अवन्ती खण्ड · अध्याय 2
ब्रह्मशिरश्छेद-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.2.1)
सनत्कुमार उवाच। पुरा त्वेकार्णवे प्राप्ते नष्टे स्थावरजंगमे। नाग्निर्न वायुरादित्यो न भूमिर्न दिशो नभः
sanatkumāra uvāca| purā tvekārṇave prāpte naṣṭe sthāvarajaṁgame| nāgnirna vāyurādityo na bhūmirna diśo nabhaḥ
सनत्कुमार ने कहा—पूर्वकाल में जब एकार्णव उपस्थित हुआ था और स्थावर-जंगम सब नष्ट हो चुके थे, तब न अग्नि थी, न वायु, न सूर्य, न पृथ्वी, न दिशाएँ, न आकाश था।
श्लोक 2 (skanda.5.2.2)
न नक्षत्राणि न ज्योतिर्न द्यौर्नेंदुर्ग्रहा स्तथा। न देवासुरगंधर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः
na nakṣatrāṇi na jyotirna dyaurneṁdurgrahā stathā| na devāsuragaṁdharvāḥ piśācoragarākṣasāḥ
न नक्षत्र थे, न ज्योति, न स्वर्ग, न चन्द्रमा और ग्रह थे; न देव, दानव और गन्धर्व थे, न पिशाच, उरग और राक्षस थे।
श्लोक 3 (skanda.5.2.3)
सरांसि नैव गिरयो नापगा नाब्धयस्तथा। सर्वमेवतमोभूतं न प्राज्ञायत किंचन
sarāṁsi naiva girayo nāpagā nābdhayastathā| sarvamevatamobhūtaṁ na prājñāyata kiṁcana
न सरोवर थे, न पर्वत, न नदियाँ, न समुद्र; सब कुछ केवल अन्धकारमय हो गया था, कुछ भी प्रतीत नहीं होता था।
श्लोक 4 (skanda.5.2.4)
तदैको हि महाकालो लोकानुग्रहकारणात्। तस्थौ स्थानान्यशेषाणि काष्ठास्वालोकयन्प्रभुः
tadaiko hi mahākālo lokānugrahakāraṇāt| tasthau sthānānyaśeṣāṇi kāṣṭhāsvālokayanprabhuḥ
तब लोकों पर अनुग्रह करने के हेतु से अकेले महाकाल ही विद्यमान थे; वे प्रभु समस्त दिशाओं का अवलोकन करते हुए सम्पूर्ण स्थानों में स्थित रहे।
श्लोक 5 (skanda.5.2.5)
सृष्ट्यर्थं स महाकालः करे कामं प्रतिष्ठितम्। दक्षिणस्य तु तर्जन्यां स ममंथाविशोषितम्
sṛṣṭyarthaṁ sa mahākālaḥ kare kāmaṁ pratiṣṭhitam| dakṣiṇasya tu tarjanyāṁ sa mamaṁthāviśoṣitam
सृष्टि के लिए महाकाल ने अपने हाथ में स्थित संकल्प को अपनी दाहिनी तर्जनी अंगुली से मथकर, शुष्क हो चुके किसी तत्त्व को क्रियाशील किया।
श्लोक 6 (skanda.5.2.6)
कललं बुद्बुदं भूत्वा तविवेगविवर्द्धितम्। जज्ञे तदंडं सुदृढं सुष्ठु वृत्तं हिरण्मयम्
kalalaṁ budbudaṁ bhūtvā tavivegavivarddhitam| jajñe tadaṁḍaṁ sudṛḍhaṁ suṣṭhu vṛttaṁ hiraṇmayam
मन्थन के वेग से बढ़ता हुआ वह कललरूप बुद्बुद बन गया, और उससे अत्यन्त दृढ़, सुगोल तथा सुवर्णमय अण्ड उत्पन्न हुआ।
श्लोक 7 (skanda.5.2.7)
करेण ताडितं तद्धि बभूव द्विदलं महत्। अधःखंडं स्मृता भूमिरूर्ध्वं द्यौस्तारकान्वितम्
kareṇa tāḍitaṁ taddhi babhūva dvidalaṁ mahat| adhaḥkhaṁḍaṁ smṛtā bhūmirūrdhvaṁ dyaustārakānvitam
हाथ से आघात करने पर वह महान अण्ड दो भागों में विभक्त हो गया—नीचे का भाग पृथ्वी के रूप में स्मरण किया गया, और ऊपर का भाग तारों से युक्त आकाश हुआ।
श्लोक 8 (skanda.5.2.8)
मध्येऽभवत्तदा ब्रह्मा पंचवक्त्रश्चतुर्भुजः। महेश्वरोऽनुमान्यैव तमयोजदनंतरम्
madhye'bhavattadā brahmā paṁcavaktraścaturbhujaḥ| maheśvaro'numānyaiva tamayojadanaṁtaram
उसके मध्य में तब पंचमुख और चतुर्भुज ब्रह्मा उत्पन्न हुए; और महेश्वर ने अनुमति देकर उन्हें तत्काल सृष्टि-कार्य में नियुक्त किया।
श्लोक 9 (skanda.5.2.9)
कुरु सृष्टिं महाबाहो विचित्रां मदनुग्रहात्। इत्युक्त्वांतर्हितः क्वापि देवो ब्रह्मा न जग्मिवान्
kuru sṛṣṭiṁ mahābāho vicitrāṁ madanugrahāt| ityuktvāṁtarhitaḥ kvāpi devo brahmā na jagmivān
'हे महाबाहो, मेरे अनुग्रह से विचित्र सृष्टि करो'—ऐसा कहकर वे कहीं अन्तर्धान हो गए; परन्तु देव ब्रह्मा सृष्टि करने के लिए आगे नहीं बढ़ सके।
श्लोक 10 (skanda.5.2.10)
प्रेर्यमाणोऽपि वै स्रष्टुं ब्रह्मा देवमचिंतयत्। ब्रह्मणा ध्यायमानश्च ज्ञानार्थं भगवान्भवः
preryamāṇo'pi vai sraṣṭuṁ brahmā devamaciṁtayat| brahmaṇā dhyāyamānaśca jñānārthaṁ bhagavānbhavaḥ
सृष्टि के लिए प्रेरित होने पर भी ब्रह्मा ने भगवान् का ध्यान किया; और ज्ञानप्राप्ति हेतु ब्रह्मा द्वारा ध्यान किए जाने पर भगवान् शिव...
