अवन्ती खण्ड · अध्याय 195
करञ्जेश्वर तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.195.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र करञ्जेश्वरमुत्तमम्। यत्र सिद्धो महाभागो दैत्यो लोकेषु विश्रुतः
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchettu rājendra karañjeśvaramuttamam| yatra siddho mahābhāgo daityo lokeṣu viśrutaḥ
श्री मार्कण्डेय ने कहा — हे राजेन्द्र! फिर उत्तम करञ्जेश्वर तीर्थ को जाना चाहिए, जहाँ लोकों में विख्यात महाभाग्यशाली दैत्य को सिद्धि प्राप्त हुई।
श्लोक 2 (skanda.5.195.2)
युधिष्ठिर उवाच। योऽसौ सिद्धो महाभाग तत्र तीर्थे महातपाः। कस्य पुत्रः कथं सिद्धः कस्मिन्काले वद द्विज
yudhiṣṭhira uvāca| yo'sau siddho mahābhāga tatra tīrthe mahātapāḥ| kasya putraḥ kathaṁ siddhaḥ kasminkāle vada dvija
युधिष्ठिर ने कहा — हे द्विज! जो वह महाभाग्यशाली महातपस्वी उस तीर्थ में सिद्ध हुआ, वह किसका पुत्र था, किस प्रकार सिद्ध हुआ, तथा किस काल में — यह बताइए।
श्लोक 3 (skanda.5.195.3)
मार्कण्डेय उवाच। पुरा कृतयुगे राजन्मानसो ब्रह्मणः सुतः। वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो मरीचिर्नाम नामतः
mārkaṇḍeya uvāca| purā kṛtayuge rājanmānaso brahmaṇaḥ sutaḥ| vedavedāṅgatattvajño marīcirnāma nāmataḥ
मार्कण्डेय ने कहा — हे राजन्! पूर्वकाल में सत्ययुग में ब्रह्मा के मानसपुत्र, वेद-वेदांग के तत्त्वज्ञाता, मरीचि नामक ऋषि थे।
श्लोक 4 (skanda.5.195.4)
तस्यापि तपसो राशेः कालेन महतानघ। पुत्रोऽथ मानसो जातः साक्षाद्ब्रह्मेव चापरः
tasyāpi tapaso rāśeḥ kālena mahatānagha| putro'tha mānaso jātaḥ sākṣādbrahmeva cāparaḥ
हे निष्पाप! उस तपोराशि मरीचि के भी दीर्घकाल पश्चात् एक मानसपुत्र उत्पन्न हुआ, जो मानो साक्षात् दूसरे ब्रह्मा के समान था।
श्लोक 5 (skanda.5.195.5)
क्षमा दमो दया दानं सत्यं शौचमथार्जवम्। मरीचेश्च गुणा ह्येते सन्ति तस्य च भारत
kṣamā damo dayā dānaṁ satyaṁ śaucamathārjavam| marīceśca guṇā hyete santi tasya ca bhārata
हे भारत! क्षमा, दम, दया, दान, सत्य, शौच तथा आर्जव — ये सभी गुण जैसे मरीचि में थे, वैसे ही उसके पुत्र में भी थे।
श्लोक 6 (skanda.5.195.6)
एवं गुणगणाकीर्णं कश्यपं द्विजसत्तमम्। ज्ञात्वा प्रजापतिर्दक्षो भार्यार्थे स्वसुतां ददौ
evaṁ guṇagaṇākīrṇaṁ kaśyapaṁ dvijasattamam| jñātvā prajāpatirdakṣo bhāryārthe svasutāṁ dadau
इस प्रकार गुणसमूह से युक्त उस द्विजश्रेष्ठ कश्यप को जानकर प्रजापति दक्ष ने उसे पत्नी के रूप में अपनी पुत्रियाँ प्रदान कीं।
श्लोक 7 (skanda.5.195.7)
अदितिर्दितिर्दनुश्चैव तथाप्येवं दशापराः। यासां पुत्राश्च संजाताः पौत्राश्च भरतर्षभ
aditirditirdanuścaiva tathāpyevaṁ daśāparāḥ| yāsāṁ putrāśca sañjātāḥ pautrāśca bharatarṣabha
हे भरतर्षभ! अदिति, दिति, दनु तथा इसी प्रकार दस अन्य पत्नियाँ थीं, जिनसे पुत्र और पौत्र उत्पन्न हुए।
श्लोक 8 (skanda.5.195.8)
अदितिर्जनयामास पुत्रानिन्द्रपुरोगमान्। जातास्तस्य महाबाहो कश्यपस्य प्रजापतेः
aditirjanayāmāsa putrānindrapurogamān| jātāstasya mahābāho kaśyapasya prajāpateḥ
हे महाबाहो! अदिति ने इन्द्र आदि पुत्रों को जन्म दिया, जो प्रजापति कश्यप से उत्पन्न हुए।
