अवन्ती खण्ड · अध्याय 337
भृगुकच्छ तीर्थ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.337.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो भृगुः श्रिया चैव समेतः कच्छपं गतः । अभिनन्द्य यथान्यायमुवाच वचनं शुभम् ॥ १ ॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato bhṛguḥ śriyā caiva sametaḥ kacchapaṁ gataḥ | abhinandya yathānyāyamuvāca vacanaṁ śubham || 1 ||
श्री मार्कण्डेय जी ने कहा - तत्पश्चात् भृगु, श्री के साथ, कच्छप के पास गए; यथोचित अभिनन्दन करके उन्होंने यह शुभ वचन कहा -
श्लोक 2 (skanda.5.337.2)
त्वया धृता धरा सर्वा तथा लोकाश्चराचराः । तथैव पुण्यभावत्वात्स्थितस्तत्र महामते ॥ २ ॥
tvayā dhṛtā dharā sarvā tathā lokāścarācarāḥ | tathaiva puṇyabhāvatvātsthitastatra mahāmate || 2 ||
'आपने ही सम्पूर्ण पृथ्वी को तथा चराचर लोकों को धारण किया हुआ है; और आपके ही पुण्यभाव के कारण हम यहाँ स्थित हैं, हे महामते!
श्लोक 3 (skanda.5.337.3)
चातुर्विद्यस्य संस्थानं करोमि रमया सह । यदि त्वं मन्यसे देव तदादेशय मां विभो ॥ ३ ॥
cāturvidyasya saṁsthānaṁ karomi ramayā saha | yadi tvaṁ manyase deva tadādeśaya māṁ vibho || 3 ||
मैं यहाँ रमा (श्री) के साथ चारों वर्णों के निवास हेतु एक संस्थान बनाना चाहता हूँ। हे देव! यदि आप सहमत हों, तो हे विभो! मुझे आज्ञा दीजिए।'
श्लोक 4 (skanda.5.337.4)
कूर्म उवाच। एवमेव द्विजश्रेष्ठ मम नामाङ्कितं पुरम् । भविष्यति महत्कालं ममोपरि सुसंस्थितम् ॥ ४ ॥
kūrma uvāca| evameva dvijaśreṣṭha mama nāmāṅkitaṁ puram | bhaviṣyati mahatkālaṁ mamopari susaṁsthitam || 4 ||
कूर्म ने कहा - 'ऐसा ही हो, हे द्विजश्रेष्ठ! मेरे नाम से अंकित एक नगर दीर्घकाल तक मेरे ऊपर सुस्थापित रहेगा।
श्लोक 5 (skanda.5.337.5)
अचलं सुस्थिरं तात न भीः कार्या सुलोचने । एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं कच्छपस्य मुखाच्च्युतम् ॥ ५ ॥
acalaṁ susthiraṁ tāta na bhīḥ kāryā sulocane | etacchrutvā śubhaṁ vākyaṁ kacchapasya mukhāccyutam || 5 ||
यह अचल और सुस्थिर रहेगा, हे तात! हे सुलोचने! भय करने की कोई आवश्यकता नहीं है।' कच्छप के मुख से निकले इस शुभ वचन को सुनकर,
श्लोक 6 (skanda.5.337.6)
हृष्टस्तुष्टः श्रिया सार्द्धं पद्मयोनिसुतो भृगुः । अभीचि उदये प्राप्ते कृतकौतुकमङ्गलः ॥ ६ ॥
hṛṣṭastuṣṭaḥ śriyā sārddhaṁ padmayonisuto bhṛguḥ | abhīci udaye prāpte kṛtakautukamaṅgalaḥ || 6 ||
कमलयोनि (ब्रह्मा) के पुत्र भृगु, हर्षित और सन्तुष्ट होकर, श्री के साथ, अभिजित् नक्षत्र के उदय होने पर, कौतुक-मंगल विधि सम्पन्न की।
श्लोक 7 (skanda.5.337.7)
नन्दने वत्सरे माघे पञ्चम्यां भरतर्षभ । शस्ते तु ह्युत्तरायोगे कुम्भस्थे शशिमण्डले ॥ ७ ॥
nandane vatsare māghe pañcamyāṁ bharatarṣabha | śaste tu hyuttarāyoge kumbhasthe śaśimaṇḍale || 7 ||
हे भरतर्षभ! नन्दन नामक संवत्सर में, माघ मास की पंचमी को, शुभ उत्तरा नक्षत्र योग में, चन्द्रमण्डल के कुम्भ राशि में स्थित होने पर,
