अवन्ती खण्ड · अध्याय 209
दीर्घतपा का स्वर्गारोहण
श्लोक 1 (skanda.5.209.1)
ईश्वर उवाच। ततश्चानन्तरं राजा जगामोद्वेगमुत्तमम्। कथं यामि गृहं त्वद्य वाराणस्यामहं पुनः॥
īśvara uvāca| tataścānantaraṁ rājā jagāmodvegamuttamam| kathaṁ yāmi gṛhaṁ tvadya vārāṇasyāmahaṁ punaḥ||
ईश्वर ने कहा—इसके बाद राजा अत्यन्त उद्वेग को प्राप्त हुआ—"मैं आज पुनः वाराणसी अपने घर कैसे जाऊँ?
श्लोक 2 (skanda.5.209.2)
ब्रह्महत्यासमाविष्टो जुहोम्यग्नौ कलेवरम्। अथवा तस्य वाक्येन तं गच्छाम्याश्रमं प्रति॥
brahmahatyāsamāviṣṭo juhomyagnau kalevaram| athavā tasya vākyena taṁ gacchāmyāśramaṁ prati||
ब्रह्महत्या से युक्त होकर क्या मैं अग्नि में अपना शरीर हवन कर दूँ? अथवा उस मुनि के वचन के अनुसार उसी आश्रम की ओर जाऊँ,
श्लोक 3 (skanda.5.209.3)
कथयामि यथावृत्तं गत्वा तस्य महामुनेः। एवं संचिन्त्य राजासौ जगामाश्रमसन्निधौ॥
kathayāmi yathāvṛttaṁ gatvā tasya mahāmuneḥ| evaṁ saṁcintya rājāsau jagāmāśramasannidhau||
और उस महामुनि के पास जाकर यथावृत्तान्त कह दूँ।" ऐसा विचार करके वह राजा आश्रम के समीप गया।
श्लोक 4 (skanda.5.209.4)
ऋक्षशृङ्गस्य चास्थीनि गृहीत्वा स नृपोत्तमः। दृष्टिमार्गे स्थितस्तस्य महर्षेर्भावितात्मनः॥
ṛkṣaśṛṅgasya cāsthīni gṛhītvā sa nṛpottamaḥ| dṛṣṭimārge sthitastasya maharṣerbhāvitātmanaḥ||
उस नृपोत्तम ने ऋक्षशृङ्ग की अस्थियाँ लेकर उस भावितात्मा महर्षि की दृष्टि के मार्ग में खड़े होकर प्रतीक्षा की।
श्लोक 5 (skanda.5.209.5)
दीर्घतपा उवाच। आगच्छ स्वागतं तेऽस्तु आसनेऽत्रोपविश्यताम्। अर्घं ददाम्यहं येन मधुपर्कं सविष्टरम्॥
dīrghatapā uvāca| āgaccha svāgataṁ te'stu āsane'tropaviśyatām| arghaṁ dadāmyahaṁ yena madhuparkaṁ saviṣṭaram||
दीर्घतपा ने कहा—"आओ, तुम्हारा स्वागत हो; इस आसन पर बैठो। मैं तुम्हें अर्घ्य, मधुपर्क तथा आसन सहित भेंट देता हूँ।"
श्लोक 6 (skanda.5.209.6)
चित्रसेन उवाच। अर्घस्यास्य न योग्योऽहं महर्षे नास्मि भाषणे। मृगमध्यस्थितो विप्रस्तव पुत्रो मया हतः॥
citrasena uvāca| arghasyāsya na yogyo'haṁ maharṣe nāsmi bhāṣaṇe| mṛgamadhyasthito viprastava putro mayā hataḥ||
चित्रसेन ने कहा—"हे महर्षे! मैं इस अर्घ्य के योग्य नहीं हूँ, और न ही बातचीत के योग्य हूँ। मृगों के बीच खड़ा हुआ जो ब्राह्मण था, वह आपका पुत्र मेरे द्वारा मारा गया।
श्लोक 7 (skanda.5.209.7)
पुत्रघ्नं विद्धि मां विप्र तीव्रदण्डेन दण्डय। मृगभ्रान्त्या हतो विप्र ऋक्षशृङ्गो महातपाः॥
putraghnaṁ viddhi māṁ vipra tīvradaṇḍena daṇḍaya| mṛgabhrāntyā hato vipra ṛkṣaśṛṅgo mahātapāḥ||
हे विप्र! मुझे पुत्रघाती जानिए, तीव्र दण्ड से मुझे दण्डित कीजिए। हे विप्र! मृग-भ्रम से महातपस्वी ऋक्षशृङ्ग मारे गए।"
श्लोक 8 (skanda.5.209.8)
इति मत्वा मुनिश्रेष्ठ कुरु मे त्वं यथोचितम्। माता तद्वचनं श्रुत्वा गृहान्निष्क्रम्य विह्वला॥
iti matvā muniśreṣṭha kuru me tvaṁ yathocitam| mātā tadvacanaṁ śrutvā gṛhānniṣkramya vihvalā||
"ऐसा मानकर, हे मुनिश्रेष्ठ, आप मेरे साथ जो उचित हो वह कीजिए।" यह वचन सुनकर उनकी माता व्याकुल होकर घर से निकल पड़ी—
श्लोक 9 (skanda.5.209.9)
हा हतास्मीत्युवाचेदं पपात धरणीतले। विललाप सुदुःखार्ता पुत्रशोकेन पीडिता॥
hā hatāsmītyuvācedaṁ papāta dharaṇītale| vilalāpa suduḥkhārtā putraśokena pīḍitā||
