अवन्ती खण्ड · अध्याय 310
चाणक्य सिद्धि-प्राप्ति वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.310.1)
अतः परं प्रवक्ष्यामि सर्वतीर्थादनुत्तमम्। उत्तरे नर्मदाकूले शुक्लतीर्थं युधिष्ठिर॥
ataḥ paraṁ pravakṣyāmi sarvatīrthādanuttamam| uttare narmadākūle śuklatīrthaṁ yudhiṣṭhira||
श्रीमार्कण्डेय बोले - हे युधिष्ठिर! अब मैं समस्त तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ तीर्थ का वर्णन करूँगा - नर्मदा के उत्तरी तट पर स्थित शुक्लतीर्थ का।
श्लोक 2 (skanda.5.310.2)
तस्य तीर्थस्य चान्यानि पुण्यत्वाच्छुभदर्शनात्। पृथिव्यां सर्वतीर्थानि कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥
tasya tīrthasya cānyāni puṇyatvācchubhadarśanāt| pṛthivyāṁ sarvatīrthāni kalāṁ nārhanti ṣoḍaśīm||
उस तीर्थ की पवित्रता और शुभ दर्शन के कारण, पृथ्वी के अन्य समस्त तीर्थ उसकी सोलहवीं कला के भी योग्य नहीं हैं।
श्लोक 3 (skanda.5.310.3)
युधिष्ठिर उवाच। तस्य तीर्थस्य माहात्म्यं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः। भ्रातृभिः सहितः सर्वैस्तथान्यैर्द्विजसत्तमैः॥
yudhiṣṭhira uvāca| tasya tīrthasya māhātmyaṁ śrotumicchāmi tattvataḥ| bhrātṛbhiḥ sahitaḥ sarvaistathānyairdvijasattamaiḥ||
युधिष्ठिर बोले - मैं अपने समस्त भाइयों तथा अन्य श्रेष्ठ ब्राह्मणों के साथ उस तीर्थ की महिमा को यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 4 (skanda.5.310.4)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। शुक्लतीर्थस्य चोत्पत्तिमाकर्णय नरेश्वर। यस्य संदर्शनादेव ब्रह्महत्या प्रलीयते॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| śuklatīrthasya cotpattimākarṇaya nareśvara| yasya saṁdarśanādeva brahmahatyā pralīyate||
श्रीमार्कण्डेय बोले - हे नरेश्वर! शुक्लतीर्थ की उत्पत्ति को सुनो, जिसके दर्शनमात्र से ब्रह्महत्या का पाप भी नष्ट हो जाता है।
श्लोक 5 (skanda.5.310.5)
नर्मदा सरितां श्रेष्ठा सर्वपापप्रणाशिनी। यच्च बाल्यं कृतं पापं दर्शनादेव नश्यति॥
narmadā saritāṁ śreṣṭhā sarvapāpapraṇāśinī| yacca bālyaṁ kṛtaṁ pāpaṁ darśanādeva naśyati||
नर्मदा नदियों में श्रेष्ठ है, समस्त पापों का नाश करने वाली है; बचपन में किया गया पाप भी उसके दर्शनमात्र से नष्ट हो जाता है।
श्लोक 6 (skanda.5.310.6)
मोक्षदानि न सर्वत्र शुक्लतीर्थमृते नृप। शुक्लतीर्थस्य माहात्म्यं पुराणे यच्छ्रुतं मया॥
mokṣadāni na sarvatra śuklatīrthamṛte nṛpa| śuklatīrthasya māhātmyaṁ purāṇe yacchrutaṁ mayā||
हे राजन्! शुक्लतीर्थ के बिना अन्यत्र सर्वत्र मोक्षदायिनी स्थान नहीं हैं। शुक्लतीर्थ की जो महिमा मैंने पुराण में सुनी है,
श्लोक 7 (skanda.5.310.7)
समागमे मुनीनां तु देवानां हि तथैव च। कथितं देवदेवेन शितिकण्ठेन भारत। कैलासे पर्वतश्रेष्ठे तत्ते संकथयाम्यहम्॥
samāgame munīnāṁ tu devānāṁ hi tathaiva ca| kathitaṁ devadevena śitikaṇṭhena bhārata| kailāse parvataśreṣṭhe tatte saṁkathayāmyaham||
- मुनियों और देवताओं के समागम में, हे भारत! देवाधिदेव शितिकण्ठ (शिव) द्वारा पर्वतश्रेष्ठ कैलास पर कही गई थी, वही मैं तुम्हें सुनाता हूँ।
श्लोक 8 (skanda.5.310.8)
पुरा कृतयुगस्यादौ तोषितुं गिरिजापतिम्। तपश्चचार विपुलं विष्णुर्वर्षसहस्रकम्। वायुभक्षो निराहारः शुक्लतीर्थे व्यवस्थितः॥
purā kṛtayugasyādau toṣituṁ girijāpatim| tapaścacāra vipulaṁ viṣṇurvarṣasahasrakam| vāyubhakṣo nirāhāraḥ śuklatīrthe vyavasthitaḥ||
पूर्वकाल में कृतयुग के आरम्भ में गिरिजापति (शिव) को संतुष्ट करने के लिए विष्णु ने शुक्लतीर्थ में स्थित होकर, केवल वायु का भक्षण करते हुए, निराहार रहकर, एक सहस्र वर्ष तक विशाल तप किया।
श्लोक 9 (skanda.5.310.9)
ततः प्रत्यक्षतामागाद्देवदेवो महेश्वरः। प्रादुर्भूतस्तु सहसा तत्र तीर्थे नराधिप॥
tataḥ pratyakṣatāmāgāddevadevo maheśvaraḥ| prādurbhūtastu sahasā tatra tīrthe narādhipa||
तब देवताओं के देव महेश्वर प्रत्यक्ष हुए, हे राजन्! वे सहसा उस तीर्थ में प्रकट हो गए।
श्लोक 10 (skanda.5.310.10)
क्रोशद्वयमिदं चक्रे भुक्तिमुक्तिप्रदायकम्। तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा मुच्यते सर्वकिल्बिषैः॥
krośadvayamidaṁ cakre bhuktimuktipradāyakam| tasmiṁstīrthe naraḥ snātvā mucyate sarvakilbiṣaiḥ||
उन्होंने इस दो कोस के क्षेत्र को भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला बना दिया। उस तीर्थ में स्नान करके मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 11 (skanda.5.310.11)
गङ्गा कनखले पुण्या कुरुक्षेत्रे सरस्वती। ग्रामे वा यदि वारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा॥
gaṅgā kanakhale puṇyā kurukṣetre sarasvatī| grāme vā yadi vāraṇye puṇyā sarvatra narmadā||
गंगा कनखल में पवित्र है, सरस्वती कुरुक्षेत्र में; परन्तु नर्मदा ग्राम में हो या वन में, सर्वत्र ही पवित्र है।
श्लोक 12 (skanda.5.310.12)
सर्वौषधीनामशनं प्रधानं सर्वेषु पेयेषु जलं प्रधानम्। निद्रा सुखानां प्रमदा रतीनां सर्वेषु गात्रेषु शिरः प्रधानम्॥
sarvauṣadhīnāmaśanaṁ pradhānaṁ sarveṣu peyeṣu jalaṁ pradhānam| nidrā sukhānāṁ pramadā ratīnāṁ sarveṣu gātreṣu śiraḥ pradhānam||
समस्त औषधियों में अन्न प्रधान है, समस्त पेय पदार्थों में जल प्रधान है, समस्त सुखों में निद्रा प्रधान है, समस्त रतियों में स्त्री प्रधान है, और समस्त अंगों में शिर प्रधान है।
श्लोक 13 (skanda.5.310.13)
स्नातस्यापि यथा पुण्यं ललाटं नृपसत्तम। शुक्लतीर्थं तथा पुण्यं नर्मदायां युधिष्ठिर॥
snātasyāpi yathā puṇyaṁ lalāṭaṁ nṛpasattama| śuklatīrthaṁ tathā puṇyaṁ narmadāyāṁ yudhiṣṭhira||
