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अवन्ती खण्ड · अध्याय 260

करञ्ज तीर्थ की महिमा

अध्याय 259अध्याय-सूचीअध्याय 261

श्लोक 1 (skanda.5.260.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। करञ्जाख्यं ततो गच्छेत्सोपवासो जितेन्द्रियः। तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र सर्वपापैः प्रमुच्यते।

śrīmārkaṇḍeya uvāca| karañjākhyaṁ tato gacchetsopavāso jitendriyaḥ| tatra snātvā tu rājendra sarvapāpaiḥ pramucyate||

श्री मार्कण्डेय बोले - तत्पश्चात उपवास कर, इन्द्रियों को वश में रखते हुए, करञ्ज नामक तीर्थ में जाना चाहिए। हे राजेन्द्र! वहां स्नान करने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 2 (skanda.5.260.2)

अर्चयित्वा महादेवं दत्त्वा दानं तु भक्तितः। सुवर्णं रजतं वापि मणिमौक्तिकविद्रुमान्।

arcayitvā mahādevaṁ dattvā dānaṁ tu bhaktitaḥ| suvarṇaṁ rajataṁ vāpi maṇimauktikavidrumān||

महादेव की भक्तिपूर्वक अर्चना कर तथा दान देकर - स्वर्ण, रजत, मणि, मोती अथवा मूंगा -

श्लोक 3 (skanda.5.260.3)

पादुकोपानहौ छत्रं शय्यां प्रावरणानि च। कोटिकोटिगुणं सर्वं जायते नात्र संशयः।

pādukopānahau chatraṁ śayyāṁ prāvaraṇāni ca| koṭikoṭiguṇaṁ sarvaṁ jāyate nātra saṁśayaḥ||

-पादुका, जूते, छत्र, शय्या तथा ओढ़ने के वस्त्र - यह सब कोटि-कोटि गुना फलदायी होता है, इसमें संदेह नहीं।

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