अवन्ती खण्ड · अध्याय 288
कुबेरादि चतुर्तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.288.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महीपाल परं तीर्थचतुष्टयम् । येषां दर्शनमात्रेण सर्वपापक्षयो भवेत् ।
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahīpāla paraṁ tīrthacatuṣṭayam| yeṣāṁ darśanamātreṇa sarvapāpakṣayo bhavet||
श्री मार्कण्डेय बोले - हे राजन्! इसके पश्चात परम चार तीर्थों के समूह में जाना चाहिए, जिनके दर्शनमात्र से समस्त पापों का नाश हो जाता है।
श्लोक 2 (skanda.5.288.2)
कौबेरं वारुणं याम्यं वायव्यं तु ततः परम् । यत्र सिद्धा महाप्राज्ञा लोकपाला महाबलाः ।
kauberaṁ vāruṇaṁ yāmyaṁ vāyavyaṁ tu tataḥ param| yatra siddhā mahāprājñā lokapālā mahābalāḥ||
कौबेर, वारुण, याम्य और तत्पश्चात वायव्य - जहाँ महाप्राज्ञ महाबली लोकपाल सिद्ध हुए थे।
श्लोक 3 (skanda.5.288.3)
युधिष्ठिर उवाच। किमर्थं लोकपालैश्च तपश्चीर्णं पुरानघ । नर्मदातटमाश्रित्य ह्येतन्मे वक्तुमर्हसि ।
yudhiṣṭhira uvāca| kimarthaṁ lokapālaiś ca tapaś cīrṇaṁ purānagha| narmadātaṭam āśritya hy etan me vaktum arhasi||
युधिष्ठिर बोले - हे निष्पाप! लोकपालों ने नर्मदा तट का आश्रय लेकर पूर्वकाल में किस प्रयोजन से तपस्या की थी? यह मुझे बताइए।
श्लोक 4 (skanda.5.288.4)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। अधिष्ठानं समिच्छन्ति ह्यचलं निर्बले सति । संसारे सर्वभूतानां तृणबिन्दुवदस्थिरे ।
śrīmārkaṇḍeya uvāca| adhiṣṭhānaṁ samicchanti hy acalaṁ nirbale sati| saṁsāre sarvabhūtānāṁ tṛṇabinduvad asthire||
श्री मार्कण्डेय बोले - समस्त प्राणियों के इस निर्बल और तृणबिन्दु के समान अस्थिर संसार में, वे एक अचल आधार चाहते थे।
श्लोक 5 (skanda.5.288.5)
कदलीसारनिःसारे मृगतृष्णेव चञ्चले । स्थावरे जङ्गमे सर्वे भूतग्रामे चतुर्विधे ।
kadalīsāraniḥsāre mṛgatṛṣṇeva cañcale| sthāvare jaṅgame sarve bhūtagrāme caturvidhe||
यह संसार केले के तने के गूदे के समान निःसार है, मृगतृष्णा के समान चंचल है, समस्त स्थावर-जंगम चतुर्विध प्राणिसमूहों से युक्त है।
श्लोक 6 (skanda.5.288.6)
धर्मो माता पिता धर्मो धर्मो बन्धुः सुहृत्तथा । आधारः सर्वभूतानां त्रैलोक्ये सचराचरे ।
dharmo mātā pitā dharmo dharmo bandhuḥ suhṛt tathā| ādhāraḥ sarvabhūtānāṁ trailokye sacarācare||
धर्म ही माता है, धर्म ही पिता है, धर्म ही बन्धु और सुहृद है - चराचर त्रैलोक्य में समस्त प्राणियों का यही आधार है।
श्लोक 7 (skanda.5.288.7)
एवं ज्ञात्वा तु ते सर्वे लोकपालाः कृतक्षणाः । तपस्ते चक्रुरतुलं मारुताहारतत्पराः ।
