अवन्ती खण्ड · अध्याय 215
आदित्येश्वर तीर्थ का माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.5.215.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। भूयोऽप्यहं प्रवक्ष्यामि आदित्येश्वरमुत्तमम्। सर्वदुःखहरं पार्थ सर्वविघ्नविनाशनम्॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| bhūyo'pyahaṁ pravakṣyāmi ādityeśvaramuttamam| sarvaduḥkhaharaṁ pārtha sarvavighnavināśanam||
श्रीमार्कण्डेय ने कहा—हे पार्थ! मैं पुनः उत्तम आदित्येश्वर का वर्णन करूँगा, जो सभी दुःखों को हरने वाला तथा सभी विघ्नों का नाश करने वाला है।
श्लोक 2 (skanda.5.215.2)
आयुःश्रीवर्द्धनं नित्यं पुत्रदं स्वर्गदं शिवम्। यस्य तीर्थस्य चान्यानि तीर्थानि कुरुनन्दन॥
āyuḥśrīvarddhanaṁ nityaṁ putradaṁ svargadaṁ śivam| yasya tīrthasya cānyāni tīrthāni kurunandana||
जो नित्य आयु और श्री को बढ़ाने वाला, पुत्रदाता, स्वर्गदाता तथा शिवकारी है। हे कुरुनन्दन! जिस तीर्थ की [महिमा के आगे] अन्य तीर्थ—
श्लोक 3 (skanda.5.215.3)
नालभन्त श्रियं नाके मर्त्ये पातालगोचरे। कुरुक्षेत्रं गया गङ्गा नैमिषं पुष्करं तथा॥
nālabhanta śriyaṁ nāke martye pātālagocare| kurukṣetraṁ gayā gaṅgā naimiṣaṁ puṣkaraṁ tathā||
स्वर्ग में, मृत्युलोक में अथवा पाताल में श्री प्राप्त न कर सके—कुरुक्षेत्र, गया, गंगा, नैमिष तथा पुष्कर भी,
श्लोक 4 (skanda.5.215.4)
वाराणसी च केदारं प्रयागं रुद्रनन्दनम्। महाकालं सहस्राक्षं शुक्लतीर्थं नृपोत्तम॥
vārāṇasī ca kedāraṁ prayāgaṁ rudranandanam| mahākālaṁ sahasrākṣaṁ śuklatīrthaṁ nṛpottama||
तथा वाराणसी, केदार, प्रयाग, रुद्रनन्दन, महाकाल, सहस्राक्ष, और शुक्लतीर्थ, हे नृपोत्तम—
श्लोक 5 (skanda.5.215.5)
रवितीर्थस्य सर्वाणि कलां नार्हन्ति षोडशीम्। रवितीर्थे हि यद्वृत्तं तच्छृणुष्व नृपोत्तम॥
ravitīrthasya sarvāṇi kalāṁ nārhanti ṣoḍaśīm| ravitīrthe hi yadvṛttaṁ tacchṛṇuṣva nṛpottama||
ये सभी रवितीर्थ की सोलहवीं कला के भी योग्य नहीं हैं। हे नृपोत्तम! रवितीर्थ में जो कुछ घटित हुआ, वह सुनो।
श्लोक 6 (skanda.5.215.6)
स्नेहात्ते कथयिष्यामि वार्द्धकेनातिपीडितः। शृण्वन्तु ऋषयः सर्वे तपोनिष्ठा महौजसः॥
snehātte kathayiṣyāmi vārddhakenātipīḍitaḥ| śṛṇvantu ṛṣayaḥ sarve taponiṣṭhā mahaujasaḥ||
स्नेहवश मैं तुम्हें यह कहूँगा, यद्यपि वृद्धावस्था से अत्यन्त पीड़ित हूँ; तपोनिष्ठ महातेजस्वी सभी ऋषिगण सुनें।
श्लोक 7 (skanda.5.215.7)
श्रुतं मे रुद्रसांनिध्ये नन्दिस्कन्दगणैः सह। पार्वत्या पृष्टः शम्भुश्च रवितीर्थस्य यत्फलम्॥
śrutaṁ me rudrasāṁnidhye nandiskandagaṇaiḥ saha| pārvatyā pṛṣṭaḥ śambhuśca ravitīrthasya yatphalam||
मैंने रुद्र के सान्निध्य में, नन्दि-स्कन्द-गणों सहित, यह सुना था, जब पार्वती ने शम्भु से रवितीर्थ का फल पूछा था।
श्लोक 8 (skanda.5.215.8)
शम्भुना च यदाख्यातं गिरिजायाः ससम्भ्रमम्। तत्सर्वमेकचित्तेन रुद्रोद्गीतं श्रुतं मया॥
śambhunā ca yadākhyātaṁ girijāyāḥ sasambhramam| tatsarvamekacittena rudrodgītaṁ śrutaṁ mayā||
और शम्भु ने गिरिजा को जो सादर कहा, वह सब मैंने एकाग्रचित्त होकर रुद्र द्वारा उद्गीत सुना।
श्लोक 9 (skanda.5.215.9)
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणु यत्नेन पाण्डव। दुर्भिक्षोपहता विप्रा नर्मदां तु समाश्रिताः॥
tatte'haṁ sampravakṣyāmi śṛṇu yatnena pāṇḍava| durbhikṣopahatā viprā narmadāṁ tu samāśritāḥ||
वही मैं तुम्हें अब कहूँगा; हे पाण्डव! यत्नपूर्वक सुनो। दुर्भिक्ष से पीड़ित ब्राह्मण नर्मदा के आश्रय में गए थे—
श्लोक 10 (skanda.5.215.10)
उद्दालको वशिष्ठश्च माण्डव्यो गौतमस्तथा। याज्ञवल्क्योऽथ गर्गश्च शाण्डिल्यो गालवस्तथा॥
uddālako vaśiṣṭhaśca māṇḍavyo gautamastathā| yājñavalkyo'tha gargaśca śāṇḍilyo gālavastathā||
उद्दालक, वशिष्ठ, माण्डव्य, गौतम, याज्ञवल्क्य, गर्ग, शाण्डिल्य, गालव,
श्लोक 11 (skanda.5.215.11)
नाचिकेतो विभाण्डश्च वालखिल्यादयस्तथा। शातातपश्च शङ्खश्च जैमिनिर्गोभिलस्तथा॥
nāciketo vibhāṇḍaśca vālakhilyādayastathā| śātātapaśca śaṅkhaśca jaiminirgobhilastathā||
नाचिकेत, विभाण्ड, वालखिल्य आदि, शातातप, शंख, जैमिनि, गोभिल,
श्लोक 12 (skanda.5.215.12)
