अवन्ती खण्ड · अध्याय 335
दशाश्वमेध तीर्थ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.335.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महीपाल दशाश्वमेधिकं परम् । तीर्थं सर्वगुणोपेतं महापातकनाशनम् ॥ १ ॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahīpāla daśāśvamedhikaṁ param | tīrthaṁ sarvaguṇopetaṁ mahāpātakanāśanam || 1 ||
श्री मार्कण्डेय जी ने कहा - तत्पश्चात्, हे महीपाल! परम दशाश्वमेधिक तीर्थ में जाना चाहिए, जो सभी गुणों से युक्त तथा महापातकों का नाशक है।
श्लोक 2 (skanda.5.335.2)
यत्र गत्वा महाराज स्नात्वा सम्पूज्य चेश्वरम् । दशानामश्वमेधानां फलं प्राप्नोति मानवः ॥ २ ॥
yatra gatvā mahārāja snātvā sampūjya ceśvaram | daśānāmaśvamedhānāṁ phalaṁ prāpnoti mānavaḥ || 2 ||
हे महाराज! वहाँ जाकर, स्नान करके तथा ईश्वर की पूजा करके, मनुष्य दस अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 3 (skanda.5.335.3)
युधिष्ठिर उवाच। अश्वमेधो महायज्ञो बहुसम्भारदक्षिणः । अशक्यः प्राकृतैः कर्तुं कथं तेषां फलं लभेत् ॥ ३ ॥
yudhiṣṭhira uvāca| aśvamedho mahāyajño bahusambhāradakṣiṇaḥ | aśakyaḥ prākṛtaiḥ kartuṁ kathaṁ teṣāṁ phalaṁ labhet || 3 ||
युधिष्ठिर ने कहा - 'अश्वमेध महान् यज्ञ है, जिसमें प्रचुर सामग्री और दक्षिणा चाहिए, जिसे साधारण लोग करने में असमर्थ हैं। तो वे उसका फल कैसे प्राप्त कर सकते हैं?
श्लोक 4 (skanda.5.335.4)
अत्याश्चर्यमिदं तत्त्वं त्वयोक्तं वदता सता । यथा मे जायते श्रद्धा दीर्घायुस्त्वं तथा वद ॥ ४ ॥
atyāścaryamidaṁ tattvaṁ tvayoktaṁ vadatā satā | yathā me jāyate śraddhā dīrghāyustvaṁ tathā vada || 4 ||
यह जो सत्य आपने कहा है, हे सत्यवादी! अत्यन्त आश्चर्यजनक है। हे दीर्घायु! इसे ऐसे समझाइए कि मुझमें श्रद्धा उत्पन्न हो।'
श्लोक 5 (skanda.5.335.5)
मार्कण्डेय उवाच। इदमाश्चर्यभूतं हि गौर्या पृष्टस्त्रियम्बकः । तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि पृच्छते निपुणाय वै ॥ ५ ॥
mārkaṇḍeya uvāca| idamāścaryabhūtaṁ hi gauryā pṛṣṭastriyambakaḥ | tatte'haṁ sampravakṣyāmi pṛcchate nipuṇāya vai || 5 ||
मार्कण्डेय जी ने कहा - यही आश्चर्यजनक बात गौरी ने त्र्यम्बक (शिव) से पूछी थी; वही मैं तुम्हें बताता हूँ, क्योंकि तुम भी कुशलतापूर्वक पूछ रहे हो।
श्लोक 6 (skanda.5.335.6)
पुरा वृषस्थो देवेश ह्युमया सह शङ्करः । कदाचित्पर्यटन्पृथिवीं नर्मदातटमाश्रितः ॥ ६ ॥
purā vṛṣastho deveśa hyumayā saha śaṅkaraḥ | kadācitparyaṭanpṛthivīṁ narmadātaṭamāśritaḥ || 6 ||
एक बार देवेश शंकर, अपने वृषभ पर सवार, उमा के साथ पृथ्वी पर विचरण करते हुए, नर्मदा के तट पर आ पहुँचे।
श्लोक 7 (skanda.5.335.7)
दशाश्वमेधिकं तीर्थं दृष्ट्वा देवो महेश्वरः । तीर्थं प्रत्यञ्जलिं बद्ध्वा नमश्चक्रे त्रिलोचनः ॥ ७ ॥
daśāśvamedhikaṁ tīrthaṁ dṛṣṭvā devo maheśvaraḥ | tīrthaṁ pratyañjaliṁ baddhvā namaścakre trilocanaḥ || 7 ||
दशाश्वमेधिक तीर्थ को देखकर देव महेश्वर त्रिलोचन ने उस तीर्थ के सम्मुख हाथ जोड़कर नमस्कार किया।
श्लोक 8 (skanda.5.335.8)
कृताञ्जलिपुटं देवं दृष्ट्वा देवीदमब्रवीत् ॥ ८ ॥
kṛtāñjalipuṭaṁ devaṁ dṛṣṭvā devīdamabravīt || 8 ||
हाथ जोड़े हुए देव को देखकर देवी ने यह कहा -
श्लोक 9 (skanda.5.335.9)
देव्युवाच। किमेतद्देवदेवेश चराचरनमस्कृत । प्रह्वनम्राञ्जलिं बद्ध्वा भक्त्या परमया युतः ॥ ९ ॥
devyuvāca| kimetaddevadeveśa carācaranamaskṛta | prahvanamrāñjaliṁ baddhvā bhaktyā paramayā yutaḥ || 9 ||
देवी ने कहा - 'हे देवदेवेश! समस्त चराचर द्वारा नमस्कृत आप, यह क्या है? आप विनम्रतापूर्वक झुककर हाथ जोड़े हुए, परम भक्तिसहित -
श्लोक 10 (skanda.5.335.10)
एतदाश्चर्यमतुलं सर्वं कथय मे प्रभो ॥ १० ॥
etadāścaryamatulaṁ sarvaṁ kathaya me prabho || 10 ||
- [ऐसा क्यों कर रहे हैं]? हे प्रभो! इस अनुपम आश्चर्य के विषय में मुझे सब कुछ बताइए।'
श्लोक 11 (skanda.5.335.11)
ईश्वर उवाच। प्रत्यक्षं पश्य तीर्थस्य फलं मा विस्मिता भव । वियत्स्था मे भुविस्थस्य क्षणं देवि स्थिरा भव ॥ ११ ॥