evaṁ jñātvā tu te sarve lokapālāḥ kṛtakṣaṇāḥ| tapas te cakrur atulaṁ mārutāhāratatparāḥ||
यह जानकर उन सभी लोकपालों ने अवसर पाकर, केवल वायु का आहार करते हुए, अतुल तपस्या की।
श्लोक 8 (skanda.5.288.8)
ततस्तुष्टो महादेवः कृतस्यार्द्धे गते तदा । अनुरूपेण राजेन्द्र युगस्य परमेश्वरः ।
tatas tuṣṭo mahādevaḥ kṛtasyārdhe gate tadā| anurūpeṇa rājendra yugasya parameśvaraḥ||
तब हे राजेन्द्र! कृतयुग का आधा भाग बीत जाने पर परमेश्वर महादेव युग के अनुरूप रूप में प्रसन्न हुए।
श्लोक 9 (skanda.5.288.9)
वरेण छन्दयामास लोकपालान्महाबलान् । यो यमिच्छति कामं वै तं तं तस्य ददाम्यहम् ।
vareṇa chandayāmāsa lokapālān mahābalān| yo yam icchati kāmaṁ vai taṁ taṁ tasya dadāmy aham||
उन्होंने महाबली लोकपालों को वर के लिए प्रेरित किया - 'जो जो जिसे इच्छित हो, वह वह मैं उसे दूँगा।'
श्लोक 10 (skanda.5.288.10)
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य लोकपाला जगद्धिताः । वरदं प्रार्थयामासुर्देवं वरमनुत्तमम् ।
etac chrutvā vacas tasya lokapālā jagaddhitāḥ| varadaṁ prārthayāmāsur devaṁ varam anuttamam||
उनका यह वचन सुनकर जगद्धित लोकपालों ने वरदाता देव से उत्तम वर की प्रार्थना की।
श्लोक 11 (skanda.5.288.11)
कुबेर उवाच। यदि तुष्टो महादेव यदि देयो वरो मम । यक्षाणामीश्वरश्चाहं भवामि धनदस्त्विति ।
kubera uvāca| yadi tuṣṭo mahādeva yadi deyo varo mama| yakṣāṇām īśvaraś cāhaṁ bhavāmi dhanadas tviti||
कुबेर ने कहा - 'हे महादेव! यदि आप प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं, तो मैं यक्षों का ईश्वर और धनद बनूँ।'
श्लोक 12 (skanda.5.288.12)
ततः प्रोवाच देवेशं यमः संयमने रतः । तत्र प्रधानो भगवान् भवेयं सर्वजन्तुषु ।
tataḥ provāca deveśaṁ yamaḥ saṁyamane rataḥ| tatra pradhāno bhagavān bhaveyaṁ sarvajantuṣu||
तब संयमपरायण यम ने देवेश से कहा - 'हे भगवन्! मैं समस्त प्राणियों में संयमन के विषय में प्रधान बनूँ।'
श्लोक 13 (skanda.5.288.13)
वरुणोऽनन्तरं प्राह प्रणम्य तु महेश्वरम् । क्रीडेयं वारुणे लोके यादोगणसमन्वितः ।
varuṇo 'nantaraṁ prāha praṇamya tu maheśvaram| krīḍeyaṁ vāruṇe loke yādogaṇasamanvitaḥ||
तत्पश्चात वरुण ने महेश्वर को प्रणाम करके कहा - 'मैं जलचरों के समूह से युक्त होकर वारुण लोक में क्रीड़ा करूँ।'
श्लोक 14 (skanda.5.288.14)
जगादाशु ततो वायुः प्रणम्य तु महेश्वरम् । व्यापकत्वं त्रिलोकेषु प्रार्थयामास भारत ।
jagādāśu tato vāyuḥ praṇamya tu maheśvaram| vyāpakatvaṁ triloke prārthayāmāsa bhārata||
हे भारत! तत्पश्चात वायु ने शीघ्र महेश्वर को प्रणाम कर त्रिलोक में व्यापकत्व की प्रार्थना की।
