अवन्ती खण्ड · अध्याय 261
कामद तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.261.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महीपाल तीर्थं परमशोभनम्। सौभाग्यकरणं दिव्यं नरनारीमनोरमम्।
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahīpāla tīrthaṁ paramaśobhanam| saubhāgyakaraṇaṁ divyaṁ naranārīmanoramam||
श्री मार्कण्डेय बोले - हे राजन्! इसके पश्चात एक परम सुंदर तीर्थ है, जो दिव्य है, सौभाग्य प्रदान करने वाला तथा नर-नारियों के मन को मोहित करने वाला है।
श्लोक 2 (skanda.5.261.2)
तत्र या दुर्भगा नारी नरो वा नृपसत्तम। स्नात्वार्चयेदुमारुद्रौ सौभाग्यं तस्य जायते।
tatra yā durbhagā nārī naro vā nṛpasattama| snātvārcayedumārudrau saubhāgyaṁ tasya jāyate||
हे नृपसत्तम! वहां जो भी दुर्भाग्यशाली स्त्री अथवा पुरुष, स्नान कर उमा-रुद्र की पूजा करता है, उसे सौभाग्य प्राप्त होता है।
श्लोक 3 (skanda.5.261.3)
तृतीयायामहोरात्रं सोपवासो जितेन्द्रियः। निमन्त्रयेद्द्विजं भक्त्या सपत्नीकं सुरूपिणम्।
tṛtīyāyāmahorātraṁ sopavāso jitendriyaḥ| nimantrayeddvijaṁ bhaktyā sapatnīkaṁ surūpiṇam||
तृतीया तिथि को अहोरात्र उपवास कर, जितेन्द्रिय होकर, भक्तिपूर्वक सुंदर ब्राह्मण को उसकी पत्नी सहित आमंत्रित करना चाहिए।
श्लोक 4 (skanda.5.261.4)
गन्धमाल्यैरलंकृत्य वस्त्रधूपादिवासितम्। भोजयेत्पायसान्नेन कृसरेणाथ भक्तितः।
gandhamālyairalaṁkṛtya vastradhūpādivāsitam| bhojayetpāyasānnena kṛsareṇātha bhaktitaḥ||
गंध-माल्य से अलंकृत कर, वस्त्र-धूप आदि से सुवासित कर, भक्तिपूर्वक खीर तथा खिचड़ी से उन्हें भोजन कराना चाहिए।
श्लोक 5 (skanda.5.261.5)
भोजयित्वा यथान्यायं प्रदक्षिणमुदाहरेत्। प्रीयतां मे महादेवः सपत्नीको वृषध्वजः।
bhojayitvā yathānyāyaṁ pradakṣiṇamudāharet| prīyatāṁ me mahādevaḥ sapatnīko vṛṣadhvajaḥ||
यथाविधि भोजन कराकर प्रदक्षिणा करनी चाहिए। हे वृषध्वज महादेव! आप अपनी पत्नी सहित मुझ पर प्रसन्न हों।
श्लोक 6 (skanda.5.261.6)
यथा ते देवदेवेश न वियोगः कदाचन। ममापि करुणां कृत्वा तथास्त्विति विचिन्तयेत्।
yathā te devadeveśa na viyogaḥ kadācana| mamāpi karuṇāṁ kṛtvā tathāstviti vicintayet||
हे देवदेवेश! जैसे आपका कभी वियोग नहीं होता, वैसे ही मुझ पर भी कृपा करके ऐसा ही हो - ऐसा चिंतन करे।
श्लोक 7 (skanda.5.261.7)
एवं कृते ततस्तस्य यत्पुण्यं समुदाहृतम्। तत्ते सर्वं प्रवक्ष्यामि यथा देवेन भाषितम्।
evaṁ kṛte tatastasya yatpuṇyaṁ samudāhṛtam| tatte sarvaṁ pravakṣyāmi yathā devena bhāṣitam||
ऐसा करने पर उसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह सब मैं तुम्हें बताऊंगा, जैसा देव ने कहा है।
श्लोक 8 (skanda.5.261.8)
दौर्भाग्यं दुर्गतिश्चैव दारिद्र्यं शोकबन्धनम्। वन्ध्यत्वं सप्तजन्मानि जायते न युधिष्ठिर।
daurbhāgyaṁ durgatiścaiva dāridryaṁ śokabandhanam| vandhyatvaṁ saptajanmāni jāyate na yudhiṣṭhira||
हे युधिष्ठिर! सात जन्मों तक दुर्भाग्य, दुर्गति, दरिद्रता, शोक-बंधन तथा वंध्यत्व उत्पन्न नहीं होते।
श्लोक 9 (skanda.5.261.9)
ज्येष्ठमासे सिते पक्षे तृतीयायां विशेषतः। तत्र गत्वा तु यो भक्त्या पञ्चाग्निं साधयेत्ततः।
jyeṣṭhamāse site pakṣe tṛtīyāyāṁ viśeṣataḥ| tatra gatvā tu yo bhaktyā pañcāgniṁ sādhayettataḥ||
विशेषतः ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को वहां जाकर जो भक्तिपूर्वक पंचाग्नि तप करता है -
श्लोक 10 (skanda.5.261.10)
सोऽपि पापैरशेषैस्तु मुच्यते नात्र संशयः। गुग्गुलं दहते यस्तु द्विधा चित्तविवर्जितः।