īśvara uvāca| pratyakṣaṁ paśya tīrthasya phalaṁ mā vismitā bhava | viyatsthā me bhuvisthasya kṣaṇaṁ devi sthirā bhava || 11 ||
ईश्वर ने कहा - 'इस तीर्थ का फल प्रत्यक्ष देखो, आश्चर्यचकित मत होओ। हे देवि! तुम आकाश में स्थिर रहो एक क्षण के लिए, जब मैं भूमि पर स्थित होता हूँ।'
श्लोक 12 (skanda.5.335.12)
एवमुक्त्वा तु देवेशो गौरवर्णो द्विजोऽभवत् । क्षुत्क्षामकण्ठो जटिलः शुष्को धमनिसंततः ॥ १२ ॥
evamuktvā tu deveśo gauravarṇo dvijo'bhavat | kṣutkṣāmakaṇṭho jaṭilaḥ śuṣko dhamanisaṁtataḥ || 12 ||
ऐसा कहकर देवेश गौरवर्ण ब्राह्मण बन गए - क्षुधा से क्षीण कण्ठ, जटाधारी, सूखे हुए तथा शिराओं से भरे हुए शरीर वाले।
श्लोक 13 (skanda.5.335.13)
उपविश्य भुवः पृष्ठे सुस्वरं मन्त्रमुच्चरन् । क्रमप्रियो महादेवो माधुर्येण प्रमोदयन् ॥ १३ ॥
upaviśya bhuvaḥ pṛṣṭhe susvaraṁ mantramuccaran | kramapriyo mahādevo mādhuryeṇa pramodayan || 13 ||
भूमि पर बैठकर मधुर स्वर में मन्त्रोच्चारण करते हुए, क्रमपाठ में निपुण महादेव अपनी मधुरता से सबको आनन्दित करने लगे।
श्लोक 14 (skanda.5.335.14)
श्रुत्वा तां मधुरां वाणीं स्वयं देवेन निर्मिताम् । संभ्रान्ता ब्राह्मणाः सर्वे स्नातुं ये तत्र चागताः ॥ १४ ॥
śrutvā tāṁ madhurāṁ vāṇīṁ svayaṁ devena nirmitām | saṁbhrāntā brāhmaṇāḥ sarve snātuṁ ye tatra cāgatāḥ || 14 ||
स्वयं देव द्वारा उत्पन्न उस मधुर वाणी को सुनकर, वहाँ स्नान के लिए आए हुए सभी ब्राह्मण चकित रह गए।
श्लोक 15 (skanda.5.335.15)
नित्यक्रिया च सर्वेषां विस्मृता श्रुतिविभ्रमात् । तं दृष्ट्वा पठमानं तु क्षुत्पिपासाभिपीडितम् ॥ १५ ॥
nityakriyā ca sarveṣāṁ vismṛtā śrutivibhramāt | taṁ dṛṣṭvā paṭhamānaṁ tu kṣutpipāsābhipīḍitam || 15 ||
उस श्रवण के विभ्रम से सबकी नित्य क्रियाएँ भूल गईं। उसे पाठ करते हुए, भूख-प्यास से पीड़ित देखकर,
श्लोक 16 (skanda.5.335.16)
द्विजोऽन्यमन्त्रयत्कश्चिद्भक्त्या तं भोजनाय वै । प्रसादः क्रियतां ब्रह्मन्भोजनाय गृहे मम ॥ १६ ॥
dvijo'nyamantrayatkaścidbhaktyā taṁ bhojanāya vai | prasādaḥ kriyatāṁ brahmanbhojanāya gṛhe mama || 16 ||
एक अन्य ब्राह्मण ने भक्तिपूर्वक उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया - 'हे ब्रह्मन्! मेरे घर भोजन के लिए कृपा कीजिए।
श्लोक 17 (skanda.5.335.17)
अद्य मे सफलं जन्म ह्यद्य मे सफलाः क्रियाः । सर्वान्कामान्प्रदास्यन्ति प्रीता मेऽद्य पितामहाः ॥ १७ ॥
adya me saphalaṁ janma hyadya me saphalāḥ kriyāḥ | sarvānkāmānpradāsyanti prītā me'dya pitāmahāḥ || 17 ||
आज मेरा जन्म सफल है, आज मेरी क्रियाएँ सफल हैं; आज मेरे पितर प्रसन्न होकर मुझे सभी कामनाएँ प्रदान करेंगे।
श्लोक 18 (skanda.5.335.18)
त्वयि भुक्ते द्विजश्रेष्ठ प्रसीद त्वं ध्रुवं मम । एवमुक्तो महादेवो द्विजरूपधरस्तदा ॥ १८ ॥
tvayi bhukte dvijaśreṣṭha prasīda tvaṁ dhruvaṁ mama | evamukto mahādevo dvijarūpadharastadā || 18 ||
हे द्विजश्रेष्ठ! आपके भोजन कर लेने पर आप निश्चय ही मुझ पर प्रसन्न होंगे।' इस प्रकार कहे जाने पर, ब्राह्मण रूप धारण किए हुए महादेव ने,
श्लोक 19 (skanda.5.335.19)
प्रहस्य प्रत्युवाचेदं ब्राह्मणं श्लक्ष्णया गिरा । मया वर्षसहस्रं तु निराहारं तपः कृतम् ॥ १९ ॥
prahasya pratyuvācedaṁ brāhmaṇaṁ ślakṣṇayā girā | mayā varṣasahasraṁ tu nirāhāraṁ tapaḥ kṛtam || 19 ||
हँसते हुए, कोमल वाणी में उस ब्राह्मण को उत्तर दिया - 'मैंने सहस्र वर्षों तक निराहार तपस्या की है।
श्लोक 20 (skanda.5.335.20)
इदानीं तु गृहे तस्य करिष्ये द्विजसत्तम । दशभिर्वाजिमेधैश्च येनेष्टं पारणं तथा ॥ २० ॥
idānīṁ tu gṛhe tasya kariṣye dvijasattama | daśabhirvājimedhaiśca yeneṣṭaṁ pāraṇaṁ tathā || 20 ||
परन्तु अब, हे द्विजसत्तम! मैं उसी के घर व्रत-पारण करूँगा, जिसने दस अश्वमेध यज्ञों के समान इष्टि की हो।'
श्लोक 21 (skanda.5.335.21)
इत्युक्तो देवदेवेन ब्राह्मणो विस्मयान्वितः । उत्तमाङ्गं विधुन्वन्वै जगाम स्वगृहं प्रति ॥ २१ ॥