श्लोक 15 (skanda.5.288.15)
तेषां यदीप्सितं काममुमया सह शङ्करः । सर्वेषां लोकपालानः दत्त्वा चादर्शनं गतः ।
teṣāṁ yad īpsitaṁ kāmam umayā saha śaṅkaraḥ| sarveṣāṁ lokapālānaḥ dattvā cādarśanaṁ gataḥ||
उमा सहित शंकर ने समस्त लोकपालों को उनकी इच्छित कामनाएँ प्रदान कर अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 16 (skanda.5.288.16)
गते महेश्वरे देवे यथास्थानं तु ते स्थिताः । स्थापना च कृता सर्वैः स्वनाम्नैव पृथक्पृथक् ।
gate maheśvare deve yathāsthānaṁ tu te sthitāḥ| sthāpanā ca kṛtā sarvaiḥ svanāmnaiva pṛthakpṛthak||
महेश्वर देव के चले जाने पर वे अपने-अपने स्थान में स्थित हो गए; और सबने अपने-अपने नाम से पृथक्-पृथक् स्थापना की।
श्लोक 17 (skanda.5.288.17)
कुबेरश्च कुबेरेशं यमश्चैव यमेश्वरम् । वरुणो वरुणेशं तु वातो वातेश्वरं नृप ।
kuberaś ca kubereśaṁ yamaś caiva yameśvaram| varuṇo varuṇeśaṁ tu vāto vāteśvaraṁ nṛpa||
हे राजन्! कुबेर ने कुबेरेश की, यम ने यमेश्वर की, वरुण ने वरुणेश की और वायु ने वातेश्वर की स्थापना की।
श्लोक 18 (skanda.5.288.18)
तर्पणं विदधुः सर्वे मन्त्रैश्च विविधैः शुभैः । सर्वे सर्वेश्वरं देव पूजयित्वा यथाविधि ।
tarpaṇaṁ vidadhuḥ sarve mantraiś ca vividhaiḥ śubhaiḥ| sarve sarveśvaraṁ deva pūjayitvā yathāvidhi||
सभी ने विविध शुभ मन्त्रों से तर्पण किया; सभी ने विधिपूर्वक सर्वेश्वर देव की पूजा करके...
श्लोक 19 (skanda.5.288.19)
आह्वयामासुस्तान् विप्रान्सर्वे सर्वेश्वरा इव । क्षान्तदान्तजितक्रोधान्सर्वभूताभयप्रदान् ।
āhvayāmāsus tān viprān sarve sarveśvarā iva| kṣāntadāntajitakrodhān sarvabhūtābhayapradān||
...सभी ने, मानो सर्वेश्वर हों, ऐसे ब्राह्मणों को आमंत्रित किया, जो क्षमाशील, संयमी, क्रोधविजयी और समस्त प्राणियों को अभय देने वाले थे,
श्लोक 20 (skanda.5.288.20)
वेदविद्याव्रतस्नातान् सर्वशास्त्रविशारदान् । ऋग्यजुःसामसंयुक्तांस्तथाथर्वविभूषितान् ।
vedavidyāvratasnātān sarvaśāstraviśāradān| ṛgyajuḥsāmasaṁyuktāṁs tathātharvavibhūṣitān||
-वेदविद्या-व्रत में स्नात, समस्त शास्त्रों में निपुण, ऋक्-यजुः-साम से युक्त तथा अथर्व से विभूषित थे।
श्लोक 21 (skanda.5.288.21)
चातुर्विध्यं तु सर्वेषां दानं दास्याम गृह्णत । एवमुक्त्वा तु सर्वेषां विप्राणां दानमुत्तमम् ।
cāturvidhyaṁ tu sarveṣāṁ dānaṁ dāsyāma gṛhṇata| evam uktvā tu sarveṣāṁ viprāṇāṁ dānam uttamam||
'हम सबको चतुर्विध दान देंगे - स्वीकार करो।' ऐसा कहकर उन्होंने समस्त ब्राह्मणों को उत्तम दान दिया।
श्लोक 22 (skanda.5.288.22)
