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अवन्ती खण्ड · अध्याय 311

शुक्लतीर्थ माहात्म्य वर्णन

अध्याय 310अध्याय-सूचीअध्याय 312

श्लोक 1 (skanda.5.311.1)

नास्ति लोकेषु तत्तीर्थं पृथिव्यां यन्नरेश्वर। शुक्लतीर्थेन सदृशमुपमानेन गीयते॥

nāsti lokeṣu tattīrthaṁ pṛthivyāṁ yannareśvara| śuklatīrthena sadṛśamupamānena gīyate||

श्रीमार्कण्डेय बोले - हे नरेश्वर! पृथ्वी पर लोकों में ऐसा कोई तीर्थ नहीं है, जो उपमा में शुक्लतीर्थ के सदृश गाया जाता हो।

श्लोक 2 (skanda.5.311.2)

शुक्लतीर्थं महातीर्थं नर्मदायां व्यवस्थितम्। प्रागुदक्प्रवणे देशे मुनिसङ्घनिषेवितम्॥

śuklatīrthaṁ mahātīrthaṁ narmadāyāṁ vyavasthitam| prāgudakpravaṇe deśe munisaṅghaniṣevitam||

शुक्लतीर्थ महातीर्थ है, नर्मदा में स्थित है, पूर्वोत्तर की ओर ढलान वाले प्रदेश में स्थित तथा मुनिसमूहों द्वारा सेवित है।

श्लोक 3 (skanda.5.311.3)

वैशाखे च तथा मासि कृष्णपक्षे चतुर्दशी। कैलासादुमया सार्द्धं स्वयमायाति शङ्करः॥

vaiśākhe ca tathā māsi kṛṣṇapakṣe caturdaśī| kailāsādumayā sārddhaṁ svayamāyāti śaṅkaraḥ||

वैशाख मास में कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को शंकर स्वयं उमा के साथ कैलास से आते हैं।

श्लोक 4 (skanda.5.311.4)

मध्याह्नसमये स्नात्वा पश्यत्यात्मानमात्मना। ब्रह्मविष्ण्विन्द्रसहितः शुक्लतीर्थे समाहितः॥

madhyāhnasamaye snātvā paśyatyātmānamātmanā| brahmaviṣṇvindrasahitaḥ śuklatīrthe samāhitaḥ||

मध्याह्न के समय स्नान करके, ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र के साथ, शुक्लतीर्थ में समाहित होकर, वे स्वयं अपने को अपने द्वारा देखते हैं।

श्लोक 5 (skanda.5.311.5)

कार्त्तिक्यां तु विशेषेण वैशाख्यां च नरोत्तम। ब्रह्मविष्णुमहादेवान् स्नात्वा पश्यति तद्दिने॥

kārttikyāṁ tu viśeṣeṇa vaiśākhyāṁ ca narottama| brahmaviṣṇumahādevān snātvā paśyati taddine||

हे नरोत्तम! विशेष रूप से कार्तिकी और वैशाखी पूर्णिमा के दिन, स्नान करके मनुष्य उस दिन ब्रह्मा, विष्णु और महादेव को देखता है।

श्लोक 6 (skanda.5.311.6)

देवराजः सुरैः सार्द्धं वायुमार्गव्यवस्थितः। कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां स्नात्वा पश्यति शङ्करम्॥

devarājaḥ suraiḥ sārddhaṁ vāyumārgavyavasthitaḥ| kṛṣṇapakṣe caturdaśyāṁ snātvā paśyati śaṅkaram||

देवराज इन्द्र देवताओं के साथ आकाश-मार्ग में स्थित होकर कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को स्नान करके शंकर का दर्शन करते हैं।

श्लोक 7 (skanda.5.311.7)

गन्धर्वाप्सरसो यक्षाः सिद्धविद्याधरोरगाः। तद्दिने तेऽपि देवेशं दृष्ट्वा मुञ्चन्ति किल्बिषम्॥

gandharvāpsaraso yakṣāḥ siddhavidyādharoragāḥ| taddine te'pi deveśaṁ dṛṣṭvā muñcanti kilbiṣam||

गन्धर्व, अप्सराएँ, यक्ष, सिद्ध, विद्याधर और नाग - वे भी उस दिन देवेश का दर्शन करके पाप का परित्याग कर देते हैं।

