अवन्ती खण्ड · अध्याय 31
सौभाग्येश्वरादिनानातीर्थमाहात्म्य-वर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.5.31.1)
सनत्कुमार उवाच । अथान्यत्संप्रवक्ष्यामि केदारेश्वरमुत्तमम् । प्रवरं सर्वतीर्थानां त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्
sanatkumāra uvāca athānyatsaṁpravakṣyāmi kedāreśvaramuttamam pravaraṁ sarvatīrthānāṁ triṣu lokeṣu viśrutam
सनत्कुमार ने कहा -- अब मैं एक अन्य उत्तम केदारेश्वर का वर्णन करता हूँ, जो त्रिलोक में विख्यात, समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ है।
श्लोक 2 (skanda.5.31.2)
तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा यः पश्यति महेश्वरम् । केदारे यत्फलं प्रोक्तं तदत्रापि लभेन्नरः
tatra snātvā śucirbhūtvā yaḥ paśyati maheśvaram kedāre yatphalaṁ proktaṁ tadatrāpi labhennaraḥ
वहाँ स्नान कर, शुद्ध होकर जो महेश्वर का दर्शन करता है, उसे हिमालय के केदार में कहा गया फल यहाँ भी प्राप्त होता है।
श्लोक 3 (skanda.5.31.3)
सर्वपापविनिर्मुक्तः स्वकीयकुलसंयुतः । विमानेनार्कवर्णेन शिव लोके स मोदते
sarvapāpavinirmuktaḥ svakīyakulasaṁyutaḥ vimānenārkavarṇena śiva loke sa modate
सर्वपापों से मुक्त होकर, अपने कुल सहित, वह सूर्य-वर्ण विमान से शिवलोक में आनन्दित होता है।
श्लोक 4 (skanda.5.31.4)
जटाशृंगे नरः स्नात्वा शुचिर्भूत्वा जितेंद्रियः । दृष्ट्वा जटेश्वरं देवं ततः पापाद्विमुच्यते
jaṭāśṛṁge naraḥ snātvā śucirbhūtvā jiteṁdriyaḥ dṛṣṭvā jaṭeśvaraṁ devaṁ tataḥ pāpādvimucyate
जटाशृंग में स्नान कर, शुद्ध और इन्द्रियसंयमी होकर जो मनुष्य देव जटेश्वर का दर्शन करता है, वह पाप से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 5 (skanda.5.31.5)
महातपनमादौ च कृत्वा गच्छेच्छिवं प्रति । मातृकं पितृकं चैव कुलानां तारयेच्छतम्
mahātapanamādau ca kṛtvā gacchecchivaṁ prati mātṛkaṁ pitṛkaṁ caiva kulānāṁ tārayecchatam
पहले महाउपवास कर, शिव की ओर जाना चाहिए; इससे माता और पिता दोनों कुलों की सौ पीढ़ियों का उद्धार होता है।
श्लोक 6 (skanda.5.31.6)
इंद्रतीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चेंद्रेश्वरं शिवम् । विमुक्तः सर्वपापेभ्यः शक्रलोके महीयते
iṁdratīrthe naraḥ snātvā dṛṣṭvā ceṁdreśvaraṁ śivam vimuktaḥ sarvapāpebhyaḥ śakraloke mahīyate
इन्द्रतीर्थ में स्नान कर शिव इन्द्रेश्वर का दर्शन करने वाला मनुष्य सर्वपापों से मुक्त होकर शक्रलोक में महिमामण्डित होता है।
श्लोक 7 (skanda.5.31.7)
कुंडेश्वरं तु यः पश्येच्छिवध्यानपरायणः । लभते स नरो व्यास शिवदीक्षाफलं शिवम्
kuṁḍeśvaraṁ tu yaḥ paśyecchivadhyānaparāyaṇaḥ labhate sa naro vyāsa śivadīkṣāphalaṁ śivam
हे व्यास! जो शिवध्यानपरायण होकर कुण्डेश्वर का दर्शन करता है, वह शिव-दीक्षा का शुभ फल प्राप्त करता है।
श्लोक 8 (skanda.5.31.8)
गोपतीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा गोपेश्वरं शिवम् । शिवलोकं नरो याति ह्यमृतादमरो यथा
gopatīrthe naraḥ snātvā dṛṣṭvā gopeśvaraṁ śivam śivalokaṁ naro yāti hyamṛtādamaro yathā
गोपतीर्थ में स्नान कर शिव गोपेश्वर का दर्शन करने वाला मनुष्य, अमृत से देव के समान अमर होकर शिवलोक को जाता है।
श्लोक 9 (skanda.5.31.9)
स्नात्वा तु चिपिटातीर्थे शिवं देवं प्रणम्य च । तिर्यग्योनिं नरो नैव प्रयाति मुनिपुंगव
snātvā tu cipiṭātīrthe śivaṁ devaṁ praṇamya ca tiryagyoniṁ naro naiva prayāti munipuṁgava
हे मुनिपुंगव! चिपिटा तीर्थ में स्नान कर देव शिव को प्रणाम करने वाला मनुष्य कभी पशु-योनि को नहीं जाता।
श्लोक 10 (skanda.5.31.10)
विजये च नरः स्नात्वा आनंदेश्वरपूजनात् । विमुक्तः सर्वपापेभ्यः स्वर्लोके विजयी भवेत्
vijaye ca naraḥ snātvā ānaṁdeśvarapūjanāt vimuktaḥ sarvapāpebhyaḥ svarloke vijayī bhavet
विजय तीर्थ में स्नान कर आनन्देश्वर के पूजन से मनुष्य सर्वपापों से मुक्त होकर स्वर्ग में विजयी होता है।
श्लोक 11 (skanda.5.31.11)
अथान्यं संप्रवक्ष्यामि कुशस्थल्यां विनिर्मितम् । देवं रामेश्वरं व्यास भुक्तिमुक्तिप्रदायकम्
athānyaṁ saṁpravakṣyāmi kuśasthalyāṁ vinirmitam devaṁ rāmeśvaraṁ vyāsa bhuktimuktipradāyakam
हे व्यास! अब मैं कुशस्थली में स्थापित एक अन्य देव रामेश्वर का वर्णन करता हूँ, जो भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करते हैं।
श्लोक 12 (skanda.5.31.12)
चित्रकूटात्पुरा रामो मैथिल्या लक्ष्मणेन च । समन्वितः समागत्य पप्रच्छ मुनिसत्तमम्
citrakūṭātpurā rāmo maithilyā lakṣmaṇena ca samanvitaḥ samāgatya papraccha munisattamam
पूर्वकाल में चित्रकूट से राम, मैथिली और लक्ष्मण के साथ आकर, मुनिश्रेष्ठ से पूछने लगे --
श्लोक 13 (skanda.5.31.13)
राम उवाच । कानि तीर्थानि पुण्यानि किं वा क्षेत्रं महामुने । यत्र गत्वा न चाप्नोति वियोगं सह बांधवैः
rāma uvāca kāni tīrthāni puṇyāni kiṁ vā kṣetraṁ mahāmune yatra gatvā na cāpnoti viyogaṁ saha bāṁdhavaiḥ
राम ने कहा -- हे महामुने! कौन-से पुण्य तीर्थ हैं, अथवा कौन-सा क्षेत्र है, जहाँ जाने पर बान्धवों से वियोग नहीं होता?