हे नृपसत्तम! जैसे स्नान किए हुए मनुष्य में भी ललाट पुण्यमय अंग है, वैसे ही हे युधिष्ठिर! नर्मदा में शुक्लतीर्थ पुण्यमय है।
श्लोक 14 (skanda.5.310.14)
सरितां च यथा गङ्गा देवतानां जनार्दनः। शुक्लतीर्थं तथा पुण्यं नर्मदायां व्यवस्थितम्॥
saritāṁ ca yathā gaṅgā devatānāṁ janārdanaḥ| śuklatīrthaṁ tathā puṇyaṁ narmadāyāṁ vyavasthitam||
जैसे नदियों में गंगा और देवताओं में जनार्दन (विष्णु) श्रेष्ठ हैं, वैसे ही नर्मदा में स्थित शुक्लतीर्थ पुण्यमय है।
श्लोक 15 (skanda.5.310.15)
चतुष्पदानां सुरभिर्वर्णानां ब्राह्मणो यथा। प्रधानं सर्वतीर्थानां शुक्लतीर्थं तथा नृप॥
catuṣpadānāṁ surabhirvarṇānāṁ brāhmaṇo yathā| pradhānaṁ sarvatīrthānāṁ śuklatīrthaṁ tathā nṛpa||
जैसे चतुष्पदों में सुरभि (कामधेनु) और वर्णों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है, हे राजन्! वैसे ही समस्त तीर्थों में शुक्लतीर्थ प्रधान है।
श्लोक 16 (skanda.5.310.16)
ग्रहाणां तु यथादित्यो नक्षत्राणां यथा शशी। शिरो वा सर्वगात्राणां धर्माणां सत्यमिष्यते॥
grahāṇāṁ tu yathādityo nakṣatrāṇāṁ yathā śaśī| śiro vā sarvagātrāṇāṁ dharmāṇāṁ satyamiṣyate||
जैसे ग्रहों में सूर्य, नक्षत्रों में चन्द्रमा, तथा समस्त अंगों में शिर श्रेष्ठ माना जाता है, और धर्मों में सत्य श्रेष्ठ माना जाता है -
श्लोक 17 (skanda.5.310.17)
तथैव पार्थ तीर्थानां शुक्लतीर्थमनुत्तमम्। दुर्विज्ञेयो यथा लोके परमात्मा सनातनः॥
tathaiva pārtha tīrthānāṁ śuklatīrthamanuttamam| durvijñeyo yathā loke paramātmā sanātanaḥ||
- हे पार्थ! उसी प्रकार तीर्थों में शुक्लतीर्थ सर्वश्रेष्ठ है। जैसे संसार में सनातन परमात्मा को जानना अत्यन्त कठिन है,
श्लोक 18 (skanda.5.310.18)
सुसूक्ष्मत्वादनिर्देश्यः शुक्लतीर्थं तथा नृप। मन्दप्रज्ञत्वमापन्ने महामोहसमन्वितः॥
susūkṣmatvādanirdeśyaḥ śuklatīrthaṁ tathā nṛpa| mandaprajñatvamāpanne mahāmohasamanvitaḥ||
अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण अनिर्देश्य है, हे राजन्! वैसे ही शुक्लतीर्थ भी है। मन्दबुद्धि तथा महामोह से युक्त हुआ -
श्लोक 19 (skanda.5.310.19)
शुक्लतीर्थं ना जानाति नर्मदातटसंस्थितम्। बहुनात्र किमुक्तेन धर्मपुत्र पुनः पुनः॥
śuklatīrthaṁ nā jānāti narmadātaṭasaṁsthitam| bahunātra kimuktena dharmaputra punaḥ punaḥ||
- नर्मदा के तट पर स्थित शुक्लतीर्थ को नहीं जान पाता। हे धर्मपुत्र! यहाँ बार-बार अधिक कहने से क्या लाभ?
श्लोक 20 (skanda.5.310.20)
शुक्लतीर्थं महापुण्यं सम्प्राप्तं कल्मषक्षयात्। योऽत्र दत्ते शुचिर्भूत्वा एकं रेवाजलाञ्जलिम्॥
śuklatīrthaṁ mahāpuṇyaṁ samprāptaṁ kalmaṣakṣayāt| yo'tra datte śucirbhūtvā ekaṁ revājalāñjalim||
शुक्लतीर्थ महापुण्यमय है, पापों के क्षय से ही उसकी प्राप्ति होती है। जो यहाँ पवित्र होकर रेवा के जल की एक अंजलि देता है -
श्लोक 21 (skanda.5.310.21)
कल्पकोटिसहस्राणि पितरस्तेन तर्पिताः॥
kalpakoṭisahasrāṇi pitarastena tarpitāḥ||
- उसके द्वारा पितर करोड़ों-हज़ारों कल्पों तक तृप्त हो जाते हैं।
श्लोक 22 (skanda.5.310.22)
एकः पुत्रो धरापृष्ठे पितॄणामार्तिनाशनः। चाणक्यो नाम राजाभूच्छुक्लतीर्थं च वेद सः॥
ekaḥ putro dharāpṛṣṭhe pitṝṇāmārtināśanaḥ| cāṇakyo nāma rājābhūcchuklatīrthaṁ ca veda saḥ||
पृथ्वीतल पर एक ही ऐसा पुत्र है जो पितरों की पीड़ा का नाशक है - चाणक्य नामक राजा हुआ, जो शुक्लतीर्थ को जानता था।
श्लोक 23 (skanda.5.310.23)
युधिष्ठिर उवाच। कोऽसौ द्विजवरश्रेष्ठ चाणक्यो नाम नामतः। शुक्लतीर्थस्य यो वेत्ता नान्यो वेत्ता हि कश्चन॥
yudhiṣṭhira uvāca| ko'sau dvijavaraśreṣṭha cāṇakyo nāma nāmataḥ| śuklatīrthasya yo vettā nānyo vettā hi kaścana||
युधिष्ठिर बोले - हे श्रेष्ठ द्विजवर! वह चाणक्य नाम का कौन था, जो शुक्लतीर्थ का ज्ञाता था, जबकि उसे अन्य कोई नहीं जानता था?
श्लोक 24 (skanda.5.310.24)
केनोपायेन तत्तीर्थं तेन ज्ञातं धरातले। तदहं श्रोतुमिच्छामि परं कौतूहलं हि मे॥
kenopāyena tattīrthaṁ tena jñātaṁ dharātale| tadahaṁ śrotumicchāmi paraṁ kautūhalaṁ hi me||
किस उपाय से उसने पृथ्वीतल पर उस तीर्थ को जाना? मुझे इसे सुनने की बड़ी उत्कण्ठा है, यह मैं सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 25 (skanda.5.310.25)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। इक्ष्वाकुप्रभवो राजा नप्ता शुद्धोदनस्य च। चाणक्यो नाम राजर्षिर्बुभुजे पृथिवीमिमाम्॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| ikṣvākuprabhavo rājā naptā śuddhodanasya ca| cāṇakyo nāma rājarṣirbubhuje pṛthivīmimām||
श्रीमार्कण्डेय बोले - इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न, शुद्धोदन का पौत्र, चाणक्य नामक राजर्षि इस पृथ्वी का शासन करता था।
श्लोक 26 (skanda.5.310.26)
विक्रान्तो मतिमाञ्छूरः सर्वलोकैरवञ्चितः। वञ्चितः सहसा धूर्तवायसाभ्यां नृपोत्तमः॥
vikrānto matimāñchūraḥ sarvalokairavañcitaḥ| vañcitaḥ sahasā dhūrtavāyasābhyāṁ nṛpottamaḥ||
वह पराक्रमी, बुद्धिमान्, शूरवीर तथा समस्त लोक द्वारा निष्कपट माना जाता था; किन्तु वह श्रेष्ठ राजा दो धूर्त कौओं द्वारा सहसा छला गया।
श्लोक 27 (skanda.5.310.27)
युधिष्ठिर उवाच। कथं स वञ्चितो राजा वायसाभ्यां कुतोऽथवा। पुरा येन प्रतिज्ञातं धीगर्भेण महात्मना॥
yudhiṣṭhira uvāca| kathaṁ sa vañcito rājā vāyasābhyāṁ kuto'thavā| purā yena pratijñātaṁ dhīgarbheṇa mahātmanā||
युधिष्ठिर बोले - वह राजा कौओं द्वारा किस प्रकार और क्यों छला गया, जिस बुद्धिमान महात्मा ने पहले यह प्रतिज्ञा की थी कि -
श्लोक 28 (skanda.5.310.28)
न जीवे वञ्चितोऽन्येन प्राणांस्त्यक्ष्ये न संशयः। एतन्मे वद विप्रेन्द्र परं कौतूहलं मम॥