श्लोक 8 (skanda.5.311.8)

अर्धयोजनविस्तारं तदर्द्धेनैव चायतम्। शुक्लतीर्थं महापुण्यं महापातकनाशनम्॥

ardhayojanavistāraṁ tadarddhenaiva cāyatam| śuklatīrthaṁ mahāpuṇyaṁ mahāpātakanāśanam||

आधे योजन विस्तार वाला तथा उसके आधे भाग में लम्बा, शुक्लतीर्थ महापुण्यमय है, महापातकों का नाशक है।

श्लोक 9 (skanda.5.311.9)

यत्र स्थितैः प्रदृश्यन्ते वृक्षाग्राणि नरोत्तमैः। तत्र स्थिता महापापैर्मुच्यन्ते पूर्वसंचितैः॥

yatra sthitaiḥ pradṛśyante vṛkṣāgrāṇi narottamaiḥ| tatra sthitā mahāpāpairmucyante pūrvasaṁcitaiḥ||

जहाँ खड़े होकर श्रेष्ठ मनुष्य वृक्षों के अग्रभाग देख सकते हैं, वहाँ खड़े होकर वे पूर्वसंचित महापापों से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 10 (skanda.5.311.10)

पापोपपातकैर्युक्तो नरः स्नात्वा प्रमुच्यते। उपार्जिता विनश्येत भ्रूणहत्यापि दुस्त्यजा॥

pāpopapātakairyukto naraḥ snātvā pramucyate| upārjitā vinaśyeta bhrūṇahatyāpi dustyajā||

पाप और उपपातकों से युक्त मनुष्य भी स्नान करके मुक्त हो जाता है; उपार्जित तथा दुस्त्यज भ्रूणहत्या का पाप भी नष्ट हो जाता है।

श्लोक 11 (skanda.5.311.11)

यस्मात्तत्रैव देवेश उमया सह तिष्ठति। वैशाख्यां च विशेषेण कैलासादेति शङ्करः॥

yasmāttatraiva deveśa umayā saha tiṣṭhati| vaiśākhyāṁ ca viśeṣeṇa kailāsādeti śaṅkaraḥ||

क्योंकि वहीं देवेश उमा के साथ निवास करते हैं, तथा विशेष रूप से वैशाख मास में शंकर कैलास से वहाँ आते हैं।

श्लोक 12 (skanda.5.311.12)

तेन तीर्थं महापुण्यं सर्वपातकनाशनम्। कथितं ब्रह्मणा पूर्वं मया तव तथा नृप॥

tena tīrthaṁ mahāpuṇyaṁ sarvapātakanāśanam| kathitaṁ brahmaṇā pūrvaṁ mayā tava tathā nṛpa||

इसलिए यह महापुण्यमय, सर्वपातक-नाशक तीर्थ है, जिसे पहले ब्रह्मा ने कहा था, हे राजन्! उसी को मैंने तुम्हें बताया है।

श्लोक 13 (skanda.5.311.13)

रजकेन यथा धौतं वस्त्रं भवति निर्मलम्। तथा तत्र वपुःस्नानं पुरुषस्य भवेच्छुचि॥

rajakena yathā dhautaṁ vastraṁ bhavati nirmalam| tathā tatra vapuḥsnānaṁ puruṣasya bhavecchuci||

जैसे धोबी द्वारा धोया गया वस्त्र निर्मल हो जाता है, वैसे ही वहाँ मनुष्य के शरीर का स्नान पवित्र हो जाता है।

श्लोक 14 (skanda.5.311.14)

पूर्वे वयसि पापानि कृत्वा पुष्टानि मानवः। अहोरात्रोषितो भूत्वा शुक्लतीर्थे व्यपोहति॥

pūrve vayasi pāpāni kṛtvā puṣṭāni mānavaḥ| ahorātroṣito bhūtvā śuklatīrthe vyapohati||

पूर्व वय में पाप करके उन्हें पुष्ट किया हुआ मनुष्य भी, एक अहोरात्र वहाँ उपवास करके, शुक्लतीर्थ में उन्हें नष्ट कर देता है।

श्लोक 15 (skanda.5.311.15)

शुक्लतीर्थे महाराज राकां रेवाजलाञ्जलिम्। कल्पकोटिसहस्राणि दत्त्वा स्युः पितरः शिवाः॥

