अवन्ती खण्ड · अध्याय 326
माण्डव्य की कथा और शाण्डिली-ऋषि संवाद
श्लोक 1 (skanda.5.326.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। कथितं ब्राह्मणं द्रष्टुं शूले क्षिप्तं तपोधनैः । नारायणसमीपे तु गताः सर्वे महर्षयः ॥ १ ॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| kathitaṁ brāhmaṇaṁ draṣṭuṁ śūle kṣiptaṁ tapodhanaiḥ | nārāyaṇasamīpe tu gatāḥ sarve maharṣayaḥ || 1 ||
श्री मार्कण्डेय जी ने कहा - शूल पर चढ़ाए गए ब्राह्मण के विषय में सुनकर, तपस्वी महर्षिगण उसे देखने के लिए नारायण मुनि के समीप पहुँचे।
श्लोक 2 (skanda.5.326.2)
नारदो देवलो रैभ्यो यमः शातातपोऽङ्गिराः । वसिष्ठो जमदग्निश्च याज्ञवल्क्यो बृहस्पतिः ॥ २ ॥
nārado devalo raibhyo yamaḥ śātātapo'ṅgirāḥ | vasiṣṭho jamadagniśca yājñavalkyo bṛhaspatiḥ || 2 ||
नारद, देवल, रैभ्य, यम, शातातप, अंगिरा, वसिष्ठ, जमदग्नि, याज्ञवल्क्य और बृहस्पति —
श्लोक 3 (skanda.5.326.3)
कश्यपोऽत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोऽरुणिर्मुनिः । वालखिल्यादयोऽन्ये च सर्वेऽप्यृषिगणान्वयाः ॥ ३ ॥
kaśyapo'trirbharadvājo viśvāmitro'ruṇirmuniḥ | vālakhilyādayo'nye ca sarve'pyṛṣigaṇānvayāḥ || 3 ||
कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, मुनि अरुणि, वालखिल्यगण और अनेक ऋषिकुलों के अन्य मुनि —
श्लोक 4 (skanda.5.326.4)
ददृशुः शूलमारूढं माण्डव्यमृषिपुंगवाः । प्रोचुर्नारायणं विप्रं किं कुर्मस्तव चेप्सितम् ॥ ४ ॥
dadṛśuḥ śūlamārūḍhaṁ māṇḍavyamṛṣipuṅgavāḥ | procurnārāyaṇaṁ vipraṁ kiṁ kurmastava cepsitam || 4 ||
उन श्रेष्ठ ऋषियों ने शूल पर चढ़े हुए माण्डव्य को देखा और ब्राह्मण नारायण से कहा - 'हम क्या करें? तुम्हारी क्या इच्छा है, बताओ।'
श्लोक 5 (skanda.5.326.5)
सर्वे ते तत्र सांनिध्यान्माण्डव्यस्य महात्मनः । संभ्रान्ता आगता ऊचुः किं मृतः किं नु जीवति ॥ ५ ॥
sarve te tatra sānnidhyānmāṇḍavyasya mahātmanaḥ | sambhrāntā āgatā ūcuḥ kiṁ mṛtaḥ kiṁ nu jīvati || 5 ||
वे सब घबराए हुए महात्मा माण्डव्य के समीप पहुँचे और पूछने लगे - 'क्या यह मर गया है, या अभी जीवित है?'
श्लोक 6 (skanda.5.326.6)
अवस्थां तस्य ते दृष्ट्वा विषादमगमन्परम् । असहित्वा तु तद्दुःखं सर्वे ते मनसा द्विजाः ॥ ६ ॥
avasthāṁ tasya te dṛṣṭvā viṣādamagamanparam | asahitvā tu tadduḥkhaṁ sarve te manasā dvijāḥ || 6 ||
उसकी दशा देखकर वे अत्यन्त दुःखी हो गए; वे सभी ब्राह्मण मन में उस पीड़ा को सहन न कर सके,
श्लोक 7 (skanda.5.326.7)
पृच्छ्यतां यदि मन्येत राजानं भस्मसात्कुरु । तेषां तद्वचनं श्रुत्वा वाक्यं नारायणोऽब्रवीत् ॥ ७ ॥
pṛcchyatāṁ yadi manyeta rājānaṁ bhasmasātkuru | teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā vākyaṁ nārāyaṇo'bravīt || 7 ||
[आपस में कहने लगे] 'यदि यह चाहे तो इससे पूछा जाए - और राजा को भस्म कर दिया जाए!' उनकी यह बात सुनकर नारायण ने यह वचन कहा -
श्लोक 8 (skanda.5.326.8)
मयि जीवति मद्भ्राता ह्यवस्थामीदृशीं गतः । धिग्जीवितं च मे किंतु तपसो विद्यते फलम् ॥ ८ ॥
mayi jīvati madbhrātā hyavasthāmīdṛśīṁ gataḥ | dhigjīvitaṁ ca me kiṁtu tapaso vidyate phalam || 8 ||
'मेरे जीते-जी मेरा भाई इस दशा को प्राप्त हुआ है - धिक्कार है मेरे जीवन को! किन्तु यह तो तपस्या का ही फल विद्यमान है।
श्लोक 9 (skanda.5.326.9)
