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अवन्ती खण्ड · अध्याय 312

हुंकारस्वामी तीर्थ माहात्म्य वर्णन

अध्याय 311अध्याय-सूचीअध्याय 313

श्लोक 1 (skanda.5.312.1)

तस्यैवानन्तरं राजञ्छुक्लतीर्थसमीपतः। वासुदेवस्य तीर्थं तु सर्वलोकेषु पूजितम्॥

tasyaivānantaraṁ rājañchuklatīrthasamīpataḥ| vāsudevasya tīrthaṁ tu sarvalokeṣu pūjitam||

श्रीमार्कण्डेय बोले - हे राजन्! उसी के अनन्तर, शुक्लतीर्थ के निकट ही, वासुदेव का तीर्थ है, जो समस्त लोकों में पूजित है।

श्लोक 2 (skanda.5.312.2)

तद्धि पुण्यं सुविख्यातं नर्मदायां पुरातनम्। यत्र हुङ्कारमात्रेण रेवा क्रोशं जगाम सा॥

taddhi puṇyaṁ suvikhyātaṁ narmadāyāṁ purātanam| yatra huṅkāramātreṇa revā krośaṁ jagāma sā||

वह अत्यन्त प्राचीन तथा सुविख्यात पुण्य तीर्थ नर्मदा में है, जहाँ केवल हुंकार मात्र से रेवा एक कोस हट गई थी।

श्लोक 3 (skanda.5.312.3)

यदा प्रभृति राजेन्द्र हुङ्कारेण गता सरित्। तदाप्रभृति स स्वामी हुङ्कारः शब्दितो बुधैः॥

yadā prabhṛti rājendra huṅkāreṇa gatā sarit| tadāprabhṛti sa svāmī huṅkāraḥ śabdito budhaiḥ||

हे राजेन्द्र! जबसे उस हुंकार से नदी हटी, तबसे उस स्वामी को विद्वानों ने 'हुंकार' नाम से पुकारा।

श्लोक 4 (skanda.5.312.4)

हुङ्कारतीर्थे यः स्नात्वा पश्यत्यव्ययमच्युतम्। स मुच्यते नरः पापैः सप्तजन्म कृतैरपि॥

huṅkāratīrthe yaḥ snātvā paśyatyavyayamacyutam| sa mucyate naraḥ pāpaiḥ saptajanma kṛtairapi||

हुंकारतीर्थ में स्नान करके जो अव्यय अच्युत का दर्शन करता है, वह मनुष्य सात जन्मों में किए गए पापों से भी मुक्त हो जाता है।

श्लोक 5 (skanda.5.312.5)

संसारार्णवमग्नानां नराणां पापकर्मिणाम्। नैवोद्धर्ता जगन्नाथं विना नारायणं परः॥

saṁsārārṇavamagnānāṁ narāṇāṁ pāpakarmiṇām| naivoddhartā jagannāthaṁ vinā nārāyaṇaṁ paraḥ||

संसार-सागर में डूबे हुए पापकर्मी मनुष्यों का जगन्नाथ परम नारायण के बिना और कोई उद्धारकर्ता नहीं है।

श्लोक 6 (skanda.5.312.6)

सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत्तदर्पितम्। तावेव केवलौ श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ॥

sā jihvā yā hariṁ stauti taccittaṁ yattadarpitam| tāveva kevalau ślāghyau yau tatpūjākarau karau||

वही जिह्वा प्रशंसनीय है जो हरि की स्तुति करती है, वही चित्त प्रशंसनीय है जो उन्हीं को समर्पित है, तथा वे ही दोनों हाथ प्रशंसनीय हैं जो उनकी पूजा करते हैं।

श्लोक 7 (skanda.5.312.7)

सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम्। येषां हृदिस्थो भगवान्मङ्गलायतनो हरिः॥

sarvadā sarvakāryeṣu nāsti teṣāmamaṅgalam| yeṣāṁ hṛdistho bhagavānmaṅgalāyatano hariḥ||

जिनके हृदय में मंगल के आश्रयस्थान भगवान् हरि विराजमान हैं, उनके लिए समस्त कार्यों में सर्वदा कोई अमंगल नहीं होता।

श्लोक 8 (skanda.5.312.8)

यदन्यद्देवतार्चायाः फलं प्राप्नोति मानवः। साष्टाङ्गप्रणिपातेन तत्फलं लभते हरेः॥

yadanyaddevatārcāyāḥ phalaṁ prāpnoti mānavaḥ| sāṣṭāṅgapraṇipātena tatphalaṁ labhate hareḥ||

अन्य देवताओं की अर्चना से जो फल मनुष्य प्राप्त करता है, वह फल हरि को साष्टांग प्रणाम करने मात्र से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 9 (skanda.5.312.9)

