Skip to main content

अवन्ती खण्ड · अध्याय 197

पिप्पलाद तीर्थ की महिमा

अध्याय 196अध्याय-सूचीअध्याय 198

श्लोक 1 (skanda.5.197.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र पिप्पलेश्वरमुत्तमम्। यत्र सिद्धो महायोगी पिप्पलादो महातपाः

śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchettu rājendra pippaleśvaramuttamam| yatra siddho mahāyogī pippalādo mahātapāḥ

श्री मार्कण्डेय ने कहा — हे राजेन्द्र! फिर उत्तम पिप्पलेश्वर तीर्थ को जाना चाहिए, जहाँ महायोगी, महातपस्वी पिप्पलाद सिद्ध हुए।

श्लोक 2 (skanda.5.197.2)

युधिष्ठिर उवाच। पिप्पलादस्य चरितं श्रोतुमिच्छाम्यहं विभो। माहात्म्यं तस्य तीर्थस्य यत्र सिद्धो महातपाः

yudhiṣṭhira uvāca| pippalādasya caritaṁ śrotumicchāmyahaṁ vibho| māhātmyaṁ tasya tīrthasya yatra siddho mahātapāḥ

युधिष्ठिर ने कहा — हे विभो! मैं पिप्पलाद के चरित्र को सुनना चाहता हूँ, तथा उस तीर्थ के माहात्म्य को भी, जहाँ वह महातपस्वी सिद्ध हुए।

श्लोक 3 (skanda.5.197.3)

कस्य पुत्रो महाभाग किमर्थं कृतवांस्तपः। एतद्विस्तरतः सर्वं कथयस्व ममानघ

kasya putro mahābhāga kimarthaṁ kṛtavāṁstapaḥ| etadvistarataḥ sarvaṁ kathayasva mamānagha

हे महाभाग! वह किसका पुत्र था, तथा किस प्रयोजन से उसने तप किया? हे निष्पाप! यह सब मुझे विस्तार से कहिए।

श्लोक 4 (skanda.5.197.4)

मार्कण्डेय उवाच। मिथिलास्थो महाभागो वेदवेदाङ्गपारगः। याज्ञवल्क्यः पुरा तात चचार विपुलं तपः

mārkaṇḍeya uvāca| mithilāstho mahābhāgo vedavedāṅgapāragaḥ| yājñavalkyaḥ purā tāta cacāra vipulaṁ tapaḥ

मार्कण्डेय ने कहा — मिथिला में निवास करने वाले, वेद-वेदांग में पारंगत महाभाग्यशाली याज्ञवल्क्य ने, हे तात! पूर्वकाल में विपुल तप किया।

श्लोक 5 (skanda.5.197.5)

तापसी तस्य भगिनी याज्ञवल्क्यस्य धीमतः। सा सप्तमेऽपि वर्षे च वैधव्यं प्राप दैवतः

tāpasī tasya bhaginī yājñavalkyasya dhīmataḥ| sā saptame'pi varṣe ca vaidhavyaṁ prāpa daivataḥ

बुद्धिमान याज्ञवल्क्य की तापसी बहन को दैवयोग से सातवें वर्ष में ही वैधव्य प्राप्त हो गया।

श्लोक 6 (skanda.5.197.6)

पूर्वकर्मविपाकेन हीनाभूत्पितृमातृतः। नाभूत्तत्पतिपक्षेऽपि कोऽपीत्येकाकिनी स्थिता

pūrvakarmavipākena hīnābhūtpitṛmātṛtaḥ| nābhūttatpatipakṣe'pi ko'pītyekākinī sthitā

पूर्वजन्म के कर्मों के फलस्वरूप वह माता-पिता से भी वंचित हो गई; उसके पति-पक्ष में भी कोई न था, इस प्रकार वह अकेली रह गई।

श्लोक 7 (skanda.5.197.7)

भूमौ भ्रमन्ती भ्रातुः सा समीपमगमच्छनैः। चचार च तपः सोऽपि परलोकसुखेप्सया

bhūmau bhramantī bhrātuḥ sā samīpamagamacchanaiḥ| cacāra ca tapaḥ so'pi paralokasukhepsayā

पृथ्वी पर भटकती हुई वह धीरे-धीरे अपने भाई के समीप गई; और वह भाई भी परलोक-सुख की इच्छा से तप करता था।

श्लोक 8 (skanda.5.197.8)

चचार सापि तत्रस्था शुश्रूषन्ती महत्तपः। कस्मिंश्चित्समये साथ स्नाताहनि रजस्वला

cacāra sāpi tatrasthā śuśrūṣantī mahattapaḥ| kasmiṁścitsamaye sātha snātāhani rajasvalā

वह भी वहीं रहकर उसकी सेवा करते हुए महान तप करती रही; किसी समय वह स्नान करके, उस दिन रजस्वला होते हुए भी,

श्लोक 9 (skanda.5.197.9)

अन्तर्वासो धृतवती दृष्ट्वा कर्पटकं रहः। याज्ञवल्क्योऽपि तद्रात्रौ सुप्तो यत्र सुसंवृतः

antarvāso dhṛtavatī dṛṣṭvā karpaṭakaṁ rahaḥ| yājñavalkyo'pi tadrātrau supto yatra susaṁvṛtaḥ

एक वस्त्र-खण्ड को देखकर एकान्त में उसे अन्तर्वस्त्र के रूप में धारण किया; उसी रात्रि में याज्ञवल्क्य भी उसी स्थान के समीप भलीभाँति ढककर सो गए थे।