ityukto devadevena brāhmaṇo vismayānvitaḥ | uttamāṅgaṁ vidhunvanvai jagāma svagṛhaṁ prati || 21 ||
देवाधिदेव द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, वह ब्राह्मण आश्चर्यचकित होकर सिर हिलाता हुआ अपने घर की ओर चला गया।
श्लोक 22 (skanda.5.335.22)
एवं ते बहवो विप्राः प्रत्याख्याते निमन्त्रणे । पुराणार्थमजानन्तो नास्तिका बहवो गताः ॥ २२ ॥
evaṁ te bahavo viprāḥ pratyākhyāte nimantraṇe | purāṇārthamajānanto nāstikā bahavo gatāḥ || 22 ||
इस प्रकार बहुत से ब्राह्मणों का निमंत्रण अस्वीकृत हो गया; पुराण के अर्थ को न समझने वाले नास्तिक-प्रवृत्ति के बहुत से लोग निराश होकर चले गए।
श्लोक 23 (skanda.5.335.23)
अथ कश्चिद्द्विजो विद्वान्पुराणार्थस्य तत्त्ववित् । देवं निमन्त्रयामास द्विजरूपधरं शिवम् ॥ २३ ॥
atha kaścidddvijo vidvānpurāṇārthasya tattvavit | devaṁ nimantrayāmāsa dvijarūpadharaṁ śivam || 23 ||
तब पुराण के अर्थ के तत्त्व को जानने वाले एक विद्वान् ब्राह्मण ने ब्राह्मण-रूपधारी देव शिव को आमंत्रित किया।
श्लोक 24 (skanda.5.335.24)
तथैव सोऽपि देवेन प्रोक्तः स प्राह तं पुनः । मनसा चिन्तयित्वा तु पुराणोक्तं द्विजोत्तमः ॥ २४ ॥
tathaiva so'pi devena proktaḥ sa prāha taṁ punaḥ | manasā cintayitvā tu purāṇoktaṁ dvijottamaḥ || 24 ||
उसे भी देव ने वैसा ही उत्तर दिया; तब उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने मन में पुराणोक्त बात का चिन्तन करके पुनः उससे कहा -
श्लोक 25 (skanda.5.335.25)
स्मृतिवेदपुराणेषु यदुक्तं तत्तथा भवेत् । इति निश्चित्य तं विप्रमुवाच प्रहसन्निव ॥ २५ ॥
smṛtivedapurāṇeṣu yaduktaṁ tattathā bhavet | iti niścitya taṁ vipramuvāca prahasanniva || 25 ||
[उसने सोचा -] 'स्मृति, वेद और पुराणों में जो कहा गया है, वह वैसा ही सत्य होना चाहिए' - ऐसा निश्चय करके उसने उस ब्राह्मण से मुस्कुराते हुए-से कहा -
श्लोक 26 (skanda.5.335.26)
भोभो विप्र प्रतीक्षस्व यावदागमनं पुनः । इत्युक्त्वा तु द्विजो गत्वा दशाश्वमेधिकं परम् ॥ २६ ॥
bhobho vipra pratīkṣasva yāvadāgamanaṁ punaḥ | ityuktvā tu dvijo gatvā daśāśvamedhikaṁ param || 26 ||
'हे विप्र! मेरे पुनः लौटने तक प्रतीक्षा करें।' ऐसा कहकर वह ब्राह्मण परम दशाश्वमेधिक तीर्थ में गया।
श्लोक 27 (skanda.5.335.27)
स्नानं महालम्भनादि कृतं तेन द्विजन्मना । जपं श्राद्धं तथा दानं कृत्वा धर्मानुसारतः ॥ २७ ॥
snānaṁ mahālambhanādi kṛtaṁ tena dvijanmanā | japaṁ śrāddhaṁ tathā dānaṁ kṛtvā dharmānusārataḥ || 27 ||
उस द्विज ने वहाँ स्नान तथा महालम्भन आदि किया; तत्पश्चात् धर्मानुसार जप, श्राद्ध तथा दान किया।
श्लोक 28 (skanda.5.335.28)
संकल्प्य कपिलां तत्र पुराणोक्तविधानतः । समायात्त्वरितं तत्र यत्रासौ तिष्ठते द्विजः ॥ २८ ॥
saṅkalpya kapilāṁ tatra purāṇoktavidhānataḥ | samāyāttvaritaṁ tatra yatrāsau tiṣṭhate dvijaḥ || 28 ||
वहाँ पुराणोक्त विधि से कपिला गौ के दान का संकल्प करके, वह शीघ्रता से वहाँ लौट आया जहाँ वह ब्राह्मण ठहरे हुए थे।
श्लोक 29 (skanda.5.335.29)
अथागत्य द्विजं प्राह वाजिमेधः कृतो मया । उत्तिष्ठ मे गृहं रम्यं भोजनार्थं हि गम्यताम् ॥ २९ ॥
athāgatya dvijaṁ prāha vājimedhaḥ kṛto mayā | uttiṣṭha me gṛhaṁ ramyaṁ bhojanārthaṁ hi gamyatām || 29 ||
वहाँ आकर उसने ब्राह्मण से कहा - 'मैंने अश्वमेध सम्पन्न कर लिया है। उठिए, मेरे सुरम्य घर भोजन के लिए चलिए।'
श्लोक 30 (skanda.5.335.30)
इत्युक्तः शङ्करस्तेन ब्राह्मणेनातिविस्मितः । उवाच ब्राह्मणं देव इदानीं त्वमितो गतः ॥ ३० ॥
ityuktaḥ śaṅkarastena brāhmaṇenātivismitaḥ | uvāca brāhmaṇaṁ deva idānīṁ tvamito gataḥ || 30 ||
उस ब्राह्मण द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, शंकर अत्यन्त विस्मित हुए और ब्राह्मण से बोले - 'तुम अभी-अभी यहाँ से गए थे,
श्लोक 31 (skanda.5.335.31)
द्विजवर्य कथं चेष्टा दश यज्ञा महाधनाः ॥ ३१ ॥
dvijavarya kathaṁ ceṣṭā daśa yajñā mahādhanāḥ || 31 ||
- हे द्विजवर, महाधन-साध्य दस यज्ञ इतनी शीघ्रता से कैसे सम्पन्न हो गए?'