śuklatīrthe mahārāja rākāṁ revājalāñjalim| kalpakoṭisahasrāṇi dattvā syuḥ pitaraḥ śivāḥ||

हे महाराज! शुक्लतीर्थ में पूर्णिमा के दिन रेवा के जल की अंजलि देने से पितर करोड़ों-हज़ारों कल्पों तक कल्याणयुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 16 (skanda.5.311.16)

न माता न पिता बन्धुः पतनं नरकार्णवे। उद्धरन्ति यथा पुण्यं शुक्लतीर्थे नरेश्वर॥

na mātā na pitā bandhuḥ patanaṁ narakārṇave| uddharanti yathā puṇyaṁ śuklatīrthe nareśvara||

हे नरेश्वर! नरकसागर में पतन से न माता, न पिता, न बन्धु उद्धार करते हैं, जैसा शुक्लतीर्थ का पुण्य उद्धार करता है।

श्लोक 17 (skanda.5.311.17)

तपसा ब्रह्मचर्येण न तां गच्छन्ति सद्गतिम्। शुक्लतीर्थे मृतो जन्तुर्देहत्यागेन यां लभेत्॥

tapasā brahmacaryeṇa na tāṁ gacchanti sadgatim| śuklatīrthe mṛto janturdehatyāgena yāṁ labhet||

तप और ब्रह्मचर्य से भी लोग उस सद्गति को प्राप्त नहीं करते, जो शुक्लतीर्थ में मरा हुआ प्राणी देहत्याग से प्राप्त करता है।

श्लोक 18 (skanda.5.311.18)

कार्त्तिकस्य तु मासस्य कृष्णपक्षे चतुर्दशीम्। घृतेन स्नापयेद्देवमुपोष्य प्रयतो नरः॥

kārttikasya tu māsasya kṛṣṇapakṣe caturdaśīm| ghṛtena snāpayeddevamupoṣya prayato naraḥ||

कार्तिक मास की कृष्णपक्ष चतुर्दशी को उपवास करके, संयमी मनुष्य देव को घृत से स्नान कराए।

श्लोक 19 (skanda.5.311.19)

स्नात्वा प्रभाते रेवायां दद्यात्सघृतकम्बलम्। सहिरण्यं यथाशक्ति देवमुद्दिश्य शङ्करम्॥

snātvā prabhāte revāyāṁ dadyātsaghṛtakambalam| sahiraṇyaṁ yathāśakti devamuddiśya śaṅkaram||

प्रातःकाल रेवा में स्नान करके, शंकर देव को उद्देश्य करके, यथाशक्ति स्वर्ण सहित घी से भरा कम्बल दान करे।

श्लोक 20 (skanda.5.311.20)

देवस्य पूरणं कुर्याद्घृतेन घृतकम्बलम्। स गच्छति महातेजाः शिवलोकं मृतो नरः॥

devasya pūraṇaṁ kuryādghṛtena ghṛtakambalam| sa gacchati mahātejāḥ śivalokaṁ mṛto naraḥ||

देव के लिए घी से कम्बल भरे। ऐसा महातेजस्वी मनुष्य मरने पर शिवलोक को जाता है।

श्लोक 21 (skanda.5.311.21)

एकविंशकुलोपेतो यावदाभूतसम्प्लवम्। शुक्लतीर्थे नरः स्नात्वा ह्युमां रुद्रं च योऽर्चयेत्॥

ekaviṁśakulopeto yāvadābhūtasamplavam| śuklatīrthe naraḥ snātvā hyumāṁ rudraṁ ca yo'rcayet||

वह इक्कीस पीढ़ियों के कुल सहित प्रलयकाल तक शिवलोक में वास करता है। जो मनुष्य शुक्लतीर्थ में स्नान करके उमा और रुद्र की पूजा करता है -

श्लोक 22 (skanda.5.311.22)

गन्धपुष्पादिधूपैश्च सोऽश्वमेधफलं लभेत्। मासोपवासं यः कुर्यात्तत्र तीर्थे नरेश्वर॥

gandhapuṣpādidhūpaiśca so'śvamedhaphalaṁ labhet| māsopavāsaṁ yaḥ kuryāttatra tīrthe nareśvara||

- गन्ध, पुष्प आदि तथा धूप से, वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है। हे नरेश्वर! जो उस तीर्थ में एक मास का उपवास करता है -

