अवन्ती खण्ड · अध्याय 263
रोहिणी-सोमनाथ तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.263.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महीपाल रोहिणीतीर्थमुत्तमम्। विख्यातं त्रिषु लोकेषु सर्वपापहरं परम्।
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahīpāla rohiṇītīrthamuttamam| vikhyātaṁ triṣu lokeṣu sarvapāpaharaṁ param||
श्री मार्कण्डेय बोले - हे राजन्! इसके पश्चात उत्तम रोहिणी तीर्थ में जाना चाहिए, जो तीनों लोकों में विख्यात तथा समस्त पापों का परम नाशक है।
श्लोक 2 (skanda.5.263.2)
युधिष्ठिर उवाच। रोहिणीतीर्थमाहात्म्यं सर्वपापप्रणाशनम्। श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि।
yudhiṣṭhira uvāca| rohiṇītīrthamāhātmyaṁ sarvapāpapraṇāśanam| śrotumicchāmi tattvena tanme tvaṁ vaktumarhasi||
युधिष्ठिर बोले - रोहिणी तीर्थ की महिमा, जो समस्त पापों का नाश करने वाली है, उसे मैं यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूं; आप मुझे बताने योग्य हैं।
श्लोक 3 (skanda.5.263.3)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे। उदधौ च शयानस्य देवदेवस्य चक्रिणः।
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tasminnekārṇave ghore naṣṭe sthāvarajaṅgame| udadhau ca śayānasya devadevasya cakriṇaḥ||
श्री मार्कण्डेय बोले - उस घोर एकार्णव में, जब चराचर सब कुछ नष्ट हो चुका था, समुद्र पर शयन करते हुए चक्रधारी देवदेव (विष्णु) की -
श्लोक 4 (skanda.5.263.4)
नाभौ समुत्थितं पद्मं रविमण्डलसन्निभम्। कर्णिकाकेसरोपेतं पत्रैश्च समलंकृतम्।
nābhau samutthitaṁ padmaṁ ravimaṇḍalasannibham| karṇikākesaropetaṁ patraiśca samalaṁkṛtam||
-नाभि से एक कमल उत्पन्न हुआ, जो सूर्यमंडल के समान था, कर्णिका और केसर से युक्त तथा पत्तों से सुशोभित था।
श्लोक 5 (skanda.5.263.5)
तत्र ब्रह्मा समुत्पन्नश्चतुर्वदनपङ्कजः। किं करोमीति देवेश आज्ञा मे दीयतां प्रभो।
tatra brahmā samutpannaścaturvadanapaṅkajaḥ| kiṁ karomīti deveśa ājñā me dīyatāṁ prabho||
वहां चतुर्मुख ब्रह्मा उत्पन्न हुए और बोले - हे देवेश! मैं क्या करूं? हे प्रभु! मुझे आज्ञा दीजिए।
श्लोक 6 (skanda.5.263.6)
एवमुक्तस्तु देवेशः शङ्खचक्रगदाधरः। उवाच मधुरां वाणीं तदा देवं पितामहम्।
evamuktastu deveśaḥ śaṅkhacakragadādharaḥ| uvāca madhurāṁ vāṇīṁ tadā devaṁ pitāmaham||
इस प्रकार पूछे जाने पर शंख-चक्र-गदाधारी देवेश (विष्णु) ने तब पितामह देव से मधुर वाणी में कहा।
श्लोक 7 (skanda.5.263.7)
सरस्वत्यां महाबाहो लोकं कुरु ममाज्ञया। भूतग्राममशेषस्य उत्पादनविधिक्षयम्।
sarasvatyāṁ mahābāho lokaṁ kuru mamājñayā| bhūtagrāmamaśeṣasya utpādanavidhikṣayam||
