अवन्ती खण्ड · अध्याय 333
गंगावाहक तीर्थ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.333.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र गङ्गावाहकमुत्तमम् । नर्मदायां महापुण्यं भृगुतीर्थसमीपतः ॥ १ ॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchettu rājendra gaṅgāvāhakamuttamam | narmadāyāṁ mahāpuṇyaṁ bhṛgutīrthasamīpataḥ || 1 ||
श्री मार्कण्डेय जी ने कहा - तत्पश्चात्, हे राजेन्द्र! भृगुतीर्थ के समीप नर्मदा में स्थित उत्तम एवं महापुण्यकारी गंगावाहक तीर्थ में जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.5.333.2)
तत्र गङ्गा महापुण्या चचार विपुलं तपः । पुरा वर्षशतं साग्रं परमं व्रतमास्थिता ॥ २ ॥
tatra gaṅgā mahāpuṇyā cacāra vipulaṁ tapaḥ | purā varṣaśataṁ sāgraṁ paramaṁ vratamāsthitā || 2 ||
वहाँ महापुण्यमयी गंगा ने पूर्वकाल में विशाल तपस्या की, सौ वर्षों से अधिक तक परम व्रत का पालन करते हुए,
श्लोक 3 (skanda.5.333.3)
ध्यात्वा देवं जगद्योनिं नारायणमकल्मषम् । आत्मानं परमं धाम सरित्सा जगतीपते ॥ ३ ॥
dhyātvā devaṁ jagadyoniṁ nārāyaṇamakalmaṣam | ātmānaṁ paramaṁ dhāma saritsā jagatīpate || 3 ||
हे जगतीपते! वह नदी नारायण देव का ध्यान करती रही, जो जगत् की योनि, निष्कलंक तथा स्वयं परम धाम हैं।
श्लोक 4 (skanda.5.333.4)
ततो जनार्दनो देव आगत्येदमुवाच ह ॥ ४ ॥
tato janārdano deva āgatyedamuvāca ha || 4 ||
तब जनार्दन देव वहाँ पधारकर यह बोले -
श्लोक 5 (skanda.5.333.5)
विष्णुरुवाच। तपसा तव तुष्टोऽहं मत्पादाम्बुजसम्भवे । मत्तः किमिच्छसे देवि ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ ५ ॥
viṣṇuruvāca| tapasā tava tuṣṭo'haṁ matpādāmbujasambhave | mattaḥ kimicchase devi brūhi kiṁ karavāṇi te || 5 ||
विष्णु ने कहा - 'हे मेरे चरण-कमल से उत्पन्न देवी! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ। तुम मुझसे क्या चाहती हो? बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?'
श्लोक 6 (skanda.5.333.6)
गङ्गोवाच। त्वत्पादकमलाद्भ्रष्टा गङ्गा सहचरा विभो । यदृच्छया त्रिलोकेश वन्द्यमाना दिवौकसैः ॥ ६ ॥
gaṅgovāca| tvatpādakamalādbhraṣṭā gaṅgā sahacarā vibho | yadṛcchayā trilokeśa vandyamānā divaukasaiḥ || 6 ||
गंगा ने कहा - 'हे विभो! मैं गंगा आपके चरणकमल से गिरी हुई आपकी सहचरी हूँ। हे त्रिलोकेश! मैं स्वेच्छा से विचरण करती हूँ, देवताओं द्वारा वन्दित होती हुई।
श्लोक 7 (skanda.5.333.7)
नृपो भगीरथस्तस्मात्तपः कृत्वा सुदुष्करम् । समाराध्य जगन्नाथं शङ्करं लोकशङ्करम् ॥ ७ ॥
nṛpo bhagīrathastasmāttapaḥ kṛtvā suduṣkaram | samārādhya jagannāthaṁ śaṅkaraṁ lokaśaṅkaram || 7 ||
तत्पश्चात् राजा भगीरथ ने अत्यन्त कठिन तपस्या करके, जगन्नाथ लोककल्याणकारी शंकर की आराधना करके,
श्लोक 8 (skanda.5.333.8)