na jīve vañcito'nyena prāṇāṁstyakṣye na saṁśayaḥ| etanme vada viprendra paraṁ kautūhalaṁ mama||
"यदि किसी अन्य के द्वारा छला जाऊँ तो मैं जीवित न रहूँगा, निःसन्देह अपने प्राण त्याग दूँगा।" हे विप्रेन्द्र! यह मुझसे कहिए, मुझे बड़ी उत्कण्ठा है।
श्लोक 29 (skanda.5.310.29)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। आत्मानं वञ्चितं ज्ञात्वा तदा संगृह्य वायसौ। प्रेषयामास तीव्रेण दण्डेन यमसादनम्॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| ātmānaṁ vañcitaṁ jñātvā tadā saṁgṛhya vāyasau| preṣayāmāsa tīvreṇa daṇḍena yamasādanam||
श्रीमार्कण्डेय बोले - स्वयं को छला गया जानकर, उसने तब दोनों कौओं को पकड़कर, कठोर दण्ड देते हुए, उन्हें यमलोक भेजने का निश्चय किया।
श्लोक 30 (skanda.5.310.30)
वायसावूचतुः। सुन्दोपसुन्दयोः पुत्रावावां काकत्वमागतौ। मा वधीस्त्वं महाभाग कस्मिंश्चित्कारणान्तरे॥
vāyasāvūcatuḥ| sundopasundayoḥ putrāvāvāṁ kākatvamāgatau| mā vadhīstvaṁ mahābhāga kasmiṁścitkāraṇāntare||
दोनों कौए बोले - हे महाभाग! हम सुन्द और उपसुन्द के पुत्र हैं, जो कौए की योनि को प्राप्त हुए हैं। किसी कारणवश आप हमें मत मारिए।
श्लोक 31 (skanda.5.310.31)
तावावां कृतसंकल्पौ त्वया कोपेन मानद। निरस्तावनिरस्तौ वा यास्यावः परमां गतिम्॥
tāvāvāṁ kṛtasaṁkalpau tvayā kopena mānada| nirastāvanirastau vā yāsyāvaḥ paramāṁ gatim||
हे मानद! क्रोधवश आपने हम दोनों को यह संकल्प दिला दिया है कि निरस्त हों या न हों, हम परम गति को प्राप्त होंगे।
श्लोक 32 (skanda.5.310.32)
तदादेशय राजेन्द्र कृत्वा तव महत्प्रियम्। मुक्तशापौ भविष्यावो ब्रह्मणो वचनं तथा॥
tadādeśaya rājendra kṛtvā tava mahatpriyam| muktaśāpau bhaviṣyāvo brahmaṇo vacanaṁ tathā||
अतः हे राजेन्द्र! आज्ञा दीजिए, हम आपका महान् प्रिय कार्य करके तथा ब्रह्मा के वचन के अनुसार शापमुक्त हो जाएँगे।
श्लोक 33 (skanda.5.310.33)
तच्छ्रुत्वा काकवचनं चाणक्यो नृपसत्तमः। नाहं जीवे विदित्वैवं वञ्चितः केन कर्हिचित्॥
tacchrutvā kākavacanaṁ cāṇakyo nṛpasattamaḥ| nāhaṁ jīve viditvaivaṁ vañcitaḥ kena karhicit||
कौओं का यह वचन सुनकर श्रेष्ठ राजा चाणक्य ने कहा - "यह जानकर कि मैं किसी के द्वारा भी छला गया हूँ, मैं जीवित नहीं रहूँगा।
श्लोक 34 (skanda.5.310.34)
तस्मात्तीर्थं विजानीतं यमस्य सदने द्विजौ। प्रेषयामि यथान्यायं श्रुत्वा तत्कथयिष्यथः॥
tasmāttīrthaṁ vijānītaṁ yamasya sadane dvijau| preṣayāmi yathānyāyaṁ śrutvā tatkathayiṣyathaḥ||
अतः हे द्विजो! मैं तुम्हें यमलोक भेजता हूँ, वहाँ जाकर उचित रीति से वह तीर्थ जान लो और सुनकर मुझे कहना।"
श्लोक 35 (skanda.5.310.35)
तेनैव मुक्तौ तौ काकौ स्रक्चन्दनविभूषितौ। शीघ्रगौ प्रेषयामास यमस्य सदनं प्रति॥
tenaiva muktau tau kākau srakcandanavibhūṣitau| śīghragau preṣayāmāsa yamasya sadanaṁ prati||
उसी ने उन दोनों कौओं को छोड़कर, माला-चन्दन से विभूषित करके, यमलोक की ओर शीघ्रगामी बनाकर भेज दिया।
श्लोक 36 (skanda.5.310.36)
राजोवाच। तत्र धर्मपुरं गत्वा विचरन्तावितस्ततः। यदि पृच्छति धर्मात्मा यमः संयमनो महान्॥
rājovāca| tatra dharmapuraṁ gatvā vicarantāvitastataḥ| yadi pṛcchati dharmātmā yamaḥ saṁyamano mahān||
राजा बोला - वहाँ धर्मपुर में जाकर इधर-उधर विचरण करते हुए, यदि धर्मात्मा महान् संयमन यमराज पूछें -
श्लोक 37 (skanda.5.310.37)
कुतो वामागतं ब्रूतं केन वा भूषितावुभौ। मदीया भारती तस्य कथनीया ह्यशङ्कितम्॥
kuto vāmāgataṁ brūtaṁ kena vā bhūṣitāvubhau| madīyā bhāratī tasya kathanīyā hyaśaṅkitam||
- "तुम दोनों कहाँ से आए हो और किसने तुम्हें विभूषित किया है?" - तो निःशंक होकर उन्हें मेरा वचन कहना।
श्लोक 38 (skanda.5.310.38)
इक्ष्वाकुसंभवो राजा चाणक्यो नाम धार्मिकः। द्वादशाहे मृतस्यास्य तर्पितावशनादिना॥
ikṣvākusaṁbhavo rājā cāṇakyo nāma dhārmikaḥ| dvādaśāhe mṛtasyāsya tarpitāvaśanādinā||
इक्ष्वाकुवंशी धर्मात्मा राजा चाणक्य के, द्वादशाह श्राद्ध में मृतक के निमित्त अन्नादि से हम दोनों तृप्त किए गए हैं।
श्लोक 39 (skanda.5.310.39)
तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञो गतौ तौ यमसादनम्। क्रीडितौ प्राङ्गणे तस्य स्रक्चन्दनविभूषितौ। धर्मराजेन तौ दृष्टौ पृष्टौ धृष्टौ च वायसौ॥
tacchrutvā vacanaṁ rājño gatau tau yamasādanam| krīḍitau prāṅgaṇe tasya srakcandanavibhūṣitau| dharmarājena tau dṛṣṭau pṛṣṭau dhṛṣṭau ca vāyasau||
राजा का यह वचन सुनकर वे दोनों यमलोक गए, और यमराज के आँगन में माला-चन्दन से विभूषित होकर क्रीड़ा करने लगे। धर्मराज ने उन ढीठ कौओं को देखकर उनसे पूछा।
श्लोक 40 (skanda.5.310.40)
यम उवाच। कुतः स्थानात्समायातौ केन वा भूषितावुभौ। वृत्तं वै कथ्यतामेतद्वायसावविशङ्कया॥
yama uvāca| kutaḥ sthānātsamāyātau kena vā bhūṣitāvubhau| vṛttaṁ vai kathyatāmetadvāyasāvaviśaṅkayā||
यम बोले - तुम दोनों किस स्थान से आए हो, तथा किसने तुम्हें विभूषित किया है? हे कौओ! निःशंक होकर यह वृत्तान्त कहो।
श्लोक 41 (skanda.5.310.41)
काकावूचतुः। इक्ष्वाकुसम्भवो राजा चाणक्यो नाम धार्मिकः। द्वादशाहे मृतस्यास्य तर्पितावशनादिभिः॥
kākāvūcatuḥ| ikṣvākusambhavo rājā cāṇakyo nāma dhārmikaḥ| dvādaśāhe mṛtasyāsya tarpitāvaśanādibhiḥ||
दोनों कौए बोले - इक्ष्वाकुवंशी धर्मात्मा राजा चाणक्य के मृतक-श्राद्ध के द्वादश दिन में हम दोनों अन्नादि से तृप्त किए गए हैं।
श्लोक 42 (skanda.5.310.42)
तयोस्तद्वचनं श्रुत्वा सदा वैवस्वतो यमः। चित्रगुप्तं कलिं कालं वीक्ष्यतामिदमब्रवीत्॥
tayostadvacanaṁ śrutvā sadā vaivasvato yamaḥ| citraguptaṁ kaliṁ kālaṁ vīkṣyatāmidamabravīt||
उन दोनों का यह वचन सुनकर सदा वैवस्वत यमराज ने चित्रगुप्त, कलि और काल को देखते हुए यह कहा -
