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अवन्ती खण्ड · अध्याय 208

ऋक्षशृङ्ग का स्वर्गगमन

अध्याय 207अध्याय-सूचीअध्याय 209

श्लोक 1 (skanda.5.208.1)

उत्तानपाद उवाच। आश्रमे वसतस्तस्य स दीर्घतपसो मुनेः। कनीयांस्तनयो देव कथं मृत्युमुपागतः॥

uttānapāda uvāca| āśrame vasatastasya sa dīrghatapaso muneḥ| kanīyāṁstanayo deva kathaṁ mṛtyumupāgataḥ||

उत्तानपाद ने कहा—हे देव! उस दीर्घतपा मुनि के आश्रम में रहते हुए उनका छोटा पुत्र मृत्यु को कैसे प्राप्त हुआ?

श्लोक 2 (skanda.5.208.2)

ईश्वर उवाच। शृणुष्वैकमना भूत्वा कथां दिव्यां महीपते। श्रवणादेव यस्यास्तु मुच्यते सर्वकिल्बिषैः॥

īśvara uvāca| śṛṇuṣvaikamanā bhūtvā kathāṁ divyāṁ mahīpate| śravaṇādeva yasyāstu mucyate sarvakilbiṣaiḥ||

ईश्वर ने कहा—हे राजन्! एकाग्रचित्त होकर इस दिव्य कथा को सुनो, जिसके श्रवण मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 3 (skanda.5.208.3)

काशीराजो महावीर्यो महाबलपराक्रमः। चित्रसेन इति ख्यातां धरण्यां स नराधिप॥

kāśīrājo mahāvīryo mahābalaparākramaḥ| citrasena iti khyātāṁ dharaṇyāṁ sa narādhipa||

काशी का राजा महापराक्रमी और महाबली था, जो पृथ्वी पर चित्रसेन नाम से विख्यात था, हे राजन्।

श्लोक 4 (skanda.5.208.4)

तस्य राज्ये सदा धर्मो नाधर्मो विद्यते क्वचित्। वेदधर्मरतो नित्यं प्रजा धर्मेण पालयन्॥

tasya rājye sadā dharmo nādharmo vidyate kvacit| vedadharmarato nityaṁ prajā dharmeṇa pālayan||

उसके राज्य में सदा धर्म ही रहता था, अधर्म कहीं नहीं था; वह सदा वेदोक्त धर्म में रत रहकर प्रजा का धर्मपूर्वक पालन करता था।

श्लोक 5 (skanda.5.208.5)

स्वधर्मनिरतश्चैव युद्धातिथ्यप्रियः सदा। क्षत्रधर्मं समाश्रित्य भोगान्भुङ्क्ते स कामतः॥

svadharmanirataścaiva yuddhātithyapriyaḥ sadā| kṣatradharmaṁ samāśritya bhogānbhuṅkte sa kāmataḥ||

वह अपने धर्म में निरत, सदा युद्ध और अतिथि-सत्कार का प्रेमी था; क्षत्रिय-धर्म का आश्रय लेकर वह इच्छानुसार भोगों का उपभोग करता था।

श्लोक 6 (skanda.5.208.6)

कोशस्यान्तो न विद्येत हस्त्यश्वरथपत्तिमान्। इतिहासपुराणज्ञैः पण्डितैः सह संकथाम्॥

kośasyānto na vidyeta hastyaśvarathapattimān| itihāsapurāṇajñaiḥ paṇḍitaiḥ saha saṁkathām||

उसके कोष का अन्त नहीं था; वह हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सेना से युक्त था तथा इतिहास-पुराणों के ज्ञाता पण्डितों के साथ वार्तालाप करता था।

श्लोक 7 (skanda.5.208.7)

कथयन्राजते राजा कैलास इव शङ्करः। एवं स पालयन्राज्यं राजा मन्त्रिणमब्रवीत्॥

kathayanrājate rājā kailāsa iva śaṅkaraḥ| evaṁ sa pālayanrājyaṁ rājā mantriṇamabravīt||

इस प्रकार वार्तालाप करता हुआ राजा कैलास पर शंकर के समान सुशोभित होता था। इस प्रकार राज्य का पालन करते हुए राजा ने मन्त्री से कहा—

श्लोक 8 (skanda.5.208.8)