श्लोक 14 (skanda.5.31.14)
अनेन वनवासेन मरणेन पितुः प्रभो । भरतस्य वियोगेन प्रतप्येऽहं त्रिभिर्मुने
anena vanavāsena maraṇena pituḥ prabho bharatasya viyogena pratapye'haṁ tribhirmune
हे प्रभो, मुनिवर! इस वनवास, पिता की मृत्यु और भरत के वियोग -- इन तीन से मैं संतप्त हूँ।
श्लोक 15 (skanda.5.31.15)
तद्वाक्यं राघवेणोक्तं श्रुत्वा विप्रर्षभस्तदा । ध्यात्वा तु सुचिरं कालमिदं वचनमब्रवीत्
tadvākyaṁ rāghaveṇoktaṁ śrutvā viprarṣabhastadā dhyātvā tu suciraṁ kālamidaṁ vacanamabravīt
राघव के इस वचन को सुनकर वे श्रेष्ठ ब्राह्मण, बहुत देर तक ध्यानमग्न रहकर, यह वचन बोले --
श्लोक 16 (skanda.5.31.16)
साधु पृष्टं त्वया वीर रघूणां वंशवर्धन । मम पित्रा कृतं क्षेत्रं प्रयाच्य शिवमादरात
sādhu pṛṣṭaṁ tvayā vīra raghūṇāṁ vaṁśavardhana mama pitrā kṛtaṁ kṣetraṁ prayācya śivamādarāta
-- 'हे वीर, रघुवंशवर्धन! तुमने अच्छा पूछा। मेरे पिता ने आदरपूर्वक शिव की प्रार्थना कर एक क्षेत्र प्राप्त किया --
श्लोक 17 (skanda.5.31.17)
अवंतीविषये राम पुरी तस्मिन्कुशस्थली । उज्जयिनीति वै नाम्ना ख्यातिं लोके गता विभो
avaṁtīviṣaye rāma purī tasminkuśasthalī ujjayinīti vai nāmnā khyātiṁ loke gatā vibho
-- हे राम! अवन्ती प्रदेश में उस क्षेत्र में कुशस्थली नामक नगरी है, जो हे विभो, लोक में उज्जयिनी नाम से विख्यात हुई है।
श्लोक 18 (skanda.5.31.18)
तस्यां गत्वा दशरथं पिंडदानेन तर्पय । सुरासुरगुरुस्तत्र महाकालो व्यवस्थितः
tasyāṁ gatvā daśarathaṁ piṁḍadānena tarpaya surāsuragurustatra mahākālo vyavasthitaḥ
वहाँ जाकर पिंडदान से दशरथ को तर्पित करो; वहाँ देव-दानवों के गुरु महाकाल विराजते हैं।
श्लोक 19 (skanda.5.31.19)
देवः स वै सदा राजन्वांछितार्थफलप्रदः । दृष्टे तस्मिञ्जगन्नाथे वियोगो नैव जायते
devaḥ sa vai sadā rājanvāṁchitārthaphalapradaḥ dṛṣṭe tasmiñjagannāthe viyogo naiva jāyate
हे राजन्! वे देव सदा अभीष्ट फल प्रदान करने वाले हैं; उस जगन्नाथ का दर्शन होने पर वियोग कभी नहीं होता।
श्लोक 20 (skanda.5.31.20)
तत्र गच्छंति ये विप्रा राजा चैव महावलः । लभंते परमं स्थानं यत्र देवो महेश्वरः
tatra gacchaṁti ye viprā rājā caiva mahāvalaḥ labhaṁte paramaṁ sthānaṁ yatra devo maheśvaraḥ
वहाँ जाने वाले ब्राह्मण और महाबली राजा भी, जहाँ देव महेश्वर हैं, वह परम स्थान प्राप्त करते हैं।'
श्लोक 21 (skanda.5.31.21)
तीर्थानामपि तत्तीर्थं प्रविष्टोऽवंतिमंडले । आजगाम ततोवंतीं सा शिप्रा यत्र पुण्यदा
tīrthānāmapi tattīrthaṁ praviṣṭo'vaṁtimaṁḍale ājagāma tatovaṁtīṁ sā śiprā yatra puṇyadā
यह तीर्थों में भी श्रेष्ठ तीर्थ अवन्ति-मंडल में है। तत्पश्चात् राम अवन्ती पहुँचे, जहाँ वह पुण्यदायिनी शिप्रा है।
श्लोक 22 (skanda.5.31.22)
तस्यां स्नात्वा ततो रामस्तर्पयामास पूर्वजान् । महाकालं यदा द्रष्टुं प्रतस्थे रघुनंदनः
tasyāṁ snātvā tato rāmastarpayāmāsa pūrvajān mahākālaṁ yadā draṣṭuṁ pratasthe raghunaṁdanaḥ
वहाँ स्नान कर राम ने अपने पूर्वजों को तर्पित किया। जब रघुनन्दन महाकाल के दर्शन को चले --
श्लोक 23 (skanda.5.31.23)
वाण्या ततोऽशरीरिण्या देवदेवेन भाषितम् । भो भो राघव भद्रं ते स्वनाम्ना स्थापयस्व माम्
vāṇyā tato'śarīriṇyā devadevena bhāṣitam bho bho rāghava bhadraṁ te svanāmnā sthāpayasva mām
-- तब देवाधिदेव ने अशरीर वाणी से कहा -- 'हे राघव! तुम्हारा कल्याण हो, मुझे अपने ही नाम से स्थापित करो।
श्लोक 24 (skanda.5.31.24)
अत्र स्थानं मया दत्त मा विचारय राघव । ततो द्दृष्टमना रामो लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत्
atra sthānaṁ mayā datta mā vicāraya rāghava tato ddṛṣṭamanā rāmo lakṣmaṇaṁ vākyamabravīt
यह स्थान मैंने तुम्हें दिया है, हे राघव! संदेह मत करो।' तब प्रसन्नचित्त राम ने लक्ष्मण से यह वचन कहा --
श्लोक 25 (skanda.5.31.25)
अनुगृहीताः सौमित्रे देवदेवेन शंभुना । तस्मात्स्थापय तीर्थेऽस्मिँल्लिंगं रामेश्वरं शुभम्