दृष्ट्वा शूलस्थितं ज्येष्ठं मन्मनो नु विदीर्यते । परं किं तु करिष्यामि येन राष्ट्रं सराजकम् ॥ ९ ॥
dṛṣṭvā śūlasthitaṁ jyeṣṭhaṁ manmano nu vidīryate | paraṁ kiṁ tu kariṣyāmi yena rāṣṭraṁ sarājakam || 9 ||
शूल पर स्थित अपने ज्येष्ठ भ्राता को देखकर मेरा मन मानो विदीर्ण हो रहा है। परन्तु मैं क्या करूँ, जिससे राजा सहित सम्पूर्ण राष्ट्र -
श्लोक 10 (skanda.5.326.10)
भस्मसाच्च करोम्यद्य भवद्भिः क्षम्यतामिह । एवमुक्त्वा गृहीत्वासौ करस्थमभिमन्त्रयेत् ॥ १० ॥
bhasmasācca karomyadya bhavadbhiḥ kṣamyatāmiha | evamuktvā gṛhītvāsau karasthamabhimantrayet || 10 ||
- आज भस्म कर दूँ - इसके लिए आप सब मुझे क्षमा करें।' ऐसा कहकर उसने हाथ में जल लेकर उसे मन्त्रों से अभिमन्त्रित करना आरम्भ किया।
श्लोक 11 (skanda.5.326.11)
क्रोधेन पश्यते यावत्तावद्धुंकारकोऽभवत् । तेन हुङ्कारशब्देन ऋषयो विस्मितास्तदा ॥ ११ ॥
krodhena paśyate yāvattāvaddhuṁkārako'bhavat | tena huṅkāraśabdena ṛṣayo vismitāstadā || 11 ||
क्रोध से देखते ही एक 'हुं' की ध्वनि उत्पन्न हुई। उस हुंकार-शब्द को सुनकर ऋषिगण चकित रह गए।
श्लोक 12 (skanda.5.326.12)
माण्डव्यस्य समीपे तु ह्यपृच्छंस्ते द्विजोत्तमाः । निवारयसि किं विप्र शापं नृपजिघांसनम् ॥ १२ ॥
māṇḍavyasya samīpe tu hyapṛcchaṁste dvijottamāḥ | nivārayasi kiṁ vipra śāpaṁ nṛpajighāṁsanam || 12 ||
तब माण्डव्य के समीप उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने पूछा - 'हे विप्र! राजा का नाश करने वाले शाप को तुम क्यों रोक रहे हो?'
श्लोक 13 (skanda.5.326.13)
अपापस्य तु येनेह कृतमस्य जिघांसनम् । ऋषीणां वचनं श्रुत्वा कृच्छ्रान्माण्डव्यकोऽब्रवीत् ॥ १३ ॥
apāpasya tu yeneha kṛtamasya jighāṁsanam | ṛṣīṇāṁ vacanaṁ śrutvā kṛcchrānmāṇḍavyako'bravīt || 13 ||
- 'जिसने इस निष्पाप को मारने का प्रयत्न किया है।' ऋषियों की यह बात सुनकर माण्डव्य ने बड़े कष्ट से कहा -
श्लोक 14 (skanda.5.326.14)
अभिवन्दामि वो मूर्ध्ना स्वागतं ऋषयः सदा । अर्घ्यसन्मानपूजार्हाः सर्वेऽत्रोपविशन्तु ते ॥ १४ ॥
abhivandāmi vo mūrdhnā svāgataṁ ṛṣayaḥ sadā | arghyasanmānapūjārhāḥ sarve'tropaviśantu te || 14 ||
'मैं सिर झुकाकर आप सबको प्रणाम करता हूँ; हे ऋषिगण, आपका सदा स्वागत है। अर्घ्य, सम्मान और पूजा के योग्य आप सब यहाँ विराजमान हों।'
श्लोक 15 (skanda.5.326.15)
निविष्टैकाग्रमनसा सर्वान्माण्डव्यकोऽब्रवीत् ॥ १५ ॥
niviṣṭaikāgramanasā sarvānmāṇḍavyako'bravīt || 15 ||
एकाग्रचित्त होकर माण्डव्य ने उन सबसे कहा।
श्लोक 16 (skanda.5.326.16)
प्राप्तं दुःखं मया घोरं पूर्वजन्मार्जितं फलम् । मा विषादं कुरुध्वं भोः कृतं पापं तु भुज्यते ॥ १६ ॥
prāptaṁ duḥkhaṁ mayā ghoraṁ pūrvajanmārjitaṁ phalam | mā viṣādaṁ kurudhvaṁ bhoḥ kṛtaṁ pāpaṁ tu bhujyate || 16 ||
'मुझे यह जो घोर दुःख प्राप्त हुआ है, यह पूर्वजन्म में अर्जित कर्मफल है। हे महानुभावो, विषाद न करें - किया गया पाप अवश्य भोगना पड़ता है।'
श्लोक 17 (skanda.5.326.17)
ऋषय ऊचुः । केन कर्मविपाकेन इह जात्यन्तरं व्रजेत् । दानधर्मफलेनैव केन स्वर्गं च गच्छति ॥ १७ ॥
ṛṣaya ūcuḥ | kena karmavipākena iha jātyantaraṁ vrajet | dānadharmaphalenaiva kena svargaṁ ca gacchati || 17 ||
ऋषियों ने कहा - 'किस कर्म के परिपाक से इस लोक में मनुष्य दूसरी योनि को प्राप्त होता है? और किस दान-धर्म के फल से स्वर्ग को प्राप्त होता है?'