"हाय, मैं मारी गई!" ऐसा कहकर वह पृथ्वी पर गिर पड़ी; अत्यन्त दुःख से पीड़ित होकर पुत्रशोक से संतप्त वह विलाप करने लगी।
श्लोक 10 (skanda.5.209.10)
हा हता पुत्र पुत्रेति करुणं कुररी यथा। विललापातुरा माता क्व गतो मां विहाय वै। मुखं दर्शय चात्मीयं मातरं मां हि मानय॥
hā hatā putra putreti karuṇaṁ kurarī yathā| vilalāpāturā mātā kva gato māṁ vihāya vai| mukhaṁ darśaya cātmīyaṁ mātaraṁ māṁ hi mānaya||
"हाय पुत्र, हाय पुत्र!" इस प्रकार कुररी पक्षी के समान करुण विलाप करती हुई माता व्याकुल हो उठी—"मुझे छोड़कर तू कहाँ चला गया? मुझे अपना मुख दिखा, अपनी माता का सम्मान कर।
श्लोक 11 (skanda.5.209.11)
श्रुताध्ययनसम्पन्नं जपहोमपरायणम्। आगतं त्वां गृहद्वारे कदा द्रक्ष्यामि पुत्रक॥
śrutādhyayanasampannaṁ japahomaparāyaṇam| āgataṁ tvāṁ gṛhadvāre kadā drakṣyāmi putraka||
वेदाध्ययन में निपुण, जप-होम में परायण, अपने घर के द्वार पर आते हुए तुझे मैं कब देखूँगी, हे पुत्रक?
श्लोक 12 (skanda.5.209.12)
लोकोक्त्या श्रूयते चैतच्चन्दनं किल शीतलम्। पुत्रगात्रपरिष्वङ्गश्चन्दनादपि शीतलः॥
lokoktyā śrūyate caitaccandanaṁ kila śītalam| putragātrapariṣvaṅgaścandanādapi śītalaḥ||
लोकोक्ति में कहा जाता है कि चन्दन शीतल होता है; परन्तु पुत्र के अंगों का आलिंगन चन्दन से भी अधिक शीतल है।
श्लोक 13 (skanda.5.209.13)
किं चन्दनेन पीयूपबिन्दुना किं किमिन्दुना॥
kiṁ candanena pīyūpabindunā kiṁ kimindunā||
मेरे लिए चन्दन का क्या प्रयोजन, अमृत की बूँद का क्या, चन्द्रमा का ही क्या प्रयोजन,
श्लोक 14 (skanda.5.209.14)
पुत्रगात्रपरिष्वङ्गपात्रं गात्रं भवेद्यदि॥
putragātrapariṣvaṅgapātraṁ gātraṁ bhavedyadi||
यदि मेरा शरीर पुत्र के अंगों के आलिंगन का पात्र ही न बने?
श्लोक 15 (skanda.5.209.15)
परिष्वजितुमिच्छामि त्वामहं पुत्र सुप्रिय। पञ्चत्वमनुयास्यामि त्वद्विहीनाद्य दुःखिता॥
pariṣvajitumicchāmi tvāmahaṁ putra supriya| pañcatvamanuyāsyāmi tvadvihīnādya duḥkhitā||
हे अत्यन्त प्रिय पुत्र! मैं तुम्हें आलिंगन करना चाहती हूँ; आज तुमसे वियुक्त, दुःखी होकर मैं भी पंचत्व को प्राप्त हो जाऊँगी।"
श्लोक 16 (skanda.5.209.16)
एवं विलपती दीना पुत्रशोकेन पीडिता। मूर्छिता विह्वला दीना निपपात महीतले॥
evaṁ vilapatī dīnā putraśokena pīḍitā| mūrchitā vihvalā dīnā nipapāta mahītale||
इस प्रकार विलाप करती हुई, दीन, पुत्रशोक से पीड़ित वह मूर्छित, व्याकुल और दीन होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी।
श्लोक 17 (skanda.5.209.17)
भार्यां च पतितां दृष्ट्वा पुत्रशोकेन पीडिताम्। चुकोप स मुनिस्तत्र चित्रसेनाय भूभृते॥
bhāryāṁ ca patitāṁ dṛṣṭvā putraśokena pīḍitām| cukopa sa munistatra citrasenāya bhūbhṛte||
पुत्रशोक से पीड़ित अपनी गिरी हुई पत्नी को देखकर वह मुनि वहाँ राजा चित्रसेन पर क्रुद्ध हो उठा।
श्लोक 18 (skanda.5.209.18)
दीर्घतपा उवाच। याहि याहि महापाप मा मुखं दर्शयस्व मे। किं त्वया घातितो विप्रो ह्यकामाच्च सुतो मम॥
dīrghatapā uvāca| yāhi yāhi mahāpāpa mā mukhaṁ darśayasva me| kiṁ tvayā ghātito vipro hyakāmācca suto mama||
दीर्घतपा ने कहा—"जा, जा, हे महापापी! मुझे अपना मुख मत दिखा। क्या मेरा पुत्र वह ब्राह्मण तूने अनजाने में नहीं मारा?
