अवन्ती खण्ड · अध्याय 334
गौतमेश्वर तीर्थ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.334.1)
मार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र गौतमेश्वरमुत्तमम् । सर्वपापहरं तीर्थं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ १ ॥
mārkaṇḍeya uvāca| tato gacchettu rājendra gautameśvaramuttamam | sarvapāpaharaṁ tīrthaṁ triṣu lokeṣu viśrutam || 1 ||
मार्कण्डेय जी ने कहा - तत्पश्चात्, हे राजेन्द्र! उत्तम गौतमेश्वर तीर्थ में जाना चाहिए, जो समस्त पापों को हरने वाला तथा तीनों लोकों में विख्यात है।
श्लोक 2 (skanda.5.334.2)
गौतमेन तपस्तप्तं तत्र तीर्थे युधिष्ठिर । दिव्यं वर्षसहस्रं तु ततस्तुष्टो महेश्वरः ॥ २ ॥
gautamena tapastaptaṁ tatra tīrthe yudhiṣṭhira | divyaṁ varṣasahasraṁ tu tatastuṣṭo maheśvaraḥ || 2 ||
हे युधिष्ठिर! गौतम मुनि ने उस तीर्थ में एक सहस्र दिव्य वर्षों तक तपस्या की; तत्पश्चात् महेश्वर प्रसन्न हुए।
श्लोक 3 (skanda.5.334.3)
प्रणम्य शिरसा तत्र स्थापितः परमेश्वरः । स्थापितो गौतमेनेशो गौतमेश्वर उच्यते ॥ ३ ॥
praṇamya śirasā tatra sthāpitaḥ parameśvaraḥ | sthāpito gautameneśo gautameśvara ucyate || 3 ||
वहाँ सिर झुकाकर उन्होंने परमेश्वर की स्थापना की; चूँकि ईश्वर की स्थापना गौतम द्वारा हुई, अतः वे गौतमेश्वर कहलाते हैं।
श्लोक 4 (skanda.5.334.4)
तत्र देवैश्च गन्धर्वैरृषिभिः पितृदैवतैः । सम्प्राप्ता ह्युत्तमा सिद्धिराराध्य परमेश्वरम् ॥ ४ ॥
tatra devaiśca gandharvairṛṣibhiḥ pitṛdaivataiḥ | samprāptā hyuttamā siddhirārādhya parameśvaram || 4 ||
वहाँ देवताओं, गन्धर्वों, ऋषियों तथा पितृदेवताओं द्वारा परमेश्वर की आराधना करके उत्तम सिद्धि प्राप्त की गई।
श्लोक 5 (skanda.5.334.5)
तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत्पितृदेवताः । पूजयेत्परमीशानं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५ ॥
tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayetpitṛdevatāḥ | pūjayetparamīśānaṁ sarvapāpaiḥ pramucyate || 5 ||
जो उस तीर्थ में स्नान करके पितृदेवताओं की पूजा करता है, और परमेशान की पूजा करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 6 (skanda.5.334.6)
बहवस्तन्न जानन्ति विष्णुमायाविमोहिताः । तत्र संनिहितं देवं शूलपाणिं महेश्वरम् ॥ ६ ॥
bahavastanna jānanti viṣṇumāyāvimohitāḥ | tatra saṁnihitaṁ devaṁ śūlapāṇiṁ maheśvaram || 6 ||
विष्णु की माया से मोहित बहुत से लोग यह नहीं जानते कि त्रिशूलधारी देव महेश्वर वहाँ साक्षात् विराजमान हैं।
श्लोक 7 (skanda.5.334.7)
ब्रह्मचारी तु यो भूत्वा तत्र तीर्थे नरेश्वर । स्नात्वार्चयेन्महादेवं सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥ ७ ॥
brahmacārī tu yo bhūtvā tatra tīrthe nareśvara | snātvārcayenmahādevaṁ so'śvamedhaphalaṁ labhet || 7 ||
हे नरेश्वर! जो ब्रह्मचर्य धारण करके उस तीर्थ में स्नान करके महादेव की पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 8 (skanda.5.334.8)
ब्रह्मचारी तु यो भूत्वा तर्पयेत्पितृदेवताः । पूजयेत्परमीशानं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ८ ॥
brahmacārī tu yo bhūtvā tarpayetpitṛdevatāḥ | pūjayetparamīśānaṁ sarvapāpaiḥ pramucyate || 8 ||
जो ब्रह्मचर्यपूर्वक पितृदेवताओं को तर्पण देता है और परमेशान की पूजा करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 9 (skanda.5.334.9)