हे महाबाहो! मेरी आज्ञा से सरस्वती (वाणी) द्वारा लोक की रचना करो - समस्त भूतगण की उत्पत्ति और संहार की संपूर्ण विधि करो।
श्लोक 8 (skanda.5.263.8)
एतच्छ्रुतं तु वचनं पद्मनाभस्य भारत। चिन्तयामास भगवान्सप्तर्षीन्हितकाम्यया।
etacchrutaṁ tu vacanaṁ padmanābhasya bhārata| cintayāmāsa bhagavānsaptarṣīnhitakāmyayā||
हे भारत! पद्मनाभ के इस वचन को सुनकर भगवान ब्रह्मा ने हितकामना से सप्तर्षियों का चिंतन किया।
श्लोक 9 (skanda.5.263.9)
क्रमात्ते चिन्तिताः प्राज्ञाः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः। प्राचेतसो वसिष्ठश्च भृगुर्नारद एव च।
kramātte cintitāḥ prājñāḥ pulastyaḥ pulahaḥ kratuḥ| prācetaso vasiṣṭhaśca bhṛgurnārada eva ca||
क्रमशः उन प्राज्ञ ऋषियों का चिंतन हुआ - पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्राचेतस (दक्ष), वसिष्ठ, भृगु तथा नारद।
श्लोक 10 (skanda.5.263.10)
यज्ञे प्राचेतसो दक्षो महातेजाः प्रजापतिः। दक्षस्यापि तथा जाताः पञ्चाशद्दुहितरोऽनघ।
yajñe prācetaso dakṣo mahātejāḥ prajāpatiḥ| dakṣasyāpi tathā jātāḥ pañcāśadduhitaro'nagha||
यज्ञ में प्राचेतस दक्ष महातेजस्वी प्रजापति हुए। हे निष्पाप! दक्ष से भी पचास कन्याएं उत्पन्न हुईं।
श्लोक 11 (skanda.5.263.11)
ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश। तथैव स महाभागः सप्तविंशतिमिन्दवे।
dadau sa daśa dharmāya kaśyapāya trayodaśa| tathaiva sa mahābhāgaḥ saptaviṁśatimindave||
उसने दस कन्याएं धर्म को, तेरह कश्यप को दीं; तथा उसी महाभाग्यशाली ने सत्ताईस कन्याएं चंद्रमा को दीं।
श्लोक 12 (skanda.5.263.12)
रोहिणीनाम या तासां मध्ये तस्य नराधिप। अनिष्टा सर्वनारीणां भर्तुश्चैव विशेषतः।
rohiṇīnāma yā tāsāṁ madhye tasya narādhipa| aniṣṭā sarvanārīṇāṁ bhartuścaiva viśeṣataḥ||
हे नराधिप! उन्हीं में से रोहिणी नामक कन्या पति की विशेष प्रिय होने के कारण अन्य समस्त पत्नियों की ईर्ष्या का पात्र बनी।
श्लोक 13 (skanda.5.263.13)
ततः सा परमं कृत्वा वैराग्यं नृपसत्तम। आगत्य नर्मदातीरे चचार विपुलं तपः।
tataḥ sā paramaṁ kṛtvā vairāgyaṁ nṛpasattama| āgatya narmadātīre cacāra vipulaṁ tapaḥ||
तब, हे नृपसत्तम! परम वैराग्य धारण कर वह नर्मदा के तट पर आई और विपुल तप करने लगी।
श्लोक 14 (skanda.5.263.14)
एकरात्रैस्त्रिरात्रैश्च षड्द्वादशभिरेव च। पक्षमासोपवासैश्च कर्शयन्ति कलेवरम्।
ekarātraistrirātraiśca ṣaḍdvādaśabhireva ca| pakṣamāsopavāsaiśca karśayanti kalevaram||
एक रात्रि, तीन रात्रि, छह तथा बारह रात्रि के उपवासों से, तथा पक्ष और मास के उपवासों से उसने अपने शरीर को कृश कर लिया।
