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अवन्ती खण्ड · अध्याय 331

पिंगलेश्वर तीर्थ माहात्म्य एवं देवखात-उत्पत्ति वर्णन

अध्याय 330अध्याय-सूचीअध्याय 332

श्लोक 1 (skanda.5.331.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महीपाल पिङ्गलावर्तमुत्तमम् । तीर्थं सर्वगुणोपेतं कामिकं भुवि दुर्लभम् ॥ १ ॥

śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahīpāla piṅgalāvartamuttamam | tīrthaṁ sarvaguṇopetaṁ kāmikaṁ bhuvi durlabham || 1 ||

श्री मार्कण्डेय जी ने कहा - तत्पश्चात्, हे महीपाल! उत्तम पिंगलावर्त तीर्थ में जाना चाहिए, जो सभी गुणों से युक्त, कामनाओं को पूर्ण करने वाला तथा पृथ्वी पर दुर्लभ है।

श्लोक 2 (skanda.5.331.2)

वाचिकं मानसं पापं कर्मजं यत्पुरा कृतम् । पिङ्गलेश्वरमासाद्य तत्सर्वं विलयं व्रजेत् ॥ २ ॥

vācikaṁ mānasaṁ pāpaṁ karmajaṁ yatpurā kṛtam | piṅgaleśvaramāsādya tatsarvaṁ vilayaṁ vrajet || 2 ||

वाणी से, मन से अथवा कर्म से पूर्वकाल में किया गया जो भी पाप हो, पिंगलेश्वर में पहुँचने पर वह सब विलीन हो जाता है।

श्लोक 3 (skanda.5.331.3)

तत्र स्नानं च दानं च देवखाते कृतं नृप । अक्षयं तद्भवेत्सर्वमित्येवं शङ्करोऽब्रवीत् ॥ ३ ॥

tatra snānaṁ ca dānaṁ ca devakhāte kṛtaṁ nṛpa | akṣayaṁ tadbhavetsarvamityevaṁ śaṅkaro'bravīt || 3 ||

हे राजन्! वहाँ देवखात में किया गया स्नान और दान सब अक्षय हो जाता है - ऐसा स्वयं शंकर ने कहा है।

श्लोक 4 (skanda.5.331.4)

पृथिव्यां सर्वतीर्थेषु समुद्धृत्य शुभोदकम् । मुक्तं तत्र सुरैः खात्वा देवखातं ततोऽभवत् ॥ ४ ॥

pṛthivyāṁ sarvatīrtheṣu samuddhṛtya śubhodakam | muktaṁ tatra suraiḥ khātvā devakhātaṁ tato'bhavat || 4 ||

पृथ्वी के सभी तीर्थों से शुभ जल निकालकर तथा वहाँ खोदकर, देवताओं ने उसे मुक्त किया - इस प्रकार देवखात की उत्पत्ति हुई।

श्लोक 5 (skanda.5.331.5)

युधिष्ठिर उवाच। कथं तु देवखातं तत्संजातं द्विजसत्तम । सुराः सर्वे कथं तत्र मुमुचुर्वारि तीर्थजम् । सर्वं कथय मे विप्र श्रवणे लम्पटं मनः ॥ ५ ॥

yudhiṣṭhira uvāca| kathaṁ tu devakhātaṁ tatsaṁjātaṁ dvijasattama | surāḥ sarve kathaṁ tatra mumucurvāri tīrthajam | sarvaṁ kathaya me vipra śravaṇe lampaṭaṁ manaḥ || 5 ||

युधिष्ठिर ने कहा - 'हे द्विजसत्तम! वह देवखात कैसे उत्पन्न हुआ? सभी देवताओं ने वहाँ तीर्थों का वह जल कैसे मुक्त किया? हे विप्र! मुझे सब कुछ बताइए, मेरा मन सुनने के लिए अत्यन्त उत्सुक है।'

श्लोक 6 (skanda.5.331.6)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। यदा तु शूलशुद्ध्यर्थं रुद्रो देवगणैः सह । बभ्राम पृथिवीं सर्वां कमण्डलुधरः शुभाम् ॥ ६ ॥

śrīmārkaṇḍeya uvāca| yadā tu śūlaśuddhyarthaṁ rudro devagaṇaiḥ saha | babhrāma pṛthivīṁ sarvāṁ kamaṇḍaludharaḥ śubhām || 6 ||

