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अवन्ती खण्ड · अध्याय 32

नरादित्यमाहात्म्ये-अर्जुनस्तुतिवर्णनम्

अध्याय 31अध्याय-सूचीअध्याय 33

श्लोक 1 (skanda.5.32.1)

सनत्कुमार उवाच । अथान्यत्संप्रवक्ष्यामि नरादित्यं दिवाकरम् । यस्य दर्शनमात्रेण सर्वरोगैर्विमुच्यते

sanatkumāra uvāca athānyatsaṁpravakṣyāmi narādityaṁ divākaram yasya darśanamātreṇa sarvarogairvimucyate

सनत्कुमार ने कहा -- अब मैं एक अन्य देव नरादित्य दिवाकर का वर्णन करता हूँ, जिनके दर्शनमात्र से मनुष्य सर्वरोगों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 2 (skanda.5.32.2)

स्थापनां ते प्रवक्ष्यामि नरादित्यस्य यादृशी । युद्धे निवारिते तस्मिन्रक्तस्वेदजयोः पुरा

sthāpanāṁ te pravakṣyāmi narādityasya yādṛśī yuddhe nivārite tasminraktasvedajayoḥ purā

मैं तुम्हें बताता हूँ कि नरादित्य की स्थापना कैसे हुई -- पूर्वकाल में जब रक्त और स्वेद (दानवों) का वह युद्ध टाला गया था।

श्लोक 3 (skanda.5.32.3)

नरनारायणौ देवाववतीर्णौ धरातले । कुंत्यां देव्यां च देवक्यां मथुरायामजायताम्

naranārāyaṇau devāvavatīrṇau dharātale kuṁtyāṁ devyāṁ ca devakyāṁ mathurāyāmajāyatām

नर और नारायण देव पृथ्वी पर अवतरित हुए; वे मथुरा में देवी कुन्ती और देवकी से जन्मे।

श्लोक 4 (skanda.5.32.4)

एवं तौ वर्तितौ लोके कांतौ वृद्धिं परां गतौ । अन्यस्मात्कारणात्कृष्णो ऽन्यस्माज्जातो धनंजयः

evaṁ tau vartitau loke kāṁtau vṛddhiṁ parāṁ gatau anyasmātkāraṇātkṛṣṇo 'nyasmājjāto dhanaṁjayaḥ

इस प्रकार वे दोनों सुन्दर लोक में रहते हुए परम वृद्धि को प्राप्त हुए; एक कारण से कृष्ण उत्पन्न हुए, दूसरे कारण से धनंजय।

श्लोक 5 (skanda.5.32.5)

कंसादीन्दानवान्सर्वान्निजघान रणे हि सः । स्वर्गं गतस्ततः पार्थो वासवादस्त्रसिद्धये

kaṁsādīndānavānsarvānnijaghāna raṇe hi saḥ svargaṁ gatastataḥ pārtho vāsavādastrasiddhaye

उन्होंने युद्ध में कंस आदि सभी दानवों का वध किया। फिर पार्थ अस्त्र-सिद्धि हेतु वासव (इन्द्र) से प्राप्त करने स्वर्ग गए।

श्लोक 6 (skanda.5.32.6)

कृतास्त्रेण तु वीरेण देवराजस्य दक्षिणा । संस्तुता देवराजस्तु ययाचे तां हि दक्षिणाम्

kṛtāstreṇa tu vīreṇa devarājasya dakṣiṇā saṁstutā devarājastu yayāce tāṁ hi dakṣiṇām

अस्त्र-विद्या सीख चुके उस वीर से देवराज की गुरु-दक्षिणा माँगी गई; देवराज ने वह दक्षिणा माँगी --

श्लोक 7 (skanda.5.32.7)

निवातकवचा ह्युग्रा हिरण्यपुरवासिनः । वध्यंतामर्जुन क्षिप्रमेषा मे गुरुदक्षिणा

nivātakavacā hyugrā hiraṇyapuravāsinaḥ vadhyaṁtāmarjuna kṣiprameṣā me gurudakṣiṇā

-- 'हिरण्यपुर-निवासी उग्र निवातकवच दानवों को शीघ्र मार डालो, हे अर्जुन! यह मेरी गुरु-दक्षिणा है।'

श्लोक 8 (skanda.5.32.8)

अर्जुनेन प्रतिज्ञातो वधस्तेषां दुरात्मनाम् । ऐंद्रं स रथमास्थाय गृहीत्वा सशरं धनुः

arjunena pratijñāto vadhasteṣāṁ durātmanām aiṁdraṁ sa rathamāsthāya gṛhītvā saśaraṁ dhanuḥ

अर्जुन ने उन दुरात्माओं के वध की प्रतिज्ञा की; इन्द्र के रथ पर आरूढ़ होकर, बाणसहित धनुष लेकर --

श्लोक 9 (skanda.5.32.9)

निहत्य तांस्ततः पार्थः कृत्वा कर्म सुदुष्करम् । प्रीतिमुत्पादयामास सर्वेषां च दिवौकसाम्

nihatya tāṁstataḥ pārthaḥ kṛtvā karma suduṣkaram prītimutpādayāmāsa sarveṣāṁ ca divaukasām

-- उनका वध कर, अत्यन्त दुष्कर कार्य सम्पन्न कर, पार्थ ने समस्त देवताओं में प्रसन्नता उत्पन्न कर दी।

श्लोक 10 (skanda.5.32.10)

कृतकार्यं तदा शक्रस्त्वर्जुनं वाक्यमब्रवीत् । यत्तेऽभिरुचिरं वीर मृत्युलोके सुदुर्लभम्

kṛtakāryaṁ tadā śakrastvarjunaṁ vākyamabravīt yatte'bhiruciraṁ vīra mṛtyuloke sudurlabham

कार्य सम्पन्न होने पर शक्र ने अर्जुन से यह वचन कहा -- 'हे वीर! जो भी तुम्हें प्रिय हो, मृत्युलोक में अत्यन्त दुर्लभ भी --

श्लोक 11 (skanda.5.32.11)

मनसा कांक्षितं पार्थ वरं त्वं वरयोत्तमम् । स वव्रे प्रतिमे द्वे तु येऽर्चिते ब्रह्मणा स्वयम्

manasā kāṁkṣitaṁ pārtha varaṁ tvaṁ varayottamam sa vavre pratime dve tu ye'rcite brahmaṇā svayam

-- मन में वांछित वह श्रेष्ठ वर तुम माँग लो, हे पार्थ।' उन्होंने वे दो प्रतिमाएँ माँगीं, जो स्वयं ब्रह्मा द्वारा पूजित थीं।

श्लोक 12 (skanda.5.32.12)

ब्रह्मणा प्रीतियुक्तेन दक्षाय प्रतिपादिते । दक्षेणापि युगं साग्रं पूजिते तिमिरापहे

brahmaṇā prītiyuktena dakṣāya pratipādite dakṣeṇāpi yugaṁ sāgraṁ pūjite timirāpahe

प्रीतिपूर्वक ब्रह्मा द्वारा दक्ष को दी गई, और दक्ष द्वारा भी एक पूरे युग से अधिक समय तक पूजित, वे अन्धकार-नाशक (सूर्य) की प्रतिमाएँ थीं।

श्लोक 13 (skanda.5.32.13)

सुराणामसुराणां च विग्रहे समुपस्थिते । दानवैर्निर्जितः शक्रो हृतराज्यो वनं गतः

surāṇāmasurāṇāṁ ca vigrahe samupasthite dānavairnirjitaḥ śakro hṛtarājyo vanaṁ gataḥ

जब देव-असुरों में संग्राम उपस्थित हुआ, तो दानवों से पराजित होकर, राज्यहीन शक्र वन को चले गए।

श्लोक 14 (skanda.5.32.14)

तपश्चचार दुर्धर्षमेकपादः शतक्रतुः । दिव्यवर्षसहस्रं तु धिषणस्तं ददर्श ह

tapaścacāra durdharṣamekapādaḥ śatakratuḥ divyavarṣasahasraṁ tu dhiṣaṇastaṁ dadarśa ha

शतक्रतु ने एक पैर पर खड़े होकर सहस्र दिव्य वर्षों तक दुर्धर्ष तप किया; विद्वान बृहस्पति ने उन्हें देखा।

श्लोक 15 (skanda.5.32.15)

दृष्ट्वा तु देवराजं तं बृहस्पतिरुवाच ह । हित्वा त्रिदिवमायातः कथं शक्र त्विदं वनम्

dṛṣṭvā tu devarājaṁ taṁ bṛhaspatiruvāca ha hitvā tridivamāyātaḥ kathaṁ śakra tvidaṁ vanam

उस देवराज को देखकर बृहस्पति ने कहा -- 'हे शक्र! स्वर्ग त्यागकर तुम इस वन में कैसे आए हो?