श्लोक 32 (skanda.5.335.32)
द्विज उवाच। न विचारस्त्वया कार्यः कृता यज्ञा न संशयः । यदि वेदाः प्रमाणं तं भुवि देवा द्विजास्तथा ॥ ३२ ॥
dvija uvāca| na vicārastvayā kāryaḥ kṛtā yajñā na saṁśayaḥ | yadi vedāḥ pramāṇaṁ taṁ bhuvi devā dvijāstathā || 32 ||
उस ब्राह्मण ने कहा - 'आपको इसमें कोई संशय करने की आवश्यकता नहीं है - यज्ञ अवश्य सम्पन्न हुआ है, इसमें कोई संदेह नहीं। यदि वेद प्रमाण हैं, जैसे इस पृथ्वी पर देवता और ब्राह्मण प्रमाण हैं,
श्लोक 33 (skanda.5.335.33)
दशाश्वमेधिकं तीर्थं तथा सत्यं द्विजोत्तम । यदि वेदपुराणोक्तं वाक्यं निःसंशयं भवेत् ॥ ३३ ॥
daśāśvamedhikaṁ tīrthaṁ tathā satyaṁ dvijottama | yadi vedapurāṇoktaṁ vākyaṁ niḥsaṁśayaṁ bhavet || 33 ||
- तो हे द्विजोत्तम! दशाश्वमेधिक तीर्थ भी उतना ही सत्य है। यदि वेद और पुराण में कहा गया वाक्य निःसंशय है,
श्लोक 34 (skanda.5.335.34)
तदा प्राप्तं मया सर्वं नात्र कार्या विचारणा । एवमुक्तस्तु देवेश आस्तिक्यं तस्य चेतसः ॥ ३४ ॥
tadā prāptaṁ mayā sarvaṁ nātra kāryā vicāraṇā | evamuktastu deveśa āstikyaṁ tasya cetasaḥ || 34 ||
- तो मैंने सब कुछ प्राप्त कर लिया है, इसमें कोई विचार करने योग्य बात नहीं है।' इस प्रकार कहे जाने पर, देवेश ने उस व्यक्ति के हृदय की आस्तिकता को देखकर -
श्लोक 35 (skanda.5.335.35)
विमृश्य बहुभिः किंचिदुत्तरं न प्रपद्यत । जगाम तद्गृहं रम्यं पठन्ब्रह्म सनातनम् ॥ ३५ ॥
vimṛśya bahubhiḥ kiṁcidauttaraṁ na prapadyata | jagāma tadgṛhaṁ ramyaṁ paṭhanbrahma sanātanam || 35 ||
- बहुत सोच-विचार करने पर भी कोई उत्तर न पाया, और सनातन ब्रह्म का पाठ करते हुए उस ब्राह्मण के सुरम्य घर को चले गए।
श्लोक 36 (skanda.5.335.36)
सम्प्राप्तं तं द्विजं भक्त्या पाद्यार्घ्येण तमर्चयत् । षड्रसं भोजनं तेन दत्तं पश्चाद्यथाविधि ॥ ३६ ॥
samprāptaṁ taṁ dvijaṁ bhaktyā pādyārghyeṇa tamarcayat | ṣaḍrasaṁ bhojanaṁ tena dattaṁ paścādyathāvidhi || 36 ||
वहाँ पहुँचे हुए उन्हें उस ब्राह्मण ने भक्तिपूर्वक पाद्य-अर्घ्य से पूजा; तत्पश्चात् विधिपूर्वक उन्हें षड्रस भोजन कराया।
श्लोक 37 (skanda.5.335.37)
ततो भुक्ते महादेवे सर्वदेवमये शिवे । पुष्पवृष्टिः पपाताशु गगनात्तस्य मूर्धनि । तस्यास्तिक्यं तु संलक्ष्य तुष्टः प्रोवाच शङ्करः ॥ ३७ ॥
tato bhukte mahādeve sarvadevamaye śive | puṣpavṛṣṭiḥ papātāśu gaganāttasya mūrdhani | tasyāstikyaṁ tu saṁlakṣya tuṣṭaḥ provāca śaṅkaraḥ || 37 ||
तत्पश्चात् सर्वदेवमय शिव महादेव के भोजन कर लेने पर, आकाश से तत्काल उसके सिर पर पुष्पवृष्टि होने लगी; उसकी आस्तिकता को देखकर प्रसन्न होकर शंकर ने कहा -
श्लोक 38 (skanda.5.335.38)
ईश्वर उवाच। किं तेऽद्य क्रियतां ब्रूहि वरदोऽहं द्विजोत्तम । अदेयमपि दास्यामि एकचित्तस्य ते ध्रुवम् ॥ ३८ ॥
īśvara uvāca| kiṁ te'dya kriyatāṁ brūhi varado'haṁ dvijottama | adeyamapi dāsyāmi ekacittasya te dhruvam || 38 ||
ईश्वर ने कहा - 'हे द्विजोत्तम! बताओ, आज तुम्हारे लिए क्या करूँ? मैं वरदाता हूँ; तुम्हारे एकचित्त होने के कारण मैं तुम्हें अदेय वस्तु भी निश्चय ही दूँगा।'
श्लोक 39 (skanda.5.335.39)
ब्राह्मण उवाच। यदि प्रीतोऽसि मे देव यदि देयो वरो मम । अस्मिंस्तीर्थे महादेव स्थातव्यं सर्वदैव हि ॥ ३९ ॥
brāhmaṇa uvāca| yadi prīto'si me deva yadi deyo varo mama | asmiṁstīrthe mahādeva sthātavyaṁ sarvadaiva hi || 39 ||
ब्राह्मण ने कहा - 'हे देव! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं और यदि मुझे वर देना है, तो हे महादेव! आप सदा इसी तीर्थ में निवास करें।
श्लोक 40 (skanda.5.335.40)
उपकाराय देवेश एष मे वर उत्तमः । एवमुक्तस्तु देवेन आरुरोह द्विजोत्तमः ॥ ४० ॥
upakārāya deveśa eṣa me vara uttamaḥ | evamuktastu devena āruroha dvijottamaḥ || 40 ||
हे देवेश! सबके उपकार के लिए यही मेरा उत्तम वर है।' देव द्वारा इस प्रकार स्वीकृति दिए जाने पर, वह श्रेष्ठ ब्राह्मण चढ़ गया -
श्लोक 41 (skanda.5.335.41)
गन्धर्वाप्सरःसम्बाधं विमानं सार्वकामिकम् । पूज्यमानो गतस्तत्र यत्र लोका निरामयाः ॥ ४१ ॥
gandharvāpsaraḥsambādhaṁ vimānaṁ sārvakāmikam | pūjyamāno gatastatra yatra lokā nirāmayāḥ || 41 ||
