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अवन्ती खण्ड · अध्याय 336

भृगुकच्छ उत्पत्ति एवं भृगु-स्तोत्र वर्णन

अध्याय 335अध्याय-सूचीअध्याय 337

श्लोक 1 (skanda.5.336.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। अतः परं प्रवक्ष्यामि भृगुतीर्थस्य विस्तरम् । यं श्रुत्वा ब्रह्महा गोघ्नो मुच्यते सर्वपातकैः ॥ १ ॥

śrīmārkaṇḍeya uvāca| ataḥ paraṁ pravakṣyāmi bhṛgutīrthasya vistaram | yaṁ śrutvā brahmahā goghno mucyate sarvapātakaiḥ || 1 ||

श्री मार्कण्डेय जी ने कहा - अब मैं आगे भृगुतीर्थ का विस्तार कहूँगा, जिसे सुनकर ब्रह्महत्यारा और गोहत्यारा भी समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 2 (skanda.5.336.2)

तत्र तीर्थे तु विख्यातं वृषखातमिति श्रुतम् । भृगुणा तत्र राजेन्द्र तपस्तप्तं पुरा किल ॥ २ ॥

tatra tīrthe tu vikhyātaṁ vṛṣakhātamiti śrutam | bhṛguṇā tatra rājendra tapastaptaṁ purā kila || 2 ||

उस तीर्थ में वृषखात नाम से विख्यात एक स्थान है। हे राजेन्द्र! वहाँ भृगु ने पूर्वकाल में तपस्या की थी, ऐसा कहा जाता है।

श्लोक 3 (skanda.5.336.3)

युधिष्ठिर उवाच। भृगुकच्छे स विप्रेन्द्रो निवसन् केन हेतुना । तपस्तप्त्वा सुविपुलं परां सिद्धिमुपागतः ॥ ३ ॥

yudhiṣṭhira uvāca| bhṛgukacche sa viprendro nivasan kena hetunā | tapastaptvā suvipulaṁ parāṁ siddhimupāgataḥ || 3 ||

युधिष्ठिर ने कहा - 'वह विप्रेन्द्र भृगुकच्छ में किस कारण निवास करते रहे? इतनी विपुल तपस्या करके उन्होंने कौन-सी परम सिद्धि प्राप्त की?

श्लोक 4 (skanda.5.336.4)

को वा वृष इति प्रोक्तस्तत्खातं येन खानितम् । एतत्सर्वं यथान्यायं कथयस्व ममानघ ॥ ४ ॥

ko vā vṛṣa iti proktastatkhātaṁ yena khānitam | etatsarvaṁ yathānyāyaṁ kathayasva mamānagha || 4 ||

और वह वृष कौन है, जिसके द्वारा वह खात खोदा गया था? हे अनघ! यह सब मुझे यथाक्रम बताइए।'

श्लोक 5 (skanda.5.336.5)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। एष प्रश्नो महाराज यस्त्वया परिपृच्छितः । तत्सर्वं कथयिष्यामि शृणुष्वैकमना नृप ॥ ५ ॥

śrīmārkaṇḍeya uvāca| eṣa praśno mahārāja yastvayā paripṛcchitaḥ | tatsarvaṁ kathayiṣyāmi śṛṇuṣvaikamanā nṛpa || 5 ||

श्री मार्कण्डेय जी ने कहा - हे महाराज! तुमने जो प्रश्न पूछा है, मैं वह सब बताता हूँ; हे राजन्! एकाग्रचित्त होकर सुनो।

श्लोक 6 (skanda.5.336.6)

षष्ठस्तु ब्रह्मणः पुत्रो मानसो भृगुसत्तमः । तपश्चचार विपुलं श्रीवृते क्षेत्र उत्तमे ॥ ६ ॥

ṣaṣṭhastu brahmaṇaḥ putro mānaso bhṛgusattamaḥ | tapaścacāra vipulaṁ śrīvṛte kṣetra uttame || 6 ||

ब्रह्मा के छठे मानस पुत्र, भृगुओं में श्रेष्ठ भृगु ने श्री से सुशोभित इस उत्तम क्षेत्र में विपुल तपस्या की।

श्लोक 7 (skanda.5.336.7)

दिव्यं वर्षसहस्रं तु संशुष्को मुनिसत्तमः । निराहारो निरानन्दः काष्ठपाषाणवत्स्थितः ॥ ७ ॥

divyaṁ varṣasahasraṁ tu saṁśuṣko munisattamaḥ | nirāhāro nirānando kāṣṭhapāṣāṇavatsthitaḥ || 7 ||

सहस्र दिव्य वर्षों तक वह मुनिश्रेष्ठ, शरीर से क्षीण, निराहार, आनन्दरहित, काष्ठ-पाषाण के समान स्थिर खड़े रहे।

श्लोक 8 (skanda.5.336.8)

ततः कदाचिद्देवेशो विमानवरमास्थितः । उमया सहितः श्रीमांस्तेन मार्गेण चागतः ॥ ८ ॥

tataḥ kadācidddeveśo vimānavaramāsthitaḥ | umayā sahitaḥ śrīmāṁstena mārgeṇa cāgataḥ || 8 ||

तब किसी समय देवेश, श्रीमान्, उत्तम विमान पर आरूढ़ होकर, उमा के साथ उसी मार्ग से पधारे।

श्लोक 9 (skanda.5.336.9)

दृष्ट्वा तत्र महाभागं भृगुं वल्मीकवत्स्थितम् । उवाच देवी देवेशं किमिदं दृश्यते प्रभो ॥ ९ ॥

dṛṣṭvā tatra mahābhāgaṁ bhṛguṁ valmīkavatsthitam | uvāca devī deveśaṁ kimidaṁ dṛśyate prabho || 9 ||

वहाँ बाँबी के समान स्थिर खड़े महाभाग भृगु को देखकर देवी ने देवेश से कहा - 'हे प्रभो! यह क्या दिखाई दे रहा है?'