anugṛhītāḥ saumitre devadevena śaṁbhunā tasmātsthāpaya tīrthe'smi~lliṁgaṁ rāmeśvaraṁ śubham
-- 'हे सौमित्रे! हम देवाधिदेव शम्भु द्वारा अनुगृहीत हुए हैं; अतः इस तीर्थ में शुभ लिंग रामेश्वर की स्थापना करो।'
श्लोक 26 (skanda.5.31.26)
वाक्यं तल्लक्ष्मणः श्रुत्वा स्थापयामास शंकरम् । दृष्ट्वा देवं पुरा रामो लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत्
vākyaṁ tallakṣmaṇaḥ śrutvā sthāpayāmāsa śaṁkaram dṛṣṭvā devaṁ purā rāmo lakṣmaṇaṁ vākyamabravīt
यह वचन सुनकर लक्ष्मण ने शंकर की स्थापना की। पूर्वकाल में देव का दर्शन कर राम ने लक्ष्मण से यह वचन कहा --
श्लोक 27 (skanda.5.31.27)
एहि लक्ष्मण शीघ्रं त्वं शिप्राया जलमानय । करिष्यामि यतोऽत्राहं देवस्य स्नपनं शुभम्
ehi lakṣmaṇa śīghraṁ tvaṁ śiprāyā jalamānaya kariṣyāmi yato'trāhaṁ devasya snapanaṁ śubham
-- 'हे लक्ष्मण! शीघ्र आओ, शिप्रा का जल ले आओ; मैं यहाँ देव का शुभ स्नपन करना चाहता हूँ।'
श्लोक 28 (skanda.5.31.28)
लक्ष्मणस्त्वब्रवीद्वाक्यं सीतया किं करिष्यसि । राम नाहं सर्वकालं दासभावं करोमि ते
lakṣmaṇastvabravīdvākyaṁ sītayā kiṁ kariṣyasi rāma nāhaṁ sarvakālaṁ dāsabhāvaṁ karomi te
लक्ष्मण ने कहा -- 'हे राम! सीता के साथ तुम क्या करोगे? मैं सदा तुम्हारा दासभाव नहीं निभाऊँगा।
श्लोक 29 (skanda.5.31.29)
इयं च पुष्टा सुदृढा पीवरा च ममाग्रतः । वद राघव सत्येन अनया किं करिष्यसि
iyaṁ ca puṣṭā sudṛḍhā pīvarā ca mamāgrataḥ vada rāghava satyena anayā kiṁ kariṣyasi
यह पुष्ट, सुदृढ़ और तेजस्वी स्त्री मेरे सामने है। हे राघव! सत्यपूर्वक बताओ, इसके साथ क्या करोगे?'
श्लोक 30 (skanda.5.31.30)
श्रुत्वा रामो हि तद्वाक्यं लक्ष्मणेन प्रभाषितम् । विमना राघवस्तस्थौ सीता चापि वरानना
śrutvā rāmo hi tadvākyaṁ lakṣmaṇena prabhāṣitam vimanā rāghavastasthau sītā cāpi varānanā
लक्ष्मण द्वारा कहा गया यह वचन सुनकर राम व्याकुल होकर खड़े रह गए, और सुन्दर मुख वाली सीता भी।
श्लोक 31 (skanda.5.31.31)
यदुक्तं लक्ष्मणेनाथ तच्च सीता चकार ह । स्नात्वा भुक्त्वा च तौ वीरौ महाकालमुपागतौ
yaduktaṁ lakṣmaṇenātha tacca sītā cakāra ha snātvā bhuktvā ca tau vīrau mahākālamupāgatau
जो लक्ष्मण ने कहा था, वैसा ही सीता ने भी किया। स्नान और भोजन कर वे दोनों वीर महाकाल के पास पहुँचे।
श्लोक 32 (skanda.5.31.32)
नीत्वा विभावरीं तत्र गमनाय मनो दधे । उत्तिष्ठ वत्स सौमित्रे व्रजामो दक्षिणां दिशम्
nītvā vibhāvarīṁ tatra gamanāya mano dadhe uttiṣṭha vatsa saumitre vrajāmo dakṣiṇāṁ diśam
वहाँ रात्रि व्यतीत कर, आगे जाने का विचार किया -- 'हे वत्स सौमित्रे! उठो, हम दक्षिण दिशा को चलें।'
श्लोक 33 (skanda.5.31.33)
सौमित्रिरब्रवीद्वाक्यं नाहं गन्ता कथंचन । व्रज त्वमनया सार्धं भार्यया कमलेक्षण
saumitrirabravīdvākyaṁ nāhaṁ gantā kathaṁcana vraja tvamanayā sārdhaṁ bhāryayā kamalekṣaṇa
सौमित्रि ने कहा -- 'मैं किसी भी प्रकार नहीं जाऊँगा। हे कमलनयन! तुम इस अपनी पत्नी के साथ ही जाओ।
श्लोक 34 (skanda.5.31.34)
नाहमग्रे वनं यामि न वायोध्यां कथं चन । एवं ब्रुवाणं सौमित्रिमुवाच रघुनंदनः
nāhamagre vanaṁ yāmi na vāyodhyāṁ kathaṁ cana evaṁ bruvāṇaṁ saumitrimuvāca raghunaṁdanaḥ
मैं आगे वन को नहीं जाऊँगा, न कभी अयोध्या को।' इस प्रकार बोलते सौमित्रि से रघुनन्दन ने कहा --
श्लोक 35 (skanda.5.31.35)
कथं पूर्वमूयोध्याया निर्गतोऽसि मया सह । वने वसाम्यहं राम नव वर्षाणि पंच च
kathaṁ pūrvamūyodhyāyā nirgato'si mayā saha vane vasāmyahaṁ rāma nava varṣāṇi paṁca ca
-- 'पहले तुम मेरे साथ अयोध्या से कैसे निकले थे?' (लक्ष्मण ने कहा) -- 'हे राम! मैं चौदह वर्ष वन में निवास कर चुका हूँ --
श्लोक 36 (skanda.5.31.36)
प्रमादः क्रियतां मह्यं नय मामपि राघव । इदानीं त्वमर्धपथे कथं स्थातासि शत्रुहन्
pramādaḥ kriyatāṁ mahyaṁ naya māmapi rāghava idānīṁ tvamardhapathe kathaṁ sthātāsi śatruhan
-- मेरे लिए अपवाद किया जाए, हे राघव! मुझे भी साथ ले चलो। हे शत्रुहन्! अब आधे रास्ते में तुम कैसे रुकोगे?'
