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अवन्ती खण्ड · अध्याय 196

कुण्डलेश्वर तीर्थ की महिमा

अध्याय 195अध्याय-सूचीअध्याय 197

श्लोक 1 (skanda.5.196.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेच्च राजेन्द्र कुण्डलेश्वरमुत्तमम्। यत्र सिद्धो महायक्षः कुण्डधारो नृपोत्तम

śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gaccheccha rājendra kuṇḍaleśvaramuttamam| yatra siddho mahāyakṣaḥ kuṇḍadhāro nṛpottama

श्री मार्कण्डेय ने कहा — हे राजेन्द्र! फिर उत्तम कुण्डलेश्वर तीर्थ को जाना चाहिए, हे नृपोत्तम! जहाँ महायक्ष कुण्डधार सिद्ध हुआ।

श्लोक 2 (skanda.5.196.2)

तपः कृत्वा सुविपुलं सुरासुरभयंकरम्। पौलस्त्यमन्दिरे चैव चिक्रीड नृपसत्तम

tapaḥ kṛtvā suvipulaṁ surāsurabhayaṁkaram| paulastyamandire caiva cikrīḍa nṛpasattama

हे नृपसत्तम! अत्यन्त विपुल तथा सुर-असुरों को भयभीत करने वाला तप करके, वह पुलस्त्य (कुबेर) के भवन में विहार करने लगा।

श्लोक 3 (skanda.5.196.3)

युधिष्ठिर उवाच। कस्मिन्युगे समुत्पन्नः कस्य पुत्रो महामतिः। तपस्तप्त्वा सुविपुलं तोषितो येन शङ्करः

yudhiṣṭhira uvāca| kasminyuge samutpannaḥ kasya putro mahāmatiḥ| tapastaptvā suvipulaṁ toṣito yena śaṅkaraḥ

युधिष्ठिर ने कहा — वह महामति किस युग में उत्पन्न हुआ, किसका पुत्र था, और किस विपुल तप से उसने शंकर को संतुष्ट किया?

श्लोक 4 (skanda.5.196.4)

एतद्विस्तरतस्तात कथयस्व ममानघ। शृण्वतश्च न तृप्तिर्मे कथामृतमनुत्तमम्

etadvistaratastāta kathayasva mamānagha| śṛṇvataśca na tṛptirme kathāmṛtamanuttamam

हे निष्पाप तात! यह मुझे विस्तार से कहिए; इस अमृत के समान उत्तम कथा को सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं होती।

श्लोक 5 (skanda.5.196.5)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। त्रेतायुगे ब्रह्मसमः पौलस्त्योनाम विश्रवाः। तपः कृत्वा सुविपुलं भरद्वाजसुतोद्भवः

śrīmārkaṇḍeya uvāca| tretāyuge brahmasamaḥ paulastyo nāma viśravāḥ| tapaḥ kṛtvā suvipulaṁ bharadvājasutodbhavaḥ

श्री मार्कण्डेय ने कहा — त्रेतायुग में ब्रह्मा के समान, पुलस्त्य के वंशज विश्रवा नामक ऋषि, भरद्वाज के पुत्र से उत्पन्न, अत्यन्त विपुल तप करके,

श्लोक 6 (skanda.5.196.6)

पुत्रं पौत्रगणैर्युक्तं पत्न्या भक्त्या सुतोषितः। धनदं जनयामास सर्वलक्षणलक्षितम्

putraṁ pautragaṇairyuktaṁ patnyā bhaktyā sutoṣitaḥ| dhanadaṁ janayāmāsa sarvalakṣaṇalakṣitam

अपनी पत्नी से भक्तिपूर्वक अतीव संतुष्ट होकर, उसने सर्वलक्षणों से सम्पन्न, पौत्रों से युक्त होने वाले पुत्र धनद को जन्म दिया।

श्लोक 7 (skanda.5.196.7)

जातमात्रं तु तं ज्ञात्वा ब्रह्मा लोकपितामहः। चकार नाम सुप्रीत ऋषिदेवसमन्वितः

jātamātraṁ tu taṁ jñātvā brahmā lokapitāmahaḥ| cakāra nāma suprīta ṛṣidevasamanvitaḥ

जन्म लेते ही उसे जानकर लोकपितामह ब्रह्मा ऋषियों और देवों सहित अत्यन्त प्रसन्न होकर उसका नामकरण करने लगे।

