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अवन्ती खण्ड · अध्याय 234

दधिस्कन्द-मधुस्कन्द तीर्थ की महिमा

अध्याय 233अध्याय-सूचीअध्याय 235

श्लोक 1 (skanda.5.234.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र तीर्थद्वयमनुत्तमम्। दधिस्कन्दं मधुस्कन्दं सर्वपापक्षयंकरम्

śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchettu rājendra tīrthadvayamanuttamam| dadhiskandaṁ madhuskandaṁ sarvapāpakṣayaṁkaram

श्री मार्कण्डेय ने कहा — तत्पश्चात् हे राजेन्द्र! दो अनुपम तीर्थों को जाओ — दधिस्कन्द और मधुस्कन्द, जो सब पापों का क्षय करने वाले हैं।

श्लोक 2 (skanda.5.234.2)

दधिस्कन्दे नरः स्नात्वा यस्तु दद्याद्द्विजे दधि। उपतिष्ठेत्ततस्तस्य सप्तजन्मनि भारत

dadhiskande naraḥ snātvā yastu dadyāddvije dadhi| upatiṣṭhettatastasya saptajanmani bhārata

दधिस्कन्द में स्नान करके जो मनुष्य ब्राह्मण को दही देता है, हे भारत! सात जन्मों तक वह फल उसकी सेवा में उपस्थित रहता है।

श्लोक 3 (skanda.5.234.3)

न व्याधिर्न जरा तस्य न शोको नैव मत्सरः। दशचन्द्रशतं यावज्जायते विमले कुले

na vyādhirna jarā tasya na śoko naiva matsaraḥ| daśacandraśataṁ yāvajjāyate vimale kule

उसे न व्याधि होती है, न वृद्धावस्था, न शोक, न ईर्ष्या; एक सहस्र चन्द्र-वर्षों तक वह निर्मल कुल में जन्म लेता है।

श्लोक 4 (skanda.5.234.4)

मधुस्कन्देऽपि मधुना मिश्रितान्यस्तिलान्ददेत्। नासौ वैवस्वतं देवं पश्येद्वै जन्मसप्ततिम्

madhuskande'pi madhunā miśritānyastilānddet| nāsau vaivasvataṁ devaṁ paśyedvai janmasaptatim

मधुस्कन्द में भी जो मधु में मिलाकर तिल दान करता है, वह सत्तर जन्मों तक वैवस्वत यम को नहीं देखता।

श्लोक 5 (skanda.5.234.5)

मधुना सह सम्मिश्रं पिण्डं यस्तु प्रदापयेत्। तस्य पौत्रप्रपौत्रेभ्यो दारिद्र्यं नैव जायते

madhunā saha sammiśraṁ piṇḍaṁ yastu pradāpayet| tasya pautraprapautrebhyo dāridryaṁ naiva jāyate

जो मधु में मिलाकर पिण्ड अर्पित करता है, उसके पौत्रों और प्रपौत्रों तक भी दरिद्रता कभी उत्पन्न नहीं होती।

श्लोक 6 (skanda.5.234.6)

दधिभिः सह संमिश्रं पिण्डं यस्तु प्रदापयेत्। तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा विधिवद्दक्षिणामुखः

dadhibhiḥ saha saṁmiśraṁ piṇḍaṁ yastu pradāpayet| tasmiṁstīrthe naraḥ snātvā vidhivaddakṣiṇāmukhaḥ

जो दही में मिलाकर पिण्ड अर्पित करता है — उस तीर्थ में स्नान करके, विधिपूर्वक दक्षिणामुख होकर,

श्लोक 7 (skanda.5.234.7)

पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः। द्वादशाब्दानि तुष्यन्ति नात्र कार्या विचारणा

pitā pitāmahaścaiva tathaiva prapitāmahaḥ| dvādaśābdāni tuṣyanti nātra kāryā vicāraṇā

उसके पिता, पितामह तथा प्रपितामह बारह वर्षों तक तृप्त रहते हैं — इसमें कोई संदेह नहीं करना चाहिए।

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