श्री मार्कण्डेय जी ने कहा - जब अपने त्रिशूल की शुद्धि के लिए रुद्र, कमण्डलु धारण किए हुए, देवगणों के साथ इस सम्पूर्ण शुभ पृथ्वी पर विचरण करने लगे -

श्लोक 7 (skanda.5.331.7)

प्रभासाद्येषु तीर्थेषु स्नानं चक्रुः सुरास्तदा । सर्वतीर्थोत्थितं तोयं पात्रे वै निहितं तु तैः ॥ ७ ॥

prabhāsādyeṣu tīrtheṣu snānaṁ cakruḥ surāstadā | sarvatīrthotthitaṁ toyaṁ pātre vai nihitaṁ tu taiḥ || 7 ||

- तब देवताओं ने प्रभास आदि तीर्थों में स्नान किया, और उन सभी तीर्थों से उत्पन्न जल को उन्होंने एक पात्र में एकत्र किया।

श्लोक 8 (skanda.5.331.8)

शूलभेदमनुप्राप्य शूलं शुद्धं तु शूलिनः । तत्रोत्थमुदकं गृह्य आगता भृगुकच्छके ॥ ८ ॥

śūlabhedamanuprāpya śūlaṁ śuddhaṁ tu śūlinaḥ | tatrotthamudakaṁ gṛhya āgatā bhṛgukacchake || 8 ||

उस भेदन के पश्चात् त्रिशूलधारी का त्रिशूल शुद्ध हो गया; तब वहाँ एकत्रित जल लेकर वे भृगुकच्छ (भड़ौंच) में आए।

श्लोक 9 (skanda.5.331.9)

तत्रापश्यंस्ततो ह्यग्निं च पिङ्गलाक्षं च रोगिणम् । तपस्युग्रे व्यवसितं ध्यायमानं महेश्वरम् ॥ ९ ॥

tatrāpaśyaṁstato hyagniṁ ca piṅgalākṣaṁ ca rogiṇam | tapasyugre vyavasitaṁ dhyāyamānaṁ maheśvaram || 9 ||

वहाँ उन्होंने पिंगल-नेत्र, रोगग्रस्त अग्निदेव को देखा, जो उग्र तपस्या में लीन होकर महेश्वर का ध्यान कर रहे थे।

श्लोक 10 (skanda.5.331.10)

हविर्भागैस्तु विप्राणां राज्ञां चैवामयाविनाम् । दृष्ट्वा तु बहुरोगार्तमग्निं देवमुखं सुराः । प्राहुस्ते सहिता देवं शङ्करं लोकशङ्करम् ॥ १० ॥

havirbhāgaistu viprāṇāṁ rājñāṁ caivāmayāvinām | dṛṣṭvā tu bahurogārtamagniṁ devamukhaṁ surāḥ | prāhuste sahitā devaṁ śaṅkaraṁ lokaśaṅkaram || 10 ||

रोगग्रस्त ब्राह्मणों और राजाओं के हविर्भाग ग्रहण करने के कारण देवमुख अग्नि को अनेक रोगों से पीड़ित देखकर, देवताओं ने मिलकर लोक के कल्याणकारी देव शंकर से कहा -

श्लोक 11 (skanda.5.331.11)

देवा ऊचुः । प्रसादः क्रियतां शम्भो पिङ्गलस्यामयाविनः । यथा हि नीरुजः कायो हविषां ग्रहणक्षमः । पुनर्भवति पिङ्गस्तु तथा कुरु महेश्वर ॥ ११ ॥

devā ūcuḥ | prasādaḥ kriyatāṁ śambho piṅgalasyāmayāvinaḥ | yathā hi nīrujaḥ kāyo haviṣāṁ grahaṇakṣamaḥ | punarbhavati piṅgastu tathā kuru maheśvara || 11 ||

देवताओं ने कहा - 'हे शम्भो! रोगग्रस्त पिंगल (अग्नि) पर अनुग्रह कीजिए। हे महेश्वर! जिससे यह पिंगल पुनः नीरोग शरीर वाला होकर हविष्य ग्रहण करने में समर्थ हो जाए, वैसा कीजिए।'

श्लोक 12 (skanda.5.331.12)

ईश्वर उवाच। भोभोः सुरा हि तपसा तुष्टोऽहं वो विशेषतः । वचनाच्च विशेषेण ददाम्यभिमतं वरम् ॥ १२ ॥

īśvara uvāca| bhobhoḥ surā hi tapasā tuṣṭo'haṁ vo viśeṣataḥ | vacanācca viśeṣeṇa dadāmyabhimataṁ varam || 12 ||

