अवन्ती खण्ड · अध्याय 212
व्याध का स्वर्गगमन
श्लोक 1 (skanda.5.212.1)
ईश्वर उवाच। भानुमती द्विजान्भोज्य बुभुजे भुक्तशेषतः। भुक्त्वा सुसुखमास्थाय तदन्नं परिणाम्य च॥
īśvara uvāca| bhānumatī dvijānbhojya bubhuje bhuktaśeṣataḥ| bhuktvā susukhamāsthāya tadannaṁ pariṇāmya ca||
ईश्वर ने कहा—भानुमती ने ब्राह्मणों को भोजन कराकर, भोजन-शेष से स्वयं भोजन किया। सुखपूर्वक बैठकर उस अन्न को पचाकर,
श्लोक 2 (skanda.5.212.2)
त्रयोदश्यां ततो गत्वा मदनाख्यतिथौ तदा। मार्कण्डस्य ह्रदे स्नात्वानर्च्य देवं गुहाशयम्॥
trayodaśyāṁ tato gatvā madanākhyatithau tadā| mārkaṇḍasya hrade snātvānarcya devaṁ guhāśayam||
फिर त्रयोदशी को, मदन नामक तिथि पर, मार्कण्ड के ह्रद में स्नान करके, गुफा में विराजमान देव की अर्चना करके,
श्लोक 3 (skanda.5.212.3)
कृतोपवासनियमा स्नापयित्वा महेश्वरम्। पञ्चामृतसुगन्धेन धूपदीपनिवेदनैः॥
kṛtopavāsaniyamā snāpayitvā maheśvaram| pañcāmṛtasugandhena dhūpadīpanivedanaiḥ||
उपवास-नियम का पालन करके, पंचामृत और सुगन्धित द्रव्यों से महेश्वर को स्नान कराकर, धूप-दीप-नैवेद्य से,
श्लोक 4 (skanda.5.212.4)
आर्चयद्विविधैः पुष्पैर्नैवेद्यैश्च सुशोभनैः। क्षपाजागरणं कृत्वा श्रुत्वा पौराणिकीं कथाम्॥
ārcayadvividhaiḥ puṣpairnaivedyaiśca suśobhanaiḥ| kṣapājāgaraṇaṁ kṛtvā śrutvā paurāṇikīṁ kathām||
उसने विविध पुष्पों और सुशोभित नैवेद्यों से पूजा की। रात्रि-जागरण करके, पौराणिक कथा सुनकर,
श्लोक 5 (skanda.5.212.5)
नृत्यगीतैस्तथा स्तोत्रैर्दध्यौ देवं महेश्वरम्। अन्नं विस्तारितं सर्वं देवस्याग्रे यथाविधि॥
nṛtyagītaistathā stotrairdadhyau devaṁ maheśvaram| annaṁ vistāritaṁ sarvaṁ devasyāgre yathāvidhi||
नृत्य-गीत तथा स्तोत्रों से उसने महेश्वर देव का ध्यान किया। देव के सम्मुख विधिपूर्वक सम्पूर्ण अन्न फैलाया गया,
श्लोक 6 (skanda.5.212.6)
चातुर्वर्ण्यसुताः सर्वे भोजिताः सपरिच्छदाः। चतुर्दश्यां दिनं यावत्सम्पूज्य वृषभध्वजम्॥
cāturvarṇyasutāḥ sarve bhojitāḥ saparicchadāḥ| caturdaśyāṁ dinaṁ yāvatsampūjya vṛṣabhadhvajam||
और चारों वर्णों की सन्तानें अपने परिवार सहित भोजन करवाई गईं। चतुर्दशी को दिनभर वृषभध्वज की पूजा करके,
श्लोक 7 (skanda.5.212.7)
शङ्खवादित्रभेरीभिः पटहध्वनिनादितम्। क्षपाजागरणं कृत्वा प्रभूतजनसंकुलम्॥
śaṅkhavāditrabherībhiḥ paṭahadhvanināditam| kṣapājāgaraṇaṁ kṛtvā prabhūtajanasaṁkulam||
शंख, वाद्य, भेरी तथा पटह की ध्वनि से गुंजायमान, रात्रि-जागरण करके, अत्यधिक जनसमूह से भरी हुई,
श्लोक 8 (skanda.5.212.8)
नृत्यगीतैस्तथा स्तोत्रैः प्रेरिता सा निशा तदा। प्रभाते भोजिता विप्राः पायसैर्मधुसर्पिषा॥
nṛtyagītaistathā stotraiḥ preritā sā niśā tadā| prabhāte bhojitā viprāḥ pāyasairmadhusarpiṣā||
नृत्य-गीत तथा स्तोत्रों से प्रेरित वह रात्रि व्यतीत हुई। प्रातःकाल विप्रों को खीर, मधु तथा घृत से भोजन कराया गया।
श्लोक 9 (skanda.5.212.9)
दत्त्वा दानानि विप्रेभ्यः शक्त्या विप्रानुसारतः। अर्चयित्वा महापुष्पैः सुगन्धैर्मदनेन च॥
dattvā dānāni viprebhyaḥ śaktyā viprānusārataḥ| arcayitvā mahāpuṣpaiḥ sugandhairmadanena ca||