श्लोक 18 (skanda.5.326.18)
माण्डव्य उवाच। अदत्तदाना जायन्ते परभाग्योपजीविनः । न स्नानं न जपो होमो नातिथ्यं न सुरार्चनम् ॥ १८ ॥
māṇḍavya uvāca| adattadānā jāyante parabhāgyopajīvinaḥ | na snānaṁ na japo homo nātithyaṁ na surārcanam || 18 ||
माण्डव्य ने कहा - 'जो लोग दान नहीं देते, वे दूसरों के भाग्य पर आश्रित होकर जीवन बिताने वाले बनते हैं - जिनके यहाँ न स्नान है, न जप, न हवन, न अतिथिसत्कार, न देवपूजा -
श्लोक 19 (skanda.5.326.19)
न पर्वणि पितृश्राद्धं न दानं द्विजसत्तमाः । व्रजन्ति नरके घोरे यान्ति ते त्वन्त्यजां गतिम् ॥ १९ ॥
na parvaṇi pitṛśrāddhaṁ na dānaṁ dvijasattamāḥ | vrajanti narake ghore yānti te tvantyajāṁ gatim || 19 ||
- न पर्व पर पितृश्राद्ध, न दान, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो - ऐसे लोग घोर नरक को जाते हैं और अन्त्यज (निम्न) योनि को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 20 (skanda.5.326.20)
पुनर्दरिद्राः पुनरेव पापाः पापप्रभावान्नरके वसन्ति । तेनैव संसरिणि मर्त्यलोके जीवादिभूते कृमयः पतङ्गाः ॥ २० ॥
punardaridrāḥ punareva pāpāḥ pāpaprabhāvānnarake vasanti | tenaiva saṁsariṇi martyaloke jīvādibhūte kṛmayaḥ pataṅgāḥ || 20 ||
वे बार-बार दरिद्र होते हैं, बार-बार पापी होते हैं, पाप के प्रभाव से नरक में वास करते हैं; और उसी संसारचक्र में इस मृत्युलोक में कीड़े-पतंगे आदि निम्न जीवयोनियों में जन्म लेते हैं।
श्लोक 21 (skanda.5.326.21)
ये स्नानशीला द्विजदेवभक्ता जितेन्द्रिया जीवदयानुशीलाः । ते देवलोकेषु वसन्ति हृष्टा ये धर्मशीला जितमानरोषाः ॥ २१ ॥
ye snānaśīlā dvijadevabhaktā jitendriyā jīvadayānuśīlāḥ | te devalokeṣu vasanti hṛṣṭā ye dharmaśīlā jitamānaroṣāḥ || 21 ||
जो नित्य स्नानशील, ब्राह्मण-देवभक्त, जितेन्द्रिय और जीवों पर दया रखने वाले हैं, जो धर्मशील तथा मान-क्रोध को जीत चुके हैं, वे प्रसन्नतापूर्वक देवलोकों में निवास करते हैं।
श्लोक 22 (skanda.5.326.22)
विद्याविनीता न परोपतापिनः स्वदारतुष्टाः परदारवर्जिताः । तेषां न लोके भयमस्ति किंचित्स्वभावशुद्धा गतकल्मषा हि ते ॥ २२ ॥
vidyāvinītā na paropatāpinaḥ svadāratuṣṭāḥ paradāravarjitāḥ | teṣāṁ na loke bhayamasti kiṁcitsvabhāvaśuddhā gatakalmaṣā hi te || 22 ||
जो विद्या से विनम्र हैं, दूसरों को कष्ट नहीं देते, अपनी पत्नी से संतुष्ट रहते हैं और परस्त्री का त्याग करते हैं - उन्हें संसार में कोई भय नहीं होता, क्योंकि वे स्वभाव से शुद्ध और पापरहित हैं।
श्लोक 23 (skanda.5.326.23)
ऋषय ऊचुः । पूर्वजन्मनि विप्रेन्द्र किं त्वया दुष्कृतं कृतम् । येन कष्टमिदं प्राप्तं सन्धानं शूलगर्हितम् ॥ २३ ॥
ṛṣaya ūcuḥ | pūrvajanmani viprendra kiṁ tvayā duṣkṛtaṁ kṛtam | yena kaṣṭamidaṁ prāptaṁ sandhānaṁ śūlagarhitam || 23 ||
ऋषियों ने कहा - 'हे विप्रेन्द्र! पूर्वजन्म में तुमने कौन-सा दुष्कर्म किया था, जिससे शूल में गड़ा हुआ यह निन्दनीय कष्ट तुम्हें प्राप्त हुआ?'