श्लोक 8 (skanda.5.337.8)
रेवाया उत्तरे तीरे गम्भीरे चाभिवारुणि । प्रागुदक्प्रवणे देशे कोटितीर्थसमन्वितम् ॥ ८ ॥
revāyā uttare tīre gambhīre cābhivāruṇi | prāgudakpravaṇe deśe koṭitīrthasamanvitam || 8 ||
रेवा के उत्तर तट पर, वरुण दिशा की ओर अभिमुख गहरे स्थान में, ईशान की ओर ढलान वाले प्रदेश में, करोड़ों तीर्थों से युक्त -
श्लोक 9 (skanda.5.337.9)
क्रोशप्रमाणं तत्क्षेत्रं प्रासादशतसंकुलम् । अचिरेणैव कालेन तपोबलसमन्वितः । विचिन्त्य विश्वकर्माणं चकार भृगुसत्तमः ॥ ९ ॥
krośapramāṇaṁ tatkṣetraṁ prāsādaśatasaṅkulam | acireṇaiva kālena tapobalasamanvitaḥ | vicintya viśvakarmāṇaṁ cakāra bhṛgusattamaḥ || 9 ||
- एक क्रोश परिमाण वाले उस क्षेत्र को, सैकड़ों प्रासादों से भरा हुआ, भृगुश्रेष्ठ ने अपने तपोबल के सहारे विश्वकर्मा का ध्यान करके अल्पकाल में ही निर्मित करा दिया।
श्लोक 10 (skanda.5.337.10)
ब्राह्मणा वेदविद्वांसः क्षत्रिया राज्यपालकाः । वैश्या वृत्तिरतास्तत्र शूद्राः शुश्रूषकास्त्रिषु ॥ १० ॥
brāhmaṇā vedavidvāṁsaḥ kṣatriyā rājyapālakāḥ | vaiśyā vṛttiratāstatra śūdrāḥ śuśrūṣakāstriṣu || 10 ||
वहाँ ब्राह्मण वेदविद्वान् थे, क्षत्रिय राज्य के पालक थे, वैश्य व्यवसाय में रत थे, तथा शूद्र इन तीनों वर्णों की सेवा करने वाले थे।
श्लोक 11 (skanda.5.337.11)
एवं श्रिया वृतं क्षेत्रं परमानन्दनन्दितम् । निर्मितं भृगुणा तात सर्वपातकनाशनम् । इति भृगुकच्छोत्पत्तिः ॥ ११ ॥
evaṁ śriyā vṛtaṁ kṣetraṁ paramānandananditam | nirmitaṁ bhṛguṇā tāta sarvapātakanāśanam | iti bhṛgukacchotpattiḥ || 11 ||
इस प्रकार, हे तात! श्री द्वारा चुना गया, परम आनन्द से पूर्ण, यह क्षेत्र भृगु द्वारा निर्मित हुआ, जो समस्त पापों का नाशक है। इस प्रकार भृगुकच्छ की उत्पत्ति की कथा समाप्त हुई।
श्लोक 12 (skanda.5.337.12)
मार्कण्डेय उवाच। ततः कालेन महता कस्मिंश्चित्कारणान्तरे । देवलोकं जगामाशु लक्ष्मीरृषिसमागमे ॥ १२ ॥
mārkaṇḍeya uvāca| tataḥ kālena mahatā kasmiṁścitkāraṇāntare | devalokaṁ jagāmāśu lakṣmīrṛṣisamāgame || 12 ||
मार्कण्डेय जी ने कहा - तत्पश्चात् दीर्घकाल बीतने पर, किसी विशेष कारणवश, लक्ष्मी ऋषियों के समागम को छोड़कर शीघ्र देवलोक को चली गईं,
श्लोक 13 (skanda.5.337.13)
समर्प्य कुञ्चिकाट्टालं भृगवे ब्रह्मवादिने । पालयस्व यथार्थं वै स्थानकं मम सुव्रत ॥ १३ ॥
samarpya kuñcikāṭṭālaṁ bhṛgave brahmavādine | pālayasva yathārthaṁ vai sthānakaṁ mama suvrata || 13 ||
- अपने भण्डार-गृह की कुंजी ब्रह्मवादी भृगु को सौंपकर उसने कहा - 'हे सुव्रत! मेरे इस स्थान की यथार्थ रूप से रक्षा करना।'
श्लोक 14 (skanda.5.337.14)
देवकार्याण्यशेषाणि कृत्वा श्रीः पुनरागता । आजगाम रमा देवी भृगुकच्छं त्वरान्विता ॥ १४ ॥
devakāryāṇyaśeṣāṇi kṛtvā śrīḥ punarāgatā | ājagāma ramā devī bhṛgukacchaṁ tvarānvitā || 14 ||
देवताओं के समस्त कार्यों को सम्पन्न करके श्री लौट आईं; देवी रमा शीघ्रतापूर्वक भृगुकच्छ को वापस आ गईं।