श्लोक 11 (skanda.5.2.11)
ब्रह्मणस्तपसा दृष्टः प्रादाद्वेदं षडंगकम्। लब्धे वेदेऽपि न चिरात्सष्टिं कर्तुं शशाक सः
brahmaṇastapasā dṛṣṭaḥ prādādvedaṁ ṣaḍaṁgakam| labdhe vede'pi na cirātsaṣṭiṁ kartuṁ śaśāka saḥ
...ब्रह्मा की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें षडंग वेद प्रदान किया; परन्तु वेद प्राप्त होने पर भी वे शीघ्र सृष्टि करने में समर्थ नहीं हो सके।
श्लोक 12 (skanda.5.2.12)
तपसाऽतिष्ठदा भूयः समाराधयितुं भवम्। नापश्यत्स यदा देवं तदा तुष्टाव भावितः
tapasā'tiṣṭhadā bhūyaḥ samārādhayituṁ bhavam| nāpaśyatsa yadā devaṁ tadā tuṣṭāva bhāvitaḥ
उन्होंने पुनः भव की आराधना के लिए तपस्या आरम्भ की; और जब उन्हें भगवान् के दर्शन नहीं हुए, तब वे भावपूर्ण होकर स्तुति करने लगे।
श्लोक 13 (skanda.5.2.13)
ब्रह्मोवाच। नमः शिवायामलसत्त्वचेतसे गुणत्रयातीतविसारितेजसे। षडंगवेदस्य ममापि वेधसे परस्वरूपानुभवाय चक्षुषे
brahmovāca| namaḥ śivāyāmalasattvacetase guṇatrayātītavisāritejase| ṣaḍaṁgavedasya mamāpi vedhase parasvarūpānubhavāya cakṣuṣe
ब्रह्मा ने कहा—शिव को नमस्कार, जिनका चित्त निर्मल सत्त्वमय है, जिनका तेज त्रिगुण से परे विस्तृत है; जो मेरे षडंग वेद के भी विधाता हैं तथा परम स्वरूप के अनुभव के लिए नेत्रस्वरूप हैं।
श्लोक 14 (skanda.5.2.14)
नमोऽ स्तु ते सृष्टिविधौ रजोजुषे जगत्स्थितौ सत्त्वमधिष्ठिताय ते। विनाशहेतौ तमसा महीयसे शिवाय निर्वाणसुखप्रदायिने
namo' stu te sṛṣṭividhau rajojuṣe jagatsthitau sattvamadhiṣṭhitāya te| vināśahetau tamasā mahīyase śivāya nirvāṇasukhapradāyine
सृष्टि के कार्य में रजोगुण से युक्त, जगत्-स्थिति में सत्त्वगुण में प्रतिष्ठित, तथा विनाश के हेतु में तमोगुण से महिमायुक्त आपको नमस्कार है—हे शिव, आप निर्वाणसुख के दाता हैं।
श्लोक 15 (skanda.5.2.15)
अशेषभूतप्रकृतेः परा य वै परात्मरूपाय नमः शिवाय वै। नृबुद्ध्यहंकारमनोविधायिने भर्त्रे च षड्विंशकरूपकाय वै
aśeṣabhūtaprakṛteḥ parā ya vai parātmarūpāya namaḥ śivāya vai| nṛbuddhyahaṁkāramanovidhāyine bhartre ca ṣaḍviṁśakarūpakāya vai
जो समस्त भूतप्रकृति से परे तथा परमात्मस्वरूप हैं, उन शिव को नमस्कार है; जो मनुष्यों की बुद्धि, अहंकार और मन के विधाता तथा छब्बीस तत्त्वों के धारक हैं।
श्लोक 16 (skanda.5.2.16)
भूतोयवह्न्यम्बरवायुचंद्रसूर्यात्मरूपाभिरिदं तनूभिः। व्याप्तं जगद्यस्य नमोऽस्तु तस्मै भूतं भविष्यमथ वर्तमानम्
bhūtoyavahnyambaravāyucaṁdrasūryātmarūpābhiridaṁ tanūbhiḥ| vyāptaṁ jagadyasya namo'stu tasmai bhūtaṁ bhaviṣyamatha vartamānam
जिनका यह जगत् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्र और सूर्य रूपी शरीरों से व्याप्त है, तथा जो भूत, भविष्य और वर्तमान में भी वैसे ही रहते हैं, उन्हें नमस्कार है।
श्लोक 17 (skanda.5.2.17)
यानीह तेजांसि जगंति यानि भूतानि भव्यान्यथ कारणानि। भवंति सृष्टौ विलयं विनाशे व्रजंति यस्यात्मनि तं नमामि
yānīha tejāṁsi jagaṁti yāni bhūtāni bhavyānyatha kāraṇāni| bhavaṁti sṛṣṭau vilayaṁ vināśe vrajaṁti yasyātmani taṁ namāmi
जिनके आत्मा में सृष्टि के समय समस्त तेज, लोक, प्राणी, भावी वस्तुएँ और कारण उत्पन्न होते हैं, और प्रलयकाल में जिनमें ही लीन हो जाते हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।
श्लोक 18 (skanda.5.2.18)
सनत्कुमार उवाच। एवं संस्तुवतो व्यास ब्रह्मणो भगवान्परः। अन्तर्हित उवाचेदं ब्रह्मन्संयाच्यतां वरः
sanatkumāra uvāca| evaṁ saṁstuvato vyāsa brahmaṇo bhagavānparaḥ| antarhita uvācedaṁ brahmansaṁyācyatāṁ varaḥ
