अवन्ती खण्ड · अध्याय 214
पुष्करिणी में आदित्य-तीर्थ का माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.5.214.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततः पुष्करिणीं गच्छेत्सर्वपापप्रणाशिनीम्। श्रुते यस्याः प्रभावे तु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tataḥ puṣkariṇīṁ gacchetsarvapāpapraṇāśinīm| śrute yasyāḥ prabhāve tu sarvapāpaiḥ pramucyate||
श्रीमार्कण्डेय ने कहा—इसके पश्चात् सभी पापों का नाश करने वाली पुष्करिणी को जाना चाहिए; जिसका प्रभाव सुनने मात्र से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 2 (skanda.5.214.2)
रेवाया उत्तरे कूले तीर्थं परमशोभनम्। यत्रास्ते सर्वदा देवो वेदमूर्तिर्दिवाकरः॥
revāyā uttare kūle tīrthaṁ paramaśobhanam| yatrāste sarvadā devo vedamūrtirdivākaraḥ||
रेवा के उत्तर तट पर एक परम शोभन तीर्थ है, जहाँ वेदमूर्ति देव दिवाकर (सूर्य) सदा विराजमान रहते हैं।
श्लोक 3 (skanda.5.214.3)
कुरुक्षेत्रं यथा पुण्यं सार्वकामिकमुत्तमम्। इदं तीर्थं तथा पुण्यं सर्वकामफलप्रदम्॥
kurukṣetraṁ yathā puṇyaṁ sārvakāmikamuttamam| idaṁ tīrthaṁ tathā puṇyaṁ sarvakāmaphalapradam||
जैसे कुरुक्षेत्र सर्वकामनाओं को पूर्ण करने वाला, उत्तम और पुण्यदायी है, वैसे ही यह तीर्थ भी पुण्यदायी तथा सभी कामनाओं का फल देने वाला है।
श्लोक 4 (skanda.5.214.4)
कुरुक्षेत्रे यथा वृद्धिर्दानस्य जगतीपते। पुष्करिण्यां तथा दानं वर्धते नात्र संशयः॥
kurukṣetre yathā vṛddhirdānasya jagatīpate| puṣkariṇyāṁ tathā dānaṁ vardhate nātra saṁśayaḥ||
हे जगतीपते! जैसे कुरुक्षेत्र में दिए गए दान की वृद्धि होती है, वैसे ही पुष्करिणी में भी दान की वृद्धि होती है, इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 5 (skanda.5.214.5)
यवमेकं तु यो दद्यात्सौवर्णं मस्तके नृप। पुष्करिण्यां तथा स्थानं यथा स्थानं नरे स्मृतम्॥
yavamekaṁ tu yo dadyātsauvarṇaṁ mastake nṛpa| puṣkariṇyāṁ tathā sthānaṁ yathā sthānaṁ nare smṛtam||
हे नृप! जो कोई सिर पर स्वर्ण-मंडित एक यव भी अर्पित करता है, उसे पुष्करिणी में उतना ही स्थान (फल) प्राप्त होता है जितना अन्यत्र मनुष्य के लिए स्मृत है।
श्लोक 6 (skanda.5.214.6)
सूर्यग्रहे तु यः स्नात्वा दद्याद्दानं यथाविधि। हस्त्यश्वरथरत्नादि गृहं गाश्च युगंधरान्॥
sūryagrahe tu yaḥ snātvā dadyāddānaṁ yathāvidhi| hastyaśvaratharatnādi gṛhaṁ gāśca yugaṁdharān||
जो सूर्यग्रहण के समय स्नान करके विधिपूर्वक दान देता है—हाथी, घोड़े, रथ, रत्न आदि, घर, गायें, तथा बैलों की जोड़ी,
श्लोक 7 (skanda.5.214.7)
सुवर्णं रजतं वापि ब्राह्मणेभ्यो ददाति यः। त्रयोदश दिनं यावत्त्रयोदशगुणं भवेत्॥
suvarṇaṁ rajataṁ vāpi brāhmaṇebhyo dadāti yaḥ| trayodaśa dinaṁ yāvattrayodaśaguṇaṁ bhavet||