श्लोक 15 (skanda.5.337.15)
प्रार्थितं कुञ्चिकाट्टालं स्वगृहं सपरिग्रहम् । भृगुर्यदा तदा पार्थ मिथ्या नास्ति तदा वदत ॥ १५ ॥
prārthitaṁ kuñcikāṭṭālaṁ svagṛhaṁ saparigraham | bhṛguryadā tadā pārtha mithyā nāsti tadā vadata || 15 ||
हे पार्थ! जब उसने भृगु से अपने घर की कुंजी उसके सामान सहित माँगी, तब भृगु ने कहा - 'इसमें कोई असत्य नहीं है' -
श्लोक 16 (skanda.5.337.16)
एव विवादः सुमहान्संजातश्च नरेश्वर । ममेति मम चैवेति परस्परसमागमे ॥ १६ ॥
eva vivādaḥ sumahānsaṁjātaśca nareśvara | mameti mama caiveti parasparasamāgame || 16 ||
- और इस प्रकार, हे नरेश्वर! दोनों के बीच परस्पर भेंट में 'यह मेरा है, यह मेरा है' कहते हुए एक बड़ा विवाद उत्पन्न हो गया।
श्लोक 17 (skanda.5.337.17)
ततः कालेन महता भृगुणा परमर्षिणा । चातुर्विद्यप्रमाणार्थं चकार महतीं स्थितिम् ॥ १७ ॥
tataḥ kālena mahatā bhṛguṇā paramarṣiṇā | cāturvidyapramāṇārthaṁ cakāra mahatīṁ sthitim || 17 ||
तत्पश्चात् दीर्घकाल बीतने पर, महर्षि भृगु ने चतुर्विद्याविज्ञ विद्वानों के प्रमाण हेतु एक विशाल सभा का आयोजन किया।
श्लोक 18 (skanda.5.337.18)
अस्मदीयं यथा सर्वं नगरं मृगलोचने । चातुर्विद्या द्विजाः सर्वे तथा जानन्ति सुन्दरि ॥ १८ ॥
asmadīyaṁ yathā sarvaṁ nagaraṁ mṛgalocane | cāturvidyā dvijāḥ sarve tathā jānanti sundari || 18 ||
[उसने कहा -] 'हे मृगलोचने! यह सम्पूर्ण नगर मेरा है - हे सुन्दरि! चारों विद्याओं में पारंगत समस्त ब्राह्मण इस बात को जानते हैं।'
श्लोक 19 (skanda.5.337.19)
श्रीरुवाच। प्रमाणं मम विप्रेन्द्र चातुर्वण्या न संशयः । मदीयं वा त्वदीयं वा कथयन्तु द्विजोत्तमाः ॥ १९ ॥
śrīruvāca| pramāṇaṁ mama viprendra cāturvaṇyā na saṁśayaḥ | madīyaṁ vā tvadīyaṁ vā kathayantu dvijottamāḥ || 19 ||
श्री ने कहा - 'हे विप्रेन्द्र! इसका प्रमाण चारों वर्णों से निःसंदेह प्राप्त हो; श्रेष्ठ ब्राह्मण बताएँ कि यह मेरा है या तुम्हारा।'
श्लोक 20 (skanda.5.337.20)
ततः समस्तैर्विबुधैः सम्प्रधार्य परस्परम् । द्विधा तैर्वाक्स्थलं दृष्ट्वा ब्राह्मणा नृपसंहितम् ॥ २० ॥
tataḥ samastairvibudhaiḥ sampradhārya parasparam | dvidhā tairvākasthalaṁ dṛṣṭvā brāhmaṇā nṛpasaṁhitam || 20 ||
तब सभी विद्वानों ने परस्पर विचार-विमर्श करके, इस विषय को दुविधापूर्ण देखकर, राजा सहित ब्राह्मणों ने -
श्लोक 21 (skanda.5.337.21)
अष्टादशसहस्राणि नोचुर्वै किंचिदुत्तरम् । अष्टादशसहस्रेषु भृगुकोपभयान्नृप । उक्तं च तालकं हस्ते यस्य तस्येदमुत्तरम् ॥ २१ ॥
aṣṭādaśasahasrāṇi nocurvai kiṁcidauttaram | aṣṭādaśasahasreṣu bhṛgukopabhayānnṛpa | uktaṁ ca tālakaṁ haste yasya tasyedamauttaram || 21 ||
- अठारह हजार ब्राह्मणों ने कोई उत्तर नहीं दिया; हे राजन्! उन अठारह हजार में से, भृगु के क्रोध के भय से, यह कहा गया - 'जिसके हाथ में कुंजी है, वही उत्तर सत्य है।'
श्लोक 22 (skanda.5.337.22)
एतच्छ्रुत्वा तु सा देवी निगमं नैगमैः कृतम् । क्रोधेन महताविष्टा शशाप द्विजपुंगवान् ॥ २२ ॥