श्लोक 16 (skanda.5.32.16)

एकाकिना वनस्थेन न साध्याः शत्रवस्त्वया । ज्ञात्वैवं देवराज त्वं शीघ्रं दक्षाश्रमं व्रज

ekākinā vanasthena na sādhyāḥ śatravastvayā jñātvaivaṁ devarāja tvaṁ śīghraṁ dakṣāśramaṁ vraja

वन में अकेले रहते हुए तुम शत्रुओं को नहीं जीत सकते। हे देवराज! यह जानकर शीघ्र दक्ष के आश्रम को जाओ।

श्लोक 17 (skanda.5.32.17)

पूजार्थे ब्रह्मणा दत्ते पारिजातसमुद्भवे । चकार विश्वकर्मा ये ते याचस्व प्रजापतिम्

pūjārthe brahmaṇā datte pārijātasamudbhave cakāra viśvakarmā ye te yācasva prajāpatim

पूजा के लिए ब्रह्मा द्वारा दी गई, पारिजात से उत्पन्न, विश्वकर्मा द्वारा बनाई गई वे (प्रतिमाएँ) प्रजापति से माँगो --

श्लोक 18 (skanda.5.32.18)

शत्रूणां च क्षयो भावी प्रसादादर्चयो स्तयोः । गुरोस्तु तेन वाक्येन हृष्टो देवः शतक्रतुः

śatrūṇāṁ ca kṣayo bhāvī prasādādarcayo stayoḥ gurostu tena vākyena hṛṣṭo devaḥ śatakratuḥ

-- उन दोनों के पूजन की कृपा से शत्रुओं का नाश होगा।' गुरु के इस वचन से शतक्रतु देव हर्षित हो गए।

श्लोक 19 (skanda.5.32.19)

जगाम सत्वरस्तत्र यत्र दक्षः प्रजापतिः । विनयावनतो भूत्वा ययाचे प्रतिमे शुभे

jagāma satvarastatra yatra dakṣaḥ prajāpatiḥ vinayāvanato bhūtvā yayāce pratime śubhe

वे शीघ्र वहाँ गए जहाँ प्रजापति दक्ष थे; विनयपूर्वक झुककर उन्होंने वे शुभ प्रतिमाएँ माँगीं।

श्लोक 20 (skanda.5.32.20)

पूजिते प्रतिमे व्यास शक्रेण शरदां शतम् । तयोस्तु तेजसा सर्वे विनाशं दानवा गताः

pūjite pratime vyāsa śakreṇa śaradāṁ śatam tayostu tejasā sarve vināśaṁ dānavā gatāḥ

हे व्यास! शक्र ने सौ शरद ऋतुओं तक उन प्रतिमाओं की पूजा की; उनके तेज से सभी दानव नष्ट हो गए।

श्लोक 21 (skanda.5.32.21)

प्रतिमे चोचुतुः शक्रं वरयस्व वरोत्तमम् । भक्त्यानया परं तुष्टावावां जानीहि वासव

pratime cocutuḥ śakraṁ varayasva varottamam bhaktyānayā paraṁ tuṣṭāvāvāṁ jānīhi vāsava

प्रतिमाओं ने शक्र से कहा -- 'श्रेष्ठ वर माँगो; तुम्हारी इस भक्ति से हम अत्यन्त प्रसन्न हैं, हे वासव! यह जान लो।'

श्लोक 22 (skanda.5.32.22)

वरं वव्रे तदा शक्रः प्रसन्नात्मा द्विजोत्म । अस्माकं प्रतिपक्षा ये दानवाः पापचेतसः

varaṁ vavre tadā śakraḥ prasannātmā dvijotma asmākaṁ pratipakṣā ye dānavāḥ pāpacetasaḥ

हे द्विजश्रेष्ठ! तब प्रसन्नचित्त शक्र ने वर माँगा -- 'हमारे जो शत्रु पापचेता दानव हैं --

श्लोक 23 (skanda.5.32.23)

सर्वे ते नाशमृच्छंतु वर एष मतो मम । युवां पूजितुमिच्छामि यावदिंद्रो भवाम्यहम्

sarve te nāśamṛcchaṁtu vara eṣa mato mama yuvāṁ pūjitumicchāmi yāvadiṁdro bhavāmyaham

-- वे सभी नष्ट हो जाएँ, यह मेरा अभीष्ट वर है। मैं जब तक इन्द्र रहूँ, तब तक तुम दोनों की पूजा करना चाहता हूँ।'

श्लोक 24 (skanda.5.32.24)

तथेति चोक्त्वा प्रतिमे ते नाकं प्रति जग्मतुः । तत्तु याचे ह्यवश्यार्थे वरार्थे प्रतिमाद्वयम्

tatheti coktvā pratime te nākaṁ prati jagmatuḥ tattu yāce hyavaśyārthe varārthe pratimādvayam

'ऐसा ही हो' कहकर वे प्रतिमाएँ स्वर्ग को चली गईं। बाद में उन्हीं दो प्रतिमाओं को उसी प्रयोजन हेतु वरस्वरूप --

श्लोक 25 (skanda.5.32.25)

इंद्र उवाच । साधु पार्थ पुनः साधु यत्रेत्थं प्रतितिष्ठतः । इमे च प्रतिमे पार्थ शंकरेण महात्मना

iṁdra uvāca sādhu pārtha punaḥ sādhu yatretthaṁ pratitiṣṭhataḥ ime ca pratime pārtha śaṁkareṇa mahātmanā

-- इन्द्र ने कहा -- 'साधु, हे पार्थ! फिर से साधु, कि तुमने ऐसा माँगा है। हे पार्थ! ये दोनों प्रतिमाएँ महात्मा शंकर द्वारा --

श्लोक 26 (skanda.5.32.26)

सुरक्तैः शतपत्रैश्च पूजिते ब्रह्मणो दिनम् । । त्रैलोक्यपालनार्थाय पूजिते विष्णुना पुरा

suraktaiḥ śatapatraiśca pūjite brahmaṇo dinam trailokyapālanārthāya pūjite viṣṇunā purā

-- सौ पंखुड़ी वाले लाल कमलों से ब्रह्मा के एक पूरे दिन तक पूजित थीं; और पूर्वकाल में त्रिलोक-रक्षा हेतु विष्णु द्वारा पूजित --

श्लोक 27 (skanda.5.32.27)

नीलोत्पलैः सुगंधैश्च सहस्रपरिवत्सरान् । ततः प्रजापतिः सृष्टिं कर्तुकामः समा हितः

nīlotpalaiḥ sugaṁdhaiśca sahasraparivatsarān tataḥ prajāpatiḥ sṛṣṭiṁ kartukāmaḥ samā hitaḥ

-- नीले कमलों और सुगन्ध से सहस्र वर्षों तक पूजित हुईं। तब सृष्टि करने की इच्छा से समाहितचित्त प्रजापति ने --

श्लोक 28 (skanda.5.32.28)

पूजयामास प्रतिमे पद्मै रक्तोत्पलैः शुभैः । त्वमेव हि कथं पार्थ मृत्युलोके नयिष्यति

pūjayāmāsa pratime padmai raktotpalaiḥ śubhaiḥ tvameva hi kathaṁ pārtha mṛtyuloke nayiṣyati

-- कमलों और शुभ लाल कमलों से उन प्रतिमाओं का पूजन किया। हे पार्थ! तुम इन्हें मृत्युलोक में कैसे ले जाओगे?