- गन्धर्वों और अप्सराओं से भरे हुए, सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले विमान में; और सम्मानित होते हुए वह उन लोकों को गया, जो सर्वथा रोगरहित हैं।
श्लोक 42 (skanda.5.335.42)
मार्कण्डेय उवाच। एतदाश्चर्यमतुलं दृष्ट्वा देवी सुविस्मिता । विस्मयोत्फुल्लनयना पुनः पप्रच्छ शङ्करम् ॥ ४२ ॥
mārkaṇḍeya uvāca| etadāścaryamatulaṁ dṛṣṭvā devī suvismitā | vismayotphullanayanā punaḥ papraccha śaṅkaram || 42 ||
मार्कण्डेय जी ने कहा - इस अनुपम आश्चर्य को देखकर देवी अत्यन्त विस्मित हो गईं; आश्चर्य से खिले हुए नेत्रों वाली उन्होंने पुनः शंकर से पूछा -
श्लोक 43 (skanda.5.335.43)
पार्वत्युवाच। कथमेतद्भवेत्सत्यं यत्रेदमसमञ्जसम् । स्नानं कुर्वन्ति बहवो लोका ह्यत्र महेश्वर ॥ ४३ ॥
pārvatyuvāca| kathametadbhavetsatyaṁ yatredamasamañjasam | snānaṁ kurvanti bahavo lokā hyatra maheśvara || 43 ||
पार्वती ने कहा - 'यह कैसे सत्य हो सकता है, जबकि यह इतना असंगत प्रतीत होता है? हे महेश्वर! यहाँ बहुत से लोग यह स्नान करते हैं -
श्लोक 44 (skanda.5.335.44)
तेषां तु स्वर्गगमनं यथैष स्वर्गतिं गतः । कथमेतत्समाचक्ष्व विस्मयः परमो मम ॥ ४४ ॥
teṣāṁ tu svargagamanaṁ yathaiṣa svargatiṁ gataḥ | kathametatsamācakṣva vismayaḥ paramo mama || 44 ||
- [परन्तु ऐसा क्यों नहीं होता कि] वे सब स्वर्ग जाएँ, जैसे यह व्यक्ति स्वर्गगति को प्राप्त हुआ? कृपया यह समझाइए - मुझे अत्यन्त आश्चर्य हो रहा है।'
श्लोक 45 (skanda.5.335.45)
एतच्छ्रुत्वा तु देवेशः प्रहसन्प्रत्युवाच ताम् । वेदवाक्ये पुराणार्थे स्मृत्यर्थे द्विजभाषिते ॥ ४५ ॥
etacchrutvā tu deveśaḥ prahasanpratyuvāca tām | vedavākye purāṇārthe smṛtyarthe dvijabhāṣite || 45 ||
यह सुनकर देवेश ने मुस्कुराते हुए उसे उत्तर दिया - 'वेदवाक्य में, पुराणार्थ में, स्मृत्यर्थ में, तथा द्विजों द्वारा कहे गए वचनों में -
श्लोक 46 (skanda.5.335.46)
विस्मयो हि न कर्तव्यो ह्यनुमानं हि तत्तथा । असंभाव्यं हि लोकानां पुराणे यत्प्रगीयते ॥ ४६ ॥
vismayo hi na kartavyo hyanumānaṁ hi tattathā | asaṁbhāvyaṁ hi lokānāṁ purāṇe yatpragīyate || 46 ||
- आश्चर्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह अनुमान का विषय है। पुराण में जो गाया जाता है, वह सामान्य लोगों को असंभव प्रतीत होता है -
श्लोक 47 (skanda.5.335.47)
यदि पक्षं पुरस्कृत्य लोकाः कुर्वन्ति पार्वति । तस्मान्न सिद्धिरेतेषां भवत्येको न विस्मयः ॥ ४७ ॥
yadi pakṣaṁ puraskṛtya lokāḥ kurvanti pārvati | tasmānna siddhireteṣāṁ bhavatyeko na vismayaḥ || 47 ||
- हे पार्वती! यदि लोग संशय के पक्ष को आगे रखकर कार्य करते हैं, तो उन्हें सिद्धि नहीं मिलती - यही एकमात्र कारण है, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं।
श्लोक 48 (skanda.5.335.48)
नास्तिका भिन्नमर्यादा ये निश्चयबहिष्कृताः । तेषां सिद्धिर्न विद्येत आस्तिक्याद्भवते ध्रुवम् ॥ ४८ ॥
nāstikā bhinnamaryādā ye niścayabahiṣkṛtāḥ | teṣāṁ siddhirna vidyeta āstikyādbhavate dhruvam || 48 ||
नास्तिक, जो मर्यादा भंग करने वाले हैं, जो दृढ़ निश्चय से रहित हैं - उन्हें सिद्धि प्राप्त नहीं होती। सिद्धि निश्चय ही आस्तिकता से प्राप्त होती है।
श्लोक 49 (skanda.5.335.49)
श्रुत्वाख्यानमिदं देवी ववन्दे तीर्थमुत्तमम् । सर्वपापहरं पुण्यं नर्मदायां व्यवस्थितम् ॥ ४९ ॥
śrutvākhyānamidaṁ devī vavande tīrthamuttamam | sarvapāpaharaṁ puṇyaṁ narmadāyāṁ vyavasthitam || 49 ||
यह आख्यान सुनकर देवी ने उस उत्तम तीर्थ को प्रणाम किया, जो समस्त पापों को हरने वाला, पुण्यकारी तथा नर्मदा में स्थित है।
श्लोक 50 (skanda.5.335.50)
मार्कण्डेय उवाच। दशाश्वमेधं राजेन्द्र सर्वतीर्थोत्तमोत्तमम् । तीर्थं सर्वगुणोपेतं महापातकनाशनम् ॥ ५० ॥
mārkaṇḍeya uvāca| daśāśvamedhaṁ rājendra sarvatīrthottamottamam | tīrthaṁ sarvaguṇopetaṁ mahāpātakanāśanam || 50 ||
मार्कण्डेय जी ने कहा - हे राजेन्द्र! दशाश्वमेध समस्त तीर्थों में सर्वोत्तम है, यह तीर्थ सभी गुणों से युक्त तथा महापातकों का नाशक है।