श्लोक 37 (skanda.5.31.37)
लक्ष्मणस्त्वब्रवीद्राम नाहं गन्ता वनं पुनः । लक्ष्मणं विकृतं ज्ञात्वा रामो वचनमब्रवीत्
lakṣmaṇastvabravīdrāma nāhaṁ gantā vanaṁ punaḥ lakṣmaṇaṁ vikṛtaṁ jñātvā rāmo vacanamabravīt
लक्ष्मण ने कहा -- 'हे राम! मैं फिर वन को नहीं जाऊँगा।' लक्ष्मण को इस प्रकार विचलित जानकर राम ने कहा --
श्लोक 38 (skanda.5.31.38)
मा माऽनुव्रज सौमित्रे ह्येको यास्यामि काननम् । द्वितीयापि त्वियं सीता उक्तो रामेण लक्ष्मणः
mā mā'nuvraja saumitre hyeko yāsyāmi kānanam dvitīyāpi tviyaṁ sītā ukto rāmeṇa lakṣmaṇaḥ
-- 'हे सौमित्रे! मेरे पीछे मत आओ, मैं अकेला वन जाऊँगा; यह सीता ही तुम्हारी दूसरी साथी है।' राम ने लक्ष्मण से यह कहा।
श्लोक 39 (skanda.5.31.39)
धनुः संगृह्य विमना उत्तस्थौ लक्ष्मणस्तदा । प्राप्तौ प्राकारमर्यादां क्षेत्रसीमां परंतपौ ।। । क्षेत्रसीमां समुल्लंघ्य रामो लक्ष्मणमब्रवीत्
dhanuḥ saṁgṛhya vimanā uttasthau lakṣmaṇastadā prāptau prākāramaryādāṁ kṣetrasīmāṁ paraṁtapau kṣetrasīmāṁ samullaṁghya rāmo lakṣmaṇamabravīt
धनुष उठाकर व्याकुल लक्ष्मण उठ खड़े हुए। वे दोनों शत्रुतापन क्षेत्र की सीमा-प्राचीर तक पहुँचे। क्षेत्र की सीमा लाँघकर राम ने लक्ष्मण से कहा --
श्लोक 40 (skanda.5.31.40)
निवर्तयस्व सौमित्रे समर्पय च मे धनुः । रामवाक्यमुपश्रुत्य सीतां वै लक्ष्मणोऽब्रवीत्
nivartayasva saumitre samarpaya ca me dhanuḥ rāmavākyamupaśrutya sītāṁ vai lakṣmaṇo'bravīt
-- 'हे सौमित्रे! लौट जाओ, और मुझे मेरा धनुष सौंप दो।' राम का यह वचन सुनकर लक्ष्मण ने सीता से कहा --
श्लोक 41 (skanda.5.31.41)
किमर्थं हि परित्यक्तः कोऽपराधः कृतो मया । रामेण हि परित्यक्तः प्राणांस्त्यक्ष्याम्यसंशयम्
kimarthaṁ hi parityaktaḥ ko'parādhaḥ kṛto mayā rāmeṇa hi parityaktaḥ prāṇāṁstyakṣyāmyasaṁśayam
-- 'मैं किस कारण त्यागा गया? मैंने क्या अपराध किया है? राम द्वारा त्यागे जाने पर मैं निश्चय ही प्राण त्याग दूँगा।'
श्लोक 42 (skanda.5.31.42)
रामं ततोऽब्रवीत्सीता किमर्थं लक्ष्मणस्त्वया । देव संत्यज्यते वीरः सुमित्रानंदिवर्धनः
rāmaṁ tato'bravītsītā kimarthaṁ lakṣmaṇastvayā deva saṁtyajyate vīraḥ sumitrānaṁdivardhanaḥ
तब सीता ने राम से कहा -- 'हे देव! सुमित्रा के आनन्दवर्धक वीर लक्ष्मण को आप किस कारण त्याग रहे हैं?
श्लोक 43 (skanda.5.31.43)
राघवस्त्वब्रवीत्सीतां नाहं त्यक्ष्यामि लक्ष्मणम् । न कदाचिदपि स्वप्ने लक्ष्मणसदृशं प्रियम्
rāghavastvabravītsītāṁ nāhaṁ tyakṣyāmi lakṣmaṇam na kadācidapi svapne lakṣmaṇasadṛśaṁ priyam
राघव ने सीता से कहा -- 'मैं लक्ष्मण को कभी नहीं त्यागूँगा; स्वप्न में भी कभी लक्ष्मण के समान प्रिय --
श्लोक 44 (skanda.5.31.44)
श्रुतपूर्वं तु सुश्रोणि क्षेत्रस्यास्य विचेष्टितम् । अस्मिन्क्षेत्रे न सौभ्रात्रं सर्वो हि स्वार्थतत्परः
śrutapūrvaṁ tu suśroṇi kṣetrasyāsya viceṣṭitam asminkṣetre na saubhrātraṁ sarvo hi svārthatatparaḥ
-- मैंने इस क्षेत्र के इस विचित्र प्रभाव के विषय में पहले सुना था, हे सुश्रोणि! इस क्षेत्र में भ्रातृभाव नहीं टिकता, सभी अपने-अपने स्वार्थ में तत्पर रहते हैं।
श्लोक 45 (skanda.5.31.45)
परस्परं न मन्यंते स्वार्थनिष्ठैकहेतवः । न शृण्वंति पितुः पुत्राः पुत्राणां वा तथा पिता
parasparaṁ na manyaṁte svārthaniṣṭhaikahetavaḥ na śṛṇvaṁti pituḥ putrāḥ putrāṇāṁ vā tathā pitā
वे एक-दूसरे का सम्मान नहीं करते, केवल स्वार्थ में लीन रहते हैं; पुत्र पिता की बात नहीं सुनते, न पिता पुत्रों की।
श्लोक 46 (skanda.5.31.46)
न च शिष्यो गुरोर्वाक्यं गुरुर्वा शिष्यकर्म च । अर्थानुबंधिनी प्रीतिर्न कश्चित्कस्यचि त्प्रियः
na ca śiṣyo gurorvākyaṁ gururvā śiṣyakarma ca arthānubaṁdhinī prītirna kaścitkasyaci tpriyaḥ
न शिष्य गुरु का वचन मानता है, न गुरु शिष्य का कार्य; यहाँ प्रीति केवल स्वार्थ से बँधी रहती है, कोई किसी का सच्चा प्रिय नहीं होता।'
श्लोक 47 (skanda.5.31.47)
एवमुक्त्वा ययौ रामो लक्ष्मणो जानकी तथा । लिंगं तत्र प्रतिष्ठाप्य स्वनाम्ना रघुनंदनः
evamuktvā yayau rāmo lakṣmaṇo jānakī tathā liṁgaṁ tatra pratiṣṭhāpya svanāmnā raghunaṁdanaḥ
ऐसा कहकर राम, लक्ष्मण और जानकी सहित वहाँ से चले गए; और रघुनन्दन ने वहाँ अपने ही नाम से लिंग की स्थापना कर --
श्लोक 48 (skanda.5.31.48)
रामतीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा रामेश्वरं शिवम् । विमुक्तः सर्वपापेभ्यः शिवलोकं स गच्छति