श्लोक 29 (skanda.5.32.29)

एताभ्यां रहितः स्वर्गो मृत्युतुल्यो भविष्यति । अदातुकामं देवेंद्रं प्रणिपत्य तमर्जुनः

etābhyāṁ rahitaḥ svargo mṛtyutulyo bhaviṣyati adātukāmaṁ deveṁdraṁ praṇipatya tamarjunaḥ

इनके बिना स्वर्ग मृत्यु के समान हो जाएगा।' देना न चाहते देवेन्द्र को अर्जुन ने प्रणाम कर --

श्लोक 30 (skanda.5.32.30)

उवाच नाहमर्थ्यस्मिन्वरेणानेन वै प्रभो । ततः शक्रः पुनः पार्थमुवाच मुनिपुंगव

uvāca nāhamarthyasminvareṇānena vai prabho tataḥ śakraḥ punaḥ pārthamuvāca munipuṁgava

-- कहा 'हे प्रभो! मुझे इस वर की आवश्यकता नहीं है।' तब हे मुनिपुंगव! शक्र ने पुनः पार्थ से कहा --

श्लोक 31 (skanda.5.32.31)

गृहीत्वा त्वमिमे वीर कुशस्थल्यां निवेशय । शिप्राया उत्तरे तीरे केशवार्कं तु केशवः

gṛhītvā tvamime vīra kuśasthalyāṁ niveśaya śiprāyā uttare tīre keśavārkaṁ tu keśavaḥ

-- 'हे वीर! इन्हें लेकर कुशस्थली में स्थापित करो। शिप्रा के उत्तर तट पर, जहाँ केशव ने केशवार्क --

श्लोक 32 (skanda.5.32.32)

प्रति तिष्ठति वै यत्र सर्वपापप्रणाशनः । संस्थापयस्व वै तत्र सर्वपापप्रणाशने । भविष्यति तदा यात्रा आषाढी चाथ कौमुदी

prati tiṣṭhati vai yatra sarvapāpapraṇāśanaḥ saṁsthāpayasva vai tatra sarvapāpapraṇāśane bhaviṣyati tadā yātrā āṣāḍhī cātha kaumudī

-- सर्वपापनाशक स्थापित किए हैं, वहीं इन्हें भी सर्वपापनाशक रूप में स्थापित करो। तब आषाढ़ी और कौमुदी यात्रा होगी।

श्लोक 33 (skanda.5.32.33)

आगमिष्याम्यहं तत्र सहितोऽप्सरसां गणैः । मरुतश्चागमिष्यंति मेघाश्चैव सविद्युतः

āgamiṣyāmyahaṁ tatra sahito'psarasāṁ gaṇaiḥ marutaścāgamiṣyaṁti meghāścaiva savidyutaḥ

मैं भी अप्सराओं के गणों सहित वहाँ आऊँगा। मरुद्गण और बिजली सहित मेघ भी आएँगे।

श्लोक 34 (skanda.5.32.34)

मेघखण्डे समुद्भूते मयि तत्र प्रवर्षति । प्रवदिष्यंति वै लोकाः प्राप्तो देवः पुरंदरः

meghakhaṇḍe samudbhūte mayi tatra pravarṣati pravadiṣyaṁti vai lokāḥ prāpto devaḥ puraṁdaraḥ

जब मेघखण्ड उठकर वहाँ मैं वर्षा करूँगा, तब लोग कहेंगे -- 'देव पुरन्दर पधारे हैं!'

श्लोक 35 (skanda.5.32.35)

भास्करं च नमस्कृत्य ब्रह्माद्यैः पूजितं विभुम् । प्रतियामि तु बीभत्सो पुनरेव यथागतम्

bhāskaraṁ ca namaskṛtya brahmādyaiḥ pūjitaṁ vibhum pratiyāmi tu bībhatso punareva yathāgatam

और भास्कर को, जो ब्रह्मा आदि द्वारा पूजित विभु हैं, नमस्कार कर, हे बीभत्सु! मैं फिर उसी प्रकार लौट जाऊँगा जैसे आया था।'

श्लोक 36 (skanda.5.32.36)

एवं मृर्तिद्वयं व्यास दत्त्वा पार्थाय वासवः । भूर्लोकं प्रेषयामास सूतेन सह पांडवम्

evaṁ mṛrtidvayaṁ vyāsa dattvā pārthāya vāsavaḥ bhūrlokaṁ preṣayāmāsa sūtena saha pāṁḍavam

हे व्यास! इस प्रकार दोनों मूर्तियाँ पार्थ को देकर वासव ने सारथि सहित पांडुपुत्र को भूलोक भेज दिया।

श्लोक 37 (skanda.5.32.37)

नारदो द्वारकायां तु कृष्णस्याह्वानकारणात् । देवराजस्य तद्वाक्यं सरहस्यं च केशवम्

nārado dvārakāyāṁ tu kṛṣṇasyāhvānakāraṇāt devarājasya tadvākyaṁ sarahasyaṁ ca keśavam

तब द्वारका में नारद ने कृष्ण को बुलाने हेतु, देवराज के उस रहस्ययुक्त वचन को केशव को --

श्लोक 38 (skanda.5.32.38)

श्रावयामास विप्रेंद्रं एहि कृष्ण कुशस्थलीम् । अर्च्चे हि पारिजातस्य विश्वकर्मसुकारिते

śrāvayāmāsa vipreṁdraṁ ehi kṛṣṇa kuśasthalīm arcce hi pārijātasya viśvakarmasukārite

-- उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने सुनाया -- 'हे कृष्ण! कुशस्थली आओ; विश्वकर्मा द्वारा भलीभाँति बनाई गई पारिजात की वे प्रतिमाएँ --

श्लोक 39 (skanda.5.32.39)

इंद्रेणाथ प्रदत्ते वै ते तुभ्यं पांडवाय च । श्रुत्वा शौरिस्तु तद्वाक्यं प्रतस्थेऽवंतिनीपुरीम्

iṁdreṇātha pradatte vai te tubhyaṁ pāṁḍavāya ca śrutvā śauristu tadvākyaṁ pratasthe'vaṁtinīpurīm

-- अब इन्द्र द्वारा तुम्हें और पांडुपुत्र को दे दी गई हैं।' यह वचन सुनकर शौरि अवन्तिनी नगरी के लिए चल पड़े।

श्लोक 40 (skanda.5.32.40)

अवातरच्च आकाशात्तमालिंग्य च पांडवम् । प्रीतः प्रोवाच वचनं परिष्वज्य च फाल्गुनम्

avātaracca ākāśāttamāliṁgya ca pāṁḍavam prītaḥ provāca vacanaṁ pariṣvajya ca phālgunam

वे आकाश से उतरकर पांडुपुत्र को आलिंगन कर, प्रसन्न होकर फाल्गुन को गले लगाते हुए वचन बोले --

श्लोक 41 (skanda.5.32.41)

जन्म मे सफलं जातं प्रीतिर्मे जनितार्जुन । यतो मे प्रीतिरतुला क्रियतां कार्यमुत्तमम्

janma me saphalaṁ jātaṁ prītirme janitārjuna yato me prītiratulā kriyatāṁ kāryamuttamam

-- 'मेरा जन्म सफल हो गया, हे अर्जुन! मेरा हर्ष उत्पन्न हुआ। मेरे इस अतुल प्रेम के कारण अब उत्तम कार्य किया जाए।'

श्लोक 42 (skanda.5.32.42)

इत्युक्त्वा तौ तदा व्यास समायातौ कुशस्थलीम् । पार्थं प्राह तदा कृष्णः सुसंपूर्णमनोरथः

ityuktvā tau tadā vyāsa samāyātau kuśasthalīm pārthaṁ prāha tadā kṛṣṇaḥ susaṁpūrṇamanorathaḥ