श्लोक 10 (skanda.5.197.10)

स्वप्नं दृष्ट्वात्यजच्छुक्रं कौपीने रक्तबिन्दुवत्। विराजितेन तपसा सिद्धं तदनलप्रभम्

svapnaṁ dṛṣṭvātyajacchukraṁ kaupīne raktabinduvat| virājitena tapasā siddhaṁ tadanalaprabham

स्वप्न देखकर उनसे वीर्य स्खलित हो गया, जो लंगोटी पर रक्त-बिन्दु के समान, अपने तेजस्वी तप से सिद्ध होकर अग्नि के समान प्रभावाला हो गया।

श्लोक 11 (skanda.5.197.11)

यावत्प्रबुद्धो विप्रोऽसौ वीक्ष्योच्छिष्टं तदंशुकम्। चिक्षेप दूरतोऽस्पृश्यं शौचं कृत्वा विधानतः

yāvatprabuddho vipro'sau vīkṣyocchiṣṭaṁ tadaṁśukam| ciukṣepa dūrato'spṛśyaṁ śaucaṁ kṛtvā vidhānataḥ

जब वह ब्राह्मण जागा और उस मलिन वस्त्र को देखा, तो उसे अस्पृश्य समझकर दूर फेंक दिया, और विधिपूर्वक शुद्धि की।

श्लोक 12 (skanda.5.197.12)

निषिद्धं तु निशि स्नानमिति सुष्वाप स द्विजः। निशीथे सापि तद्वस्त्रं भगस्यावरणं व्यधात्

niṣiddhaṁ tu niśi snānamiti suṣvāpa sa dvijaḥ| niśīthe sāpi tadvastraṁ bhagasyāvaraṇaṁ vyadhāt

रात्रि में स्नान वर्जित है — यह सोचकर वह द्विज पुनः सो गया; उधर आधी रात में उसी वस्त्र को उसने अपने गुह्य अंग पर लपेट लिया।

श्लोक 13 (skanda.5.197.13)

प्रातरन्वेषयामास मुनिर्वस्त्रमितस्ततः। ततः सा ब्राह्मणी प्राह किं अन्वेषयसे प्रभो। केन कार्यं तव तथा वदस्व मम तत्त्वतः

prātaranveṣayāmāsa munirvastramitastataḥ| tataḥ sā brāhmaṇī prāha kiṁ anveṣayase prabho| kena kāryaṁ tava tathā vadasva mama tattvataḥ

प्रातःकाल मुनि इधर-उधर उस वस्त्र को खोजने लगे; तब उस ब्राह्मणी ने कहा — हे प्रभो! आप क्या ढूँढ़ रहे हैं? आपको उससे क्या प्रयोजन है, मुझे यथार्थ रूप से बताइए।

श्लोक 14 (skanda.5.197.14)

याज्ञवल्क्य उवाच। अपवित्रो मया भद्रे स्वप्नो दृष्टोऽद्य वै निशि। सक्लेदं तत्र मे वस्त्रं निक्षिप्तं तन्न दृश्यते

yājñavalkya uvāca| apavitro mayā bhadre svapno dṛṣṭo'dya vai niśi| sakledaṁ tatra me vastraṁ nikṣiptaṁ tanna dṛśyate

याज्ञवल्क्य ने कहा — हे भद्रे! आज रात्रि में मैंने एक अपवित्र स्वप्न देखा; उससे मलिन हुआ वह वस्त्र मैंने फेंक दिया था, वह अब दिखाई नहीं दे रहा है।

श्लोक 15 (skanda.5.197.15)

तच्छ्रुत्वा ब्राह्मणी वाक्यं भीतभीतावदन्नृप। तद्वस्त्रं तु मया विप्र स्नात्वा ह्यन्तः कृतं महत्

tacchrutvā brāhmaṇī vākyaṁ bhītabhītāvadannṛpa| tadvastraṁ tu mayā vipra snātvā hyantaḥ kṛtaṁ mahat

हे नृप! यह सुनकर वह ब्राह्मणी अत्यन्त भयभीत होकर बोली — हे विप्र! वह महान वस्त्र तो मैंने स्नान करके अन्तर्वस्त्र के रूप में धारण कर लिया है।

श्लोक 16 (skanda.5.197.16)

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा हाहेत्युक्त्वा महामुनिः। निपपात तदा भूमौ छिन्नमूल इव द्रुमः

tasyāstadvacanaṁ śrutvā hāhetyuktvā mahāmuniḥ| nipapāta tadā bhūmau chinnamūla iva drumaḥ

उसका यह वचन सुनकर वह महामुनि 'हाय-हाय' कहकर तत्क्षण भूमि पर गिर पड़े, जैसे मूल से कटा हुआ वृक्ष गिरता है।

श्लोक 17 (skanda.5.197.17)

किमेतदिति सेत्युक्त्वा ह्याकाशमिव निर्मला। आश्वासयन्ती तं विप्रं प्रोवाच वचनं तदा

kimetaditi setyuktvā hyākāśamiva nirmalā| āśvāsayantī taṁ vipraṁ provāca vacanaṁ tadā

'यह क्या हुआ' ऐसा कहते हुए, आकाश के समान निर्मल वह ब्राह्मणी उस विप्र को आश्वासन देती हुई तब यह वचन बोली।

श्लोक 18 (skanda.5.197.18)

