अवन्ती खण्ड · अध्याय 259
सुवर्णशिला तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.259.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महीपालं सौवर्णशिलमुत्तमम्। प्रख्यातमुत्तरे कूले सर्वपापक्षयंकरम्।
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahīpālaṁ sauvarṇaśilamuttamam| prakhyātamuttare kūle sarvapāpakṣayaṁkaram||
श्री मार्कण्डेय बोले - हे राजन्! इसके पश्चात उत्तम सुवर्णशिला तीर्थ में जाना चाहिए, जो उत्तरी तट पर प्रख्यात तथा समस्त पापों का नाशक है।
श्लोक 2 (skanda.5.259.2)
समन्ताच्छतपातेन मुनिसङ्घैः पुरा कृतम्। रेवायां दुर्लभं स्थानं सङ्गमस्य समीपतः।
samantācchatapātena munisaṅghaiḥ purā kṛtam| revāyāṁ durlabhaṁ sthānaṁ saṅgamasya samīpataḥ||
प्राचीनकाल में मुनि-समूहों द्वारा सभी ओर से सैकड़ों दण्डवत-प्रणामों से सिद्ध किया गया यह स्थान रेवा में, संगम के समीप, एक दुर्लभ स्थान है।
श्लोक 3 (skanda.5.259.3)
विभक्तं हस्तमात्रं च पुण्यक्षेत्रं नराधिप। सुवर्णशिलके स्नात्वा पूजयित्वा महेश्वरम्।
vibhaktaṁ hastamātraṁ ca puṇyakṣetraṁ narādhipa| suvarṇaśilake snātvā pūjayitvā maheśvaram||
हे नराधिप! यह पुण्यक्षेत्र मात्र एक हाथ जितना विभक्त है। सुवर्णशिलक में स्नान कर तथा महेश्वर की पूजा कर -
श्लोक 4 (skanda.5.259.4)
नत्वा तु भास्करं देवं होतव्यं च हुताशने। बिल्वेनाज्यविमिश्रेण बिल्वपत्रैरथापि वा।
natvā tu bhāskaraṁ devaṁ hotavyaṁ ca hutāśane| bilvenājyavimiśreṇa bilvapatrairathāpi vā||
-तथा सूर्यदेव को प्रणाम कर, अग्नि में घृतमिश्रित बिल्वफल अथवा बिल्वपत्रों से हवन करना चाहिए।
श्लोक 5 (skanda.5.259.5)
प्रीयतां मे जगन्नाथो व्याधिर्नश्यतु मे ध्रुवम्। द्विजाय काञ्चने दत्ते यत्फलं तच्छृणुष्व मे।
prīyatāṁ me jagannātho vyādhirnaśyatu me dhruvam| dvijāya kāñcane datte yatphalaṁ tacchṛṇuṣva me||
(संकल्प) जगन्नाथ मुझ पर प्रसन्न हों, मेरा रोग निश्चय ही नष्ट हो। ब्राह्मण को स्वर्ण दान करने का जो फल है, वह मुझसे सुनो।
श्लोक 6 (skanda.5.259.6)
बहुस्वर्णस्य यत्प्रोक्तं यागस्य फलमुत्तमम्। तथासौ लभते सर्वं काञ्चनं यः प्रयच्छति।
bahusvarṇasya yatproktaṁ yāgasya phalamuttamam| tathāsau labhate sarvaṁ kāñcanaṁ yaḥ prayacchati||
बहुत स्वर्ण वाले यज्ञ का जो उत्तम फल कहा गया है, वह संपूर्ण फल वह व्यक्ति प्राप्त करता है जो यहां स्वर्ण दान करता है।
श्लोक 7 (skanda.5.259.7)
तेन दानेन पूतात्मा मृतः स्वर्गमवाप्नुयात्। रुद्रस्यानुचरस्तावद्यावदिन्द्राश्चतुर्दश।
tena dānena pūtātmā mṛtaḥ svargamavāpnuyāt| rudrasyānucarastāvadyāvadindrāścaturdaśa||
उस दान से पवित्रात्मा होकर वह मृत्यु के पश्चात स्वर्ग को प्राप्त होता है। वह चौदह इंद्रों के काल तक रुद्र का अनुचर बना रहता है।
श्लोक 8 (skanda.5.259.8)
ततः स्वर्गावतीर्णस्तु जायते विशदे कुले। धनधान्यसमोपेतः पुनः स्मरति तज्जलम्।
tataḥ svargāvatīrṇastu jāyate viśade kule| dhanadhānyasamopetaḥ punaḥ smarati tajjalam||
तत्पश्चात स्वर्ग से अवतरित होकर वह विशुद्ध कुल में जन्म लेता है, धन-धान्य से संपन्न होता है, तथा पुनः उस तीर्थ के जल का स्मरण करता है।