मृगयायां गमिष्यामि तिष्ठध्वं राज्यपालने। गम्यतां सचिवैः प्रोक्ते गतोऽसौ वसुधाधिपः॥

mṛgayāyāṁ gamiṣyāmi tiṣṭhadhvaṁ rājyapālane| gamyatāṁ sacivaiḥ prokte gato'sau vasudhādhipaḥ||

"मैं मृगया के लिए जाऊँगा, तुम राज्य के पालन में स्थित रहो।" मन्त्रियों द्वारा "जाइए" कहे जाने पर वह राजा चला गया।

श्लोक 9 (skanda.5.208.9)

अश्वारूढाश्च धावन्तो राजानो मण्डलाधिपाः। छत्रैश्छत्राणि घृष्यन्तोऽनुजग्मुः काननं प्रति॥

aśvārūḍhāśca dhāvanto rājāno maṇḍalādhipāḥ| chatraiśchatrāṇi ghṛṣyanto'nujagmuḥ kānanaṁ prati||

घोड़ों पर सवार दौड़ते हुए मण्डलाधिपति राजागण, जिनके छत्र आपस में टकरा रहे थे, वन की ओर उसके पीछे-पीछे चले।

श्लोक 10 (skanda.5.208.10)

रजस्तत्रोत्थितं भौमं गजवाजिपदाहतम्। तेनैतच्छादितं सर्वं सदिङ्मार्तण्डमंलम्॥

rajastatrotthitaṁ bhaumaṁ gajavājipadāhatam| tenaitacchāditaṁ sarvaṁ sadiṅmārtaṇḍamaṁlam||

वहाँ हाथी-घोड़ों के पैरों से आहत पृथ्वी की धूल उठी; उससे सूर्यमण्डल सहित सम्पूर्ण दिशाएँ ढक गईं।

श्लोक 11 (skanda.5.208.11)

न तत्र दृश्यते सूर्यो न काष्ठा न च चन्द्रमाः। पादपाश्च न दृश्यन्ते गिरिशृङ्गाणि सर्वतः॥

na tatra dṛśyate sūryo na kāṣṭhā na ca candramāḥ| pādapāśca na dṛśyante giriśṛṅgāṇi sarvataḥ||

वहाँ न सूर्य दिखाई देता था, न दिशा, न चन्द्रमा; वृक्ष भी नहीं दिखते थे और न ही चारों ओर पर्वत-शिखर।

श्लोक 12 (skanda.5.208.12)

परस्परं न पश्यन्ति निशार्द्धे वार्षिके यथा। तत्रासौ सुमहद्यूथं मृगाणां समलक्ष्यत॥

parasparaṁ na paśyanti niśārddhe vārṣike yathā| tatrāsau sumahadyūthaṁ mṛgāṇāṁ samalakṣyata||

वे एक-दूसरे को उस प्रकार नहीं देख पा रहे थे जैसे वर्षा-ऋतु की आधी रात में। वहीं उन्होंने मृगों का एक अत्यन्त विशाल झुंड देखा।

श्लोक 13 (skanda.5.208.13)

अधावत्सहितः सर्वैः स राजा राजपुत्रकैः। वृन्दास्फोटोऽभवत्तेषां शीघ्रं जग्मुर्दिशो दश॥

adhāvatsahitaḥ sarvaiḥ sa rājā rājaputrakaiḥ| vṛndāsphoṭo'bhavatteṣāṁ śīghraṁ jagmurdiśo daśa||

राजा सभी राजकुमारों के साथ उनके पीछे दौड़ा; उनका झुंड बिखर गया और वे शीघ्र ही दसों दिशाओं में भाग गए।

श्लोक 14 (skanda.5.208.14)

एकमार्गगतो राजा चित्रसेनो महीपतिः। एकाकी स गतस्तत्र यत्र यत्र च ते मृगाः॥

ekamārgagato rājā citraseno mahīpatiḥ| ekākī sa gatastatra yatra yatra ca te mṛgāḥ||

राजा चित्रसेन एक ही मार्ग पर अकेला उन मृगों के पीछे-पीछे वहीं गया, जहाँ-जहाँ वे मृग गए।

श्लोक 15 (skanda.5.208.15)