वदस्व कारणं तात गुह्याद्गुह्यतरं यदि। प्रतीकारोऽस्य येनैव विमृश्य क्रियते त्वरा

vadasva kāraṇaṁ tāta guhyādguhyataraṁ yadi| pratīkāro'sya yenaiva vimṛśya kriyate tvarā

हे तात! भले ही यह अत्यन्त गोपनीय कारण हो, फिर भी मुझे बताइए, जिससे विचार करके इसका शीघ्र उपाय किया जा सके।

श्लोक 19 (skanda.5.197.19)

ततः स सुचिरं ध्यात्वा लब्धवाग्वै ततः क्षणम्। प्रोवाच साध्वसमना यत्तच्छृणु नरेश्वर

tataḥ sa suciraṁ dhyātvā labdhavāgvai tataḥ kṣaṇam| provāca sādhvasamanā yattacchṛṇu nareśvara

तब वह देर तक ध्यानमग्न रहकर, तत्पश्चात् वाणी प्राप्त कर, भयाकुल मन से जो कहा, हे नरेश्वर! वह सुनो।

श्लोक 20 (skanda.5.197.20)

नात्र दोषोऽस्ति ते कश्चिन्मम चैव शुभव्रते। तवोदरे तु गर्भो यस्तत्र दैवं परायणम्

nātra doṣo'sti te kaścinmama caiva śubhavrate| tavodare tu garbho yastatra daivaṁ parāyaṇam

हे शुभव्रते! इसमें न तुम्हारा दोष है, न मेरा; तुम्हारे उदर में जो गर्भ अब स्थापित होगा, उसमें दैव ही मुख्य कारण है।

श्लोक 21 (skanda.5.197.21)

तस्य तत्त्वेन रक्षा च त्वया कार्या सदैव हि। विनाशी नैव कर्तव्यो यावत्कालस्य पर्ययः

tasya tattvena rakṣā ca tvayā kāryā sadaiva hi| vināśī naiva kartavyo yāvatkālasya paryayaḥ

उसकी रक्षा तुम्हें सदैव सच्चाई से करनी होगी; जब तक समय पूरा न हो, तब तक उसका विनाश कदापि न करना।

श्लोक 22 (skanda.5.197.22)

तथेति व्रीडिता साध्वी दूयमानेन चेतसा। अपालयच्च तं गर्भं यावत्पुत्रो ह्यजायत

tatheti vrīḍitā sādhvī dūyamānena cetasā| apālayacca taṁ garbhaṁ yāvatputro hyajāyata

'ऐसा ही होगा' कहकर वह साध्वी लज्जित तथा व्यथित मन से उस गर्भ की रक्षा करती रही, यहाँ तक कि पुत्र उत्पन्न हुआ।

श्लोक 23 (skanda.5.197.23)

जातमात्रं च तं गर्भं गृहीत्वा ब्राह्मणी च सा। अश्वत्थच्छायामाश्रित्य तमुत्सृज्य वचोऽब्रवीत्

jātamātraṁ ca taṁ garbhaṁ gṛhītvā brāhmaṇī ca sā| aśvatthacchāyāmāśritya tamutsṛjya vaco'bravīt

जन्म लेते ही उस शिशु को लेकर उस ब्राह्मणी ने पीपल वृक्ष की छाया का आश्रय लिया, और वहाँ उसे छोड़कर यह वचन कहा।

श्लोक 24 (skanda.5.197.24)

यानि सत्त्वानि लोकेषु स्थावराणि चराणि च। तानि सर्वाणि रक्षन्तु त्यक्तं वै बालकं मया

yāni sattvāni lokeṣu sthāvarāṇi carāṇi ca| tāni sarvāṇi rakṣantu tyaktaṁ vai bālakaṁ mayā

लोकों में जो भी सत्त्व स्थावर और जंगम हैं, वे सभी मेरे द्वारा त्यागे गए इस बालक की रक्षा करें।

श्लोक 25 (skanda.5.197.25)

एवमुक्त्वा गता सा तु ब्राह्मणी नृपसत्तम। तथागतः स तु शिशुस्तत्र स्थित्वा मुहूर्तकम्

evamuktvā gatā sā tu brāhmaṇī nṛpasattama| tathāgataḥ sa tu śiśustatra sthitvā muhūrtakam

हे नृपसत्तम! ऐसा कहकर वह ब्राह्मणी चली गई; और वह शिशु वहाँ कुछ क्षण तक उसी अवस्था में पड़ा रहा।

श्लोक 26 (skanda.5.197.26)

पाणिपादौ विनिक्षिप्य निकुञ्च्य नयने शुभे। आस्यं तु विकृतं कृत्वा रुरोद विकृतैः स्वरैः

pāṇipādau vinikṣipya nikuñcya nayane śubhe| āsyaṁ tu vikṛtaṁ kṛtvā ruroda vikṛtaiḥ svaraiḥ

अपने हाथ-पैर फैलाकर, अपनी सुन्दर आँखें सिकोड़कर, मुख को विकृत बनाकर, वह विकृत स्वरों में रोने लगा।

श्लोक 27 (skanda.5.197.27)

तेन शब्देन वित्रस्ताः स्थावरा जङ्गमाश्च ये। आकम्पिता महोत्पातैः सशैलवनकानना

tena śabdena vitrastāḥ sthāvarā jaṅgamāśca ye| ākampitā mahotpātaiḥ saśailavanakānanā

उस ध्वनि से स्थावर और जंगम सभी भयभीत हो उठे; पर्वत-वन-कानन सहित पृथ्वी महान उत्पातों से काँप उठी।