rāmatīrthe naraḥ snātvā dṛṣṭvā rāmeśvaraṁ śivam vimuktaḥ sarvapāpebhyaḥ śivalokaṁ sa gacchati
-- रामतीर्थ नाम बनाया। जो मनुष्य रामतीर्थ में स्नान कर शिव रामेश्वर का दर्शन करता है, वह सर्वपापों से मुक्त होकर शिवलोक को जाता है।
श्लोक 49 (skanda.5.31.49)
इति रामेश्वरमाहात्म्यम् । सनत्कुमार उवाच । तीर्थे सौभाग्यके स्नात्वा दृष्ट्वा सौभाम्यमीश्वरम् । सर्वपापविनिर्मुक्तः सौभाग्यं परमं लभेत्
iti rāmeśvaramāhātmyam sanatkumāra uvāca tīrthe saubhāgyake snātvā dṛṣṭvā saubhāmyamīśvaram sarvapāpavinirmuktaḥ saubhāgyaṁ paramaṁ labhet
इस प्रकार रामेश्वर का माहात्म्य कहा गया। सनत्कुमार ने कहा -- सौभाग्य तीर्थ में स्नान कर सौभाग्येश्वर का दर्शन करने वाला सर्वपापों से मुक्त होकर परम सौभाग्य प्राप्त करता है।
श्लोक 50 (skanda.5.31.50)
घृततीर्थे नरः स्नात्वा घृतेन स्नापयेच्छिवम् । घृतमग्नावथो हुत्वा रुद्रलोके महीयते
ghṛtatīrthe naraḥ snātvā ghṛtena snāpayecchivam ghṛtamagnāvatho hutvā rudraloke mahīyate
घृततीर्थ में स्नान कर घी से शिव का स्नपन करने वाला, और अग्नि में घी की आहुति देने वाला, रुद्रलोक में महिमामण्डित होता है।
श्लोक 51 (skanda.5.31.51)
देवीं योगीश्वरीं पूज्य सुरासुरनमस्कृताम् । सर्वपापविनिर्मुक्तः परं योगमवाप्नुयात्
devīṁ yogīśvarīṁ pūjya surāsuranamaskṛtām sarvapāpavinirmuktaḥ paraṁ yogamavāpnuyāt
देव-असुरों द्वारा नमस्कृत देवी योगीश्वरी का पूजन करने वाला सर्वपापों से मुक्त होकर परम योग प्राप्त करता है।
श्लोक 52 (skanda.5.31.52)
शंखावर्ते नरः स्नात्वा सर्वपापविवर्जितः । । धनधान्यसमायुक्तो जायते निर्मले कुले
śaṁkhāvarte naraḥ snātvā sarvapāpavivarjitaḥ dhanadhānyasamāyukto jāyate nirmale kule
शंखावर्त में स्नान कर सर्वपापों से रहित मनुष्य धन-धान्य से युक्त होकर निर्मल कुल में जन्म लेता है।
श्लोक 53 (skanda.5.31.53)
सुधोदके चतुर्दश्यां मुक्त्यर्थं स्नापयेन्नरः । शिवं सुधेश्वरं दृष्ट्वा ततो मोक्षगतिर्भवेत्
sudhodake caturdaśyāṁ muktyarthaṁ snāpayennaraḥ śivaṁ sudheśvaraṁ dṛṣṭvā tato mokṣagatirbhavet
चतुर्दशी को मुक्ति की कामना से मनुष्य को सुधोदक में स्नान करना चाहिए; शिव सुधेश्वर का दर्शन कर तब मोक्षगति प्राप्त होती है।
श्लोक 54 (skanda.5.31.54)
तथान्य त्संप्रवक्ष्यामि तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् । किं पुनेति च विख्यातं ब्रह्महत्याविमोचनम्
tathānya tsaṁpravakṣyāmi tīrthaṁ trailokyaviśrutam kiṁ puneti ca vikhyātaṁ brahmahatyāvimocanam
अब मैं त्रिलोकविख्यात एक अन्य तीर्थ का वर्णन करता हूँ, जो 'किंपुनक' नाम से विख्यात है और ब्रह्महत्या से मुक्ति देता है।
श्लोक 55 (skanda.5.31.55)
पूर्वं त्रेतायुगे व्यास सुनेत्रो नाम वै द्विजः । तस्य पुत्रः समु त्पन्नो विश्वावसुरिति स्मृतः
pūrvaṁ tretāyuge vyāsa sunetro nāma vai dvijaḥ tasya putraḥ samu tpanno viśvāvasuriti smṛtaḥ
हे व्यास! पूर्वकाल त्रेतायुग में सुनेत्र नामक एक ब्राह्मण थे; उनका पुत्र विश्वावसु नाम से विख्यात हुआ।
श्लोक 56 (skanda.5.31.56)
यवक्रीतस्य शापेन स्वपिता तेन घातितः । ब्रह्महत्यान्वितो व्यास तीर्थात्तीर्थं परिभ्रमन्
yavakrītasya śāpena svapitā tena ghātitaḥ brahmahatyānvito vyāsa tīrthāttīrthaṁ paribhraman
यवक्रीत के शाप से उसने अपने ही पिता का वध कर दिया। हे व्यास! ब्रह्महत्या से ग्रस्त होकर वह तीर्थ-तीर्थ भटकने लगा।
श्लोक 57 (skanda.5.31.57)
तीर्थे किंपुनके स्नात्वा धारातीर्थे गतो द्विजः । ततः कपिलधारायां चिंतयत्यात्मना स्वयम्
tīrthe kiṁpunake snātvā dhārātīrthe gato dvijaḥ tataḥ kapiladhārāyāṁ ciṁtayatyātmanā svayam
किंपुनक तीर्थ में स्नान कर वह ब्राह्मण धारातीर्थ गया; फिर कपिलधारा में उसने अपने मन में विचार किया --
श्लोक 58 (skanda.5.31.58)
कथं मे पतिता धारा अनृता वा श्रुतिस्तथा । एवं ह्यचिंत यत्सोऽथ पुनरायादवंतिकाम्
kathaṁ me patitā dhārā anṛtā vā śrutistathā evaṁ hyaciṁta yatso'tha punarāyādavaṁtikām
-- 'यह धारा मेरे लिए विफल कैसे हो गई, या क्या यह श्रुति ही असत्य है?' ऐसा सोचते हुए वह पुनः अवन्तिका आया।
श्लोक 59 (skanda.5.31.59)
अत्र तीर्थे पुनः स्नाति यावद्वाणीं ततोऽशृणोत् । किं पुनर्ध्यायसि ब्रह्मन्येन जातो द्विजोत्तमः
atra tīrthe punaḥ snāti yāvadvāṇīṁ tato'śṛṇot kiṁ punardhyāyasi brahmanyena jāto dvijottamaḥ
इस तीर्थ में उसने पुनः स्नान किया, तभी उसने एक वाणी सुनी -- 'हे ब्रह्मन्! तुम किस बात का पुनः विचार कर रहे हो, हे द्विजश्रेष्ठ?