etacchrutvā tu sā devī nigamaṁ naigamaiḥ kṛtam | krodhena mahatāviṣṭā śaśāpa dvijapuṅgavān || 22 ||
विद्वत्सभा द्वारा दिए गए इस निर्णय को सुनकर, वह देवी अत्यन्त क्रोध से भर गईं और उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शाप दे दिया -
श्लोक 23 (skanda.5.337.23)
श्रीदेव्युवाच। यस्मात्सत्यं समुत्सृज्य लोभोपहतमानसैः । मदीयं लोपितं स्थानं तस्माच्छृण्वन्तु मे गिरम् ॥ २३ ॥
śrīdevyuvāca| yasmātsatyaṁ samutsṛjya lobhopahatamānasaiḥ | madīyaṁ lopitaṁ sthānaṁ tasmācchṛṇvantu me giram || 23 ||
श्री देवी ने कहा - 'चूँकि तुमने सत्य को त्यागकर, लोभ से आच्छादित मन से, मेरे स्थान का अपहरण किया है, इसलिए मेरी बात सुनो।
श्लोक 24 (skanda.5.337.24)
त्रिपौरुषा भवेद्विद्या त्रिपुरुषं न भवेद्धनम् । न द्वितीयस्तु वो वेदः पठितो भवति द्विजाः ॥ २४ ॥
tripauruṣā bhavedvidyā tripuruṣaṁ na bhaveddhanam | na dvitīyastu vo vedaḥ paṭhito bhavati dvijāḥ || 24 ||
तुम्हारी विद्या केवल तीन पीढ़ियों तक टिकेगी, तुम्हारा धन भी तीन पीढ़ियों तक नहीं टिकेगा; और हे ब्राह्मणो! तुम्हें दूसरी बार वेद का सम्पूर्ण अध्ययन प्राप्त नहीं होगा।
श्लोक 25 (skanda.5.337.25)
गृहाणि न द्विभौमानि न च भूतिः स्थिरा द्विजाः । पक्षपातेन वो धर्मो न च निःश्रेयभावतः ॥ २५ ॥
gṛhāṇi na dvibhaumāni na ca bhūtiḥ sthirā dvijāḥ | pakṣapātena vo dharmo na ca niḥśreyabhāvataḥ || 25 ||
तुम्हारे घर दुमंजिले (भव्य) नहीं होंगे, न तुम्हारी सम्पत्ति स्थिर रहेगी, हे ब्राह्मणो! तुम्हारा धर्म पक्षपातपूर्ण होगा, निःश्रेयस की सच्ची भावना से रहित।
श्लोक 26 (skanda.5.337.26)
इष्टो गोत्रजनः कश्चिल्लोभेनावृतमानसः । न च द्वैधं परित्यज्य ह्येकं सत्यं भविष्यति ॥ २६ ॥
iṣṭo gotrajanaḥ kaścillobhenāvṛtamānasaḥ | na ca dvaidhaṁ parityajya hyekaṁ satyaṁ bhaviṣyati || 26 ||
तुम्हारा मन लोभ से आच्छादित होकर किसी न किसी सगोत्री का पक्ष लेगा; और द्वैधभाव (दुविधा) का त्याग न कर पाने के कारण तुम्हारे पास कभी एक अटल सत्य नहीं रहेगा।
श्लोक 27 (skanda.5.337.27)
अद्यप्रभृति सर्वेषामहङ्कारो द्विजन्मनाम् । न पिता पुत्रवाक्येन न पुत्रः पितृकर्मणि ॥ २७ ॥
adyaprabhṛti sarveṣāmahaṅkāro dvijanmanām | na pitā putravākyena na putraḥ pitṛkarmaṇi || 27 ||
आज से समस्त द्विजों में अहंकार व्याप्त होगा; न पिता पुत्र के वचन को मानेगा, न पुत्र पिता के कार्य को,
श्लोक 28 (skanda.5.337.28)
अहङ्कारकृताः सर्वे भविष्यन्ति न संशयः । इति शप्त्वा रमादेवी तदैव च दिवं ययौ ॥ २८ ॥
ahaṅkārakṛtāḥ sarve bhaviṣyanti na saṁśayaḥ | iti śaptvā ramādevī tadaiva ca divaṁ yayau || 28 ||
- सभी अहंकार से प्रेरित होंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं।' ऐसा शाप देकर देवी रमा उसी क्षण स्वर्ग को चली गईं।
श्लोक 29 (skanda.5.337.29)
ततो गतायां वै लक्ष्म्यां देवा ब्रह्मर्षयोऽमलाः । क्रोधलोभमिदं स्थानं तेऽपि चोक्त्वा दिवं ययुः ॥ २९ ॥