श्लोक 28 (skanda.5.197.28)

ततो ज्ञात्वा महद्भूतं क्षुधाविष्टं द्विजर्षभम्। न जहाति नगश्छायां पानार्थाय ततः परम्। अपिबच्च सुतं तस्मादभृतं चैव भारत

tato jñātvā mahadbhūtaṁ kṣudhāviṣṭaṁ dvijarṣabham| na jahāti nagaśchāyāṁ pānārthāya tataḥ param| apibacca sutaṁ tasmādabhṛtaṁ caiva bhārata

तब उस महाभूत को यह जानकर कि वह भूख से पीड़ित एक श्रेष्ठ ब्राह्मण-शिशु है, वृक्ष ने अपनी छाया कभी न छोड़ी; हे भारत! और उस असहाय, अपोषित पुत्र को उस वृक्ष ने ही दूध पिलाया।

श्लोक 29 (skanda.5.197.29)

एवं स वर्धितस्तत्र कुमारो निजचेतसि। चिन्तयामास विश्रब्धः किं मम ग्रहगोचरम्

evaṁ sa vardhitastatra kumāro nijacetasi| cintayāmāsa viśrabdhaḥ kiṁ mama grahagocaram

इस प्रकार वहाँ पला हुआ वह बालक अपने मन में निश्चिन्त होकर विचार करने लगा — मेरे भाग्य में ग्रहों का प्रभाव कैसा है?

श्लोक 30 (skanda.5.197.30)

ततः क्रूरसभाचारः क्रूरं दृष्ट्वा निरीक्षितः। पपात सहसा भूमौ शनैश्चारी शनैश्चरः

tataḥ krūrasabhācāraḥ krūraṁ dṛṣṭvā nirīkṣitaḥ| papāta sahasā bhūmau śanaiścārī śanaiścaraḥ

तब क्रूर स्वभाव वाले शनैश्चर ने उसे क्रूर दृष्टि से देखा; और शनैश्चर स्वयं ही सहसा भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 31 (skanda.5.197.31)

उवाच च भयत्रस्तः कृताञ्जलिपुटस्तदा। किं मयापकृतं विप्र पिप्पलाद महामुने

uvāca ca bhayatrastaḥ kṛtāñjaliputastadā| kiṁ mayāpakṛtaṁ vipra pippalāda mahāmune

भय से त्रस्त होकर, हाथ जोड़कर उसने कहा — हे विप्र पिप्पलाद! हे महामुने! मैंने आपका क्या अपराध किया है?

श्लोक 32 (skanda.5.197.32)

चरन्वै गगनाद्येन पातितो धरणीतले। सौरिणा ह्येवमुक्तस्तु पिप्पलादो महामुनिः

caranvai gaganādyena pātito dharaṇītale| sauriṇā hyevamuktastu pippalādo mahāmuniḥ

आकाश में विचरण करते हुए मुझे किसने पृथ्वी पर गिरा दिया? इस प्रकार सौरि (शनि) द्वारा कहे जाने पर महामुनि पिप्पलाद,

श्लोक 33 (skanda.5.197.33)

क्रोधरूपोऽब्रवीद्वाक्यं तच्छृणुष्व नराधिप। पितृमातृविहीनस्य मम बालस्य दुर्मते। पीडां करोषि कस्मात्त्वं सौरे ब्रूहि ह्यशेषतः

krodharūpo'bravīdvākyaṁ tacchṛṇuṣva narādhipa| pitṛmātṛvihīnasya mama bālasya durmate| pīḍāṁ karoṣi kasmāttvaṁ saure brūhi hyaśeṣataḥ

क्रोध से भरकर बोले, हे नराधिप! सुनो — हे दुर्बुद्धि सौरे! मुझ पितृ-मातृविहीन बालक को तुम क्यों पीड़ा दे रहे हो? मुझे पूर्णरूप से बताओ।

श्लोक 34 (skanda.5.197.34)

शनैश्चर उवाच। क्रूरस्वभावः सहजो मम दृष्टिस्तथेदृशी। मुञ्चस्व मां तथा कर्ता यद्ब्रवीषि न संशयः

śanaiścara uvāca| krūrasvabhāvaḥ sahajo mama dṛṣṭistathedṛśī| muñcasva māṁ tathā kartā yadbravīṣi na saṁśayaḥ

शनैश्चर ने कहा — मेरा स्वभाव जन्म से ही क्रूर है, तथा मेरी दृष्टि भी वैसी ही है; मुझे छोड़ दो, मैं वही करूँगा जो तुम कहोगे, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 35 (skanda.5.197.35)

पिप्पलाद उवाच। अद्यप्रभृति बालानां वर्षादा षोडशाद्ग्रह। पीडा त्वया न कर्तव्या एष ते समयः कृतः

pippalāda uvāca| adyaprabhṛti bālānāṁ varṣādā ṣoḍaśādgraha| pīḍā tvayā na kartavyā eṣa te samayaḥ kṛtaḥ

पिप्पलाद ने कहा — हे ग्रह! आज से लेकर सोलह वर्ष तक बालकों को तुम पीड़ा मत देना, यही तुम्हारे लिए मर्यादा निर्धारित की गई है।

श्लोक 36 (skanda.5.197.36)