सनत्कुमार ने कहा—हे व्यास, इस प्रकार ब्रह्मा के स्तुति करने पर भगवान् परमेश्वर ने अन्तर्हित होकर यह कहा—हे ब्रह्मन्, वर माँगो।
श्लोक 19 (skanda.5.2.19)
स वव्रे मनसा पुत्रं भवं गौरवकारणात्। विज्ञायांतर्गतं तस्य परमेश उवाच तम्
sa vavre manasā putraṁ bhavaṁ gauravakāraṇāt| vijñāyāṁtargataṁ tasya parameśa uvāca tam
उन्होंने आदरवश मन ही मन भव को पुत्र रूप में वरण करने की इच्छा की; उनके हृदय की बात जानकर परमेश्वर ने उनसे कहा।
श्लोक 20 (skanda.5.2.20)
यस्मान्मां मनसा पुत्रं चतुर्मुख समीहसे। कस्मिंश्चित्कारणे तस्मादहं छेत्स्यामि ते शिरः
yasmānmāṁ manasā putraṁ caturmukha samīhase| kasmiṁścitkāraṇe tasmādahaṁ chetsyāmi te śiraḥ
'हे चतुर्मुख, चूँकि तुम मुझे मानसपुत्र के रूप में चाहते हो, इसलिए किसी कारणवश मैं तुम्हारा शिर काट डालूँगा।'
श्लोक 21 (skanda.5.2.21)
अयाच्यं याचितं यस्मान्ममांशो नीललोहितः। रुद्रो भविष्यति सुतः स च ते हिंस्यति प्रभाम्
ayācyaṁ yācitaṁ yasmānmamāṁśo nīlalohitaḥ| rudro bhaviṣyati sutaḥ sa ca te hiṁsyati prabhām
'चूँकि जो माँगने योग्य नहीं था, वह माँगा गया, इसलिए मेरा अंश नीललोहित तुम्हारा पुत्र रुद्र के रूप में उत्पन्न होगा, और वही तुम्हारे तेज को नष्ट करेगा।'
श्लोक 22 (skanda.5.2.22)
अन्यद्यस्मात्स्मृतो भक्त्या त्वयाहं पितृभावतः। परब्रह्मस्वरूपेण जिज्ञासा मम या कृता
anyadyasmātsmṛto bhaktyā tvayāhaṁ pitṛbhāvataḥ| parabrahmasvarūpeṇa jijñāsā mama yā kṛtā
'और चूँकि तुमने भक्तिपूर्वक मुझे पितृभाव से स्मरण किया है, तथा परब्रह्मस्वरूप के विषय में जिज्ञासा भी की है...'
श्लोक 23 (skanda.5.2.23)
तस्माद्ब्रह्मेति लोकेऽत्र नाम ख्यातं भविष्यति। पितामहत्वं तेनापि पितामहस्ततो ह्यसि
tasmādbrahmeti loke'tra nāma khyātaṁ bhaviṣyati| pitāmahatvaṁ tenāpi pitāmahastato hyasi
'...इसलिए इस लोक में तुम्हारा नाम "ब्रह्मा" प्रसिद्ध होगा; और उसी कारण तुम पितामह भी कहलाओगे।'
श्लोक 24 (skanda.5.2.24)
लब्ध्वा शापवरावेवं पुत्रसृष्टिं चकार सः। स्वतेजोजनितं वह्निं जुह्वतः स्वेदमावहत्
labdhvā śāpavarāvevaṁ putrasṛṣṭiṁ cakāra saḥ| svatejojanitaṁ vahniṁ juhvataḥ svedamāvahat
इस प्रकार शाप और वर दोनों प्राप्त कर उन्होंने पुत्रों की सृष्टि आरम्भ की; अपने तेज से उत्पन्न अग्नि में आहुति देते हुए उन्हें स्वेद उत्पन्न हुआ।
श्लोक 25 (skanda.5.2.25)
समिद्युक्तेन हस्तेन ललाटं मार्जतोऽभवत्। स्विन्नभ्रष्टस्ततो रक्तबिंदुरेको विभावसौ
samidyuktena hastena lalāṭaṁ mārjato'bhavat| svinnabhraṣṭastato raktabiṁdureko vibhāvasau
समिधायुक्त हाथ से ललाट को पोंछते समय एक स्वेदबिन्दु गिरकर अग्नि में लाल हो गया।
श्लोक 26 (skanda.5.2.26)
स नीललोहितोऽभूद्वै स च रुद्रो भवाज्ञया। तदनन्तरमासाद्य उत्ततार सुतोंऽतिकात्
sa nīlalohito'bhūdvai sa ca rudro bhavājñayā| tadanantaramāsādya uttatāra sutoṁ'tikāt
वही नीललोहित हुआ, और भव की आज्ञा से वही रुद्र कहलाया; तत्पश्चात् वह पुत्र उस बिन्दु के समीप से ही प्रकट हुआ।
श्लोक 27 (skanda.5.2.27)
पंचवक्त्रो दशभुजः शूलचापासिशक्तिमान्। त्रिपंच नयनो रौद्रो व्यालयज्ञोपवीतकः
paṁcavaktro daśabhujaḥ śūlacāpāsiśaktimān| tripaṁca nayano raudro vyālayajñopavītakaḥ
पंचमुख, दशभुज, त्रिशूल-धनुष-खड्ग-शक्ति धारण करने वाला; पन्द्रह नेत्रों वाला, रौद्र, सर्प का यज्ञोपवीत धारण करने वाला।
श्लोक 28 (skanda.5.2.28)
सेन्दुः कपर्दं बिभ्राणः सिंहचर्मांबरंधरः। जातमेवं स दृष्ट्वा तु ब्रह्मा नामाकरोत्तदा
