अवन्ती खण्ड · अध्याय 313
संगमेश्वर तीर्थ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.313.1)
ततो गच्छेत्परं तीर्थं सङ्गमेश्वरमुत्तमम्। नर्मदादक्षिणे कूले सर्वपापभयापहम्॥
tato gacchetparaṁ tīrthaṁ saṅgameśvaramuttamam| narmadādakṣiṇe kūle sarvapāpabhayāpaham||
श्रीमार्कण्डेय बोले - तत्पश्चात् नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित, समस्त पाप-भय का नाश करने वाले, श्रेष्ठ संगमेश्वर नामक परम तीर्थ में जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.5.313.2)
धनदस्तत्र विश्रान्तो मुहूर्तं नृपसत्तम। पितृलोकात्समायातः कैलासं धरणीधरम्॥
dhanadastatra viśrānto muhūrtaṁ nṛpasattama| pitṛlokātsamāyātaḥ kailāsaṁ dharaṇīdharam||
हे नृपसत्तम! पितृलोक से पर्वतराज कैलास की ओर आते हुए कुबेर वहाँ एक मुहूर्त के लिए विश्राम करते थे।
श्लोक 3 (skanda.5.313.3)
प्रत्ययार्थं नृपश्रेष्ठ ह्यद्यापि धरणीतले। कृष्णवर्णा हि पाषाणा दृश्यन्ते स्फटिकोज्ज्वलाः॥
pratyayārthaṁ nṛpaśreṣṭha hyadyāpi dharaṇītale| kṛṣṇavarṇā hi pāṣāṇā dṛśyante sphaṭikojjvalāḥ||
हे नृपश्रेष्ठ! इसकी प्रामाणिकता के लिए आज भी धरतीतल पर स्फटिक के समान उज्ज्वल काले रंग के पत्थर दिखाई देते हैं।
श्लोक 4 (skanda.5.313.4)
विन्ध्यनिर्झरनिष्क्रान्ता पुण्यतोया सरिद्वरा। प्रविष्टा नर्मदातोये सर्वपापप्रणाशने॥
vindhyanirjharaniṣkrāntā puṇyatoyā saridvarā| praviṣṭā narmadātoye sarvapāpapraṇāśane||
विन्ध्य पर्वत के झरने से निकली हुई, पवित्र जल वाली श्रेष्ठ नदी, समस्त पापों का नाश करने वाले नर्मदा के जल में प्रविष्ट हुई।
श्लोक 5 (skanda.5.313.5)
सङ्गमे तत्र यः स्नात्वा पूजयेत्सङ्गमेश्वरम्। अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयम्॥
saṅgame tatra yaḥ snātvā pūjayetsaṅgameśvaram| aśvamedhasya yajñasya phalaṁ prāpnotyasaṁśayam||
उस संगम में स्नान करके जो संगमेश्वर की पूजा करता है, वह निःसन्देह अश्वमेध यज्ञ के फल को प्राप्त करता है।
श्लोक 6 (skanda.5.313.6)
घण्टापताकावितनं यो ददेत्सङ्गमेश्वरे। हंसयुक्तविमानस्थो दिव्यस्त्रीशतसंवृतः॥
ghaṇṭāpatākāvitanaṁ yo dadetsaṅgameśvare| haṁsayuktavimānastho divyastrīśatasaṁvṛtaḥ||
जो संगमेश्वर में घण्टा और पताका का समर्पण करता है, वह हंसयुक्त विमान पर बैठकर, सैकड़ों दिव्य स्त्रियों से घिरा हुआ,
श्लोक 7 (skanda.5.313.7)
स रुद्रपदमाप्नोति रुद्रस्यानुचरो भवेत्। दधि भक्ते न देवस्य यः कुर्याल्लिङ्गपूरणम्॥
sa rudrapadamāpnoti rudrasyānucaro bhavet| dadhi bhakte na devasya yaḥ kuryālliṅgapūraṇam||
- रुद्र के पद को प्राप्त करता है और रुद्र का अनुचर बनता है। जो देव के भक्त-कर्म में दही से लिंग का पूरण करता है,