हे व्यास! ऐसा कहकर वे दोनों कुशस्थली पहुँचे। तब मनोरथ पूर्ण हुए कृष्ण ने पार्थ से कहा --

श्लोक 43 (skanda.5.32.43)

गत्वार्जुन दिशं प्राचीं मूर्तिमेकां निवेशय । पूर्वाह्ने हि शुभं लग्नं भविष्यति मनोरमम्

gatvārjuna diśaṁ prācīṁ mūrtimekāṁ niveśaya pūrvāhne hi śubhaṁ lagnaṁ bhaviṣyati manoramam

-- 'हे अर्जुन! पूर्व दिशा में जाकर एक मूर्ति स्थापित करो। पूर्वाह्न में शुभ, मनोरम लग्न होगा।

श्लोक 44 (skanda.5.32.44)

अहमप्युत्तरां यामि स्थापनार्थं नदीं मुने । मम शंखस्य नादेन प्रतितिष्ठ रविं प्रभुम्

ahamapyuttarāṁ yāmi sthāpanārthaṁ nadīṁ mune mama śaṁkhasya nādena pratitiṣṭha raviṁ prabhum

मैं भी स्थापना हेतु उत्तर की नदी की ओर जाता हूँ, हे मुने! मेरे शंख के नाद पर प्रभु सूर्य को स्थापित करना।

श्लोक 45 (skanda.5.32.45)

पूर्वां गत्वा ततः पार्थ शुभं स्थानं व्यलोकयत् । व्यास संस्थापयामास दिननाथं च सुस्थिरम्

pūrvāṁ gatvā tataḥ pārtha śubhaṁ sthānaṁ vyalokayat vyāsa saṁsthāpayāmāsa dinanāthaṁ ca susthiram

हे व्यास! पूर्व दिशा में जाकर पार्थ ने एक शुभ स्थान देखा; उन्होंने दिननाथ को वहाँ सुस्थिर रूप से स्थापित किया।

श्लोक 46 (skanda.5.32.46)

अर्कं देवं स्थापयामि यावद्दध्यौ च पांडवः । तावत्स चाब्रवीदेनं स्थानं कारय शोभनम्

arkaṁ devaṁ sthāpayāmi yāvaddadhyau ca pāṁḍavaḥ tāvatsa cābravīdenaṁ sthānaṁ kāraya śobhanam

'मैं देव अर्क को स्थापित करता हूँ' -- ऐसा पांडुपुत्र जब तक विचार कर ही रहे थे, तभी उन्होंने स्वयं कहा -- 'इस स्थान को सुशोभित बनाओ।'

श्लोक 47 (skanda.5.32.47)

कथयामास पार्थाय तेजसा तेन दुःसहम् । सव्यसाची ततो भीतो दृष्ट्वार्च्चां तां प्रजल्पतीम्

kathayāmāsa pārthāya tejasā tena duḥsaham savyasācī tato bhīto dṛṣṭvārccāṁ tāṁ prajalpatīm

उन्होंने अपने दुःसह तेज से पार्थ से बात की। सव्यसाची तब उस बोलती हुई प्रतिमा को देखकर भयभीत हो गए,

श्लोक 48 (skanda.5.32.48)

तेजस्त्वसहमानो वै देवं वचनमब्रवीत् । क्व देव त्वां स्थापयामि किं स्थानं तव रोचते

tejastvasahamāno vai devaṁ vacanamabravīt kva deva tvāṁ sthāpayāmi kiṁ sthānaṁ tava rocate

-- तेज को सहन न करते हुए उन्होंने देव से कहा -- 'हे देव! मैं आपको कहाँ स्थापित करूँ? आपको कौन-सा स्थान भाता है?

श्लोक 49 (skanda.5.32.49)

सौम्य रूपः सुदर्शश्च प्रजाभ्यो भव गोपते । दिविसंस्थाश्च ये देवा नागाः पातालसंश्रयाः

saumya rūpaḥ sudarśaśca prajābhyo bhava gopate divisaṁsthāśca ye devā nāgāḥ pātālasaṁśrayāḥ

हे गोपते! प्रजाओं के लिए सौम्य और सुदर्श रूप धारण कीजिए। स्वर्ग में स्थित देव, पाताल-निवासी नाग --

श्लोक 50 (skanda.5.32.50)

भुविस्था मानवाः पूता भवंतु तव दर्शनात् । सोऽर्जुनमब्रवीद्देवो मा भैस्त्वं मम दर्शनात्

bhuvisthā mānavāḥ pūtā bhavaṁtu tava darśanāt so'rjunamabravīddevo mā bhaistvaṁ mama darśanāt

-- और पृथ्वी पर स्थित मनुष्य, आपके दर्शन से पवित्र हो जाएँ।' देव ने अर्जुन से कहा -- 'मेरे दर्शन से भयभीत मत होओ।'

श्लोक 51 (skanda.5.32.51)

दक्षिणेन करेणाथ ह्यभयेनाभयप्रदः । समाश्वास्याथ तं शांतं सौम्यमूर्तिर्बभूव ह

dakṣiṇena kareṇātha hyabhayenābhayapradaḥ samāśvāsyātha taṁ śāṁtaṁ saumyamūrtirbabhūva ha

फिर अभयदाता ने दाहिने हाथ से अभय-मुद्रा दिखाकर उन्हें आश्वस्त किया, और शान्त, सौम्य रूप धारण किया।

श्लोक 52 (skanda.5.32.52)

प्रभाकरेण देवेन निजं तेजः प्रदर्शितम । ततः सूर्योऽब्रवीत्स्थानमेतदेवाचलं मम

prabhākareṇa devena nijaṁ tejaḥ pradarśitama tataḥ sūryo'bravītsthānametadevācalaṁ mama

देव प्रभाकर ने पहले अपना निज तेज दिखाया; फिर सूर्य ने कहा -- 'यही स्थान मेरा अचल निवास होगा।'

श्लोक 53 (skanda.5.32.53)

प्राप्ते लग्ने च हरिणा शंखश्चापूरितो महान् । नरेण च स वै सूर्यः स्थापितोऽमरसंस्तुतः

prāpte lagne ca hariṇā śaṁkhaścāpūrito mahān nareṇa ca sa vai sūryaḥ sthāpito'marasaṁstutaḥ

शुभ लग्न आने पर हरि ने महान शंख बजाया; और उस मनुष्य (अर्जुन) द्वारा वह देवताओं द्वारा प्रशंसित सूर्य स्थापित किया गया।

श्लोक 54 (skanda.5.32.54)

अर्जुन उवाच । जयति किरणमाली भासुरः श्रांतसप्तिः सकलभुवनधामा प्राग्दिगंताट्टहासः । भवति विगतपापं कीर्तनादेव यस्य प्रचुरकलुषदोषैर्ग्रस्तमंगं नराणाम्

arjuna uvāca jayati kiraṇamālī bhāsuraḥ śrāṁtasaptiḥ sakalabhuvanadhāmā prāgdigaṁtāṭṭahāsaḥ bhavati vigatapāpaṁ kīrtanādeva yasya pracurakaluṣadoṣairgrastamaṁgaṁ narāṇām

अर्जुन ने कहा -- विजयी हों वे किरणमाली, देदीप्यमान, अथक अश्वों वाले, समस्त भुवनों के आधार, जिनकी अट्टहास पूर्व दिशा की सीमा है; जिनके कीर्तनमात्र से ही मनुष्यों का पापों से ग्रस्त शरीर पापरहित हो जाता है।

श्लोक 55 (skanda.5.32.55)

ब्रह्माद्यैर्मुनिभिरभिष्टुतं पतंगं कः स्तोतुं कविरभिवांछते प्रकामम् । स्तोष्येहं तदपि सुविस्तरात्सुबुद्धे किं दीपो ज्वलति हि नोदिते शशांके

brahmādyairmunibhirabhiṣṭutaṁ pataṁgaṁ kaḥ stotuṁ kavirabhivāṁchate prakāmam stoṣyehaṁ tadapi suvistarātsubuddhe kiṁ dīpo jvalati hi nodite śaśāṁke

ब्रह्मा आदि मुनियों द्वारा स्तुत उस सूर्य की स्तुति करने की भला कौन कवि पूर्ण इच्छा रखता है? फिर भी हे सुबुद्धे! मैं विस्तार से स्तुति करूँगा -- क्या चन्द्रमा के उदय न होने पर भी दीपक नहीं जलता?