अवतारयामास हि मां पृथिव्यां धरणीधर । मया वै युवयोर्वाक्यादवतारः कृतो भुवि ॥ ८ ॥
avatārayāmāsa hi māṁ pṛthivyāṁ dharaṇīdhara | mayā vai yuvayorvākyādavatāraḥ kṛto bhuvi || 8 ||
हे धरणीधर! मुझे इस पृथ्वी पर उतार लिया। आप दोनों के वचन से ही मैंने पृथ्वी पर अवतरण किया।
श्लोक 9 (skanda.5.333.9)
वैष्णवीमिति मां मत्वा जनः सर्वाप्लुतो मयि । ये वै ब्रह्मणो लोके ये च वै गुरुतल्पगाः ॥ ९ ॥
vaiṣṇavīmiti māṁ matvā janaḥ sarvāplutо mayi | ye vai brahmaṇo loke ye ca vai gurutalpagāḥ || 9 ||
मुझे वैष्णवी मानकर सभी लोग मुझमें स्नान करते हैं। इनमें वे भी हैं जो लोक में ब्रह्महत्यारे हैं, और जो गुरुपत्नीगामी हैं,
श्लोक 10 (skanda.5.333.10)
त्यागिनः पितृमातृभ्यां ये च स्वर्णहरा नराः । गोघ्ना ये मनुजा लोके तथा ये प्राणिहिंसकाः ॥ १० ॥
tyāginaḥ pitṛmātṛbhyāṁ ye ca svarṇaharā narāḥ | goghnā ye manujā loke tathā ye prāṇihiṁsakāḥ || 10 ||
जो पिता-माता का परित्याग करने वाले हैं, जो स्वर्णचोर हैं, जो गोहत्यारे हैं, तथा जो प्राणियों की हिंसा करने वाले हैं,
श्लोक 11 (skanda.5.333.11)
अगम्यागामिनो ये च ह्यभक्ष्यस्य च भक्षकाः । ये चानृतप्रवक्तारो ये च विश्वासघातकाः ॥ ११ ॥
agamyāgāmino ye ca hyabhakṣyasya ca bhakṣakāḥ | ye cānṛtapravaktāro ye ca viśvāsaghātakāḥ || 11 ||
जो अगम्यागामी हैं, जो अभक्ष्य का भक्षण करने वाले हैं, जो असत्य बोलने वाले हैं, तथा जो विश्वासघाती हैं,
श्लोक 12 (skanda.5.333.12)
देवब्राह्मणवित्तानां हर्तारो ये नराधमाः । देवब्रह्मगुरुस्त्रीणां ये च निन्दाकरा नराः ॥ १२ ॥
devabrāhmaṇavittānāṁ hartāro ye narādhamāḥ | devabrahmagurustrīṇāṁ ye ca nindākarā narāḥ || 12 ||
जो नराधम देवताओं और ब्राह्मणों के धन का हरण करते हैं, तथा जो मनुष्य देवताओं, ब्राह्मणों, गुरु और स्त्रियों की निन्दा करते हैं,
श्लोक 13 (skanda.5.333.13)
ब्रह्मशापप्रदग्धा ये ये चैवात्महनो द्विजाः । भ्रष्टानशनसंन्यासनियतव्रतचारिणः ॥ १३ ॥
brahmaśāpapradagdhā ye ye caivātmahano dvijāḥ | bhraṣṭānaśanasaṁnyāsaniyatavratacāriṇaḥ || 13 ||
जो ब्रह्मशाप से दग्ध हैं, जो द्विज आत्महत्या करने वाले हैं, तथा जो अपने अनशन, संन्यास अथवा नियत व्रतों से भ्रष्ट हो गए हैं -
श्लोक 14 (skanda.5.333.14)
तथैवापेयपेयाश्च ये च स्वगुरुनिन्दकाः । निषेधका ये दानानां पात्रदानपराङ्मुखाः ॥ १४ ॥
tathaivāpeyapeyāśca ye ca svagurunindakāḥ | niṣedhakā ye dānānāṁ pātradānaparāṅmukhāḥ || 14 ||
उसी प्रकार जो अपेय पदार्थ पीने वाले हैं, जो अपने ही गुरु की निन्दा करने वाले हैं, जो दानों को रोकने वाले हैं, तथा जो सुपात्र को दान देने से विमुख रहते हैं,
श्लोक 15 (skanda.5.333.15)
ऋतुघ्ना ये स्वपत्नीनां पित्रोः सेहपरा न हि । बान्धवेषु च दीनेषु करुणा यस्य नास्ति वै ॥ १५ ॥