श्लोक 43 (skanda.5.310.43)
अण्डजस्वेदजातीनां भूतानां सचराचरे। विहितं लोककर्तॄणां सान्निध्यं ब्रह्मणा मम॥
aṇḍajasvedajātīnāṁ bhūtānāṁ sacarācare| vihitaṁ lokakartṝṇāṁ sānnidhyaṁ brahmaṇā mama||
"अण्डज तथा स्वेदज योनियों में उत्पन्न, चराचर समस्त प्राणियों का लोक-रचयिताओं के साथ मेरे सान्निध्य में आना ब्रह्मा द्वारा विहित है।
श्लोक 44 (skanda.5.310.44)
गतः कुत्र दुराचारश्चाणक्यो नामतस्त्विह। अन्विष्यतां पुराणेषु त्वितिहासेषु या गतिः॥
gataḥ kutra durācāraścāṇakyo nāmatastviha| anviṣyatāṁ purāṇeṣu tvitihāseṣu yā gatiḥ||
उस दुराचारी चाणक्य नामक व्यक्ति की गति कहाँ हुई? पुराणों और इतिहासों में उसकी गति का अन्वेषण करो।"
श्लोक 45 (skanda.5.310.45)
ततस्तैर्धर्मपालैस्तु धर्मराजप्रचोदितैः। निरीक्षिता पुराणोक्ता कर्मजा गतिरागतिः॥
tatastairdharmapālaistu dharmarājapracoditaiḥ| nirīkṣitā purāṇoktā karmajā gatirāgatiḥ||
तब धर्मराज द्वारा प्रेरित उन धर्मपालों ने पुराणों में कथित कर्मजनित गति-आगति का अवलोकन किया।
श्लोक 46 (skanda.5.310.46)
ततः प्रोवाच वचनं धर्मो धर्मभृतां वरः। शृण्वतां धर्मपालानां मेघगम्भीरया गिरा॥
tataḥ provāca vacanaṁ dharmo dharmabhṛtāṁ varaḥ| śṛṇvatāṁ dharmapālānāṁ meghagambhīrayā girā||
तब धर्मधारकों में श्रेष्ठ धर्म ने, सुनते हुए धर्मपालों के समक्ष, मेघ के समान गम्भीर वाणी में यह वचन कहा -
श्लोक 47 (skanda.5.310.47)
शुक्लतीर्थे मृतानां तु नर्मदाविमले जले। अण्डजस्वेदजातीनां न गतिर्मम सन्निधौ॥
śuklatīrthe mṛtānāṁ tu narmadāvimale jale| aṇḍajasvedajātīnāṁ na gatirmama sannidhau||
"नर्मदा के निर्मल जल में शुक्लतीर्थ में मरने वालों की, चाहे वे अण्डज हों या स्वेदज, मेरे सान्निध्य में गति नहीं होती।
श्लोक 48 (skanda.5.310.48)
तत्तीर्थं धार्मिकं लोके ब्रह्मविष्णुमहेश्वरैः। निर्मितं परया भक्त्या लोकानां हितकाम्यया॥
tattīrthaṁ dhārmikaṁ loke brahmaviṣṇumaheśvaraiḥ| nirmitaṁ parayā bhaktyā lokānāṁ hitakāmyayā||
वह धर्मयुक्त तीर्थ, संसार के हित की कामना से, परम भक्ति के साथ ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर द्वारा निर्मित है।
श्लोक 49 (skanda.5.310.49)
पापोपपातकैर्युक्ता ये नरा नर्मदाजले। शुक्लतीर्थे मृताः शुद्धा न ते मद्विषयाः क्वचित्॥
pāpopapātakairyuktā ye narā narmadājale| śuklatīrthe mṛtāḥ śuddhā na te madviṣayāḥ kvacit||
जो मनुष्य पाप और उपपापों से युक्त होकर भी नर्मदा के जल में शुक्लतीर्थ में मरते हैं, वे शुद्ध हो जाते हैं और कभी भी मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं आते।"
श्लोक 50 (skanda.5.310.50)
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं तौ काकौ यमभाषितम्। आगतौ शीघ्रगौ पार्थ दृष्ट्वा यमपुरं महत्॥
etacchrutvā tu vacanaṁ tau kākau yamabhāṣitam| āgatau śīghragau pārtha dṛṣṭvā yamapuraṁ mahat||
यमराज के इस वचन को सुनकर, हे पार्थ! वे दोनों कौए, महान् यमपुर को देखकर, शीघ्रगामी होकर लौट आए।
श्लोक 51 (skanda.5.310.51)
पृष्टौ तौ प्रणतौ राज्ञा यथावृत्तं यथाश्रुतम्। कथयामासतुः पार्थ दानवौ काकतां गतौ॥
pṛṣṭau tau praṇatau rājñā yathāvṛttaṁ yathāśrutam| kathayāmāsatuḥ pārtha dānavau kākatāṁ gatau||
राजा द्वारा पूछे जाने पर, नमस्कार करते हुए उन दोनों दानवों ने, जो कौए की योनि को प्राप्त हुए थे, हे पार्थ! जो कुछ घटित हुआ और सुना था, वह यथावत् कह सुनाया।
श्लोक 52 (skanda.5.310.52)
अस्मात्स्थानाद्गतावावां यमस्य पुरमुत्तमम्। पृथिव्या दक्षिणे भागे ह्यतीत्य बहुयोनिजम्॥
asmātsthānādgatāvāvāṁ yamasya puramuttamam| pṛthivyā dakṣiṇe bhāge hyatītya bahuyonijam||
हम दोनों इस स्थान से जाकर, पृथ्वी के दक्षिण भाग में स्थित यमराज के श्रेष्ठ पुर में, अनेक योनियों को पार करके पहुँचे।
श्लोक 53 (skanda.5.310.53)
तत्पुरं कामगं दिव्यं स्वर्णप्राकारतोरणम्। अनेकगृहसम्बाधं मणिकाञ्चनभूषितम्॥
tatpuraṁ kāmagaṁ divyaṁ svarṇaprākāratoraṇam| aneka gṛhasambādhaṁ maṇikāñcanabhūṣitam||
वह दिव्य नगर इच्छानुसार गमन करने वाला है, स्वर्णिम प्राचीर और तोरणों से युक्त, अनेक भवनों से सघन, मणि और स्वर्ण से सुशोभित है।
श्लोक 54 (skanda.5.310.54)
चतुष्पथैश्चत्वरैश्च घण्टामार्गोपशोभितम्। उद्यानवनसंछन्नं पद्मिनीखण्डमन्दितम्॥
catuṣpathaiścatvaraiśca ghaṇṭāmārgopaśobhitam| udyānavanasaṁchannaṁ padminīkhaṇḍamanditam||
वह चौराहों और चौकों से, घण्टियों से सुशोभित मार्गों से युक्त है, उद्यान-वनों से आच्छादित तथा कमल-समूहों से सुसज्जित है।
श्लोक 55 (skanda.5.310.55)
हंससारससंघुष्टं कोकिलाकुलसंकुलम्। सिंहव्याघ्रगजाकीर्णमृक्षवानरसेवितम्॥
haṁsasārasasaṁghuṣṭaṁ kokilākulasaṁkulam| siṁhavyāghragajākīrṇamṛkṣavānarasevitam||
वह हंस-सारसों की ध्वनि से गुंजित है, कोकिल-समूहों से भरपूर है, सिंह-व्याघ्र-हाथियों से व्याप्त तथा भालू-वानरों से सेवित है।
श्लोक 56 (skanda.5.310.56)
नरनारीसमाकीर्णं नित्योत्सवविभूषितम्। शंखदुन्दुभिर्निर्घोषैर्वीणावेणुनिनादितम्॥
naranārīsamākīrṇaṁ nityotsavavibhūṣitam| śaṅkhadundubhirnirghoṣairvīṇāveṇuninaditam||
वह स्त्री-पुरुषों से भरा है, नित्य उत्सवों से सुशोभित है, शंख-दुन्दुभियों की गर्जना तथा वीणा-वेणु की ध्वनियों से निनादित रहता है।
श्लोक 57 (skanda.5.310.57)
यममार्गेऽपि विहितं स्वर्गलोकमिवापरम्। गतौ तत्र पुनश्चान्यैर्यमदूतैर्यमाज्ञया॥
yamamārge'pi vihitaṁ svargalokamivāparam| gatau tatra punaścānyairyamadūtairyamājñayā||
यम के मार्ग में भी यह मानो दूसरा स्वर्गलोक ही बनाया गया है। वहाँ हम फिर से यमराज की आज्ञा से अन्य यमदूतों के साथ गए,
श्लोक 58 (skanda.5.310.58)