श्लोक 51 (skanda.5.335.51)
तत्रागता महाभागा स्नातुकामा सरस्वती । पुण्यानां परमा पुण्या नदीनामुत्तमा नदी ॥ ५१ ॥
tatrāgatā mahābhāgā snātukāmā sarasvatī | puṇyānāṁ paramā puṇyā nadīnāmuttamā nadī || 51 ||
उस तीर्थ में महाभागा सरस्वती स्नान की इच्छा से पधारती हैं - वे पुण्यों में परम पुण्यमयी, नदियों में उत्तम नदी हैं।
श्लोक 52 (skanda.5.335.52)
नाममात्रेण यस्यास्तु सर्वपापैः प्रमुच्यते । स्नातास्तत्र दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः ॥ ५२ ॥
nāmamātreṇa yasyāstu sarvapāpaiḥ pramucyate | snātāstatra divaṁ yānti ye mṛtāste'punarbhavāḥ || 52 ||
जिनके नाममात्र के उच्चारण से ही मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। वहाँ स्नान करने वाले स्वर्ग को प्राप्त होते हैं, और जो वहाँ मर जाते हैं, वे पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होते।
श्लोक 53 (skanda.5.335.53)
दशाश्वमेधे सा राजन्नियता ब्रह्मचारिणी । आराधयित्वा देवेशं परं निर्वाणमागतीः ॥ ५३ ॥
daśāśvamedhe sā rājanniyatā brahmacāriṇī | ārādhayitvā deveśaṁ paraṁ nirvāṇamāgatīḥ || 53 ||
हे राजन्! दशाश्वमेध में, वह संयमित ब्रह्मचारिणी सरस्वती देवेश की आराधना करके परम निर्वाण को प्राप्त होने आती हैं।
श्लोक 54 (skanda.5.335.54)
कालुष्यं ब्रह्मसम्भूता संवत्सरसमुद्भवम् । प्रक्षालयितुमायाति दशम्यामाश्विनस्य च ॥ ५४ ॥
kāluṣyaṁ brahmasambhūtā saṁvatsarasamudbhavam | prakṣālayitumāyāti daśamyāmāśvinasya ca || 54 ||
ब्रह्मा से उत्पन्न वह देवी वर्षभर में संचित मलिनता को धोने के लिए आश्विन मास की दशमी को आती हैं।
श्लोक 55 (skanda.5.335.55)
उपोष्य रजनीं तां तु सम्पूज्य त्रिपुरान्तकम् । राजन्निष्कल्मषा यान्ति श्वोभूते शाश्वतं पदम् ॥ ५५ ॥
upoṣya rajanīṁ tāṁ tu sampūjya tripurāntakam | rājanniṣkalmaṣā yānti śvobhūte śāśvataṁ padam || 55 ||
हे राजन्! उस रात्रि उपवास करके तथा त्रिपुरान्तक (शिव) की पूजा करके, भक्तगण पापरहित होकर अगले दिन शाश्वत पद को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 56 (skanda.5.335.56)
युधिष्ठिर उवाच। सरस्वती महापुण्या नदीनामुत्तमा नदी । श्रीमार्कण्डेय उवाच। राजन्नाश्वयुजे मासि दशम्यां तद्विशिष्यते । पार्थिवेषु च तीर्थे तु सर्वेष्वेव न संशयः ॥ ५६ ॥
yudhiṣṭhira uvāca| sarasvatī mahāpuṇyā nadīnāmuttamā nadī | śrīmārkaṇḍeya uvāca| rājannāśvayuje māsi daśamyāṁ tadviśiṣyate | pārthiveṣu ca tīrthe tu sarveṣveva na saṁśayaḥ || 56 ||
युधिष्ठिर ने कहा - 'सरस्वती महापुण्यमयी नदी है, नदियों में सर्वश्रेष्ठ है -' श्री मार्कण्डेय जी ने कहा - 'हे राजन्! आश्विन मास की दशमी को यह विशेष फलदायी होता है - पार्थिव पूजा में तथा समस्त तीर्थों में भी, इसमें कोई संदेह नहीं।'
श्लोक 57 (skanda.5.335.57)
दशाश्वमेधिके राजन्नित्यं हि दशमी शुभा । विशेषादाश्विने शुक्ला महापातकनाशिनी ॥ ५७ ॥
daśāśvamedhike rājannityaṁ hi daśamī śubhā | viśeṣādāśvine śuklā mahāpātakanāśinī || 57 ||
हे राजन्! दशाश्वमेधिक में प्रतिदिन दशमी तिथि शुभ है; विशेषतः आश्विन मास की शुक्ल दशमी महापातकों का नाश करने वाली है।
श्लोक 58 (skanda.5.335.58)
तस्या स्नात्वार्चयेद्देवानुपवासपरायणः । श्राद्धं कृत्वा विधानेन पश्चात्सम्पूजयेच्छिवम् ॥ ५८ ॥
tasyā snātvārcayeddevānupavāsaparāyaṇaḥ | śrāddhaṁ kṛtvā vidhānena paścātsampūjayecchivam || 58 ||
उस दिन स्नान करके, उपवासपरायण होकर देवताओं की पूजा करनी चाहिए; विधिपूर्वक श्राद्ध करके तत्पश्चात् शिव की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 59 (skanda.5.335.59)
तत्रस्थां पूजयेद्देवीं स्नातुकामां सरस्वतीम् । नमो नमस्ते देवेशि ब्रह्मदेहसमुद्भवे ॥ ५९ ॥
tatrasthāṁ pūjayeddevīṁ snātukāmāṁ sarasvatīm | namo namaste deveśi brahmadehasamudbhave || 59 ||
वहाँ स्नान की इच्छुक विराजमान देवी सरस्वती की पूजा करनी चाहिए - 'हे देवेशि! ब्रह्मा के शरीर से उत्पन्न आपको बारम्बार नमस्कार है।
श्लोक 60 (skanda.5.335.60)
कुरु पापक्षयं देवि संसारान्मां समुद्धर । गन्धधूपैश्च सम्पूज्य ह्यर्चयित्वा पुनःपुनः ॥ ६० ॥