श्लोक 23 (skanda.5.311.23)

मुच्यते स महत्पापैः सप्तजन्मसुसंचितैः। उष्ट्रीक्षीरमविक्षीरं नवश्राद्धे च भोजनम्॥

mucyate sa mahatpāpaiḥ saptajanmasusaṁcitaiḥ| uṣṭrīkṣīramavikṣīraṁ navaśrāddhe ca bhojanam||

- वह सात जन्मों में संचित महापापों से मुक्त हो जाता है। ऊँटनी का दूध, भेड़ का दूध, नवश्राद्ध में भोजन,

श्लोक 24 (skanda.5.311.24)

वृषलीगमनं चैव तथाभक्ष्यस्य भक्षणम्। अविक्रयेऽनृते पापं माहिषेऽयाज्ययाजके॥

vṛṣalīgamanaṁ caiva tathābhakṣyasya bhakṣaṇam| avikraye'nṛte pāpaṁ māhiṣe'yājyayājake||

वृषली-गमन, अभक्ष्य का भक्षण, अविक्रेय वस्तु के व्यापार में झूठ बोलने का पाप, भैंस के दूध का पाप, अयाज्य का यजन कराने का पाप,

श्लोक 25 (skanda.5.311.25)

वार्द्धुष्ये पङ्क्तिगरदे देवब्राह्मणदूषके। एवमादीनि पापानि तथान्यान्यपि भारत॥

vārddhuṣye paṅktigarade devabrāhmaṇadūṣake| evamādīni pāpāni tathānyānyapi bhārata||

सूदखोरी, भोज की पंक्ति में विष देने का पाप, देवता और ब्राह्मणों को दूषित करने का पाप - इस प्रकार के तथा अन्य पाप भी, हे भारत!

श्लोक 26 (skanda.5.311.26)

चान्द्रायणेन नश्यन्ति शुक्लतीर्थे न संशयः। शुक्लतीर्थे तु यः स्नात्वा तर्पयेत्पितृदेवताः॥

cāndrāyaṇena naśyanti śuklatīrthe na saṁśayaḥ| śuklatīrthe tu yaḥ snātvā tarpayetpitṛdevatāḥ||

- चान्द्रायण व्रत के बराबर फल देकर शुक्लतीर्थ में निःसन्देह नष्ट हो जाते हैं। जो शुक्लतीर्थ में स्नान करके पितरों और देवताओं को तर्पण देता है,

श्लोक 27 (skanda.5.311.27)

तस्य ते द्वादशाब्दानि तृप्तिं यान्ति सुतर्पिताः। पादुकोपानहौ छत्रं शय्यामासनमेव च॥

tasya te dvādaśābdāni tṛptiṁ yānti sutarpitāḥ| pādukopānahau chatraṁ śayyāmāsanameva ca||

उसके पितर बारह वर्षों तक भलीभाँति तृप्त होकर तृप्ति को प्राप्त होते हैं। खड़ाऊँ, जूते, छाता, शय्या तथा आसन,

श्लोक 28 (skanda.5.311.28)

सुवर्णं धनधान्यं च श्राद्धं युक्तहलं तथा। अन्नं पानीयसंहितं तस्मिंस्तीर्थे ददन्ति ये॥

suvarṇaṁ dhanadhānyaṁ ca śrāddhaṁ yuktahalaṁ tathā| annaṁ pānīyasaṁhitaṁ tasmiṁstīrthe dadanti ye||

स्वर्ण, धन-धान्य, विधिवत् श्राद्ध, तथा जल सहित अन्न - जो लोग उस तीर्थ में इन्हें दान करते हैं,

श्लोक 29 (skanda.5.311.29)

हृष्टाः पुष्टा मृता यान्ति शिवलोकं न संशयः। तत्र तीर्थे तु यो भक्त्या शिवमुद्दिश्य भारत॥

hṛṣṭāḥ puṣṭā mṛtā yānti śivalokaṁ na saṁśayaḥ| tatra tīrthe tu yo bhaktyā śivamuddiśya bhārata||

- वे प्रसन्न और पुष्ट होकर मृत्यु के पश्चात् निःसन्देह शिवलोक जाते हैं। हे भारत! उस तीर्थ में जो भक्तिपूर्वक शिव को उद्दिष्ट करके -

