Skip to main content

अवन्ती खण्ड · अध्याय 332

भूतीश्वर तीर्थ माहात्म्य एवं पंचविध स्नान वर्णन

अध्याय 331अध्याय-सूचीअध्याय 333

श्लोक 1 (skanda.5.332.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। भूतीश्वरं ततो गच्छेत्सर्वतीर्थेष्वनुत्तमम् । दर्शनादेव राजेन्द्र यस्य पापं प्रणश्यति ॥ १ ॥

śrīmārkaṇḍeya uvāca| bhūtīśvaraṁ tato gacchetsarvatīrtheṣvanuttamam | darśanādeva rājendra yasya pāpaṁ praṇaśyati || 1 ||

श्री मार्कण्डेय जी ने कहा - तत्पश्चात् भूतीश्वर तीर्थ में जाना चाहिए, जो समस्त तीर्थों में सर्वोत्तम है, हे राजेन्द्र! जिसके दर्शन मात्र से पाप नष्ट हो जाता है।

श्लोक 2 (skanda.5.332.2)

तत्र स्थाने पुरा पार्थ देवदेवेन शूलिना । उद्धूलनं कृतं गात्रे तेन भूतीश्वरं तु तत् ॥ २ ॥

tatra sthāne purā pārtha devadevena śūlinā | uddhūlanaṁ kṛtaṁ gātre tena bhūtīśvaraṁ tu tat || 2 ||

हे पार्थ! उस स्थान पर पूर्वकाल में त्रिशूलधारी देवाधिदेव ने अपने शरीर पर भस्म लगाई थी; इसीलिए वह स्थान भूतीश्वर कहलाता है।

श्लोक 3 (skanda.5.332.3)

पुष्ये वा जन्मनक्षत्रे अमावास्यां विशेषतः । भूतीश्वरे नरः स्नात्वा कुलकोटिं समुद्धरेत् ॥ ३ ॥

puṣye vā janmanakṣatre amāvāsyāṁ viśeṣataḥ | bhūtīśvare naraḥ snātvā kulakoṭiṁ samuddharet || 3 ||

पुष्य नक्षत्र में, अथवा अपने जन्मनक्षत्र में, विशेषतः अमावस्या को भूतीश्वर में स्नान करने वाला मनुष्य अपने करोड़ों कुलजनों का उद्धार कर देता है।

श्लोक 4 (skanda.5.332.4)

तत्र स्थाने तु यो भक्त्या कुरुते ह्यङ्गगुण्ठनम् । तस्य यत्फलमुद्दिष्टं तच्छृणुष्व नराधिप ॥ ४ ॥

tatra sthāne tu yo bhaktyā kurute hyaṅgaguṇṭhanam | tasya yatphalamuddiṣṭaṁ tacchṛṇuṣva narādhipa || 4 ||

हे नराधिप! उस स्थान पर जो भक्तिपूर्वक अपने अंगों पर भस्म का लेपन करता है, उसका जो फल कहा गया है, वह सुनो।

श्लोक 5 (skanda.5.332.5)

यावन्तो भूतिकणिका गात्रे लग्नाः शिवालये । तावद्वर्षसहस्राणि शिवलोके महीयते ॥ ५ ॥

yāvanto bhūtikaṇikā gātre lagnāḥ śivālaye | tāvadvarṣasahasrāṇi śivaloke mahīyate || 5 ||

शिवालय में जितने भस्म-कण उसके शरीर पर चिपकते हैं, उतने ही सहस्र वर्षों तक वह शिवलोक में महिमामण्डित रहता है।

श्लोक 6 (skanda.5.332.6)

सर्वेषामेव स्नानानां भस्मस्नानं परं स्मृतम् । पुराणैरृषिभिः प्रोक्तं सर्वशास्त्रेष्वनुत्तमम् ॥ ६ ॥

sarveṣāmeva snānānāṁ bhasmasnānaṁ paraṁ smṛtam | purāṇairṛṣibhiḥ proktaṁ sarvaśāstreṣvanuttamam || 6 ||

समस्त स्नानों में भस्म-स्नान परम स्मृत है; पुरातन ऋषियों द्वारा यह कहा गया है, जो समस्त शास्त्रों में सर्वोत्तम है।

श्लोक 7 (skanda.5.332.7)