श्लोक 10 (skanda.5.336.10)

ईश्वर उवाच। भृगुर्नाम महादेवि तपस्तप्त्वा सुदारुणम् । दिव्यं वर्षसहस्रं तु मम ध्यानपरायणः ॥ १० ॥

īśvara uvāca| bhṛgurnāma mahādevi tapastaptvā sudāruṇam | divyaṁ varṣasahasraṁ tu mama dhyānaparāyaṇaḥ || 10 ||

ईश्वर ने कहा - 'हे महादेवि! यह भृगु नामक तपस्वी है, जो सहस्र दिव्य वर्षों तक मेरे ध्यान में परायण होकर अत्यन्त कठोर तपस्या कर रहा है।

श्लोक 11 (skanda.5.336.11)

जलबिन्दु कुशाग्रेण मासे मासे पिबेच्च सः । संवत्सरशतं साग्रं तिष्ठते च वरानने ॥ ११ ॥

jalabindu kuśāgreṇa māse māse pibecca saḥ | saṁvatsaraśataṁ sāgraṁ tiṣṭhate ca varānane || 11 ||

हे वरानने! वह प्रतिमास कुशाग्र पर स्थित जल की एक बूँद पीता है, और इस प्रकार सौ वर्षों से भी अधिक समय से खड़ा है।

श्लोक 12 (skanda.5.336.12)

तच्छ्रुत्वा वचनं गौरी क्रोधसंवर्तितेक्षणा । उवाच देवी देवेशं शूलपाणिं महेश्वरम् ॥ १२ ॥

tacchrutvā vacanaṁ gaurī krodhasaṁvartitekṣaṇā | uvāca devī deveśaṁ śūlapāṇiṁ maheśvaram || 12 ||

यह बात सुनकर गौरी क्रोध से नेत्र फैलाए हुए त्रिशूलधारी देवेश महेश्वर से बोलीं -

श्लोक 13 (skanda.5.336.13)

सत्यमुग्रोऽसि लोके त्वं ख्यापितो वृषभध्वज । निष्कारुण्यो दुराराध्यः सर्वभूतभयंकरः ॥ १३ ॥

satyamugro'si loke tvaṁ khyāpito vṛṣabhadhvaja | niṣkāruṇyo durārādhyaḥ sarvabhūtabhayaṁkaraḥ || 13 ||

'यह सत्य है, हे वृषभध्वज! तुम संसार में उग्र के रूप में विख्यात हो - निर्दय, दुराराध्य तथा समस्त प्राणियों के लिए भयंकर।

श्लोक 14 (skanda.5.336.14)

दिव्यं वर्षसहस्रं तु ध्यायमानस्य शङ्करम् । ब्राह्मणस्य वरं कस्मान्न प्रयच्छसि शंस मे ॥ १४ ॥

divyaṁ varṣasahasraṁ tu dhyāyamānasya śaṅkaram | brāhmaṇasya varaṁ kasmānna prayacchasi śaṁsa me || 14 ||

सहस्र दिव्य वर्षों तक शंकर का ध्यान करने वाले इस ब्राह्मण को तुम वर क्यों नहीं देते? मुझे बताओ।'

श्लोक 15 (skanda.5.336.15)

एवमुक्तोऽथ देवेशः प्रहस्य गिरिनन्दिनीम् । उवाच नरशार्दूल मेघगम्भीरया गिरा ॥ १५ ॥

evamukto'tha deveśaḥ prahasya girinandinīm | uvāca naraśārdūla meghagambhīrayā girā || 15 ||

इस प्रकार कहे जाने पर देवेश ने हँसते हुए पर्वतपुत्री से, हे नरशार्दूल! मेघ के समान गम्भीर वाणी में कहा -

श्लोक 16 (skanda.5.336.16)

स्त्री विनश्यति गर्वेण तपः क्रोधेन नश्यति । गावो दूरप्रचारेण शूद्रान्नेन द्विजोत्तमाः ॥ १६ ॥

strī vinaśyati garveṇa tapaḥ krodhena naśyati | gāvo dūrapracāreṇa śūdrānnena dvijottamāḥ || 16 ||

'स्त्री गर्व से नष्ट होती है, तप क्रोध से नष्ट होता है, गायें दूर तक विचरण करने से हानि पाती हैं, तथा श्रेष्ठ ब्राह्मण शूद्र के अन्न से भ्रष्ट होते हैं।

श्लोक 17 (skanda.5.336.17)

क्रोधान्वितो द्विजो गौरी तेन सिद्धिर्न विद्यते । वर्षायुतैस्तथा लक्षैर्न किंचित्कारणं प्रिये ॥ १७ ॥

krodhānvito dvijo gaurī tena siddhirna vidyate | varṣāyutaistathā lakṣairna kiṁcitkāraṇaṁ priye || 17 ||