तत्र तीर्थे तु यो दानं भक्त्या दद्याद्द्विजातये । तदक्षयफलं सर्वं नात्र कार्या विचारणा ॥ ९ ॥
tatra tīrthe tu yo dānaṁ bhaktyā dadyāddvijātaye | tadakṣayaphalaṁ sarvaṁ nātra kāryā vicāraṇā || 9 ||
उस तीर्थ में जो कोई भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को दान देता है, उसका वह सब फल अक्षय होता है - इसमें कोई विचार करने योग्य बात नहीं है।
श्लोक 10 (skanda.5.334.10)
मासे चाश्वयुजे राजन् कृष्णपक्षे चतुर्दशीम् । स्नात्वा तत्र विधानेन दीपकानां शतं ददेत् ॥ १० ॥
māse cāśvayuje rājan kṛṣṇapakṣe caturdaśīm | snātvā tatra vidhānena dīpakānāṁ śataṁ dadet || 10 ||
हे राजन्! आश्विन मास में, कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को, वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके सौ दीपक अर्पित करने चाहिए।
श्लोक 11 (skanda.5.334.11)
पूजयित्वा महादेवं गन्धपुष्पादिभिर्नरः । मुच्यते सर्वपापेभ्यो मृतः शिवपुरं व्रजेत् ॥ ११ ॥
pūjayitvā mahādevaṁ gandhapuṣpādibhirnaraḥ | mucyate sarvapāpebhyo mṛtaḥ śivapuraṁ vrajet || 11 ||
गन्ध, पुष्प आदि से महादेव की पूजा करने वाला मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर मृत्यु के पश्चात् शिवपुर को जाता है।
श्लोक 12 (skanda.5.334.12)
अष्टम्यां च चतुर्दश्यां कार्त्तिक्यां तु विशेषतः । उपोष्य प्रयतो भूत्वा घृतेन स्नापयेच्छिवम् ॥ १२ ॥
aṣṭamyāṁ ca caturdaśyāṁ kārttikyāṁ tu viśeṣataḥ | upoṣya prayato bhūtvā ghṛtena snāpayecchivam || 12 ||
अष्टमी और चतुर्दशी को, तथा विशेषतः कार्तिक मास में, उपवास करके पवित्र होकर घृत से शिव का अभिषेक करना चाहिए,
श्लोक 13 (skanda.5.334.13)
पञ्चगव्येन मधुना दध्ना वा शीतवारिणा । स च सर्वस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ १३ ॥
pañcagavyena madhunā dadhnā vā śītavāriṇā | sa ca sarvasya yajñasya phalaṁ prāpnoti mānavaḥ || 13 ||
- पंचगव्य से, मधु से, दधि से अथवा शीतल जल से; और वह मनुष्य समस्त यज्ञों का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 14 (skanda.5.334.14)
भक्त्या तु पूजयेत्पश्चात्स लभेत्फलमुत्तमम् । बिल्वपत्रैरखण्डैश्च पुष्पैरुन्मत्तकोद्भवैः ॥ १४ ॥
bhaktyā tu pūjayetpaścātsa labhetphalamuttamam | bilvapatrairakhaṇḍaiśca puṣpairunmattakodbhavaiḥ || 14 ||
तत्पश्चात् भक्तिपूर्वक पूजा करके वह उत्तम फल प्राप्त करता है - अखण्डित बिल्वपत्रों से, तथा धतूरे के पुष्पों से,
श्लोक 15 (skanda.5.334.15)
कुशापामार्गसहितैः कदम्बद्रोणजैरपि । मल्लिकाकरवीरैश्च रक्तपीतैः सितासितैः ॥ १५ ॥
kuśāpāmārgasahitaiḥ kadambadroṇajairapi | mallikākaravīraiśca raktapītaiḥ sitāsitaiḥ || 15 ||
कुश और अपामार्ग सहित, कदम्ब और द्रोणपुष्प से भी, मल्लिका और कनेर के पुष्पों से - लाल, पीले, सफेद और काले -
श्लोक 16 (skanda.5.334.16)
पुष्पैरन्यैर्यथालाभं यो नरः पूजयेच्छिवम् । नैरन्तर्येण षण्मासं योऽर्चयेद्गौतमेश्वरम् । सर्वान्कामानवाप्नोति मृतः शिवपुरं व्रजेत् ॥ १६ ॥
puṣpairanyairyathālābhaṁ yo naraḥ pūjayecchivam | nairantaryeṇa ṣaṇmāsaṁ yo'rcayedgautameśvaram | sarvānkāmānavāpnoti mṛtaḥ śivapuraṁ vrajet || 16 ||
- तथा उपलब्ध अन्य पुष्पों से भी जो मनुष्य शिव की पूजा करता है; जो निरन्तर छह महीने तक गौतमेश्वर की पूजा करता है, वह समस्त कामनाओं को प्राप्त करके मृत्यु के पश्चात् शिवपुर को जाता है।