tato gatāyāṁ vai lakṣmyāṁ devā brahmarṣayo'malāḥ | krodhalobhamidaṁ sthānaṁ te'pi coktvā divaṁ yayuḥ || 29 ||
तत्पश्चात् लक्ष्मी के चले जाने पर, देवगण और निर्मल ब्रह्मर्षि, इस स्थान को क्रोध और लोभ का स्थान घोषित करते हुए, वे भी स्वर्ग को चले गए।
श्लोक 30 (skanda.5.337.30)
गतां दृष्ट्वा ततो देवीमृषींश्चैव तपोधनान् । भृगुश्च परमेष्ठी स विषादमगमत्परम् । प्रसादयामास पुनः शङ्करं त्रिपुरान्तकम् ॥ ३० ॥
gatāṁ dṛṣṭvā tato devīmṛṣīṁścaiva tapodhanān | bhṛguśca parameṣṭhī sa viṣādamagamatparam | prasādayāmāsa punaḥ śaṅkaraṁ tripurāntakam || 30 ||
देवी और तपोधन ऋषियों को इस प्रकार चले गया देखकर, परमेष्ठी भृगु परम विषाद में डूब गए; उन्होंने पुनः त्रिपुरान्तक शंकर को प्रसन्न करने का प्रयत्न किया।
श्लोक 31 (skanda.5.337.31)
तपसा महता पार्थ ततस्तुष्टो महेश्वरः । उवाच वचनं काले हर्षयन् भृगुसत्तमम् ॥ ३१ ॥
tapasā mahatā pārtha tatastuṣṭo maheśvaraḥ | uvāca vacanaṁ kāle harṣayan bhṛgusattamam || 31 ||
हे पार्थ! उस महान् तपस्या से महेश्वर प्रसन्न हुए; उचित समय पर उन्होंने भृगुश्रेष्ठ को हर्षित करते हुए यह वचन कहा -
श्लोक 32 (skanda.5.337.32)
किं विषण्णोऽसि विप्रेन्द्र किं वा सन्तापकारणम् । मयि प्रसन्नेऽपि तव ह्येतत्कथय मेऽनघ ॥ ३२ ॥
kiṁ viṣaṇṇo'si viprendra kiṁ vā santāpakāraṇam | mayi prasanne'pi tava hyetatkathaya me'nagha || 32 ||
'हे विप्रेन्द्र! तुम विषादग्रस्त क्यों हो? मेरे प्रसन्न होने पर भी तुम्हारे संताप का क्या कारण है? हे अनघ! मुझे यह बताओ।'
श्लोक 33 (skanda.5.337.33)
भृगुरुवाच। शापयित्वा द्विजान्सर्वान्पुरा लक्ष्मीर्विनिर्गता । अपवित्रमिदं चोक्त्वा ततो देवा विनिर्गताः ॥ ३३ ॥
bhṛguruvāca| śāpayitvā dvijānsarvānpurā lakṣmīrvinirgatā | apavitramidaṁ coktvā tato devā vinirgatāḥ || 33 ||
भृगु ने कहा - 'समस्त ब्राह्मणों को शाप देकर लक्ष्मी पहले ही जा चुकी हैं; और इस स्थान को अपवित्र घोषित करके देवगण भी चले गए हैं।'
श्लोक 34 (skanda.5.337.34)
ईश्वर उवाच। पुरा मया यथा प्रोक्तं तत्तथा न तदन्यथा । क्रोधस्थानमसंदेहं तथान्यदपि तच्छृणु ॥ ३४ ॥
īśvara uvāca| purā mayā yathā proktaṁ tattathā na tadanyathā | krodhasthānamasaṁdehaṁ tathānyadapi tacchṛṇu || 34 ||
ईश्वर ने कहा - 'जैसा मैंने पहले कहा था, वैसा ही है, अन्यथा नहीं - यह निःसंदेह क्रोधस्थान है। अब कुछ और भी सुनो।
श्लोक 35 (skanda.5.337.35)
तत्र स्थानसमुद्भूता महद्भयविवर्जिताः । ब्राह्मणा मत्प्रसादेन भविष्यन्ति न संशयः ॥ ३५ ॥
tatra sthānasamudbhūtā mahadbhayavivarjitāḥ | brāhmaṇā matprasādena bhaviṣyanti na saṁśayaḥ || 35 ||
मेरी कृपा से, इस स्थान में उत्पन्न होने वाले ब्राह्मण निश्चय ही महान् भय से रहित होंगे।
श्लोक 36 (skanda.5.337.36)
वेदविद्याव्रतस्नाताः सर्वशास्त्रविशारदाः । येऽपि ते शतसाहस्रास्त्वरिता ह्यागतास्त्विह ॥ ३६ ॥
vedavidyāvratasnātāḥ sarvaśāstraviśāradāḥ | ye'pi te śatasāhasrāstvaritā hyāgatāstviha || 36 ||