श्लोक 19 (skanda.5.209.19)
ब्रह्महत्या भविष्यन्ति बह्व्यस्ते वसुधाधिप। सकुटुम्बस्य मे त्वं हि मृत्युरेष उपस्थितः॥
brahmahatyā bhaviṣyanti bahvyaste vasudhādhipa| sakuṭumbasya me tvaṁ hi mṛtyureṣa upasthitaḥ||
हे वसुधाधिप! अब तेरी अनेक ब्रह्महत्याएँ होंगी; तू ही मेरे परिवार सहित मेरी मृत्यु का कारण बनकर उपस्थित हुआ है।"
श्लोक 20 (skanda.5.209.20)
एवमुक्त्वा ततो विप्रो विचिन्त्य च पुनःपुनः। परित्यज्य तदा क्रोधं मुनिभावाज्जगाद ह॥
evamuktvā tato vipro vicintya ca punaḥpunaḥ| parityajya tadā krodhaṁ munibhāvājjagāda ha||
ऐसा कहकर वह ब्राह्मण बार-बार विचार करके तथा मुनि-स्वभाव के कारण अपना क्रोध त्यागकर बोला—
श्लोक 21 (skanda.5.209.21)
दीर्घतपा उवाच। उद्वेगं त्यज भो वत्स दुरुक्तं गदितो मया। पुत्रशोकाभिभूतेन दुःखतप्तेन मानद॥
dīrghatapā uvāca| udvegaṁ tyaja bho vatsa duruktaṁ gadito mayā| putraśokābhibhūtena duḥkhataptena mānada||
दीर्घतपा ने कहा—"हे वत्स! अपना उद्वेग त्याग दो। मैंने पुत्रशोक से अभिभूत और दुःख से संतप्त होकर तुम्हें अनुचित वचन कहे हैं, हे मानद।
श्लोक 22 (skanda.5.209.22)
किं करोति नरः प्राज्ञः प्रेर्यमाणः स्वकर्मभिः। प्रागेव हि मनुष्याणां बुद्धिः कर्मानुसारिणी॥
kiṁ karoti naraḥ prājñaḥ preryamāṇaḥ svakarmabhiḥ| prāgeva hi manuṣyāṇāṁ buddhiḥ karmānusāriṇī||
बुद्धिमान पुरुष भी अपने ही कर्मों से प्रेरित होकर क्या कर सकता है? मनुष्यों की बुद्धि पहले से ही कर्म का अनुसरण करती है।
श्लोक 23 (skanda.5.209.23)
अनेनैव विधानेन पञ्चत्वं विहितं मम। हत्यास्तव भविष्यन्ति पूर्वमुक्ता न संशयः॥
anenaiva vidhānena pañcatvaṁ vihitaṁ mama| hatyāstava bhaviṣyanti pūrvamuktā na saṁśayaḥ||
इसी विधान से मेरा पंचत्व निश्चित था; तुम्हारी ये हत्याएँ पहले ही कही जा चुकी थीं, इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 24 (skanda.5.209.24)
ब्रह्मक्षत्रविशां मध्ये शूद्रचण्डालजातिषु। कस्त्वं कथय सत्यं मे कस्माच्च निहतो द्विजः॥
brahmakṣatraviśāṁ madhye śūdracaṇḍālajātiṣu| kastvaṁ kathaya satyaṁ me kasmācca nihato dvijaḥ||
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य में से, अथवा शूद्र-चाण्डाल जातियों में से, तुम कौन हो? मुझसे सत्य कहो, और किस कारण यह द्विज मारा गया?"
श्लोक 25 (skanda.5.209.25)
चित्रसेन उवाच। विज्ञापयामि विप्रर्षे क्षन्तव्यं ते ममोपरि। नाहं विप्रोऽस्मि वै तात न वैश्यो न च शूद्रजः॥
citrasena uvāca| vijñāpayāmi viprarṣe kṣantavyaṁ te mamopari| nāhaṁ vipro'smi vai tāta na vaiśyo na ca śūdrajaḥ||
चित्रसेन ने कहा—"हे विप्रर्षि! मैं निवेदन करता हूँ, मुझे आपसे क्षमा चाहिए। हे तात! मैं न विप्र हूँ, न वैश्य हूँ, न शूद्रजातीय हूँ,
श्लोक 26 (skanda.5.209.26)
न व्याधश्चान्त्यजातो वा क्षत्रियोऽहं महामुने। काशीराजो मृगान् हन्तुमागतो वनमुत्तमम्॥
na vyādhaścāntyajāto vā kṣatriyo'haṁ mahāmune| kāśīrājo mṛgān hantumāgato vanamuttamam||
न व्याध हूँ, न अन्त्यज जातीय हूँ, हे महामुने! मैं क्षत्रिय हूँ—काशी का राजा, जो मृगों के वध हेतु इस उत्तम वन में आया था।
श्लोक 27 (skanda.5.209.27)
भ्रान्त्या निपातितो ह्येष मृगरूपधरो मुनिः। इदानीं तव पादान्ते संश्रितः पातकान्वितः॥
bhrāntyā nipātito hyeṣa mṛgarūpadharo muniḥ| idānīṁ tava pādānte saṁśritaḥ pātakānvitaḥ||