हे गौरी! क्रोधयुक्त ब्राह्मण को उस क्रोध के कारण सिद्धि प्राप्त नहीं होती; हे प्रिये! दस हजार या लाख वर्षों में भी इसका कोई कारण सिद्ध नहीं होता।

श्लोक 18 (skanda.5.336.18)

एवम्भूतस्य तस्यापि क्रोधस्य चरितं महत् । एवमुक्त्वा ततः शम्भुर्वृषं दध्यौ च तत्क्षणे ॥ १८ ॥

evambhūtasya tasyāpi krodhasya caritaṁ mahat | evamuktvā tataḥ śambhurvṛṣaṁ dadhyau ca tatkṣaṇe || 18 ||

फिर भी, उसके इस क्रोध का चरित्र महान् है।' ऐसा कहकर शम्भु ने उसी क्षण वृषभ (नन्दी) का ध्यान किया।

श्लोक 19 (skanda.5.336.19)

वृषो हि भगवन्ब्रह्मा वृषरूपी महेश्वरः । ध्यानप्राप्तः क्षणादेव गर्जयन् वै मुहुर्मुहुः ॥ १९ ॥

vṛṣo hi bhagavanbrahmā vṛṣarūpī maheśvaraḥ | dhyānaprāptaḥ kṣaṇādeva garjayan vai muhurmuhuḥ || 19 ||

वह वृषभ, जो भगवान् ब्रह्मा का ही रूप है, महेश्वर का वृषरूप, ध्यान से बुलाए जाने पर तत्क्षण प्रकट हो गया, बार-बार गर्जना करते हुए।

श्लोक 20 (skanda.5.336.20)

किं करोमि सुरश्रेष्ठ ध्यातः केनैव हेतुना । करोमि कस्य निधनमकाले परमेश्वर ॥ २० ॥

kiṁ karomi suraśreṣṭha dhyātaḥ kenaiva hetunā | karomi kasya nidhanamakāle parameśvara || 20 ||

'हे सुरश्रेष्ठ! मैं क्या करूँ? आपने किस कारण मेरा ध्यान किया? हे परमेश्वर! मैं किसका असमय विनाश करूँ?'

श्लोक 21 (skanda.5.336.21)

ईश्वर उवाच। कोपयस्व द्विजश्रेष्ठं गत्वा त्वं भृगुसत्तमम् । येन मे श्रद्दधत्येषा गौरी लोकैकसुन्दरी ॥ २१ ॥

īśvara uvāca| kopayasva dvijaśreṣṭhaṁ gatvā tvaṁ bhṛgusattamam | yena me śraddadhatyeṣā gaurī lokaikasundarī || 21 ||

ईश्वर ने कहा - 'तुम जाकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण भृगुसत्तम को क्रोधित करो, जिससे यह लोकसुन्दरी गौरी मेरी बात पर विश्वास करे।'

श्लोक 22 (skanda.5.336.22)

एतच्छ्रुत्वा वृषो गत्वा धर्षणार्थं द्विजोत्तमम् । नर्मदायास्तटे रम्ये समीपे चाश्रमे भृगुः ॥ २२ ॥

etacchrutvā vṛṣo gatvā dharṣaṇārthaṁ dvijottamam | narmadāyāstaṭe ramye samīpe cāśrame bhṛguḥ || 22 ||

यह सुनकर वृषभ, नर्मदा के रमणीय तट के समीप आश्रम में विराजमान उस श्रेष्ठ ब्राह्मण भृगु को छेड़ने के लिए गया।

श्लोक 23 (skanda.5.336.23)

ततः शृङ्गैर्गृहीत्वा तु प्रक्षिप्तो नर्मदाजले । ततः क्रुद्धो भृगुस्तत्र दण्डहस्तो महामुनिः ॥ २३ ॥

tataḥ śṛṅgairgṛhītvā tu prakṣipto narmadājale | tataḥ kruddho bhṛgustatra daṇḍahasto mahāmuniḥ || 23 ||

फिर उसने सींगों से पकड़कर उन्हें नर्मदा के जल में फेंक दिया। इस पर वहाँ महामुनि भृगु क्रोधित होकर दण्ड हाथ में लेकर,

श्लोक 24 (skanda.5.336.24)

पशुवत्ते वधिष्यामि दण्डघातेन मस्तके । शिखायज्ञोपवीते च परिधानं वरासने ॥ २४ ॥

paśuvatte vadhiṣyāmi daṇḍaghātena mastake | śikhāyajñopavīte ca paridhānaṁ varāsane || 24 ||

[चिल्लाकर बोले] - 'मैं तुझे पशु की भाँति दण्ड-प्रहार से सिर पर मार डालूँगा!' [इसी बीच] उनकी शिखा, यज्ञोपवीत तथा आसन का वस्त्र -

श्लोक 25 (skanda.5.336.25)

सुसंवृतं कृतं तेन धावन्वै पृष्ठतो ब्रवीत् ॥ २५ ॥

susaṁvṛtaṁ kṛtaṁ tena dhāvanvai pṛṣṭhato bravīt || 25 ||

- उस वृषभ के कारण अस्त-व्यस्त हो गए; उसके पीछे दौड़ते हुए वे बोले -

श्लोक 26 (skanda.5.336.26)

भृगुरुवाच। पापकर्मन्दुराचार कथं यास्यसि मे वृष । अवमानं समुत्पाद्य कृत्वा गर्तं खुरैस्तथा ॥ २६ ॥

bhṛguruvāca| pāpakarmandurācāra kathaṁ yāsyasi me vṛṣa | avamānaṁ samutpādya kṛtvā gartaṁ khuraistathā || 26 ||

भृगु ने कहा - 'हे पापकर्मा, दुराचारी वृष! मेरा अपमान करके तथा अपने खुरों से गड्ढा बनाकर, अब तू मुझसे बचकर कहाँ जाएगा?'