so'pi pāpairaśeṣaistu mucyate nātra saṁśayaḥ| guggulaṁ dahate yastu dvidhā cittavivarjitaḥ||
-वह भी समस्त पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं। जो एकाग्रचित्त होकर गुग्गुल जलाता है -
श्लोक 11 (skanda.5.261.11)
शरीरं भेदयेद्यस्तु गौर्याश्चैव समीपतः। तस्मिन्कर्मप्रविष्टस्य उत्क्रान्तिर्जायते यदि।
śarīraṁ bhedayedyastu gauryāścaiva samīpataḥ| tasminkarmapraviṣṭasya utkrāntirjāyate yadi||
-जो गौरी के समीप अपना शरीर छेदन करता है, यदि उस कर्म में प्रवृत्त उसकी प्राणोत्क्रांति हो जाए -
श्लोक 12 (skanda.5.261.12)
देहपाते व्रजेत्स्वर्गमित्येवं शङ्करोऽब्रवीत्। सितरक्तैस्तथा पीतैर्वस्त्रैश्च विविधैः शुभैः।
dehapāte vrajetsvargamityevaṁ śaṅkaro'bravīt| sitaraktaistathā pītairvastraiśca vividhaiḥ śubhaiḥ||
-तो शरीर छूटने पर वह स्वर्ग को जाता है - ऐसा शंकर ने कहा। श्वेत, लाल तथा पीत वस्त्रों से, विविध शुभ वस्त्रों से -
श्लोक 13 (skanda.5.261.13)
ब्राह्मणीं ब्राह्मणं चैव पूजयित्वा यथाविधि। पुष्पैर्नानाविधैश्चैव गन्धधूपैः सुशोभनैः।
brāhmaṇīṁ brāhmaṇaṁ caiva pūjayitvā yathāvidhi| puṣpairnānāvidhaiścaiva gandhadhūpaiḥ suśobhanaiḥ||
-ब्राह्मणी और ब्राह्मण की यथाविधि पूजा कर, विविध पुष्पों तथा सुंदर गंध-धूप से -
श्लोक 14 (skanda.5.261.14)
कण्ठसूत्रकसिन्दूरैः कुङ्कुमेन विलेपयेत्। कल्पयेत स्त्रियं गौरीं ब्राह्मणं शिवरूपिणम्।
kaṇṭhasūtrakasindūraiḥ kuṅkumena vilepayet| kalpayeta striyaṁ gaurīṁ brāhmaṇaṁ śivarūpiṇam||
-कंठसूत्र, सिंदूर और कुंकुम से विलेपन करे; स्त्री को गौरी और ब्राह्मण को शिवस्वरूप मानकर उनकी भावना करे।
श्लोक 15 (skanda.5.261.15)
तेषां तद्रूपकं कृत्वा दानमुत्सृज्यते ततः। कङ्कणं कर्णवेष्टं च कण्ठिकां मुद्रिकां तथा।
teṣāṁ tadrūpakaṁ kṛtvā dānamutsṛjyate tataḥ| kaṅkaṇaṁ karṇaveṣṭaṁ ca kaṇṭhikāṁ mudrikāṁ tathā||
उनका इस प्रकार रूपकल्पन कर तत्पश्चात दान अर्पित करना चाहिए - कंकण, कर्णाभूषण, कंठी तथा मुद्रिका -
श्लोक 16 (skanda.5.261.16)
सप्तधान्यं तथा चैव भोजनं नृपसत्तम। अन्यान्यपि च दानानि तस्मिंस्तीर्थे ददाति यः।
saptadhānyaṁ tathā caiva bhojanaṁ nṛpasattama| anyānyapi ca dānāni tasmiṁstīrthe dadāti yaḥ||
-तथा सप्तधान्य और भोजन, हे नृपसत्तम! जो इस तीर्थ में ये तथा अन्य दान भी अर्पित करता है -
श्लोक 17 (skanda.5.261.17)
सर्वदानैश्च यत्पुण्यं प्राप्नुयान्नात्र संशयः। सहस्रगुणितं सर्वं नात्र कार्या विचारणा।
sarvadānaiśca yatpuṇyaṁ prāpnuyānnātra saṁśayaḥ| sahasraguṇitaṁ sarvaṁ nātra kāryā vicāraṇā||
-सभी दानों से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह सब यहां सहस्रगुणित हो जाता है, इसमें संदेह नहीं करना चाहिए।
श्लोक 18 (skanda.5.261.18)
शङ्करेण समं तस्माद्भोगं भुङ्क्ते ह्यनुत्तमम्। सौभाग्यं तस्य विपुलं जायते नात्र संशयः।
śaṅkareṇa samaṁ tasmādbhogaṁ bhuṅkte hyanuttamam| saubhāgyaṁ tasya vipulaṁ jāyate nātra saṁśayaḥ||
इसलिए वह शंकर के समान ही सर्वोत्तम भोग भोगता है। उसका सौभाग्य विपुल हो जाता है, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 19 (skanda.5.261.19)
अपुत्रो लभते पुत्रमधनो धनमाप्नुयात्। राजेन्द्र कामदं तीर्थं नर्मदायां व्यवस्थितम्।
aputro labhate putramadhano dhanamāpnuyāt| rājendra kāmadaṁ tīrthaṁ narmadāyāṁ vyavasthitam||
पुत्रहीन को पुत्र प्राप्त होता है, निर्धन को धन प्राप्त होता है। हे राजेन्द्र! यह कामद तीर्थ नर्मदा में स्थित है, जो सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।