जैगीषव्यः शतानीकः सर्व एव समागताः। तीर्थयात्रा कृता तैस्तु नर्मदायाः समन्ततः॥
jaigīṣavyaḥ śatānīkaḥ sarva eva samāgatāḥ| tīrthayātrā kṛtā taistu narmadāyāḥ samantataḥ||
जैगीषव्य, शतानीक—ये सभी वहाँ एकत्र आए; उन्होंने नर्मदा के चारों ओर तीर्थयात्रा की।
श्लोक 13 (skanda.5.215.13)
आदित्येश्वरमायाताः प्रसङ्गादृषिपुंगवाः। वृक्षैः संछादितं शुभ्रं धवतिन्दुकपाटलैः॥
ādityeśvaramāyātāḥ prasaṅgādṛṣipuṁgavāḥ| vṛkṣaiḥ saṁchāditaṁ śubhraṁ dhavatindukapāṭalaiḥ||
वे श्रेष्ठ ऋषि प्रसंगवश आदित्येश्वर आ पहुँचे, जो धव, तिन्दुक और पाटल वृक्षों से आच्छादित, उज्ज्वल था,
श्लोक 14 (skanda.5.215.14)
जम्बीरैरर्जुनैः कुब्जैः शमीकेसरकिंशुकैः। तस्मिंस्तीर्थे महापुण्ये सुगन्धिकुसुमाकुले॥
jambīrairarjunaiḥ kubjaiḥ śamīkesarakiṁśukaiḥ| tasmiṁstīrthe mahāpuṇye sugandhikusumākule||
जम्बीर, अर्जुन, कुब्ज, शमी, केसर और किंशुक वृक्षों से, उस महापुण्य, सुगन्धित पुष्पों से भरे तीर्थ में,
श्लोक 15 (skanda.5.215.15)
पुन्नागनालिकेरैश्च खदिरैः कल्पपादपैः। अनेकश्वापदाकीर्णं मृगमार्जारसंकुलम्॥
punnāganālikeraiśca khadiraiḥ kalpapādapaiḥ| anekaśvāpadākīrṇaṁ mṛgamārjārasaṁkulam||
पुन्नाग, नारियल, खदिर तथा कल्पवृक्षों से युक्त, अनेक हिंसक पशुओं से भरा, मृगों और बिलावों से व्याप्त,
श्लोक 16 (skanda.5.215.16)
ऋक्षहस्तिसमाकीर्णं चित्रकैश्चोपशोभितम्। प्रविष्टा ऋषयः सर्वे वने पुष्पसमाकुले॥
ṛkṣahastisamākīrṇaṁ citrakaiścopaśobhitam| praviṣṭā ṛṣayaḥ sarve vane puṣpasamākule||
भालुओं और हाथियों से भरे, चीतों से सुशोभित उस पुष्पयुक्त वन में सभी ऋषि प्रविष्ट हुए।
श्लोक 17 (skanda.5.215.17)
वनान्ते च स्त्रियो दृष्ट्वा रक्ता रक्ताम्बरान्विताः। रक्तमाल्यानुशोभाढ्या रक्तचन्दनचर्चिताः॥
vanānte ca striyo dṛṣṭvā raktā raktāmbarānvitāḥ| raktamālyānuśobhāḍhyā raktacandanacarcitāḥ||
वन के छोर पर उन्होंने लाल रंग की, लाल वस्त्रधारी स्त्रियाँ देखीं, जो लाल मालाओं से सुशोभित तथा लाल चन्दन से लिप्त थीं,
श्लोक 18 (skanda.5.215.18)
रक्ताभरणसंयुक्ताः पाशहस्ता भयावहाः। तासां समीपगा दृष्टाः कृष्णजीमूतसन्निभाः॥
raktābharaṇasaṁyuktāḥ pāśahastā bhayāvahāḥ| tāsāṁ samīpagā dṛṣṭāḥ kṛṣṇajīmūtasannibhāḥ||
लाल आभूषणों से युक्त, हाथों में पाश लिए भयकारी थीं। उनके समीप काले मेघों के समान [प्राणी] दिखाई दिए,
श्लोक 19 (skanda.5.215.19)
महाकाया भीमवक्त्राः पाशहस्ता भयावहाः। अनावृष्ट्युपमा दृष्टा आतुराः पिङ्गलोचनाः॥
mahākāyā bhīmavaktrāḥ pāśahastā bhayāvahāḥ| anāvṛṣṭyupamā dṛṣṭā āturāḥ piṅgalocanāḥ||
विशालकाय, भीषण मुखवाले, हाथों में पाश लिए भयकारी, अनावृष्टि के समान दिखने वाले, पीड़ित-से, पीत नेत्रों वाले,
श्लोक 20 (skanda.5.215.20)
दीर्घजिह्वा करालास्या तीक्ष्णदंष्ट्रा दुरासदा। वृद्धा नारी कुरुश्रेष्ठ दृष्टान्या ऋषिपुंगवैः॥
dīrghajihvā karālāsyā tīkṣṇadaṁṣṭrā durāsadā| vṛddhā nārī kuruśreṣṭha dṛṣṭānyā ṛṣipuṁgavaiḥ||
लम्बी जीभ वाली, विकराल मुखवाली, तीक्ष्ण दाढ़ोंवाली, दुर्गम्य—हे कुरुश्रेष्ठ! उन ऋषिश्रेष्ठों ने एक अन्य वृद्धा स्त्री भी देखी।
श्लोक 21 (skanda.5.215.21)
ततः समीपगा वृद्धा तस्य वृन्दस्य भारत। स्वाध्यायनिरता विप्रा दृष्टास्तैः पापकर्मभिः॥
tataḥ samīpagā vṛddhā tasya vṛndasya bhārata| svādhyāyaniratā viprā dṛṣṭāstaiḥ pāpakarmabhiḥ||
तब हे भारत! वह वृद्धा उस स्वाध्याय में रत ब्राह्मणों के समूह के समीप आई, और उन पापकर्मियों द्वारा वे देखे गए।
श्लोक 22 (skanda.5.215.22)
ऊचुस्ते तु समूहेन ब्राह्मणांस्तपसि स्थितान्। अस्माकं स्वामिनः सर्वे तिष्ठन्ते तीर्थमध्यतः। ते प्रस्थाप्या महाभागाः सर्वथैव त्वरान्विताः॥
ūcuste tu samūhena brāhmaṇāṁstapasi sthitān| asmākaṁ svāminaḥ sarve tiṣṭhante tīrthamadhyataḥ| te prasthāpyā mahābhāgāḥ sarvathaiva tvarānvitāḥ||
वे समूहबद्ध होकर तपस्या में स्थित ब्राह्मणों से बोलीं—"हमारे सभी स्वामी तीर्थ के मध्य में स्थित हैं; उन महाभागों को अवश्य ही अत्यन्त शीघ्रता से भेजा जाना चाहिए।"
श्लोक 23 (skanda.5.215.23)
तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां सर्वे चैव त्वरान्विताः। जग्मुस्ते नर्मदाकक्षं दृष्ट्वा रेवां द्विजोत्तमाः॥