श्लोक 8 (skanda.5.196.8)

यस्माद्विश्रवसो जातो मम पौत्रत्वमागतः। तस्माद्वैश्रवणो नाम तव दत्तं मयानघ

yasmādviśravaso jāto mama pautratvamāgataḥ| tasmādvaiśravaṇo nāma tava dattaṁ mayānagha

चूँकि तुम विश्रवा से उत्पन्न होकर मेरे पौत्रत्व को प्राप्त हुए हो, इसलिए हे निष्पाप! मैंने तुम्हें वैश्रवण नाम दिया है।

श्लोक 9 (skanda.5.196.9)

तथा त्वं सर्वदेवानां धनगोप्ता भविष्यसि। चतुर्थो लोकपालानामक्षयश्चाव्ययो भुवि

tathā tvaṁ sarvadevānāṁ dhanagoptā bhaviṣyasi| caturtho lokapālānāmakṣayaścāvyayo bhuvi

तथा तुम समस्त देवों के धन के रक्षक बनोगे, लोकपालों में चौथे तथा पृथ्वी पर अक्षय और अव्यय होगे।

श्लोक 10 (skanda.5.196.10)

तस्य भार्या महाराज ईश्वरीति च विश्रुता। यक्षो यक्षाधिपः श्रेष्ठस्तस्य कुण्डोऽभवत्सुतः

tasya bhāryā mahārāja īśvarīti ca viśrutā| yakṣo yakṣādhipaḥ śreṣṭhastasya kuṇḍo'bhavatsutaḥ

हे महाराज! उसकी पत्नी ईश्वरी नाम से विख्यात थी; उसका पुत्र यक्षों में श्रेष्ठ यक्षाधिप कुण्ड नामक उत्पन्न हुआ।

श्लोक 11 (skanda.5.196.11)

स च रूपं परं प्राप्य मातापित्रोरनुज्ञया। तपश्चचार विपुलं नर्मदातटमाश्रितः

sa ca rūpaṁ paraṁ prāpya mātāpitroranujñayā| tapaścacāra vipulaṁ narmadātaṭamāśritaḥ

वह भी सर्वोत्तम रूप प्राप्त कर, माता-पिता की अनुमति से नर्मदा के तट का आश्रय लेकर विपुल तप करने लगा।

श्लोक 12 (skanda.5.196.12)

ग्रीष्मे पञ्चाग्निसंतप्तो वर्षासु स्थण्डिलेशयः। हेमन्ते जलमध्यस्थो वायुभक्षः शतं समाः

grīṣme pañcāgnisaṁtapto varṣāsu sthaṇḍileśayaḥ| hemante jalamadhyastho vāyubhakṣaḥ śataṁ samāḥ

ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि से तप्त होकर, वर्षा ऋतु में खुले आकाश के नीचे शयन करते हुए, हेमन्त में जल के मध्य खड़े होकर, वायु का भक्षण करते हुए सौ वर्षों तक,

श्लोक 13 (skanda.5.196.13)

एवं वर्षशते पूर्णे एकाङ्गुष्ठेऽभवन्नृप। अस्थिभूतः परं तात ऊर्ध्वबाहुस्ततः परम्

evaṁ varṣaśate pūrṇe ekāṅguṣṭhe'bhavannṛpa| asthibhūtaḥ paraṁ tāta ūrdhvabāhustataḥ param

हे नृप! इस प्रकार सौ वर्ष पूर्ण होने पर वह एक अंगूठे पर खड़ा रहने लगा; हे तात! उसके बाद वह अस्थिमात्र शेष रह गया और ऊर्ध्वबाहु हो गया।

श्लोक 14 (skanda.5.196.14)

अतपच्च घृतश्वासः कुण्डलो भरतर्षभ। चतुर्थे वर्षशतके तुतोष वृषवाहनः

atapacca ghṛtaśvāsaḥ kuṇḍalo bharatarṣabha| caturthe varṣaśatake tutoṣa vṛṣavāhanaḥ

हे भरतर्षभ! कुण्डल घृतश्वास होकर तप करता रहा; चौथे सौ वर्ष में वृषभवाहन शिव संतुष्ट हो गए।

श्लोक 15 (skanda.5.196.15)