श्लोक 15 (skanda.5.263.15)
आराधयन्ती सततं महिषासुरनाशिनीं। देवीं भगवतीं तात सर्वार्तिविनिवारणीम्।
ārādhayantī satataṁ mahiṣāsuranāśinīṁ| devīṁ bhagavatīṁ tāta sarvārtivinivāraṇīm||
हे तात! वह निरंतर महिषासुर-नाशिनी भगवती देवी की आराधना करती रही, जो समस्त पीड़ाओं का निवारण करने वाली हैं।
श्लोक 16 (skanda.5.263.16)
स्नात्वा स्नात्वा जले नित्यं नर्मदायाः शुचिस्मिता। ततस्तुष्टा महाभागा देवी नारायणी नृप।
snātvā snātvā jale nityaṁ narmadāyāḥ śucismitā| tatastuṣṭā mahābhāgā devī nārāyaṇī nṛpa||
प्रतिदिन बार-बार नर्मदा के जल में स्नान करती हुई वह शुचिस्मिता - तब हे राजन्! महाभाग्यशाली देवी नारायणी प्रसन्न हुईं।
श्लोक 17 (skanda.5.263.17)
प्रसन्ना ते महाभागे व्रतेन नियमेन च। एतच्छ्रुत्वा तु वचनं रोहिणी शशिनः प्रिया।
prasannā te mahābhāge vratena niyamena ca| etacchrutvā tu vacanaṁ rohiṇī śaśinaḥ priyā||
देवी बोलीं - हे महाभागे! तुम्हारे व्रत और नियम से मैं प्रसन्न हूं। यह वचन सुनकर चंद्रमा की प्रिया रोहिणी -
श्लोक 18 (skanda.5.263.18)
यथा भवामि न चिरात्तथा भवतु मानदे। एवमस्त्विति सा चोक्त्वा भवानी भक्तवत्सला।
yathā bhavāmi na cirāttathā bhavatu mānade| evamastviti sā coktvā bhavānī bhaktavatsalā||
-बोली - हे मानदे! शीघ्र ही ऐसा हो कि मैं सदा वैसी ही बनी रहूं। भक्तवत्सला भवानी ने 'ऐसा ही हो' कहकर -
श्लोक 19 (skanda.5.263.19)
स्तूयमाना मुनिगणैस्तत्रैवान्तरधीयत। तदाप्रभृति तत्तीर्थं रोहिणी शशिनः प्रिया।
stūyamānā munigaṇaistatraivāntaradhīyata| tadāprabhṛti tattīrthaṁ rohiṇī śaśinaḥ priyā||
-मुनिगणों द्वारा स्तुति की जाती हुई वहीं अंतर्धान हो गईं। तभी से वह तीर्थ, चंद्रमा की प्रिया रोहिणी के नाम से -
श्लोक 20 (skanda.5.263.20)
संजाता सर्वकालं तु वल्लभा नृपसत्तम। तत्र तीर्थे तु या नारी नरो वा स्नानि भक्तितः।
saṁjātā sarvakālaṁ tu vallabhā nṛpasattama| tatra tīrthe tu yā nārī naro vā snāni bhaktitaḥ||
-हे नृपसत्तम! सदा के लिए सर्वाधिक प्रिय हो गया। उस तीर्थ में जो भी स्त्री अथवा पुरुष भक्तिपूर्वक स्नान करता है -
श्लोक 21 (skanda.5.263.21)
वल्लभा जायते सा तु भर्तुर्वै रोहिणी यथा। तत्र तीर्थे तु यः कश्चित्प्राणत्यागं करोति वै।
vallabhā jāyate sā tu bharturvai rohiṇī yathā| tatra tīrthe tu yaḥ kaścitprāṇatyāgaṁ karoti vai||
-वह रोहिणी की भांति ही अपने पति अथवा पत्नी का प्रिय बन जाता है। जो कोई उस तीर्थ में प्राणत्याग करता है -
श्लोक 22 (skanda.5.263.22)
सप्तजन्मानि दाम्पत्यवियोगो न भवेत्क्वचित्।
saptajanmāni dāmpatyaviyogo na bhavetkvacit||
-उसके लिए सात जन्मों तक दाम्पत्य का वियोग कभी नहीं होता।