श्लोक 30 (skanda.5.311.30)

भिक्षामात्रं तथान्नं ये तेऽपि स्वर्यान्ति वै नराः। यज्विनां व्रतिनां चैव तत्र तीर्थनिवासिनाम्॥

bhikṣāmātraṁ tathānnaṁ ye te'pi svaryānti vai narāḥ| yajvināṁ vratināṁ caiva tatra tīrthanivāsinām||

- मात्र भिक्षा अथवा अन्न भी देते हैं, वे मनुष्य भी स्वर्ग जाते हैं। वहाँ तीर्थ में रहने वाले यज्ञकर्ताओं और व्रतियों को -

श्लोक 31 (skanda.5.311.31)

अपि वालाग्रमात्रं हि दत्तं भवति चाक्षयम्। अग्निप्रवेशं यः कुर्याच्छुक्लतीर्थे समाहितः॥

api vālāgramātraṁ hi dattaṁ bhavati cākṣayam| agnipraveśaṁ yaḥ kuryācchuklatīrthe samāhitaḥ||

- जो कुछ भी दान बाल के अग्रभाग जितना भी दिया जाता है, वह अक्षय हो जाता है। जो शुक्लतीर्थ में समाहितचित्त होकर अग्निप्रवेश करता है -

श्लोक 32 (skanda.5.311.32)

रागद्वेषविनिर्मुक्तो हृदि ध्यात्वा जनार्दनम्। सर्वकामसुसम्पूर्णः स गच्छेद्वारुणं पुरम्॥

rāgadveṣavinirmukto hṛdi dhyātvā janārdanam| sarvakāmasusampūrṇaḥ sa gacchedvāruṇaṁ puram||

- राग-द्वेष से मुक्त होकर, हृदय में जनार्दन का ध्यान करते हुए, समस्त कामनाओं से पूर्ण होकर वारुण पुर को जाता है।

श्लोक 33 (skanda.5.311.33)

न रोगो न जरा तत्र यत्र देवोऽंभसां पतिः। अनाशकं तु यः कुर्यात्तस्मिंस्तीर्थे युधिष्ठिर॥

na rogo na jarā tatra yatra devo'ṁbhasāṁ patiḥ| anāśakaṁ tu yaḥ kuryāttasmiṁstīrthe yudhiṣṭhira||

वहाँ न रोग है, न जरा, जहाँ जल के स्वामी देव निवास करते हैं। हे युधिष्ठिर! जो उस तीर्थ में अन्न-त्याग करता है -

श्लोक 34 (skanda.5.311.34)

अनिवर्तिका गतिस्तस्य रुद्रलोकादसंशयम्। अवशः स्ववशो वापि जन्तुस्तत्क्षेत्रमण्डले॥

anivartikā gatistasya rudralokādasaṁśayam| avaśaḥ svavaśo vāpi jantustatkṣetramaṇḍale||

- उसकी गति रुद्रलोक से निःसन्देह अनिवर्तनीय होती है। चाहे अवश हो या स्ववश, प्राणी उस क्षेत्रमण्डल में -

श्लोक 35 (skanda.5.311.35)

मृतः स तु न सन्देहो रुद्रस्यानुचरो भवेत्। शुक्लतीर्थे तु यः कन्यां शक्त्या दद्यादलंकृताम्॥

mṛtaḥ sa tu na sandeho rudrasyānucaro bhavet| śuklatīrthe tu yaḥ kanyāṁ śaktyā dadyādalaṁkṛtām||

- मृत्यु होने पर निःसन्देह रुद्र का अनुचर बन जाता है। जो शुक्लतीर्थ में यथाशक्ति अलंकृत कन्या का दान करता है,

श्लोक 36 (skanda.5.311.36)

विधिना यो नृपश्रेष्ठ कुरुते वृषमोक्षणम्। तस्य यत्फलमुद्दिष्टं पुराणे रुद्रभाषितम्॥

vidhinā yo nṛpaśreṣṭha kurute vṛṣamokṣaṇam| tasya yatphalamuddiṣṭaṁ purāṇe rudrabhāṣitam||

तथा हे नृपश्रेष्ठ! जो विधिपूर्वक वृषोत्सर्ग करता है, उसका जो फल पुराण में रुद्र द्वारा कहा गया है,