श्लोक 9 (skanda.5.195.9)
यैस्तु लोकत्रयं व्याप्तं स्थावरं जङ्गमं महत्। तथान्यस्य महाभागो दनोः पुत्रो व्यजायत
yaistu lokatrayaṁ vyāptaṁ sthāvaraṁ jaṅgamaṁ mahat| tathānyasya mahābhāgo danoḥ putro vyajāyata
जिनसे यह विशाल स्थावर-जंगम त्रैलोक्य व्याप्त हो गया; उसी प्रकार अन्य महाभाग्यशालिनी दनु का भी एक पुत्र उत्पन्न हुआ।
श्लोक 10 (skanda.5.195.10)
सर्वलक्षणसम्पन्नः करञ्जो नाम नामतः। बाल एव महाभाग चचार स महत्तपः
sarvalakṣaṇasampannaḥ karañjo nāma nāmataḥ| bāla eva mahābhāga cacāra sa mahattapaḥ
वह सर्वलक्षणसम्पन्न पुत्र करञ्ज नाम से जाना गया; हे महाभाग! वह बाल्यकाल से ही महान तप करने लगा।
श्लोक 11 (skanda.5.195.11)
नर्मदातटमाश्रित्य चातिघोरमनुत्तमम्। दिव्यं वर्षसहस्रं च कृच्छ्रचान्द्रायणं नृप
narmadātaṭamāśritya cātighoramanuttamam| divyaṁ varṣasahasraṁ ca kṛcchracāndrāyaṇaṁ nṛpa
हे नृप! नर्मदा के तट पर आश्रय लेकर उसने अत्यन्त घोर तथा उत्तम, एक हजार दिव्य वर्षों तक कृच्छ्र-चान्द्रायण व्रत का पालन किया।
श्लोक 12 (skanda.5.195.12)
शाकमूलफलाहारः स्नानहोमपरायणः। ततस्तुष्टो महादेव उमया सहितः किल
śākamūlaphalāhāraḥ snānahomaparāyaṇaḥ| tatastuṣṭo mahādeva umayā sahitaḥ kila
वह शाक, मूल और फल का आहार करते हुए स्नान-हवन में तत्पर रहा। तब उमा सहित महादेव उससे संतुष्ट हुए।
श्लोक 13 (skanda.5.195.13)
वरेण छन्दयामास त्रिपुरान्तकरः प्रभुः। भोः करञ्ज महासत्त्व परितुष्टोऽस्मि तेऽनघ
vareṇa chandayāmāsa tripurāntakaraḥ prabhuḥ| bhoḥ karañja mahāsattva parituṣṭo'smi te'nagha
त्रिपुरान्तक प्रभु ने उसे वर के लिए प्रलोभित किया — हे निष्पाप करञ्ज! हे महासत्त्व! मैं तुमसे परम संतुष्ट हूँ।
श्लोक 14 (skanda.5.195.14)
वरं वृणीष्व ते दद्मि ह्यमरत्वमृते मम
varaṁ vṛṇīṣva te dadmi hyamaratvamṛte mama
वर माँगो, मैं तुम्हें अपनी अमरता के अतिरिक्त सब कुछ दूँगा।
श्लोक 15 (skanda.5.195.15)
करञ्ज उवाच। यदि तुष्टो महादेव यदि देयो वरो मम। तर्हि पुत्राश्च पौत्राश्च सन्तु मे धर्मवत्सलाः
karañja uvāca| yadi tuṣṭo mahādeva yadi deyo varo mama| tarhi putrāśca pautrāśca santu me dharmavatsalāḥ
करञ्ज ने कहा — हे महादेव! यदि तुम संतुष्ट हो, यदि मुझे वर देना चाहते हो, तो मेरे पुत्र और पौत्र धर्मवत्सल हों।
श्लोक 16 (skanda.5.195.16)
तथेत्युक्त्वा महादेव उमया सहितस्तदा। वृषारूढो गणैः सार्द्धं तत्रैवान्तरधीयत
tathetyuktvā mahādeva umayā sahitastadā| vṛṣārūḍho gaṇaiḥ sārddhaṁ tatraivāntaradhīyata
ऐसा ही हो कहकर, तब उमा सहित महादेव वृषभ पर आरूढ़ होकर गणों सहित वहीं अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 17 (skanda.5.195.17)
गते चादर्शनं देवे सोऽपि दैत्यो मुदान्वितः। स्वनाम्नात्र महादेवं स्थापयित्वा ययौ गृहम्
gate cādarśanaṁ deve so'pi daityo mudānvitaḥ| svanāmnātra mahādevaṁ sthāpayitvā yayau gṛham
देव के अदृश्य हो जाने पर वह दैत्य भी हर्षित होकर, वहाँ अपने ही नाम से महादेव को स्थापित कर अपने घर चला गया।
श्लोक 18 (skanda.5.195.18)
तदाप्रभृति तत्तीर्थं सर्वतीर्थेष्वनुत्तमम्। स्नानमात्रानरस्तत्र मुच्यते सर्वपातकैः
tadāprabhṛti tattīrthaṁ sarvatīrtheṣvanuttamam| snānamātrānarastatra mucyate sarvapātakaiḥ
