अवन्ती खण्ड · अध्याय 330
कपिलेश्वर तीर्थ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.330.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। उत्तरे नर्मदाकूले भृगुक्षेत्रस्य मध्यतः । कपिलेश्वरं तु विख्यातं विशेषात्पापनाशनम् ॥ १ ॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| uttare narmadākūle bhṛgukṣetrasya madhyataḥ | kapileśvaraṁ tu vikhyātaṁ viśeṣātpāpanāśanam || 1 ||
श्री मार्कण्डेय जी ने कहा - नर्मदा के उत्तर तट पर, भृगुक्षेत्र के मध्य में, कपिलेश्वर नामक विख्यात तीर्थ है, जो विशेष रूप से पापनाशक है।
श्लोक 2 (skanda.5.330.2)
योऽसौ सनातनो देवः पुराणे परिपठ्यते । वासुदेवो जगन्नाथः कपिलत्वमुपागतः ॥ २ ॥
yo'sau sanātano devaḥ purāṇe paripaṭhyate | vāsudevo jagannāthaḥ kapilatvamupāgataḥ || 2 ||
जो सनातन देव पुराणों में वर्णित हैं - वासुदेव, जगन्नाथ - वे ही कपिल रूप को प्राप्त हुए।
श्लोक 3 (skanda.5.330.3)
पातालं सुतलं नाम तस्यैव नितलं ह्यधः । गभस्तिगं च तस्याधो ह्यन्धतामिस्रमेव च ॥ ३ ॥
pātālaṁ sutalaṁ nāma tasyaiva nitalaṁ hyadhaḥ | gabhastigaṁ ca tasyādho hyandhatāmisrameva ca || 3 ||
[पृथ्वी के नीचे] पाताल, फिर सुतल, उसके नीचे नितल, उसके नीचे गभस्तिमान् तथा उसके भी नीचे अन्धतामिस्र -
श्लोक 4 (skanda.5.330.4)
पातालं सप्तमं यच्च ह्यधस्तात्संस्थितं महत् । वसते तत्र वै देवः पुराणः परमेश्वरः ॥ ४ ॥
pātālaṁ saptamaṁ yacca hyadhastātsaṁsthitaṁ mahat | vasate tatra vai devaḥ purāṇaḥ parameśvaraḥ || 4 ||
- और सातवाँ महान् पाताल, जो सबसे नीचे स्थित है। वहीं वह पुरातन परमेश्वर देव निवास करते हैं।
श्लोक 5 (skanda.5.330.5)
स ब्रह्मा स महादेवः स देवो गरुडध्वजः । पूज्यमानः सुरैः सिद्धैस्तिष्ठते ब्रह्मवादिभिः ॥ ५ ॥
sa brahmā sa mahādevaḥ sa devo garuḍadhvajaḥ | pūjyamānaḥ suraiḥ siddhaistiṣṭhate brahmavādibhiḥ || 5 ||
वे ही ब्रह्मा हैं, वे ही महादेव हैं, वे ही गरुड़ध्वज देव (विष्णु) हैं। देवताओं, सिद्धों तथा ब्रह्मवादियों द्वारा पूजित होकर वे वहाँ निवास करते हैं।
श्लोक 6 (skanda.5.330.6)
वसतस्तस्य राजेन्द्र कपिलस्य जगद्गुरोः । विनाशं चाग्रतः प्राप्ताः क्षणेन सगरात्मजाः ॥ ६ ॥
vasatastasya rājendra kapilasya jagadguroḥ | vināśaṁ cāgrataḥ prāptāḥ kṣaṇena sagarātmajāḥ || 6 ||
हे राजेन्द्र! जगद्गुरु कपिल के वहाँ निवास करते समय, सगरपुत्र उनके सामने आए और क्षणभर में ही भस्म हो गए।
श्लोक 7 (skanda.5.330.7)
भस्मीभूतांस्तु तान्दृष्ट्वा कपिलो मुनिसत्तमः । जगाम परमं शोकं चिन्त्यमानोऽथ किल्बिषम् ॥ ७ ॥