विदितौ प्रेषितौ तत्र यत्र देवो जगत्प्रभुः। प्राणस्य भीत्या दृष्टोऽसौ सिंहासनगतः प्रभुः॥
viditau preṣitau tatra yatra devo jagatprabhuḥ| prāṇasya bhītyā dṛṣṭo'sau siṁhāsanagataḥ prabhuḥ||
और वहाँ पहचान के साथ भेजे गए, जहाँ जगत्प्रभु देव विराजमान थे। हमने प्राणभय से उन्हें देखा, जो प्रभु सिंहासन पर विराजमान थे -
श्लोक 59 (skanda.5.310.59)
महाकायो महाजङ्घो महास्कन्धो महोदरः। महावक्षा महाबाहुर्महावक्त्रेक्षणो महान्॥
mahākāyo mahājaṅgho mahāskandho mahodaraḥ| mahāvakṣā mahābāhurmahāvaktrekṣaṇo mahān||
- विशालकाय, विशाल जंघाओं वाले, विशाल स्कन्धों वाले, विशाल उदर वाले, विशाल वक्षस्थल वाले, विशाल भुजाओं वाले, विशाल मुख और नेत्रों वाले, महान् -
श्लोक 60 (skanda.5.310.60)
महामहिषमारूढो महामुकुटभूषितः। तत्रान्यश्च कलिः कालश्चित्रगुप्तो महामतिः॥
mahāmahiṣamārūḍho mahāmukuṭabhūṣitaḥ| tatrānyaśca kaliḥ kālaścitragupto mahāmatiḥ||
- विशाल भैंसे पर आरूढ़, विशाल मुकुट से विभूषित। वहाँ और भी थे - कलि, काल तथा महाबुद्धिमान् चित्रगुप्त।
श्लोक 61 (skanda.5.310.61)
समागतौ तदा दृष्टौ मध्ये ज्वलितपावकौ। पुण्यपापानि जन्तूनां श्रुतिस्मृत्यर्थपारगौ॥
samāgatau tadā dṛṣṭau madhye jvalitapāvakau| puṇyapāpāni jantūnāṁ śrutismṛtyarthapāragau||
हमने वहाँ उन दोनों को एकत्र देखा, बीच में प्रज्वलित अग्नि थी; वे दोनों श्रुति-स्मृति के अर्थ में पारंगत होकर प्राणियों के पुण्य-पाप का निर्णय करते हुए,
श्लोक 62 (skanda.5.310.62)
विचारयन्तौ सततं तिष्ठाते तौ दिवानिशम्। ततो ह्यावां प्रणामान्ते यमेन यममूर्तिना॥
vicārayantau satataṁ tiṣṭhāte tau divāniśam| tato hyāvāṁ praṇāmānte yamena yamamūrtinā||
रात-दिन निरन्तर वहाँ स्थित रहते हैं। तत्पश्चात् हम दोनों को यमरूपधारी यमराज ने प्रणाम के अन्त में -
श्लोक 63 (skanda.5.310.63)
पृष्टावागमने हेतुं तमब्रूव शृणुष्व तत्। उज्जयिन्यां महीपालश्चाणक्योऽभूत्प्रतापवान्॥
pṛṣṭāvāgamane hetuṁ tamabrūva śṛṇuṣva tat| ujjayinyāṁ mahīpālaścāṇakyo'bhūtpratāpavān||
- हम दोनों से आगमन का कारण पूछा। हमने उन्हें बताया - सुनिए वह वृत्तान्त - "उज्जयिनी में चाणक्य नामक प्रतापी राजा था।
श्लोक 64 (skanda.5.310.64)
द्वादशाहे मृतस्यास्य भुक्त्वा प्राप्तौ यमालयम्। ततोऽस्माकं वचः श्रुत्वा कम्पयित्वा शिरो यमः॥
dvādaśāhe mṛtasyāsya bhuktvā prāptau yamālayam| tato'smākaṁ vacaḥ śrutvā kampayitvā śiro yamaḥ||
उसकी मृत्यु के द्वादशाह श्राद्ध में भोजन करके हम दोनों यमलोक पहुँचे हैं।" तब हमारा वचन सुनकर यमराज ने अपना सिर हिलाते हुए,
श्लोक 65 (skanda.5.310.65)
उवाच वचनं सत्यं सभामध्ये हसन्निव। अस्ति तत्कारणं येन चाणक्यः पापपूरुषः॥
uvāca vacanaṁ satyaṁ sabhāmadhye hasanniva| asti tatkāraṇaṁ yena cāṇakyaḥ pāpapūruṣaḥ||
सभा के बीच मानो हँसते हुए यह सत्य वचन कहा - "उसका कारण है कि चाणक्य पापी पुरुष होते हुए भी -
श्लोक 66 (skanda.5.310.66)
नायातो मम लोके तु सर्वपापभयंकरे। शुक्लतीर्थे मृतानां तु नर्मदायां परं पदम्॥
nāyāto mama loke tu sarvapāpabhayaṁkare| śuklatīrthe mṛtānāṁ tu narmadāyāṁ paraṁ padam||
- मेरे उस लोक में नहीं आया, जो समस्त पापों के लिए भयंकर है। शुक्लतीर्थ में नर्मदा में मरने वालों को परम पद -
श्लोक 67 (skanda.5.310.67)
जायते सर्वजन्तूनां नात्र काचिद्विचारणा। अवशः स्ववशो वापि जन्तुस्तत्क्षेत्रमण्डले॥
jāyate sarvajantūnāṁ nātra kācidvicāraṇā| avaśaḥ svavaśo vāpi jantustatkṣetramaṇḍale||
- समस्त प्राणियों के लिए प्राप्त होता है, इसमें कोई विचार-विमर्श नहीं है। चाहे प्राणी अवश हो या स्ववश, उस क्षेत्रमण्डल में -
श्लोक 68 (skanda.5.310.68)
मृतः स वै न सन्देहो रुद्रस्यानुचरो भवेत्। तद्धर्मवचनं श्रुत्वा निर्गत्य नगराद्बहिः॥
mṛtaḥ sa vai na sandeho rudrasyānucaro bhavet| taddharmavacanaṁ śrutvā nirgatya nagarādbahiḥ||
- यदि मरता है तो वह निःसन्देह रुद्र का अनुचर बन जाता है।" धर्मराज का यह वचन सुनकर, हम नगर से बाहर निकलकर,
श्लोक 69 (skanda.5.310.69)
पश्यन्तौ विविधां घोरां नरके लोकयातनाम्। त्रिंशत्कोट्यो हि घोराणां नरकाणां नृपोत्तम॥
paśyantau vividhāṁ ghorāṁ narake lokayātanām| triṁśatkoṭyo hi ghorāṇāṁ narakāṇāṁ nṛpottama||
हमने नरक में लोगों की विविध भयंकर यातनाएँ देखीं। हे श्रेष्ठ राजन्! तीस करोड़ भयंकर नरक हैं -
श्लोक 70 (skanda.5.310.70)
दृष्टा भीतौ परामार्तिगतौ तत्र महापथि। नरको रौरवस्तत्र महारौरव एव च॥
dṛṣṭā bhītau parāmārtigatau tatra mahāpathi| narako rauravastatra mahārauravaeva ca||
- जिन्हें देखकर हम दोनों भयभीत हुए और उस महापथ पर परम पीड़ा को प्राप्त हुए। वहाँ रौरव नरक है, और महारौरव भी है,
श्लोक 71 (skanda.5.310.71)
पेषणः शोषणश्चैव कालसूत्रोऽस्थिभञ्जनः। तामिस्रश्चान्धतामिस्रः कृमिपूतिवहस्तथा॥
peṣaṇaḥ śoṣaṇaścaiva kālasūtro'sthibhañjanaḥ| tāmisraścāndhatāmisraḥ kṛmipūtivahastathā||
पेषण, शोषण, कालसूत्र, अस्थिभञ्जन, तामिस्र, अन्धतामिस्र, तथा कृमिपूतिवह नामक नरक भी हैं।
श्लोक 72 (skanda.5.310.72)
दृष्टश्चान्यो महाज्वालस्तत्रैव विषभोजनः। नरकौ दंशमशकौ तथा यमलपर्वतौ॥
dṛṣṭaścānyo mahājvālastatraiva viṣabhojanaḥ| narakau daṁśamaśakau tathā yamalaparvatau||
वहाँ हमने महाज्वाल तथा विषभोजन नामक अन्य नरक भी देखे, तथा दंश और मशक नामक दो नरक, और यमलपर्वत नरक भी।
श्लोक 73 (skanda.5.310.73)
नदी वैतरणी दृष्टा सर्वपापप्रणाशिनी। शीतलं सलिलं यत्र पिबन्ति ह्यमृतोपमम्॥
nadī vaitaraṇī dṛṣṭā sarvapāpapraṇāśinī| śītalaṁ salilaṁ yatra pibanti hyamṛtopamam||
हमने वैतरणी नदी भी देखी, जो समस्त पापों का नाश करने वाली है, जहाँ कुछ लोग अमृत के समान शीतल जल पीते हैं,