श्लोक 56 (skanda.5.32.56)

शास्त्रार्थकामनिपुणैर्मुनिभिः स्तुतस्य किं वस्तु यन्न रचितं विविधैः प्रयोगैः । द्वैपायनप्रभृतिभिर्मुनिभिः पुराणैरापीतसारमिह भाति जगत्समस्तम्

śāstrārthakāmanipuṇairmunibhiḥ stutasya kiṁ vastu yanna racitaṁ vividhaiḥ prayogaiḥ dvaipāyanaprabhṛtibhirmunibhiḥ purāṇairāpītasāramiha bhāti jagatsamastam

शास्त्रार्थ में निपुण मुनियों द्वारा स्तुत उनके विषय में ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो विविध प्रयोगों से रची नहीं गई? द्वैपायन आदि मुनियों द्वारा पुराणों में जिनका सार समाया, उससे ही यह सम्पूर्ण जगत प्रकाशित होता है।

श्लोक 57 (skanda.5.32.57)

कामं तथाप्यहमतीव विचार्य ब्रुद्ध्या भानोस्त्रिलोकगुरुपूजितपादयुग्मम् । वृत्तैः स्फुटार्थमधुराक्षरसंधियुक्तैस्त्वां वै विचित्रगतिभिः परिकीर्तयिष्ये

kāmaṁ tathāpyahamatīva vicārya bruddhyā bhānostrilokagurupūjitapādayugmam vṛttaiḥ sphuṭārthamadhurākṣarasaṁdhiyuktaistvāṁ vai vicitragatibhiḥ parikīrtayiṣye

फिर भी मैं बुद्धिपूर्वक अत्यन्त विचार कर, त्रिलोकगुरु के चरण-युगल की पूजा करते हुए, स्पष्ट-अर्थ, मधुर-अक्षर संधियों से युक्त छन्दों में, विचित्र गतियों से आपकी स्तुति करूँगा।

श्लोक 58 (skanda.5.32.58)

तावज्जगद्भवति निश्चलमेव सर्वं तावत्क्रियाश्च विविधा न च यांति सिद्धिम् । यावच्च नाथ कमलामलमंडल त्वमुत्तिष्ठसे व्यपनयन्किरणैस्तमांसि

tāvajjagadbhavati niścalameva sarvaṁ tāvatkriyāśca vividhā na ca yāṁti siddhim yāvacca nātha kamalāmalamaṁḍala tvamuttiṣṭhase vyapanayankiraṇaistamāṁsi

जब तक हे नाथ, कमल-सम निर्मल मण्डल! आप किरणों से अन्धकार दूर करते हुए उदित नहीं होते, तब तक सम्पूर्ण जगत निश्चल रहता है और विविध क्रियाएँ सिद्धि को नहीं प्राप्त होतीं।

श्लोक 59 (skanda.5.32.59)

तावन्न भांति शिखराणि महीरुहाणां गुच्छैस्तु फुल्लवनमीलितलोचनानि । सुप्तानि बोधयसि षट्चरणाकुलानि यावन्न भाभिरमलाभिरनुत्तमाभिः

tāvanna bhāṁti śikharāṇi mahīruhāṇāṁ gucchaistu phullavanamīlitalocanāni suptāni bodhayasi ṣaṭcaraṇākulāni yāvanna bhābhiramalābhiranuttamābhiḥ

जब तक आपकी निर्मल, अनुपम किरणें नहीं फैलतीं, तब तक फूले हुए वनों के गुच्छों में मुद्रित नेत्रों जैसे वृक्षशिखर नहीं चमकते; आप ही भ्रमरों से व्याकुल सोए हुए फूलों को जगाते हैं।

श्लोक 60 (skanda.5.32.60)

उद्यंतमंबरतले सुरसिद्धसंघाः सब्रह्मदैत्यमुनिकिन्नरनागयक्षाः । त्वामर्चयंति विबुधाः प्रणतैः शिरोभिश्चञ्चत्किरीटमणिभाभिरनुत्तमाभिः

udyaṁtamaṁbaratale surasiddhasaṁghāḥ sabrahmadaityamunikinnaranāgayakṣāḥ tvāmarcayaṁti vibudhāḥ praṇataiḥ śirobhiścañcatkirīṭamaṇibhābhiranuttamābhiḥ

आकाश में उदित होते हुए आपकी, ब्रह्मा, दैत्य, मुनि, किन्नर, नाग और यक्ष सहित सुर-सिद्ध समूह, चमकते मुकुट-मणियों की अनुपम आभा से युक्त, झुके सिरों से पूजा करते हैं।

श्लोक 61 (skanda.5.32.61)

अस्तं गते त्वयि जगद्भवति प्रसुप्तं भूयस्त्वयि प्रतपति प्रतिबोधमेति । एवं सदा वरद लोकहितार्थहेतोरेकस्त्वमेव भगवंस्तिमिरस्य हंता

astaṁ gate tvayi jagadbhavati prasuptaṁ bhūyastvayi pratapati pratibodhameti evaṁ sadā varada lokahitārthahetorekastvameva bhagavaṁstimirasya haṁtā

आपके अस्त होने पर जगत सो जाता है, आपके पुनः तपने पर पुनः जाग उठता है। हे वरद! इस प्रकार सदा लोक-हित के लिए आप ही एकमात्र अन्धकार के नाशक हैं।

श्लोक 62 (skanda.5.32.62)

उत्साहशक्तिनयशौर्यसमन्वितानां सेवाप्रयोगरचनाविधितत्पराणाम् । कार्याणि यन्न फलदानि भवंति पुंसां हेतुस्त्वभक्तिरिह नाथ वेति नूनम् ।।६२ ६२ । यत्संयुगेषु रथकुञ्जरकुन्तशक्तिनाराचचक्रशरतोमरभीमखड्गैः । क्षिप्रं नराः समुपयांति विजित्य शत्रून्सर्वं सदा प्रणतवत्सल वेष्टितं ते

utsāhaśaktinayaśauryasamanvitānāṁ sevāprayogaracanāvidhitatparāṇām kāryāṇi yanna phaladāni bhavaṁti puṁsāṁ hetustvabhaktiriha nātha veti nūnam 62 62 yatsaṁyugeṣu rathakuñjarakuntaśaktinārācacakraśaratomarabhīmakhaḍgaiḥ kṣipraṁ narāḥ samupayāṁti vijitya śatrūnsarvaṁ sadā praṇatavatsala veṣṭitaṁ te

उत्साह, शक्ति, नीति और शौर्य से युक्त, सेवा और प्रयोग की रचना-विधि में तत्पर मनुष्यों के कार्य जो फलदायी नहीं होते, हे नाथ! उसका कारण निश्चय ही आपके प्रति भक्ति का अभाव है।

श्लोक 63 (skanda.5.32.63)

कांतारदुर्गविषमेष्वपि वर्तमाना ऋक्षेभसिंहबहुकण्टकतस्करेषु । तृष्णान्विताश्च बहुशोकविमूढचित्तास्त्वत्कीर्तनाद्धि गतमृत्यु भया भवंति

kāṁtāradurgaviṣameṣvapi vartamānā ṛkṣebhasiṁhabahukaṇṭakataskareṣu tṛṣṇānvitāśca bahuśokavimūḍhacittāstvatkīrtanāddhi gatamṛtyu bhayā bhavaṁti