भ्रमवश यह मृगरूपधारी मुनि मारा गया; अब पापयुक्त होकर मैं आपके चरणों की शरण में आया हूँ।
श्लोक 28 (skanda.5.209.28)
किं कर्तव्यं मया विप्र उपायं कथयस्व मे॥
kiṁ kartavyaṁ mayā vipra upāyaṁ kathayasva me||
हे विप्र! मुझे क्या करना चाहिए? मुझे उसका उपाय बताइए।"
श्लोक 29 (skanda.5.209.29)
दीर्घतपा उवाच। ब्रह्महत्या न शक्येताप्येका निस्तरितुं प्रभो। दशैका च कथं शक्यास्ताः शृणुष्व नरेश्वर॥
dīrghatapā uvāca| brahmahatyā na śakyetāpyekā nistarituṁ prabho| daśaikā ca kathaṁ śakyāstāḥ śṛṇuṣva nareśvara||
दीर्घतपा ने कहा—"हे प्रभो! एक भी ब्रह्महत्या से पार पाना सम्भव नहीं है, फिर दस से कैसे सम्भव होगा? हे नरेश्वर! सुनो।
श्लोक 30 (skanda.5.209.30)
चत्वारो मे सुता राजन् सभार्या मातृपूर्वकाः। मया सह न जीवन्ति ऋक्षशृङ्गस्य कारणे॥
catvāro me sutā rājan sabhāryā mātṛpūrvakāḥ| mayā saha na jīvanti ṛkṣaśṛṅgasya kāraṇe||
हे राजन्! मेरे चार पुत्र अपनी पत्नियों सहित, अपनी माता के साथ, ऋक्षशृङ्ग के कारण अब मेरे साथ जीवित नहीं रहेंगे।
श्लोक 31 (skanda.5.209.31)
उपायं शोभनं तात कथयिष्ये शृणुष्व तम्। शक्रोऽपि यदि तं कर्तुं सुखोपायं नरेश्वर॥
upāyaṁ śobhanaṁ tāta kathayiṣye śṛṇuṣva tam| śakro'pi yadi taṁ kartuṁ sukhopāyaṁ nareśvara||
हे तात! मैं तुम्हें एक शुभ उपाय बताऊँगा, उसे सुनो। हे नरेश्वर! उसे करना तो इन्द्र के लिए भी सुखद उपाय होगा—
श्लोक 32 (skanda.5.209.32)
सकुटुम्बं समस्तं मां दाहयित्वानले नृप। अस्थीनि नर्मदातोये शूलभेदे विनिक्षिप॥
sakuṭumbaṁ samastaṁ māṁ dāhayitvānale nṛpa| asthīni narmadātoye śūlabhede vinikṣipa||
हे नृप! मुझे मेरे सम्पूर्ण परिवार सहित अग्नि में जलाकर, हमारी अस्थियों को नर्मदा के जल में शूलभेद तीर्थ में डाल देना।
श्लोक 33 (skanda.5.209.33)
नर्मदादक्षिणे कूले शूलभेदं हि विश्रुतम्। सर्वपापहरं तीर्थं सर्वदुःखघ्नमुत्तमम्॥
narmadādakṣiṇe kūle śūlabhedaṁ hi viśrutam| sarvapāpaharaṁ tīrthaṁ sarvaduḥkhaghnamuttamam||
नर्मदा के दक्षिण तट पर शूलभेद नामक तीर्थ विख्यात है, जो सर्वपापहर, उत्तम तथा सभी दुःखों का नाशक है।
श्लोक 34 (skanda.5.209.34)
शुचिर्भूत्वा ममास्थीनि तत्र तीर्थे विनिक्षिप। मोक्ष्यसे सर्वपापैस्त्वं मम वाक्यान्न संशयः॥
śucirbhūtvā mamāsthīni tatra tīrthe vinikṣipa| mokṣyase sarvapāpaistvaṁ mama vākyānna saṁśayaḥ||
पवित्र होकर मेरी अस्थियाँ वहाँ उस तीर्थ में डाल देना। मेरे वचन से, निःसंदेह, तुम सभी पापों से मुक्त हो जाओगे।"
श्लोक 35 (skanda.5.209.35)
राजोवाच। आदेशो दीयतां तात करिष्यामि न संशयः। समस्तं मेऽस्ति यत्किंचिद्राज्यं कोशः सुहृत्सुताः॥
rājovāca| ādeśo dīyatāṁ tāta kariṣyāmi na saṁśayaḥ| samastaṁ me'sti yatkiṁcidrājyaṁ kośaḥ suhṛtsutāḥ||
राजा ने कहा—"हे तात! आदेश दीजिए, मैं निःसंदेह उसे करूँगा। मेरे पास जो कुछ भी है—राज्य, कोश, मित्र, पुत्र—
श्लोक 36 (skanda.5.209.36)
तवाधीनं महाविप्र प्रयच्छामि प्रसीद मे। परस्परं विवदतोर्विप्र राज्ञोस्तदा नृप॥
tavādhīnaṁ mahāvipra prayacchāmi prasīda me| parasparaṁ vivadatorvipra rājñostadā nṛpa||
वह सब आपके अधीन है, हे महाविप्र! मैं वह सब आपको अर्पित करता हूँ, मुझ पर प्रसन्न होइए।" जब वह ब्राह्मण और राजा हे नृप, इस प्रकार परस्पर बातचीत कर रहे थे,
श्लोक 37 (skanda.5.209.37)
स्फुटित्वा हृदयं शीघ्रं मुनिभार्या मृता तदा। पुत्रशोकसमाविष्टा निर्जीवा पतिता क्षितौ॥