bhasmībhūtāṁstu tāndṛṣṭvā kapilo munisattamaḥ | jagāma paramaṁ śokaṁ cintyamāno'tha kilbiṣam || 7 ||
उन्हें भस्म हुआ देखकर मुनिश्रेष्ठ कपिल अत्यन्त शोक में डूब गए और अपने ऊपर लगे उस पाप का चिन्तन करने लगे।
श्लोक 8 (skanda.5.330.8)
सर्वसङ्गपरित्यागे चित्ते निर्विषयीकृते । अयुक्तं षष्टिसहस्राणां कर्तं मम विनाशनम् ॥ ८ ॥
sarvasaṅgaparityāge citte nirviṣayīkṛte | ayuktaṁ ṣaṣṭisahasrāṇāṁ kartaṁ mama vināśanam || 8 ||
सम्पूर्ण आसक्तियों का त्याग कर तथा चित्त को विषयरहित करते हुए [उन्होंने सोचा] - 'इन साठ हजार का विनाश करना मेरे लिए उचित नहीं था।
श्लोक 9 (skanda.5.330.9)
कृतस्य करणं नास्ति तस्मात्पापविनाशनम् । गत्वा तु कापिलं तीर्थं मोचयाम्यघमात्मनः ॥ ९ ॥
kṛtasya karaṇaṁ nāsti tasmātpāpavināśanam | gatvā tu kāpilaṁ tīrthaṁ mocayāmyaghamātmanaḥ || 9 ||
जो हो चुका है उसे पूर्ववत् नहीं किया जा सकता; अतः उस पाप के नाश हेतु मैं कापिल तीर्थ में जाकर अपनी आत्मा को इस पाप से मुक्त करूँगा।'
श्लोक 10 (skanda.5.330.10)
पातालं तु ततो मुक्त्वा कपिलो मुनिसत्तमः । तपश्चचार सुमहन्नर्मदातटमास्थितः ॥ १० ॥
pātālaṁ tu tato muktvā kapilo munisattamaḥ | tapaścacāra sumahannarmadātaṭamāsthitaḥ || 10 ||
तत्पश्चात् मुनिश्रेष्ठ कपिल पाताल को छोड़कर नर्मदा के तट पर स्थित होकर अत्यन्त महान् तपस्या करने लगे।
श्लोक 11 (skanda.5.330.11)
व्रतोपवासैर्विविधैः स्नानदानजपादिकैः । परं निर्वाणमापन्नः पूजयन्रुद्रमव्ययम् ॥ ११ ॥
vratopavāsairvividhaiḥ snānadānajapādikaiḥ | paraṁ nirvāṇamāpannaḥ pūjayanrudramavyayam || 11 ||
विविध व्रतों-उपवासों से, स्नान-दान-जप आदि से तथा अविनाशी रुद्र की पूजा करते हुए, उन्होंने परम निर्वाण को प्राप्त किया।
श्लोक 12 (skanda.5.330.12)
तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत्परमेश्वरम् । गोसहस्रफलं तस्य लभते नात्र संशयः ॥ १२ ॥
tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayetparameśvaram | gosahasraphalaṁ tasya labhate nātra saṁśayaḥ || 12 ||
जो उस तीर्थ में स्नान करके परमेश्वर की पूजा करता है, उसे सहस्र गौओं के दान का फल प्राप्त होता है - इसमें कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 13 (skanda.5.330.13)
ज्येष्ठमासे तु सम्प्राप्ते शुक्लपक्षे चतुर्दशी । तत्र स्नात्वा विधानेन भक्त्या दानं प्रयच्छति ॥ १३ ॥
jyeṣṭhamāse tu samprāpte śuklapakṣe caturdaśī | tatra snātvā vidhānena bhaktyā dānaṁ prayacchati || 13 ||