श्लोक 27 (skanda.5.336.27)

गर्जयित्वा महानादं ततो विप्रमपातयत् । आत्मानं पातितं ज्ञात्वा वृषेण परमेष्ठिना ॥ २७ ॥

garjayitvā mahānādaṁ tato vipramapātayat | ātmānaṁ pātitaṁ jñātvā vṛṣeṇa parameṣṭhinā || 27 ||

भारी गर्जना करते हुए उसने ब्राह्मण को गिरा दिया। अपने को उस वृषभ - जो परमेष्ठी (शिव) ही थे - द्वारा गिराया गया जानकर,

श्लोक 28 (skanda.5.336.28)

भृगुः क्रोधेन जज्वाल हुताहुतिरिवानलः । करे गृह्य महादण्डं ब्रह्मदण्डमिवापरम् ॥ २८ ॥

bhṛguḥ krodhena jajvāla hutāhutirivānalaḥ | kare gṛhya mahādaṇḍaṁ brahmadaṇḍamivāparam || 28 ||

भृगु क्रोध से उसी प्रकार दहक उठे, जैसे आहुति से बढ़ी हुई अग्नि; उन्होंने हाथ में एक दूसरे ब्रह्मदण्ड के समान महादण्ड ग्रहण किया,

श्लोक 29 (skanda.5.336.29)

हन्तुकामो वृषं विप्रोऽभ्यधावत युधिष्ठिर । धावमानं ततो दृष्ट्वा स वृषः पूर्वसागरे ॥ २९ ॥

hantukāmo vṛṣaṁ vipro'bhyadhāvata yudhiṣṭhira | dhāvamānaṁ tato dṛṣṭvā sa vṛṣaḥ pūrvasāgare || 29 ||

हे युधिष्ठिर! वृषभ को मारने की इच्छा से वह ब्राह्मण उसके पीछे दौड़ा। तब उसे दौड़ता हुआ देखकर वह वृषभ पूर्वी सागर की ओर -

श्लोक 30 (skanda.5.336.30)

जम्बूद्वीपं कुशां क्रौञ्चं शाल्मलिं शाकमेव च । गोमेदं पुष्करं प्राप्तः पूर्वतो दक्षिणापथम् ॥ ३० ॥

jambūdvīpaṁ kuśāṁ krauñcaṁ śālmaliṁ śākameva ca | gomedaṁ puṣkaraṁ prāptaḥ pūrvato dakṣiṇāpatham || 30 ||

- जम्बूद्वीप, कुशद्वीप, क्रौञ्चद्वीप, शाल्मलिद्वीप तथा शाकद्वीप को पार करते हुए, गोमेदद्वीप और पुष्करद्वीप को प्राप्त हुआ, पूर्व से दक्षिणापथ की ओर।

श्लोक 31 (skanda.5.336.31)

उत्तरं पश्चिमं चैव द्वीपाद्द्वीपं नरेश्वर । पातालं सुतलं पश्चाद्वितलं च तलातलम् ॥ ३१ ॥

uttaraṁ paścimaṁ caiva dvīpāddvīpaṁ nareśvara | pātālaṁ sutalaṁ paścādvitalaṁ ca talātalam || 31 ||

हे नरेश्वर! उत्तर और पश्चिम की ओर, द्वीप-द्वीप होते हुए, फिर पाताल, सुतल, वितल तथा तलातल को,

श्लोक 32 (skanda.5.336.32)

तामिस्रमन्धतामिस्रं पातालं सप्तमं ययौ । ततो जगाम भूर्लोकं प्राणार्थी स वृषोत्तमः ॥ ३२ ॥

tāmisramandhatāmisraṁ pātālaṁ saptamaṁ yayau | tato jagāma bhūrlokaṁ prāṇārthī sa vṛṣottamaḥ || 32 ||

- तामिस्र, अन्धतामिस्र तथा सातवें पाताल को गया। तत्पश्चात् प्राणों की रक्षा चाहता हुआ वह श्रेष्ठ वृषभ भूर्लोक को गया -

श्लोक 33 (skanda.5.336.33)

भुवः स्वश्चैव च महस्तपः सत्यं जनस्तथा । अनुगम्यमानो विप्रेण न शर्म लभते क्वचित् ॥ ३३ ॥

bhuvaḥ svaścaiva ca mahastapaḥ satyaṁ janastathā | anugamyamāno vipreṇa na śarma labhate kvacit || 33 ||

- तथा भुवः, स्वः, महः, तपः, सत्य और जनः लोकों को गया; उस ब्राह्मण द्वारा पीछा किए जाते हुए उसे कहीं भी शान्ति नहीं मिली।

श्लोक 34 (skanda.5.336.34)