sphuṭitvā hṛdayaṁ śīghraṁ munibhāryā mṛtā tadā| putraśokasamāviṣṭā nirjīvā patitā kṣitau||
तभी मुनि की पत्नी का हृदय शीघ्र ही फट गया और वह मर गई; पुत्रशोक से आविष्ट, निर्जीव होकर वह पृथ्वी पर गिर पड़ी।
श्लोक 38 (skanda.5.209.38)
पुत्राश्च मातृशोकेन सर्वे पञ्चत्वमागताः। स्नुषाश्चैव तदा सर्वा मृताश्च सह भर्तृभिः॥
putrāśca mātṛśokena sarve pañcatvamāgatāḥ| snuṣāścaiva tadā sarvā mṛtāśca saha bhartṛbhiḥ||
और उसके सभी पुत्र भी माता के शोक से पंचत्व को प्राप्त हो गए; उनकी सभी पुत्रवधुएँ भी तब अपने पतियों के साथ मर गईं।
श्लोक 39 (skanda.5.209.39)
पञ्चत्वं च गताः सर्वे मुनिमुख्या नृपोत्तम। विप्रानाह्वापयामास ये तत्राश्रमवासिनः॥
pañcatvaṁ ca gatāḥ sarve munimukhyā nṛpottama| viprānāhvāpayāmāsa ye tatrāśramavāsinaḥ||
हे नृपोत्तम! वे सभी मुनिश्रेष्ठ इस प्रकार पंचत्व को प्राप्त हो गए। तब उसने वहाँ आश्रम में रहने वाले ब्राह्मणों को बुलवाया,
श्लोक 40 (skanda.5.209.40)
तेभ्यो निवेदयामास यथावृत्तं नृपोत्तमः। स तैस्तदाभ्यनुज्ञातः काष्ठान्यादाय यत्नतः॥
tebhyo nivedayāmāsa yathāvṛttaṁ nṛpottamaḥ| sa taistadābhyanujñātaḥ kāṣṭhānyādāya yatnataḥ||
और उस नृपोत्तम ने उन्हें यथावृत्तान्त निवेदन किया। तब उनकी अनुमति पाकर उसने यत्नपूर्वक लकड़ियाँ एकत्र कीं,
श्लोक 41 (skanda.5.209.41)
दाहं संचयनं चक्रे चित्रसेनो महीपतिः। ऋक्षशृङ्गादिसर्वेषां गृहीत्वास्थीनि यत्नतः॥
dāhaṁ saṁcayanaṁ cakre citraseno mahīpatiḥ| ṛkṣaśṛṅgādisarveṣāṁ gṛhītvāsthīni yatnataḥ||
और राजा चित्रसेन ने दाह-संस्कार तथा अस्थि-संचयन किया; ऋक्षशृङ्ग सहित उन सबकी अस्थियाँ यत्नपूर्वक लेकर,
श्लोक 42 (skanda.5.209.42)
याम्याशां प्रस्थितो राजा पादचारी महीपते। न शक्नोति यदा गन्तुं छायामाश्रित्य तिष्ठति॥
yāmyāśāṁ prasthito rājā pādacārī mahīpate| na śaknoti yadā gantuṁ chāyāmāśritya tiṣṭhati||
हे महीपते! राजा पैदल ही दक्षिण दिशा की ओर चल पड़ा; जब वह चल नहीं पाता, तो छाया का आश्रय लेकर रुक जाता।
श्लोक 43 (skanda.5.209.43)
विश्रम्य च पुनर्गच्छेद्भाराक्रान्तो महीपतिः। सचैलं कुरुते स्नानं मुक्त्वास्थीनि पदे पदे॥
viśramya ca punargacchedbhārākrānto mahīpatiḥ| sacailaṁ kurute snānaṁ muktvāsthīni pade pade||
विश्राम करके भार से आक्रान्त वह महीपति पुनः चल पड़ता; वह पद-पद पर अस्थियाँ बिना छोड़े ही वस्त्र सहित स्नान करता था।
श्लोक 44 (skanda.5.209.44)
पिबेज्जलं निराहारः स गच्छन् दक्षिणामुखः। अचिरेणैव कालेन संगतो नर्मदातटम्॥
pibejjalaṁ nirāhāraḥ sa gacchan dakṣiṇāmukhaḥ| acireṇaiva kālena saṁgato narmadātaṭam||
वह निराहार रहकर केवल जल पीता हुआ दक्षिणाभिमुख चलता रहा; अल्प काल में ही वह नर्मदा के तट पर पहुँच गया।
श्लोक 45 (skanda.5.209.45)
आश्रमस्थान् द्विजान् दृष्ट्वा पप्रच्छ पृथिवीपतिः॥
āśramasthān dvijān dṛṣṭvā papraccha pṛthivīpatiḥ||
वहाँ आश्रम में रहने वाले द्विजों को देखकर उस पृथ्वीपति ने पूछा—
श्लोक 46 (skanda.5.209.46)
चित्रसेन उवाच। कथ्यतां शूलभेदस्य मार्गं मे द्विजसत्तमाः। येन यामि महाभागाः स्वकार्यार्थस्य सिद्धये॥
citrasena uvāca| kathyatāṁ śūlabhedasya mārgaṁ me dvijasattamāḥ| yena yāmi mahābhāgāḥ svakāryārthasya siddhaye||
चित्रसेन ने कहा—"हे द्विजसत्तमो! मुझे शूलभेद का मार्ग बताइए, जिससे हे महाभागो! मैं अपने कार्य की सिद्धि के लिए जा सकूँ।"
श्लोक 47 (skanda.5.209.47)