एककालं द्विकालं वा त्रिकालं चापि यः सदा । स्नानं करोति चाग्नेयं पापं तस्य प्रणश्यति ॥ ७ ॥

ekakālaṁ dvikālaṁ vā trikālaṁ cāpi yaḥ sadā | snānaṁ karoti cāgneyaṁ pāpaṁ tasya praṇaśyati || 7 ||

जो सदा एक बार, दो बार अथवा तीन बार भी आग्नेय (भस्म) स्नान करता है, उसका पाप नष्ट हो जाता है।

श्लोक 8 (skanda.5.332.8)

दिव्यस्नानाद्वरं स्नानं वायव्यं भरतर्षभ । वायव्यादुत्तमं ब्राह्म्यं वरं ब्राह्म्यात्तु वारुणम् ॥ ८ ॥

divyasnānādvaraṁ snānaṁ vāyavyaṁ bharatarṣabha | vāyavyāduttamaṁ brāhmyaṁ varaṁ brāhmyāttu vāruṇam || 8 ||

हे भरतर्षभ! दिव्य स्नान से श्रेष्ठ वायव्य स्नान है; वायव्य से उत्तम ब्राह्म्य स्नान है; और ब्राह्म्य से श्रेष्ठ वारुण (जल) स्नान है।

श्लोक 9 (skanda.5.332.9)

आग्नेयं वारुणाच्छ्रेष्ठं यस्मादुक्तं स्वयम्भुवा । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन ह्याग्नेयं स्नानमाचरेत् ॥ ९ ॥

āgneyaṁ vāruṇācchreṣṭhaṁ yasmāduktaṁ svayambhuvā | tasmātsarvaprayatnena hyāgneyaṁ snānamācaret || 9 ||

और जल-स्नान से श्रेष्ठ आग्नेय (भस्म) स्नान है, जैसा स्वयं स्वयम्भू ब्रह्मा ने कहा है। अतः सम्पूर्ण प्रयत्न से आग्नेय स्नान करना चाहिए।

श्लोक 10 (skanda.5.332.10)

युधिष्ठिर उवाच। आग्नेयं वारुणं ब्राह्म्यं वायव्यं दिव्यमेव च । किमुक्तं श्रोतुमिच्छामि परं कौतूहलं हि मे ॥ १० ॥

yudhiṣṭhira uvāca| āgneyaṁ vāruṇaṁ brāhmyaṁ vāyavyaṁ divyameva ca | kimuktaṁ śrotumicchāmi paraṁ kautūhalaṁ hi me || 10 ||

युधिष्ठिर ने कहा - 'आग्नेय, वारुण, ब्राह्म्य, वायव्य तथा दिव्य स्नान से क्या तात्पर्य है? मैं इसे सुनना चाहता हूँ, क्योंकि मुझे इसके विषय में अत्यन्त कौतूहल है।'

श्लोक 11 (skanda.5.332.11)

मार्कण्डेय उवाच। आग्नेयं भस्मना स्नानमवगाह्य च वारुणम् । आपोहिष्ठेति च ब्राह्म्यं वायव्यं गोरजः स्मृतम् ॥ ११ ॥

mārkaṇḍeya uvāca| āgneyaṁ bhasmanā snānamavagāhya ca vāruṇam | āpohiṣṭheti ca brāhmyaṁ vāyavyaṁ gorajaḥ smṛtam || 11 ||

मार्कण्डेय जी ने कहा - भस्म से स्नान करना आग्नेय स्नान है; जल में डुबकी लगाना वारुण स्नान है; 'आपो हि ष्ठा' मन्त्र के साथ स्नान करना ब्राह्म्य स्नान है; तथा गायों द्वारा उड़ाई गई धूल में स्नान करना वायव्य स्नान कहा गया है।

श्लोक 12 (skanda.5.332.12)

सूर्ये दृष्टे तु यत्स्नानं गङ्गातोयेन तत्समम् । तत्स्नानं पञ्चमं प्रोक्तं दिव्यं पाण्डवसत्तम ॥ १२ ॥

sūrye dṛṣṭe tu yatsnānaṁ gaṅgātoyena tatsamam | tatsnānaṁ pañcamaṁ proktaṁ divyaṁ pāṇḍavasattama || 12 ||

हे पाण्डवसत्तम! सूर्य को देखते हुए किया गया स्नान गंगाजल के स्नान के समान होता है; वह पाँचवाँ स्नान दिव्य स्नान कहा गया है।