ब्राह्मणों को उनकी योग्यता के अनुसार शक्तिपूर्वक दान देकर, बड़े-बड़े सुगन्धित पुष्पों और मदन-पुष्प से पूजा करके,
श्लोक 10 (skanda.5.212.10)
विचित्रैः सूक्ष्मवस्त्रैश्च देवः सम्पूज्य वेष्टितः। स्रग्दामलम्बमानैश्च बहुदीपसमुज्ज्वलैः॥
vicitraiḥ sūkṣmavastraiśca devaḥ sampūjya veṣṭitaḥ| sragdāmalambamānaiśca bahudīpasamujjvalaiḥ||
विचित्र सूक्ष्म वस्त्रों से देव की पूजा करके उन्हें वेष्टित किया गया, लटकती हुई मालाओं तथा अनेक दीपकों से वे उज्ज्वल हो उठे,
श्लोक 11 (skanda.5.212.11)
पक्वान्नैर्विविधैर्भक्ष्यैः सुवृत्तैर्मोदकादिभिः। ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे वेदाध्ययनतत्पराः॥
pakvānnairvividhairbhakṣyaiḥ suvṛttairmodakādibhiḥ| tataste brāhmaṇāḥ sarve vedādhyayanatatparāḥ||
पक्वान्न, विविध भक्ष्य पदार्थों, गोल-गोल मोदक आदि से [पूजा हुई]। तब वेदाध्ययन में तत्पर वे सभी ब्राह्मण,
श्लोक 12 (skanda.5.212.12)
तत्पर्व कीर्तयांश्चक्रुः पद्मकं नाम नामतः। आदित्यस्य दिनं त्वद्य तिथिः पञ्चदशी तथा॥
tatparva kīrtayāṁścakruḥ padmakaṁ nāma nāmataḥ| ādityasya dinaṁ tvadya tithiḥ pañcadaśī tathā||
उस पर्व को पद्मक नाम से कीर्तन करने लगे—"आज आदित्य का दिन है, तथा तिथि पञ्चदशी है,
श्लोक 13 (skanda.5.212.13)
त्वाष्ट्रमेव च नक्षत्रं संक्रान्तिर्विषुवन्तथा। व्यतीपातस्तथा योगः करणविष्टिरेव च॥
tvāṣṭrameva ca nakṣatraṁ saṁkrāntirviṣuvantathā| vyatīpātastathā yogaḥ karaṇaviṣṭireva ca||
और त्वाष्ट्र नक्षत्र (चित्रा) है, संक्रान्ति है, विषुव भी है, व्यतीपात है, योग है, तथा विष्टि करण भी है—
श्लोक 14 (skanda.5.212.14)
पद्मकं नाम पर्वैतदयनादिचतुर्गुणम्। अत्र दत्तं हुतं जप्तं सर्वं भवति चाक्षयम्॥
padmakaṁ nāma parvaitadayanādicaturguṇam| atra dattaṁ hutaṁ japtaṁ sarvaṁ bhavati cākṣayam||
यह पद्मक नामक पर्व अयन आदि से चौगुना [फलदायी] है। यहाँ दिया गया, हवन किया गया, तथा जप किया गया सब कुछ अक्षय हो जाता है।"
श्लोक 15 (skanda.5.212.15)
ते द्विजा भानुमत्याथ शूलभेदं गताः सह। ददृशुः शबरं कुण्डे भार्यया सह संस्थितम्॥
te dvijā bhānumatyātha śūlabhedaṁ gatāḥ saha| dadṛśuḥ śabaraṁ kuṇḍe bhāryayā saha saṁsthitam||
वे ब्राह्मण तब भानुमती के साथ शूलभेद गए; उन्होंने शबर को अपनी पत्नी सहित कुण्ड में स्थित देखा,
श्लोक 16 (skanda.5.212.16)
ऐशानीं स दिशं गत्वा पर्वते भृगुमूर्धनि। पतितुं च समारूढो भार्यया सह पार्थिव॥
aiśānīṁ sa diśaṁ gatvā parvate bhṛgumūrdhani| patituṁ ca samārūḍho bhāryayā saha pārthiva||
जो ईशान दिशा को जाकर भृगु-शिखर पर्वत पर, हे राजन्! अपनी पत्नी सहित गिरने के लिए चढ़ गया था।
श्लोक 17 (skanda.5.212.17)
भानुमत्युवाच। तिष्ठ तिष्ठ महासत्त्व शृणुष्व वचनं मम। किमर्थं त्यजसि प्राणानद्यापि च युवा भवान्॥
bhānumatyuvāca| tiṣṭha tiṣṭha mahāsattva śṛṇuṣva vacanaṁ mama| kimarthaṁ tyajasi prāṇānadyāpi ca yuvā bhavān||
भानुमती ने कहा—"ठहरो, ठहरो, हे महासत्त्व! मेरा वचन सुनो। आप अभी युवा होते हुए भी क्यों अपने प्राणों का त्याग कर रहे हैं?