tacchrutvā vacanaṁ teṣāṁ sarve caiva tvarānvitāḥ| jagmuste narmadākakṣaṁ dṛṣṭvā revāṁ dvijottamāḥ||
उनका वचन सुनकर वे सभी द्विजोत्तम शीघ्रता से नर्मदा के तट पर गए और रेवा को देखा।
श्लोक 24 (skanda.5.215.24)
ततः केचित्स्तुवन्त्यन्ये जय देवि नमोऽस्तु ते॥
tataḥ kecitstuvantyanye jaya devi namo'stu te||
तब उनमें से कुछ ने स्तुति की—"हे देवि! जय हो, तुम्हें नमस्कार हो।
श्लोक 25 (skanda.5.215.25)
नमोऽस्तु ते सिद्धगणैर्निषेविते नमोऽस्तु ते सर्वपवित्रमङ्गले। नमोऽस्तु ते विप्रसहस्रसेविते नमोऽस्तु रुद्राङ्गसमुद्भवे वरे॥
namo'stu te siddhagaṇairniṣevite namo'stu te sarvapavitramaṅgale| namo'stu te viprasahasrasevite namo'stu rudrāṅgasamudbhave vare||
सिद्धगणों द्वारा सेवित तुम्हें नमस्कार हो, सर्वपवित्र-मंगलमयी तुम्हें नमस्कार हो; हजारों ब्राह्मणों द्वारा सेवित तुम्हें नमस्कार हो, रुद्र के अंग से उत्पन्न श्रेष्ठे! तुम्हें नमस्कार हो।
श्लोक 26 (skanda.5.215.26)
नमोऽस्तु ते सर्वपवित्रपावने नमोऽस्तु ते देवि वरप्रदे शिवे। नमामि ते शीतजले सुखप्रदे सरिद्वरे पापहरे विचित्रिते॥
namo'stu te sarvapavitrapāvane namo'stu te devi varaprade śive| namāmi te śītajale sukhaprade saridvare pāpahare vicitrite||
सम्पूर्ण पवित्रों को पवित्र करने वाली तुम्हें नमस्कार हो, हे देवि! वरदायिनी, शिवे! तुम्हें नमस्कार हो। शीतल जलवाली, सुखदायिनी, श्रेष्ठ नदी, पापहारिणी, विचित्र तुम्हें मैं नमन करता हूँ।
श्लोक 27 (skanda.5.215.27)
अनेकभूतौघसुसेविताङ्गे गन्धर्वयक्षोरगपाविताङ्गे। महागजौघैर्महिषैर्वराहैरापीयसे तोयमहोर्मिमाले॥
anekabhūtaughasusevitāṅge gandharvayakṣoragapāvitāṅge| mahāgajaughairmahiṣairvarāhairāpīyase toyamahormimāle||
अनेक भूतगणों द्वारा सुसेवित शरीर वाली, गन्धर्व-यक्ष-नागों द्वारा पवित्र अंगों वाली, महान गजसमूहों, भैंसों और वराहों द्वारा जिसकी महान तरंगमालाओं वाली जलराशि पी जाती है—
श्लोक 28 (skanda.5.215.28)
नमामि ते सर्ववरे सुखप्रदे विमोचयास्मानघपाशबद्धान्॥
namāmi te sarvavare sukhaprade vimocayāsmānaghapāśabaddhān||
हे सर्वश्रेष्ठे, सुखदायिनी! मैं तुम्हें नमन करता हूँ; पाप के पाश में बँधे हुए हमें मुक्त करो।
श्लोक 29 (skanda.5.215.29)
भ्रमन्ति तावन्नरकेषु मर्त्या यावत्तवाम्भो नहि संश्रयन्ति। स्पृष्टं करैश्चन्द्रमसो रवेश्चेत्तद्देवि दद्यात्परमं पदं तु॥
bhramanti tāvannarakeṣu martyā yāvattavāmbho nahi saṁśrayanti| spṛṣṭaṁ karaiścandramaso raveścettaddevi dadyātparamaṁ padaṁ tu||
मनुष्य तब तक नरकों में भटकते हैं जब तक वे तुम्हारे जल का आश्रय नहीं लेते; यदि चन्द्रमा या सूर्य की किरणों से स्पर्श भी हो जाए, हे देवि! तो वह परमपद प्रदान कर दे।
श्लोक 30 (skanda.5.215.30)
अनेकसंसारभयार्दितानां पापैरनेकैरभिवेष्टितानाम्। गतिस्त्वमम्भोजसमानवक्त्रे द्वन्द्वैरनेकैरभिसंवृतानाम्॥
anekasaṁsārabhayārditānāṁ pāpairanekairabhiveṣṭitānām| gatistvamambhojasamānavaktre dvandvairanekairabhisaṁvṛtānām||
संसार के अनेक भयों से पीड़ितों की, अनेक पापों से आवृत लोगों की, हे कमलमुखी! तुम ही गति हो, अनेक द्वन्द्वों से घिरे हुए लोगों की भी।
श्लोक 31 (skanda.5.215.31)
नद्यश्च पूता विमला भवन्ति त्वां देवि सम्प्राप्य न संशयोऽत्र। दुःखातुराणामभयं ददासि शिष्टैरनेकैरभिपूजितासि॥
nadyaśca pūtā vimalā bhavanti tvāṁ devi samprāpya na saṁśayo'tra| duḥkhāturāṇāmabhayaṁ dadāsi śiṣṭairanekairabhipūjitāsi||
तुम्हें प्राप्त करके नदियाँ भी पवित्र और निर्मल हो जाती हैं, इसमें कोई संशय नहीं। तुम दुःख से पीड़ितों को अभय देती हो, अनेक सज्जनों द्वारा तुम पूजित हो।
श्लोक 32 (skanda.5.215.32)
विण्मूत्रदेहाश्च निमग्नदेहा भ्रमन्ति तावन्नरकेषु मर्त्याः। महाबलध्वस्ततरङ्गभङ्गं जलं न यावत्तव संस्पृशन्ति॥
viṇmūtradehāśca nimagnadehā bhramanti tāvannarakeṣu martyāḥ| mahābaladhvastataraṅgabhaṅgaṁ jalaṁ na yāvattava saṁspṛśanti||
विष्ठा-मूत्र में डूबे हुए शरीर वाले मनुष्य तब तक नरकों में भटकते हैं, जब तक वे महाबल से टूटती तरंगों वाले तुम्हारे जल का स्पर्श नहीं करते।