तभी से वह तीर्थ समस्त तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ हुआ; वहाँ मात्र स्नान करने से ही मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 19 (skanda.5.195.19)
तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा तर्पयेत्पितृदेवताः। सोऽग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयम्
tatra tīrthe tu yaḥ snātvā tarpayetpitṛdevatāḥ| so'gniṣṭomasya yajñasya phalaṁ prāpnotyasaṁśayam
जो उस तीर्थ में स्नान कर पितृ-देवताओं को तर्पण करता है, वह निःसंदेह अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 20 (skanda.5.195.20)
अनाशकं तु यः कुर्यात्तस्मिंस्तीर्थे नराधिप। अनिवर्त्या गतिस्तस्य रुद्रलोकं स गच्छति
anāśakaṁ tu yaḥ kuryāttasmiṁstīrthe narādhipa| anivartyā gatistasya rudralokaṁ sa gacchati
हे नराधिप! जो उस तीर्थ में अनशन करता है, उसकी गति अनिवर्तनीय होती है, वह रुद्रलोक को जाता है।
श्लोक 21 (skanda.5.195.21)
अथवाग्निजले प्राणान्यस्त्यजेद्धर्मनन्दन। अयुतद्वितयं वस्ते वर्षाणां शिवमन्दिरे
athavāgnijale prāṇānyastyajeddharmanandana| ayutadvitayaṁ vaste varṣāṇāṁ śivamandire
हे धर्मनन्दन! अथवा जो अग्नि या जल में प्राण त्यागता है, वह बीस हजार वर्षों तक शिवमन्दिर में निवास करता है।
श्लोक 22 (skanda.5.195.22)
ततश्चैव क्षये जाते जायते विमले कुले। वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः
tataścaiva kṣaye jāte jāyate vimale kule| vedavedāṅgatattvajñaḥ sarvaśāstraviśāradaḥ
उसके पश्चात्, उस अवधि के समाप्त होने पर, वह निर्मल कुल में जन्म लेता है, वेद-वेदांग का ज्ञाता तथा समस्त शास्त्रों में निपुण होता है।
श्लोक 23 (skanda.5.195.23)
राजा वा राजतुल्यो वा जीवेच्च शरदः शतम्। पुत्रपौत्रसमोपेतः सर्वव्याधिविवर्जितः
rājā vā rājatulyo vā jīvecca śaradaḥ śatam| putrapautrasamopetaḥ sarvavyādhivivarjitaḥ
वह राजा या राजा के समान होकर सौ वर्षों तक जीवित रहता है, पुत्र-पौत्रों से युक्त तथा समस्त व्याधियों से रहित होता है।
श्लोक 24 (skanda.5.195.24)
एवं ते सर्वमाख्यातं पृष्टं यद्यत्त्वयानघ। तीर्थस्य तु फलं तस्य स्नानदानेषु भारत
evaṁ te sarvamākhyātaṁ pṛṣṭaṁ yadyattvayānagha| tīrthasya tu phalaṁ tasya snānadāneṣu bhārata
हे निष्पाप! इस प्रकार तुमने जो कुछ भी पूछा, वह सब मैंने कह दिया; हे भारत! यह उस तीर्थ का फल है, स्नान और दान में।
श्लोक 25 (skanda.5.195.25)
एतत्पुण्यं पापहरं धन्यं दुःस्वप्ननाशनम्। पठतां शृण्वतां चैव तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम्
etatpuṇyaṁ pāpaharaṁ dhanyaṁ duḥsvapnanāśanam| paṭhatāṁ śṛṇvatāṁ caiva tīrthamāhātmyamuttamam
यह पुण्यमय, पापनाशक, धन्यकारी, दुःस्वप्न-नाशक, तीर्थ का यह उत्तम माहात्म्य पढ़ने और सुनने वालों के लिए है।
श्लोक 26 (skanda.5.195.26)
यस्तु श्रावयते श्राद्धे पठेत्पितृपरायणः। अक्षयं जायते पुण्यमित्येवं शङ्करोऽब्रवीत्
yastu śrāvayate śrāddhe paṭhetpitṛparāyaṇaḥ| akṣayaṁ jāyate puṇyamityevaṁ śaṅkaro'bravīt
जो श्राद्ध में इसे सुनाता है, या पितरों के प्रति समर्पित होकर इसे पढ़ता है, उसे अक्षय पुण्य प्राप्त होता है — ऐसा शंकर ने कहा।