प्रविष्टोऽसौ ततो दुर्गं काननं गिरिगह्वरम्। वल्लीगुल्मसमाकीर्णं स्थितो यत्र न लक्ष्यते॥

praviṣṭo'sau tato durgaṁ kānanaṁ girigahvaram| vallīgulmasamākīrṇaṁ sthito yatra na lakṣyate||

फिर वह लता-झाड़ियों से भरे दुर्गम वन और पर्वत-गुहा में प्रविष्ट हुआ, जहाँ अन्दर जाने पर कुछ भी दिखाई नहीं देता था।

श्लोक 16 (skanda.5.208.16)

अदृश्यांस्तु मृगान्मत्वा दिशो राजा व्यलोकयत्। कां दिशं नु गमिष्यामि क्व मे सैन्यसमागमः॥

adṛśyāṁstu mṛgānmatvā diśo rājā vyalokayat| kāṁ diśaṁ nu gamiṣyāmi kva me sainyasamāgamaḥ||

मृगों को अदृश्य पाकर राजा ने दिशाओं की ओर देखा—"अब मैं किस दिशा को जाऊँ? मेरी सेना से मिलन कहाँ होगा?"

श्लोक 17 (skanda.5.208.17)

एवं कष्टं गतो राजा चित्रसेनो नराधिपः। वृक्षच्छायां समाश्रित्य विश्राममकरोन्नृपः॥

evaṁ kaṣṭaṁ gato rājā citraseno narādhipaḥ| vṛkṣacchāyāṁ samāśritya viśrāmamakaronnṛpaḥ||

इस प्रकार कष्ट में पड़ा राजा चित्रसेन एक वृक्ष की छाया का आश्रय लेकर विश्राम करने लगा।

श्लोक 18 (skanda.5.208.18)

क्षुत्तृषार्तो भ्रमन्दुर्गे कानने गिरिगह्वरे। ततोऽपश्यत्सरो दिव्यं पद्मिनीखण्डमण्डितम्॥

kṣuttṛṣārto bhramandurge kānane girigahvare| tato'paśyatsaro divyaṁ padminīkhaṇḍamaṇḍitam||

भूख-प्यास से पीड़ित, उस दुर्गम वन और पर्वत-गुहा में भटकते हुए, उसने तब एक दिव्य सरोवर देखा, जो कमलिनी-खण्डों से सुशोभित था,

श्लोक 19 (skanda.5.208.19)

हंसकारण्डवाकीर्णं चक्रवाकोपशोभितम्। ततो दृष्ट्वा स राजेन्द्रः सम्प्रहृष्टतनूरुहः॥

haṁsakāraṇḍavākīrṇaṁ cakravākopaśobhitam| tato dṛṣṭvā sa rājendraḥ samprahṛṣṭatanūruhaḥ||

जो हंस और कारण्डवों से भरा हुआ तथा चक्रवाक पक्षियों से सुशोभित था। उसे देखकर वह राजेन्द्र हर्ष से रोमांचित हो उठा।

श्लोक 20 (skanda.5.208.20)

कमलानि गृहीत्वा तु ततः स्नानं समाचरत्। तर्पयित्वा पितृदेवान्मनुष्यांश्च यथाविधि॥

kamalāni gṛhītvā tu tataḥ snānaṁ samācarat| tarpayitvā pitṛdevānmanuṣyāṁśca yathāvidhi||

उसने कमल तोड़कर स्नान किया और विधिपूर्वक पितरों, देवताओं तथा मनुष्यों को तर्पण दिया।

श्लोक 21 (skanda.5.208.21)

आच्छाद्य शतपत्रैश्च पूजयामास शङ्करम्। ययौ पानीयममलं यथावत्स समाहितः॥

ācchādya śatapatraiśca pūjayāmāsa śaṅkaram| yayau pānīyamamalaṁ yathāvatsa samāhitaḥ||

सैकड़ों पंखुड़ियों वाले कमलों से आच्छादित करके उसने शंकर की पूजा की; फिर सावधान होकर उसने विधिपूर्वक निर्मल जल पिया।

श्लोक 22 (skanda.5.208.22)

उत्तीर्य सलिलात्तीरे दृष्ट्वा वृक्षं समीपगम्। उत्तरीयमधः कृत्वोपविष्टो धरणीतले॥

uttīrya salilāttīre dṛṣṭvā vṛkṣaṁ samīpagam| uttarīyamadhaḥ kṛtvopaviṣṭo dharaṇītale||