तत्र स्थाने ददुस्तेषां भूमिदानमनुत्तमम् । यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च यावत्तिष्ठति मेदिनी ।
tatra sthāne dadus teṣāṁ bhūmidānam anuttamam| yāvac candraś ca sūryaś ca yāvat tiṣṭhati medinī||
उस स्थान पर उन्हें उत्तम भूमिदान दिया, जो चन्द्र-सूर्य और पृथ्वी के रहने तक स्थिर रहे।
श्लोक 23 (skanda.5.288.23)
तावद्दानं तु युष्माकं परिपन्थी न कश्चन । राजा वा राजतुल्यो वा लोकपालैरनुत्तमम् ।
tāvad dānaṁ tu yuṣmākaṁ paripanthī na kaścana| rājā vā rājatulyo vā lokapālair anuttamam||
'तब तक तुम्हारे इस दान का कोई विरोधी न होगा, चाहे राजा हो या राजतुल्य' - लोकपालों ने यह अनुपम दान दिया।
श्लोक 24 (skanda.5.288.24)
दत्तं लोपयते मूढः श्रूयतां तस्य यो विधिः । शोषयेद्धनदो वित्तं तस्य पापस्य भारत ।
dattaṁ lopayate mūḍhaḥ śrūyatāṁ tasya yo vidhiḥ| śoṣayed dhanado vittaṁ tasya pāpasya bhārata||
हे भारत! जो मूर्ख दिए हुए दान को छीन लेता है, उसका जो विधान है, वह सुनो - धनद उस पापी का धन सुखा देता है।
श्लोक 25 (skanda.5.288.25)
शरीरं वरुणो देवः संततीं श्वसनस्तथा । आयुर्नयति तस्याशु यमः संयमनो महान् ।
śarīraṁ varuṇo devaḥ saṁtatīṁ śvasanas tathā| āyur nayati tasyāśu yamaḥ saṁyamano mahān||
वरुण देव उसके शरीर को, वायु उसकी संतति को पीड़ित करते हैं; और महान संयमनकर्ता यम शीघ्र ही उसकी आयु हर लेते हैं।
श्लोक 26 (skanda.5.288.26)
निःशेषं भस्मसात्कृत्वा हुतभुग्याति भारत । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन ब्राह्मणेभ्यो युधिष्ठिर । भक्तिः कार्या नृपैः सर्वैरिच्छद्भिः श्रेय आत्मनः ।
niḥśeṣaṁ bhasmasāt kṛtvā hutabhug yāti bhārata| tasmāt sarvaprayatnena brāhmaṇebhyo yudhiṣṭhira| bhaktiḥ kāryā nṛpaiḥ sarvair icchadbhiḥ śreya ātmanaḥ||
हे भारत! अग्नि उसे पूर्णतः भस्म कर देता है। इसलिए हे युधिष्ठिर! अपने कल्याण की इच्छा रखने वाले समस्त राजाओं को सर्वप्रयत्न से ब्राह्मणों के प्रति भक्ति करनी चाहिए।
श्लोक 27 (skanda.5.288.27)
राजा वृक्षो ब्राह्मणास्तस्य मूलं भृत्याः पर्णा मन्त्रिणस्तस्य शाखाः । तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं मूले गुप्ते नास्ति वृक्षस्य नाशः ।
rājā vṛkṣo brāhmaṇās tasya mūlaṁ bhṛtyāḥ parṇā mantriṇas tasya śākhāḥ| tasmān mūlaṁ yatnato rakṣaṇīyaṁ mūle gupte nāsti vṛkṣasya nāśaḥ||
राजा वृक्ष है, ब्राह्मण उसकी जड़ हैं, सेवक पत्ते हैं, मंत्री उसकी शाखाएँ हैं; इसलिए जड़ की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए - जड़ सुरक्षित रहने पर वृक्ष का नाश नहीं होता।
श्लोक 28 (skanda.5.288.28)