श्लोक 24 (skanda.5.326.24)
शूलस्थं त्वां समालक्ष्य ह्यागताः सर्व एव हि । जीवन्तं त्वां प्रपश्याम त्वन्तरन्नवतारयन् । रुजासंतापजं दुःखं सोढ्वापि त्वमवेदनः ॥ २४ ॥
śūlasthaṁ tvāṁ samālakṣya hyāgatāḥ sarva eva hi | jīvantaṁ tvāṁ prapaśyāma tvantarannavatārayan | rujāsaṁtāpajaṁ duḥkhaṁ soḍhvāpi tvamavedanaḥ || 24 ||
'शूल पर स्थित तुम्हें देखकर हम सब यहाँ आए हैं। हम तुम्हें जीवित देख रहे हैं - हम तुम्हें भीतर से निकालते हैं। पीड़ा से उत्पन्न इस कष्ट को सहते हुए भी तुम मानो वेदनारहित प्रतीत होते हो।'
श्लोक 25 (skanda.5.326.25)
माण्डव्य उवाच। स्वयमेव कृतं कर्म स्वयमेवोपभुज्यते । सुकृतं दुष्कृतं पूर्वे नान्ये भुञ्जन्ति कर्हिचित् ॥ २५ ॥
māṇḍavya uvāca| svayameva kṛtaṁ karma svayamevopabhujyate | sukṛtaṁ duṣkṛtaṁ pūrve nānye bhuñjanti karhicit || 25 ||
माण्डव्य ने कहा - 'जो कर्म मनुष्य स्वयं करता है, उसे स्वयं ही भोगना पड़ता है। पूर्वजन्म में किया गया शुभ या अशुभ कर्म दूसरा कोई कभी नहीं भोगता।'
श्लोक 26 (skanda.5.326.26)
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम् । तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमुपगच्छति ॥ २६ ॥
yathā dhenusahasreṣu vatso vindati mātaram | tathā pūrvakṛtaṁ karma kartāramupagacchati || 26 ||
जैसे हजारों गायों के बीच बछड़ा अपनी ही माता को पहचान लेता है, वैसे ही पूर्वकाल में किया गया कर्म अपने कर्ता को खोज ही लेता है।
श्लोक 27 (skanda.5.326.27)
न माता न पिता भ्राता न भार्या न सुताः सुहृत् । न कस्य कर्मणां लेपः स्वयमेवोपभुज्यते ॥ २७ ॥
na mātā na pitā bhrātā na bhāryā na sutāḥ suhṛt | na kasya karmaṇāṁ lepaḥ svayamevopabhujyate || 27 ||
न माता, न पिता, न भाई, न पत्नी, न पुत्र, न मित्र - किसी के कर्मों का लेप किसी दूसरे को नहीं लगता; प्रत्येक अपने ही कर्म को स्वयं भोगता है।
श्लोक 28 (skanda.5.326.28)
श्रूयतां मम वाक्यं च भवद्भिः पृच्छितो ह्यहम् । पूर्वे वयसि भो विप्रा मलस्नानकृतक्षणः ॥ २८ ॥
śrūyatāṁ mama vākyaṁ ca bhavadbhiḥ pṛcchito hyaham | pūrve vayasi bho viprā malasnānakṛtakṣaṇaḥ || 28 ||
मेरी बात सुनिए, क्योंकि आपने मुझसे पूछा है। हे विप्रो, अपनी पूर्व अवस्था में, जब मैं मैल धोने के लिए स्नान कर रहा था -
श्लोक 29 (skanda.5.326.29)
अज्ञानाद्बालभावेन यूका कण्टेऽधिरोपिता । तैलाभ्यक्तशिरोगात्रे मया यूका घृता न हि ॥ २९ ॥
ajñānādbālabhāvena yūkā kaṇṭe'dhiropitā | tailābhyaktaśirogātre mayā yūkā ghṛtā na hi || 29 ||
- अज्ञानतावश, बालसुलभ भाव से, मैंने एक जूँ को काँटे में छेदकर बींध दिया। तेल से चुपड़े सिर और शरीर पर उस जूँ को मैंने कोमलता से नहीं पकड़ा।
श्लोक 30 (skanda.5.326.30)
कङ्कतीं रोप्य केशेषु सासा कण्टेऽधिरोपिता । तेषु पापं कृतं सद्यः फलमेतन्ममाभवत् ॥ ३० ॥
kaṅkatīṁ ropya keśeṣu sāsā kaṇṭe'dhiropitā | teṣu pāpaṁ kṛtaṁ sadyaḥ phalametanmamābhavat || 30 ||
बालों में कंघी करते हुए, मैंने उसी प्रकार उस जूँ को काँटे में बींध डाला। उसी पाप के कारण यह फल तत्काल ही मुझे प्राप्त हुआ है।
श्लोक 31 (skanda.5.326.31)
किंचित्कालं क्षपित्वाहं प्राप्स्ये मोक्षं निरामयम् । भवन्तस्त्विह सन्तापं मां कुरुध्वं महर्षयः ॥ ३१ ॥