वेदविद्या-व्रत में स्नातक, समस्त शास्त्रों में निपुण, यहाँ शीघ्रतापूर्वक आने वाले उन सैकड़ों-हजारों में से भी -
श्लोक 37 (skanda.5.337.37)
अपठस्यापि मूर्खस्य सर्वावस्थां गतस्य च । उत्तरादुत्तरं शक्रो दातुं न तु भृगूत्तम ॥ ३७ ॥
apaṭhasyāpi mūrkhasya sarvāvasthāṁ gatasya ca | uttarādauttaraṁ śakro dātuṁ na tu bhṛgūttama || 37 ||
- हे भृगुश्रेष्ठ! जो अनपढ़, मूर्ख तथा हर प्रकार से हीन अवस्था को प्राप्त है, उससे भी बढ़कर उत्तर देने में स्वयं इन्द्र भी समर्थ नहीं हैं।
श्लोक 38 (skanda.5.337.38)
कोटितीर्थमिदं स्थानं सर्वपापप्रणाशनम् । अद्यप्रभृति विप्रेन्द्र भविष्यति न संशयः ॥ ३८ ॥
koṭitīrthamidaṁ sthānaṁ sarvapāpapraṇāśanam | adyaprabhṛti viprendra bhaviṣyati na saṁśayaḥ || 38 ||
हे विप्रेन्द्र! आज से यह स्थान निश्चय ही कोटितीर्थ के नाम से समस्त पापों का नाशक होगा।
श्लोक 39 (skanda.5.337.39)
मत्प्रसादाद्देवगणैः सेवितं च भविष्यति । भृगुक्षेत्रे मृता ये तु कृमिकीटपतंगकाः ॥ ३९ ॥
matprasādāddevagaṇaiḥ sevitaṁ ca bhaviṣyati | bhṛgukṣetre mṛtā ye tu kṛmikīṭapataṁgakāḥ || 39 ||
मेरी कृपा से यह देवगणों द्वारा भी सेवित होगा। भृगुक्षेत्र में मरने वाले कीड़े-मकोड़े और पतंगे भी -
श्लोक 40 (skanda.5.337.40)
वासस्तेषां शिवे लोके मत्प्रसादाद्भविष्यति । वृषखाते नरः स्नात्वा पूजयित्वा महेश्वरम् ॥ ४० ॥
vāsasteṣāṁ śive loke matprasādādbhaviṣyati | vṛṣakhāte naraḥ snātvā pūjayitvā maheśvaram || 40 ||
- उनका निवास, मेरी कृपा से, शिवलोक में होगा। जो मनुष्य वृषखात में स्नान करके महेश्वर की पूजा करता है,
श्लोक 41 (skanda.5.337.41)
सर्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयम् । भृगुतीर्थे नरः स्नात्वा तर्पयेत्पितृदेवताः ॥ ४१ ॥
sarvamedhasya yajñasya phalaṁ prāpnotyasaṁśayam | bhṛgutīrthe naraḥ snātvā tarpayetpitṛdevatāḥ || 41 ||
- वह निःसंदेह सर्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य भृगुतीर्थ में स्नान करके पितृदेवताओं को तर्पण देता है,
श्लोक 42 (skanda.5.337.42)
तस्य ते द्वादशाब्दानि शान्तिं गच्छन्ति तर्पिताः । दधिक्षीरेण तोयेन घृतेन मधुना सह ॥ ४२ ॥
tasya te dvādaśābdāni śāntiṁ gacchanti tarpitāḥ | dadhikṣīreṇa toyena ghṛtena madhunā saha || 42 ||
- उसके पितर तृप्त होकर बारह वर्षों तक शान्ति को प्राप्त करते हैं। जो दही, दूध, जल, घृत तथा मधु से विरूपाक्ष का अभिषेक करते हैं,
श्लोक 43 (skanda.5.337.43)
ये स्नपन्ति विरूपाक्षं तेषां वासस्त्रिविष्टपे । मत्प्रसादाद्द्विजश्रेष्ठ सर्वदेवानुसेवितम् ॥ ४३ ॥
ye snapanti virūpākṣaṁ teṣāṁ vāsastriviṣṭape | matprasādāddvijaśreṣṭha sarvadevānusevitam || 43 ||
- उनका निवास स्वर्ग में होता है। हे द्विजश्रेष्ठ! मेरी कृपा से यह भृगुक्षेत्र समस्त देवताओं द्वारा सेवित होगा,
श्लोक 44 (skanda.5.337.44)
भविष्यति भृगुक्षेत्रं कुरुक्षेत्रादिभिः समम् । मार्तण्डग्रहणे प्राप्ते यवं कृत्वा हिरण्मयम् ॥ ४४ ॥