पापं कृत्वैव पुरुषः कामक्रोधबलार्दितः । ततो जगाम शरणं ब्रह्माणं विष्णुमेव च ॥ ३४ ॥

pāpaṁ kṛtvaiva puruṣaḥ kāmakrodhabalārditaḥ | tato jagāma śaraṇaṁ brahmāṇaṁ viṣṇumeva ca || 34 ||

जैसे पाप करके काम-क्रोध के बल से पीड़ित पुरुष शान्ति नहीं पाता - तत्पश्चात् वह ब्रह्मा और विष्णु की शरण में गया,

श्लोक 35 (skanda.5.336.35)

इन्द्रं चन्द्रं तथादित्यैर्याम्यवारुणमारुतैः । यदा सर्वैः परित्यक्तो लोकालोकैः सुरेश्वरैः ॥ ३५ ॥

indraṁ candraṁ tathādityairyāmyavāruṇamārutaiḥ | yadā sarvaiḥ parityakto lokālokaiḥ sureśvaraiḥ || 35 ||

तथा इन्द्र, चन्द्र, आदित्य, यम, वरुण और मरुतों की शरण में गया। जब यह सभी लोकों और सुरेश्वरों द्वारा परित्यक्त कर दिया गया,

श्लोक 36 (skanda.5.336.36)

तदा देवं नमस्कृत्वा रक्ष रक्षस्व चाब्रवीत् । वध्यमानं महादेवो भृगुणा परमेष्ठिना ॥ ३६ ॥

tadā devaṁ namaskṛtvā rakṣa rakṣasva cābravīt | vadhyamānaṁ mahādevo bhṛguṇā parameṣṭhinā || 36 ||

- तब देव को नमस्कार करके यह पुकारा - 'रक्षा करो, रक्षा करो!' - क्योंकि वह परमेष्ठी भृगु द्वारा मारे जाने के निकट था, जो स्वयं महादेव ही थे -

श्लोक 37 (skanda.5.336.37)

सर्वलोकैः परित्यक्तमनाथमिव तं प्रभो । दृष्ट्वा श्रान्तं वृषं देवः पतितं चरणाग्रतः ॥ ३७ ॥

sarvalokaiḥ parityaktamanāthamiva taṁ prabho | dṛṣṭvā śrāntaṁ vṛṣaṁ devaḥ patitaṁ caraṇāgrataḥ || 37 ||

हे प्रभो! समस्त लोकों द्वारा परित्यक्त, मानो अनाथ, थके हुए तथा अपने ही चरणों के आगे गिरे हुए उस वृषभ को देखकर,

श्लोक 38 (skanda.5.336.38)

ततः प्रोवाच भगवान् स्मितपूर्वमिदं वचः ॥ ३८ ॥

tataḥ provāca bhagavān smitapūrvamidaṁ vacaḥ || 38 ||

- तब भगवान् मुस्कुराते हुए यह वचन बोले -

श्लोक 39 (skanda.5.336.39)

ईश्वर उवाच। पश्य देवि महाभागे शमं विप्रस्य सुन्दरि ॥ ३९ ॥

īśvara uvāca| paśya devi mahābhāge śamaṁ viprasya sundari || 39 ||

ईश्वर ने कहा - 'हे महाभागे देवि! हे सुन्दरी! देखो इस ब्राह्मण की शान्ति!'

श्लोक 40 (skanda.5.336.40)

पार्वत्युवाच। यावद्विप्रो न चास्माकं कुप्यते परमेश्वर । तावद्वरं प्रयच्छाशु यदि चेच्छसि मत्प्रियम् ॥ ४० ॥

pārvatyuvāca| yāvadvipro na cāsmākaṁ kupyate parameśvara | tāvadvaraṁ prayacchāśu yadi ceccasi matpriyam || 40 ||

पार्वती ने कहा - 'हे परमेश्वर! इससे पहले कि यह ब्राह्मण हम पर क्रोधित हो, तुरन्त इसे वर प्रदान करो, यदि मुझे प्रसन्न करना चाहते हो।'

श्लोक 41 (skanda.5.336.41)

ततो भस्मी जटी शूली चन्द्रार्धकृतशेखरः । उमार्द्धदेहो भगवान्भूत्वा विप्रमुवाच ह ॥ ४१ ॥

tato bhasmī jaṭī śūlī candrārdhakṛtaśekharaḥ | umārddhadeho bhagavānbhūtvā vipramuvāca ha || 41 ||

तब भगवान्, भस्मलिप्त, जटाधारी, त्रिशूलधारी, अर्धचन्द्र से सुशोभित शिरोभाग वाले, उमा के साथ अर्धनारीश्वर रूप में, ब्राह्मण से बोले -

श्लोक 42 (skanda.5.336.42)

भोभो द्विजवरश्रेष्ठ क्रोधस्ते न शमं गतः । यस्मात्तस्मादिदं तात क्रोधस्थानं भविष्यति ॥ ४२ ॥

bhobho dvijavaraśreṣṭha krodhaste na śamaṁ gataḥ | yasmāttasmādidaṁ tāta krodhasthānaṁ bhaviṣyati || 42 ||

'हे द्विजवरश्रेष्ठ! चूँकि तुम्हारा क्रोध शान्त नहीं हुआ, अतः हे तात! यह स्थान क्रोधस्थान कहलाएगा।'

श्लोक 43 (skanda.5.336.43)