जल से निकलकर तट पर एक निकटवर्ती वृक्ष देखकर, अपना उत्तरीय वस्त्र बिछाकर वह भूमि पर बैठ गया।

श्लोक 23 (skanda.5.208.23)

चिन्तयन्नुपविष्टोऽसौ किमद्य प्रकरोम्यहम्। तत्रासीनो ददर्शाथ वनोद्देशे मृगान्बहून्॥

cintayannupaviṣṭo'sau kimadya prakaromyaham| tatrāsīno dadarśātha vanoddeśe mṛgānbahūn||

वहाँ बैठा हुआ वह सोचने लगा—"अब मैं क्या करूँ?" वहीं बैठे हुए उसने वन के उस भाग में अनेक मृगों को देखा।

श्लोक 24 (skanda.5.208.24)

केचित्पूर्वमुखास्तत्र चापरे दक्षिणामुखाः। वारुण्यमिमुखाः केचित्केचित्कौबेरदिङ्मुखाः॥

kecitpūrvamukhāstatra cāpare dakṣiṇāmukhāḥ| vāruṇyamimukhāḥ kecitkecitkauberadiṅmukhāḥ||

उनमें से कुछ पूर्वाभिमुख थे, कुछ दक्षिणाभिमुख; कुछ वरुण की दिशा की ओर मुख किए थे, तो कुछ कुबेर की दिशा की ओर।

श्लोक 25 (skanda.5.208.25)

केचिन्निद्रापराः केचिदूर्ध्वकर्णाः स्थिताः परे। मृगमध्ये स्थितो योगी ऋक्षशृङ्गो महातपाः॥

kecinnidrāparāḥ kecidūrdhvakarṇāḥ sthitāḥ pare| mṛgamadhye sthito yogī ṛkṣaśṛṅgo mahātapāḥ||

कुछ निद्रा में लीन थे, कुछ कान ऊँचे किए खड़े थे। उन मृगों के बीच महातपस्वी योगी ऋक्षशृङ्ग खड़ा था।

श्लोक 26 (skanda.5.208.26)

मृगान्दृष्ट्वा ततो राजा आहारार्थमचिन्तयत्। हत्वैतेषु मृगं कंचिद्भक्षयामि यदृच्छया॥

mṛgāndṛṣṭvā tato rājā āhārārthamacintayat| hatvaiteṣu mṛgaṁ kaṁcidbhakṣayāmi yadṛcchayā||

मृगों को देखकर राजा ने आहार के विषय में सोचा—"इनमें से किसी मृग को मारकर मैं इच्छानुसार उसका भक्षण करूँगा।

श्लोक 27 (skanda.5.208.27)

स्वस्थावस्थो भविष्यामि मृगमांसस्य भक्षणात्। काशीं प्रति गमिष्यामि मार्गमन्विष्य यत्नतः॥

svasthāvastho bhaviṣyāmi mṛgamāṁsasya bhakṣaṇāt| kāśīṁ prati gamiṣyāmi mārgamanviṣya yatnataḥ||

मृग-मांस खाने से मैं स्वस्थ हो जाऊँगा, फिर यत्नपूर्वक मार्ग खोजकर काशी की ओर चला जाऊँगा।"

श्लोक 28 (skanda.5.208.28)

विचिन्त्यैवं ततो राजा वृक्षमूलमुपाश्रितः। चापं गृह्य कराग्रेण स शरं संदधे ततः॥

vicintyaivaṁ tato rājā vṛkṣamūlamupāśritaḥ| cāpaṁ gṛhya karāgreṇa sa śaraṁ saṁdadhe tataḥ||

ऐसा विचार करके राजा एक वृक्ष के मूल का आश्रय लेकर खड़ा हुआ; हाथ में धनुष लेकर उसने बाण का संधान किया।

श्लोक 29 (skanda.5.208.29)

विचिक्षेप शरं तत्र यत्र ते बहवो मृगाः। तेषां मध्ये स वै विद्ध ऋक्षशृङ्गो महातपाः॥

vicikṣepa śaraṁ tatra yatra te bahavo mṛgāḥ| teṣāṁ madhye sa vai viddha ṛkṣaśṛṅgo mahātapāḥ||

उसने वहाँ बाण चलाया, जहाँ वे अनेक मृग थे; उनके बीच महातपस्वी ऋक्षशृङ्ग बाण से बिंध गया।