श्लोक 74 (skanda.5.310.74)
तदेव नीरं पापानां शोणितं परिवर्तते। असिपत्रवनं चान्यद्दृष्टान्या महती शिला॥
tadeva nīraṁ pāpānāṁ śoṇitaṁ parivartate| asipatravanaṁ cānyaddṛṣṭānyā mahatī śilā||
- जबकि पापियों के लिए वही जल रक्त में परिवर्तित हो जाता है। हमने असिपत्रवन भी देखा, और एक अन्य विशाल शिला भी,
श्लोक 75 (skanda.5.310.75)
अग्निपुंजनिभाकारा विशाला शाल्मली परा। इत्यादयस्तथैवान्ये शतसाहस्रसंज्ञिताः॥
agnipuñjanibhākārā viśālā śālmalī parā| ityādayastathaivānye śatasāhasrasaṁjñitāḥ||
तथा अग्निपुंज के समान आकार वाला विशाल शाल्मली वृक्ष भी देखा। इस प्रकार अन्य भी लाखों-हजारों नामों वाले नरक हैं,
श्लोक 76 (skanda.5.310.76)
घोरघोरतरा दृष्टाः क्लिश्यन्ते यत्र मानवाः। वाचिकैर्मानसैः पापैः कर्मजैश्च पृथग्विधैः॥
ghoraghoratarā dṛṣṭāḥ kliśyante yatra mānavāḥ| vācikairmānasaiḥ pāpaiḥ karmajaiśca pṛthagvidhaiḥ||
- अत्यन्त भयंकर, जिन्हें हमने देखा, जहाँ मनुष्य वाणी, मन और कर्म से किए गए विविध पापों के कारण क्लेश भोगते हैं,
श्लोक 77 (skanda.5.310.77)
अहंकारकृतैर्दोषैर्मायावचनपूर्वकैः। पिता माता गुरुर्भ्राता अनाथा विकलेन्द्रियाः॥
ahaṁkārakṛtairdoṣairmāyāvacanapūrvakaiḥ| pitā mātā gururbhrātā anāthā vikalendriyāḥ||
तथा अहंकार से किए गए दोषों और छल-वचनों से युक्त पापों के कारण भी। जिनके पिता, माता, गुरु, भ्राता अनाथ, विकल-इन्द्रिय होकर -
श्लोक 78 (skanda.5.310.78)
भ्रमन्ति नोद्धृता येषां गतिस्तेषां हि रौरवे। तत्र ते द्वादशाब्दानि क्षपित्वा रौरवेऽधमाः॥
bhramanti noddhṛtā yeṣāṁ gatisteṣāṁ hi raurave| tatra te dvādaśābdāni kṣapitvā raurave'dhamāḥ||
- बिना उद्धार पाए भटकते रहते हैं, उनकी गति रौरव नरक में होती है। वे अधम वहाँ रौरव में बारह वर्ष व्यतीत करके,
श्लोक 79 (skanda.5.310.79)
इह मानुष्यके लोके दीनान्धाश्च भवन्ति ते। देवब्रह्मस्वहर्तॄणां नराणां पापकर्मणाम्॥
iha mānuṣyake loke dīnāndhāśca bhavanti te| devabrahmasvahartṝṇāṁ narāṇāṁ pāpakarmaṇām||
इस मनुष्य-लोक में दीन और अन्धे होकर जन्म लेते हैं। देव तथा ब्राह्मणों की सम्पत्ति का हरण करने वाले पापकर्मी मनुष्यों का -
श्लोक 80 (skanda.5.310.80)
महारौरवमाश्रित्य ध्रुवं वासो यमालये। ततः कालेन महता पापाः पापेन वेष्टिताः॥
mahārauravamāśritya dhruvaṁ vāso yamālaye| tataḥ kālena mahatā pāpāḥ pāpena veṣṭitāḥ||
- निश्चय ही महारौरव में यमलोक में वास होता है। तत्पश्चात् दीर्घकाल बीतने पर, पापों से आवेष्टित वे पापी -
श्लोक 81 (skanda.5.310.81)
जायन्ते कण्टकैर्भिन्नाः कोशे वा कोशकारकाः। मृगपक्षिविहङ्गानां घातका मांसभक्षकाः॥
jāyante kaṇṭakairbhinnāḥ kośe vā kośakārakāḥ| mṛgapakṣivihaṅgānāṁ ghātakā māṁsabhakṣakāḥ||
- काँटों से बिंधे हुए जीव अथवा कोश में कोशकार (रेशम के कीड़े) बनकर जन्म लेते हैं। मृग, पक्षी और विहगों के घातक, मांसभक्षी मनुष्य -
श्लोक 82 (skanda.5.310.82)
पेषणं नरकं यान्ति शोषणं जीवबन्धनात्। तत्रत्यां यातनां घोरां सहित्वा शास्त्रचोदिताम्॥
peṣaṇaṁ narakaṁ yānti śoṣaṇaṁ jīvabandhanāt| tatratyāṁ yātanāṁ ghorāṁ sahitvā śāstracoditām||
- पेषण नरक को जाते हैं; प्राणियों को बाँधने के पाप से शोषण नरक को। वहाँ शास्त्रोक्त भयंकर यातना सहन करके,
श्लोक 83 (skanda.5.310.83)
इह मानुष्यतां प्राप्य पङ्ग्वन्धबधिरा नराः। गवार्थे ब्राह्मणार्थे च ह्यनृतं वदतामिह॥
iha mānuṣyatāṁ prāpya paṅgvandhabadhirā narāḥ| gavārthe brāhmaṇārthe ca hyanṛtaṁ vadatāmiha||
वे इस मनुष्य-योनि को प्राप्त होकर लँगड़े, अन्धे और बहरे होते हैं। गाय के लिए या ब्राह्मण के लिए यहाँ झूठ बोलने वालों का -
श्लोक 84 (skanda.5.310.84)
पतनं जायते पुंसां नरके कालसूत्रके। तत्रत्या यातना घोरा विहिता शास्त्रकर्तृभिः॥
patanaṁ jāyate puṁsāṁ narake kālasūtrake| tatratyā yātanā ghorā vihitā śāstrakartṛbhiḥ||
- कालसूत्रक नामक नरक में पतन होता है। वहाँ की भयंकर यातना शास्त्रकारों द्वारा विहित है।
श्लोक 85 (skanda.5.310.85)
भुक्त्वा समागता ह्यत्र ते यास्यन्त्यन्त्यजां गतिम्। बन्धयन्ति च ये जीवांस्त्यक्त्वात्मकुलसन्ततिम्॥
bhuktvā samāgatā hyatra te yāsyantyantyajāṁ gatim| bandhayanti ca ye jīvāṁstyaktvātmakulasantatim||
उसे भोगकर लौटे हुए वे यहाँ नीच योनि को प्राप्त होते हैं। जो अपने कुल की सन्तति को त्यागकर प्राणियों को बाँधते हैं -
श्लोक 86 (skanda.5.310.86)
पतन्ति नात्र सन्देहो नरके तेऽस्थिभञ्जने। तत्र वर्षशतस्यान्त इह मानुष्यतां गताः॥
patanti nātra sandeho narake te'sthibhañjane| tatra varṣaśatasyānta iha mānuṣyatāṁ gatāḥ||
- वे निःसन्देह अस्थिभञ्जन नरक में गिरते हैं। वहाँ सौ वर्ष के अन्त में मनुष्य-योनि को प्राप्त होकर -
श्लोक 87 (skanda.5.310.87)
कुब्जा वामनकाः पापा जायन्ते दुःखभागिनः। ये त्यजन्ति स्वकां भार्यां मूढाः पण्डितमानिनः॥
kubjā vāmanakāḥ pāpā jāyante duḥkhabhāginaḥ| ye tyajanti svakāṁ bhāryāṁ mūḍhāḥ paṇḍitamāninaḥ||
- वे पापी, कुबड़े और बौने होकर दुःखभागी बनते हैं। जो मूर्ख, स्वयं को पण्डित मानते हुए अपनी पत्नी को त्याग देते हैं -
श्लोक 88 (skanda.5.310.88)
ते यान्ति नरकं घोरं तामिस्रं नात्र संशयः। तत्र वर्षशतस्यान्ते इह मानुष्यतां गताः॥
te yānti narakaṁ ghoraṁ tāmisraṁ nātra saṁśayaḥ| tatra varṣaśatasyānte iha mānuṣyatāṁ gatāḥ||
- वे निःसन्देह भयंकर तामिस्र नरक को जाते हैं। वहाँ सौ वर्ष के अन्त में इस मनुष्य-योनि को प्राप्त होकर,
श्लोक 89 (skanda.5.310.89)
दुश्चर्माणो दुर्भगाश्च जायन्ते मानवा हि ते। मानकूटं तुलाकूटं कूटकं तु वदन्ति ये॥
duścarmāṇo durbhagāśca jāyante mānavā hi te| mānakūṭaṁ tulākūṭaṁ kūṭakaṁ tu vadanti ye||