ततो दृष्ट्वा च तं शम्भुं भृगुः श्रेष्ठं त्रिलोचनम् । जानुभ्यामवनिं गत्वा इदं स्तोत्रमुदैरयत् ॥ ४३ ॥

tato dṛṣṭvā ca taṁ śambhuṁ bhṛguḥ śreṣṭhaṁ trilocanam | jānubhyāmavaniṁ gatvā idaṁ stotramudairayat || 43 ||

तब उस श्रेष्ठ त्रिलोचन शम्भु को देखकर भृगु ने घुटनों के बल भूमि पर गिरकर यह स्तोत्र गाया -

श्लोक 44 (skanda.5.336.44)

भृगुरुवाच। प्रणिपत्य भूतनाथं भवोद्भवं भूतिदं भयातीतम् । भवभीतो भुवनपते विज्ञप्तुं किंचिदिच्छामि ॥ ४४ ॥

bhṛguruvāca| praṇipatya bhūtanāthaṁ bhavodbhavaṁ bhūtidaṁ bhayātītam | bhavabhīto bhuvanapate vijñaptuṁ kiṁcidicchāmi || 44 ||

भृगु ने कहा - भूतनाथ, भवोद्भव, भूतिदाता, भय से परे प्रभु को प्रणाम करके, हे भुवनपते! संसार से भयभीत मैं कुछ निवेदन करना चाहता हूँ।

श्लोक 45 (skanda.5.336.45)

त्वद्गुणनिकरान्वक्तुं का शक्तिर्मानुषस्यास्य । वासुकिरपि न तावद्वक्तुं वदनसहस्रं भवेद्यस्य ॥ ४५ ॥

tvadguṇanikarānvaktuṁ kā śaktirmānuṣasyāsya | vāsukirapi na tāvadvaktuṁ vadanasahasraṁ bhavedyasya || 45 ||

तुम्हारे गुण-समूहों का वर्णन करने की इस मनुष्य में क्या शक्ति है? सहस्र मुखों वाला वासुकि भी उन्हें पूर्णतः कहने में समर्थ नहीं है।

श्लोक 46 (skanda.5.336.46)

भक्त्या तथापि शङ्कर शशिधर करजालधवलिताशेष । स्तुतिमुखरस्य महेश्वर प्रसीद तव चरणनिरतस्य ॥ ४६ ॥

bhaktyā tathāpi śaṅkara śaśidhara karajāladhavalitāśeṣa | stutimukharasya maheśvara prasīda tava caraṇaniratasya || 46 ||

फिर भी, हे शंकर! हे शशिधर! हे अपनी किरणजाल से सम्पूर्ण जगत् को धवल करने वाले! हे महेश्वर! स्तुति में मुखर, तुम्हारे चरणों में निरत इस भक्त पर प्रसन्न होइए।

श्लोक 47 (skanda.5.336.47)

सत्त्वं रजस्तमस्त्वं स्थित्युत्पत्तिविनाशनं देव । भवभीतो भुवनपते भुवनेश शरणनिरतस्य ॥ ४७ ॥

sattvaṁ rajastamastvaṁ sthityutpattivināśanaṁ deva | bhavabhīto bhuvanapate bhuvaneśa śaraṇaniratasya || 47 ||

हे देव! तुम्हीं सत्त्व, रज और तम हो, तुम्हीं स्थिति, उत्पत्ति और विनाश के कारण हो। हे भुवनपते! हे भुवनेश! संसार से भयभीत, तुम्हारी शरण में निरत इस भक्त की रक्षा करो।

श्लोक 48 (skanda.5.336.48)

यमनियमयज्ञदानं वेदाभ्यासश्च धारणायोगः । त्वद्भक्तेः सर्वमिदं नार्हन्ति वै कलासहस्रांशम् ॥ ४८ ॥

yamaniyamayajñadānaṁ vedābhyāsaśca dhāraṇāyogaḥ | tvadbhakteḥ sarvamidaṁ nārhanti vai kalāsahasrāṁśam || 48 ||

यम, नियम, यज्ञ, दान, वेदाभ्यास तथा धारणायोग - यह सब मिलकर भी तुम्हारी भक्ति के सहस्रवें अंश के बराबर भी नहीं है।

श्लोक 49 (skanda.5.336.49)

उत्कृष्टरसरसायनखड्गां जनविवरपादुकासिद्धिः । चिह्नं हि तव नतानां दृश्यत इह जन्मनि प्रकटम् ॥ ४९ ॥

utkṛṣṭarasarasāyanakhaḍgāṁ janavivarapādukāsiddhiḥ | cihnaṁ hi tava natānāṁ dṛśyata iha janmani prakaṭam || 49 ||

उत्कृष्ट रसायन-सिद्धि, अदृश्य-पादुका सिद्धि आदि - ये सब तुम्हें नमन करने वालों के लिए इसी जन्म में स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती हैं।

श्लोक 50 (skanda.5.336.50)

शाठ्येन यदि प्रणमति वितरसि तस्यापि भूतिमिच्छया देव । भवति भवच्छेदकरी भक्तिर्मोक्षाय निर्मिता नाथ ॥ ५० ॥

śāṭhyena yadi praṇamati vitarasi tasyāpi bhūtimicchayā deva | bhavati bhavacchedakarī bhaktirmokṣāya nirmitā nātha || 50 ||