ṛtughnā ye svapatnīnāṁ pitroḥ sehaparā na hi | bāndhaveṣu ca dīneṣu karuṇā yasya nāsti vai || 15 ||
जो अपनी पत्नियों के ऋतुकाल की उपेक्षा करते हैं, जो माता-पिता की सेवा में तत्पर नहीं रहते, तथा जिनमें बन्धुजनों और दीनों के प्रति करुणा नहीं है,
श्लोक 16 (skanda.5.333.16)
क्षेत्रसेतुविभेदी च पूर्वमार्गप्रलोपकः । नास्तिकः शास्त्रहीनस्तु विप्रः सन्ध्याविवर्जितः ॥ १६ ॥
kṣetrasetuvibhedī ca pūrvamārgapralopakaḥ | nāstikaḥ śāstrahīnastu vipraḥ sandhyāvivarjitaḥ || 16 ||
जो खेतों की मेड़ों और बाँधों को तोड़ने वाले हैं, जो प्राचीन मार्गों को नष्ट करने वाले हैं, जो नास्तिक हैं, जो शास्त्रहीन तथा संध्या-विवर्जित ब्राह्मण हैं,
श्लोक 17 (skanda.5.333.17)
अहुताशी ह्यसंतुष्टः सर्वाशी सर्वविक्रयी । कदर्या नास्तिकाः क्रूराः कृतघ्ना ये द्विजायः ॥ १७ ॥
ahutāśī hyasaṁtuṣṭaḥ sarvāśī sarvavikrayī | kadaryā nāstikāḥ krūrāḥ kṛtaghnā ye dvijāyaḥ || 17 ||
जो अग्नि में हवन किए बिना ही भोजन कर लेते हैं, जो असंतुष्ट हैं, जो सर्वभक्षी हैं, जो सब कुछ बेचने वाले हैं, कंजूस, नास्तिक, क्रूर तथा कृतघ्न द्विज,
श्लोक 18 (skanda.5.333.18)
पैशुन्या रसविक्रेयाः सर्वकालविनाकृताः । स्वगोत्रां परगोत्रां वा ये भुञ्जन्ति द्विजाधमाः ॥ १८ ॥
paiśunyā rasavikreyāḥ sarvakālavinākṛtāḥ | svagotrāṁ paragotrāṁ vā ye bhuñjanti dvijādhamāḥ || 18 ||
चुगलखोर, मादक रस बेचने वाले, सभी उचित कर्मकाण्डों से रहित, तथा वे नीच द्विज जो स्वगोत्रा अथवा परगोत्रा स्त्रियों के साथ अनुचित रूप से भोग करते हैं -
श्लोक 19 (skanda.5.333.19)
ते मां प्राप्य विमुच्यन्ते पापसङ्घैः सुसंचितैः । तत्पापक्षारतप्ताया न शर्म मम विद्यते ॥ १९ ॥
te māṁ prāpya vimucyante pāpasaṅghaiḥ susaṁcitaiḥ | tatpāpakṣārataptāyā na śarma mama vidyate || 19 ||
- ये सब मुझे प्राप्त कर अपने भलीभाँति संचित पापसमूहों से मुक्त हो जाते हैं। परन्तु उन्हीं पापों के क्षार से संतप्त होकर मुझे स्वयं कोई शान्ति प्राप्त नहीं होती।
श्लोक 20 (skanda.5.333.20)
तथा कुरु जगन्नाथ यथाहं शर्म चाप्नुयाम् । एवमुक्तस्तु देवेशस्तुष्टः प्रोवाच जाह्नवीम् ॥ २० ॥
tathā kuru jagannātha yathāhaṁ śarma cāpnuyām | evamuktastu deveśastuṣṭaḥ provāca jāhnavīm || 20 ||
हे जगन्नाथ! ऐसा कुछ कीजिए कि मुझे भी शान्ति प्राप्त हो सके।' इस प्रकार निवेदन किए जाने पर देवेश प्रसन्न होकर जाह्नवी से बोले -
श्लोक 21 (skanda.5.333.21)
विष्णुरुवाच। अहमत्र वसिष्यामि गङ्गाधरसहायवान् । प्रविशस्व सदा रेवां त्वमत्रैव च मूर्तिना ॥ २१ ॥
viṣṇuruvāca| ahamatra vasiṣyāmi gaṅgādharasahāyavān | praviśasva sadā revāṁ tvamatraiva ca mūrtinā || 21 ||
विष्णु ने कहा - 'मैं गंगाधर (शिव) के सहयोग से यहीं निवास करूँगा। तुम सदा रेवा (नर्मदा) में प्रवेश करती रहो, और स्वयं यहीं मूर्तिरूप में भी स्थित रहो।