- वे मनुष्य रूखी त्वचा वाले और अभागे होकर जन्म लेते हैं। जो नाप में, तराजू में तथा अन्य प्रकार से छल-कपट का व्यवहार करते हैं -
श्लोक 90 (skanda.5.310.90)
नरके तेऽन्धतामिस्रे प्रपच्यन्ते नराधमाः। शतसाहस्रिकं कालमुषित्वा तत्र ते नराः॥
narake te'ndhatāmisre prapacyante narādhamāḥ| śatasāhasrikaṁ kālamuṣitvā tatra te narāḥ||
- वे नराधम अन्धतामिस्र नरक में पकाए जाते हैं। वहाँ लाख वर्ष तक निवास करने के पश्चात् वे मनुष्य -
श्लोक 91 (skanda.5.310.91)
इह शत्रुगृहे त्वन्धा भ्रमन्ते दीनमूर्तयः। पितृदेवद्विजेभ्योऽन्नमदत्त्वा येऽत्र भुञ्जते॥
iha śatrugṛhe tvandhā bhramante dīnamūrtayaḥ| pitṛdevadvijebhyo'nnamadattvā ye'tra bhuñjate||
- इस लोक में शत्रु के घर में अन्धे होकर दीन रूप में भटकते हैं। जो पितर, देवता और द्विजों को अन्न दिए बिना स्वयं यहाँ भोजन करते हैं -
श्लोक 92 (skanda.5.310.92)
नरके कृमिभक्ष्ये ते पतन्ति स्वात्मपोषकाः। ततः प्रसूतिकाले हि कृमिभुक्तश्च सव्रणः॥
narake kṛmibhakṣye te patanti svātmapoṣakāḥ| tataḥ prasūtikāle hi kṛmibhuktaśca savraṇaḥ||
- वे, केवल अपना ही पोषण करने वाले, कृमिभक्ष्य नरक में गिरते हैं। तत्पश्चात् जन्म के समय कीड़ों द्वारा खाया हुआ, व्रणयुक्त,
श्लोक 93 (skanda.5.310.93)
जायतेऽशुचिगन्धोऽत्र परभाग्योपजीवकः। स्वकर्मविच्युताः पापा वर्णाश्रमविवर्जिताः॥
jāyate'śucigandho'tra parabhāgyopajīvakaḥ| svakarmavicyutāḥ pāpā varṇāśramavivarjitāḥ||
- अपवित्र-गन्ध वाला होकर, वह दूसरों के भाग्य पर जीविका चलाने वाला बनकर जन्म लेता है। जो अपने कर्म से च्युत, पापी, वर्णाश्रम-रहित हैं -
श्लोक 94 (skanda.5.310.94)
नरके पूयसम्पूर्णे क्लिश्यन्ते ह्ययुतं समाः। पूर्णे तत्र ततः काले प्राप्य मानुष्यकं भवम्॥
narake pūyasampūrṇe kliśyante hyayutaṁ samāḥ| pūrṇe tatra tataḥ kāle prāpya mānuṣyakaṁ bhavam||
- वे पूयपूर्ण नरक में दस हज़ार वर्ष तक क्लेश भोगते हैं। वहाँ वह काल पूर्ण होने पर, मनुष्य-जन्म को प्राप्त करके,
श्लोक 95 (skanda.5.310.95)
उद्वेजनीया भूतानां जायन्ते व्याधिभिर्वृताः। अग्निदो गरदश्चैव लोभमोहान्वितो नरः॥
udvejanīyā bhūtānāṁ jāyante vyādhibhirvṛtāḥ| agnido garadaścaiva lobhamohānvito naraḥ||
- वे प्राणियों को घृणा उत्पन्न कराने वाले, रोगों से घिरे होकर जन्म लेते हैं। आग लगाने वाला, विष देने वाला, तथा लोभ-मोह से युक्त मनुष्य -
श्लोक 96 (skanda.5.310.96)
नरके विषसम्पूर्णे निमज्जति दुरात्मवान्। तत्र वर्षशतात्कालादुन्मज्जनमवस्थितः॥
narake viṣasampūrṇe nimajjati durātmavān| tatra varṣaśatātkālādunmajjanamavasthitaḥ||
- वह दुरात्मा विषपूर्ण नरक में डूबता है। वहाँ सौ वर्ष बीतने पर उसका बाहर निकलना निश्चित है।
श्लोक 97 (skanda.5.310.97)
भुवि मानुषतां प्राप्य कृपणो जायते पुनः। पादुकोपानहौ छत्रं शय्यां प्रावरणानि च॥
bhuvi mānuṣatāṁ prāpya kṛpaṇo jāyate punaḥ| pādukopānahau chatraṁ śayyāṁ prāvaraṇāni ca||
पृथ्वी पर मनुष्य-जन्म पाकर वह पुनः कृपण बनकर जन्म लेता है। जो खड़ाऊँ, जूते, छाता, शय्या और ओढ़ने के वस्त्र -
श्लोक 98 (skanda.5.310.98)
अदत्त्वा दंशमशकैर्भक्ष्यन्ते जन्यसप्ततिम्। पितुर्द्रव्यापहर्तारस्ताडनक्रोशने रताः॥
adattvā daṁśamaśakairbhakṣyante janyasaptatim| piturdravyāpahartārastāḍanakrośane ratāḥ||
- दान किए बिना वे सत्तर जन्मों तक डाँस-मच्छरों से खाए जाते हैं। पिता के धन का अपहरण करने वाले, ताड़ना और चीत्कार में रत,
श्लोक 99 (skanda.5.310.99)
पीडनं क्रियते तेषां यत्र तौ युग्मपर्वतौ। या सा वैतरणी घोरा नदी रक्तप्रवाहिनी॥
pīḍanaṁ kriyate teṣāṁ yatra tau yugmaparvatau| yā sā vaitaraṇī ghorā nadī raktapravāhinī||
- जहाँ वे दोनों युग्मपर्वत हैं, वहाँ उनकी पीड़ा की जाती है। वह भयंकर वैतरणी नदी, जो रक्त की धारा बहाती है,
श्लोक 100 (skanda.5.310.100)
पिबन्ति रुधिरं तत्र येऽभियान्ति रजस्वलाम्। असिपत्रवने घोरे पीड्यन्ते पापकारिणः॥
pibanti rudhiraṁ tatra ye'bhiyānti rajasvalām| asipatravane ghore pīḍyante pāpakāriṇaḥ||
- जो लोग रजस्वला स्त्री के पास जाते हैं वे वहाँ रक्त पीते हैं। भयंकर असिपत्रवन में पापकर्मी पीड़ित होते हैं -
श्लोक 101 (skanda.5.310.101)
परपीडाकरा नित्यं ये नरोऽन्त्यजगामिनः। गुरुदाररतानां तु महापातकिनामपि॥
parapīḍākarā nityaṁ ye naro'ntyajagāminaḥ| gurudāraratānāṁ tu mahāpātakināmapi||
- जो नित्य दूसरों को कष्ट देते हैं और नीच स्त्रियों में रत रहते हैं। गुरु-पत्नी में आसक्त, महापातकी लोगों के लिए भी -
श्लोक 102 (skanda.5.310.102)
शिलावगूहनं तेषां जायते जन्मसप्ततिम्। ज्वलन्तीमायसीं घोरां बहुकण्टकसंवृताम्॥
śilāvagūhanaṁ teṣāṁ jāyate janmasaptatim| jvalantīmāyasīṁ ghorāṁ bahukaṇṭakasaṁvṛtām||
- सत्तर जन्मों तक शिला का आलिंगन होता है। जलती हुई, लोहे की, भयंकर, अनेक काँटों से आच्छादित -
श्लोक 103 (skanda.5.310.103)
शाल्मलीं तेऽवगूहन्ति परदाररता हि ये। परस्य योषितं हृत्वा ब्रह्मस्वमपहृत्य च॥
śālmalīṁ te'vagūhanti paradāraratā hi ye| parasya yoṣitaṁ hṛtvā brahmasvamapahṛtya ca||
- शाल्मली वृक्ष का आलिंगन वे करते हैं, जो परस्त्री में आसक्त रहते हैं। दूसरे की स्त्री का हरण करके, तथा ब्राह्मण की सम्पत्ति का अपहरण करके -
श्लोक 104 (skanda.5.310.104)
अरण्ये निर्जले देशे स भवेत्क्रूरराक्षसः। देवस्वं ब्राह्मणस्वं च लोभेनैवाहरेच्च यः॥
araṇye nirjale deśe sa bhavetkrūrarākṣasaḥ| devasvaṁ brāhmaṇasvaṁ ca lobhenaivāharecca yaḥ||
- वह निर्जल वन प्रदेश में क्रूर राक्षस बनता है। जो लोभवश देवता और ब्राह्मण की सम्पत्ति का हरण करता है,
श्लोक 105 (skanda.5.310.105)
स पापात्मा परे लोके गृध्रोच्छिष्टेन जीवति। एवमादीनि पापानि भुञ्जन्ते यमशासनात्॥