kiṁcitkālaṁ kṣapitvāhaṁ prāpsye mokṣaṁ nirāmayam | bhavantastviha santāpaṁ māṁ kurudhvaṁ maharṣayaḥ || 31 ||
कुछ काल तक इस कर्म को क्षीण करने के पश्चात् मैं निरामय मोक्ष को प्राप्त करूँगा। हे महर्षियो, आप लोग मेरे लिए संताप न करें।
श्लोक 32 (skanda.5.326.32)
इमामवस्थां भुक्त्वाहं कंचिच्छपे न चोच्चरे । अहनि कतिचिच्छूले क्षपयिष्यामि किल्बिषम् ॥ ३२ ॥
imāmavasthāṁ bhuktvāhaṁ kaṁcicchape na coccare | ahani katicicchūle kṣapayiṣyāmi kilbiṣam || 32 ||
इस अवस्था को भोगते हुए मैं किसी को शाप नहीं देता, न ही कुछ कहता हूँ। कुछ और दिनों तक शूल पर रहकर ही मैं अपने पाप को क्षीण करूँगा।
श्लोक 33 (skanda.5.326.33)
प्राक्तनं कर्म भुञ्जामि यन्मया संचितं द्विजाः । क्षन्तव्यमस्य राज्ञोऽथ कोपश्चैव विसर्ज्यताम् ॥ ३३ ॥
prāktanaṁ karma bhuñjāmi yanmayā saṁcitaṁ dvijāḥ | kṣantavyamasya rājño'tha kopaścaiva visarjyatām || 33 ||
हे ब्राह्मणो, मैं अपने ही संचित पूर्वकर्म को भोग रहा हूँ। अतः इस राजा को क्षमा किया जाए और इसके प्रति क्रोध का त्याग कर दिया जाए।
श्लोक 34 (skanda.5.326.34)
श्रुत्वा तु तस्य तद्वाक्यं माण्डव्यस्य महर्षयः । प्रहर्षमतुलं लब्ध्वा साधु साध्वित्यपूजयन् ॥ ३४ ॥
śrutvā tu tasya tadvākyaṁ māṇḍavyasya maharṣayaḥ | praharṣamatulaṁ labdhvā sādhu sādhvityapūjayan || 34 ||
माण्डव्य के इन वचनों को सुनकर महर्षिगण अत्यन्त हर्षित हुए और 'साधु! साधु!' कहकर उनका सम्मान करने लगे।
श्लोक 35 (skanda.5.326.35)
नारायण उवाच। इदं जलं मन्त्रपूतं कस्मिन्स्थाने क्षिपाम्यहम् । येन राजा भवेद्भस्म सराष्ट्रः सपुरोहितः ॥ ३५ ॥
nārāyaṇa uvāca| idaṁ jalaṁ mantrapūtaṁ kasminsthāne kṣipāmyaham | yena rājā bhavedbhasma sarāṣṭraḥ sapurohitaḥ || 35 ||
नारायण ने कहा - 'मन्त्र से पवित्र किए गए इस जल को मैं कहाँ फेंकूँ, जिससे राजा राष्ट्र और पुरोहित सहित भस्म हो जाए?'
श्लोक 36 (skanda.5.326.36)
माण्डव्य उवाच। इदं जलं च रक्षस्व कालकूटविषोपमम् । समुद्रे क्षिपयिष्यामि देवकार्यं समुत्थितम् ॥ ३६ ॥
māṇḍavya uvāca| idaṁ jalaṁ ca rakṣasva kālakūṭaviṣopamam | samudre kṣipayiṣyāmi devakāryaṁ samutthitam || 36 ||
माण्डव्य ने कहा - 'कालकूट विष के समान इस जल की तुम रक्षा करो। मैं इसे समुद्र में डलवा दूँगा, क्योंकि इससे कोई देवकार्य सिद्ध होने वाला है।'
श्लोक 37 (skanda.5.326.37)
अथ ते मुनयः सर्वे माण्डव्यं प्रणिपत्य च । आमन्त्रयित्वा हर्षाच्च कश्यपाद्या गृहान्ययुः ॥ ३७ ॥
atha te munayaḥ sarve māṇḍavyaṁ praṇipatya ca | āmantrayitvā harṣācca kaśyapādyā gṛhānyayuḥ || 37 ||
तब वे सभी मुनि माण्डव्य को प्रणाम करके और हर्षपूर्वक विदा लेकर, कश्यप आदि अपने-अपने घरों को चले गए।
श्लोक 38 (skanda.5.326.38)
गच्छमानास्तु ते चोक्ताः पञ्चमेऽहनि तापसाः । आगन्तव्यं भवद्भिश्च मत्सकाशं प्रतिज्ञया ॥ ३८ ॥
gacchamānāstu te coktāḥ pañcame'hani tāpasāḥ | āgantavyaṁ bhavadbhiśca matsakāśaṁ pratijñayā || 38 ||
जाते समय उन तपस्वियों से [माण्डव्य ने] कहा - 'पाँचवें दिन आप लोगों को वचनबद्ध होकर पुनः मेरे पास आना है।'
श्लोक 39 (skanda.5.326.39)
तथेति ते प्रतिज्ञाय नारदाद्या अदर्शनम् । गतेषु विप्रमुख्येषु शाण्डिली च तपोधना ॥ ३९ ॥