वरं वृणीष्व भो वत्स यत्ते मनसि रोचते। ददामि ते न सन्देहस्तपसा तोषितो ह्यहम्

varaṁ vṛṇīṣva bho vatsa yatte manasi rocate| dadāmi te na sandehastapasā toṣito hyaham

हे वत्स! जो तुम्हारे मन को भाता है, वह वर माँगो; मैं तुम्हें अवश्य दूँगा, तुम्हारे तप से मैं संतुष्ट हुआ हूँ।

श्लोक 16 (skanda.5.196.16)

कुण्डल उवाच। यक्षाधिपप्रसादेन तस्यैवानुचरः पुरे। विचरामि यथाकाममवध्यः सर्वशत्रुषु

kuṇḍala uvāca| yakṣādhipaprasādena tasyaivānucaraḥ pure| vicarāmi yathākāmamavadhyaḥ sarvaśatruṣu

कुण्डल ने कहा — यक्षाधिप के अनुग्रह से उन्हीं के नगर में उनका अनुचर बनकर, इच्छानुसार विचरण करते हुए, मैं समस्त शत्रुओं के लिए अवध्य रहूँ।

श्लोक 17 (skanda.5.196.17)

तथेत्युक्त्वा महादेवः सर्वलोकनमस्कृतः। जगामाकाशमाविश्य कैलासं धरणीधरम्

tathetyuktvā mahādevaḥ sarvalokanamaskṛtaḥ| jagāmākāśamāviśya kailāsaṁ dharaṇīdharam

ऐसा ही हो कहकर, समस्त लोकों द्वारा नमस्कृत महादेव आकाश में प्रवेश कर पर्वतराज कैलास को चले गए।

श्लोक 18 (skanda.5.196.18)

गते चादर्शनं देवे सोऽपि यक्षो मुदान्वितः। स्थापयामास देवेशं कुण्डलेश्वरमुत्तमम्

gate cādarśanaṁ deve so'pi yakṣo mudānvitaḥ| sthāpayāmāsa deveśaṁ kuṇḍaleśvaramuttamam

देव के अदृश्य हो जाने पर वह यक्ष भी हर्षित होकर देवेश को उत्तम कुण्डलेश्वर के रूप में स्थापित किया।

श्लोक 19 (skanda.5.196.19)

अलंकृत्वा जगन्नाथं पुष्पधूपानुलेपनैः। विमानैश्चामरैश्छत्रैस्तथा वै लिङ्गपूरणैः

alaṁkṛtvā jagannāthaṁ puṣpadhūpānulepanaiḥ| vimānaiścāmaraiśchatraistathā vai liṅgapūraṇaiḥ

फूलों, धूप और अनुलेपन से जगन्नाथ को अलंकृत कर, विमानों, चामरों, छत्रों तथा लिंग-पूजन की समग्र सामग्री से,

श्लोक 20 (skanda.5.196.20)

तर्पयित्वा द्विजान्सम्यगन्नपानादिभूषणैः। प्रीणयित्वा महादेवं ततः स्वभवनं ययौ

tarpayitvā dvijānsamyagannapānādibhūṣaṇaiḥ| prīṇayitvā mahādevaṁ tataḥ svabhavanaṁ yayau

ब्राह्मणों को उत्तम रीति से अन्न-पान आदि तथा आभूषणों से संतुष्ट कर, महादेव को प्रसन्न कर, वह अपने भवन को चला गया।

श्लोक 21 (skanda.5.196.21)

तदाप्रभृति तत्तीर्थं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्। उत्तमं परमं पुण्यं कुण्डलेश्वरनामतः

tadāprabhṛti tattīrthaṁ triṣu lokeṣu viśrutam| uttamaṁ paramaṁ puṇyaṁ kuṇḍaleśvaranāmataḥ

तभी से वह तीर्थ तीनों लोकों में कुण्डलेश्वर के नाम से विख्यात हुआ, जो उत्तम तथा परम पुण्यमय है।

श्लोक 22 (skanda.5.196.22)

तत्र तीर्थे तु यः कश्चिदुपवासपरायणः। अर्चयेद्देवमीशानं सर्वपापैः प्रमुच्यते

tatra tīrthe tu yaḥ kaścidupavāsaparāyaṇaḥ| arcayeddevamīśānaṁ sarvapāpaiḥ pramucyate