श्लोक 60 (skanda.5.31.60)
न तेऽस्ति ब्रह्महत्या वै तीर्थस्नानेन नाशिता । गच्छ शीघ्रं गृहं विप्र पापहीनो यथासुखम्
na te'sti brahmahatyā vai tīrthasnānena nāśitā gaccha śīghraṁ gṛhaṁ vipra pāpahīno yathāsukham
तुम्हारी ब्रह्महत्या अब नहीं है, वह तीर्थ-स्नान से नष्ट हो चुकी है। हे विप्र! शीघ्र घर जाओ, पाप से रहित होकर सुखपूर्वक।'
श्लोक 61 (skanda.5.31.61)
इति किंपुनामाहात्म्यम् ।। । सनत्कुमार उवाच । पुनरन्यत्प्रवक्ष्यामि पत्तनेश्वरमुत्तमम् । तत्र स्थित्वा महेशेन पुनः पत्तनमीक्षितम्
iti kiṁpunāmāhātmyam sanatkumāra uvāca punaranyatpravakṣyāmi pattaneśvaramuttamam tatra sthitvā maheśena punaḥ pattanamīkṣitam
इस प्रकार किंपुनक का माहात्म्य कहा गया। सनत्कुमार ने कहा -- अब मैं पुनः एक अन्य उत्तम पत्तनेश्वर का वर्णन करता हूँ। वहाँ स्थित होकर महेश ने पुनः नगर को देखा।
श्लोक 62 (skanda.5.31.62)
पत्तनेश्वर इत्याख्यो देवदेवो महेश्वरः । यस्तु गंधैश्च पुष्पैश्च धूपैर्दीपैर्मनोरमैः
pattaneśvara ityākhyo devadevo maheśvaraḥ yastu gaṁdhaiśca puṣpaiśca dhūpairdīpairmanoramaiḥ
इसीलिए वे 'पत्तनेश्वर' नाम से विख्यात देवाधिदेव महेश्वर कहलाए। जो गन्ध, पुष्प, धूप और मनोहर दीपों से --
श्लोक 63 (skanda.5.31.63)
भावयुक्तो नरो व्यास पूजयेद्विधिवत्सदा । यथावत्तिष्ठते लिंगं वंशच्छेदो न जायते
bhāvayukto naro vyāsa pūjayedvidhivatsadā yathāvattiṣṭhate liṁgaṁ vaṁśacchedo na jāyate
-- हे व्यास! भावयुक्त होकर विधिपूर्वक सदा उनका पूजन करता है, उस लिंग के यथावत स्थित रहने तक उसके वंश का उच्छेद नहीं होता।
श्लोक 64 (skanda.5.31.64)
हंसयुक्तेन यानेन शिवलोकं स गच्छति । तथान्यत्संप्रवक्ष्यामि तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्
haṁsayuktena yānena śivalokaṁ sa gacchati tathānyatsaṁpravakṣyāmi tīrthaṁ trailokyaviśrutam
वह हंसयुक्त विमान से शिवलोक को जाता है। अब मैं त्रिलोकविख्यात एक अन्य तीर्थ का वर्णन करता हूँ।
श्लोक 65 (skanda.5.31.65)
दुर्धर्षमिति विख्यातं ब्रह्महत्याविमोचनम् । पुरा दिवाकरो व्यास चक्रे दुर्धर्षनामतः
durdharṣamiti vikhyātaṁ brahmahatyāvimocanam purā divākaro vyāsa cakre durdharṣanāmataḥ
'दुर्धर्ष' नाम से विख्यात, ब्रह्महत्या से मुक्ति देने वाला यह तीर्थ है। हे व्यास! पूर्वकाल में सूर्य ने इसे बनाया, इसीलिए 'दुर्धर्ष' नाम पड़ा।
श्लोक 66 (skanda.5.31.66)
तीर्थमासीन्नदीतीरे विख्यातं सूर्यसंस्कृतम् । तेजःपुंजं भवेल्लिंगं गणगं धर्वपूजितम्
tīrthamāsīnnadītīre vikhyātaṁ sūryasaṁskṛtam tejaḥpuṁjaṁ bhavelliṁgaṁ gaṇagaṁ dharvapūjitam
नदी-तट पर वह विख्यात, सूर्य द्वारा संस्कारित तीर्थ था; वहाँ गण-गंधर्वों द्वारा पूजित, तेजपुंज लिंग है।
श्लोक 67 (skanda.5.31.67)
सप्तम्यामथवाष्टम्यां संक्रातौ रविवासरे । तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा दिनमेकमुपोषितः
saptamyāmathavāṣṭamyāṁ saṁkrātau ravivāsare tatra snātvā śucirbhūtvā dinamekamupoṣitaḥ
सप्तमी या अष्टमी को, संक्रांति के दिन अथवा रविवार को, वहाँ स्नान कर, शुद्ध होकर, एक दिन उपवास कर --
श्लोक 68 (skanda.5.31.68)
दृष्ट्वा महेश्वरं तत्र शिप्राकूले व्यवस्थितम् । पूजयित्वा तु भावेन यत्फलं तच्छ्रणुष्व मे
dṛṣṭvā maheśvaraṁ tatra śiprākūle vyavasthitam pūjayitvā tu bhāvena yatphalaṁ tacchraṇuṣva me
-- वहाँ शिप्रा-तट पर स्थित महेश्वर का दर्शन कर, भावपूर्वक पूजन करने का जो फल है, वह मुझसे सुनो।
श्लोक 69 (skanda.5.31.69)
पितृमातृकुलं सर्वं समुद्धृत्य शिवं व्रजेत् । तत्र यच्छति यो दानं गोहेमादि विशेषतः
pitṛmātṛkulaṁ sarvaṁ samuddhṛtya śivaṁ vrajet tatra yacchati yo dānaṁ gohemādi viśeṣataḥ
अपने माता-पिता दोनों कुलों का उद्धार कर वह शिव को प्राप्त होता है। वहाँ जो गौ-स्वर्ण आदि विशेष रूप से दान करता है --