tatheti te pratijñāya nāradādyā adarśanam | gateṣu vipramukhyeṣu śāṇḍilī ca tapodhanā || 39 ||
'ऐसा ही होगा' कहकर उन्होंने प्रतिज्ञा की, और नारद आदि अदृश्य हो गए। उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों के चले जाने पर तपस्विनी शाण्डिली -
श्लोक 40 (skanda.5.326.40)
द्वितीयेऽह्नि समायाता न तु बुद्ध्वाथ तं ऋषिम् । भर्तारं शिरसा धार्य रात्रौ पर्यटते स्म सा ॥ ४० ॥
dvitīye'hni samāyātā na tu buddhvātha taṁ ṛṣim | bhartāraṁ śirasā dhārya rātrau paryaṭate sma sā || 40 ||
- दूसरे दिन वहाँ पहुँची, किन्तु उस ऋषि को पहचान न सकी। अपने पति को सिर पर धारण किए हुए वह रात्रि में इधर-उधर घूम रही थी।
श्लोक 41 (skanda.5.326.41)
न दृष्टः शूलके विप्रो भराक्रान्त्या युधिष्ठिर । स्खलिता तस्य जानुभ्यां शूलस्थस्य पतिव्रता ॥ ४१ ॥
na dṛṣṭaḥ śūlake vipro bharākrāntyā yudhiṣṭhira | skhalitā tasya jānubhyāṁ śūlasthasya pativratā || 41 ||
हे युधिष्ठिर! भार से दबी हुई वह शूल पर स्थित उस ब्राह्मण को न देख सकी; उस पतिव्रता के घुटने शूल पर स्थित उस मुनि से टकरा गए।
श्लोक 42 (skanda.5.326.42)
सर्वाङ्गेषु व्यथा जाता तस्याः प्रस्खलनान्मुनेः । ईदृशीं वर्तमानां च ह्यवस्थां पूर्वदैविकीम् ॥ ४२ ॥
sarvāṅgeṣu vyathā jātā tasyāḥ praskhalanānmuneḥ | īdṛśīṁ vartamānāṁ ca hyavasthāṁ pūrvadaivikīm || 42 ||
उसके टकराने से उस मुनि के समस्त अंगों में पीड़ा उत्पन्न हो गई; [उन्होंने विचार किया] मेरी यह वर्तमान दशा तो पूर्वजन्म के दैवकृत कर्म से बनी है, -
श्लोक 43 (skanda.5.326.43)
पुनः पापफलं किंचिद्धा कष्टं मम वर्तते । व्यथितोऽहं त्वया पापे किमर्थं सूनकर्मणि ॥ ४३ ॥
punaḥ pāpaphalaṁ kiṁciddhā kaṣṭaṁ mama vartate | vyathito'haṁ tvayā pāpe kimarthaṁ sūnakarmaṇi || 43 ||
[मुनि ने कहा] 'हाय! पुनः किसी पापफल के कारण यह कष्ट मुझे प्राप्त हो रहा है। हे पापिनी! तूने इस क्रूर कर्म से मुझे क्यों व्यथित किया?
श्लोक 44 (skanda.5.326.44)
स्वैरिणीं त्वां प्रपश्यामि राक्षसी तस्करी नु किम् । एवमुक्त्वा क्षणं मोहात्क्रन्दमानो मुहुर्मुहुः ॥ ४४ ॥
svairiṇīṁ tvāṁ prapaśyāmi rākṣasī taskarī nu kim | evamuktvā kṣaṇaṁ mohātkrandamāno muhurmuhuḥ || 44 ||
मुझे तू स्वच्छन्द विचरने वाली स्त्री जान पड़ती है - क्या तू राक्षसी है या चोरनी?' ऐसा कहकर वह क्षणभर मोहग्रस्त होकर बार-बार विलाप करने लगा।
श्लोक 45 (skanda.5.326.45)
तपस्विनोऽथ ऋषयः सर्वे संत्रस्तमानसाः । पश्यमाना मुनेः कष्टं पृच्छन्ते ते युधिष्ठिर ॥ ४५ ॥
tapasvino'tha ṛṣayaḥ sarve saṁtrastamānasāḥ | paśyamānā muneḥ kaṣṭaṁ pṛcchante te yudhiṣṭhira || 45 ||
हे युधिष्ठिर! तब समस्त तपस्वी ऋषिगण भयभीत मन से, मुनि के कष्ट को देखकर, उससे पूछने लगे -
श्लोक 46 (skanda.5.326.46)
पर्यटसे किमर्थं त्वं निशीये वहनं नु किम् । क्षिप्तं तु झोलिकाभारं किंवागमनकारणम् । व्यथामुत्पाद्य ऋषये दुःखाद्दुःखविलासिनि ॥ ४६ ॥
paryaṭase kimarthaṁ tvaṁ niśīye vahanaṁ nu kim | kṣiptaṁ tu jholikābhāraṁ kiṁvāgamanakāraṇam | vyathāmutpādya ṛṣaye duḥkhādduḥkhavilāsini || 46 ||
'तुम रात्रि में क्यों घूम रही हो? यह क्या भार ढो रही हो? झोली का बोझ लिए यहाँ आने का क्या कारण है, जिससे मुनि को पीड़ा पहुँची - हे दुःख पर दुःख उत्पन्न करने वाली स्त्री?'