स्वर्ण अथवा चाँदी ब्राह्मणों को देता है, [उसका फल] तेरह दिनों तक तेरह गुना हो जाता है।
श्लोक 8 (skanda.5.214.8)
तिलमिश्रेण तोयेन तर्पयेत्पितृदेवताः। द्वादशाब्दे भवेत्प्रीतिस्तत्र तीर्थे महीपते॥
tilamiśreṇa toyena tarpayetpitṛdevatāḥ| dvādaśābde bhavetprītistatra tīrthe mahīpate||
तिलमिश्रित जल से पितृ-देवताओं को तर्पण दे; हे महीपते! उस तीर्थ में बारह वर्षों तक तृप्ति होती है।
श्लोक 9 (skanda.5.214.9)
यस्तत्र कुरुते श्राद्धं पायसैर्मधुसर्पिषा। श्राद्धदो लभते स्वर्गं पितॄणां दत्तमक्षयम्॥
yastatra kurute śrāddhaṁ pāyasairmadhusarpiṣā| śrāddhado labhate svargaṁ pitḥṇāṁ dattamakṣayam||
जो वहाँ खीर, मधु और घृत से श्राद्ध करता है, वह श्राद्धकर्ता स्वर्ग प्राप्त करता है; पितरों को दिया गया दान अक्षय हो जाता है।
श्लोक 10 (skanda.5.214.10)
अक्षतैर्बदरैर्बिल्वैरिङ्गुदैर्वा तिलैः सह। अक्षयं फलमाप्नोति तस्मिंस्तीर्थे न संशयः॥
akṣatairbadarairbilvairiṅgudairvā tilaiḥ saha| akṣayaṁ phalamāpnoti tasmiṁstīrthe na saṁśayaḥ||
अक्षत, बेर, बिल्व अथवा इंगुदी फल के साथ तिल अर्पित करने से उस तीर्थ में अक्षय फल प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 11 (skanda.5.214.11)
तत्र स्नात्वा तु यो देवं पूजयेच्च दिवाकरम्। आदित्यहृदयं जप्त्वा पुनरादित्यमर्चयेत्। स गच्छेत्परमं लोकं त्रिदशैरपि वन्दितम्॥
tatra snātvā tu yo devaṁ pūjayecca divākaram| ādityahṛdayaṁ japtvā punarādityamarcayet| sa gacchetparamaṁ lokaṁ tridaśairapi vanditam||
जो वहाँ स्नान करके देव दिवाकर की पूजा करता है, आदित्यहृदय का जप करके पुनः आदित्य की अर्चना करता है, वह त्रिदशों (देवों) द्वारा भी वन्दित परम लोक को प्राप्त करता है।
श्लोक 12 (skanda.5.214.12)
ऋचमेकां जपेद्यस्तु यजुर्वा साम एव च। स समग्रस्य वेदस्य फलमाप्नोति वै नृप॥
ṛcamekāṁ japedyastu yajurvā sāma eva ca| sa samagrasya vedasya phalamāpnoti vai nṛpa||
हे नृप! जो कोई वहाँ ऋग्वेद, यजुर्वेद अथवा सामवेद की एक भी ऋचा का जप करता है, वह सम्पूर्ण वेद का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 13 (skanda.5.214.13)
यस्त्र्यक्षरं जपेन्मन्त्रं ध्यायमानो दिवाकरम्। आदित्यहृदयं जप्त्वा मुच्यते सर्वपातकैः॥
yastryakṣaraṁ japenmantraṁ dhyāyamāno divākaram| ādityahṛdayaṁ japtvā mucyate sarvapātakaiḥ||
जो दिवाकर का ध्यान करते हुए त्र्यक्षर मन्त्र का जप करता है, आदित्यहृदय का जप करके वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 14 (skanda.5.214.14)
यस्तत्र विधिवत्प्राणांस्त्यजते नृपसत्तम। स गच्छेत्परमं स्थानं यत्र देवो दिवाकरः॥
yastatra vidhivatprāṇāṁstyajate nṛpasattama| sa gacchetparamaṁ sthānaṁ yatra devo divākaraḥ||
हे नृपसत्तम! जो वहाँ विधिपूर्वक प्राणों का त्याग करता है, वह उस परम स्थान को प्राप्त होता है जहाँ देव दिवाकर विराजमान हैं।