एवमस्त्विति चोक्त्वा स जगाम पुनरागतः। देवमार्गं शनैश्चारी प्रणम्य ऋषिसत्तमम्

evamastviti coktvā sa jagāma punarāgataḥ| devamārgaṁ śanaiścārī praṇamya ṛṣisattamam

'ऐसा ही हो' कहकर, उस श्रेष्ठ ऋषि को प्रणाम कर, शनैश्चर पुनः देवमार्ग की ओर चला गया।

श्लोक 37 (skanda.5.197.37)

गते चादर्शनं तत्र सोऽपि बालो महाग्रहः। विचिन्तयन्वै पितरं क्रोधेन कलुषीकृतः

gate cādarśanaṁ tatra so'pi bālo mahāgrahaḥ| vicintayanvai pitaraṁ krodhena kaluṣīkṛtaḥ

उस महाग्रह के अदृश्य हो जाने पर, वह बालक भी क्रोध से विचलित होकर अपने पिता के विषय में विचार करने लगा।

श्लोक 38 (skanda.5.197.38)

आग्नेयीं धारणां ध्यात्वा जनयामास पावकम्। कृत्यामन्त्रैर्जुहावाग्नौ कृत्या वै संभवत्विति

āgneyīṁ dhāraṇāṁ dhyātvā janayāmāsa pāvakam| kṛtyāmantrairjuhāvāgnau kṛtyā vai sambhavatviti

अग्नि-धारणा का ध्यान करके उसने अग्नि उत्पन्न की, और कृत्या-मन्त्रों से अग्नि में आहुति दी — 'कृत्या उत्पन्न हो' इस भावना से।

श्लोक 39 (skanda.5.197.39)

तावज्झटिति सा कन्या ज्वालामालाविभूषिता। हुतभुक्सदृशाकारा किं करोमीति चाब्रवीत्

tāvajjhaṭiti sā kanyā jvālāmālāvibhūṣitā| hutabhuksadṛśākārā kiṁ karomīti cābravīt

तत्क्षण ज्वाला की माला से विभूषित, अग्नि के समान आकार वाली वह कन्या प्रकट होकर बोली — मैं क्या करूँ?

श्लोक 40 (skanda.5.197.40)

शोषयामि समुद्रान् किं चूर्णयामि च पर्वतान्। अवनिं वेष्टयामीति पातये किं नभस्तलम्

śoṣayāmi samudrān kiṁ cūrṇayāmi ca parvatān| avaniṁ veṣṭayāmīti pātaye kiṁ nabhastalam

क्या मैं समुद्रों को सुखा दूँ? क्या पर्वतों को चूर्ण कर दूँ? क्या पृथ्वी को लपेट लूँ, या आकाश को गिरा दूँ?

श्लोक 41 (skanda.5.197.41)

कस्य मूर्ध्नि पतिष्यामि घातयामि च कं द्विज। शीघ्रमादिश्यतां कार्यं मा मे कालात्ययो भवेत्

kasya mūrdhni patiṣyāmi ghātayāmi ca kaṁ dvija| śīghramādiśyatāṁ kāryaṁ mā me kālātyayo bhavet

हे द्विज! मैं किसके सिर पर गिरूँ, किसका वध करूँ? शीघ्र मुझे कार्य बताया जाए, ऐसा न हो कि मेरा समय व्यर्थ बीत जाए।

श्लोक 42 (skanda.5.197.42)

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा पिप्पलादो महातपाः। क्रोधसंरक्तनयन इदं वचनमब्रवीत्

tasyāstadvacanaṁ śrutvā pippalādo mahātapāḥ| krodhasaṁraktanayana idaṁ vacanamabravīt

उसके इस वचन को सुनकर, महातपस्वी पिप्पलाद ने क्रोध से लाल नेत्रों वाला होकर यह वचन कहा।

श्लोक 43 (skanda.5.197.43)

महता क्रोधवेगेन मया त्वं चिन्तिता शुभे। पिता मे याज्ञवल्क्यश्च तस्य त्वं पत माचिरम्

mahatā krodhavegena mayā tvaṁ cintitā śubhe| pitā me yājñavalkyaśca tasya tvaṁ pata māciram

हे शुभे! तुम्हें मैंने महान क्रोधावेग से उत्पन्न किया है; याज्ञवल्क्य मेरे पिता हैं — विलम्ब न कर उन्हीं पर तुम प्रहार करो।

श्लोक 44 (skanda.5.197.44)

एवमुक्त्वागमच्छीघ्रं स्फोटयन्ती नभस्तलम्। मिथिलास्थो महाप्राज्ञस्तपस्तेपे महामनाः

evamuktvāgamacchīghraṁ sphoṭayantī nabhastalam| mithilāstho mahāprājñastapastepe mahāmanāḥ

ऐसा कहते ही वह आकाश को विदीर्ण करती हुई शीघ्र चली गई; उधर मिथिला में स्थित वह महाप्राज्ञ, महामना (याज्ञवल्क्य) तप कर रहे थे।

श्लोक 45 (skanda.5.197.45)

यावत्पश्यति दिग्भागं ज्वलनार्कसमप्रभम्। याज्ञवल्क्यो महातेजा महद्भूतमुपस्थितम्

yāvatpaśyati digbhāgaṁ jvalanārkasamaprabham| yājñavalkyo mahātejā mahadbhūtamupasthitam

जब वह अत्यन्त तेजस्वी याज्ञवल्क्य ने अग्नि और सूर्य के समान प्रकाशमान दिशा-भाग को देखा, तो समझ गए कि कोई महाभूत उपस्थित हुआ है।