श्लोक 22 (skanda.5.333.22)
मम पादतलं प्राप्य वह त्रिपथगामिनि । यदा बहूदककाले नर्मदाजलसंभृता ॥ २२ ॥
mama pādatalaṁ prāpya vaha tripathagāmini | yadā bahūdakakāle narmadājalasaṁbhṛtā || 22 ||
हे त्रिपथगामिनी! मेरे चरणतल को प्राप्त करके तुम प्रवाहित होती रहो। जब जलाधिक्य के समय, नर्मदा के जल से भरपूर होकर,
श्लोक 23 (skanda.5.333.23)
प्रावृट्कालं समासाद्य भविष्यति जलाकुला । प्लाव्योभयतटं देवी प्राप्य मामुत्तरस्थितम् ॥ २३ ॥
prāvṛṭkālaṁ samāsādya bhaviṣyati jalākulā | plāvyobhayataṭaṁ devī prāpya māmuttarasthitam || 23 ||
- वर्षाऋतु के आगमन पर वह जलाकुल हो जाएगी; और वह देवी दोनों तटों को जलमग्न करके, उत्तर में स्थित मुझे प्राप्त करेगी -
श्लोक 24 (skanda.5.333.24)
प्लावयिष्यति तोयेन यदा शङ्खं करे स्थितम् । तदा पर्वशतोद्युक्तं वैष्णवं पर्वसंज्ञितम् ॥ २४ ॥
plāvayiṣyati toyena yadā śaṅkhaṁ kare sthitam | tadā parvaśatodyuktaṁ vaiṣṇavaṁ parvasaṁjñitam || 24 ||
- और जब उसका जल मेरे हाथ में स्थित शंख को जलमग्न कर देगा, तब वह वैष्णव पर्व कहलाएगा, जो सौ पर्वों के समान महत्त्वपूर्ण होगा।
श्लोक 25 (skanda.5.333.25)
न तेन सदृशं किंचिद्व्यतीपातादिसंक्रमम् । अयने द्वे च न तथा पुण्यात्पुण्यतरं यथा ॥ २५ ॥
na tena sadṛśaṁ kiṁcidvyatīpātādisaṅkramam | ayane dve ca na tathā puṇyātpuṇyataraṁ yathā || 25 ||
उसके समान न व्यतीपात योग है, न अन्य सूर्य-संक्रान्तियाँ, न ही दोनों अयन - इस पुण्य से अधिक पुण्यकारी और कुछ भी नहीं है।
श्लोक 26 (skanda.5.333.26)
तस्मिन्पर्वणि देवेशि शङ्खं संस्पृश्य मानवः । स्नानमाचरते तोये मिश्रे गाङ्गेयनार्मदे ॥ २६ ॥
tasminparvaṇi deveśi śaṅkhaṁ saṁspṛśya mānavaḥ | snānamācarate toye miśre gāṅgeyanārmade || 26 ||
हे देवेशि! उस पर्व पर जो मनुष्य शंख का स्पर्श करके गंगा और नर्मदा के मिश्रित जल में स्नान करता है,
श्लोक 27 (skanda.5.333.27)
पुण्यं त्वशेषपुण्यानां मङ्गलानां च मङ्गलम् । विष्णुना विधृतो येन तस्माच्छान्तिः प्रचक्रमे ॥ २७ ॥
puṇyaṁ tvaśeṣapuṇyānāṁ maṅgalānāṁ ca maṅgalam | viṣṇunā vidhṛto yena tasmācchāntiḥ pracakrame || 27 ||
- उसे सम्पूर्ण पुण्यों का पुण्य तथा समस्त मंगलों का मंगल प्राप्त होता है। चूँकि यह स्वयं विष्णु द्वारा धारण किया गया है, इससे शान्ति की उत्पत्ति होती है।
श्लोक 28 (skanda.5.333.28)
तत्रान्तं पापसङ्घस्य ध्रुवमाप्नोति मानवः । शङ्खोद्धारे नरः स्नात्वा तर्पयेत्पितृदेवताः ॥ २८ ॥
tatrāntaṁ pāpasaṅghasya dhruvamāpnoti mānavaḥ | śaṅkhoddhāre naraḥ snātvā tarpayetpitṛdevatāḥ || 28 ||
वहाँ मनुष्य निश्चित रूप से अपने पापसमूह का अन्त प्राप्त करता है। जो शंखोद्धार में स्नान करता है, उसे पितृदेवताओं को तर्पण देना चाहिए।
श्लोक 29 (skanda.5.333.29)