श्लोक 13 (skanda.5.332.13)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्नात्वा भूतीश्वरे तु यः । पूजयेद्देवमीशानं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥ १३ ॥

tasmātsarvaprayatnena snātvā bhūtīśvare tu yaḥ | pūjayeddevamīśānaṁ sa bāhyābhyantaraḥ śuciḥ || 13 ||

अतः जो भूतीश्वर में सम्पूर्ण प्रयत्नपूर्वक स्नान करके देव ईशान की पूजा करता है, वह बाह्य और आभ्यन्तर दोनों प्रकार से शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 14 (skanda.5.332.14)

तत्र स्थाने तु ये नित्यं ध्यायन्ति परमं पदम् । सूक्ष्मं चातीन्द्रियं नित्यं ते धन्या नात्र संशयः ॥ १४ ॥

tatra sthāne tu ye nityaṁ dhyāyanti paramaṁ padam | sūkṣmaṁ cātīndriyaṁ nityaṁ te dhanyā nātra saṁśayaḥ || 14 ||

उस स्थान पर जो नित्य सूक्ष्म, इन्द्रियातीत, नित्य परम पद का ध्यान करते हैं, वे धन्य हैं - इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 15 (skanda.5.332.15)

मुक्तितीर्थं तु तत्तीर्थं सर्वतीर्थेष्वनुत्तमम् । दर्शनादेव यस्यैव पापं याति महत्क्षयम् ॥ १५ ॥

muktitīrthaṁ tu tattīrthaṁ sarvatīrtheṣvanuttamam | darśanādeva yasyaiva pāpaṁ yāti mahatkṣayam || 15 ||

यह तीर्थ मुक्ति-तीर्थ है, समस्त तीर्थों में सर्वोत्तम है, जिसके दर्शन मात्र से बड़े-बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 16 (skanda.5.332.16)

जायते पूजया राज्यं तत्र स्तुत्वा महेश्वरम् । जपेन पापसंशुद्धिर्ध्यानेनानन्त्यमश्नुते ॥ १६ ॥

jāyate pūjayā rājyaṁ tatra stutvā maheśvaram | japena pāpasaṁśuddhirdhyānenānantyamaśnute || 16 ||

वहाँ पूजा से राज्य की प्राप्ति होती है, महेश्वर की स्तुति से पुण्य की प्राप्ति होती है, जप से पापों की शुद्धि होती है, और ध्यान से अनन्तता की प्राप्ति होती है।

श्लोक 17 (skanda.5.332.17)

ओं ज्योतिः स्वरूपमनादिमध्यमनुत्पाद्यमानमनुचार्यमाणाक्षरम् । सर्वभूतस्थितं शिवं सर्वयोगेश्वरं सर्वलोकेश्वरं मोहशोकहीनं महाज्ञानगम्यम् ॥ १७ ॥

oṁ jyotiḥ svarūpamanādimadhyamanutpādyamānamanucāryamāṇākṣaram | sarvabhūtasthitaṁ śivaṁ sarvayogeśvaraṁ sarvalokeśvaraṁ mohaśokahīnaṁ mahājñānagamyam || 17 ||

ॐ - जो ज्योतिस्वरूप है, जिसका न आदि है न मध्य, जो अनुत्पन्न है, जो निरन्तर जपा जाने वाला अक्षर है; जो समस्त प्राणियों में स्थित, कल्याणकारी, समस्त योगों का ईश्वर, समस्त लोकों का ईश्वर, मोह-शोक से रहित तथा महान् ज्ञान से ही गम्य है।

श्लोक 18 (skanda.5.332.18)

तत्र तीर्थे तु यो गत्वा स्नानं कुर्यान्नरेश्वर । अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः । एवम्भूतं न जानन्ति मोक्षापेक्षणिका नराः ॥ १८ ॥

tatra tīrthe tu yo gatvā snānaṁ kuryānnareśvara | aśvamedhasya yajñasya phalaṁ prāpnoti mānavaḥ | evambhūtaṁ na jānanti mokṣāpekṣaṇikā narāḥ || 18 ||

हे नरेश्वर! जो कोई वहाँ जाकर उस तीर्थ में स्नान करता है, वह मनुष्य अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है। परन्तु जो मनुष्य मोक्ष की ही अपेक्षा रखते हैं, वे ऐसे कर्मफलों की परवाह नहीं करते।

अध्याय 331अध्याय-सूचीअध्याय 333