ईश्वर ने कहा - 'हे देवगणो! मैं इस तपस्या से तथा विशेष रूप से तुम्हारे इन वचनों से प्रसन्न हूँ; मैं अभीष्ट वर प्रदान करता हूँ।'

श्लोक 13 (skanda.5.331.13)

पिङ्गल उवाच। यदि तुष्टोऽसि देवेश दीयते देव चेप्सितम् । चन्द्रादित्यौ च नयने कृत्वात्र कलया स्थितः ॥ १३ ॥

piṅgala uvāca| yadi tuṣṭo'si deveśa dīyate deva cepsitam | candrādityau ca nayane kṛtvātra kalayā sthitaḥ || 13 ||

पिंगल ने कहा - 'हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और हे देव! यदि मेरी अभीष्ट कामना पूर्ण की जानी है, तो चन्द्रमा और सूर्य को अपने दोनों नेत्र बनाकर मैं यहाँ आपकी कला से स्थित रहूँ -

श्लोक 14 (skanda.5.331.14)

तथा पुनर्नवः कायो भवेद्वै मम शङ्कर । तथा कुरु विरूपाक्ष नमस्तुभ्यं पुनः पुनः ॥ १४ ॥

tathā punarnavaḥ kāyo bhavedvai mama śaṅkara | tathā kuru virūpākṣa namastubhyaṁ punaḥ punaḥ || 14 ||

- और हे शंकर! मेरा शरीर पुनः नवीन हो जाए। हे विरूपाक्ष! ऐसा ही कीजिए; मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ।'

श्लोक 15 (skanda.5.331.15)

मार्कण्डेय उवाच। ततः स भगवाञ्छम्भुर्मूर्तिमादित्यरूपिणीम् । कृत्वा तु तस्य तद्रोगमपानुदत शङ्करः ॥ १५ ॥

mārkaṇḍeya uvāca| tataḥ sa bhagavāñchambhurmūrtimādityarūpiṇīm | kṛtvā tu tasya tadrogamapānudata śaṅkaraḥ || 15 ||

मार्कण्डेय जी ने कहा - तत्पश्चात् भगवान् शम्भु ने आदित्य के समान तेजस्वी रूप धारण करके उसके उस रोग को दूर कर दिया।

श्लोक 16 (skanda.5.331.16)

ततः पुनर्नवीभूतः पुनः प्रोवाच शङ्करम् । अत्रैव स्थीयतां शम्भो तथैव भास्करः स्वयम् ॥ १६ ॥

tataḥ punarnavībhūtaḥ punaḥ provāca śaṅkaram | atraiva sthīyatāṁ śambho tathaiva bhāskaraḥ svayam || 16 ||

तत्पश्चात् पुनः नवीन हो चुके उस [अग्नि] ने पुनः शंकर से कहा - 'हे शम्भो! आप यहीं स्थित रहें, और सूर्यदेव भी स्वयं यहीं स्थित रहें -

श्लोक 17 (skanda.5.331.17)

प्राणिनामुपकाराय रोगाणामुपशान्तये । पापानां ध्वंसनार्थाय श्रेयसां चैव वृद्धये ॥ १७ ॥

prāṇināmupakārāya rogāṇāmupaśāntaye | pāpānāṁ dhvaṁsanārthāya śreyasāṁ caiva vṛddhaye || 17 ||

- प्राणियों के उपकार के लिए, रोगों की शान्ति के लिए, पापों के नाश के लिए तथा कल्याण की वृद्धि के लिए।'

श्लोक 18 (skanda.5.331.18)

एवमुक्तस्तु भगवान्पिङ्गलेन महात्मना । अवतारं च कृतवान् गीर्वाणानिदमब्रवीत् ॥ १८ ॥

evamuktastu bhagavānpiṅgalena mahātmanā | avatāraṁ ca kṛtavān gīrvāṇānidamabravīt || 18 ||

महात्मा पिंगल द्वारा इस प्रकार निवेदन किए जाने पर, भगवान् ने वहाँ अवतार धारण किया और देवताओं से यह कहा -

श्लोक 19 (skanda.5.331.19)

ईश्वर उवाच। मुञ्चध्वमुदकं देवास्तीर्थेभ्यो यत्समाहृतम् । मम चोत्तरतः कृत्वा खातं देवमयं शुभम् ॥ १९ ॥

īśvara uvāca| muñcadhvamudakaṁ devāstīrthebhyo yatsamāhṛtam | mama cottarataḥ kṛtvā khātaṁ devamayaṁ śubham || 19 ||