श्लोक 33 (skanda.5.215.33)
म्लेच्छाः पुलिन्दास्त्वथ यातुधानाः पिबन्ति येऽंभस्तव देवि पुण्यम्। तेऽपि प्रमुच्यन्ति भयाच्च घोरात्किमत्र विप्रा भवपाशभीताः॥
mlecchāḥ pulindāstvatha yātudhānāḥ pibanti ye'ṁbhastava devi puṇyam| te'pi pramucyanti bhayācca ghorātkimatra viprā bhavapāśabhītāḥ||
म्लेच्छ, पुलिन्द, तथा राक्षस भी जो तुम्हारा पुण्य जल पीते हैं, हे देवि! वे भी घोर भय से मुक्त हो जाते हैं; फिर संसार-पाश से भयभीत ब्राह्मणों की तो बात ही क्या।
श्लोक 34 (skanda.5.215.34)
सरांसि नद्यः क्षयमभ्युपेता घोरे युगेऽस्मिन्कलिनावसृष्टे। त्वं भ्राजसे देवि जलौघपूर्णा दिवीव नक्षत्रपथे च गङ्गा॥
sarāṁsi nadyaḥ kṣayamabhyupetā ghore yuge'sminkalināvasṛṣṭe| tvaṁ bhrājase devi jalaughapūrṇā divīva nakṣatrapathe ca gaṅgā||
इस घोर कलियुग में सरोवर और नदियाँ क्षीण हो चली हैं, [किन्तु] हे देवि! तुम जलप्रवाह से परिपूर्ण होकर वैसे ही सुशोभित होती हो जैसे आकाश में नक्षत्र-पथ पर गंगा।
श्लोक 35 (skanda.5.215.35)
तव प्रासादाद्वरदे विशिष्टे कालं यथेमं परिपालयित्वा। यास्याम मोक्षं तव सुप्रसादाद्वयं यथा त्वं कुरु नः प्रसादम्॥
tava prāsādādvarade viśiṣṭe kālaṁ yathemaṁ paripālayitvā| yāsyāma mokṣaṁ tava suprasādādvayaṁ yathā tvaṁ kuru naḥ prasādam||
हे वरदायिनी, विशिष्टे! तुम्हारे प्रसाद से इस काल को व्यतीत करके तुम्हारी सुप्रसन्नता से हम मोक्ष को प्राप्त होंगे; जैसे तुम हो, वैसे ही हम पर प्रसाद करो।
श्लोक 36 (skanda.5.215.36)
त्वामाश्रिता ये शरणं गताश्च गतिस्त्वमम्बेव पितेव पुत्रान्। त्वत्पालिता यावदिमं सुघोरं कालं त्वनावृष्टिहतं क्षिपामः॥
tvāmāśritā ye śaraṇaṁ gatāśca gatistvamambeva piteva putrān| tvatpālitā yāvadimaṁ sughoraṁ kālaṁ tvanāvṛṣṭihataṁ kṣipāmaḥ||
जो तुम्हारा आश्रय लेकर शरण में आए हैं, तुम माता के समान, पिता के समान पुत्रों की, उनकी गति हो; तुम्हारे द्वारा पालित होकर हम इस अत्यन्त घोर, अनावृष्टि से पीड़ित काल को पार करेंगे।
श्लोक 37 (skanda.5.215.37)
एवं स्तुता तदा देवी नर्मदा सरितां वरा। प्रत्यक्षा सा परा मूर्तिर्ब्राह्मणानां युधिष्ठिर॥
evaṁ stutā tadā devī narmadā saritāṁ varā| pratyakṣā sā parā mūrtirbrāhmaṇānāṁ yudhiṣṭhira||
इस प्रकार स्तुति की गई नदियों में श्रेष्ठ देवी नर्मदा, हे युधिष्ठिर! ब्राह्मणों के समक्ष अपने साक्षात् परम रूप में प्रकट हुई।
श्लोक 38 (skanda.5.215.38)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। पठन्ति ये स्तोत्रमिदं नरेन्द्र शृण्वन्ति भक्त्या परया प्रशान्ताः। ते यान्ति रुद्रं वृषसंयुतेन यानेन दिव्याम्बरभूषिताङ्गाः॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| paṭhanti ye stotramidaṁ narendra śṛṇvanti bhaktyā parayā praśāntāḥ| te yānti rudraṁ vṛṣasaṁyutena yānena divyāmbarabhūṣitāṅgāḥ||
श्रीमार्कण्डेय ने कहा—हे नरेन्द्र! जो इस स्तोत्र को पढ़ते हैं, अथवा परम भक्ति से शान्तचित्त होकर इसे सुनते हैं, वे दिव्य वस्त्रों से अंगभूषित होकर वृषभयुक्त यान पर सवार होकर रुद्र के पास जाते हैं।
श्लोक 39 (skanda.5.215.39)
ये स्तोत्रमेतत्सततं जपन्ति स्नात्वा च तोयेन तु नर्मदायाः। तेभ्योऽन्तकाले सरिदुत्तमेयं गतिं विशुद्धामचिराद्ददाति॥
ye stotrametatsatataṁ japanti snātvā ca toyena tu narmadāyāḥ| tebhyo'ntakāle sariduttameyaṁ gatiṁ viśuddhāmacirāddadāti||
जो इस स्तोत्र का निरन्तर जप करते हैं और नर्मदा के जल में स्नान करते हैं, उन्हें अन्तकाल में यह श्रेष्ठ नदी शीघ्र ही विशुद्ध गति प्रदान करती है।
श्लोक 40 (skanda.5.215.40)
प्रातः समुत्थाय तथा शयानो यः कीर्तयेतानुदिनं स्तवेन्द्रम्। देहक्षयं स्वे सलिले ददाति समाश्रयं तस्य महानुभाव॥
prātaḥ samutthāya tathā śayāno yaḥ kīrtayetānudinaṁ stavendram| dehakṣayaṁ sve salile dadāti samāśrayaṁ tasya mahānubhāva||
प्रातःकाल उठकर तथा सोते समय जो इस श्रेष्ठ स्तोत्र का प्रतिदिन कीर्तन करता है, हे महानुभाव! उसे [नर्मदा] अपने ही जल में देह-क्षय तथा शरण प्रदान करती है।
श्लोक 41 (skanda.5.215.41)
पापैर्विमुक्ता दिवि मोदमानाः सम्भोगिनश्चैव तु नान्यथा च॥
pāpairvimuktā divi modamānāḥ sambhoginaścaiva tu nānyathā ca||