श्लोक 37 (skanda.5.311.37)

तदहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमना नृप। यावन्तो रोमकूपाः स्युः सर्वाङ्गेषु पृथक्पृथक्॥

tadahaṁ sampravakṣyāmi śṛṇuṣvaikamanā nṛpa| yāvanto romakūpāḥ syuḥ sarvāṅgeṣu pṛthakpṛthak||

- वह मैं तुम्हें बताता हूँ, हे राजन्! एकाग्रचित्त होकर सुनो। समस्त अंगों में अलग-अलग जितने भी रोमकूप हैं,

श्लोक 38 (skanda.5.311.38)

तावद्वर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते। शुक्लतीर्थे तु यद्दत्तं ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः॥

tāvadvarṣasahasrāṇi rudraloke mahīyate| śuklatīrthe tu yaddattaṁ grahaṇe candrasūryayoḥ||

- उतने ही हज़ार वर्षों तक वह रुद्रलोक में सम्मानित होता है। शुक्लतीर्थ में चन्द्र या सूर्य ग्रहण के अवसर पर जो दान दिया जाता है,

श्लोक 39 (skanda.5.311.39)

वर्धते तद्गुणं तावद्दिनानि दश पञ्च च। शुक्लतीर्थे शुचिर्भूत्वा यः करोति प्रदक्षिणम्॥

vardhate tadguṇaṁ tāvaddināni daśa pañca ca| śuklatīrthe śucirbhūtvā yaḥ karoti pradakṣiṇam||

वह उतने ही गुणा बढ़ जाता है जितने पन्द्रह दिन होते हैं। जो शुक्लतीर्थ में पवित्र होकर प्रदक्षिणा करता है,

श्लोक 40 (skanda.5.311.40)

पृथ्वी प्रदक्षिणा तेन कृता यत्तस्य तत्फलम्। शोभनं मिथुनं यस्तु रुद्रमुद्दिश्य पूजयेत्॥

pṛthvī pradakṣiṇā tena kṛtā yattasya tatphalam| śobhanaṁ mithunaṁ yastu rudramuddiśya pūjayet||

उसे पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने का फल प्राप्त होता है। जो रुद्र को उद्दिष्ट करके सुन्दर युगल की पूजा करता है,

श्लोक 41 (skanda.5.311.41)

सप्त जन्मानि तस्यैव वियोगो न च वै क्वचित्। एतत्ते कथितं राजन् संक्षेपेण फलं महत्॥

sapta janmāni tasyaiva viyogo na ca vai kvacit| etatte kathitaṁ rājan saṁkṣepeṇa phalaṁ mahat||

- उसका सात जन्मों तक कभी वियोग नहीं होता। हे राजन्! यह महान् फल तुम्हें संक्षेप में बता दिया गया है,

श्लोक 42 (skanda.5.311.42)

शुक्लतीर्थस्य यत्पुण्यं यथा देवाच्छ्रुतं मया। य इदं शृणुयाद्भक्त्या पुराणे विहितं फलम्॥

śuklatīrthasya yatpuṇyaṁ yathā devācchrutaṁ mayā| ya idaṁ śṛṇuyādbhaktyā purāṇe vihitaṁ phalam||

- जो शुक्लतीर्थ का पुण्य है, जैसा मैंने देव से सुना है। जो कोई भक्तिपूर्वक इस पुराणोक्त फल को सुनता है,

श्लोक 43 (skanda.5.311.43)

स लभेन्नात्र सन्देहः सत्यं सत्यं पुनः पुनः। पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम्॥

sa labhennātra sandehaḥ satyaṁ satyaṁ punaḥ punaḥ| putrārthī labhate putraṁ dhanārthī labhate dhanam||

- वह निःसन्देह उसे प्राप्त करता है; यह सत्य है, सत्य है, बार-बार सत्य है। पुत्रार्थी पुत्र को प्राप्त करता है, धनार्थी धन को प्राप्त करता है,

श्लोक 44 (skanda.5.311.44)

मोक्षार्थी लभते मोक्षं स्नानदानफलं महत्॥

mokṣārthī labhate mokṣaṁ snānadānaphalaṁ mahat||

- मोक्षार्थी मोक्ष को प्राप्त करता है - यह स्नान और दान का महान् फल है।

अध्याय 310अध्याय-सूचीअध्याय 312