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अवन्ती खण्ड · अध्याय 329

गोपेश्वर तीर्थ माहात्म्य वर्णन

अध्याय 328अध्याय-सूचीअध्याय 330

श्लोक 1 (skanda.5.329.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। गोपेश्वरं ततो गच्छेदुत्तरे नर्मदातटे । यत्र स्नानेन चैकेन मुच्यन्ते पातकैर्नराः ॥ १ ॥

śrīmārkaṇḍeya uvāca| gopeśvaraṁ tato gaccheduttare narmadātaṭe | yatra snānena caikena mucyante pātakairnarāḥ || 1 ||

श्री मार्कण्डेय जी ने कहा - तत्पश्चात् नर्मदा के उत्तर तट पर स्थित गोपेश्वर तीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ एक ही स्नान से मनुष्य पापों से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 2 (skanda.5.329.2)

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा कुरुते प्राणसंक्षयम् । बर्हियुक्तेन यानेन स गच्छेच्छिवमन्दिरे ॥ २ ॥

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā kurute prāṇasaṅkṣayam | barhiyuktena yānena sa gacchecchivamandire || 2 ||

जो उस तीर्थ में स्नान करके वहाँ अपने प्राणों का त्याग करता है, वह मोरों से युक्त विमान में बैठकर शिवधाम को जाता है।

श्लोक 3 (skanda.5.329.3)

क्रीडित्वा सुचिरं कालं शिवलोके नराधिप । इह मानुष्यतां प्राप्य राजा भवति वीर्यवान् ॥ ३ ॥

krīḍitvā suciraṁ kālaṁ śivaloke narādhipa | iha mānuṣyatāṁ prāpya rājā bhavati vīryavān || 3 ||

हे नराधिप! शिवलोक में दीर्घकाल तक क्रीड़ा करने के पश्चात्, पुनः इस लोक में मनुष्य जन्म पाकर वह पराक्रमी राजा बनता है।

श्लोक 4 (skanda.5.329.4)

हस्त्यश्वरथसम्पन्नो दासीदाससमन्वितः । पूज्यमानो नरेन्द्रैश्च जीवेद्वर्षशतं नरः ॥ ४ ॥

hastyaśvarathasampanno dāsīdāsasamanvitaḥ | pūjyamāno narendraiśca jīvedvarṣaśataṁ naraḥ || 4 ||

हाथी, घोड़े और रथों से सम्पन्न, दासी-दासों से युक्त, राजाओं द्वारा सम्मानित वह मनुष्य सौ वर्षों तक जीवित रहता है।

श्लोक 5 (skanda.5.329.5)

सम्प्राप्ते कार्त्तिके मासि नवम्यां शुक्लपक्षतः । सोपवासः शुचिर्भूत्वा दीपकांस्तत्र दापयेत् ॥ ५ ॥

samprāpte kārttike māsi navamyāṁ śuklapakṣataḥ | sopavāsaḥ śucirbhūtvā dīpakāṁstatra dāpayet || 5 ||

कार्तिक मास आने पर, शुक्लपक्ष की नवमी को, उपवास सहित पवित्र होकर वहाँ दीपक जलवाने चाहिए।

श्लोक 6 (skanda.5.329.6)

गन्धपुष्पैः समभ्यर्च्य रात्रौ कुर्वीत जागरम् । तस्य यत्फलमुद्दिष्टं तच्छृणुष्व नराधिप ॥ ६ ॥

gandhapuṣpaiḥ samabhyarcya rātrau kurvīta jāgaram | tasya yatphalamuddiṣṭaṁ tacchṛṇuṣva narādhipa || 6 ||

गन्ध और पुष्पों से पूजा करके रात्रि में जागरण करना चाहिए। हे नराधिप! इसका जो फल कहा गया है, वह सुनो।

श्लोक 7 (skanda.5.329.7)

यावत्पुण्यं फलं संख्या दीपकानां तथैव च । तावद्युगसहस्राणि शिवलोके महीयते ॥ ७ ॥

yāvatpuṇyaṁ phalaṁ saṅkhyā dīpakānāṁ tathaiva ca | tāvadyugasahasrāṇi śivaloke mahīyate || 7 ||

जितनी संख्या में दीपक जलाए जाते हैं, उतना ही पुण्यफल प्राप्त होता है - उतने ही सहस्र युगों तक वह शिवलोक में महिमामण्डित रहता है।

श्लोक 8 (skanda.5.329.8)

तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र लिङ्गपूरणकं विधिम् । तथैव पद्मकैश्चैव दधिभक्तैस्तथैव च ॥ ८ ॥

tasmiṁstīrthe tu rājendra liṅgapūraṇakaṁ vidhim | tathaiva padmakaiścaiva dadhibhaktaistathaiva ca || 8 ||

हे राजेन्द्र! उस तीर्थ में लिंगपूरण की विधि - उसी प्रकार कमलबीजों से तथा दधि-भात से भी -

श्लोक 9 (skanda.5.329.9)

यस्तु कुर्यान्नरश्रेष्ठ तस्य पुण्यफलं शृणु । यावन्ति तिलसंख्यानि दधिभक्तं तथैव च ॥ ९ ॥

yastu kuryānnaraśreṣṭha tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu | yāvanti tilasaṅkhyāni dadhibhaktaṁ tathaiva ca || 9 ||

- हे नरश्रेष्ठ! जो कोई यह करता है, उसका पुण्यफल सुनो। जितने तिलों की संख्या और उतने ही दधि-भात के कणों की संख्या,

श्लोक 10 (skanda.5.329.10)

पद्मसंख्या शिवे लोके मोदते कालमीप्सितम् । तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र यत्किंचिद्दीयते नृप ॥ १० ॥

padmasaṅkhyā śive loke modate kālamīpsitam | tasmiṁstīrthe tu rājendra yatkiṁciddīyate nṛpa || 10 ||

- तथा जितने कमलबीजों की संख्या हो, उतने ही समय तक वह शिवलोक में इच्छानुसार आनन्द करता है। हे राजेन्द्र! उस तीर्थ में जो कुछ भी, चाहे कितना भी अल्प, दान किया जाता है, हे राजन्,

श्लोक 11 (skanda.5.329.11)

सर्वं कोटिगुणं तस्य संख्यातुं वा न शक्यते । एवं ते कथितं सर्वं सर्वतीर्थमनुत्तमम् ॥ ११ ॥

sarvaṁ koṭiguṇaṁ tasya saṅkhyātuṁ vā na śakyate | evaṁ te kathitaṁ sarvaṁ sarvatīrthamanuttamam || 11 ||

- वह सब करोड़ गुना हो जाता है, जिसकी गणना करना भी सम्भव नहीं है। इस प्रकार तुम्हें यह सब तीर्थों में सर्वोत्तम तीर्थ का वर्णन बताया गया।

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