युद्धों में रथ, हाथी, बरछे, शक्ति, बाण, चक्र, तीर, तोमर और भयंकर खड्ग से मनुष्य शीघ्र शत्रुओं को जीतकर विजय प्राप्त करते हैं -- हे प्रणतवत्सल! यह सब सदा आपसे ही घिरा है।

श्लोक 64 (skanda.5.32.64)

तेजोराशिस्त्वमिह शरणं सर्वतोदुःखितानां । त्वत्तुल्योऽन्यो जगति सकले नास्ति कश्चिद्दयालुः । त्वय्येकस्मिन्भवति सकला भक्तिरन्विष्यमाणा । त्वामासाद्य प्रभवति कुतो व्याधिदुःखं नराणाम्

tejorāśistvamiha śaraṇaṁ sarvatoduḥkhitānāṁ tvattulyo'nyo jagati sakale nāsti kaściddayāluḥ tvayyekasminbhavati sakalā bhaktiranviṣyamāṇā tvāmāsādya prabhavati kuto vyādhiduḥkhaṁ narāṇām

दुर्गम, भयंकर, विषम वनों में, रीछ, हाथी, सिंह, अनेक काँटों और चोरों के बीच रहते हुए भी, प्यास से व्याकुल और शोक से मोहित मनुष्य -- आपके कीर्तन मात्र से मृत्यु का भय त्याग देते हैं।

श्लोक 65 (skanda.5.32.65)

कः कुष्ठाभिहतः क्व चारिभिरथो को व्याधिभिः पीडितः । के पंग्वंधजडाः क्व शीर्णचरणः को वा विपन्नक्रियः । इत्येवं प्रसमीक्ष्य देव कृपया दोषात्परित्रायसे । कस्यान्यस्य परोपकारनिरता चेष्टा यथैषा तव

kaḥ kuṣṭhābhihataḥ kva cāribhiratho ko vyādhibhiḥ pīḍitaḥ ke paṁgvaṁdhajaḍāḥ kva śīrṇacaraṇaḥ ko vā vipannakriyaḥ ityevaṁ prasamīkṣya deva kṛpayā doṣātparitrāyase kasyānyasya paropakāraniratā ceṣṭā yathaiṣā tava

हे तेजोराशि! आप यहाँ सर्वत्र दुःखियों के शरणस्थल हैं; समस्त जगत में आपके समान दयालु और कोई नहीं है। आप एक में ही खोजी जाती हुई समस्त भक्ति टिकती है; आपको पाकर मनुष्यों को व्याधि-दुःख कहाँ से हो सकता है?

श्लोक 66 (skanda.5.32.66)

धर्मः परत्र किल तिष्ठति सेवितोऽसौ । कालांतरेण विबुधा वरदा भवंति । त्वं सेवितः प्रणतवत्सल भूतिकामैः । सद्यः प्रयच्छसि फलं यदभीप्सितं तैः

dharmaḥ paratra kila tiṣṭhati sevito'sau kālāṁtareṇa vibudhā varadā bhavaṁti tvaṁ sevitaḥ praṇatavatsala bhūtikāmaiḥ sadyaḥ prayacchasi phalaṁ yadabhīpsitaṁ taiḥ

कौन कुष्ठ से पीड़ित है? कहाँ शत्रुओं से घिरा कोई है? कौन रोगों से पीड़ित है? कौन पंगु, अन्धा, जड़ है, कहाँ क्षीण-चरण है, किसका कार्य विफल है? -- हे देव! ऐसा देखकर आप कृपापूर्वक दोष से रक्षा करते हैं। किसी अन्य की चेष्टा आपके समान परोपकार में तत्पर नहीं है।

श्लोक 67 (skanda.5.32.67)

विभ्रांतकांतहरिणीसदृशेक्षणाभिः । कांतोरुहारमणिकुण्डलमेखलाभिः । तेषां भवंति भवनानि विलासिनीभिर्येषां नृणां त्वमसि वै वरदः प्रसन्नः

vibhrāṁtakāṁtahariṇīsadṛśekṣaṇābhiḥ kāṁtoruhāramaṇikuṇḍalamekhalābhiḥ teṣāṁ bhavaṁti bhavanāni vilāsinībhiryeṣāṁ nṛṇāṁ tvamasi vai varadaḥ prasannaḥ

धर्म का सेवन तो परलोक में ही फलित होता है; अन्य देवगण सेवित होकर काल बीतने पर वरदाता बनते हैं। किन्तु हे प्रणतवत्सल! आप ऐश्वर्य चाहने वालों द्वारा सेवित होकर तत्काल ही अभीष्ट फल प्रदान करते हैं।

श्लोक 68 (skanda.5.32.68)

यैस्त्वं नरैः सकृदपि प्रणतः कथंचिद्ध्यातोऽथवा भुवननाथ तथांतकाले । निष्कल्मषा जगति दुष्कृतिनो भवंति ते निर्मलाः सुकृतिनो गतिमाप्नुवंति

yaistvaṁ naraiḥ sakṛdapi praṇataḥ kathaṁciddhyāto'thavā bhuvananātha tathāṁtakāle niṣkalmaṣā jagati duṣkṛtino bhavaṁti te nirmalāḥ sukṛtino gatimāpnuvaṁti

चंचल हिरणी-सी आँखों वाली, सुन्दर हार, मणि-कुण्डल और मेखला से सुसज्जित विलासिनियों से जिनके घर सुशोभित हैं -- वे ही मनुष्य हैं जिनके लिए आप प्रसन्न होकर वरदाता बनते हैं।

श्लोक 69 (skanda.5.32.69)

ये त्वां कुतर्कमतिभिर्न नमंति भक्त्या रोमांचकंचुकशताकुलितैः शरीरैः । ते निर्धनाः परगृहेष्ववभूतमन्नं क्षुत्क्षामकण्ठवदनाः परितर्कयंति

ye tvāṁ kutarkamatibhirna namaṁti bhaktyā romāṁcakaṁcukaśatākulitaiḥ śarīraiḥ te nirdhanāḥ paragṛheṣvavabhūtamannaṁ kṣutkṣāmakaṇṭhavadanāḥ paritarkayaṁti

हे भुवननाथ! जिन मनुष्यों ने आपको एक बार भी किसी प्रकार प्रणाम किया हो या ध्यान किया हो, चाहे अंतकाल में ही सही -- वे दुष्कर्मी भी संसार में निष्कलंक हो जाते हैं, वे निर्मल पुण्यात्मा सद्गति प्राप्त करते हैं।

श्लोक 70 (skanda.5.32.70)

उदधिजलतरंगक्षोभलोलाक्षियुग्मैः सफणिमणिमयूखोद्भासितैर्लेलिहद्भिः । प्रणिपतितशिरोभिर्नागमुख्यैरजस्रं श्रुतिभिरनुपमाभिः स्तूयसे पुष्कलाभिः

udadhijalataraṁgakṣobhalolākṣiyugmaiḥ saphaṇimaṇimayūkhodbhāsitairlelihadbhiḥ praṇipatitaśirobhirnāgamukhyairajasraṁ śrutibhiranupamābhiḥ stūyase puṣkalābhiḥ

जो कुतर्क बुद्धि वाले, रोमांचित शरीर से सैकड़ों बार भी भक्तिपूर्वक आपको प्रणाम नहीं करते, वे निर्धन होकर दूसरों के घरों में फेंके गए अन्न के लिए, भूख से क्षीण कंठ-मुख लिए, तरसते रहते हैं।

श्लोक 71 (skanda.5.32.71)

तव सुरवर गच्छतोऽनुसरंति त्रिदशनदीकमलोद्ग तानि वातैः । कनककमलरेणुपिंजरितानि भ्रमरकुलानि पतंग चामराणि

tava suravara gacchato'nusaraṁti tridaśanadīkamalodga tāni vātaiḥ kanakakamalareṇupiṁjaritāni bhramarakulāni pataṁga cāmarāṇi

समुद्र की तरंगों के समान चंचल नेत्रों से, फणों की मणि-किरणों से चमकते, जिह्वा लपलपाते नागराज, झुके हुए सिरों से, अनुपम प्रचुर श्रुतियों से निरन्तर आपकी स्तुति करते हैं।

श्लोक 72 (skanda.5.32.72)

तत्त्वध्यानं जलनिधिनिवहे स्थित्वा स्थित्वा चरणनिवहैः । आजीवार्थं प्रतपसि भगवन्कस्ते तुल्यस्त्रिभुवनसमये

tattvadhyānaṁ jalanidhinivahe sthitvā sthitvā caraṇanivahaiḥ ājīvārthaṁ pratapasi bhagavankaste tulyastribhuvanasamaye

तत्त्व का ध्यान करते हुए, समुद्र की जलराशि पर बार-बार अपनी किरणों की पंक्तियों से टिककर, हे भगवन्! आप जीवन-निर्वाह हेतु तपते हैं -- त्रिभुवन में आपके समान कौन है?