ईश्वर ने कहा - 'हे देवगणो! तीर्थों से एकत्रित इस जल को मुक्त करो; और मेरे उत्तर की ओर देवताओं द्वारा निर्मित एक शुभ कुण्ड खोदकर -

श्लोक 20 (skanda.5.331.20)

तत्र निक्षिप्यतां वारि सर्वरोगविनाशनम् । सर्वपापहरं दिव्यं सर्वैरपि सुरादिभिः ॥ २० ॥

tatra nikṣipyatāṁ vāri sarvarogavināśanam | sarvapāpaharaṁ divyaṁ sarvairapi surādibhiḥ || 20 ||

- उसमें, सभी रोगों को नष्ट करने वाला, सभी पापों को हरने वाला वह दिव्य जल तुम सब देवगण डाल दो।'

श्लोक 21 (skanda.5.331.21)

एवमुक्ताः सुराः सर्वे खातं कृत्वा तथोत्तरे । वयस्त्रिंशत्कोटिगणैर्मुक्तं तत्तीर्थजं जलम् ॥ २१ ॥

evamuktāḥ surāḥ sarve khātaṁ kṛtvā tathottare | vayastriṁśatkoṭigaṇairmuktaṁ tattīrthajaṁ jalam || 21 ||

इस प्रकार आदेश पाकर सभी देवताओं ने उत्तर दिशा में वह कुण्ड खोदा; और तीस करोड़ देवगणों द्वारा उस तीर्थजन्य जल को उसमें डाल दिया गया।

श्लोक 22 (skanda.5.331.22)

प्रोचुस्ते सहिताः सर्वे विरूपाक्षपुरोगमाः । यः कश्चिद्देवखातेऽस्मिन्मृदालम्भनपूर्वकम् ॥ २२ ॥

procuste sahitāḥ sarve virūpākṣapurogamāḥ | yaḥ kaścidddevakhāte'sminmṛdālambhanapūrvakam || 22 ||

विरूपाक्ष को आगे करके उन सबने मिलकर घोषित किया - 'इस देवखात में जो कोई पहले मिट्टी का स्पर्श करके -

श्लोक 23 (skanda.5.331.23)

स्नानं कृत्वा रविदिने संस्नाय नर्मदाजले । श्राद्धं कृत्वा पितृभ्यो वै दानं दत्त्वा स्वशक्तितः ॥ २३ ॥

snānaṁ kṛtvā ravidine saṁsnāya narmadājale | śrāddhaṁ kṛtvā pitṛbhyo vai dānaṁ dattvā svaśaktitaḥ || 23 ||

- रविवार को स्नान करके, तथा नर्मदा जल में भी स्नान करके, पितरों के लिए श्राद्ध करके तथा यथाशक्ति दान देकर -

श्लोक 24 (skanda.5.331.24)

पूजयिष्यति पिङ्गेशं तस्य वासस्त्रिविष्टपे । भविष्यति सुरैरुक्तं शृणोति सकलं जगत् ॥ २४ ॥

pūjayiṣyati piṅgeśaṁ tasya vāsastriviṣṭape | bhaviṣyati surairuktaṁ śṛṇoti sakalaṁ jagat || 24 ||

- और पिंगेश (पिंगलेश्वर) की पूजा करता है, उसका निवास स्वर्ग में होगा - ऐसा देवताओं ने कहा है, जिसे सारा जगत् सुने।'

श्लोक 25 (skanda.5.331.25)

आमया भुवि मर्त्यानां क्षयरोगविचर्चिकाः । व्याधयो विकृताकाराः कासश्वासज्वरोद्भवाः ॥ २५ ॥

āmayā bhuvi martyānāṁ kṣayarogavicarcikāḥ | vyādhayo vikṛtākārāḥ kāsaśvāsajvarodbhavāḥ || 25 ||

पृथ्वी पर मनुष्यों के रोग - क्षयरोग, विचर्चिका (त्वचा-रोग), विकृत रूप वाली व्याधियाँ, खाँसी-श्वास-ज्वर से उत्पन्न रोग -

श्लोक 26 (skanda.5.331.26)

एकद्वित्रिचतुर्थाहा ये ज्वरा भूतसम्भवाः । ये चान्ये विकृता दोषा दद्रुश्च कामलं तथा ॥ २६ ॥

ekadvitricaturthāhā ye jvarā bhūtasambhavāḥ | ye cānye vikṛtā doṣā dadruśca kāmalaṁ tathā || 26 ||