bhaviṣyati bhṛgukṣetraṁ kurukṣetrādibhiḥ samam | mārtaṇḍagrahaṇe prāpte yavaṁ kṛtvā hiraṇmayam || 44 ||
- तथा कुरुक्षेत्र आदि के समान होगा। सूर्यग्रहण के समय स्वर्ण का जौ बनाकर,
श्लोक 45 (skanda.5.337.45)
दत्त्वा शिरसि यः स्नाति भृगुक्षेत्रे द्विजोत्तम । अविचारेण तं विद्धि संस्नातं कुरुजाङ्गले ॥ ४५ ॥
dattvā śirasi yaḥ snāti bhṛgukṣetre dvijottama | avicāreṇa taṁ viddhi saṁsnātaṁ kurujāṅgale || 45 ||
- सिर पर रखकर जो भृगुक्षेत्र में स्नान करता है, हे द्विजोत्तम! निःसंदेह जान लो कि उसने कुरुजांगल में स्नान करने के समान फल प्राप्त किया है।
श्लोक 46 (skanda.5.337.46)
अहं चैव वसिष्यामि अम्बिका च मम प्रिया । सर्वदुःखापहा देवी नाम्ना सौभाग्यसुन्दरी ॥ ४६ ॥
ahaṁ caiva vasiṣyāmi ambikā ca mama priyā | sarvaduḥkhāpahā devī nāmnā saubhāgyasundarī || 46 ||
मैं स्वयं यहाँ निवास करूँगा, अपनी प्रिया अम्बिका के साथ - सर्वदुःखहर्ता देवी, जो सौभाग्यसुन्दरी नाम से जानी जाती हैं।
श्लोक 47 (skanda.5.337.47)
वसिष्यामि तया देव्या सहितो भृगुकच्छके । एवमुक्त्वा स्थितो देवो भृगुकच्छेऽम्बिका तथा ॥ ४७ ॥
vasiṣyāmi tayā devyā sahito bhṛgukacchake | evamuktvā sthito devo bhṛgukacche'mbikā tathā || 47 ||
मैं उस देवी के साथ भृगुकच्छ में निवास करूँगा।' ऐसा कहकर देव अम्बिका सहित भृगुकच्छ में स्थित हो गए।
श्लोक 48 (skanda.5.337.48)
भृगुस्तु स्वपुरं प्रायाद्ब्रह्मघोषनिनादितम् । ऋग्यजुःसामघोषेण ह्यथर्वणनिनादितम् ॥ ४८ ॥
bhṛgustu svapuraṁ prāyādbrahmaghoṣaninaditam | ṛgyajuḥsāmaghoṣeṇa hyatharvaṇaninaditam || 48 ||
तत्पश्चात् भृगु अपने नगर को गए, जो ब्रह्मघोष से गूँज रहा था, तथा ऋक्, यजुः, साम और अथर्व के घोष से निनादित था।
श्लोक 49 (skanda.5.337.49)
तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा वृषमुत्सृजते नरः । स याति शिवसायुज्यमित्येवं शङ्करोऽब्रवीत् ॥ ४९ ॥
tatra tīrthe tu yaḥ snātvā vṛṣamutsṛjate naraḥ | sa yāti śivasāyujyamityevaṁ śaṅkaro'bravīt || 49 ||
जो उस तीर्थ में स्नान करके वृषोत्सर्ग करता है, वह शिव-सायुज्य को प्राप्त होता है - ऐसा स्वयं शंकर ने कहा है।
श्लोक 50 (skanda.5.337.50)
तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा चैत्रे मासि समाचरेत् । दद्याच्च लवणं विप्रे पूज्य सौभाग्यसुन्दरीम् ॥ ५० ॥
tatra tīrthe tu yaḥ snātvā caitre māsi samācaret | dadyācca lavaṇaṁ vipre pūjya saubhāgyasundarīm || 50 ||
जो उस तीर्थ में चैत्र मास में स्नान करके यह आचरण करता है, ब्राह्मण को नमक का दान देता है, तथा सौभाग्यसुन्दरी की पूजा करता है,
श्लोक 51 (skanda.5.337.51)
गोभूहिरण्यं विप्रेभ्यः प्रीयेतां ललिताशिवौ । न दुःखं दुर्भगत्वं च वियोगं पतिना सह ॥ ५१ ॥
gobhūhiraṇyaṁ viprebhyaḥ prīyetāṁ lalitāśivau | na duḥkhaṁ durbhagatvaṁ ca viyogaṁ patinā saha || 51 ||
- तथा ब्राह्मणों को गौ, भूमि और स्वर्ण का दान देकर ललिता और शिव को प्रसन्न करता है, ऐसी स्त्री को कभी दुःख, दुर्भाग्य अथवा पति से वियोग नहीं होता।
