्यां प्रदेयं च स्वके च दद्यात्स्निग्धे त्वखण्डे सुसमे प्रशस्ते

anaṁgalagnaṁ dhavalaṁ ca vastraṁ navaṁ suraktaṁ hyathavā suśuklam vartyāṁ pradeyaṁ ca svake ca dadyātsnigdhe tvakhaṇḍe susame praśaste

बिना सिलाई का श्वेत, नया, सुरक्त अथवा शुद्ध श्वेत वस्त्र; उसी की स्नेहयुक्त, अखण्ड, सम, प्रशस्त बत्ती अपने ही (दीप में) देनी चाहिए।

श्लोक 93 (skanda.5.30.93)

तच्छालिपिष्टोपरि संनिधाय यथा न निर्याति न कंपते च । सर्वं प्रकुर्यात्त्रिगुणप्रमाणं मध्यस्थितस्तस्य च दीपराजः

tacchālipiṣṭopari saṁnidhāya yathā na niryāti na kaṁpate ca sarvaṁ prakuryāttriguṇapramāṇaṁ madhyasthitastasya ca dīparājaḥ

उसे चावल के आटे के आधार पर इस प्रकार रखना चाहिए कि वह न खिसके, न काँपे; सब कुछ तिगुने प्रमाण में करना चाहिए, और मध्य में स्थित दीपराज हो।

श्लोक 94 (skanda.5.30.94)

दलेषु शोभार्थमतीव कुर्यान्मनोरथप्रत्युपलब्धये च । घंटाष्टकं लंबितपुष्पदाम सवस्त्रशोभान्वितमंत्र कार्यम्

daleṣu śobhārthamatīva kuryānmanorathapratyupalabdhaye ca ghaṁṭāṣṭakaṁ laṁbitapuṣpadāma savastraśobhānvitamaṁtra kāryam

दलों पर शोभा और मनोरथ-सिद्धि के लिए, वस्त्र और लटकती पुष्पमालाओं से सुशोभित आठ घंटियाँ, विधिवत मन्त्रों सहित लगानी चाहिए।

श्लोक 95 (skanda.5.30.95)

संलिप्य भूमिं त्वथ गोमयेन पुनः सुगंधेन जलेन लिप्त्वा । कुर्याद्विचित्रं त्वथ मंडले च दलाष्टकं वै कमलं च रम्यम्

saṁlipya bhūmiṁ tvatha gomayena punaḥ sugaṁdhena jalena liptvā kuryādvicitraṁ tvatha maṁḍale ca dalāṣṭakaṁ vai kamalaṁ ca ramyam

गोबर से भूमि लीपकर, फिर सुगन्धित जल से लीपकर, उस मंडल पर विचित्र आठ-दल वाला रमणीय कमल बनाना चाहिए।

श्लोक 96 (skanda.5.30.96)

ततो जलं शीतलमानयित्वा आपूर्य चाष्टौ कलशांस्तु रम्यान् । निधाय मूर्ध्नि क्रमशो हि धीमान्फलानि मूलानि तथेक्षुकानि

tato jalaṁ śītalamānayitvā āpūrya cāṣṭau kalaśāṁstu ramyān nidhāya mūrdhni kramaśo hi dhīmānphalāni mūlāni tathekṣukāni

फिर शीतल जल लाकर आठ रमणीय कलश भरकर, विवेकी पुरुष उन्हें शीर्ष पर क्रमशः रखकर, फल, मूल और गन्ने भी --

श्लोक 97 (skanda.5.30.97)

मध्वाज्ययुक्ता दधिदुग्धपूर्णा नैर्ऋत्यकोणादथ दक्षिणांतम् । धर्माय दद्यादथ शंकराय दामोदरायाप्यथ वेधसे च

madhvājyayuktā dadhidugdhapūrṇā nairṛtyakoṇādatha dakṣiṇāṁtam dharmāya dadyādatha śaṁkarāya dāmodarāyāpyatha vedhase ca

-- मधु-घृतयुक्त, दही-दूध से पूर्ण, नैऋत्य कोण से दक्षिण तक धर्म को, शंकर को, दामोदर को और विधाता को अर्पित करने चाहिए --

श्लोक 98 (skanda.5.30.98)

प्रजापतिभ्यः क्रमशो हि भक्त्या प्रेतेभ्य इंद्राय तथा पितृभ्यः । होमादिपात्रं तिलचूर्णमेव दद्याद्द्विजानां च सदक्षिणं च

prajāpatibhyaḥ kramaśo hi bhaktyā pretebhya iṁdrāya tathā pitṛbhyaḥ homādipātraṁ tilacūrṇameva dadyāddvijānāṁ ca sadakṣiṇaṁ ca

-- क्रमशः भक्तिपूर्वक प्रजापतियों, प्रेतों, इन्द्र, तथा पितरों को; तिलचूर्ण से भरा हवन-पात्र भी दक्षिणा सहित ब्राह्मणों को देना चाहिए।

श्लोक 99 (skanda.5.30.99)