senduḥ kapardaṁ bibhrāṇaḥ siṁhacarmāṁbaraṁdharaḥ| jātamevaṁ sa dṛṣṭvā tu brahmā nāmākarottadā
चन्द्रयुक्त जटा धारण करने वाला, सिंहचर्म का वस्त्र पहने हुए—इस प्रकार उत्पन्न हुए उसे देखकर ब्रह्मा ने तब उसका नामकरण किया।
श्लोक 29 (skanda.5.2.29)
नीललोहितनामेति भव रुद्र पिनाकधृक्। ततः प्रववृते सृष्टिः स्रष्टुर्लोकपितामहात्
nīlalohitanāmeti bhava rudra pinākadhṛk| tataḥ pravavṛte sṛṣṭiḥ sraṣṭurlokapitāmahāt
'तुम्हारा नाम नीललोहित होगा; हे रुद्र, तुम पिनाकधारी बनो।' इसके पश्चात् सृष्टिकर्ता लोकपितामह से सृष्टि का प्रवर्तन हुआ।
श्लोक 30 (skanda.5.2.30)
सप्तादौ मानसाञ्जज्ञे सनकादींस्ततोऽपरान्। मरीचि दक्षप्रभृतीन्मन्वादींश्च प्रजासृजः
saptādau mānasāñjajñe sanakādīṁstato'parān| marīci dakṣaprabhṛtīnmanvādīṁśca prajāsṛjaḥ
पहले उन्होंने मानसिक रूप से सनक आदि सप्तर्षियों को उत्पन्न किया; फिर मरीचि, दक्ष आदि तथा मनु आदि प्रजापतियों को।
श्लोक 31 (skanda.5.2.31)
अष्टभेदान्सुरान्कृत्वा तिर्यग्योनिं च पंचधा। मनुष्यानेकभेदांश्च सृष्टिमेवं ससर्ज ह
aṣṭabhedānsurānkṛtvā tiryagyoniṁ ca paṁcadhā| manuṣyānekabhedāṁśca sṛṣṭimevaṁ sasarja ha
आठ प्रकार के देवताओं तथा पाँच प्रकार की तिर्यक् योनियों को उत्पन्न कर, तथा अनेक प्रकार के मनुष्यों को भी—इस प्रकार उन्होंने सृष्टि रची।
श्लोक 32 (skanda.5.2.32)
सृष्टिः सुरादिका जाता कृत्वा ब्रह्माणमप्यधः। प्रणम्याथ सिषेवुस्ते केवलं नीललोहितम्
sṛṣṭiḥ surādikā jātā kṛtvā brahmāṇamapyadhaḥ| praṇamyātha siṣevuste kevalaṁ nīlalohitam
इस प्रकार उत्पन्न हुई देवादि सृष्टि ने ब्रह्मा को भी गौण मानकर, प्रणाम करते हुए केवल नीललोहित की ही सेवा-पूजा की।
श्लोक 33 (skanda.5.2.33)
ततो ब्रह्माऽवदद्रुद्रमपूज्यो हि त्वया कृतः। स्वतेजसा भवान्पूज्यो यतो याहि हिमालयम्
tato brahmā'vadadrudramapūjyo hi tvayā kṛtaḥ| svatejasā bhavānpūjyo yato yāhi himālayam
तब ब्रह्मा ने रुद्र से कहा—'तुमने मुझे अपूज्य बना दिया है; अपने तेज से तुम स्वयं पूज्य हो, इसलिए हिमालय पर चले जाओ।'
श्लोक 34 (skanda.5.2.34)
तं नीललोहितः प्रोचे भवता नार्चितो ह्यहम्। ततो जगाम रुद्रोऽसौ स यत्र भगवान्भवः
taṁ nīlalohitaḥ proce bhavatā nārcito hyaham| tato jagāma rudro'sau sa yatra bhagavānbhavaḥ
उससे नीललोहित ने कहा—'मैं तुम्हारे द्वारा सम्मानित नहीं हुआ हूँ।' तत्पश्चात् वह रुद्र वहाँ गया जहाँ भगवान् भव विराजमान थे।
श्लोक 35 (skanda.5.2.35)
ततो ब्रह्माऽभवन्मूढो रजसा चोपबृंहितः। तताप तेजसा सृष्टिं मन्यमानो मया कृताम्
tato brahmā'bhavanmūḍho rajasā copabṛṁhitaḥ| tatāpa tejasā sṛṣṭiṁ manyamāno mayā kṛtām
तब ब्रह्मा रजोगुण से उन्मत्त होकर मोहग्रस्त हो गए; यह मानते हुए कि सृष्टि उन्हीं के द्वारा रची गई है, वे अहंकार से संतप्त हो उठे।
श्लोक 36 (skanda.5.2.36)
मत्तुल्यो नास्ति वै देवो येन सृष्टिः प्रवर्द्धिता। सदेवासुरगन्धर्वा पशु पक्षिमृगाकुला
mattulyo nāsti vai devo yena sṛṣṭiḥ pravarddhitā| sadevāsuragandharvā paśu pakṣimṛgākulā
'मेरे समान कोई देवता नहीं है, जिसके द्वारा यह सृष्टि इतनी विस्तृत की गई है—जो देव, दानव, गन्धर्व, पशु, पक्षी और मृगों से परिपूर्ण है।'
श्लोक 37 (skanda.5.2.37)
एवं मूढः स पंचास्यो विरंच्योऽभवद्दर्पितः। प्राग्वक्त्रं सुस्वरं तस्य सामवेदप्रवर्तकम्
evaṁ mūḍhaḥ sa paṁcāsyo viraṁcyo'bhavaddarpitaḥ| prāgvaktraṁ susvaraṁ tasya sāmavedapravartakam