sa pāpātmā pare loke gṛdhrocchiṣṭena jīvati| evamādīni pāpāni bhuñjante yamaśāsanāt||
- वह पापात्मा परलोक में गिद्धों के जूठन से जीवन-निर्वाह करता है। इस प्रकार यमराज के शासन से जीव इन आदि पापों के फल को भोगते हैं।
श्लोक 106 (skanda.5.310.106)
येषां तु दर्शनादेव श्रवणाज्जायते भयम्। तथा दानफलं चान्ये भुञ्जाना यममन्दिरे॥
yeṣāṁ tu darśanādeva śravaṇājjāyate bhayam| tathā dānaphalaṁ cānye bhuñjānā yamamandire||
जिन्हें देखने और सुनने मात्र से ही भय उत्पन्न होता है, ऐसी यातनाएँ हमने देखीं; तथा यममन्दिर में दान के फल को भोगते हुए अन्य लोगों को भी हमने देखा,
श्लोक 107 (skanda.5.310.107)
दृष्टाः श्रुतं कथयतां दूतानां च यमाज्ञया। रथैरन्ये गजैरन्ये केचिद्वाजिभिरावृताः॥
dṛṣṭāḥ śrutaṁ kathayatāṁ dūtānāṁ ca yamājñayā| rathairanye gajairanye kecidvājibhirāvṛtāḥ||
- यमदूतों से जो सुना, वह हमने कह दिया। कुछ रथों पर, कुछ हाथियों पर, तथा कुछ घोड़ों से आवृत होकर,
श्लोक 108 (skanda.5.310.108)
दृष्टास्तत्र महाभाग तपःसंचयसंस्थिताः। गोदाता स्वर्णदाता च भूमिरत्नप्रदा नराः॥
dṛṣṭāstatra mahābhāga tapaḥsaṁcayasaṁsthitāḥ| godātā svarṇadātā ca bhūmiratnapradā narāḥ||
- हे महाभाग! उन्हें वहाँ तपस्या के संचय में स्थित देखा। गौ-दान करने वाले, स्वर्ण-दान करने वाले, भूमि तथा रत्न प्रदान करने वाले मनुष्य -
श्लोक 109 (skanda.5.310.109)
शय्याशनगृहादीनां स लोकः कामदो नृणाम्। अन्नं पानीयसहितं ददते येऽत्र मानवाः॥
śayyāśanagṛhādīnāṁ sa lokaḥ kāmado nṛṇām| annaṁ pānīyasahitaṁ dadate ye'tra mānavāḥ||
- उनके लिए वह लोक शय्या, भोजन, गृह आदि सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। जो मनुष्य यहाँ जल सहित अन्न दान करते हैं,
श्लोक 110 (skanda.5.310.110)
तत्र तृप्ताः सुसंतुष्टाः क्रीडन्ते यमसादने। अत्र यद्दीयते दानमपि वालाग्रमात्रकम्॥
tatra tṛptāḥ susaṁtuṣṭāḥ krīḍante yamasādane| atra yaddīyate dānamapi vālāgramātrakam||
- वे वहाँ तृप्त और सुसंतुष्ट होकर यमराज के भवन में क्रीड़ा करते हैं। यहाँ शुक्लतीर्थ में जो दान बाल के अग्रभाग जितना भी दिया जाता है,
श्लोक 111 (skanda.5.310.111)
तदक्षयफलं सर्वं शुक्लतीर्थे नृपोत्तम। एतत्ते कथितं सर्वं यद्दृष्टं यच्च वै श्रुतम्॥
tadakṣayaphalaṁ sarvaṁ śuklatīrthe nṛpottama| etatte kathitaṁ sarvaṁ yaddṛṣṭaṁ yacca vai śrutam||
- वह सब अक्षय फल देने वाला होता है, हे नृपोत्तम! यह सब हमने तुम्हें कह दिया, जो कुछ हमने देखा और सुना।
श्लोक 112 (skanda.5.310.112)
कुरुष्व यदभिप्रेतं यदि शक्नोषि मुच्यताम्। तयोस्तद्वचनं श्रुत्वा चाणक्यो हृष्टमानसः॥
kuruṣva yadabhipretaṁ yadi śaknoṣi mucyatām| tayostadvacanaṁ śrutvā cāṇakyo hṛṣṭamānasaḥ||
- जो तुम्हें अभीष्ट हो, वह करो; यदि हो सके तो इस लोक-बन्धन से मुक्त हो जाओ।" उनका यह वचन सुनकर हर्षित मन वाला चाणक्य -
श्लोक 113 (skanda.5.310.113)
विसर्जयामास खगावभिनन्द्य पुनःपुनः। ताभ्यां गताभ्यां सर्वस्वं दत्त्वा विप्रेषु भारत॥
visarjayāmāsa khagāvabhinandya punaḥpunaḥ| tābhyāṁ gatābhyāṁ sarvasvaṁ dattvā vipreṣu bhārata||
- उन दोनों पक्षियों को बार-बार अभिनन्दन करके विदा किया। हे भारत! उन दोनों के जाने पर उसने अपना सर्वस्व ब्राह्मणों को दान करके,
श्लोक 114 (skanda.5.310.114)
कामक्रोधौ परित्यज्य जगामामरपर्वतम्। तत्र बद्ध्वोडुपं गाढं कृष्णरज्ज्वावलम्बितम्॥
kāmakrodhau parityajya jagāmāmaraparvatam| tatra baddhvoḍupaṁ gāḍhaṁ kṛṣṇarajjvāvalambitam||
- काम और क्रोध का परित्याग करके अमरपर्वत को चला गया। वहाँ उसने एक बेड़ा दृढ़ता से बाँधकर, जिसे एक काली रस्सी से लटकाया गया था,
श्लोक 115 (skanda.5.310.115)
प्लवमानो जगामाऽशु ध्यायन्देवं जनार्दनम्। आरोग्यं भास्करादिच्छेद्धनं वै जातवेदसः॥
plavamāno jagāmā'śu dhyāyandevaṁ janārdanam| ārogyaṁ bhāskarādicchheddhanaṁ vai jātavedasaḥ||
- उस पर तैरते हुए, भगवान् जनार्दन का ध्यान करते हुए, वह शीघ्र चला गया। कहा जाता है कि सूर्य से आरोग्य, अग्नि से धन,
श्लोक 116 (skanda.5.310.116)
प्राप्नोति ज्ञानमीशानान्मोक्षं प्राप्नोति केशवात्। नीलं रक्तं तदभवन्मेचकं यद्धि सूत्रकम्॥
prāpnoti jñānamīśānānmokṣaṁ prāpnoti keśavāt| nīlaṁ raktaṁ tadabhavanmecakaṁ yaddhi sūtrakam||
- ज्ञान ईशान (शिव) से प्राप्त होता है, और मोक्ष केशव (विष्णु) से प्राप्त होता है। वह काली रस्सी जो नीली-लाल-श्याम रंग की थी,
श्लोक 117 (skanda.5.310.117)
शुद्धस्फटिकसङ्काशं दृष्ट्वा रज्जुं महामतिः। आप्लुत्य विमले तोये गतोऽसौ वैष्णवं पदम्॥
śuddhasphaṭikasaṅkāśaṁ dṛṣṭvā rajjuṁ mahāmatiḥ| āplutya vimale toye gato'sau vaiṣṇavaṁ padam||
- वह महामति चाणक्य, उस रस्सी को शुद्ध स्फटिक के समान देखकर, निर्मल जल में स्नान करके, वैष्णव पद को प्राप्त हो गया।
श्लोक 118 (skanda.5.310.118)
गायन्ति यद्वेदविदः पुराणं नारायणं शाश्वतमच्युताह्वयम्। प्राप्तः स तं राजसुतो महात्मा निक्षिप्य देहं शुभशुक्लतीर्थे॥
gāyanti yadvedavidaḥ purāṇaṁ nārāyaṇaṁ śāśvatamacyutāhvayam| prāptaḥ sa taṁ rājasuto mahātmā nikṣipya dehaṁ śubhaśuklatīrthe||
वेदवेत्ता जिस शाश्वत, अच्युत नाम वाले, पुरातन नारायण का गान करते हैं, उस पद को वह महात्मा राजपुत्र, शुभ शुक्लतीर्थ में अपना शरीर त्यागकर, प्राप्त हुआ।
श्लोक 119 (skanda.5.310.119)
एषा ते कथिता राजन्सिद्धिश्चाणक्यभूभृतः। तथान्यत्तव वक्ष्यामि शृणुष्वैकाग्रमानसः॥
eṣā te kathitā rājansiddhiścāṇakyabhūbhṛtaḥ| tathānyattava vakṣyāmi śṛṇuṣvaikāgramānasaḥ||
हे राजन्! यह तुम्हें राजा चाणक्य की सिद्धि कह सुनाई गई। अब मैं तुम्हें और भी वृत्तान्त कहूँगा, एकाग्रचित्त होकर सुनो।