षष्टिवर्षसहस्राणि स्वर्गे तिष्ठति भूमिदः । आच्छेत्ता चावमन्ता च तान्येव नरके वसेत् ।
ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi svarge tiṣṭhati bhūmidaḥ| ācchettā cāvamantā ca tāny eva narake vaset||
भूमिदान करने वाला साठ सहस्र वर्षों तक स्वर्ग में रहता है; उसे छीनने वाला और उसका अपमान करने वाला उतने ही वर्षों तक नरक में रहता है।
श्लोक 29 (skanda.5.288.29)
स्वदत्ता परदत्ता वा पालनीया वसुंधरा । यस्य यस्य यदा भूमिस्तस्य तस्य तदा फलम् ।
svadattā paradattā vā pālanīyā vasundharā| yasya yasya yadā bhūmis tasya tasya tadā phalam||
चाहे स्वयं दी हो या दूसरे की दी हुई, भूमि की रक्षा करनी चाहिए; जिस-जिस के पास जब-जब भूमि होती है, उसे तब-तब उसका फल मिलता है।
श्लोक 30 (skanda.5.288.30)
देवताज्ञामनुस्मृत्य राजानो येऽपि तां नृप । पालयिष्यन्ति सततं तेषां वासस्त्रिविष्टपे ।
devatājñām anusmṛtya rājāno ye 'pi tāṁ nṛpa| pālayiṣyanti satataṁ teṣāṁ vāsas triviṣṭape||
हे राजन्! जो राजा देवाज्ञा का स्मरण कर सतत उसकी रक्षा करेंगे, उनका निवास स्वर्ग में होगा।
श्लोक 31 (skanda.5.288.31)
स्वदत्ता परदत्ता वा यत्नाद्रक्ष्या युधिष्ठिर । मही महीक्षिता नित्यं दानाच्छ्रेयोऽनुपालनम् ।
svadattā paradattā vā yatnād rakṣyā yudhiṣṭhira| mahī mahīkṣitā nityaṁ dānāc chreyo 'nupālanam||
हे युधिष्ठिर! स्वयं दी हो या दूसरे की दी हुई, पृथ्वी की सदा राजाओं द्वारा यत्नपूर्वक रक्षा होनी चाहिए; दान से भी श्रेष्ठ है उसका अनुपालन।
श्लोक 32 (skanda.5.288.32)
आयुर्यशो बलं वित्तं संततिश्चाक्षया नृप । तेषां भविष्यते नूनं ये प्रजापालने रताः ।
āyur yaśo balaṁ vittaṁ saṁtatiś cākṣayā nṛpa| teṣāṁ bhaviṣyate nūnaṁ ye prajāpālane ratāḥ||
हे राजन्! जो प्रजापालन में रत रहते हैं, उन्हें निश्चय ही आयु, यश, बल, धन और अक्षय संतति प्राप्त होती है।
श्लोक 33 (skanda.5.288.33)
एवमुक्त्वा तु तान् सर्वांल्लोकपालान् द्विजोत्तमान् । पूजयित्वा विधानेन प्रणिपत्य व्यसर्जयन् ।
evam uktvā tu tān sarvāṁl lokapālān dvijottamān| pūjayitvā vidhānena praṇipatya vyasarjayan||
ऐसा कहकर लोकपालों ने उन सभी द्विजोत्तमों की विधिपूर्वक पूजा करके और प्रणाम करके उन्हें विदा किया।
श्लोक 34 (skanda.5.288.34)
गतेषु विप्रमुख्येषु स्नात्वा हुतहुताशनाः । लोकपालाः क्षुधाविष्टाः पर्यटन्भैक्षमात्मनः ।
gateṣu vipramukhyeṣu snātvā hutahutāśanāḥ| lokapālāḥ kṣudhāviṣṭāḥ paryaṭan bhaikṣam ātmanaḥ||
प्रमुख ब्राह्मणों के चले जाने पर, स्नान और हवन करके, क्षुधाग्रस्त लोकपाल अपने लिए भिक्षा माँगते हुए घूमने लगे।