पापों से मुक्त होकर वे स्वर्ग में आनन्दित होते हुए, [दिव्य] भोग भोगते हैं, अन्यथा नहीं।
श्लोक 42 (skanda.5.215.42)
प्रसन्ना नर्मदा देवी स्तोत्रेणानेन भारत। जलेनाप्यायितान् विप्रान् दक्षिणापथवाहिनी॥
prasannā narmadā devī stotreṇānena bhārata| jalenāpyāyitān viprān dakṣiṇāpathavāhinī||
हे भारत! इस स्तोत्र से प्रसन्न होकर देवी नर्मदा, दक्षिणापथ में बहने वाली, उन ब्राह्मणों को अपने जल से तृप्त करती हुई [बोलीं]—
श्लोक 43 (skanda.5.215.43)
अमृतत्वं तु वो दद्मि योगिभिर्यन्न गम्यते। दुर्लभं यत्सुरैः सर्वैर्मत्प्रसादाल्लभिष्यथ॥
amṛtatvaṁ tu vo dadmi yogibhiryanna gamyate| durlabhaṁ yatsuraiḥ sarvairmatprasādāllabhiṣyatha||
"मैं तुम्हें अमरत्व देती हूँ, जिसे योगी भी नहीं प्राप्त करते; जो सभी देवों के लिए भी दुर्लभ है, वह तुम मेरी कृपा से प्राप्त करोगे।"
श्लोक 44 (skanda.5.215.44)
इति ते ब्राह्मणा राजंल्लब्धा वरमनुत्तमम्। गमिष्यन्तः प्रीतचित्ता ददृशुश्चित्रमद्भुतम्॥
iti te brāhmaṇā rājaṁllabdhā varamanuttamam| gamiṣyantaḥ prītacittā dadṛśuścitramadbhutam||
हे राजन्! इस प्रकार वे ब्राह्मण परम उत्तम वर प्राप्त करके, प्रसन्नचित्त होकर जाते हुए, एक अद्भुत आश्चर्य देखने लगे।
श्लोक 45 (skanda.5.215.45)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। दृष्टास्तैः पुरुषाः पार्थ नर्मदातटसंस्थिताः। स्नानदेवार्चनासक्ताः पञ्च एव महाबलाः॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| dṛṣṭāstaiḥ puruṣāḥ pārtha narmadātaṭasaṁsthitāḥ| snānadevārcanāsaktāḥ pañca eva mahābalāḥ||
श्रीमार्कण्डेय ने कहा—हे पार्थ! उन्होंने नर्मदा के तट पर स्थित, स्नान और देव-अर्चना में लीन, पाँच अत्यन्त बलशाली पुरुषों को देखा।
श्लोक 46 (skanda.5.215.46)
ते दृष्टा ब्राह्मणैः सर्वैर्वेदवेदाङ्गपारगैः। संपृष्टास्तैर्महाराज यथा तदवधारय॥
te dṛṣṭā brāhmaṇaiḥ sarvairvedavedāṅgapāragaiḥ| saṁpṛṣṭāstairmahārāja yathā tadavadhāraya||
हे महाराज! वेद-वेदांगपारंगत उन सभी ब्राह्मणों ने उन्हें देखा और उनसे प्रश्न किया; जैसा हुआ, वह सुनिए।
श्लोक 47 (skanda.5.215.47)
विप्रा ऊचुः। वनान्ते स्त्रीयुगं दृष्ट्वा महारौद्रं भयावहम्। वृद्धाश्च पुरुषास्तत्र पाशहस्ता भयावहाः॥
viprā ūcuḥ| vanānte strīyugaṁ dṛṣṭvā mahāraudraṁ bhayāvaham| vṛddhāśca puruṣāstatra pāśahastā bhayāvahāḥ||
ब्राह्मणों ने कहा—वन के छोर पर हमने महाभयंकर, भयकारी स्त्रीयुगल देखा; और वहाँ हाथों में पाश लिए हुए वृद्ध पुरुष भी भयकारी थे,
श्लोक 48 (skanda.5.215.48)
दुर्धर्षा दुर्निरीक्ष्याश्च इतश्चेतश्च चञ्चलाः। व्याहरन्तः शुभां वाचं न तत्र गतिरस्ति वै॥
durdharṣā durnirīkṣyāśca itaścetaśca cañcalāḥ| vyāharantaḥ śubhāṁ vācaṁ na tatra gatirasti vai||
दुर्धर्ष, देखने में असह्य, इधर-उधर चंचल, शुभ वाणी बोलते हुए—परन्तु वहाँ कोई शरण नहीं थी।
श्लोक 49 (skanda.5.215.49)
अपरस्परयोः सर्वे निरीक्षन्तः पुनःपुनः। तैस्तु यद्वचनं प्रोक्तं तत्सर्वं कथ्यतामिति॥
aparasparayoḥ sarve nirīkṣantaḥ punaḥpunaḥ| taistu yadvacanaṁ proktaṁ tatsarvaṁ kathyatāmiti||
वे सब बार-बार एक-दूसरे को देखते हुए [बोले]—'उन्होंने जो वचन कहा, वह सब बताया जाए।'
श्लोक 50 (skanda.5.215.50)
अस्माकं पुरुषाः पञ्च तिष्ठन्ति तत्र सत्तमाः। ते प्रस्थाप्या महाभागाः सर्वथैव त्वरान्विताः॥
asmākaṁ puruṣāḥ pañca tiṣṭhanti tatra sattamāḥ| te prasthāpyā mahābhāgāḥ sarvathaiva tvarānvitāḥ||
'हमारे पाँच पुरुष, अत्यन्त श्रेष्ठ, वहाँ खड़े हैं; उन महाभागों को हर प्रकार से अत्यन्त शीघ्रता से भेजा जाना चाहिए।'
श्लोक 51 (skanda.5.215.51)
अथ ते पुरुषाः पञ्च श्रुत्वा वाक्यमिदं शुभम्। परस्परं निरीक्षन्तो वदन्ति च पुनःपुनः॥
atha te puruṣāḥ pañca śrutvā vākyamidaṁ śubham| parasparaṁ nirīkṣanto vadanti ca punaḥpunaḥ||
तब वे पाँचों पुरुष यह शुभ वचन सुनकर, एक-दूसरे को देखते हुए बार-बार कहने लगे—
श्लोक 52 (skanda.5.215.52)
क्व ते कस्य कुतो याताः किमुक्तं तैर्भयावहैः॥
kva te kasya kuto yātāḥ kimuktaṁ tairbhayāvahaiḥ||
'तुम कहाँ से, किसके, कहाँ से आए हो? उन भयकारी [स्त्रियों] ने क्या कहा है?'