मुनय ऊचुः। इतः क्रोशान्तरादर्वाक्तीर्थं परमशोभनम्। नर्मदादक्षिणे कूले ततो द्रक्ष्यसि नान्यथा॥
munaya ūcuḥ| itaḥ krośāntarādarvāktīrthaṁ paramaśobhanam| narmadādakṣiṇe kūle tato drakṣyasi nānyathā||
मुनियों ने कहा—"यहाँ से एक क्रोश के भीतर परम शोभन तीर्थ है; नर्मदा के दक्षिण तट पर ही तुम उसे देखोगे, अन्यत्र नहीं।"
श्लोक 48 (skanda.5.209.48)
ऋषिवाक्येन राजासौ शीघ्रं गत्वा नरेश्वरः। स ददर्श ततः शीघ्रं बहुद्विजसमाकुलम्॥
ṛṣivākyena rājāsau śīghraṁ gatvā nareśvaraḥ| sa dadarśa tataḥ śīghraṁ bahudvijasamākulam||
ऋषियों के वचन से वह नरेश्वर राजा शीघ्र वहाँ गया, और शीघ्र ही उसने वह स्थान देखा, जो अनेक द्विजों से भरा हुआ था,
श्लोक 49 (skanda.5.209.49)
बहुद्रुमलताकीर्णं बहुपुष्पोपशोभितम्। ऋक्षसिंहसमाकीर्णं नानाव्रतधरैः शुभैः॥
bahudrumalatākīrṇaṁ bahupuṣpopaśobhitam| ṛkṣasiṁhasamākīrṇaṁ nānāvratadharaiḥ śubhaiḥ||
अनेक वृक्षों और लताओं से युक्त, अनेक पुष्पों से सुशोभित, भालुओं और सिंहों से भरा हुआ, तथा नाना शुभ व्रतधारियों से युक्त था—
श्लोक 50 (skanda.5.209.50)
एकपादास्थिताः केचिदपरे सूर्यदृष्टयः। एकाङ्गुष्ठ स्थिताः केचिदूर्ध्वबाहुस्थिताः परे॥
ekapādāsthitāḥ kecidapare sūryadṛṣṭayaḥ| ekāṅguṣṭha sthitāḥ kecidūrdhvabāhusthitāḥ pare||
उनमें कुछ एक पैर पर खड़े थे, कुछ सूर्य की ओर दृष्टि लगाए थे; कुछ एक अंगूठे पर खड़े थे, कुछ भुजाएँ ऊपर उठाए खड़े थे।
श्लोक 51 (skanda.5.209.51)
दिनैकभोजनाः केचित्केचित्कन्दफलाशनाः। त्रिरात्रभोजनाः केचित्पराकव्रतिनोऽपरे॥
dinaikabhojanāḥ kecitkecitkandaphalāśanāḥ| trirātrabhojanāḥ kecitparākavratino'pare||
कुछ दिन में एक बार भोजन करते थे, कुछ कन्द-फल खाते थे; कुछ तीन रात्रि में एक बार भोजन करते थे, कुछ पराक व्रत करने वाले थे।
श्लोक 52 (skanda.5.209.52)
चान्द्रायणरताः केचित्केचित्पक्षोपवासिनः। मासोपवासिनः केचित्केचिदृत्वन्तपारणाः॥
cāndrāyaṇaratāḥ kecitkecitpakṣopavāsinaḥ| māsopavāsinaḥ kecitkecidṛtvantapāraṇāḥ||
कुछ चान्द्रायण व्रत में रत थे, कुछ पक्ष भर उपवास करते थे; कुछ मास भर उपवास करते थे, कुछ ऋतु बदलने पर ही पारणा करते थे।
श्लोक 53 (skanda.5.209.53)
योगाभ्यासरताः केचित्केचिद्ध्यायन्ति तत्पदम्। शीर्णपर्णाशिनः केचित्केचिच्च कटुकाशनाः॥
yogābhyāsaratāḥ kecitkeciddhyāyanti tatpadam| śīrṇaparṇāśinaḥ kecitkecicca kaṭukāśanāḥ||
कुछ योगाभ्यास में रत थे, कुछ उस परमपद का ध्यान करते थे; कुछ सूखे पत्ते खाते थे, कुछ कटु पदार्थ खाते थे।
श्लोक 54 (skanda.5.209.54)
शैवालभोजनाः केचित्केचिन्मारुतभोजनाः। गार्हस्थ्ये च स्थिताः केचित्केचिच्चैवाग्निहोत्रिणः॥
śaivālabhojanāḥ kecitkecinmārutabhojanāḥ| gārhasthye ca sthitāḥ kecitkeciccaivāgnihotriṇaḥ||
कुछ शैवाल खाते थे, कुछ केवल वायु का भक्षण करते थे; कुछ गृहस्थाश्रम में स्थित थे, कुछ अग्निहोत्री थे।
श्लोक 55 (skanda.5.209.55)
एवंविधान् द्विजान् दृष्ट्वा जानुभ्यामवनिं गतः। प्रणम्य शिरसा राजन्राजा वचनमब्रवीत्॥
evaṁvidhān dvijān dṛṣṭvā jānubhyāmavaniṁ gataḥ| praṇamya śirasā rājanrājā vacanamabravīt||
ऐसे द्विजों को देखकर वह घुटनों के बल पृथ्वी पर बैठ गया; हे राजन्! सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए राजा ने यह वचन कहा—
श्लोक 56 (skanda.5.209.56)
चित्रसेन उवाच। कस्मिन्देशे च तत्तीर्थं सत्यं कथयत द्विजाः। येनाभिवाञ्छिता सिद्धिः सफला मे भविष्यति॥