श्लोक 46 (skanda.5.197.46)

तद्दृष्ट्वा सहसायान्तं भीतभीतो महामुनिः। अनुयुक्तोऽथ भूतेन जनकं नृपतिं ययौ

taddṛṣṭvā sahasāyāntaṁ bhītabhīto mahāmuniḥ| anuyukto'tha bhūtena janakaṁ nṛpatiṁ yayau

उसे सहसा आते हुए देखकर वह महामुनि अत्यन्त भयभीत हो गए, और उस भूत द्वारा पीछा किए जाते हुए राजा जनक के पास गए।

श्लोक 47 (skanda.5.197.47)

शरण्यं मामनुप्राप्तं विद्धि त्वं नृपसत्तम। महद्भूतभयाद्रक्ष यदि शक्नोषि पार्थिव

śaraṇyaṁ māmanuprāptaṁ viddhi tvaṁ nṛpasattama| mahadbhūtabhayādrakṣa yadi śaknoṣi pārthiva

हे नृपसत्तम! मुझे शरणागत जानो; हे पार्थिव! यदि तुम समर्थ हो तो इस महाभूत के भय से मेरी रक्षा करो।

श्लोक 48 (skanda.5.197.48)

ब्रह्मतेजोभवं भूतमनिवार्यं दुरासदम्। न च शक्नोम्यहं त्रातुं राजा वचनमब्रवीत्

brahmatejobhavaṁ bhūtamanivāryaṁ durāsadam| na ca śaknomyahaṁ trātuṁ rājā vacanamabravīt

राजा ने यह वचन कहा — यह भूत ब्रह्मतेज से उत्पन्न है, अनिवार्य तथा दुर्गम्य है; मैं इसे रोक पाने में असमर्थ हूँ।

श्लोक 49 (skanda.5.197.49)

ततश्चान्यं नृपश्रेष्ठं शरणार्थी महातपाः। जगाम तेन मुक्तोऽसौ चेन्द्रस्य सदनं भयात्

tataścānyaṁ nṛpaśreṣṭhaṁ śaraṇārthī mahātapāḥ| jagāma tena mukto'sau cendrasya sadanaṁ bhayāt

तब वह महातपस्वी शरण की खोज में किसी अन्य नरेश्रेष्ठ के पास गए, और भय से मुक्त होने की इच्छा से इन्द्र के भवन को गए।

श्लोक 50 (skanda.5.197.50)

देवराज नमस्तेऽस्तु महाभूतभयान्नृप। कम्पमानोऽब्रवीद्विप्रो रक्षस्वेति पुनःपुनः

devarāja namaste'stu mahābhūtabhayānnṛpa| kampamāno'bravīdvipro rakṣasveti punaḥpunaḥ

हे देवराज! तुम्हें नमस्कार है, हे नृप! इस महाभूत के भय से — काँपते हुए उस विप्र ने बार-बार कहा, 'मेरी रक्षा करो'।

श्लोक 51 (skanda.5.197.51)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा देवराजोऽब्रवीदिदम्। न शक्नोमि परित्रातुं ब्रह्मकोपादहं मुने

tasya tadvacanaṁ śrutvā devarājo'bravīdidam| na śaknomi paritrātuṁ brahmakopādahaṁ mune

उसका यह वचन सुनकर देवराज इन्द्र ने कहा — हे मुने! मैं ब्रह्मकोप से तुम्हारी रक्षा करने में असमर्थ हूँ।

श्लोक 52 (skanda.5.197.52)

ततः स ब्रह्मभवनं ब्राह्मणो ब्रह्मवित्तमः। जगाम विष्णुलोकं च तेनापीत्युक्त एव सः

tataḥ sa brahmabhavanaṁ brāhmaṇo brahmavittamaḥ| jagāma viṣṇulokaṁ ca tenāpītyukta eva saḥ

तब वह ब्रह्मज्ञान में श्रेष्ठ ब्राह्मण ब्रह्मलोक को गया, तथा विष्णुलोक को भी गया; परन्तु वहाँ भी उससे यही कहा गया।

श्लोक 53 (skanda.5.197.53)

ततः स मुनिरुद्विग्नो निराशो जीविते नृप। अनुगम्यमानो भूतेन अगच्छच्छङ्करालयम्

tataḥ sa muniruvigno nirāśo jīvite nṛpa| anugamyamāno bhūtena agacchacchaṅkarālayam

हे नृप! तब वह मुनि व्याकुल तथा जीवन से निराश होकर, उस भूत द्वारा पीछा किया जाता हुआ शंकर के धाम को गया।

श्लोक 54 (skanda.5.197.54)

तस्य योगबलोपेतो महादेवस्य पाण्डव। नखमांसान्तरे गुप्तो यथा देवो न पश्यति

tasya yogabalopeto mahādevasya pāṇḍava| nakhamāṁsāntare gupto yathā devo na paśyati

हे पाण्डव! उस योगबल से युक्त होकर वह महादेव के नख और मांस के बीच इस प्रकार छिप गया कि देव उसे देख न सकें।

श्लोक 55 (skanda.5.197.55)

तदन्ते चागमद्भूतं ज्वलनार्कसमप्रभम्। मुञ्च मुञ्चेति पुरुषं देवदेवं महेश्वरम्

tadante cāgamadbhūtaṁ jvalanārkasamaprabham| muñca muñceti puruṣaṁ devadevaṁ maheśvaram

उसके पीछे-पीछे वह भूत भी वहाँ आ पहुँचा, जो अग्नि और सूर्य के समान प्रकाशमान था, और उस पुरुष, देवदेव महेश्वर से बोला — छोड़ दो, छोड़ दो!