श्लोक 73 (skanda.5.32.73)

उदयाद्रिनितंबसंस्थितस्य ह्युदयेष्वस्तमयेषु चावृतस्य । किरणास्तपनीयसप्रभास्ते विलसन्तस्तडितो विडंबयंति

udayādrinitaṁbasaṁsthitasya hyudayeṣvastamayeṣu cāvṛtasya kiraṇāstapanīyasaprabhāste vilasantastaḍito viḍaṁbayaṁti

उदयाचल की तलहटी पर स्थित, उदय और अस्त दोनों में परिवृत आपकी सुवर्ण-आभायुक्त किरणें, चमकती हुई, बिजली को भी लज्जित करती हैं।

श्लोक 74 (skanda.5.32.74)

यथायथा व्रजति रथस्तवांबरे विपाटयन्धनतिमिरौघसंचयान् । तथातथा क्षुभितमहानिलासृतं प्रतीयते मुहुरिव दुन्दुभिर्यथा

yathāyathā vrajati rathastavāṁbare vipāṭayandhanatimiraughasaṁcayān tathātathā kṣubhitamahānilāsṛtaṁ pratīyate muhuriva dundubhiryathā

जैसे-जैसे आपका रथ आकाश में घोर अन्धकार-राशि को चीरता हुआ आगे बढ़ता है, वैसे-वैसे मानो बार-बार क्षुब्ध महावायु से चालित नगाड़ा गूँज उठता है।

श्लोक 75 (skanda.5.32.75)

चारुपद्मविनिमीलितेक्षणां चक्रवाककलहंसमेखलाम् । कामिनीमिव रतिश्रमालसां तां विबोधयसि पद्मिनीं करैः

cārupadmavinimīlitekṣaṇāṁ cakravākakalahaṁsamekhalām kāminīmiva ratiśramālasāṁ tāṁ vibodhayasi padminīṁ karaiḥ

सुन्दर कमलों से मुँदी आँखों वाली, चक्रवाक और हंसों की मेखला वाली, रति-श्रम से आलसित कामिनी के समान उस पद्मिनी को आप अपनी किरण-हाथों से जगाते हैं।

श्लोक 76 (skanda.5.32.76)

नीललोलमतिकान्तमुत्पलं भृंगतुंगचरणाकुलीकृतम् । त्वत्प्रभाभिरनुरागरंजितं पद्मरागमिव शोभते भृशम्

nīlalolamatikāntamutpalaṁ bhṛṁgatuṁgacaraṇākulīkṛtam tvatprabhābhiranurāgaraṁjitaṁ padmarāgamiva śobhate bhṛśam

नीला, चंचल, अत्यन्त सुन्दर, ऊँचे भ्रमर-चरणों से व्याकुल किया हुआ, आपकी किरणों से अनुराग-रंजित नीलकमल, मानो पद्मराग मणि के समान अत्यन्त शोभित होता है।

श्लोक 77 (skanda.5.32.77)

स्फुरच्छशांकहारनिर्मलं खग त्वदंकेष्वचंचलम् । विभात्यतीव कांतमंबरं समं बृहच्चैक पाटलम्

sphuracchaśāṁkahāranirmalaṁ khaga tvadaṁkeṣvacaṁcalam vibhātyatīva kāṁtamaṁbaraṁ samaṁ bṛhaccaika pāṭalam

हे खग! चमकते चन्द्रहार के समान निर्मल, आपकी गोद में अचंचल, बृहत् एकल गुलाबी वर्ण वाला आकाश समान रूप से अत्यन्त सुन्दर सुशोभित होता है।

श्लोक 78 (skanda.5.32.78)

हरिति च तावन्मुहिर्निषेविततमस्यशुभं भवति च यावदैव किरणैस्तव पूजिततरम् । ऋषिभिर्मुनिभिरुदारधीभिः शाश्व तमार्गपरैर्वरद न शक्यते तव गुणस्तुतिराश्रयितुम्

hariti ca tāvanmuhirniṣevitatamasyaśubhaṁ bhavati ca yāvadaiva kiraṇaistava pūjitataram ṛṣibhirmunibhirudāradhībhiḥ śāśva tamārgaparairvarada na śakyate tava guṇastutirāśrayitum

अन्धकार में लीन जो भी अशुभ है, वह तत्काल हरा जाता है, और जब तक आपकी किरणों से वह अत्यन्त पूजनीय हो जाता है -- हे वरद! उदार बुद्धि वाले, शाश्वत मार्ग में तत्पर ऋषि-मुनियों द्वारा भी आपके गुणों की स्तुति पूर्णतः नहीं की जा सकती।

श्लोक 79 (skanda.5.32.79)

त्वं विष्णुस्त्वं शशांकस्त्वमसुरमथनः शण्मुखस्त्वं धनेशस्त्वं कालस्त्वं च धाता क्षितिधरमलयापाश्रयस्त्वं हुताशः । ॐकारस्त्वं द्विजानां त्वमिह जलनिधित्वं शरस्त्वं च रुद्रस्त्वं मुख्यस्त्वं पयोदो व्रतयमनियमास्त्वं जगत्सर्वमेव

tvaṁ viṣṇustvaṁ śaśāṁkastvamasuramathanaḥ śaṇmukhastvaṁ dhaneśastvaṁ kālastvaṁ ca dhātā kṣitidharamalayāpāśrayastvaṁ hutāśaḥ oṁkārastvaṁ dvijānāṁ tvamiha jalanidhitvaṁ śarastvaṁ ca rudrastvaṁ mukhyastvaṁ payodo vratayamaniyamāstvaṁ jagatsarvameva

आप विष्णु हैं, आप चन्द्रमा हैं, आप असुरों के नाशक हैं, आप षण्मुख हैं, आप धनेश हैं, आप काल हैं, आप विधाता हैं, आप मलय सहित पर्वतों के आश्रय हैं, आप अग्नि हैं; आप द्विजों के लिए ओंकार हैं, यहाँ आप समुद्र हैं, आप शर हैं, आप रुद्र हैं, आप मुख्य हैं, आप मेघ हैं, आप ही व्रत, यम, नियम हैं -- आप ही यह सम्पूर्ण जगत हैं।

श्लोक 80 (skanda.5.32.80)

त्वमनिंद्य गोपते त्रिपुरमथन मन्मथदाहकरस्त्वमसुरभीमदर्पहा पाहि माम् । त्रिदशाधिपकमलवराननस्त्वमिह देवगुरुर्भगवां स्त्रिभुवनमण्डलेऽस्ति कतमस्तव तुल्यगुणः

tvamaniṁdya gopate tripuramathana manmathadāhakarastvamasurabhīmadarpahā pāhi mām tridaśādhipakamalavarānanastvamiha devagururbhagavāṁ stribhuvanamaṇḍale'sti katamastava tulyaguṇaḥ

हे निष्कलंक गोपते! त्रिपुर-नाशक, मन्मथ-दाहक! असुरों के भयंकर मद का नाश करने वाले! मेरी रक्षा करें। हे त्रिदशाधिपति! कमल-सम मुख वाले, भगवन्, देवगुरु! त्रिभुवन-मण्डल में आपके समान गुण किसके हैं?