citrasena uvāca| kasmindeśe ca tattīrthaṁ satyaṁ kathayata dvijāḥ| yenābhivāñchitā siddhiḥ saphalā me bhaviṣyati||
चित्रसेन ने कहा—"हे द्विजो! सत्य-सत्य बताइए वह तीर्थ किस स्थान में है, जिससे मेरी अभीष्ट सिद्धि सफल हो सके।"
श्लोक 57 (skanda.5.209.57)
ऋषय ऊचुः। धन्वन्तरशतं गच्छ भृगुतुङ्गस्य मूर्धनि। कुण्डं द्रक्ष्यसि तत्पूर्णं विस्तीर्णं पयसा शिवम्॥
ṛṣaya ūcuḥ| dhanvantaraśataṁ gaccha bhṛgutuṅgasya mūrdhani| kuṇḍaṁ drakṣyasi tatpūrṇaṁ vistīrṇaṁ payasā śivam||
ऋषियों ने कहा—"सौ धनुष दूर भृगुतुंग के शिखर पर जाओ; वहाँ तुम एक कुण्ड देखोगे, जल से पूर्ण, विस्तृत और शिवकारी।"
श्लोक 58 (skanda.5.209.58)
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा गतः कुण्डस्य सन्निधौ। दृष्ट्वा चैव तु तत्तीर्थं भ्रान्तिर्जाता नृपस्य वै॥
teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā gataḥ kuṇḍasya sannidhau| dṛṣṭvā caiva tu tattīrthaṁ bhrāntirjātā nṛpasya vai||
उनके वचन सुनकर वह उस कुण्ड के समीप गया; उस तीर्थ को देखकर राजा के मन में संशय उत्पन्न हुआ।
श्लोक 59 (skanda.5.209.59)
ततो विस्मयमापन्नश्चिन्तयन्वै मुहुर्मुहुः। आकाशस्थं ददर्शासौ सामिषं कुररं नृपः॥
tato vismayamāpannaścintayanvai muhurmuhuḥ| ākāśasthaṁ dadarśāsau sāmiṣaṁ kuraraṁ nṛpaḥ||
तब आश्चर्यचकित होकर बार-बार विचार करते हुए राजा ने आकाश में मांस लिए हुए एक कुरर पक्षी को देखा,
श्लोक 60 (skanda.5.209.60)
भ्रममाणं गृहीताहिं वध्यमानं निरामिषैः। परस्परं च युयुधुः सर्वेऽप्यामिषकाङ्क्षया॥
bhramamāṇaṁ gṛhītāhiṁ vadhyamānaṁ nirāmiṣaiḥ| parasparaṁ ca yuyudhuḥ sarve'pyāmiṣakāṅkṣayā||
जो सर्प को पकड़े हुए भ्रमण कर रहा था और निरामिष पक्षियों द्वारा मारा जा रहा था; वे सभी मांस की कामना से परस्पर लड़ रहे थे।
श्लोक 61 (skanda.5.209.61)
हतश्चञ्चुप्रहारेण स ततः पतितोऽंभसि। शूलेन शूलिना यत्र भूभागो भेदितः पुरा॥
hataścañcuprahāreṇa sa tataḥ patito'ṁbhasi| śūlena śūlinā yatra bhūbhāgo bheditaḥ purā||
चोंच के प्रहार से आहत होकर वह वहीं जल में गिर पड़ा—उसी स्थान पर, जहाँ पूर्वकाल में शूलिन (शिव) ने त्रिशूल से भूभाग को विदीर्ण किया था।
श्लोक 62 (skanda.5.209.62)
तत्तीर्थस्य प्रभावेण स सद्यः पुरुषोऽभवत्। विमानस्थं ददर्शासौ पुमांसं दिव्यरूपिणम्॥
tattīrthasya prabhāveṇa sa sadyaḥ puruṣo'bhavat| vimānasthaṁ dadarśāsau pumāṁsaṁ divyarūpiṇam||
उस तीर्थ के प्रभाव से वह तत्काल मनुष्य बन गया; तब राजा ने विमान में बैठे उस दिव्यरूपधारी पुरुष को देखा,
श्लोक 63 (skanda.5.209.63)
गन्धर्वाप्सरसो यक्षास्तं यान्तं तुष्टुवुर्दिवि। अप्सरोगीयमाने तु गते सूर्यस्य मूर्धनि। चित्रसेनस्ततस्तस्मिन्नाश्चर्यं परमं गतः॥
gandharvāpsaraso yakṣāstaṁ yāntaṁ tuṣṭuvurdivi| apsarogīyamāne tu gate sūryasya mūrdhani| citrasenastatastasminnāścaryaṁ paramaṁ gataḥ||
जिसे जाते हुए गन्धर्व, अप्सराएँ और यक्ष आकाश में स्तुति कर रहे थे; अप्सराओं के गीत गाते हुए वह सूर्य के शिखर तक पहुँच गया, तब चित्रसेन को उस विषय में परम आश्चर्य हुआ।
श्लोक 64 (skanda.5.209.64)
ऋषिणा कथितं यद्वत्तद्वत्तीर्थं न संशयः। हृष्टरोमाभवद्दृष्ट्वा प्रभावं तीर्थसम्भवम्॥
ṛṣiṇā kathitaṁ yadvattadvattīrthaṁ na saṁśayaḥ| hṛṣṭaromābhavaddṛṣṭvā prabhāvaṁ tīrthasambhavam||