रेणुगुण्ठितगात्रस्य यावन्तोऽस्य रजःकणाः। तावद्वर्षसहस्राणि विष्णुलोके महीयते॥

reṇuguṇṭhitagātrasya yāvanto'sya rajaḥkaṇāḥ| tāvadvarṣasahasrāṇi viṣṇuloke mahīyate||

धूलि से लिपटे शरीर के जितने रजःकण होते हैं, उतने ही हजार वर्षों तक वह विष्णुलोक में सम्मानित होता है।

श्लोक 10 (skanda.5.312.10)

सम्मार्जनाभ्युक्षणलेपनेन तदालये नश्यति सर्वपापम्। नारी नराणां परया तु भक्त्या दृष्ट्वा तु रेवां नरसत्तमस्य॥

sammārjanābhyukṣaṇalepanena tadālaye naśyati sarvapāpam| nārī narāṇāṁ parayā tu bhaktyā dṛṣṭvā tu revāṁ narasattamasya||

उनके मन्दिर को झाड़ू लगाने, जल छिड़कने और लीपने से समस्त पाप नष्ट हो जाता है। स्त्री हो या पुरुष, नरश्रेष्ठ की रेवा को परम भक्ति से देखकर,

श्लोक 11 (skanda.5.312.11)

येनार्चितो भगवान्वासुदेवो जन्मार्जितं नश्यति तस्य पापम्। स याति लोकं गरुडध्वजस्य विधूतपापः सुरसङ्घपूज्यताम्॥

yenārcito bhagavānvāsudevo janmārjitaṁ naśyati tasya pāpam| sa yāti lokaṁ garuḍadhvajasya vidhūtapāpaḥ surasaṅghapūjyatām||

जिसके द्वारा भगवान् वासुदेव की पूजा की गई हो, उसका जन्म-जन्मान्तर का पाप नष्ट हो जाता है। वह पापरहित होकर गरुड़ध्वज (विष्णु) के लोक को जाता है और देवसंघों द्वारा पूज्यता प्राप्त करता है।

श्लोक 12 (skanda.5.312.12)

शाठ्येनापि नमस्कारं प्रयुञ्जंश्चक्रपाणिनः। सप्तजन्मार्जितं पापं गच्छत्याशु न संशयः॥

śāṭhyenāpi namaskāraṁ prayuñjaṁścakrapāṇinaḥ| saptajanmārjitaṁ pāpaṁ gacchatyāśu na saṁśayaḥ||

चक्रपाणि को छल से भी नमस्कार करने वाला मनुष्य सात जन्मों में उपार्जित पाप को भी शीघ्र नष्ट कर देता है, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 13 (skanda.5.312.13)

पूजायां प्रीयते रुद्रो जपहोमैर्दिवाकरः। शङ्खचक्रगदापाणिः प्रणिपातेन तुष्यति॥

pūjāyāṁ prīyate rudro japahomairdivākaraḥ| śaṅkhacakragadāpāṇiḥ praṇipātena tuṣyati||

पूजा से रुद्र प्रसन्न होते हैं, जप और होम से सूर्य; परन्तु शंख-चक्र-गदाधारी विष्णु प्रणिपात मात्र से संतुष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 14 (skanda.5.312.14)

भवजलधिगतानां द्वन्द्ववाताहतानां सुतदुहितृकलत्रत्राणभारार्दितानाम्। विषमविषयतोये मज्जतामप्लवानां भवति शरणमेको विष्णुपोतो नराणाम्॥

bhavajaladhigatānāṁ dvandvavātāhatānāṁ sutaduhitṛkalatratrāṇabhārārditānām| viṣamaviṣayatoye majjatāmaplavānāṁ bhavati śaraṇameko viṣṇupoto narāṇām||

संसार-सागर में पड़े हुए, द्वन्द्वरूपी वायु से आहत, पुत्र-पुत्री-पत्नी के रक्षा-भार से पीड़ित, विषम विषय-रूपी जल में बिना नाव के डूबते हुए मनुष्यों के लिए एकमात्र आश्रय विष्णु-रूपी नौका ही है।

श्लोक 15 (skanda.5.312.15)

हुङ्कारतीर्थे राजेन्द्र शुभं वा यदि वाशुभम्। यत्कृतं पुरुषव्याघ्र तन्नश्यति न कर्हिचित्॥

huṅkāratīrthe rājendra śubhaṁ vā yadi vāśubham| yatkṛtaṁ puruṣavyāghra tannaśyati na karhicit||

हे राजेन्द्र, पुरुषव्याघ्र! हुंकारतीर्थ में जो कुछ भी शुभ या अशुभ (साधना) की गई हो, उसका फल कभी नष्ट नहीं होता।

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