kuru pāpakṣayaṁ devi saṁsārānmāṁ samuddhara | gandhadhūpaiśca sampūjya hyarcayitvā punaḥpunaḥ || 60 ||
हे देवि! मेरे पापों का नाश करो, तथा मुझे संसार से उद्धार करो।' गन्ध-धूप से बार-बार पूजा-अर्चना करके,
श्लोक 61 (skanda.5.335.61)
दश प्रदक्षिणा दत्त्वा सूत्रेण परिवेष्टयेत् । कपिलां तु ततो विप्रे दद्याद्विगतमत्सरः ॥ ६१ ॥
daśa pradakṣiṇā dattvā sūtreṇa pariveṣṭayet | kapilāṁ tu tato vipre dadyādvigatamatsaraḥ || 61 ||
दस प्रदक्षिणा करके सूत्र से परिवेष्टन करना चाहिए; तत्पश्चात् ईर्ष्यारहित होकर ब्राह्मण को कपिला गौ का दान देना चाहिए।
श्लोक 62 (skanda.5.335.62)
सर्वलक्षणसम्पन्नां सर्वोपस्करसंयुताम् । दत्त्वा विप्राय कपिलां न शोचति कृताकृते ॥ ६२ ॥
sarvalakṣaṇasampannāṁ sarvopaskarasaṁyutām | dattvā viprāya kapilāṁ na śocati kṛtākṛte || 62 ||
सभी शुभ लक्षणों से सम्पन्न तथा सभी उपकरणों से युक्त कपिला गौ का ब्राह्मण को दान करके, मनुष्य किए-अनकिए कर्मों के लिए शोक नहीं करता।
श्लोक 63 (skanda.5.335.63)
पश्चाज्जागरणं कुर्याद्घृतेनाज्वाल्य दीपकम् । पुराणपठनेनैव नृत्यगीतविवादनैः ॥ ६३ ॥
paścājjāgaraṇaṁ kuryādghṛtenājvālya dīpakam | purāṇapaṭhanenaiva nṛtyagītavivādanaiḥ || 63 ||
तत्पश्चात् घृत से दीपक जलाकर, पुराण-पाठ के द्वारा, नृत्य-गीत-वादन के द्वारा जागरण करना चाहिए,
श्लोक 64 (skanda.5.335.64)
वेदोक्तैश्चैव पूजयेच्छशिशेखरम् । प्रभाते विमले पश्चात्स्नात्वा वै नर्मदाजले ॥ ६४ ॥
vedoktaiścaiva pūjayecchaśiśekharam | prabhāte vimale paścātsnātvā vai narmadājale || 64 ||
- तथा वेदोक्त मन्त्रों से शशिशेखर (शिव) की पूजा करनी चाहिए। तत्पश्चात् निर्मल प्रातःकाल नर्मदाजल में स्नान करके,
श्लोक 65 (skanda.5.335.65)
ब्राह्मणान् भोजयेद्भक्त्या शिवभक्तांश्च योगिनः । एवं कृते ततो राजन् सम्यक्तीर्थफलं लभेत् ॥ ६५ ॥
brāhmaṇān bhojayedbhaktyā śivabhaktāṁśca yoginaḥ | evaṁ kṛte tato rājan samyaktīrthaphalaṁ labhet || 65 ||
- भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को, तथा शिवभक्त योगियों को भोजन कराना चाहिए। हे राजन्! ऐसा करने पर मनुष्य इस तीर्थ का सम्यक् फल प्राप्त करता है।
श्लोक 66 (skanda.5.335.66)
तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेच्छङ्करं नरः । दशाश्वमेधावभृथं लभते पुण्यमुत्तमम् ॥ ६६ ॥
tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayecchaṅkaraṁ naraḥ | daśāśvamedhāvabhṛthaṁ labhate puṇyamuttamam || 66 ||
जो उस तीर्थ में स्नान करके शंकर की पूजा करता है, वह दस अश्वमेधों के अवभृथ स्नान के समान उत्तम पुण्य प्राप्त करता है।
श्लोक 67 (skanda.5.335.67)
पूतात्मा तेन पुण्येन रुद्रलोकं स गच्छति । आरूढः परमं यानं कामगं च सुशोभनम् ॥ ६७ ॥
pūtātmā tena puṇyena rudralokaṁ sa gacchati | ārūḍhaḥ paramaṁ yānaṁ kāmagaṁ ca suśobhanam || 67 ||
उस पुण्य से पवित्रात्मा होकर वह रुद्रलोक को जाता है, एक परम, सुशोभित, इच्छानुसार चलने वाले विमान पर आरूढ़ होकर।
श्लोक 68 (skanda.5.335.68)
तत्र दिव्याप्सरोभिस्तु वीज्यमानोऽथ चामरैः । क्रीडते सुचिरं कालं जयशब्दादिमङ्गलैः ॥ ६८ ॥
tatra divyāpsarobhistu vījyamāno'tha cāmaraiḥ | krīḍate suciraṁ kālaṁ jayaśabdādimaṅgalaiḥ || 68 ||
वहाँ दिव्य अप्सराओं द्वारा चँवर से बीजित होकर वह जयघोष आदि मंगल ध्वनियों के मध्य दीर्घकाल तक क्रीड़ा करता है।
श्लोक 69 (skanda.5.335.69)
ततोऽवतीर्णः कालेन इह राजा भवेद्ध्रुवम् । हस्त्यश्वरथसम्पन्नो महाभोगी परंतपः ॥ ६९ ॥
tato'vatīrṇaḥ kālena iha rājā bhavedhruvam | hastyaśvarathasampanno mahābhogī paraṁtapaḥ || 69 ||
तत्पश्चात् कालान्तर में पुनः पृथ्वी पर अवतरित होकर वह निश्चय ही यहाँ राजा बनता है, हाथी-घोड़े-रथों से सम्पन्न, महाभोगी तथा शत्रुओं को संतप्त करने वाला।
श्लोक 70 (skanda.5.335.70)
दशाश्वमेधे यद्दानं दीयते शिवयोगिनाम् । दशाश्वमेधसदृशं भवेत्तन्नात्र संशयः ॥ ७० ॥
daśāśvamedhe yaddānaṁ dīyate śivayoginām | daśāśvamedhasadṛśaṁ bhavettannātra saṁśayaḥ || 70 ||
दशाश्वमेध में शिवयोगियों को जो कुछ दान दिया जाता है, वह दस अश्वमेधों के समान होता है - इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 71 (skanda.5.335.71)
