अवन्ती खण्ड · अध्याय 262
भण्डारी तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.262.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेत राजेन्द्र भण्डारीतीर्थमुत्तमम्। दरिद्रच्छेदकरणं युगान्येकोनविंशतिः।
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gaccheta rājendra bhaṇḍārītīrthamuttamam| daridracchedakaraṇaṁ yugānyekonaviṁśatiḥ||
श्री मार्कण्डेय बोले - हे राजेन्द्र! इसके पश्चात उत्तम भण्डारी तीर्थ में जाना चाहिए, जो उन्नीस युगों तक दरिद्रता का नाश करने वाला है।
श्लोक 2 (skanda.5.262.2)
धनदेन तपस्तप्त्वा प्रसन्ने पद्मसम्भवे। तत्रैव स्वल्पदानेन प्राप्तं वित्तस्य रक्षणम्।
dhanadena tapastaptvā prasanne padmasambhave| tatraiva svalpadānena prāptaṁ vittasya rakṣaṇam||
धनद (कुबेर) ने वहां तप कर पद्मसंभव (ब्रह्मा) को प्रसन्न किया था; वहीं अल्प दान से भी धन की रक्षा प्राप्त होती है।
श्लोक 3 (skanda.5.262.3)
तत्र गत्वा तु यो भक्त्या स्नात्वा वित्तं प्रयच्छति। तस्य वित्तपरिच्छेदो न कदाचिद्भविष्यति।
tatra gatvā tu yo bhaktyā snātvā vittaṁ prayacchati| tasya vittaparicchedo na kadācidbhaviṣyati||
वहां जाकर जो भक्तिपूर्वक स्नान कर धन का दान करता है, उसके धन का कभी क्षय नहीं होता।