श्लोक 47 (skanda.5.326.47)
शाण्डिल्युवाच। नासुरीं न च गन्धर्वीं न पिशाचीं न राक्षसीम् । पतिव्रतां तु मां सर्वे जानन्तु तपसि स्थिताम् ॥ ४७ ॥
śāṇḍilyuvāca| nāsurīṁ na ca gandharvīṁ na piśācīṁ na rākṣasīm | pativratāṁ tu māṁ sarve jānantu tapasi sthitām || 47 ||
शाण्डिली ने कहा - 'मुझे न असुरी, न गन्धर्वी, न पिशाचिनी, न राक्षसी समझें - आप सब मुझे तपस्या में स्थित पतिव्रता स्त्री ही जानें।
श्लोक 48 (skanda.5.326.48)
न मे कामो न मे क्रोधो न वैरं न च मत्सरः । अज्ञानाद्दृष्टिमान्द्याच्च स्खलनं क्षन्तुमर्हथ ॥ ४८ ॥
na me kāmo na me krodho na vairaṁ na ca matsaraḥ | ajñānāddṛṣṭimāndyācca skhalanaṁ kṣantumarhatha || 48 ||
मुझमें न काम है, न क्रोध, न वैर, न मत्सर। अज्ञानवश और अन्धकार में दृष्टि मन्द होने के कारण मुझसे यह ठोकर लगी - आप सब इसे क्षमा करें।
श्लोक 49 (skanda.5.326.49)
वहनं भर्तृसौख्याय दिवा सम्पीड्यते रुजा । अयं भर्ता विजानीथ झोलिकासंस्थितः सदा ॥ ४९ ॥
vahanaṁ bhartṛsaukhyāya divā sampīḍyate rujā | ayaṁ bhartā vijānīta jholikāsaṁsthitaḥ sadā || 49 ||
यह वहन मैं अपने पति के सुख के लिए करती हूँ - दिन में वे रोग से अत्यन्त पीड़ित रहते हैं। जानिए, यह मेरे पति हैं, जो सदा इसी झोली में रहते हैं।
श्लोक 50 (skanda.5.326.50)
भरणं पानं वस्त्रं च ददाम्येतस्य रोगिणः । ऋषिः शौनकमुख्योऽसौ शाण्डिलीं मां विजानत ॥ ५० ॥
bharaṇaṁ pānaṁ vastraṁ ca dadāmyetasya rogiṇaḥ | ṛṣiḥ śaunakamukhyo'sau śāṇḍilīṁ māṁ vijānata || 50 ||
इस रोगी को मैं भोजन, पेय और वस्त्र देती हूँ। मुझे शाण्डिली के नाम से जानें - ये शौनकवंश के प्रमुख ऋषि हैं।
श्लोक 51 (skanda.5.326.51)
स्वभर्तृधर्मिणीं कोपं मा कुरुष्वातिथिं कुरु । सतां समीपं सम्प्राप्तां सर्वं मे क्षन्तुमर्हथ ॥ ५१ ॥
svabhartṛdharmiṇīṁ kopaṁ mā kuruṣvātithiṁ kuru | satāṁ samīpaṁ samprāptāṁ sarvaṁ me kṣantumarhatha || 51 ||
अपने पति के धर्म का पालन करने वाली मुझ पर क्रोध न करें, अपितु मुझे अतिथि के रूप में स्वीकार करें। सत्पुरुषों के समीप आई हुई मुझे आप सब सब कुछ क्षमा करें।'
श्लोक 52 (skanda.5.326.52)
ऋषय ऊचुः । परव्यथां न जानीषे व्यचरन्ती यदृच्छया । प्रभातेऽभ्युदिते सूर्ये तव भर्ता मरिष्यति ॥ ५२ ॥
ṛṣaya ūcuḥ | paravyathāṁ na jānīṣe vyacarantī yadṛcchayā | prabhāte'bhyudite sūrye tava bhartā mariṣyati || 52 ||
ऋषियों ने कहा - 'मनमाने ढंग से विचरण करती हुई तू दूसरों की पीड़ा को नहीं जानती। प्रातःकाल सूर्योदय होते ही तेरे पति की मृत्यु हो जाएगी।'
श्लोक 53 (skanda.5.326.53)
आत्मदुःखात्परं दुःखं न जानासि कुलाधमे । तेन वाक्येन घोरेण शाण्डिली विमनाभवत् ॥ ५३ ॥
ātmaduḥkhātparaṁ duḥkhaṁ na jānāsi kulādhame | tena vākyena ghoreṇa śāṇḍilī vimanābhavat || 53 ||
'हे कुलाधमे! तू अपने दुःख के अतिरिक्त दूसरे के दुःख को नहीं जानती।' इस कठोर वचन से शाण्डिली अत्यन्त खिन्न हो गई।
श्लोक 54 (skanda.5.326.54)