श्लोक 53 (skanda.5.215.53)
पुरुषा ऊचुः। तीर्थावगाहनं सर्वैः पूर्वदक्षिणपश्चिमैः। उत्तरैश्च कृतं भक्त्या न पापं तैर्व्यपोहितम्॥
puruṣā ūcuḥ| tīrthāvagāhanaṁ sarvaiḥ pūrvadakṣiṇapaścimaiḥ| uttaraiśca kṛtaṁ bhaktyā na pāpaṁ tairvyapohitam||
पुरुषों ने कहा—पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर के सभी लोगों ने भक्तिपूर्वक तीर्थावगाहन किया, परन्तु उनसे पाप दूर नहीं हुआ।
श्लोक 54 (skanda.5.215.54)
निष्पापाश्चाथ संजातास्तीर्थस्यास्य प्रभावतः। शृण्वन्तु ऋषयः सर्वे वह्निकालोपमा द्विजाः॥
niṣpāpāścātha saṁjātāstīrthasyāsya prabhāvataḥ| śṛṇvantu ṛṣayaḥ sarve vahnikālopamā dvijāḥ||
अब इस तीर्थ के प्रभाव से वे निष्पाप हो गए। हे द्विजो! सभी ऋषिगण सुनें, जो अग्नि और काल के समान [तेजस्वी] हैं।
श्लोक 55 (skanda.5.215.55)
पातकानि च घोराणि यान्यचिन्त्यानि देहिनाम्। पापिष्ठेन तु चैकेन गुरुदारा निषेविता॥
pātakāni ca ghorāṇi yānyacintyāni dehinām| pāpiṣṭhena tu caikena gurudārā niṣevitā||
देहधारियों के जो घोर, अचिन्त्य पातक हैं—एक अत्यन्त पापी द्वारा गुरु-पत्नी का सेवन किया गया,
श्लोक 56 (skanda.5.215.56)
हृतं चान्येन मित्रस्वं सुवर्णं च धनं तथा। ब्रह्महत्या महारौद्रा कृता चान्येन पातकम्॥
hṛtaṁ cānyena mitrasvaṁ suvarṇaṁ ca dhanaṁ tathā| brahmahatyā mahāraudrā kṛtā cānyena pātakam||
दूसरे द्वारा मित्र का धन, स्वर्ण तथा सम्पत्ति हरी गई; अत्यन्त घोर ब्रह्महत्या का पाप एक और द्वारा किया गया,
श्लोक 57 (skanda.5.215.57)
सुरापानं तु चान्यस्य संजातं चाप्यकामतः। गोवध्या चाप्यकामेन कृता चैकेन पापिना॥
surāpānaṁ tu cānyasya saṁjātaṁ cāpyakāmataḥ| govadhyā cāpyakāmena kṛtā caikena pāpinā||
किसी अन्य ने अनजाने में सुरापान किया; किसी एक पापी ने अनजाने में ही गोवध किया,
श्लोक 58 (skanda.5.215.58)
अकामतोऽपि सर्वेषां पातकानि नराधिप। ब्राह्मणानां तु ते श्रुत्वा वाक्यं तद्विस्मयान्विताः॥
akāmato'pi sarveṣāṁ pātakāni narādhipa| brāhmaṇānāṁ tu te śrutvā vākyaṁ tadvismayānvitāḥ||
हे नराधिप! अनजाने में ही सही, वे पाप सभी के थे।' यह ब्राह्मणों का वचन सुनकर वे [पाँचों] विस्मित हो गए।
श्लोक 59 (skanda.5.215.59)
सद्य एव तदा जाताः पापिष्ठा गतकल्मषाः। तीर्थस्यास्य प्रभावेन नर्मदायाः प्रभावतः॥
sadya eva tadā jātāḥ pāpiṣṭhā gatakalmaṣāḥ| tīrthasyāsya prabhāvena narmadāyāḥ prabhāvataḥ||
इस तीर्थ के प्रभाव से, नर्मदा के प्रभाव से, वे अत्यन्त पापी उसी क्षण पापरहित हो गए।
श्लोक 60 (skanda.5.215.60)
न क्वचित्पातकानां तु प्रवेशश्चात्र जायते। एवं संचित्य ते सर्वे पापिष्ठाश्च परस्परम्॥
na kvacitpātakānāṁ tu praveśaścātra jāyate| evaṁ saṁcitya te sarve pāpiṣṭhāśca parasparam||
यहाँ पापों का प्रवेश कहीं भी नहीं होता। ऐसा विचार करके वे सभी पापी परस्पर,
श्लोक 61 (skanda.5.215.61)
चित्रभानुः स्मृतस्तैस्तु विचिन्त्य हृदये हरिम्। स्नात्वा रेवाजले पुण्ये तर्पिताः पितृदेवताः॥
citrabhānuḥ smṛtastaistu vicintya hṛdaye harim| snātvā revājale puṇye tarpitāḥ pitṛdevatāḥ||
चित्रभानु (अग्नि) का स्मरण करके, हृदय में हरि का ध्यान करते हुए, पुण्य रेवा-जल में स्नान करके पितृ-देवताओं को तर्पण दिया।
श्लोक 62 (skanda.5.215.62)
नत्वा तु भास्करं देवं हृदि ध्यात्वा जनार्दनम्। प्रदक्षिणं तु तं भक्त्या ज्वलन्तं जातवेदसम्॥
natvā tu bhāskaraṁ devaṁ hṛdi dhyātvā janārdanam| pradakṣiṇaṁ tu taṁ bhaktyā jvalantaṁ jātavedasam||
देव भास्कर को नमस्कार करके, हृदय में जनार्दन का ध्यान करके, भक्तिपूर्वक उस प्रज्वलित जातवेदा (अग्नि) की प्रदक्षिणा करके,
श्लोक 63 (skanda.5.215.63)
पतिताः पाण्डवश्रेष्ठ पापोद्विग्ना महीपते। सात्त्विकीं वासनां कृत्वा त्यक्त्वा रजस्तमस्तथा॥
patitāḥ pāṇḍavaśreṣṭha pāpodvignā mahīpate| sāttvikīṁ vāsanāṁ kṛtvā tyaktvā rajastamastathā||
हे पाण्डवश्रेष्ठ! पाप से उद्विग्न होकर, हे महीपते! सात्त्विक वासना धारण करके, रजस् और तमस् को त्यागकर,
श्लोक 64 (skanda.5.215.64)
हतं तैः पावके सर्वं रेवाया उत्तरे तटे। विमानस्थास्तदा दृष्टा ब्राह्मणैस्ते युधिष्ठिर॥
hataṁ taiḥ pāvake sarvaṁ revāyā uttare taṭe| vimānasthāstadā dṛṣṭā brāhmaṇaiste yudhiṣṭhira||