इस प्रकार मोहित और अभिमानी हुए वे पंचमुख विरंचि गर्वयुक्त हो गए। उनका सम्मुख मुख, जो सुस्वर था, सामवेद का प्रवर्तक था।
श्लोक 38 (skanda.5.2.38)
द्वितीयं वदनं तस्य ऋग्वेदस्य प्रवर्तकम्। यजुर्वेदधरं चान्यदथर्वाख्यं चतुर्थकम्
dvitīyaṁ vadanaṁ tasya ṛgvedasya pravartakam| yajurvedadharaṁ cānyadatharvākhyaṁ caturthakam
उनका दूसरा मुख ऋग्वेद का प्रवर्तक था; अन्य एक यजुर्वेद को धारण करने वाला, और चौथा अथर्ववेद नामक था।
श्लोक 39 (skanda.5.2.39)
सांगोपांगेतिहासांश्च सरहस्यान्ससंग्रहान्। वेदानधीते वक्त्रेण पंचमेनोपचक्षुषा
sāṁgopāṁgetihāsāṁśca sarahasyānsasaṁgrahān| vedānadhīte vaktreṇa paṁcamenopacakṣuṣā
अपने अंग-उपांगों सहित इतिहासों को, रहस्यों और संग्रहों सहित, वे अपने पाँचवें, ऊर्ध्वदर्शी मुख से वेदों का अध्ययन करते थे।
श्लोक 40 (skanda.5.2.40)
तस्याऽसुराः सुराः सर्वे वक्त्रस्याद्भुततेजसः। तेजसा न प्रकाशंते दीपः सूर्योदये यथा
tasyā'surāḥ surāḥ sarve vaktrasyādbhutatejasaḥ| tejasā na prakāśaṁte dīpaḥ sūryodaye yathā
उस अद्भुत तेजस्वी मुख के तेज से समस्त देव और असुर अपने ही तेज से प्रकाशित नहीं हो पाते थे—जैसे सूर्योदय होने पर दीपक फीका पड़ जाता है।
श्लोक 41 (skanda.5.2.41)
सपुत्रा अपि सोद्वेगा बभूवुर्नष्ट चेतसः। नाभिगन्तुं न च द्रष्टुं चिरं तेजोऽपसर्पितुम्
saputrā api sodvegā babhūvurnaṣṭa cetasaḥ| nābhigantuṁ na ca draṣṭuṁ ciraṁ tejo'pasarpitum
वे अपने पुत्रों सहित व्याकुल हो उठे, उनका चित्त भ्रमित हो गया; वे उस विस्तृत तेज के निकट जाने या उसे देर तक देखने में भी असमर्थ हो गए।
श्लोक 42 (skanda.5.2.42)
अभिभूतमिवात्मानं मन्यमाना अविद्विषः। सर्वे ते मन्त्रयामासुर्देवा वै हितमा त्मनः
abhibhūtamivātmānaṁ manyamānā avidviṣaḥ| sarve te mantrayāmāsurdevā vai hitamā tmanaḥ
अपने आपको पराभूत-सा मानते हुए, यद्यपि वे द्वेषरहित थे, तो भी उन सब देवताओं ने अपने हित के लिए परस्पर विचार-विमर्श किया।
श्लोक 43 (skanda.5.2.43)
गच्छाम शरणं देवं निस्तेजा ब्रह्मतेजसा। किं तु तस्य न जानीमः स्थानं यत्र व्यवस्थितः
gacchāma śaraṇaṁ devaṁ nistejā brahmatejasā| kiṁ tu tasya na jānīmaḥ sthānaṁ yatra vyavasthitaḥ
'आओ, ब्रह्मा के तेज से निस्तेज होकर हम भगवान् की शरण में चलें; परन्तु हम नहीं जानते कि वे किस स्थान पर विराजमान हैं।'
श्लोक 44 (skanda.5.2.44)
तं भीममत्र दक्ष्यामो भक्त्या नान्येन केनचित्। एवं संमन्त्र्य ते देवाः कृतांजलिपुटास्तदा। चक्रुः स्तोत्रं महेशस्य परया स्वरसंपदा
taṁ bhīmamatra dakṣyāmo bhaktyā nānyena kenacit| evaṁ saṁmantrya te devāḥ kṛtāṁjalipuṭāstadā| cakruḥ stotraṁ maheśasya parayā svarasaṁpadā
'हम उस भीषण देव को यहाँ केवल भक्ति से ही देख पाएँगे, अन्य किसी उपाय से नहीं।' ऐसा विचार कर उन देवताओं ने अंजलि बाँधकर परम मधुर स्वरों में महेश की स्तुति की।
श्लोक 45 (skanda.5.2.45)
देवा ऊचुः। नमस्ते देवदेवेश महेश्वर नमोनमः
devā ūcuḥ| namaste devadeveśa maheśvara namonamaḥ
देवताओं ने कहा—हे देवदेवेश महेश्वर, आपको नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है।
श्लोक 46 (skanda.5.2.46)
न विद्मः परमं मूढा महिमानं तवातुलम्। यद्योगेन परं ब्रह्म भूतानां त्वं सनातनः
na vidmaḥ paramaṁ mūḍhā mahimānaṁ tavātulam| yadyogena paraṁ brahma bhūtānāṁ tvaṁ sanātanaḥ
'हम मोहग्रस्त होकर आपकी अनुपम परम महिमा को नहीं जानते; आप योग से समस्त प्राणियों के सनातन परब्रह्म हैं।'
श्लोक 47 (skanda.5.2.47)
प्रतिष्ठा सर्वभूतानां हेतुः सर्वस्य सर्जने। बिभर्षि चैव नेत्रस्थान्सोमसूर्यविभावसून्