श्लोक 35 (skanda.5.288.35)
अस्थिचर्मावशेषाङ्गाः कपालोद्धृतपाणयः । अलब्धग्रासमर्द्धार्धं निर्ययुर्नगराद्बहिः ।
asthicarmāvaśeṣāṅgāḥ kapālodddhṛtapāṇayaḥ| alabdhagrāsam ardhārdhaṁ niryayur nagarād bahiḥ||
अस्थि-चर्ममात्र शेष अंगों वाले, हाथों में कपाल-पात्र लिए, आधा ग्रास भी न पाकर वे नगर से बाहर निकल गए।
श्लोक 36 (skanda.5.288.36)
शापं दत्त्वा तदा क्रोधाद्ब्राह्मणाय युधिष्ठिर । दरिद्राः सततं मूर्खा भवेयुश्च ययुर्गृहान् ।
śāpaṁ dattvā tadā krodhād brāhmaṇāya yudhiṣṭhira| daridrāḥ satataṁ mūrkhā bhaveyuś ca yayur gṛhān||
हे युधिष्ठिर! तब क्रोध में आकर उन्होंने ब्राह्मण को शाप दिया - 'वे सदा दरिद्र और मूर्ख बने रहें' - और अपने-अपने घर चले गए।
श्लोक 37 (skanda.5.288.37)
तदाप्रभृति ते सर्वे ब्राह्मणा धनवर्जिताः । शापदोषेण कौबेर्यां संजाता दुःखभाजनाः ।
tadāprabhṛti te sarve brāhmaṇā dhanavarjitāḥ| śāpadoṣeṇa kauberyāṁ saṁjātā duḥkhabhājanāḥ||
तभी से वे सभी ब्राह्मण धनहीन हो गए; कौबेर तीर्थ में लगे उस शाप के दोष से वे दुःखभागी हो गए।
श्लोक 38 (skanda.5.288.38)
न धनं पैतृकं पुत्रैर्न पिता पुत्रपौत्रिकम् । भुञ्जते सकलं कालमित्येवं शङ्करोऽब्रवीत् ।
na dhanaṁ paitṛkaṁ putrair na pitā putrapautrikam| bhuñjate sakalaṁ kālam ity evaṁ śaṅkaro 'bravīt||
न पुत्र पैतृक धन भोगते हैं और न पिता पुत्र-पौत्रों का धन, सर्वकाल यही स्थिति रहती है - ऐसा शंकर ने कहा।
श्लोक 39 (skanda.5.288.39)
कुबेरेशे नरः स्नात्वा यस्तु पूजयते शिवम् । गन्धधूपनमस्कारैः सोऽश्वमेधफलं लभेत् ।
kubereśe naraḥ snātvā yas tu pūjayate śivam| gandhadhūpanamaskāraiḥ so 'śvamedhaphalaṁ labhet||
कुबेरेश में स्नान कर जो गन्ध-धूप और नमस्कार से शिव की पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 40 (skanda.5.288.40)
यमतीर्थे तु यः स्नात्वा सम्पश्यति यमेश्वरम् । सर्वपापैः प्रमुच्येत सप्तजन्मान्तरार्जितैः ।
yamatīrthe tu yaḥ snātvā sampaśyati yameśvaram| sarvapāpaiḥ pramucyeta saptajanmāntarārjitaiḥ||
यमतीर्थ में स्नान कर जो यमेश्वर का दर्शन करता है, वह सात जन्मों में अर्जित समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 41 (skanda.5.288.41)
पूर्णमास्याममावास्यां स्नात्वा तु पितृतर्पणम् । यः करोति तिलैः स्नानं तस्य पुण्यफलं शृणु ।
pūrṇamāsyām amāvāsyāṁ snātvā tu pitṛtarpaṇam| yaḥ karoti tilaiḥ snānaṁ tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu||
पूर्णिमा अथवा अमावस्या को स्नान कर जो पितृतर्पण करता है और तिलों से स्नान करता है, उसका पुण्यफल सुनो।
श्लोक 42 (skanda.5.288.42)