वे अग्नि में गिर पड़े; रेवा के उत्तर तट पर सब कुछ भस्म हो गया। हे युधिष्ठिर! तब ब्राह्मणों ने उन्हें विमान में स्थित देखा।
श्लोक 65 (skanda.5.215.65)
आश्चर्यमतुलं दृष्टमृषिभिर्नर्मदातटे। तदाप्रभृति ते सर्वे रागद्वेषविवर्जिताः॥
āścaryamatulaṁ dṛṣṭamṛṣibhirnarmadātaṭe| tadāprabhṛti te sarve rāgadveṣavivarjitāḥ||
ऋषियों ने नर्मदा-तट पर यह अनुपम आश्चर्य देखा; तभी से वे सभी राग-द्वेष से रहित हो गए,
श्लोक 66 (skanda.5.215.66)
रवितीर्थं द्विजा हृष्टाः सेवन्ते मोक्षकाङ्क्षया। तीर्थस्यास्य च यत्पुण्यं तच्छृणुष्व नराधिप॥
ravitīrthaṁ dvijā hṛṣṭāḥ sevante mokṣakāṅkṣayā| tīrthasyāsya ca yatpuṇyaṁ tacchṛṇuṣva narādhipa||
और हर्षित होकर मोक्ष की इच्छा से द्विजगण रवितीर्थ की सेवा करते हैं। हे नराधिप! इस तीर्थ का जो पुण्य है, वह सुनो।
श्लोक 67 (skanda.5.215.67)
पीडितो वृद्धभावेन भक्त्या प्रीतो नरेश्वर। उद्देशं कथयिष्यामि द्विक्रोशाभ्यन्तरे स्थितः॥
pīḍito vṛddhabhāvena bhaktyā prīto nareśvara| uddeśaṁ kathayiṣyāmi dvikrośābhyantare sthitaḥ||
हे नरेश्वर! वृद्धावस्था से पीड़ित होकर भी भक्ति से प्रसन्न होकर मैं इसका स्थान बताऊँगा—यह दो क्रोश के भीतर स्थित है।
श्लोक 68 (skanda.5.215.68)
कुरुक्षेत्रं यथा पुण्यं रवितीर्थं श्रुतं मया। ईश्वरेण पुरा ख्यातं षण्मुखस्य नराधिप॥
kurukṣetraṁ yathā puṇyaṁ ravitīrthaṁ śrutaṁ mayā| īśvareṇa purā khyātaṁ ṣaṇmukhasya narādhipa||
जैसे कुरुक्षेत्र पुण्यकारी है, वैसा ही रवितीर्थ मैंने सुना है, हे नराधिप! जो पूर्वकाल में ईश्वर द्वारा षण्मुख से कहा गया था।
श्लोक 69 (skanda.5.215.69)
श्रुतं रुद्राच्च तैः सर्वैरहं तत्र समीपगः। ईश्वर उवाच। मार्तण्डग्रहणे प्राप्ते ये व्रजन्ति षडानन। रवितीर्थे कुरुक्षेत्रे तुल्यमेतत्फलं लभेत्॥
śrutaṁ rudrācca taiḥ sarvairahaṁ tatra samīpagaḥ| īśvara uvāca| mārtaṇḍagrahaṇe prāpte ye vrajanti ṣaḍānana| ravitīrthe kurukṣetre tulyametatphalaṁ labhet||
रुद्र से सुनकर वे सभी [वहाँ थे], और मैं वहाँ समीप ही था। ईश्वर ने कहा—हे षडानन! सूर्यग्रहण के समय जो वहाँ जाते हैं, उन्हें रवितीर्थ में कुरुक्षेत्र के समान ही फल प्राप्त होता है।
श्लोक 70 (skanda.5.215.70)
स्नाने दाने तथा जप्ये होमे चैव विशेषतः। कुरुक्षेत्रे समं पुण्यं नात्र कार्या विचारणा॥
snāne dāne tathā japye home caiva viśeṣataḥ| kurukṣetre samaṁ puṇyaṁ nātra kāryā vicāraṇā||
स्नान, दान, जप तथा विशेष रूप से होम में, कुरुक्षेत्र के समान ही पुण्य है, इसमें विचार नहीं करना चाहिए।
श्लोक 71 (skanda.5.215.71)
ग्रामे वा यदि वारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा। रवितीर्थे विशेषेण रेवा पुण्यफलप्रदा॥
grāme vā yadi vāraṇye puṇyā sarvatra narmadā| ravitīrthe viśeṣeṇa revā puṇyaphalapradā||
चाहे गाँव में हो या वन में, नर्मदा सर्वत्र पुण्यदायी है; परन्तु रवितीर्थ में विशेष रूप से रेवा पुण्यफलदायिनी है।
श्लोक 72 (skanda.5.215.72)
षष्ठ्यां सूर्यदिने भक्त्या व्यतीपाते च वै धृतौ। संक्रान्तौ ग्रहणेऽमायां ये व्रजन्ति जितेन्द्रियाः॥
ṣaṣṭhyāṁ sūryadine bhaktyā vyatīpāte ca vai dhṛtau| saṁkrāntau grahaṇe'māyāṁ ye vrajanti jitendriyāḥ||
षष्ठी को, रविवार को भक्तिपूर्वक, व्यतीपात में, धृति-योग में, संक्रान्ति में, ग्रहण में, अमावस्या में जो जितेन्द्रिय जन वहाँ जाते हैं,
श्लोक 73 (skanda.5.215.73)
कामक्रोधैर्विमुक्ताश्च रागद्वेषैस्तथैव च। उपोष्य परया भक्त्या देवस्याग्रे नराधिप॥
kāmakrodhairvimuktāśca rāgadveṣaistathaiva ca| upoṣya parayā bhaktyā devasyāgre narādhipa||
काम-क्रोध से मुक्त होकर, तथा राग-द्वेष से भी मुक्त होकर, हे नराधिप! देव के सम्मुख परम भक्ति से उपवास करके,
श्लोक 74 (skanda.5.215.74)
रात्रौ जागरणं कृत्वा दीपं देवस्य बोधयेत्। कथां वै वैष्णवीं पार्थ वेदाभ्यसनमेव च॥
rātrau jāgaraṇaṁ kṛtvā dīpaṁ devasya bodhayet| kathāṁ vai vaiṣṇavīṁ pārtha vedābhyasanameva ca||
रात्रि में जागरण करके देव का दीपक जलाना चाहिए; हे पार्थ! वैष्णवी कथा तथा वेदाभ्यास भी करना चाहिए—
श्लोक 75 (skanda.5.215.75)
ऋग्वेदं वा यजुर्वेदं सामवेदमथर्वणम्। ऋचमेकां जपेद्यस्तु स वेदफलमाप्नुयात्॥
ṛgvedaṁ vā yajurvedaṁ sāmavedamatharvaṇam| ṛcamekāṁ japedyastu sa vedaphalamāpnuyāt||