श्लोक 18 (skanda.5.212.18)
कः सन्तापः क उद्वेगः किं दुःखं व्याधिरेव च। शिशुः संदृश्यसेऽद्यापि कारणं कथ्यतामिदम्॥
kaḥ santāpaḥ ka udvegaḥ kiṁ duḥkhaṁ vyādhireva ca| śiśuḥ saṁdṛśyase'dyāpi kāraṇaṁ kathyatāmidam||
यह कैसा सन्ताप है, कैसा उद्वेग है, कौन-सा दुःख अथवा व्याधि है? आप अभी भी शिशु जैसे दिखते हैं; इसका कारण बताइए।"
श्लोक 19 (skanda.5.212.19)
शबर उवाच। कारणं नास्ति मे किंचिन्न दुःखं किंचिदेव तु। संसारभयभीतोऽहं नान्या बुद्धिः प्रवर्तते॥
śabara uvāca| kāraṇaṁ nāsti me kiṁcinna duḥkhaṁ kiṁcideva tu| saṁsārabhayabhīto'haṁ nānyā buddhiḥ pravartate||
शबर ने कहा—"मेरा कोई विशेष कारण नहीं है, न ही कोई विशेष दुःख है; मैं संसार के भय से भयभीत हूँ, इसके अतिरिक्त मेरी कोई और बुद्धि नहीं है।
श्लोक 20 (skanda.5.212.20)
दुःखेन लभ्यते यस्मान्मानुष्यं जन्म भाग्यतः। मानुष्यं जन्म चासाद्य या न धर्मं समाचरेत्॥
duḥkhena labhyate yasmānmānuṣyaṁ janma bhāgyataḥ| mānuṣyaṁ janma cāsādya yā na dharmaṁ samācaret||
चूँकि मानव-जन्म बड़े कष्ट से, सौभाग्य से प्राप्त होता है, और मानव-जन्म पाकर भी जो धर्म का आचरण नहीं करता,
श्लोक 21 (skanda.5.212.21)
स गच्छेन्निरयं घोरमात्मदोषेण सुन्दरि। तस्मात्पतितुमिच्छामि तीर्थेऽस्मिन्पापनाशने॥
sa gacchennirayaṁ ghoramātmadoṣeṇa sundari| tasmātpatitumicchāmi tīrthe'sminpāpanāśane||
हे सुन्दरि! वह अपने ही दोष से घोर नरक को जाता है। इसलिए मैं इस पापनाशक तीर्थ में गिरना चाहता हूँ।"
श्लोक 22 (skanda.5.212.22)
राज्ञ्युवाच। अद्यापि वर्तते कालो धर्मस्योपार्जने तव। कृतापकृतकर्मा वै व्रतदानैर्विशुध्यति॥
rājñyuvāca| adyāpi vartate kālo dharmasyopārjane tava| kṛtāpakṛtakarmā vai vratadānairviśudhyati||
राज्ञी ने कहा—"अभी भी तुम्हारे लिए धर्म अर्जित करने का समय है; किए और न किए दोनों प्रकार के कर्मों से युक्त व्यक्ति व्रत और दान से शुद्ध हो जाता है।
श्लोक 23 (skanda.5.212.23)
अहं दास्यामि धान्यं वा वासांसि द्रविणं बहु। नित्यमाचर धर्मं त्वं ध्यायन्नित्यं महेश्वरम्॥
ahaṁ dāsyāmi dhānyaṁ vā vāsāṁsi draviṇaṁ bahu| nityamācara dharmaṁ tvaṁ dhyāyannityaṁ maheśvaram||
मैं तुम्हें धान्य, वस्त्र, अथवा बहुत-सा धन दूँगी; तुम नित्य महेश्वर का ध्यान करते हुए सदा धर्म का आचरण करो।"
श्लोक 24 (skanda.5.212.24)
शबर उवाच। नैवाहं कामये वित्तं न धान्यं वस्त्रमेव च। यो यस्यैवान्नमश्नाति स तस्याश्नाति किल्बिषम्॥
śabara uvāca| naivāhaṁ kāmaye vittaṁ na dhānyaṁ vastrameva ca| yo yasyaivānnamaśnāti sa tasyāśnāti kilbiṣam||
शबर ने कहा—"मुझे न धन चाहिए, न धान्य, न वस्त्र; जो जिसका अन्न खाता है, वह उसका पाप भी खाता है।"