श्लोक 70 (skanda.5.31.70)
तावत्तदक्षयं लोके यावच्चंद्रदिवाकरौ । तथान्यत्संप्रवक्ष्यामि गोपींद्रं तीर्थमुत्तमम्
tāvattadakṣayaṁ loke yāvaccaṁdradivākarau tathānyatsaṁpravakṣyāmi gopīṁdraṁ tīrthamuttamam
-- वह दान चन्द्र-सूर्य के रहने तक लोक में अक्षय रहता है। अब मैं एक अन्य उत्तम गोपींद्र तीर्थ का वर्णन करता हूँ।
श्लोक 71 (skanda.5.31.71)
गौतमेन पुरा यत्र इन्द्रः शापाद्भ गीकृतः । भगव्रीडायुतः शक्रः प्रविश्य वनमुत्तमम्
gautamena purā yatra indraḥ śāpādbha gīkṛtaḥ bhagavrīḍāyutaḥ śakraḥ praviśya vanamuttamam
पूर्वकाल में जहाँ गौतम के शाप से इन्द्र भगचिह्नों से युक्त कर दिए गए थे। भग-चिह्न से लज्जित शक्र ने एक उत्तम वन में प्रवेश कर --
श्लोक 72 (skanda.5.31.72)
अतोषयत्तदोग्रेण तपसा शंकरं पुरा । तुष्टेन शंभुना विप्र ये भगास्तच्छरीरगाः
atoṣayattadogreṇa tapasā śaṁkaraṁ purā tuṣṭena śaṁbhunā vipra ye bhagāstaccharīragāḥ
-- वहाँ उग्र तप से पूर्वकाल में शंकर को प्रसन्न किया। हे विप्र! प्रसन्न शम्भु ने उनके शरीर पर स्थित उन भग-चिह्नों को --
श्लोक 73 (skanda.5.31.73)
गोसहस्रीकृतास्तेन गोपींद्रस्तेन कथ्यते । तत्र स्नात्वा दिवं याति शक्रतुल्यपराक्रमः
gosahasrīkṛtāstena gopīṁdrastena kathyate tatra snātvā divaṁ yāti śakratulyaparākramaḥ
-- सहस्र नेत्रों में बदल दिया, इसीलिए वह 'गोपींद्र' कहलाया। वहाँ स्नान करने वाला शक्र के तुल्य पराक्रमी होकर स्वर्ग को जाता है।
श्लोक 74 (skanda.5.31.74)
ये मृतास्ते पुनर्जन्म नाप्नुवंति महीतले । । गंगातीर्थे नरः स्नात्वा पुण्यमाप्नोति पुष्कलम्
ye mṛtāste punarjanma nāpnuvaṁti mahītale gaṁgātīrthe naraḥ snātvā puṇyamāpnoti puṣkalam
वहाँ मरने वाले पृथ्वी पर पुनर्जन्म नहीं पाते। गंगातीर्थ में स्नान करने वाला मनुष्य प्रचुर पुण्य पाता है।
श्लोक 75 (skanda.5.31.75)
ज्येष्ठशुक्लदशम्यां तु गंगायां फलमादिशेत् । स्नात्वा पुष्पकरंडे च दृष्ट्वा पुष्पकरण्डकम्
jyeṣṭhaśukladaśamyāṁ tu gaṁgāyāṁ phalamādiśet snātvā puṣpakaraṁḍe ca dṛṣṭvā puṣpakaraṇḍakam
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को यहाँ गंगा के समान फल कहा गया है। पुष्पकरण्ड में स्नान कर पुष्पकरण्डक का दर्शन करने वाला --
श्लोक 76 (skanda.5.31.76)
पुष्पकेन विमानेन प्रयातो दिवि मोदते । नरकादुद्धरत्याशु नरः स्नात्वोत्तरेश्वरे
puṣpakena vimānena prayāto divi modate narakāduddharatyāśu naraḥ snātvottareśvare
-- पुष्पक विमान से स्वर्ग में आनन्दित होता है। उत्तरेश्वर में स्नान करने वाला मनुष्य शीघ्र (अपने पितरों को) नरक से उद्धार कर --
श्लोक 77 (skanda.5.31.77)
इष्टभोगसमापन्नो याति स्वर्गं न संशयः । भूतेश्वरे नरः स्नात्वा भूतेश्वरमथार्चयेत्
iṣṭabhogasamāpanno yāti svargaṁ na saṁśayaḥ bhūteśvare naraḥ snātvā bhūteśvaramathārcayet
-- इष्ट भोगों से सम्पन्न होकर स्वर्ग को जाता है, इसमें संशय नहीं। भूतेश्वर में स्नान कर भूतेश्वर का पूजन करने वाला --
श्लोक 78 (skanda.5.31.78)
गंधपुष्पादिनैवेद्यैर्मृतो रुद्रपुरं व्रजेत् । शिप्रायां तु नरः स्नात्वा कैलासं तु नमस्यति
gaṁdhapuṣpādinaivedyairmṛto rudrapuraṁ vrajet śiprāyāṁ tu naraḥ snātvā kailāsaṁ tu namasyati
-- गन्ध-पुष्प आदि नैवेद्यों से, मरणोपरान्त रुद्रपुर को जाता है। शिप्रा में स्नान कर कैलास को नमस्कार करने वाला मनुष्य का --
श्लोक 79 (skanda.5.31.79)
सूर्याऽऽहतं तमो यद्वत्तद्वत्पापं प्रणश्यति । अंबालिकां च यः पश्येत्समाधिनियमेन च
sūryā''hataṁ tamo yadvattadvatpāpaṁ praṇaśyati aṁbālikāṁ ca yaḥ paśyetsamādhiniyamena ca
-- पाप वैसे ही नष्ट हो जाता है जैसे सूर्य से अन्धकार। जो समाधि और नियमपूर्वक अम्बालिका का दर्शन करता है --
श्लोक 80 (skanda.5.31.80)
स मुक्तः सर्वपापेभ्यः कंचुकेन फणी यथा । घण्टेश्वरं प्रवक्ष्यामि यत्सुरैरपि पूजितम्