श्लोक 30 (skanda.5.208.30)

जग्मुस्त्रस्तास्तु ते सर्वे शब्दं कृत्वा वनौकसः। स ऋषिः पतितस्तत्र कृष्ण कृष्णेति चाब्रवीत्॥

jagmustrastāstu te sarve śabdaṁ kṛtvā vanaukasaḥ| sa ṛṣiḥ patitastatra kṛṣṇa kṛṣṇeti cābravīt||

भयभीत वे सभी वनवासी मृग शब्द करते हुए भाग गए; वह ऋषि वहीं गिर पड़ा और "कृष्ण, कृष्ण" कहने लगा।

श्लोक 31 (skanda.5.208.31)

हाहा कष्टं कृतं तेन येनाहं घातितोऽधुना। कस्यैषा दुर्मतिर्जाता पापबुद्धेर्ममोपरि॥

hāhā kaṣṭaṁ kṛtaṁ tena yenāhaṁ ghātito'dhunā| kasyaiṣā durmatirjātā pāpabuddhermamopari||

"हाय, हाय! यह कैसा कष्टकर कार्य हुआ, जिससे मैं अब मारा गया! किसकी यह दुर्बुद्धि, किसकी यह पापपूर्ण बुद्धि मेरे ऊपर उत्पन्न हुई?

श्लोक 32 (skanda.5.208.32)

मृगमध्ये स्थितश्चाहं न कंचिदुपरोधये। तां वाचं मानुषीं श्रुत्वा स राजा विस्मयान्वितः॥

mṛgamadhye sthitaścāhaṁ na kaṁciduparodhaye| tāṁ vācaṁ mānuṣīṁ śrutvā sa rājā vismayānvitaḥ||

मैं तो मृगों के बीच खड़ा होकर किसी को बाधा नहीं पहुँचाता।" वह मनुष्यों जैसी वाणी सुनकर राजा विस्मित हो गया।

श्लोक 33 (skanda.5.208.33)

शीघ्रं गत्वा ततोऽपश्यद्ब्राह्मणं ब्रह्मतेजसा। हाहा कष्टं कृतं मेऽद्य येनासौ घातितो द्विजः॥

śīghraṁ gatvā tato'paśyadbrāhmaṇaṁ brahmatejasā| hāhā kaṣṭaṁ kṛtaṁ me'dya yenāsau ghātito dvijaḥ||

वह शीघ्र वहाँ जाकर ब्रह्मतेज से युक्त एक ब्राह्मण को देखने लगा—"हाय, हाय! आज मैंने यह कैसा कष्टकर कार्य किया, जिससे यह द्विज मारा गया!"

श्लोक 34 (skanda.5.208.34)

चित्रसेन उवाच। अकामाद्घातितस्त्वं तु मृगभ्रान्त्या मयानघ। गृहीत्वा बहुदारूणि स्वतनुं दाहयाम्यहम्॥

citrasena uvāca| akāmādghātitastvaṁ tu mṛgabhrāntyā mayānagha| gṛhītvā bahudārūṇi svatanuṁ dāhayāmyaham||

चित्रसेन ने कहा—"हे निष्पाप! मैंने मृग-भ्रम से अनजाने में तुम्हें मार डाला। मैं बहुत लकड़ियाँ इकट्ठी करके अपने शरीर को जला डालूँगा।

श्लोक 35 (skanda.5.208.35)

दृष्टादृष्टं तु यत्किंचिन्न समं ब्रह्महत्यया। अन्यथा ब्रह्महत्यायाः शुद्धिर्मे न भविष्यति॥

dṛṣṭādṛṣṭaṁ tu yatkiṁcinna samaṁ brahmahatyayā| anyathā brahmahatyāyāḥ śuddhirme na bhaviṣyati||

दृष्ट या अदृष्ट कोई भी पाप ब्रह्महत्या के समान नहीं है; अन्यथा मुझे ब्रह्महत्या से शुद्धि प्राप्त नहीं होगी।"

श्लोक 36 (skanda.5.208.36)

ऋक्षशृङ्ग उवाच। न ते सिद्धिर्भवेत्काचिन्मयि पञ्चत्वमागते। बह्व्यो हत्या भविष्यन्ति विनाशे मम साम्प्रतम्॥