गावो हिरण्यं रजतं च वस्त्रं फलानि मूलानि यवाश्च धान्यम् । गृहं रथं कुंजरमश्वमेव मनोज्ञमन्यं हृदयप्रियं यत्

gāvo hiraṇyaṁ rajataṁ ca vastraṁ phalāni mūlāni yavāśca dhānyam gṛhaṁ rathaṁ kuṁjaramaśvameva manojñamanyaṁ hṛdayapriyaṁ yat

गौएँ, स्वर्ण, चाँदी, वस्त्र, फल, मूल, जौ और धान्य; घर, रथ, हाथी, घोड़ा, अथवा हृदय को प्रिय अन्य कोई मनोहर वस्तु --

श्लोक 100 (skanda.5.30.100)

विद्याधिकेभ्यो द्विजसत्तमेभ्यः पौराणिकेभ्यश्च तथा द्विजेभ्यः । एकैकसु प्रीणनमत्र कुर्याद्दीपैर्दलस्थैश्च यमादिकानाम्

vidyādhikebhyo dvijasattamebhyaḥ paurāṇikebhyaśca tathā dvijebhyaḥ ekaikasu prīṇanamatra kuryāddīpairdalasthaiśca yamādikānām

-- यह विद्वान, श्रेष्ठ, पुराणज्ञ द्विजों को दिया जाए। यमादि प्रत्येक देवता की, दलों पर स्थित दीपों से यहाँ अलग-अलग प्रसन्नता करनी चाहिए।

श्लोक 101 (skanda.5.30.101)

धर्माय देयस्त्वथ मध्यदीप आज्ञां च लब्ध्वा व्रतदेशिकस्य । नृत्येन गीतेन सुशोभने न युक्तं सुवाद्येन च कारयेच्च

dharmāya deyastvatha madhyadīpa ājñāṁ ca labdhvā vratadeśikasya nṛtyena gītena suśobhane na yuktaṁ suvādyena ca kārayecca

मध्य का दीप धर्म को देना चाहिए; व्रत के आचार्य की अनुमति प्राप्त कर, नृत्य, सुन्दर गीत और उत्तम वाद्य सहित यह कराना चाहिए।

श्लोक 102 (skanda.5.30.102)

एतत्समग्रं विधिवच्च कुर्यात्सशक्तिमादौ स्वधनं समीक्ष्य । आहूय विप्राञ्छुभभावयुक्तान्वदेच्च धीमान्परया च भक्त्या

etatsamagraṁ vidhivacca kuryātsaśaktimādau svadhanaṁ samīkṣya āhūya viprāñchubhabhāvayuktānvadecca dhīmānparayā ca bhaktyā

यह सब विधिपूर्वक अपनी सामर्थ्य के अनुसार, पहले अपने धन का आकलन कर करना चाहिए; शुभभाव युक्त ब्राह्मणों को बुलाकर विवेकी पुरुष परम भक्ति से यह कहे --

श्लोक 103 (skanda.5.30.103)

दीपान्समग्रान्नव वर्जयित्वा सर्वं नयेयुः स्थितमत्र विप्राः । प्रदक्षिणीकृत्य विसृज्य विप्रांस्ततो भवद्वै स च नक्तभोजी

dīpānsamagrānnava varjayitvā sarvaṁ nayeyuḥ sthitamatra viprāḥ pradakṣiṇīkṛtya visṛjya viprāṁstato bhavadvai sa ca naktabhojī

नौ दीपों को छोड़कर शेष सभी दीप वहाँ उपस्थित ब्राह्मण ले जाएँ। प्रदक्षिणा कर, ब्राह्मणों को विदा कर, तत्पश्चात् वह (यजमान) रात्रि में ही भोजन करने वाला बने।

श्लोक 104 (skanda.5.30.104)

एवं कृते नागलोकाद्विशिष्टं सुखं भवेत्प्रेतलोकेस्थितानाम्

evaṁ kṛte nāgalokādviśiṣṭaṁ sukhaṁ bhavetpretalokesthitānām

ऐसा करने पर प्रेतलोक में स्थित जनों को नागलोक से भी विशिष्ट सुख प्राप्त होता है।

श्लोक 105 (skanda.5.30.105)

एवं ह्यनरके व्यास दीपदानं करोति यः । तस्यैव यत्फलं प्रोक्तं तदिहैकमनाः शृणु

evaṁ hyanarake vyāsa dīpadānaṁ karoti yaḥ tasyaiva yatphalaṁ proktaṁ tadihaikamanāḥ śṛṇu

हे व्यास! इस प्रकार अनरक में जो दीपदान करता है, उसका जो फल कहा गया है, वह एकाग्रचित्त होकर यहाँ सुनो।

श्लोक 106 (skanda.5.30.106)

विमानैः कामिकैर्दिव्यैरप्सरोगणसेवितैः । उह्यमानो दिवं याति यावच्चंद्रदिवाकरौ

vimānaiḥ kāmikairdivyairapsarogaṇasevitaiḥ uhyamāno divaṁ yāti yāvaccaṁdradivākarau

अप्सराओं के समूह से सेवित, कामनापूर्ण दिव्य विमानों से वहन होकर वह चन्द्र-सूर्य के रहने तक स्वर्ग को जाता है।

अध्याय 29अध्याय-सूचीअध्याय 31