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद अथवा अथर्ववेद की एक भी ऋचा का जो जप करता है, वह वेद का [सम्पूर्ण] फल प्राप्त करता है।
श्लोक 76 (skanda.5.215.76)
गायत्र्या च चतुर्वेदफलमाप्नोति मानवः। प्रभाते पूजयेद्विप्रानन्नदानहिरण्यतः॥
gāyatryā ca caturvedaphalamāpnoti mānavaḥ| prabhāte pūjayedviprānannadānahiraṇyataḥ||
और गायत्री के जप से मनुष्य चारों वेदों का फल प्राप्त करता है। प्रातःकाल अन्नदान और स्वर्णदान से ब्राह्मणों की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 77 (skanda.5.215.77)
भूमिदानेन वस्त्रेण अन्नदानेन शक्तितः। छत्रोपानहशय्यादिगृहदानेन पाण्डव॥
bhūmidānena vastreṇa annadānena śaktitaḥ| chatropānahaśayyādigṛhadānena pāṇḍava||
हे पाण्डव! भूमिदान, वस्त्रदान, शक्ति के अनुसार अन्नदान, छत्र-उपानह-शय्या आदि तथा गृहदान से,
श्लोक 78 (skanda.5.215.78)
ग्रामधूर्वहदानेन गजकन्याहयेन च। विद्याशकटदानेन सर्वेषामभयं भवेत्॥
grāmadhūrvahadānena gajakanyāhayena ca| vidyāśakaṭadānena sarveṣāmabhayaṁ bhavet||
ग्रामदान, वाहनदान, हाथी, कन्या और घोड़े के दान से, विद्यादान और शकटदान से सभी को अभय प्राप्त होता है।
श्लोक 79 (skanda.5.215.79)
शत्रुश्च मित्रतां याति विषं चैवामृतं भवेत्। ग्रहा भवन्ति सुप्रीताः प्रीतस्तस्य दिवाकरः॥
śatruśca mitratāṁ yāti viṣaṁ caivāmṛtaṁ bhavet| grahā bhavanti suprītāḥ prītastasya divākaraḥ||
शत्रु भी मित्र बन जाता है, विष भी अमृत हो जाता है; ग्रह अत्यन्त प्रसन्न होते हैं, तथा दिवाकर उस पर प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 80 (skanda.5.215.80)
एतत्ते सर्वमाख्यातं रवितीर्थफलं नृप। ये शृण्वन्ति नरा भक्त्या रवितीर्थफलं शुभम्॥
etatte sarvamākhyātaṁ ravitīrthaphalaṁ nṛpa| ye śṛṇvanti narā bhaktyā ravitīrthaphalaṁ śubham||
हे नृप! यह तुम्हें रवितीर्थ का सम्पूर्ण फल बताया गया। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक रवितीर्थ के इस शुभ फल को सुनते हैं,
श्लोक 81 (skanda.5.215.81)
तेऽपि पापविनिर्मुक्ता रविलोके वसन्ति हि। गोदानेन च यत्पुण्यं यत्पुण्यं भृगुदर्शने॥
te'pi pāpavinirmuktā raviloke vasanti hi| godānena ca yatpuṇyaṁ yatpuṇyaṁ bhṛgudarśane||
वे भी पापमुक्त होकर सूर्यलोक में निवास करते हैं। गोदान से जो पुण्य है, भृगु-दर्शन से जो पुण्य है,
श्लोक 82 (skanda.5.215.82)
केदार उदकं पीत्वा तत्पुण्यं जायते नृणाम्। अब्दमश्वत्थसेवायां तिलपात्रप्रदो भवेत्॥
kedāra udakaṁ pītvā tatpuṇyaṁ jāyate nṛṇām| abdamaśvatthasevāyāṁ tilapātraprado bhavet||
केदार का जल पीने से मनुष्यों को जो पुण्य प्राप्त होता है, एक वर्ष तक पीपल की सेवा करने से, तथा तिल-पात्र देने से जो पुण्य होता है,
श्लोक 83 (skanda.5.215.83)
तत्फलं समवाप्नोति आदित्येश्वरकीर्तनात्। श्रुते यस्य प्रभावे न जायते यन्नृपात्मज॥
tatphalaṁ samavāpnoti ādityeśvarakīrtanāt| śrute yasya prabhāve na jāyate yannṛpātmaja||
हे नृपात्मज! वह सारा फल आदित्येश्वर के कीर्तन से ही प्राप्त हो जाता है। जिसका प्रभाव सुनने पर [अशुभ कुछ भी] उत्पन्न नहीं होता,
श्लोक 84 (skanda.5.215.84)
तत्सर्वं कथयिष्यामि भक्त्या तव महीपते। पापानि च प्रलीयन्ते भिन्नपात्रे यथा जलम्॥
tatsarvaṁ kathayiṣyāmi bhaktyā tava mahīpate| pāpāni ca pralīyante bhinnapātre yathā jalam||
हे महीपते! वह सब मैं तुम्हें भक्तिपूर्वक कहूँगा। और पाप उसी प्रकार विलीन हो जाते हैं जैसे फटे हुए पात्र से जल [बह जाता है]।
श्लोक 85 (skanda.5.215.85)
तीर्थस्याभिमुखो नित्यं जायते नात्र संशयः। गुह्याद्गुह्यतरं तीर्थं कथितं तव पाण्डव॥
tīrthasyābhimukho nityaṁ jāyate nātra saṁśayaḥ| guhyādguhyataraṁ tīrthaṁ kathitaṁ tava pāṇḍava||
जो नित्य इस तीर्थ के सम्मुख रहता है [अर्थात् इसका भक्त रहता है], इसमें कोई संशय नहीं। हे पाण्डव! तुम्हें यह तीर्थ रहस्यों से भी अधिक गोपनीय बताया गया है।
श्लोक 86 (skanda.5.215.86)
पापिष्ठानां कृतघ्नानां स्वामिमित्रावघातिनाम्। तीर्थाख्यानं शुभं तेषां गोपितव्यं सदा बुधैः॥
pāpiṣṭhānāṁ kṛtaghnānāṁ svāmimitrāvaghātinām| tīrthākhyānaṁ śubhaṁ teṣāṁ gopitavyaṁ sadā budhaiḥ||
अत्यन्त पापियों, कृतघ्नों, स्वामी और मित्र का घात करने वालों को इस तीर्थ का यह शुभ आख्यान विद्वानों द्वारा सदा गुप्त रखा जाना चाहिए।