ṛkṣaśṛṅga uvāca| na te siddhirbhavetkācinmayi pañcatvamāgate| bahvyo hatyā bhaviṣyanti vināśe mama sāmpratam||

ऋक्षशृङ्ग ने कहा—"मेरे पंचत्व को प्राप्त होने पर तुम्हें उससे कोई सिद्धि नहीं मिलेगी; अब मेरे विनाश से और भी अनेक हत्याएँ होंगी।

श्लोक 37 (skanda.5.208.37)

जननी मे पिता वृद्धो भ्रातरश्च तपस्विनः। भ्रातृजाया मरिष्यन्ति मयि पञ्चत्वमागते॥

jananī me pitā vṛddho bhrātaraśca tapasvinaḥ| bhrātṛjāyā mariṣyanti mayi pañcatvamāgate||

मेरे पंचत्व को प्राप्त होते ही मेरी माता, मेरे वृद्ध पिता, मेरे तपस्वी भ्राता तथा मेरी भ्रातृजायाएँ भी मर जाएँगी।

श्लोक 38 (skanda.5.208.38)

एता हत्या भविष्यन्ति कथं शुद्धिर्भवेत्तव। उपायं कथयिष्यामि तं कर्तुं यदि मन्यसे॥

etā hatyā bhaviṣyanti kathaṁ śuddhirbhavettava| upāyaṁ kathayiṣyāmi taṁ kartuṁ yadi manyase||

ये सब हत्याएँ होंगी—फिर तुम्हारी शुद्धि कैसे होगी? यदि तुम मानो तो मैं तुम्हें उसका उपाय बताता हूँ, जिसे तुम्हें करना होगा।"

श्लोक 39 (skanda.5.208.39)

चित्रसेन उवाच। उपायः कथ्यतां मेऽद्य यस्ते मनसि वर्तते। करिष्ये तमहं सर्वं यत्नेनापि महामुने॥

citrasena uvāca| upāyaḥ kathyatāṁ me'dya yaste manasi vartate| kariṣye tamahaṁ sarvaṁ yatnenāpi mahāmune||

चित्रसेन ने कहा—"हे महामुने! जो उपाय आपके मन में है, वह मुझसे अभी कहिए; मैं यत्नपूर्वक वह सब कुछ करूँगा।"

श्लोक 40 (skanda.5.208.40)

ऋक्षशृङ्ग उवाच। पृच्छामि त्वां कथं को वा कुतस्त्वमिह चागतः। ब्रह्मक्षत्रविशां मध्ये को भवानुत शूद्रजः॥

ṛkṣaśṛṅga uvāca| pṛcchāmi tvāṁ kathaṁ ko vā kutastvamiha cāgataḥ| brahmakṣatraviśāṁ madhye ko bhavānuta śūdrajaḥ||

ऋक्षशृङ्ग ने कहा—"मैं तुमसे पूछता हूँ—तुम कौन हो, कहाँ से यहाँ आए हो? ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य में से तुम कौन हो, अथवा शूद्रजातीय हो?"

श्लोक 41 (skanda.5.208.41)

चित्रसेन उवाच। नाहं शूद्रोऽस्मि भोस्तात न वैश्यो ब्राह्मणो न वा। न चान्त्यजोऽस्मि विप्रेन्द्र क्षत्रियोऽस्मि महामुने॥

citrasena uvāca| nāhaṁ śūdro'smi bhostāta na vaiśyo brāhmaṇo na vā| na cāntyajo'smi viprendra kṣatriyo'smi mahāmune||

चित्रसेन ने कहा—"हे तात! मैं न शूद्र हूँ, न वैश्य हूँ, न ब्राह्मण हूँ, और न ही अन्त्यज हूँ, हे विप्रेन्द्र। हे महामुने! मैं क्षत्रिय हूँ।

श्लोक 42 (skanda.5.208.42)

धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सर्वसत्त्वहिते रतः। अकामात्पातकं जातं कथं शुद्धिर्भविष्यति॥

dharmajñaśca kṛtajñaśca sarvasattvahite rataḥ| akāmātpātakaṁ jātaṁ kathaṁ śuddhirbhaviṣyati||

मैं धर्मज्ञ और कृतज्ञ हूँ, सभी प्राणियों के हित में रत हूँ। अनजाने में यह पाप हुआ है, अब इसकी शुद्धि कैसे होगी?"