हे देव! यदि कोई छल से भी नमस्कार करे, तो भी तुम उसकी इच्छानुसार उसे ऐश्वर्य प्रदान करते हो; हे नाथ! मोक्ष के लिए निर्मित तुम्हारी भक्ति संसार-बन्धन को काट देने वाली होती है।

श्लोक 51 (skanda.5.336.51)

परदारपरस्वरतं परपरिभवदुःखशोकसंतप्तम् । परवदनवीक्षणपरं परमेश्वर मां परित्राहि ॥ ५१ ॥

paradāraparasvarataṁ paraparibhavaduḥkhaśokasaṁtaptam | paravadanavīkṣaṇaparaṁ parameśvara māṁ paritrāhi || 51 ||

परस्त्री और परधन में रत, दूसरों के अपमान से उत्पन्न दुःख-शोक से संतप्त, दूसरों के मुख की ओर ईर्ष्यापूर्वक देखने में तत्पर - हे परमेश्वर! मेरी रक्षा करो।

श्लोक 52 (skanda.5.336.52)

अधिकाभिमानमुदितं क्षणभङ्गुरविभवविलसन्तम् । क्रूरं कुपथाभिमुखं शङ्कर शरणागतं परित्राहि ॥ ५२ ॥

adhikābhimānamuditaṁ kṣaṇabhaṅguravibhavavilasantam | krūraṁ kupathābhimukhaṁ śaṅkara śaraṇāgataṁ paritrāhi || 52 ||

अत्यधिक अभिमान से उन्मत्त, क्षणभंगुर वैभव में मग्न, क्रूर तथा कुमार्ग की ओर उन्मुख - हे शंकर! तुम्हारी शरण में आए हुए मुझ जैसे को बचाओ।

श्लोक 53 (skanda.5.336.53)

दीनं द्विजं वरार्थे बन्धुजने नैव पूरिता ह्याशा । छिन्द्धि महेश्वर तृष्णां किं मूढं मां विडम्बयसि ॥ ५३ ॥

dīnaṁ dvijaṁ varārthe bandhujane naiva pūritā hyāśā | chinddhi maheśvara tṛṣṇāṁ kiṁ mūḍhaṁ māṁ viḍambayasi || 53 ||

दीन इस ब्राह्मण की बन्धुजनों से वर पाने की आशा कभी पूर्ण नहीं हुई। हे महेश्वर! मेरी तृष्णा को काट दो - तुम इस मूढ़ को क्यों विडम्बित कर रहे हो?

श्लोक 54 (skanda.5.336.54)

तृष्णां हरस्व शीघ्रं लक्ष्मीं दद हृदयवासिनीं नित्यम् । छिन्द्धि मदमोहपाशं मामुत्तारय भवाच्च देवेश ॥ ५४ ॥

tṛṣṇāṁ harasva śīghraṁ lakṣmīṁ dada hṛdayavāsinīṁ nityam | chinddhi madamohapāśaṁ māmuttāraya bhavācca deveśa || 54 ||

शीघ्र मेरी तृष्णा हर लो; मेरे हृदय में सदा वास करने वाली लक्ष्मी प्रदान करो; मेरे मद-मोह के पाश को काट दो; और हे देवेश! मुझे संसार से पार कर दो।

श्लोक 55 (skanda.5.336.55)

करुणाभ्युदयं नाम स्तोत्रमिदं सर्वसिद्धिदं दिव्यम् । यः पठति भृगुं स्मरति च शिवलोकमसौ प्रयाति देहान्ते ॥ ५५ ॥

karuṇābhyudayaṁ nāma stotramidaṁ sarvasiddhidaṁ divyam | yaḥ paṭhati bhṛguṁ smarati ca śivalokamasau prayāti dehānte || 55 ||

'करुणाभ्युदय' नामक यह दिव्य स्तोत्र समस्त सिद्धियों को देने वाला है। जो इसका पाठ करता है और भृगु का स्मरण करता है, वह देहान्त होने पर शिवलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 56 (skanda.5.336.56)

एतच्छ्रुत्वा महादेवः स्तोत्रं च भृगुभाषितम् । उवाच वरदोऽस्मीति देव्या सह वरोत्तमम् ॥ ५६ ॥

etacchrutvā mahādevaḥ stotraṁ ca bhṛgubhāṣitam | uvāca varado'smīti devyā saha varottamam || 56 ||

भृगु द्वारा कहे गए इस स्तोत्र को सुनकर महादेव ने देवी सहित उस श्रेष्ठ भक्त से कहा - 'मैं वरदाता हूँ।'

श्लोक 57 (skanda.5.336.57)

भृगुरुवाच। प्रसन्नो देवदेवेश यदि देयो वरो मम । सिद्धिक्षेत्रमिदं सर्वं भविता मम नामतः ॥ ५७ ॥

bhṛguruvāca| prasanno devadeveśa yadi deyo varo mama | siddhikṣetramidaṁ sarvaṁ bhavitā mama nāmataḥ || 57 ||

भृगु ने कहा - 'हे देवदेवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं, तो यह सम्पूर्ण सिद्धिक्षेत्र मेरे ही नाम से प्रसिद्ध हो।

श्लोक 58 (skanda.5.336.58)