pratiṣṭhā sarvabhūtānāṁ hetuḥ sarvasya sarjane| bibharṣi caiva netrasthānsomasūryavibhāvasūn
'आप समस्त भूतों की प्रतिष्ठा तथा सबकी सृष्टि के कारण हैं; आप ही अपने नेत्रों में चन्द्र, सूर्य और अग्नि को धारण करते हैं।'
श्लोक 48 (skanda.5.2.48)
नामसंकीर्तनादेव मुच्यन्ते जंतवोऽशुभात्। पृथिव्यबग्निचन्द्रार्कव्योमवायूपलक्षणाः
nāmasaṁkīrtanādeva mucyante jaṁtavo'śubhāt| pṛthivyabagnicandrārkavyomavāyūpalakṣaṇāḥ
'आपके नामों के संकीर्तनमात्र से प्राणी अशुभ से मुक्त हो जाते हैं; आप पृथ्वी, जल, अग्नि, चन्द्र, सूर्य, आकाश और वायु—इन्हीं से चिह्नित हैं।'
श्लोक 49 (skanda.5.2.49)
मूर्तयस्ते महादेव व्याप्तमाभिरशेषतः। रजःसत्त्वतमोभावैर्भ्राम्यमाणं त्वया जगत्
mūrtayaste mahādeva vyāptamābhiraśeṣataḥ| rajaḥsattvatamobhāvairbhrāmyamāṇaṁ tvayā jagat
'हे महादेव, ये सब आपके ही रूप हैं, जिनसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है; रजो, सत्त्व और तमो भावों के द्वारा यह जगत् आपके ही द्वारा भ्रमित किया जाता है।'
श्लोक 50 (skanda.5.2.50)
नावबुध्यति सर्वेश सर्वमूर्तिधरो यतः। ब्रह्मादीनां सुरेशानां संमोहनविमोहनम्। त्वं करोषि युगावर्तकाले काले च दुःसहम्
nāvabudhyati sarveśa sarvamūrtidharo yataḥ| brahmādīnāṁ sureśānāṁ saṁmohanavimohanam| tvaṁ karoṣi yugāvartakāle kāle ca duḥsaham
'हे सर्वेश, आप सर्वरूपधारी होने के कारण किसी से भी नहीं जाने जाते; आप ही युगपरिवर्तन के काल में तथा काल-काल में ब्रह्मा आदि सुरेशों को असह्य मोह में डालते हैं।'
श्लोक 51 (skanda.5.2.51)
सनत्कुमार उवाच। प्रत्यक्षं दर्शनं दत्त्वा देवानामनुकंपया। प्रसन्नवदनो भूत्वा देवैश्चापि नमस्कृतः
sanatkumāra uvāca| pratyakṣaṁ darśanaṁ dattvā devānāmanukaṁpayā| prasannavadano bhūtvā devaiścāpi namaskṛtaḥ
सनत्कुमार ने कहा—देवताओं पर अनुकम्पा करके प्रत्यक्ष दर्शन देकर, प्रसन्नमुख होकर, और देवताओं द्वारा प्रणाम किए जाने पर...
श्लोक 52 (skanda.5.2.52)
वासयन्मोहनाम्ना तु सह देवैर्महेश्वरः
vāsayanmohanāmnā tu saha devairmaheśvaraḥ
...महेश्वर मोहन नाम से देवताओं के साथ निवास करते हुए...
श्लोक 53 (skanda.5.2.53)
एवं संस्तूयमानोऽसौ देवर्षिपितृमानवैः। अन्तर्हित उवाचेदं देवा ब्रूत यथेप्सितम्
evaṁ saṁstūyamāno'sau devarṣipitṛmānavaiḥ| antarhita uvācedaṁ devā brūta yathepsitam
इस प्रकार देवों, ऋषियों, पितरों और मनुष्यों द्वारा स्तुति किए जाने पर वे अन्तर्हित होकर बोले—'हे देवो, जैसा चाहो वैसा माँगो।'
श्लोक 54 (skanda.5.2.54)
देवा ऊचुः। प्रत्यक्षं दर्शनं स्थाणो प्रार्थयाम सदा तव। त्वया कारुण्यतोऽस्माकं वरश्चापि प्रदीयताम्
devā ūcuḥ| pratyakṣaṁ darśanaṁ sthāṇo prārthayāma sadā tava| tvayā kāruṇyato'smākaṁ varaścāpi pradīyatām
देवताओं ने कहा—'हे स्थाणो, हम सदा आपके प्रत्यक्ष दर्शन की प्रार्थना करते हैं; तथा अपनी करुणा से हमें एक वर भी प्रदान कीजिए।'
श्लोक 55 (skanda.5.2.55)
यदस्माकं महद्वीर्यं तेजश्चैव पराक्रमम्। तत्सर्वं ब्रह्मणा ग्रस्तं पंचमास्यस्य तेजसा
yadasmākaṁ mahadvīryaṁ tejaścaiva parākramam| tatsarvaṁ brahmaṇā grastaṁ paṁcamāsyasya tejasā
'हमारा जो महान् वीर्य, तेज और पराक्रम था, वह सब ब्रह्मा के पंचम मुख के तेज से ग्रस लिया गया है।'
श्लोक 56 (skanda.5.2.56)
विनेशुः सर्वतेजांसि त्वत्प्रसादात्पुनः प्रभो। जायते तद्यथापूर्वं तथा कुरु महेश्वर
vineśuḥ sarvatejāṁsi tvatprasādātpunaḥ prabho| jāyate tadyathāpūrvaṁ tathā kuru maheśvara