- एक-दो-तीन-चौथे दिन आने वाले भूतसम्भव ज्वर, तथा अन्य विकृत दोष, दाद और पीलिया रोग -

श्लोक 27 (skanda.5.331.27)

दिनैस्ते सप्तभिर्यान्ति नाशं स्नानैर्रवेर्दिने । शतभेदप्रभिन्ना ये कुष्ठा बहुविधास्तथा ॥ २७ ॥

dinaiste saptabhiryānti nāśaṁ snānairraverdine | śatabhedaprabhinnā ye kuṣṭhā bahuvidhāstathā || 27 ||

- ये सब रविवार के स्नान से सात दिनों में ही नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार सौ भेदों में विभक्त बहुविध कुष्ठरोग भी -

श्लोक 28 (skanda.5.331.28)

शतमादित्यवाराणां स्नायादष्टोत्तरं तु यः । सम्पूज्य शङ्करं दद्यात्तिलपात्रं द्विजातये ॥ २८ ॥

śatamādityavārāṇāṁ snāyādaṣṭottaraṁ tu yaḥ | sampūjya śaṅkaraṁ dadyāttilapātraṁ dvijātaye || 28 ||

- जो एक सौ आठ रविवारों तक स्नान करे, और शंकर की सम्यक् पूजा करके ब्राह्मण को तिल से भरा पात्र दान करे,

श्लोक 29 (skanda.5.331.29)

नश्यन्ति तस्य कुष्ठानि गरुडेनेव पन्नगाः । एवमुक्त्वा गताः सर्वे त्रिदशास्त्रिदशालयम् ॥ २९ ॥

naśyanti tasya kuṣṭhāni garuḍeneva pannagāḥ | evamuktvā gatāḥ sarve tridaśāstridaśālayam || 29 ||

- उसका कुष्ठरोग उसी प्रकार नष्ट हो जाता है, जैसे गरुड़ को देखकर सर्प भाग जाते हैं। ऐसा कहकर वे सभी देवगण देवलोक को चले गए।

श्लोक 30 (skanda.5.331.30)

मार्कण्डेय उवाच। नदीषु देवखातेषु तडागेषु सरित्सु च । स्नानं समाचरेन्नित्यं नरः पापैः प्रमुच्यते ॥ ३० ॥

mārkaṇḍeya uvāca| nadīṣu devakhāteṣu taḍāgeṣu saritsu ca | snānaṁ samācarennityaṁ naraḥ pāpaiḥ pramucyate || 30 ||

मार्कण्डेय जी ने कहा - जो मनुष्य नदियों में, देवखातों में, तालाबों में तथा सरिताओं में नित्य स्नान करता है, वह पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 31 (skanda.5.331.31)

षष्टितीर्थसहस्रेषु षष्टितीर्थशतेषु च । यत्फलं स्नानदानेषु देवखाते ततोऽधिकम् ॥ ३१ ॥

ṣaṣṭitīrthasahasreṣu ṣaṣṭitīrthaśateṣu ca | yatphalaṁ snānadāneṣu devakhāte tato'dhikam || 31 ||

साठ हजार तीर्थों में तथा छह हजार तीर्थों में स्नान-दान से जो फल प्राप्त होता है, देवखात में उससे भी अधिक फल प्राप्त होता है।

श्लोक 32 (skanda.5.331.32)

देवखातेषु यः स्नात्वा तर्पयित्वा पितॄन्नृप । पूजयेद्देवदेवेशं पिङ्गलेश्वरमुत्तमम् ॥ ३२ ॥

devakhāteṣu yaḥ snātvā tarpayitvā pitṝnnṛpa | pūjayeddevadeveśaṁ piṅgaleśvaramuttamam || 32 ||

हे राजन्! जो देवखात में स्नान करके पितरों को तर्पण देता है, और देवाधिदेव उत्तम पिंगलेश्वर की पूजा करता है,

श्लोक 33 (skanda.5.331.33)

सोऽश्वमेधस्य यज्ञस्य वाजपेयस्य भारत । द्वयोः पुण्यमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ ३३ ॥

so'śvamedhasya yajñasya vājapeyasya bhārata | dvayoḥ puṇyamavāpnoti nātra kāryā vicāraṇā || 33 ||

हे भारत! वह अश्वमेध यज्ञ तथा वाजपेय यज्ञ - दोनों का पुण्य प्राप्त करता है - इसमें कोई विचार करने योग्य बात नहीं है।

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