श्लोक 8 (skanda.5.313.8)
सिक्थसंख्यं शिवे लोके स वसेत्कालमीप्सितम्। श्रीफलैः पूरयेल्लिङ्गं निःस्वो भूत्वा भवस्य तु॥
sikthasaṁkhyaṁ śive loke sa vasetkālamīpsitam| śrīphalaiḥ pūrayelliṅgaṁ niḥsvo bhūtvā bhavasya tu||
वह शिवलोक में उतने ही समय तक निवास करता है जितने उस दही के कण होते हैं। जो निर्धन होकर भी बिल्वफलों से शिव के लिंग का पूरण करता है,
श्लोक 9 (skanda.5.313.9)
सोऽपि तत्फलमाप्नोति गतः स्वर्गे नरेश्वर। अक्षया सन्ततिस्तस्य जायते सप्तजन्मसु॥
so'pi tatphalamāpnoti gataḥ svarge nareśvara| akṣayā santatistasya jāyate saptajanmasu||
वह भी, हे नरेश्वर! उस फल को प्राप्त करके स्वर्ग जाता है। उसकी सन्तति सात जन्मों तक अक्षय बनी रहती है।
श्लोक 10 (skanda.5.313.10)
स्नपनं देवदेवस्य दध्ना मधुघृतेन वा। यः करोति विधानेन तस्य पुण्यफलं शृणु॥
snapanaṁ devadevasya dadhnā madhughṛtena vā| yaḥ karoti vidhānena tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu||
जो देवाधिदेव का अभिषेक विधिपूर्वक दही, मधु अथवा घी से करता है, उसका पुण्यफल सुनो।
श्लोक 11 (skanda.5.313.11)
धृतक्षीरवहा नद्यो यत्र वृक्षा मधुस्रवाः। तत्र ते मानवा यान्ति सुप्रसन्ने महेश्वरे॥
dhṛtakṣīravahā nadyo yatra vṛkṣā madhusravāḥ| tatra te mānavā yānti suprasanne maheśvare||
महेश्वर के अत्यन्त प्रसन्न होने पर वे मनुष्य उस लोक में जाते हैं जहाँ घी-दूध बहाने वाली नदियाँ हैं और मधु टपकाने वाले वृक्ष हैं।
श्लोक 12 (skanda.5.313.12)
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यस्तु दद्यान्महेश्वरे। तत्सर्वं सप्तजन्मानि ह्यक्षयं फलमश्नुते॥
patraṁ puṣpaṁ phalaṁ toyaṁ yastu dadyānmaheśvare| tatsarvaṁ saptajanmāni hyakṣayaṁ phalamaśnute||
जो महेश्वर को पत्र, पुष्प, फल अथवा जल अर्पित करता है, वह सब सात जन्मों तक अक्षय फल भोगता है।
श्लोक 13 (skanda.5.313.13)
सर्वेषामेव पात्राणां महापात्रं महेश्वरः। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पूजनीयो महेश्वरः॥
sarveṣāmeva pātrāṇāṁ mahāpātraṁ maheśvaraḥ| tasmātsarvaprayatnena pūjanīyo maheśvaraḥ||
समस्त पात्रों में महेश्वर महापात्र हैं; अतः समस्त प्रयत्नों से महेश्वर की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 14 (skanda.5.313.14)
ब्रह्मचर्यस्थितो नित्यं यस्तु पूजयते शिवम्। इह जीवन्स देवेशो मृतो गच्छेदनामयम्॥
brahmacaryasthito nityaṁ yastu pūjayate śivam| iha jīvansa deveśo mṛto gacchedanāmayam||
जो सदैव ब्रह्मचर्य में स्थित होकर शिव की पूजा करता है, वह जीवित रहते हुए ही देवेश-स्वरूप हो जाता है और मरने पर रोगरहित लोक को जाता है।