सर्वेषामेव यज्ञानामश्वमेधो विशिष्यते । दुर्लभः स्वल्पवित्तानां भूरिशः पापकर्मणाम् ॥ ७१ ॥
sarveṣāmeva yajñānāmaśvamedho viśiṣyate | durlabhaḥ svalpavittānāṁ bhūriśaḥ pāpakarmaṇām || 71 ||
सभी यज्ञों में अश्वमेध श्रेष्ठ है; किन्तु यह अल्पधन वालों के लिए दुर्लभ है, और अत्यधिक पापकर्मियों के लिए तो और भी अधिक दुर्लभ है।
श्लोक 72 (skanda.5.335.72)
तत्र तीर्थे तु राजेन्द्र दुर्लभोऽपि सुरासुरैः । प्राप्यते स्नानदानेन इत्येवं शङ्करोऽब्रवीत् ॥ ७२ ॥
tatra tīrthe tu rājendra durlabho'pi surāsuraiḥ | prāpyate snānadānena ityevaṁ śaṅkaro'bravīt || 72 ||
हे राजेन्द्र! उस तीर्थ में, जो देवताओं और असुरों के लिए भी दुर्लभ है, वह भी स्नान और दान से प्राप्त हो जाता है - ऐसा स्वयं शंकर ने कहा है।
श्लोक 73 (skanda.5.335.73)
अकामो वा सकामो वा मृतस्तत्र नरेश्वर । देवत्वं प्राप्नुयात्सोऽपि नात्र कार्या विचारणा ॥ ७३ ॥
akāmo vā sakāmo vā mṛtastatra nareśvara | devatvaṁ prāpnuyātso'pi nātra kāryā vicāraṇā || 73 ||
हे नरेश्वर! चाहे इच्छा से हो या बिना इच्छा के, जो वहाँ मरता है, वह देवत्व को प्राप्त होता है - इसमें कोई विचार करने योग्य बात नहीं है।
श्लोक 74 (skanda.5.335.74)
अग्निप्रवेशं यः कुर्यात्तत्र तीर्थे नरोत्तम । अग्निलोके वसेत्तावद्यावदाभूतसम्प्लवम् ॥ ७४ ॥
agnipraveśaṁ yaḥ kuryāttatra tīrthe narottama | agniloke vasettāvadyāvadābhūtasamplavam || 74 ||
हे नरोत्तम! जो उस तीर्थ में अग्निप्रवेश करता है, वह प्रलयकाल तक अग्निलोक में निवास करता है।
श्लोक 75 (skanda.5.335.75)
जलप्रवेशं यः कुर्यात्तत्र तीर्थे नराधिप । ध्यायमानो महादेवं वारुणं लोकमाप्नुयात् ॥ ७५ ॥
jalapraveśaṁ yaḥ kuryāttatra tīrthe narādhipa | dhyāyamāno mahādevaṁ vāruṇaṁ lokamāpnuyāt || 75 ||
हे नराधिप! जो उस तीर्थ में महादेव का ध्यान करते हुए जलप्रवेश करता है, वह वरुणलोक को प्राप्त होता है।
श्लोक 76 (skanda.5.335.76)
दशाश्वमेधे यः कश्चिच्छूरवृत्त्या तनुं त्यजेत् । अक्षया नु गतिस्तस्य इत्येवं श्रुतिनोदना ॥ ७६ ॥
daśāśvamedhe yaḥ kaścicchūravṛttyā tanuṁ tyajet | akṣayā nu gatistasya ityevaṁ śrutinodanā || 76 ||
दशाश्वमेध में जो कोई शूरवीरता से शरीर का त्याग करता है, उसकी गति निश्चय ही अक्षय होती है - ऐसा श्रुति का निर्देश है।
श्लोक 77 (skanda.5.335.77)
न तां गतिं यान्ति भृगुप्रपातिनो न दण्डिनो नैव च सांख्ययोगिनः । ध्वजाकुले दुन्दुभिशङ्खनादिते क्षणेन यां यान्ति महाहवे मृताः ॥ ७७ ॥
na tāṁ gatiṁ yānti bhṛguprapātino na daṇḍino naiva ca sāṅkhyayoginaḥ | dhvajākule dundubhiśaṅkhanādite kṣaṇena yāṁ yānti mahāhave mṛtāḥ || 77 ||
जो लोग पर्वत-शिखर से गिरकर प्राण त्यागते हैं, न दण्डधारी संन्यासी, न ही सांख्ययोगी, उस गति को प्राप्त होते हैं, जिसे ध्वजाओं से भरे, दुन्दुभि-शंखनाद से गूँजते महासंग्राम में मरने वाले क्षणभर में ही प्राप्त कर लेते हैं।
श्लोक 78 (skanda.5.335.78)
यत्र तत्र हतः शूरः शत्रुभिः परिवेष्टितः । अक्षयांल्लभते लोकान्यदि क्लीबं न भाषते ॥ ७८ ॥
yatra tatra hataḥ śūraḥ śatrubhiḥ pariveṣṭitaḥ | akṣayāllabhate lokānyadi klībaṁ na bhāṣate || 78 ||
कहीं भी शत्रुओं से घिरा हुआ शूरवीर, यदि वह कायरतापूर्ण वचन न बोले, तो वह अक्षय लोकों को प्राप्त करता है।
श्लोक 79 (skanda.5.335.79)
दशाश्वमेधे संन्यासं यः करोति विधानतः । अनिवर्तिका गतिस्तस्य रुद्रलोकात्कदाचन ॥ ७९ ॥
daśāśvamedhe saṁnyāsaṁ yaḥ karoti vidhānataḥ | anivartikā gatistasya rudralokātkadācana || 79 ||
जो दशाश्वमेध में विधिपूर्वक संन्यास ग्रहण करता है, उसकी रुद्रलोक से गति कभी भी अनिवर्तनीय (न लौटने वाली) होती है।
श्लोक 80 (skanda.5.335.80)
दशाश्वमेधे यत्पुण्यं संक्षेपेण युधिष्ठिर । कथितं परया भक्त्या सर्वपापप्रणाशनम् ॥ ८० ॥
daśāśvamedhe yatpuṇyaṁ saṅkṣepeṇa yudhiṣṭhira | kathitaṁ parayā bhaktyā sarvapāpapraṇāśanam || 80 ||
हे युधिष्ठिर! दशाश्वमेध का यह पुण्य संक्षेप में, परम भक्तिपूर्वक तुम्हें बताया गया है - यह समस्त पापों का नाशक है।