Skip to main content

अवन्ती खण्ड · अध्याय 216

शक्रेश्वर तीर्थ का माहात्म्य

अध्याय 215अध्याय-सूचीअध्याय 217

श्लोक 1 (skanda.5.216.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेत्परं पुण्यं नर्मदादक्षिणे तटे। शक्रतीर्थं सुविख्यातमशेषाघविनाशनम्॥

śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchetparaṁ puṇyaṁ narmadādakṣiṇe taṭe| śakratīrthaṁ suvikhyātamaśeṣāghavināśanam||

श्रीमार्कण्डेय ने कहा—इसके पश्चात् नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित परम पुण्य, सुविख्यात, सम्पूर्ण पाप का नाश करने वाले शक्रतीर्थ को जाना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.5.216.2)

पुरा शक्रेण तत्रैव तपो वै दुरतिक्रमम्। प्रारब्धं परया भक्त्या देवं प्रति महेश्वरम्॥

purā śakreṇa tatraiva tapo vai duratikramam| prārabdhaṁ parayā bhaktyā devaṁ prati maheśvaram||

पूर्वकाल में वहीं स्वयं इन्द्र ने महेश्वर देव के प्रति परम भक्ति से दुरतिक्रम्य तप आरम्भ किया था।

श्लोक 3 (skanda.5.216.3)

ततः संतोषितो देव उमापतिर्नराधिप। देवेन्द्रत्वं वरं राज्यं दानवानां वधं ददौ॥

tataḥ saṁtoṣito deva umāpatirnarādhipa| devendratvaṁ varaṁ rājyaṁ dānavānāṁ vadhaṁ dadau||

तब हे नराधिप! सन्तुष्ट होकर उमापति देव ने उन्हें देवेन्द्रत्व, उत्तम राज्य, तथा दानवों का वध वरदान में दिया।

श्लोक 4 (skanda.5.216.4)

लब्धं शक्रेण नृपते नर्मदातीर्थभावतः। ततः पुण्यतमं तीर्थं संजातं वसुधातले॥

labdhaṁ śakreṇa nṛpate narmadātīrthabhāvataḥ| tataḥ puṇyatamaṁ tīrthaṁ saṁjātaṁ vasudhātale||

हे नृपते! यह इन्द्र द्वारा नर्मदा-तीर्थ के प्रभाव से प्राप्त हुआ; तब से यह पृथ्वीतल पर परम पुण्य तीर्थ बन गया।

श्लोक 5 (skanda.5.216.5)

कार्त्तिकस्य तु मासस्य कृष्णपक्षे त्रयोदशीम्। उपोष्य वै नरो भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते॥

kārttikasya tu māsasya kṛṣṇapakṣe trayodaśīm| upoṣya vai naro bhaktyā sarvapāpaiḥ pramucyate||

कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को जो मनुष्य भक्तिपूर्वक उपवास करता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है—

श्लोक 6 (skanda.5.216.6)

दुःस्वप्नसम्भवैः पापैर्दुर्निमित्तसमुद्भवैः। ग्रहशाकिनिसम्भूतैर्मुच्यते पाण्डुनन्दन॥

duḥsvapnasambhavaiḥ pāpairdurnimittasamudbhavaiḥ| grahaśākinisambhūtairmucyate pāṇḍunandana||

दुःस्वप्न से उत्पन्न पापों से, दुर्निमित्त से उत्पन्न पापों से, तथा ग्रह और शाकिनी से उत्पन्न पापों से भी, हे पाण्डुनन्दन! वह मुक्त हो जाता है।

श्लोक 7 (skanda.5.216.7)

शक्रेश्वरं नृपश्रेष्ठ ये प्रपश्यन्ति भक्तितः। तेषां जन्मकृतं पापं नश्यते नात्र संशयः॥

śakreśvaraṁ nṛpaśreṣṭha ye prapaśyanti bhaktitaḥ| teṣāṁ janmakṛtaṁ pāpaṁ naśyate nātra saṁśayaḥ||

हे नृपश्रेष्ठ! जो लोग भक्तिपूर्वक शक्रेश्वर का दर्शन करते हैं, उनका जन्म-जन्मान्तर का पाप नष्ट हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 8 (skanda.5.216.8)

अगम्यागमने चैव अवाह्ये चैव वाहिते। स्वामिमित्रविघाते यन्नश्यते नात्र संशयः॥

agamyāgamane caiva avāhye caiva vāhite| svāmimitravighāte yannaśyate nātra saṁśayaḥ||

अगम्यागमन से, अवाह्य को वहन कराने से, तथा स्वामी या मित्र के घात से जो [पाप उत्पन्न होता है], वह नष्ट हो जाता है, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 9 (skanda.5.216.9)

गोप्रदानं प्रकर्तव्यं शुभं ब्राह्मणपुंगवे। धुर्यं वा दापयेत्तस्मिन् सर्वाङ्गरुचिरं नृप॥

gopradānaṁ prakartavyaṁ śubhaṁ brāhmaṇapuṁgave| dhuryaṁ vā dāpayettasmin sarvāṅgaruciraṁ nṛpa||

श्रेष्ठ ब्राह्मण को शुभ गोदान करना चाहिए; अथवा हे नृप! वहाँ सर्वांगसुन्दर बैल भी दान में देना चाहिए।

श्लोक 10 (skanda.5.216.10)

दातव्यं परया भक्त्या स्वर्गे वासमभीप्सता। एतत्ते सर्वमाख्यातं शक्रेश्वरफलं नृप॥

dātavyaṁ parayā bhaktyā svarge vāsamabhīpsatā| etatte sarvamākhyātaṁ śakreśvaraphalaṁ nṛpa||

स्वर्ग में निवास की इच्छा रखने वाले को परम भक्ति से यह दान देना चाहिए। हे नृप! यह तुम्हें शक्रेश्वर का सम्पूर्ण फल बताया गया।

अध्याय 215अध्याय-सूचीअध्याय 217