श्लोक 56 (skanda.5.197.56)

एवमुक्तो महादेवस्तेन भूतेन भारत। योगीन्द्रं दर्शयामास नखमांसान्तरे तदा

evamukto mahādevastena bhūtena bhārata| yogīndraṁ darśayāmāsa nakhamāṁsāntare tadā

हे भारत! उस भूत द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर महादेव ने अपने नख-मांस के बीच से उस योगीन्द्र को उसे दिखाया।

श्लोक 57 (skanda.5.197.57)

संस्थाप्य भूतं भूतेशः परमापद्गतं मुनिम्। उवाच मा भैस्त्वं विप्र निर्गच्छस्व महामुने

saṁsthāpya bhūtaṁ bhūteśaḥ paramāpadgataṁ munim| uvāca mā bhaistvaṁ vipra nirgacchasva mahāmune

भूतों के स्वामी शिव ने उस भूत को शान्त करते हुए, घोर विपत्ति में पड़े उस मुनि से कहा — हे विप्र! डरो मत, बाहर आओ, हे महामुने!

श्लोक 58 (skanda.5.197.58)

ततः सुसूक्ष्मदेहस्थं भूतं दृष्ट्वाब्रवीदिदम्। किमस्य त्वं महाभूत करिष्यसि वदस्व मे

tataḥ susūkṣmadehasthaṁ bhūtaṁ dṛṣṭvābravīdidam| kimasya tvaṁ mahābhūta kariṣyasi vadasva me

फिर उस अति सूक्ष्म देह वाले भूत को देखकर उसने कहा — हे महाभूत! तुम इसका क्या करना चाहते हो, मुझे बताओ।

श्लोक 59 (skanda.5.197.59)

कृत्योवाच। क्रोधाविष्टेन देवेश पिप्पलादेन चिन्तिता। अस्य देहं हनिष्यामि हिंसार्थं विद्धि मां प्रभो

kṛtyovāca| krodhāviṣṭena deveśa pippalādena cintitā| asya dehaṁ haniṣyāmi hiṁsārthaṁ viddhi māṁ prabho

कृत्या ने कहा — हे देवेश! क्रोध से भरे हुए पिप्पलाद द्वारा मुझे उत्पन्न किया गया है; मैं इसके शरीर का वध करूँगी — मुझे हिंसा के लिए बनाया गया है, यह जानो, हे प्रभो!

श्लोक 60 (skanda.5.197.60)

एतच्छ्रुत्वा महादेवो भूतस्य वदनाच्च्युतम्। कटिस्थं याज्ञवल्क्यं च मन्त्रयामास मन्त्रवित्

etacchrutvā mahādevo bhūtasya vadanāccyutam| kaṭisthaṁ yājñavalkyaṁ ca mantrayāmāsa mantravit

यह सुनकर महादेव, जो मन्त्रों के ज्ञाता हैं, उस भूत के मुख से निकली बात के पश्चात्, अपने पास स्थित याज्ञवल्क्य से मन्त्रणा करने लगे।

श्लोक 61 (skanda.5.197.61)

योगीश्वरेति विप्रस्य कृत्वा नाम युधिष्ठिर। विसर्जयित्वा देवेशस्तत्रैवान्तरधीयत

yogīśvareti viprasya kṛtvā nāma yudhiṣṭhira| visarjayitvā deveśastatraivāntaradhīyata

हे युधिष्ठिर! उस ब्राह्मण का नाम 'योगीश्वर' रखकर, देवेश ने उस भूत को विदा किया और स्वयं वहीं अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 62 (skanda.5.197.62)

प्रेषयित्वा तु तं भूतं पिप्पलादोऽपि दुर्मनाः। पितृमातृसमुद्विग्नो नर्मदातटमाश्रितः

preṣayitvā tu taṁ bhūtaṁ pippalādo'pi durmanāḥ| pitṛmātṛsamudvigno narmadātaṭamāśritaḥ

उस भूत को भेजने के पश्चात्, अपने माता-पिता के प्रति व्याकुल मन वाला पिप्पलाद भी नर्मदा के तट का आश्रय लेने चला गया।

श्लोक 63 (skanda.5.197.63)

एकाङ्गुष्ठो निराहारो वर्षादा षोडशान्नृप। तोषयामास देवेशमुमया सह शङ्करम्

ekāṅguṣṭho nirāhāro varṣādā ṣoḍaśānnṛpa| toṣayāmāsa deveśamumayā saha śaṅkaram

हे नृप! एक अंगूठे पर खड़े होकर, सोलह वर्षों तक निराहार रहकर, उसने उमा सहित देवेश शंकर को संतुष्ट किया।

श्लोक 64 (skanda.5.197.64)

ततस्तत्तपसा तुष्टः शङ्करो वाक्यमब्रवीत्

tatastattapasā tuṣṭaḥ śaṅkaro vākyamabravīt

तब उस तप से संतुष्ट होकर शंकर ने यह वचन कहा।

श्लोक 65 (skanda.5.197.65)

ईश्वर उवाच। परितुष्टोऽस्मि ते विप्र तपसानेन सुव्रत। वरं वृणीष्व ते दद्मि मनसा चेप्सितं शुभम्