श्लोक 25 (skanda.5.212.25)
राज्ञ्युवाच। कन्दमूलफलाहारो भ्रमित्वा भैक्ष्यमुत्तमम्। अवगाह्य सुतीर्थानि सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
rājñyuvāca| kandamūlaphalāhāro bhramitvā bhaikṣyamuttamam| avagāhya sutīrthāni sarvapāpaiḥ pramucyate||
राज्ञी ने कहा—"कन्द-मूल-फलों का आहार करते हुए, भ्रमण करके उत्तम भिक्षा माँगते हुए, तथा सुतीर्थों में अवगाहन करते हुए मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 26 (skanda.5.212.26)
ततो विमुक्तपापस्तु यत्किंचित्कुरुते शुचिः। कर्मणा तेन पूतस्त्वं सद्गतिं प्राप्स्यसि ध्रुवम्॥
tato vimuktapāpastu yatkiṁcitkurute śuciḥ| karmaṇā tena pūtastvaṁ sadgatiṁ prāpsyasi dhruvam||
तब पापमुक्त होकर जो कुछ भी शुद्ध होकर करता है, उस कर्म से पवित्र होकर तुम निश्चय ही सद्गति प्राप्त करोगे।"
श्लोक 27 (skanda.5.212.27)
शबर उवाच। अन्नमद्य मया त्यक्तं प्राणेभ्योऽपि महत्तरम्। सत्यं न लोपयेद्देवि निश्चितात्र मतिर्मम॥
śabara uvāca| annamadya mayā tyaktaṁ prāṇebhyo'pi mahattaram| satyaṁ na lopayeddevi niścitātra matirmama||
शबर ने कहा—"मैंने आज अन्न का त्याग कर दिया है, जो मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है; हे देवि! मैं सत्य को भंग नहीं करूँगा, मेरा मन इस पर निश्चित है।
श्लोक 28 (skanda.5.212.28)
प्रसादः क्रियतां देवि क्षमस्वाद्य जनैः सह। अर्धोत्तरीयवस्त्रेण संयम्यात्मानमुद्यतः॥
prasādaḥ kriyatāṁ devi kṣamasvādya janaiḥ saha| ardhottarīyavastreṇa saṁyamyātmānamudyataḥ||
हे देवि! मुझ पर प्रसन्न होइए, आज इन लोगों सहित मुझे क्षमा कीजिए।" आधे उत्तरीय वस्त्र से अपने आपको बाँधकर, तैयार होकर,
श्लोक 29 (skanda.5.212.29)
भार्यया सहितो व्याधो हरिं ध्यात्वा पपात ह। नगार्धात्पतितो यावद्गतजीवो नराधिप॥
bhāryayā sahito vyādho hariṁ dhyātvā papāta ha| nagārdhātpatito yāvadgatajīvo narādhipa||
पत्नी सहित वह व्याध हरि का ध्यान करते हुए गिर पड़ा। हे नराधिप! पर्वत के मध्य भाग से गिरते ही उसके प्राण निकल गए।
श्लोक 30 (skanda.5.212.30)
चूर्णीभूतौ हि तौ दृष्ट्वा कुण्डस्योपरि भूमिप। त्रिमुहूर्ते गते काले शबरो भार्यया सह॥
cūrṇībhūtau hi tau dṛṣṭvā kuṇḍasyopari bhūmipa| trimuhūrte gate kāle śabaro bhāryayā saha||
हे भूमिप! उन दोनों को कुण्ड के ऊपर चूर्ण होते देखकर—तीन मुहूर्त काल बीत जाने पर शबर अपनी पत्नी सहित,
श्लोक 31 (skanda.5.212.31)
दिव्यं विमानमारूढो गतश्चानुत्तमां गतिम्॥
divyaṁ vimānamārūḍho gataścānuttamāṁ gatim||
दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर परम उत्तम गति को प्राप्त हुआ।