परं विषादमापन्ना क्षणं ध्यात्वाब्रवीद्वचः । कोपात्संरक्तनयना निरीक्षन्ती मुनींस्तदा ॥ ५४ ॥
paraṁ viṣādamāpannā kṣaṇaṁ dhyātvābravīdvacaḥ | kopātsaṁraktanayanā nirīkṣantī munīṁstadā || 54 ||
अत्यन्त विषाद को प्राप्त होकर, क्षणभर विचार कर वह बोली, क्रोध से लाल नेत्र किए हुए उन मुनियों को घूरती हुई -
श्लोक 55 (skanda.5.326.55)
सतां गेहे किल प्राप्ता भवतां चापकारिणी । सामेनातिथिपूजायां शिष्टे च गृहमागते ॥ ५५ ॥
satāṁ gehe kila prāptā bhavatāṁ cāpakāriṇī | sāmenātithipūjāyāṁ śiṣṭe ca gṛhamāgate || 55 ||
'मैं तो सत्पुरुषों के घर आई हूँ, फिर भी आप लोग मुझे अपराधिनी मान रहे हैं! घर आए शिष्ट अतिथि का तो सामनीति से आदर-सत्कार करना चाहिए -
श्लोक 56 (skanda.5.326.56)
भवद्भिरीदृगातिथ्यं कृतं चैव ममैव तु । स्वर्गापवर्गधर्मश्च भवद्भिर्न निरीक्षितम् ॥ ५६ ॥
bhavadbhirīdṛgātithyaṁ kṛtaṁ caiva mamaiva tu | svargāpavargadharmaśca bhavadbhirna nirīkṣitam || 56 ||
- किन्तु आप लोगों ने मेरे साथ ऐसा ही आतिथ्य किया है। आप लोगों ने तो स्वर्ग और मोक्षदायक धर्म की ओर भी दृष्टि नहीं डाली है!
श्लोक 57 (skanda.5.326.57)
प्राजापत्यामिमां दृष्ट्वा मां यथा प्राकृताः स्त्रियः । भवन्तः स्त्रीबलं मेऽद्य पश्यन्तु दिवि देवताः ॥ ५७ ॥
prājāpatyāmimāṁ dṛṣṭvā māṁ yathā prākṛtāḥ striyaḥ | bhavantaḥ strībalaṁ me'dya paśyantu divi devatāḥ || 57 ||
प्रजापति की इस पुत्री, मुझे, आप सामान्य स्त्रियों के समान देख रहे हैं - आज आप लोग और आकाश में विराजमान देवता भी मेरे स्त्री-बल को देख लें!
श्लोक 58 (skanda.5.326.58)
मरिष्यति न मे भर्ता ह्यादित्यो नोदयिष्यति । अन्धकारं जगत्सर्वं क्षीयते नाद्य शर्वरी ॥ ५८ ॥
mariṣyati na me bhartā hyādityo nodayiṣyati | andhakāraṁ jagatsarvaṁ kṣīyate nādya śarvarī || 58 ||
मेरे पति की मृत्यु नहीं होगी - क्योंकि सूर्य का उदय ही नहीं होगा! सम्पूर्ण जगत् अन्धकारमय हो जाएगा; आज यह रात्रि समाप्त नहीं होगी!'
श्लोक 59 (skanda.5.326.59)
एवमुक्ते तया वाक्ये स्तम्भितेऽर्के तमोमयम् । न च प्रजायते सर्वं निर्वषट्कारसत्क्रियम् ॥ ५९ ॥
evamukte tayā vākye stambhite'rke tamomayam | na ca prajāyate sarvaṁ nirvaṣaṭkārasatkriyam || 59 ||
उसके ऐसा कहते ही सूर्य स्तम्भित हो गया, और सम्पूर्ण जगत् अंधकारमय हो गया; कोई भी कार्य सम्पन्न न हो सका - वषट्कारपूर्वक होने वाले सभी सत्कर्म ठप्प हो गए।
श्लोक 60 (skanda.5.326.60)
स्वाहाकारः स्वधाकारः पञ्चयज्ञविधिर्नहि । स्नानं दानं जपो नास्ति सन्ध्यालोपव्यतिक्रमः । षण्मासं च तदा पार्थ लुप्तपिण्डोदकक्रियम् ॥ ६० ॥
svāhākāraḥ svadhākāraḥ pañcayajñavidhirnahi | snānaṁ dānaṁ japo nāsti sandhyālopavyatikramaḥ | ṣaṇmāsaṁ ca tadā pārtha luptapiṇḍodakakriyam || 60 ||
न स्वाहाकार हुआ, न स्वधाकार, न पंचयज्ञ की विधि सम्पन्न हुई; न स्नान, न दान, न जप - संध्योपासना तक का लोप हो गया। हे पार्थ! छह महीने तक तब पिण्डदान और जलदान की क्रियाएँ लुप्त रहीं।