श्लोक 81 (skanda.5.32.81)

आदित्य भास्कर दिवाकर सप्तसप्ते मार्तंड सूर्य हरिदश्वपते च भानो । अश्रांतवाहन खरूप गभस्तिमालिंस्त्वां लोकनाथ शरणं प्रतिपद्यतेऽसौ

āditya bhāskara divākara saptasapte mārtaṁḍa sūrya haridaśvapate ca bhāno aśrāṁtavāhana kharūpa gabhastimāliṁstvāṁ lokanātha śaraṇaṁ pratipadyate'sau

हे आदित्य, भास्कर, दिवाकर, सप्तसप्ति, मार्तण्ड, सूर्य, हरितअश्वों के स्वामी, हे भानो! हे अथकवाहन, आकाशरूप, किरण-मालाधारी! हे लोकनाथ! यह मैं आपकी शरण में आया हूँ।

श्लोक 82 (skanda.5.32.82)

प्राग्दिग्वधूतिलकभासुरकर्णपूर मंदाकिनीदयितनाथ जगत्प्रदीप । हेमाद्रितापन नभस्तलहारिरत्न सन्ध्यांगनावदनराग नमोनमस्ते

prāgdigvadhūtilakabhāsurakarṇapūra maṁdākinīdayitanātha jagatpradīpa hemādritāpana nabhastalahāriratna sandhyāṁganāvadanarāga namonamaste

हे पूर्व-दिशारूपी वधू के तिलक, कर्णभूषण! मन्दाकिनी के प्रिय स्वामी! जगत के दीपक! हेमाद्रि के तापक! आकाश-मण्डल के हार-रत्न! सन्ध्यारूपी नारी के मुख की लाली! आपको बारम्बार नमस्कार है।

श्लोक 83 (skanda.5.32.83)

ब्रह्मैव सत्य शुभमंगल लोकनाथ व्योमांगणेश मुनिसंस्तुत विश्वमूर्ते । आर्तस्य शोकहर किंकरपालकश्च त्वं मे प्रसीद भगवञ्छरणागतस्य

brahmaiva satya śubhamaṁgala lokanātha vyomāṁgaṇeśa munisaṁstuta viśvamūrte ārtasya śokahara kiṁkarapālakaśca tvaṁ me prasīda bhagavañcharaṇāgatasya

हे साक्षात् ब्रह्म, सत्य, शुभ, मंगल, लोकनाथ, आकाश-आँगन के स्वामी, मुनियों द्वारा स्तुत, विश्वरूप! आर्तों के शोकनाशक और सेवकों के पालनकर्ता! शरणागत मुझ पर, हे भगवन्, प्रसन्न होइए।

श्लोक 84 (skanda.5.32.84)

कृत्वांजलिं शिरसि पंकजकुड्मलाभं यत्संस्तुतस्त्वमिह देव मयाद्य भक्त्या । तेन प्रभो भव ममोपरि सौम्यमूर्तिर्धर्मे मतिं कुरु सदा श्रियमूर्जितां च

kṛtvāṁjaliṁ śirasi paṁkajakuḍmalābhaṁ yatsaṁstutastvamiha deva mayādya bhaktyā tena prabho bhava mamopari saumyamūrtirdharme matiṁ kuru sadā śriyamūrjitāṁ ca

सिर पर कमल-कली के समान अंजलि जोड़कर, हे देव! जो कुछ भी आज मैंने भक्तिपूर्वक आपकी स्तुति की है, उससे, हे प्रभो! मेरे ऊपर सौम्य रूप में प्रसन्न हों; मेरी बुद्धि सदा धर्म में लगाइए और समृद्ध श्री प्रदान कीजिए।

श्लोक 85 (skanda.5.32.85)

नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे जगत्प्रसूतिस्थितिनाशहे तवे । त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारणे विरंचिनारायणशंकरात्मने

namaḥ savitre jagadekacakṣuṣe jagatprasūtisthitināśahe tave trayīmayāya triguṇātmadhāraṇe viraṁcinārāyaṇaśaṁkarātmane

सवितृ को नमस्कार, जो जगत के एकमात्र नेत्र हैं, जगत की उत्पत्ति, स्थिति और नाश के कारण हैं, त्रयीमय हैं, त्रिगुण को धारण करते हैं, और स्वयं विरंचि, नारायण तथा शंकर स्वरूप हैं।

श्लोक 86 (skanda.5.32.86)

सूर्य उवाच । तुष्टोहमधुना पार्थ स्तोत्रेणानेन सुव्रत । वरं दास्यामि यत्नेन यत्ते मनसि वर्तते

sūrya uvāca tuṣṭohamadhunā pārtha stotreṇānena suvrata varaṁ dāsyāmi yatnena yatte manasi vartate

सूर्य ने कहा -- हे सुव्रत पार्थ! इस स्तोत्र से मैं अभी प्रसन्न हुआ हूँ। तुम्हारे मन में जो हो, वह वर मैं यत्नपूर्वक दूँगा।

श्लोक 87 (skanda.5.32.87)

मद्दर्शनं हि विफलं न कदाचित्प्रजायते । शूराणां च विशेषेण ह्यदेयं नास्ति यत्नतः

maddarśanaṁ hi viphalaṁ na kadācitprajāyate śūrāṇāṁ ca viśeṣeṇa hyadeyaṁ nāsti yatnataḥ

मेरा दर्शन कभी विफल नहीं होता; विशेष रूप से शूरवीरों के लिए तो यत्नपूर्वक कुछ भी अदेय नहीं है।

श्लोक 88 (skanda.5.32.88)

अर्जुन उवाच । एष एव वरो मह्यं वराणामुत्तमोत्तमः । अत्र संनिहितो देव सर्वकालं भव प्रभो

arjuna uvāca eṣa eva varo mahyaṁ varāṇāmuttamottamaḥ atra saṁnihito deva sarvakālaṁ bhava prabho

अर्जुन ने कहा -- यही मेरे लिए वरों में सर्वोत्तम वर है -- हे देव, प्रभो! आप यहाँ सदा-सर्वदा उपस्थित रहें।

श्लोक 89 (skanda.5.32.89)

ये च त्वां मानवा भक्त्या स्तो ष्यंति प्रणताः सदा । तेषां धनं च धान्यं च पुत्रदारादिकं वसु

ye ca tvāṁ mānavā bhaktyā sto ṣyaṁti praṇatāḥ sadā teṣāṁ dhanaṁ ca dhānyaṁ ca putradārādikaṁ vasu

और जो मनुष्य सदा प्रणत होकर भक्तिपूर्वक आपकी स्तुति करेंगे, उनके लिए धन, धान्य, पुत्र-पत्नी आदि सम्पत्ति --

श्लोक 90 (skanda.5.32.90)

मनसश्चेप्सितं सर्व दातव्यं हि वरो मम । सनत्कुमार उवाच । आदित्यो ऽस्मै वरं दत्त्वा ह्युवाच वचनं शुभम्

manasaścepsitaṁ sarva dātavyaṁ hi varo mama sanatkumāra uvāca ādityo 'smai varaṁ dattvā hyuvāca vacanaṁ śubham

-- और मन की समस्त अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान की जाएँ, यही मेरा वर है।' सनत्कुमार ने कहा -- आदित्य ने उन्हें यह वर देकर शुभ वचन कहा --

श्लोक 91 (skanda.5.32.91)

यस्त्वत्कृतेन स्तोत्रेण मां स्तोष्यति नरोत्तमः । श्रिया न विच्युतिस्तस्य भवेदेष वरो मम

yastvatkṛtena stotreṇa māṁ stoṣyati narottamaḥ śriyā na vicyutistasya bhavedeṣa varo mama

-- 'जो श्रेष्ठ मनुष्य तुम्हारे रचे इस स्तोत्र से मेरी स्तुति करेगा, उसकी श्री कभी नष्ट नहीं होगी -- यही मेरा वर है।'

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