सुतृप्तास्तेन तोयेन पितरश्च पितामहाः । स्वर्गस्था द्वादशाब्दानि क्रीडन्ति प्रपितामहाः ।
sutṛptās tena toyena pitaraś ca pitāmahāḥ| svargasthā dvādaśābdāni krīḍanti prapitāmahāḥ||
उस जल से पिता, पितामह और प्रपितामह पूर्णतः तृप्त होकर स्वर्ग में बारह वर्षों तक क्रीड़ा करते हैं।
श्लोक 43 (skanda.5.288.43)
वरुणेशे नरः स्नात्वा ह्यर्चयित्वा महेश्वरम् । वाजपेयस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति पुष्कलम् ।
varuṇeśe naraḥ snātvā hy arcayitvā maheśvaram| vājapeyasya yajñasya phalaṁ prāpnoti puṣkalam||
वरुणेश में स्नान कर जो महेश्वर की पूजा करता है, वह वाजपेय यज्ञ का प्रचुर फल प्राप्त करता है।
श्लोक 44 (skanda.5.288.44)
मृतां कालेन महता लोके यत्र जलेश्वरः । स गच्छेत्तत्र यानेन गीयमानोऽप्सरोगणैः ।
mṛtāṁ kālena mahatā loke yatra jaleśvaraḥ| sa gacchet tatra yānena gīyamāno 'psarogaṇaiḥ||
जहाँ जलेश्वर विराजते हैं, वहाँ दीर्घकाल पश्चात मृत्यु प्राप्त करने वाला अप्सराओं द्वारा गाया जाता हुआ विमान द्वारा वहाँ जाता है।
श्लोक 45 (skanda.5.288.45)
वातेश्वरे नरः स्नात्वा सम्पूज्य च महेश्वरम् । जायते कृतकृत्योऽसौ लोकपालानवेक्षयन् ।
vāteśvare naraḥ snātvā sampūjya ca maheśvaram| jāyate kṛtakṛtyo 'sau lokapālān avekṣayan||
वातेश्वर में स्नान कर जो महेश्वर की सम्यक् पूजा करता है, वह लोकपालों का दर्शन करते हुए कृतकृत्य हो जाता है।
श्लोक 46 (skanda.5.288.46)
किं तस्य बहुभिर्यज्ञैर्दानैर्वा बहुदक्षिणैः । स्नात्वा चतुष्टये लोके अवाप्तं जन्मनः फलम् ।
kiṁ tasya bahubhir yajñair dānair vā bahudakṣiṇaiḥ| snātvā catuṣṭaye loke avāptaṁ janmanaḥ phalam||
जिसने इस चतुष्टय में स्नान करके अपने जन्म का फल पा लिया, उसे बहुदक्षिणा वाले अनेक यज्ञों या दानों से क्या प्रयोजन?
श्लोक 47 (skanda.5.288.47)
ते धन्यास्ते महात्मानस्तेषां जन्म सुजीवितम् । नित्यं वसन्ति कौरिल्यां लोकपालान्निमन्त्र्य ये ।
te dhanyās te mahātmānas teṣāṁ janma sujīvitam| nityaṁ vasanti kaurilyāṁ lokapālān nimantrya ye||
वे धन्य हैं, वे महात्मा हैं, उनका जन्म सफल है, जो लोकपालों को आमंत्रित करके सदा कौरिल्य (कौबेर तीर्थ के इस स्थल) में निवास करते हैं।
श्लोक 48 (skanda.5.288.48)
एतत्पुण्यं पापहरं धन्यमायुर्विवर्धनम् । पठतां शृण्वतां चैव सर्वपापक्षयो भवेत् ।
etat puṇyaṁ pāpaharaṁ dhanyam āyurvivardhanam| paṭhatāṁ śṛṇvatāṁ caiva sarvapāpakṣayo bhavet||
यह पुण्यदायी, पापहारी, धन्यकारी और आयुवर्धक है; पढ़ने वालों और सुनने वालों के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।