sa muktaḥ sarvapāpebhyaḥ kaṁcukena phaṇī yathā ghaṇṭeśvaraṁ pravakṣyāmi yatsurairapi pūjitam
-- वह सर्वपापों से वैसे ही मुक्त हो जाता है जैसे सर्प केंचुली से। अब मैं घण्टेश्वर का वर्णन करता हूँ, जो देवताओं द्वारा भी पूजित हैं।
श्लोक 81 (skanda.5.31.81)
यत्र कूपोदकं पीत्वा सौभाग्यमतुलं लभेत् । अर्चयेद्यस्तु देवेशं गंधपुष्पैरनुक्रमात्
yatra kūpodakaṁ pītvā saubhāgyamatulaṁ labhet arcayedyastu deveśaṁ gaṁdhapuṣpairanukramāt
वहाँ के कूप का जल पीकर अतुल सौभाग्य प्राप्त होता है। जो क्रमशः गन्ध-पुष्पों से देवेश का पूजन करता है --
श्लोक 82 (skanda.5.31.82)
शिवलोके वसेत्तावद्यावदिंद्राश्चतुर्दश । पुण्येश्वरं तु यः पश्येच्छुचिः स्नातो जितेंन्द्रियः
śivaloke vasettāvadyāvadiṁdrāścaturdaśa puṇyeśvaraṁ tu yaḥ paśyecchuciḥ snāto jiteṁndriyaḥ
-- वह चौदह इन्द्रों के काल तक शिवलोक में निवास करता है। जो शुद्ध, स्नात और इन्द्रियसंयमी होकर पुण्येश्वर का दर्शन करता है --
श्लोक 83 (skanda.5.31.83)
स गाणपत्यमाप्नोति यत्सुरैरपि दुर्लभम् । लंपेश्वरे नरः स्नात्वा समभ्यर्च्य महेश्वरम्
sa gāṇapatyamāpnoti yatsurairapi durlabham laṁpeśvare naraḥ snātvā samabhyarcya maheśvaram
-- वह गणपति-पद प्राप्त करता है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। लम्पेश्वर में स्नान कर महेश्वर का सम्यक पूजन करने वाला मनुष्य --
श्लोक 84 (skanda.5.31.84)
न याति नरकं मर्त्यः स्वर्गलोके महीयते । तथान्यत्संप्रवक्ष्यामि यत्सुरैरपि दुर्लभम्
na yāti narakaṁ martyaḥ svargaloke mahīyate tathānyatsaṁpravakṣyāmi yatsurairapi durlabham
-- कभी नरक नहीं जाता, वह स्वर्गलोक में महिमामण्डित होता है। अब मैं एक अन्य तीर्थ का वर्णन करता हूँ, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है --
श्लोक 85 (skanda.5.31.85)
पूजितं ब्रह्मणा पूर्वं स्थविराख्यं विनायकम् । तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा पूजयेद्यो विनायकम्
pūjitaṁ brahmaṇā pūrvaṁ sthavirākhyaṁ vināyakam tatra snātvā śucirbhūtvā pūjayedyo vināyakam
-- पूर्वकाल में ब्रह्मा द्वारा पूजित, स्थविर नामक विनायक। वहाँ स्नान कर, शुद्ध होकर जो विनायक का पूजन करता है --
श्लोक 86 (skanda.5.31.86)
गंधैर्धूपैश्च नैवेद्यैर्भक्ष्यैर्भोज्यैः फलं शृणु । समीहिता भवेत्सिद्धिर्मृतः शिवपुरं व्रजेत्
gaṁdhairdhūpaiśca naivedyairbhakṣyairbhojyaiḥ phalaṁ śṛṇu samīhitā bhavetsiddhirmṛtaḥ śivapuraṁ vrajet
-- गन्ध, धूप, नैवेद्य, भक्ष्य और भोज्य पदार्थों से -- उसका फल सुनो: उसकी अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है, और वह मरणोपरान्त शिवपुर को जाता है।
श्लोक 87 (skanda.5.31.87)
नवनद्याः समीपे तु पार्वतीं पूजयेद्बुधः । गंधपुष्पैश्च धूपैश्च सौभाग्यमतुलं लभेत्
navanadyāḥ samīpe tu pārvatīṁ pūjayedbudhaḥ gaṁdhapuṣpaiśca dhūpaiśca saubhāgyamatulaṁ labhet
नवनदी के समीप विवेकी पुरुष को पार्वती का पूजन करना चाहिए; गन्ध-पुष्प-धूप से वह अतुल सौभाग्य प्राप्त करता है।
श्लोक 88 (skanda.5.31.88)
कामोदके नरः स्नात्वा दृष्ट्वा कामं रतिप्रियम् । स्वर्गे च देवगंधर्वस्पृहणीयवपुर्भवेत्
kāmodake naraḥ snātvā dṛṣṭvā kāmaṁ ratipriyam svarge ca devagaṁdharvaspṛhaṇīyavapurbhavet
कामोदक में स्नान कर रति के प्रियतम काम का दर्शन करने वाला मनुष्य स्वर्ग में देव-गंधर्वों के लिए भी वांछनीय शरीर पाता है।
श्लोक 89 (skanda.5.31.89)
प्रयागे तु नरः स्नात्वा प्रयागेशं तु पश्यति । सर्वलोकानतिक्रम्य शिवलोके मही यते
prayāge tu naraḥ snātvā prayāgeśaṁ tu paśyati sarvalokānatikramya śivaloke mahī yate
प्रयाग में स्नान कर जो मनुष्य प्रयागेश का दर्शन करता है, वह समस्त लोकों को लाँघकर शिवलोक में महिमामण्डित होता है।