श्लोक 43 (skanda.5.208.43)

ऋक्षशृङ्ग उवाच। मां गृहीत्वा आश्रमं गच्छ यत्र तौ पितरौ मम। आवेदयस्व चात्मानं पुत्रघातिनमातुरम्॥

ṛkṣaśṛṅga uvāca| māṁ gṛhītvā āśramaṁ gaccha yatra tau pitarau mama| āvedayasva cātmānaṁ putraghātinamāturam||

ऋक्षशृङ्ग ने कहा—"मुझे लेकर उस आश्रम में जाओ जहाँ मेरे माता-पिता हैं; वहाँ अपने आपको दुःखी पुत्रघाती के रूप में प्रकट करो।

श्लोक 44 (skanda.5.208.44)

ते दृष्ट्वा मां करिष्यन्ति कारुण्यं च तवोपरि। उपायं कथयिष्यन्ति येन शान्तिर्भविष्यति॥

te dṛṣṭvā māṁ kariṣyanti kāruṇyaṁ ca tavopari| upāyaṁ kathayiṣyanti yena śāntirbhaviṣyati||

मुझे देखकर वे तुम पर भी करुणा करेंगे; वे तुम्हें वह उपाय बताएँगे जिससे शान्ति प्राप्त होगी।"

श्लोक 45 (skanda.5.208.45)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा चित्रसेनो नृपोत्तम। स्कन्धे कृत्वा तु तं विप्रं जगामाश्रमसन्निधौ॥

tasya tadvacanaṁ śrutvā citraseno nṛpottama| skandhe kṛtvā tu taṁ vipraṁ jagāmāśramasannidhau||

उसके वे वचन सुनकर, हे नृपोत्तम, चित्रसेन उस ब्राह्मण को कंधे पर उठाकर आश्रम के समीप गया।

श्लोक 46 (skanda.5.208.46)

न शक्नोति यदा वोढुं विश्राम्यति पुनःपुनः। तावत्पश्यति तं विप्रं मूर्छितं विकलेन्द्रियम्॥

na śaknoti yadā voḍhuṁ viśrāmyati punaḥpunaḥ| tāvatpaśyati taṁ vipraṁ mūrchitaṁ vikalendriyam||

जब वह उसे उठाए रखने में असमर्थ होता, तो बार-बार विश्राम करता; तभी उसने उस ब्राह्मण को मूर्छित और इन्द्रियों से विकल देखा।

श्लोक 47 (skanda.5.208.47)

मुमोच चित्रसेनस्तं छायायां वटभूरुहः। वस्त्रं चतुर्गुणं कृत्वा चक्रे वातं मुहुर्मुहुः॥

mumoca citrasenastaṁ chāyāyāṁ vaṭabhūruhaḥ| vastraṁ caturguṇaṁ kṛtvā cakre vātaṁ muhurmuhuḥ||

चित्रसेन ने उसे एक बरगद के वृक्ष की छाया में उतार दिया; वस्त्र को चौगुना करके उसने बार-बार हवा की।

श्लोक 48 (skanda.5.208.48)

पश्यतस्तस्य राजेन्द्र ऋक्षशृङ्गो महातपाः। पञ्चत्वमगमच्छीघ्रं ध्यानयोगेन योगवित्॥

paśyatastasya rājendra ṛkṣaśṛṅgo mahātapāḥ| pañcatvamagamacchīghraṁ dhyānayogena yogavit||

हे राजेन्द्र! उसके देखते-देखते ही महातपस्वी और योगवेत्ता ऋक्षशृङ्ग ध्यानयोग द्वारा शीघ्र ही पंचत्व को प्राप्त हो गया।

श्लोक 49 (skanda.5.208.49)

दाहयामास तं विप्रं विधिदृष्टेन कर्मणा। स्नानं कृत्वा स शोकार्तो विललाप मुहुर्मुहुः॥

dāhayāmāsa taṁ vipraṁ vidhidṛṣṭena karmaṇā| snānaṁ kṛtvā sa śokārto vilalāpa muhurmuhuḥ||

उसने विधि-विधान के अनुसार उस ब्राह्मण का दाह-संस्कार किया; स्नान करके शोकाकुल वह बार-बार विलाप करने लगा।

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