तृप्तास्ते द्वादशाब्दानि सिद्धिं च सार्वकामिकीम् । गङ्गावहे तु यः श्राद्धं शङ्खोद्धारे प्रदास्यति ॥ २९ ॥
tṛptāste dvādaśābdāni siddhiṁ ca sārvakāmikīm | gaṅgāvahe tu yaḥ śrāddhaṁ śaṅkhoddhāre pradāsyati || 29 ||
उसके पितर बारह वर्षों तक तृप्त रहते हैं और उसे समस्त कामनाओं की सिद्धि प्राप्त होती है। जो गंगावह में, शंखोद्धार में श्राद्ध करता है,
श्लोक 30 (skanda.5.333.30)
तेन पिण्डप्रदानेन नृत्यन्ति पितरस्तथा । शङ्खोद्धारे नरः स्नात्वा पूजयेद्बलकेशवौ ॥ ३० ॥
tena piṇḍapradānena nṛtyanti pitarastathā | śaṅkhoddhāre naraḥ snātvā pūjayedbalakeśavau || 30 ||
- उस पिण्डदान से उसके पितर नृत्य करने लगते हैं। शंखोद्धार में स्नान करके मनुष्य को बल और केशव की पूजा करनी चाहिए,
श्लोक 31 (skanda.5.333.31)
रात्रौ जागरणं कृत्वा शुद्धो भवति जाह्नवि । यत्त्वं लोककृतं कर्म मन्यसे भुवि दुःसहम् ॥ ३१ ॥
rātrau jāgaraṇaṁ kṛtvā śuddho bhavati jāhnavi | yattvaṁ lokakṛtaṁ karma manyase bhuvi duḥsaham || 31 ||
- तथा रात्रि में जागरण करके शुद्ध हो जाता है। हे जाह्नवि! लोगों द्वारा किए गए जिन कर्मों को तुम पृथ्वी पर दुःसह मानती हो,
श्लोक 32 (skanda.5.333.32)
तस्मिन्पर्वणि तत्सर्वं तत्र स्नात्वा व्यपोहय । एवमुक्त्वा नरश्रेष्ठ विष्णुश्चान्तरधीयत ॥ ३२ ॥
tasminparvaṇi tatsarvaṁ tatra snātvā vyapohaya | evamuktvā naraśreṣṭha viṣṇuścāntaradhīyata || 32 ||
- उस पर्व पर उन सबको वहाँ स्नान करके दूर कर दिया करो।' हे नरश्रेष्ठ! ऐसा कहकर विष्णु अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 33 (skanda.5.333.33)
तदाप्रभृति तत्तीर्थं गङ्गावाहकमुत्तमम् । ब्रह्माद्यैरृषिभिस्तात पारम्पर्यक्रमागतैः ॥ ३३ ॥
tadāprabhṛti tattīrthaṁ gaṅgāvāhakamuttamam | brahmādyairṛṣibhistāta pāramparyakramāgataiḥ || 33 ||
तभी से, हे तात! वह उत्तम गंगावाहक तीर्थ, ब्रह्मा आदि ऋषियों द्वारा परम्परा-क्रम से [जाना गया] -
श्लोक 34 (skanda.5.333.34)
तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा भक्तिभावेन भारत । गङ्गातीर्थे तु स स्नातः समस्तेषु न संशयः ॥ ३४ ॥
tatra tīrthe tu yaḥ snātvā bhaktibhāvena bhārata | gaṅgātīrthe tu sa snātaḥ samasteṣu na saṁśayaḥ || 34 ||
हे भारत! जो उस तीर्थ में भक्तिभाव से स्नान करता है, उसने मानो गंगा के समस्त तीर्थों में स्नान कर लिया है - इसमें कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 35 (skanda.5.333.35)
तत्र तीर्थे मृतानां तु नराणां भावितात्मनाम् । अनिवर्तिका गतिस्तेषां विष्णुलोकात्कदाचन ॥ ३५ ॥
tatra tīrthe mṛtānāṁ tu narāṇāṁ bhāvitātmanām | anivartikā gatisteṣāṁ viṣṇulokātkadācana || 35 ||
उस तीर्थ में मरने वाले भावितात्मा मनुष्यों की गति विष्णुलोक से कभी भी अनिवर्तनीय (न लौटने वाली) होती है।