"जैसा ऋषि ने कहा था, ठीक वैसा ही यह तीर्थ है, निःसंदेह"—उस तीर्थ से उत्पन्न प्रभाव को देखकर उसके रोंगटे खड़े हो गए।
श्लोक 65 (skanda.5.209.65)
ममाद्य दिवसो धन्यो यस्मादत्र समागतः। अस्थीनि भूमौ निक्षिप्य स्नानं कृत्वा यथाविधि॥
mamādya divaso dhanyo yasmādatra samāgataḥ| asthīni bhūmau nikṣipya snānaṁ kṛtvā yathāvidhi||
"आज मेरा दिन धन्य है, क्योंकि मैं यहाँ आया।" अस्थियों को भूमि पर रखकर, विधिपूर्वक स्नान करके,
श्लोक 66 (skanda.5.209.66)
तिलमिश्रेण तोयेनातर्पयत्पितृदेवताः। गृह्यास्थीनि ततो राजा चिक्षेपान्तर्जले तदा॥
tilamiśreṇa toyenātarpayatpitṛdevatāḥ| gṛhyāsthīni tato rājā cikṣepāntarjale tadā||
उसने तिलमिश्रित जल से पितरों और देवताओं को तर्पण दिया; फिर राजा ने अस्थियाँ लेकर उन्हें जल के भीतर डाल दिया।
श्लोक 67 (skanda.5.209.67)
क्षणमेकं ततो वीक्ष्य राजोर्द्ध्ववदनः स्थितः। तान् ददर्श पुनः सर्वान् दिव्यरूपधराञ्छुभान्॥
kṣaṇamekaṁ tato vīkṣya rājorddhvavadanaḥ sthitaḥ| tān dadarśa punaḥ sarvān divyarūpadharāñchubhān||
तब क्षणभर ऊपर देखते हुए राजा ने पुनः उन सबको देखा, जो दिव्य रूप धारण किए हुए, शुभ,
श्लोक 68 (skanda.5.209.68)
दिव्यवस्त्रैश्च संवीतान् दिव्याभरणभूषितान्। विमानैर्विविधैर्दिव्यैरप्सरोगणसेवितैः॥
divyavastraiśca saṁvītān divyābharaṇabhūṣitān| vimānairvividhairdivyairapsarogaṇasevitaiḥ||
दिव्य वस्त्रों से आच्छादित, दिव्य आभूषणों से विभूषित, अप्सराओं के समूह से सेवित नाना दिव्य विमानों में विराजमान थे।
श्लोक 69 (skanda.5.209.69)
पृथग्भूतांश्च तान् सर्वान् विमानेषु व्यवस्थितान्। उत्पत्तिवत्समालोक्य राजा संहर्षी सोऽभवत्॥
pṛthagbhūtāṁśca tān sarvān vimāneṣu vyavasthitān| utpattivatsamālokya rājā saṁharṣī so'bhavat||
उन सबको अलग-अलग विमानों में स्थित, मानो नवजात के समान, देखकर राजा अत्यन्त हर्षित हो उठा।
श्लोक 70 (skanda.5.209.70)
ऋषिर्विमानमारूढश्चित्रसेनमथाब्रवीत्। भोभोः साधो महाराज चित्रसेन महीपते॥
ṛṣirvimānamārūḍhaścitrasenamathābravīt| bhobhoḥ sādho mahārāja citrasena mahīpate||
विमान पर आरूढ़ उस ऋषि ने तब चित्रसेन से कहा—"साधु, साधु! हे महाराज चित्रसेन, हे महीपते!
श्लोक 71 (skanda.5.209.71)
त्वत्प्रसादान्नृपश्रेष्ठ गतिर्दिव्या ममेदृषी। जातेयं यत्त्वया कार्यं कृतं परमशोभनम्॥
tvatprasādānnṛpaśreṣṭha gatirdivyā mamedṛṣī| jāteyaṁ yattvayā kāryaṁ kṛtaṁ paramaśobhanam||
हे नृपश्रेष्ठ! तुम्हारी कृपा से मुझे ऐसी दिव्य गति प्राप्त हुई। तुमने जो यह अत्यन्त शुभ कार्य किया है,
श्लोक 72 (skanda.5.209.72)
स्वसुतोऽपि न शक्नोति पितॄणां कर्तुमीदृशम्। मदीयवचनात्तात निष्पापस्त्वं भविष्यसि॥
svasuto'pi na śaknoti pitṝṇāṁ kartumīdṛśam| madīyavacanāttāta niṣpāpastvaṁ bhaviṣyasi||
वैसा तो अपना पुत्र भी पितरों के लिए नहीं कर सकता। हे तात! मेरे वचन से तुम निष्पाप हो जाओगे,
श्लोक 73 (skanda.5.209.73)
फलं प्राप्स्यसि राजेन्द्र कामिकं मनसेप्सितम्। आशीर्वादांस्ततो दत्त्वा चित्रसेनाय धीमते। स्वर्गं जगाम ससुतस्ततो दीर्घतपा मुनिः॥
phalaṁ prāpsyasi rājendra kāmikaṁ manasepsitam| āśīrvādāṁstato dattvā citrasenāya dhīmate| svargaṁ jagāma sasutastato dīrghatapā muniḥ||
और हे राजेन्द्र! तुम अपने मन-वांछित फल प्राप्त करोगे।" इस प्रकार बुद्धिमान चित्रसेन को आशीर्वाद देकर, तत्पश्चात् दीर्घतपा मुनि अपने पुत्रों सहित स्वर्ग को चला गया।