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अवन्ती खण्ड · अध्याय 328

शुद्धेश्वर तीर्थ माहात्म्य वर्णन

अध्याय 327अध्याय-सूचीअध्याय 329

श्लोक 1 (skanda.5.328.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र तीर्थं परमशोभनम् । नर्मदादक्षिणे कूले सर्वपापप्रणाशनम् ॥ १ ॥

śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchettu rājendra tīrthaṁ paramaśobhanam | narmadādakṣiṇe kūle sarvapāpapraṇāśanam || 1 ||

श्री मार्कण्डेय जी ने कहा - तदनन्तर, हे राजेन्द्र! नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित परम सुन्दर, सर्वपापनाशक तीर्थ में जाना चाहिए -

श्लोक 2 (skanda.5.328.2)

सिद्धेश्वरमिति ख्यातं महापातकनाशनम् । यत्र शुद्धिं परां प्राप्तो देवदेवो महेश्वरः । पुरा हत्यायुतः पार्थ देवदेवस्त्रिशूलधृक् ॥ २ ॥

siddheśvaramiti khyātaṁ mahāpātakanāśanam | yatra śuddhiṁ parāṁ prāpto devadevo maheśvaraḥ | purā hatyāyutaḥ pārtha devadevastriśūladhṛk || 2 ||

- यह तीर्थ सिद्धेश्वर नाम से विख्यात है और महापातकों का नाश करने वाला है, जहाँ देवाधिदेव महेश्वर ने परम शुद्धि प्राप्त की थी। हे पार्थ! पूर्वकाल में त्रिशूलधारी देवाधिदेव हत्या (ब्रह्महत्या) के पाप से युक्त हो गए थे -

श्लोक 3 (skanda.5.328.3)

पुरा पञ्चशिरा आसीद्ब्रह्मा लोकपितामहः । तेनानृतं वचश्चोक्तं कस्मिंश्चित्कारणान्तरे ॥ ३ ॥

purā pañcaśirā āsīdbrahmā lokapitāmahaḥ | tenānṛtaṁ vacaścoktaṁ kasmiṁścitkāraṇāntare || 3 ||

पूर्वकाल में लोकपितामह ब्रह्मा के पाँच सिर थे। किसी विशेष प्रसंग में उन्होंने असत्य वचन कह दिया।

श्लोक 4 (skanda.5.328.4)

तच्छ्रुत्वा सहसा तस्मै चुकोप परमेश्वरः । छेदयामास भगवान्मूर्धानं करजैस्तदा ॥ ४ ॥

tacchrutvā sahasā tasmai cukopa parameśvaraḥ | chedayāmāsa bhagavānmūrdhānaṁ karajaistadā || 4 ||

यह सुनकर परमेश्वर सहसा उन पर अत्यन्त क्रुद्ध हो गए, और भगवान् ने अपने नखों से उनका वह सिर काट डाला।

श्लोक 5 (skanda.5.328.5)

तस्य तत्करसंलग्नं च्यवते न कदाचन । ततो हि देवदेवेशः पर्यटन् पृथिवीमिमाम् ॥ ५ ॥

tasya tatkarasaṁlagnaṁ cyavate na kadācana | tato hi devadeveśaḥ paryaṭan pṛthivīmimām || 5 ||

वह सिर उनके हाथ से चिपक गया और किसी प्रकार भी अलग नहीं हुआ। तत्पश्चात् देवाधिदेवेश्वर इस समस्त पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे -

श्लोक 6 (skanda.5.328.6)

ततो वाराणसीं प्राप्तस्तस्यां तदपतच्छिरः । पतिते तु कपाले च ब्रह्महत्या न मुञ्चति ॥ ६ ॥

tato vārāṇasīṁ prāptastasyāṁ tadapatacchiraḥ | patite tu kapāle ca brahmahatyā na muñcati || 6 ||

- फिर वाराणसी पहुँचने पर वह सिर वहीं गिर पड़ा। किन्तु कपाल के गिर जाने पर भी ब्रह्महत्या का पाप उन्हें नहीं छोड़ा।

श्लोक 7 (skanda.5.328.7)

ततस्तु सागरे गत्वा पूर्वे च दक्षिणे तथा । पश्चिमे चोत्तरे पार्थ देवदेवो महेश्वरः ॥ ७ ॥

tatastu sāgare gatvā pūrve ca dakṣiṇe tathā | paścime cottare pārtha devadevo maheśvaraḥ || 7 ||

तत्पश्चात् हे पार्थ! देवाधिदेव महेश्वर पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर के सागरों में जा-जाकर -

श्लोक 8 (skanda.5.328.8)