श्लोक 15 (skanda.5.313.15)
शिवे तु पूजिते पार्थ यत्फलं प्राप्यते बुधैः। योगीन्द्रे चैव तत्पार्थ पूजिते लभते फलम्॥
śive tu pūjite pārtha yatphalaṁ prāpyate budhaiḥ| yogīndre caiva tatpārtha pūjite labhate phalam||
हे पार्थ! शिव की पूजा से बुद्धिमान लोग जो फल प्राप्त करते हैं, हे पार्थ! वही फल योगीन्द्र की पूजा से भी प्राप्त होता है।
श्लोक 16 (skanda.5.313.16)
ते धन्यास्ते महात्मानस्तेषां जन्म सुजीवितम्। येषां गृहेषु भुञ्जन्ति शिवभक्तिरता नराः॥
te dhanyāste mahātmānasteṣāṁ janma sujīvitam| yeṣāṁ gṛheṣu bhuñjanti śivabhaktiratā narāḥ||
वे धन्य हैं, वे महात्मा हैं, उनका जन्म और जीवन सफल है, जिनके घरों में शिवभक्ति में रत मनुष्य भोजन करते हैं।
श्लोक 17 (skanda.5.313.17)
संनिरुध्येन्द्रियग्रामं यत्रयत्र वसेन्मुनिः। तत्र तत्र कुरुक्षेत्रं नैमिषं पुष्कराणि च॥
saṁnirudhyendriyagrāmaṁ yatrayatra vasenmuniḥ| tatra tatra kurukṣetraṁ naimiṣaṁ puṣkarāṇi ca||
इन्द्रियसमूह का निग्रह करके मुनि जहाँ-जहाँ निवास करता है, वहाँ-वहाँ कुरुक्षेत्र, नैमिष और पुष्कर स्वयं उपस्थित हो जाते हैं।
श्लोक 18 (skanda.5.313.18)
यत्फलं वेदविदुषि भोजिते शतसंख्यया। तत्फलं जायते पार्थ ह्येकेन शिवयोगिना॥
yatphalaṁ vedaviduṣi bhojite śatasaṁkhyayā| tatphalaṁ jāyate pārtha hyekena śivayoginā||
सौ वेदज्ञों को भोजन कराने से जो फल मिलता है, हे पार्थ! वही फल एक शिवयोगी को भोजन कराने से प्राप्त होता है।
श्लोक 19 (skanda.5.313.19)
यत्र भुञ्जति भस्माङ्गी मूर्खो वा यदि पण्डितः। तत्र भुञ्जति देवेशः सपत्नीको वृषध्वजः॥
yatra bhuñjati bhasmāṅgī mūrkho vā yadi paṇḍitaḥ| tatra bhuñjati deveśaḥ sapatnīko vṛṣadhvajaḥ||
जहाँ भस्म-अंगी शैव साधक भोजन करता है, चाहे वह मूर्ख हो या पण्डित, वहाँ वृषभध्वज देवेश अपनी पत्नी सहित भोजन करते हैं।
श्लोक 20 (skanda.5.313.20)
विप्राणां वेदविदुषां कोटिं संभोज्य यत्फलम्। भिक्षामात्रप्रदानेन तत्फलं शिवयोगिनाम्॥
viprāṇāṁ vedaviduṣāṁ koṭiṁ saṁbhojya yatphalam| bhikṣāmātrapradānena tatphalaṁ śivayoginām||
वेदज्ञ करोड़ों ब्राह्मणों को भोजन कराने से जो फल मिलता है, वही फल शिवयोगियों को मात्र भिक्षा देने से प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 21 (skanda.5.313.21)
सङ्गमेश्वरमासाद्य प्राणत्यागं करोति यः। न तस्य पुनरावृत्तिः शिवलोकात्कदाचन॥
saṅgameśvaramāsādya prāṇatyāgaṁ karoti yaḥ| na tasya punarāvṛttiḥ śivalokātkadācana||
जो संगमेश्वर को प्राप्त करके प्राणत्याग करता है, उसकी शिवलोक से पुनरावृत्ति कभी नहीं होती।