भवद्भिः सन्निधानेन स्थातव्यं हि सहोमया । देवक्षेत्रमिदं पुण्यं येन सर्वं भविष्यति ॥ ५८ ॥

bhavadbhiḥ sannidhānena sthātavyaṁ hi sahomayā | devakṣetramidaṁ puṇyaṁ yena sarvaṁ bhaviṣyati || 58 ||

आपको उमा सहित यहीं साक्षात् निवास करना होगा, जिससे यह सम्पूर्ण स्थान पुण्यमय देवक्षेत्र बन जाए।

श्लोक 59 (skanda.5.336.59)

अत्र स्थाने महास्थानं करोमि जगदीश्वर । तव प्रसादाद्देवेश पूर्यन्तां मे मनोरथाः ॥ ५९ ॥

atra sthāne mahāsthānaṁ karomi jagadīśvara | tava prasādāddeveśa pūryantāṁ me manorathāḥ || 59 ||

हे जगदीश्वर! मैं इस स्थान को महास्थान बनाऊँगा। हे देवेश! आपकी कृपा से मेरी मनोकामनाएँ पूर्ण हों।'

श्लोक 60 (skanda.5.336.60)

ईश्वर उवाच। श्रिया कृतमिदं पूर्वं किं न ज्ञातं त्वया द्विज । अनुमान्य श्रियं देवीं यदीयं मन्यते भवान् ॥ ६० ॥

īśvara uvāca| śriyā kṛtamidaṁ pūrvaṁ kiṁ na jñātaṁ tvayā dvija | anumānya śriyaṁ devīṁ yadīyaṁ manyate bhavān || 60 ||

ईश्वर ने कहा - 'हे द्विज! यह स्थान तो पूर्व में ही श्री (लक्ष्मी) द्वारा निर्मित है - क्या तुम्हें यह ज्ञात नहीं था? यदि तुम इसे अपना मानते हो, तो पहले देवी श्री की सम्मति प्राप्त करो।

श्लोक 61 (skanda.5.336.61)

कुरुष्व यदभिप्रेतं त्वत्कृतं नः तदन्यथा । एवमुक्त्वा गते देवे स्नात्वा गत्वा भृगुः श्रियम् ॥ ६१ ॥

kuruṣva yadabhipretaṁ tvatkṛtaṁ naḥ tadanyathā | evamuktvā gate deve snātvā gatvā bhṛguḥ śriyam || 61 ||

जो तुम्हें अभीष्ट हो, वह करो; तुम्हारे द्वारा किया गया कार्य हमारे लिए अन्यथा नहीं होगा।' ऐसा कहकर देव के चले जाने पर, भृगु स्नान करके श्री के पास गए।

श्लोक 62 (skanda.5.336.62)

कृत्वा च पारणं तत्र वसन्विप्रस्तया सह । श्रिया च सहितः काल इदं वचनमब्रवीत् ॥ ६२ ॥

kṛtvā ca pāraṇaṁ tatra vasanvipraḥ tayā saha | śriyā ca sahitaḥ kāla idaṁ vacanamabravīt || 62 ||

वहाँ व्रत का पारण करके, उनके साथ निवास करते हुए, कुछ समय पश्चात् श्री के साथ रहते हुए उस ब्राह्मण ने यह वचन कहा -

श्लोक 63 (skanda.5.336.63)

भृगुरुवाच। यदि ते रोचते भद्रे दुःखासीनं च ते यदि । त्वया वृते महाक्षेत्रे स्वीयं स्थानं करोम्यहम् ॥ ६३ ॥

bhṛguruvāca| yadi te rocate bhadre duḥkhāsīnaṁ ca te yadi | tvayā vṛte mahākṣetre svīyaṁ sthānaṁ karomyaham || 63 ||

भृगु ने कहा - 'हे भद्रे! यदि तुम्हें रुचिकर लगे, और यदि इससे तुम्हें कोई कष्ट न हो, तो तुम्हारे द्वारा चयनित इस महाक्षेत्र में मैं अपना स्थान बनाना चाहता हूँ।'

श्लोक 64 (skanda.5.336.64)

श्रीरुवाच। मम नाम्ना तु विप्रर्षे तव नाम्ना तु शोभनम् । स्थानं कुरुष्वाभिप्रेतमविरोधेन मे मतिः ॥ ६४ ॥

śrīruvāca| mama nāmnā tu viprarṣe tava nāmnā tu śobhanam | sthānaṁ kuruṣvābhipretamavirodhena me matiḥ || 64 ||

श्री ने कहा - 'हे विप्रर्षे! मेरे नाम से, और सुन्दरता से तुम्हारे नाम से भी - अपने अभीष्ट स्थान का निर्माण करो; मेरे मन में इसका कोई विरोध नहीं है।'

श्लोक 65 (skanda.5.336.65)

भृगुरुवाच। कच्छपाधिष्ठितं ह्येतत्तस्य पृष्ठिगतं रमे । संमन्त्र्य सहितं तेन शोभनं भवती कुरु ॥ ६५ ॥

bhṛguruvāca| kacchapādhiṣṭhitaṁ hyetattasya pṛṣṭhigataṁ rame | saṁmantrya sahitaṁ tena śobhanaṁ bhavatī kuru || 65 ||

भृगु ने कहा - 'यह स्थान एक कच्छप पर अवस्थित है; मैं उसकी पीठ पर ही निवास करूँगा। उसके साथ परामर्श करके, हे भद्रे! तुम इसे सुशोभित करो।'

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