पर्यटन्सर्वतीर्थेषु ब्रह्महत्या न मुञ्चति । नर्मदादक्षिणे कूले सुतीर्थं प्राप्तवान् प्रभुः ॥ ८ ॥

paryaṭansarvatīrtheṣu brahmahatyā na muñcati | narmadādakṣiṇe kūle sutīrthaṁ prāptavān prabhuḥ || 8 ||

- समस्त तीर्थों में भ्रमण करते रहे, फिर भी ब्रह्महत्या का पाप उन्हें नहीं छोड़ा। अन्ततः प्रभु नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित इस उत्तम तीर्थ में पहुँचे।

श्लोक 9 (skanda.5.328.9)

कुलकोटिं समासाद्य प्रार्थयामास चात्मवान् । प्रायश्चित्तं ततः कृत्वा बभूव गतकल्मषः ॥ ९ ॥

kulakoṭiṁ samāsādya prārthayāmāsa cātmavān | prāyaścittaṁ tataḥ kṛtvā babhūva gatakalmaṣaḥ || 9 ||

कुलकोटि तीर्थ में पहुँचकर उन आत्मवान् प्रभु ने प्रार्थना की; तत्पश्चात् प्रायश्चित्त करके वे पापरहित हो गए।

श्लोक 10 (skanda.5.328.10)

ततो निष्कल्मषो जातो देवदेवो महेश्वरः । हत्वा सुरेभ्यस्तत्स्थानं ततश्चान्तर्दधे प्रभुः ॥ १० ॥

tato niṣkalmaṣo jāto devadevo maheśvaraḥ | hatvā surebhyastatsthānaṁ tataścāntardadhe prabhuḥ || 10 ||

तत्पश्चात् देवाधिदेव महेश्वर निष्कलंक हो गए; उस स्थान को देवताओं के लिए अनुगृहीत करके प्रभु वहाँ से अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 11 (skanda.5.328.11)

तदाप्रभृति तत्तीर्थं शुद्धरुद्रेति कीर्तितम् । विख्यातं त्रिषु लोके ब्रह्महत्याहरं परम् ॥ ११ ॥

tadāprabhṛti tattīrthaṁ śuddharudreti kīrtitam | vikhyātaṁ triṣu loke brahmahatyāharaṁ param || 11 ||

तभी से वह तीर्थ 'शुद्धरुद्र' के नाम से विख्यात हुआ, जो तीनों लोकों में ब्रह्महत्या के परम नाशक तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है।

श्लोक 12 (skanda.5.328.12)

मासे मासे सिते पक्षेऽमावास्यायां युधिष्ठिर । स्नात्वा तत्र विधानेन तर्पयेत्पितृदेवताः ॥ १२ ॥

māse māse site pakṣe'māvāsyāyāṁ yudhiṣṭhira | snātvā tatra vidhānena tarpayetpitṛdevatāḥ || 12 ||

हे युधिष्ठिर! प्रतिमास अमावस्या को वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके पितृदेवताओं को तर्पण करना चाहिए।

श्लोक 13 (skanda.5.328.13)

दद्यात्पिण्डं पित्ॄणां तु भावितेनान्तरात्मना । तस्य ते द्वादशाब्दानि सुतृप्ताः पितरो नृप ॥ १३ ॥

dadyātpiṇḍaṁ pitṝṇāṁ tu bhāvitenāntarātmanā | tasya te dvādaśābdāni sutṛptāḥ pitaro nṛpa || 13 ||

भावपूर्ण अन्तःकरण से पितरों को पिण्ड अर्पित करना चाहिए। हे राजन्! इससे उसके पितर बारह वर्षों तक भलीभाँति तृप्त रहते हैं।

श्लोक 14 (skanda.5.328.14)

गन्धधूपप्रदीपाद्यैरभ्यर्च्य परमेश्वरम् । शुद्धेश्वराभिधानं तु शिवलोके महीयते ॥ १४ ॥

gandhadhūpapradīpādyairabhyarcya parameśvaram | śuddheśvarābhidhānaṁ tu śivaloke mahīyate || 14 ||

गन्ध, धूप, दीप आदि से शुद्धेश्वर नामक परमेश्वर की पूजा करके मनुष्य शिवलोक में महिमामण्डित होता है।

श्लोक 15 (skanda.5.328.15)

एतत्ते कथितं राजञ्छुद्धरुद्रमनुत्तमम् । मया श्रुतं यथा देवसकाशाच्छूलपाणिनः । मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति ॥ १५ ॥

etatte kathitaṁ rājañchuddharudramanuttamam | mayā śrutaṁ yathā devasakāśācchūlapāṇinaḥ | mucyate sarvapāpebhyo rudralokaṁ sa gacchati || 15 ||

हे राजन्! यह अनुपम शुद्धरुद्र-तीर्थ तुम्हें इस प्रकार बताया गया, जैसा मैंने स्वयं त्रिशूलधारी देव से सुना था। जो इसे सुनता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर रुद्रलोक को प्राप्त होता है।

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