īśvara uvāca| parituṣṭo'smi te vipra tapasānena suvrata| varaṁ vṛṇīṣva te dadmi manasā cepsitaṁ śubham

ईश्वर ने कहा — हे विप्र! हे सुव्रत! इस तप से मैं तुमसे परम संतुष्ट हूँ; वर माँगो, मैं तुम्हें मन-चाहा शुभ वर दूँगा।

श्लोक 66 (skanda.5.197.66)

पिप्पलाद उवाच। यदि मे भगवांस्तुष्टो यदि देयो वरो मम। अत्र संनिहितो देव तीर्थे भव महेश्वर

pippalāda uvāca| yadi me bhagavāṁstuṣṭo yadi deyo varo mama| atra sannihito deva tīrthe bhava maheśvara

पिप्पलाद ने कहा — हे भगवन्! यदि आप मुझसे संतुष्ट हैं, यदि मुझे वर देना चाहते हैं, तो हे महेश्वर! इसी तीर्थ में सन्निहित हो जाइए।

श्लोक 67 (skanda.5.197.67)

एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा पिप्पलादं महामुनिम्। जगामादर्शनं देवो भूतसङ्घसमन्वितः

evamuktastathetyuktvā pippalādaṁ mahāmunim| jagāmādarśanaṁ devo bhūtasaṅghasamanvitaḥ

इस प्रकार कहे जाने पर, 'ऐसा ही हो' कहकर, महामुनि पिप्पलाद से देव भूतगणों सहित अदृश्य हो गए।

श्लोक 68 (skanda.5.197.68)

पिप्पलादो गते देवे स्नात्वा तत्र महाम्भसि। स्थापयित्वा महादेवं जगामोत्तरपर्वतम्

pippalādo gate deve snātvā tatra mahāmbhasi| sthāpayitvā mahādevaṁ jagāmottaraparvatam

देव के चले जाने पर पिप्पलाद ने उस विशाल जल में स्नान किया, महादेव को वहाँ स्थापित किया, और फिर उत्तर के पर्वत की ओर चले गए।

श्लोक 69 (skanda.5.197.69)

तत्र तीर्थे नरो भक्त्या स्नात्वा मन्त्रयुतं नृप। तर्पयित्वा पितॄन् देवान् पूजयेच्च महेश्वरम्

tatra tīrthe naro bhaktyā snātvā mantrayutaṁ nṛpa| tarpayitvā pitṝn devān pūjayecca maheśvaram

हे नृप! जो मनुष्य उस तीर्थ में भक्तिपूर्वक मन्त्रसहित स्नान कर, पितरों और देवों को तर्पण देकर महेश्वर की पूजा करता है,

श्लोक 70 (skanda.5.197.70)

अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम्। मृतो रुद्रपुरं याति नात्र कार्या विचारणा

aśvamedhasya yajñasya phalaṁ prāpnotyanuttamam| mṛto rudrapuraṁ yāti nātra kāryā vicāraṇā

वह अश्वमेध यज्ञ का सर्वोत्तम फल प्राप्त करता है, तथा मृत्यु के पश्चात् रुद्रपुर को जाता है, इसमें कोई विचारणा नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 71 (skanda.5.197.71)

अथ यो भोजयेद्विप्रान् पितॄनुद्दिश्य भारत। तस्य ते द्वादशाब्दानि मोदन्ते दिवि तर्पिताः

atha yo bhojayedviprān pitṝnuddiśya bhārata| tasya te dvādaśābdāni modante divi tarpitāḥ

हे भारत! जो पितरों के निमित्त वहाँ ब्राह्मणों को भोजन कराता है, उसके पितर तृप्त होकर बारह वर्षों तक स्वर्ग में आनन्दित होते हैं।

श्लोक 72 (skanda.5.197.72)

संन्यासेन तु यः कश्चित्तत्र तीर्थे तनुं त्यजेत्। अनिवर्तिका गतिस्तस्य रुद्रलोकात्कदाचन

sannyāsena tu yaḥ kaścittatra tīrthe tanuṁ tyajet| anivartikā gatistasya rudralokātkadācana

जो कोई संन्यासपूर्वक उस तीर्थ में देह त्याग करता है, वह रुद्रलोक से कभी वापस नहीं आता — उसकी गति अनिवर्तनीय होती है।

श्लोक 73 (skanda.5.197.73)

एतत्सर्वं समाख्यातं यत्पृष्ठे हि त्वयानघ। माहात्म्यं पिप्पलादस्य तीर्थस्योत्पत्तिरेव च

etatsarvaṁ samākhyātaṁ yatpṛṣṭhe hi tvayānagha| māhātmyaṁ pippalādasya tīrthasyotpattireva ca

हे निष्पाप! जो कुछ भी तुमने पूछा, वह सब मैंने बता दिया — पिप्पलाद का यह माहात्म्य तथा तीर्थ की उत्पत्ति भी।

श्लोक 74 (skanda.5.197.74)

एतत्पुण्यं पापहरं धन्यं दुःस्वप्ननाशनम्। पठतां शृण्वतां चैव सर्वपापक्षयो भवेत्

etatpuṇyaṁ pāpaharaṁ dhanyaṁ duḥsvapnanāśanam| paṭhatāṁ śṛṇvatāṁ caiva sarvapāpakṣayo bhavet

यह पुण्यमय, पापनाशक, धन्यकारी तथा दुःस्वप्न-नाशक कथा है; इसे पढ़ने और सुनने वालों के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।

अध्याय 196अध्याय-सूचीअध्याय 198