ज्येष्ठ मास आने पर, शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को, वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके जो भक्तिपूर्वक दान देता है -
श्लोक 14 (skanda.5.330.14)
पात्रभूताय विप्राय स्वल्पं वा यदि वा बहु । अक्षयं तत्फलं प्रोक्तं शिवेन परमेष्ठिना ॥ १४ ॥
pātrabhūtāya viprāya svalpaṁ vā yadi vā bahu | akṣayaṁ tatphalaṁ proktaṁ śivena parameṣṭhinā || 14 ||
- योग्य ब्राह्मण को चाहे अल्प हो या अधिक - उस दान का फल परमेष्ठी शिव द्वारा अक्षय कहा गया है।
श्लोक 15 (skanda.5.330.15)
अङ्गारकदिने प्राप्ते चतुर्थ्यां नवमीषु च । स्नानं करोति पुरुषो भक्त्योपोष्य वराङ्गना ॥ १५ ॥
aṅgārakadine prāpte caturthyāṁ navamīṣu ca | snānaṁ karoti puruṣo bhaktyopoṣya varāṅganā || 15 ||
जब मंगलवार को चतुर्थी अथवा नवमी तिथि पड़े, तब जो पुरुष भक्तिपूर्वक स्नान करता है, अथवा जो सुन्दरी स्त्री उपवास करके स्नान करती है,
श्लोक 16 (skanda.5.330.16)
रूपमैश्वर्यमतुलं सौभाग्यं संततिं पराम् । लभते सप्तजन्मानि नित्यं नित्यं पुनः पुनः ॥ १६ ॥
rūpamaiśvaryamatulaṁ saubhāgyaṁ saṁtatiṁ parām | labhate saptajanmāni nityaṁ nityaṁ punaḥ punaḥ || 16 ||
वह सात जन्मों तक निरन्तर, बार-बार, रूप, अनुपम ऐश्वर्य, सौभाग्य तथा उत्तम संतान प्राप्त करती है।
श्लोक 17 (skanda.5.330.17)
पौर्णमास्याममावास्यां स्नात्वा पिण्डं प्रयच्छति । तस्य ते द्वादशाब्दानि तृप्ता यान्ति सुरालयम् ॥ १७ ॥
paurṇamāsyāmamāvāsyāṁ snātvā piṇḍaṁ prayacchati | tasya te dvādaśābdāni tṛptā yānti surālayam || 17 ||
जो पूर्णिमा अथवा अमावस्या को स्नान करके पिण्डदान करता है, उसके पितर बारह वर्षों तक तृप्त होकर देवलोक को जाते हैं।
श्लोक 18 (skanda.5.330.18)
तत्र तीर्थे तु यो भक्त्या दद्याद्दीपं सुशोभनम् । जायते तस्य राजेन्द्र महादीप्तिः शारीरजा ॥ १८ ॥
tatra tīrthe tu yo bhaktyā dadyāddīpaṁ suśobhanam | jāyate tasya rājendra mahādīptiḥ śārīrajā || 18 ||
जो उस तीर्थ में भक्तिपूर्वक सुन्दर दीपक अर्पित करता है, हे राजेन्द्र! उसके शरीर में एक महान् तेज उत्पन्न हो जाता है।
श्लोक 19 (skanda.5.330.19)
तत्र तीर्थे मृतानां तु जन्तूनां सर्वदा किल । अनिवर्तिका भवेत्तेषां गतिस्तु शिवमन्दिरात् ॥ १९ ॥
tatra tīrthe mṛtānāṁ tu jantūnāṁ sarvadā kila | anivartikā bhavetteṣāṁ gatistu śivamandirāt || 19 ||
उस तीर्थ में मरने वाले समस्त प्राणियों की गति सदा ही शिवधाम से अनिवर्तनीय (वापस न लौटने वाली) होती है, ऐसा कहा जाता है।