'हमारे सारे तेज नष्ट हो गए हैं; हे प्रभो, आपकी कृपा से वे पुनः पहले जैसे उत्पन्न हो जाएँ—हे महेश्वर, ऐसा ही कीजिए।'
श्लोक 57 (skanda.5.2.57)
सनत्कुमार उवाच। प्रत्यक्षमेत्य वै पश्चाच्चलितः शर्व एव हि। जगाम तत्र यत्रासौ रजोऽहंकारमूर्त्तिमान्। देवाः स्तुवंतो देवेशं परिवार्य उपाविशन्
sanatkumāra uvāca| pratyakṣametya vai paścāccalitaḥ śarva eva hi| jagāma tatra yatrāsau rajo'haṁkāramūrttimān| devāḥ stuvaṁto deveśaṁ parivārya upāviśan
सनत्कुमार ने कहा—प्रत्यक्ष दर्शन देकर शर्व वहाँ गए, जहाँ वह रजोऽहंकारमूर्ति ब्रह्मा विराजमान थे; देवगण देवेश की स्तुति करते हुए उन्हें घेरकर बैठ गए।
श्लोक 58 (skanda.5.2.58)
ब्रह्मा तमागतं देवं नाजानात्तमसा वृतः। सूर्यकोटिसहस्राणां तेजसा रंजयञ्जगत्
brahmā tamāgataṁ devaṁ nājānāttamasā vṛtaḥ| sūryakoṭisahasrāṇāṁ tejasā raṁjayañjagat
अहंकार से आवृत ब्रह्मा उस आगत देव को नहीं पहचान सके, जबकि वे स्वयं करोड़ों सूर्यों के तेज से जगत् को रंजित कर रहे थे।
श्लोक 59 (skanda.5.2.59)
तदाऽदृश्यत विश्वात्मा विश्वसृग्विश्वभाव नः। स पितामहमासीनं सकले देवमण्डले
tadā'dṛśyata viśvātmā viśvasṛgviśvabhāva naḥ| sa pitāmahamāsīnaṁ sakale devamaṇḍale
तब विश्व के आत्मा, विश्व के स्रष्टा और विश्व-स्वरूप वे [शिव] वहाँ प्रकट हुए, समस्त देवमण्डल के मध्य ब्रह्मा के समक्ष विराजमान।
श्लोक 60 (skanda.5.2.60)
तेजसाभिभवन्रुद्रस्तेन मत्तोऽग्रतः स्थितः। रुद्रतेजोभिभूतं च ब्रह्मवक्त्रं न राजते
tejasābhibhavanrudrastena matto'grataḥ sthitaḥ| rudratejobhibhūtaṁ ca brahmavaktraṁ na rājate
अपने तेज से अभिभूत करते हुए रुद्र उनके समक्ष अधिक तेजस्वी होकर खड़े हो गए; रुद्र के तेज से अभिभूत होकर ब्रह्मा का मुख शोभाहीन हो गया।
श्लोक 61 (skanda.5.2.61)
रात्रौ प्रकाशकिरणश्चंद्रः सूर्योदये यथा। सगर्वोथात्मजं दृष्ट्वा रुद्रदेवं सनातनम्
rātrau prakāśakiraṇaścaṁdraḥ sūryodaye yathā| sagarvothātmajaṁ dṛṣṭvā rudradevaṁ sanātanam
जैसे रात्रि में प्रकाशमान किरणों वाला चन्द्रमा सूर्योदय होने पर फीका पड़ जाता है, वैसे ही अपने पुत्र सनातन देव रुद्र को गर्वपूर्वक देखकर...
श्लोक 62 (skanda.5.2.62)
अवन्दत करेणैव प्राह वै सस्मितं वचः। प्रत्युवाच विरूपाक्षो ब्रह्माणं तं हसन्निव
avandata kareṇaiva prāha vai sasmitaṁ vacaḥ| pratyuvāca virūpākṣo brahmāṇaṁ taṁ hasanniva
...उन्होंने केवल हाथ से ही उनका अभिवादन किया और मुस्कराते हुए वचन कहा; तब विरूपाक्ष ने हँसते हुए-से ब्रह्मा को उत्तर दिया।
श्लोक 63 (skanda.5.2.63)
यतो न वेद परमं देवं तत्तेजसावृतः। ततोऽट्टहासं भगवान्मुमोच शशिशेखरः
yato na veda paramaṁ devaṁ tattejasāvṛtaḥ| tato'ṭṭahāsaṁ bhagavānmumoca śaśiśekharaḥ
चूँकि वे अपने ही तेज से आवृत होकर परमदेव को नहीं पहचान सके, इसलिए भगवान् शशिशेखर ने तब जोर से अट्टहास किया।
श्लोक 64 (skanda.5.2.64)
पश्यतां सर्वदेवानां शृण्वतां वाचमुक्तवान्। तेनादृहासशब्देन मोहयित्वा पितामहम्
paśyatāṁ sarvadevānāṁ śṛṇvatāṁ vācamuktavān| tenādṛhāsaśabdena mohayitvā pitāmaham
समस्त देवताओं के देखते-सुनते वे वाणी बोले; और उस अट्टहास-ध्वनि से पितामह को मोहित करके...
श्लोक 65 (skanda.5.2.65)
तेजोराशिशशांकाभः शशांकार्काग्निलोचनः। वामांगुष्ठनखाग्रेण ब्रह्मणः पञ्चमं शिरः
tejorāśiśaśāṁkābhaḥ śaśāṁkārkāgnilocanaḥ| vāmāṁguṣṭhanakhāgreṇa brahmaṇaḥ pañcamaṁ śiraḥ
...वे तेजोराशि, चन्द्रकान्ति के समान, चन्द्र-सूर्य-अग्नि जिनके नेत्र हैं, अपने बाएँ अंगूठे के नखाग्र से ब्रह्मा के पंचम शिर को...