उस तीर्थ में जो कोई उपवासपूर्वक देव ईशान की पूजा करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 23 (skanda.5.196.23)

सुवर्णं रजतं वापि मणिं मौक्तिकमेव च। दद्याद्भोज्यं ब्राह्मणेभ्यः स सुखी मोदते दिवि

suvarṇaṁ rajataṁ vāpi maṇiṁ mauktikameva ca| dadyādbhojyaṁ brāhmaṇebhyaḥ sa sukhī modate divi

जो सोना, चाँदी, मणि या मोती तथा भोजन ब्राह्मणों को देता है, वह सुखी होकर स्वर्ग में आनन्दित होता है।

श्लोक 24 (skanda.5.196.24)

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा ऋग्यजुःसामगोऽपि वा। ऋचमेकां जपित्वा तु सकलं फलमश्नुते

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā ṛgyajuḥsāmago'pi vā| ṛcamekāṁ japitvā tu sakalaṁ phalamaśnute

उस तीर्थ में जो स्नान कर, ऋक्, यजुः या साम का ज्ञाता होकर, एक भी ऋचा का जप करता है, वह समस्त फल प्राप्त करता है।

श्लोक 25 (skanda.5.196.25)

गां प्रयच्छति विप्रेभ्यस्तत्फलं शृणु पाण्डव। यावन्ति तस्या रोमाणि तत्प्रसूतिकुलेषु च

gāṁ prayacchati viprebhyastatphalaṁ śṛṇu pāṇḍava| yāvanti tasyā romāṇi tatprasūtikuleṣu ca

हे पाण्डव! जो ब्राह्मणों को गौ दान करता है, उसका फल सुनो — उस गौ के जितने रोम हैं तथा उसकी सन्तति की जितनी पीढ़ियाँ हैं,

श्लोक 26 (skanda.5.196.26)

तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते। स्वर्गे वासो भवेत्तस्य पुत्रपौत्रैः समन्वितः

tāvadvarṣasahasrāṇi svargaloke mahīyate| svarge vāso bhavettasya putrapautraiḥ samanvitaḥ

उतने ही हजार वर्षों तक वह स्वर्गलोक में महिमान्वित होता है; उसका निवास पुत्र-पौत्रों सहित स्वर्ग में होता है।

श्लोक 27 (skanda.5.196.27)

तावन्ति वर्षाणि महानुभावः स्वर्गे वसेत्पुत्रपौत्रैश्च सार्द्धम्। तत्रान्नदो याति महेशलोकमसंख्यवर्षाणि न संशयोऽत्र

tāvanti varṣāṇi mahānubhāvaḥ svarge vasetputrapautraiśca sārddham| tatrānnado yāti maheśalokamasaṁkhyavarṣāṇi na saṁśayo'tra

उतने ही वर्षों तक वह महानुभाव पुत्र-पौत्रों सहित स्वर्ग में निवास करता है; तथा जो वहाँ अन्नदान करता है, वह असंख्य वर्षों तक महेशलोक में जाता है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 28 (skanda.5.196.28)

स वै सुखी मोदते स्वर्गलोके गन्धर्वसिद्धाप्सरःसम्प्रगीते। एवं तु ते धर्मसुत प्रभावस्तीर्थस्य सर्वः कथितश्च पार्थ

sa vai sukhī modate svargaloke gandharvasiddhāpsaraḥsampragīte| evaṁ tu te dharmasuta prabhāvastīrthasya sarvaḥ kathitaśca pārtha

वह सुखी होकर स्वर्गलोक में आनन्दित होता है, जहाँ गन्धर्व, सिद्ध और अप्सराएँ गीत गाती हैं; हे धर्मपुत्र! हे पार्थ! इस प्रकार तीर्थ का यह सम्पूर्ण प्रभाव तुम्हें कहा गया।

श्लोक 29 (skanda.5.196.29)

श्रुत्वा स्तुवन्मुच्यते सर्वपापैः पुनस्त्रिलोकीमिह तत्प्रभावात्

śrutvā stuvanmucyate sarvapāpaiḥ punastrilokīmiha tatprabhāvāt

इसे सुनकर तथा इसकी स्तुति करने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है, और उसके प्रभाव से पुनः इस त्रिलोकी में उत्तम गति को प्राप्त करता है।

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