श्लोक 66 (skanda.5.2.66)
चकर्त कदलीगर्भं नरः कररुहैरिव। छिद्यमानं च तद्वक्त्रं बुबुधे न पितामहः
cakarta kadalīgarbhaṁ naraḥ kararuhairiva| chidyamānaṁ ca tadvaktraṁ bubudhe na pitāmahaḥ
...इस प्रकार काट डाला, जैसे मनुष्य अपने नखों से केले के तने के भीतरी भाग को काट लेता है; और पितामह को अपना ही मुख कटता हुआ ज्ञात भी नहीं हुआ।
श्लोक 67 (skanda.5.2.67)
रुद्रस्य तेजसा तस्मान्मोहितो न नतिं गतः। छिन्नं तस्य शिरः पश्चाद्रुद्रहस्ते स्थितं तदा
rudrasya tejasā tasmānmohito na natiṁ gataḥ| chinnaṁ tasya śiraḥ paścādrudrahaste sthitaṁ tadā
रुद्र के तेज से मोहित होने के कारण वे प्रणाम भी न कर सके; तत्पश्चात् उनका कटा हुआ शिर रुद्र के हाथ में ही रह गया।
श्लोक 68 (skanda.5.2.68)
अपश्यद्दैवतैः सार्धं रौद्रमतिभयाज्ज्वलत्। महेश्वरकरांतस्थनखैर्वक्त्रं विराजते
apaśyaddaivataiḥ sārdhaṁ raudramatibhayājjvalat| maheśvarakarāṁtasthanakhairvaktraṁ virājate
उन्होंने देवताओं सहित उस अत्यन्त भयावह और ज्वलंत रौद्ररूप को देखा; महेश्वर के हाथ के नखाग्र में स्थित वह मुख शोभायमान हो रहा था।
श्लोक 69 (skanda.5.2.69)
ग्रहमण्डलमध्यस्थो द्वितीय इव चन्द्रमाः। उत्क्षिप्य तत्कपालेन ननर्त शशिशेखरः
grahamaṇḍalamadhyastho dvitīya iva candramāḥ| utkṣipya tatkapālena nanarta śaśiśekharaḥ
ग्रहमण्डल के मध्य द्वितीय चन्द्रमा के समान उस कपाल को उठाकर शशिशेखर ने नृत्य किया।
श्लोक 70 (skanda.5.2.70)
शिखरस्थेन सूर्येण कैलास इव पर्वतः। छिन्ने वक्त्रे ततो देवा हृष्टपुष्टा वृषध्वजम्। तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैर्देवदेवं कपालिनम्
śikharasthena sūryeṇa kailāsa iva parvataḥ| chinne vaktre tato devā hṛṣṭapuṣṭā vṛṣadhvajam| tuṣṭuvurvividhaiḥ stotrairdevadevaṁ kapālinam
शिखर पर स्थित सूर्य सहित कैलास पर्वत के समान वह मुख प्रतीत हो रहा था; मुख के कट जाने पर देवगण हर्षित एवं पुष्ट होकर वृषभध्वज कपाली देवाधिदेव की विविध स्तोत्रों से स्तुति करने लगे।
श्लोक 71 (skanda.5.2.71)
देवा ऊचुः। नमः कपालिने नित्यं महाकालाय शंखिने
devā ūcuḥ| namaḥ kapāline nityaṁ mahākālāya śaṁkhine
देवताओं ने कहा—कपाली, शंखधारी, नित्य महाकाल को नमस्कार।
श्लोक 72 (skanda.5.2.72)
ऐश्वर्यज्ञानयुक्ताय सर्वभोगप्रदायिने। नमो दर्पविनाशाय सर्वदेवमयाय च
aiśvaryajñānayuktāya sarvabhogapradāyine| namo darpavināśāya sarvadevamayāya ca
'ऐश्वर्य और ज्ञान से युक्त, समस्त भोगों के दाता; अभिमान के नाशक तथा समस्त देवमय आपको नमस्कार है।'
श्लोक 73 (skanda.5.2.73)
कालसंहारकर्ता त्वं महाकालस्ततो ह्यसि। भक्तानां दुःखशमनो दुःखांतस्तेन रोचसे
kālasaṁhārakartā tvaṁ mahākālastato hyasi| bhaktānāṁ duḥkhaśamano duḥkhāṁtastena rocase
'आप काल के भी संहारकर्ता हैं, इसीलिए महाकाल कहलाते हैं; भक्तों के दुःख को शान्त करने वाले, दुःख का अन्त करने वाले होने से आप सुशोभित होते हैं।'
श्लोक 74 (skanda.5.2.74)
शंकरोप्याशु भक्तानां तेन त्वं शंकरः स्मृतः। छित्त्वा ब्रह्मशिरो यस्मात्कपालं च बिभर्षि च
śaṁkaropyāśu bhaktānāṁ tena tvaṁ śaṁkaraḥ smṛtaḥ| chittvā brahmaśiro yasmātkapālaṁ ca bibharṣi ca
'आप अपने भक्तों के लिए सदा कल्याणकारी हैं, इसीलिए शंकर कहलाते हैं; चूँकि आपने ब्रह्मा के शिर को काटकर उसे कपाल रूप में धारण किया है...'
श्लोक 75 (skanda.5.2.75)
तेन देव कपाली त्वं स्तुतो ह्यसि प्रसीद नः। एवं स्तुतः प्रसन्नात्मा देवानुत्थाप्य शंकरः
tena deva kapālī tvaṁ stuto hyasi prasīda naḥ| evaṁ stutaḥ prasannātmā devānutthāpya śaṁkaraḥ
'...इसलिए हे देव, "कपाली" कहकर स्तुति किए जाने पर आप हम पर प्रसन्न हों।' इस प्रकार स्तुति किए जाने पर प्रसन्नचित्त शंकर ने देवताओं को उठाया।
श्लोक 76 (skanda.5.2.76)
कृपानिधिः स भगवांस्तत्रैवांतरधीयत। शशिशकलमयूखैर्भासित यत्कपर्दं द्रवति गगनगंगातोयवीचीविचेयम्। सितविधृतकपालो मालया रुद्रपार्श्वे स जयति जितवेधा ऊर्जितः प्राज्यतेजाः
kṛpānidhiḥ sa bhagavāṁstatraivāṁtaradhīyata| śaśiśakalamayūkhairbhāsita yatkapardaṁ dravati gaganagaṁgātoyavīcīviceyam| sitavidhṛtakapālo mālayā rudrapārśve sa jayati jitavedhā ūrjitaḥ prājyatejāḥ
वे करुणानिधि भगवान् तत्क्षण वहीं अन्तर्धान हो गए। उनकी जटाएँ चन्द्रकला की किरणों से प्रकाशित होकर मानो आकाशगंगा के जल की तरंगों-सी बहती प्रतीत होती हैं; श्वेत कपाल को माला सहित धारण किए हुए, रुद्र के पार्श्व में विराजमान, अजेय बुद्धि वाले, बलशाली और महातेजस्वी वे विजयी हों।