श्लोक 52 (skanda.5.337.52)
प्राप्नोति नारी राजेन्द्र भृगुतीर्थाप्लवेन च । यस्तु नित्यं भृगुं देवं पश्येद्वै पाण्डुनन्दन ॥ ५२ ॥
prāpnoti nārī rājendra bhṛgutīrthāplavena ca | yastu nityaṁ bhṛguṁ devaṁ paśyedvai pāṇḍunandana || 52 ||
हे राजेन्द्र! भृगुतीर्थ में स्नान करने से स्त्री को यह सब प्राप्त होता है। हे पाण्डुनन्दन! जो नित्य भृगुदेव का दर्शन करता है,
श्लोक 53 (skanda.5.337.53)
आ ब्रह्मसदनं यावत्तत्रस्थैर्दैवतैः सह । यत्फलं समवाप्नोति तच्छृणुष्व नृपोत्तम ॥ ५३ ॥
ā brahmasadanaṁ yāvattatrasthairdaivataiḥ saha | yatphalaṁ samavāpnoti tacchṛṇuṣva nṛpottama || 53 ||
- ब्रह्मलोक तक वहाँ के देवताओं सहित, हे नृपोत्तम! उसे जो फल प्राप्त होता है, वह सुनो।
श्लोक 54 (skanda.5.337.54)
सुवर्णशृङ्गीं कपिलां पयस्विनीं साध्वीं सुशीलां तरुणीं सवत्साम् । दत्त्वा द्विजे सर्वव्रतोपपन्ने फलं च यत्स्यात्तदिहैव नूनम् ॥ ५४ ॥
suvarṇaśṛṅgīṁ kapilāṁ payasvinīṁ sādhvīṁ suśīlāṁ taruṇīṁ savatsām | dattvā dvije sarvavratopapanne phalaṁ ca yatsyāttadihaiva nūnam || 54 ||
सुवर्ण-शृंगों वाली, दूध देने वाली, सुशील, तरुण, बछड़े सहित साध्वी कपिला गौ को समस्त व्रतों में निष्णात ब्राह्मण को दान करने से जो फल मिलता है, वही फल यहाँ निश्चय ही प्राप्त होता है।
श्लोक 55 (skanda.5.337.55)
समाः सहस्राणि तु सप्त वै जले म्रियेल्लभेद्द्वादशवह्निमध्ये । त्यजंस्तनुं शूरवृत्त्या नरेन्द्र शक्रातिथ्यं याति वै मर्त्यधर्मा ॥ ५५ ॥
samāḥ sahasrāṇi tu sapta vai jale mriyellabheddvādaśavahnimadhye | tyajaṁstanuṁ śūravṛttyā narendra śakrātithyaṁ yāti vai martyadharmā || 55 ||
वहाँ जल में मरने वाला सात सहस्र वर्षों के तप के फल को प्राप्त करता है, तथा अग्नि में मरने वाला बारह सहस्र वर्षों के फल को। हे नरेन्द्र! जो मरणधर्मा मनुष्य शूरवीरता से शरीर त्यागता है, वह इन्द्र का अतिथि बनता है।
श्लोक 56 (skanda.5.337.56)
आख्यानमेतच्च सदा यशस्यं स्वर्ग्यं धन्यं पुत्र्यमायुष्यकारि । शृण्वंल्लभेत्सर्वमेतद्धि भक्त्या पर्वणि पर्वण्याजमीढस्सदैव ॥ ५६ ॥
ākhyānametacca sadā yaśasyaṁ svargyaṁ dhanyaṁ putryamāyuṣyakāri | śṛṇvanllabhetsarvametaddhi bhaktyā parvaṇi parvaṇyājamīḍhassadaiva || 56 ||
हे आजमीढ़वंशी! यह आख्यान सदा यशदायक, स्वर्गदायक, धन्य, पुत्रदायक तथा आयुवर्धक है; जो प्रत्येक पर्व के दिन इसे भक्तिपूर्वक सुनता है, वह सदैव यह सब कुछ प्राप्त करता है।
श्लोक 57 (skanda.5.337.57)
संन्यासं कुरुते यस्तु भृगुतीर्थे विधानतः । स मृतः परमं स्थानं गच्छेद्वै यच्च दुर्लभम् ॥ ५७ ॥
saṁnyāsaṁ kurute yastu bhṛgutīrthe vidhānataḥ | sa mṛtaḥ paramaṁ sthānaṁ gacchedvai yacca durlabham || 57 ||
जो भृगुतीर्थ में विधिपूर्वक संन्यास ग्रहण करता है, वह मृत्यु पश्चात् उस परम स्थान को प्राप्त होता है, जो अन्यथा अत्यन्त दुर्लभ है।
श्लोक 58 (skanda.5.337.58)
एतच्छ्रुत्वा भृगुश्रेष्ठो देवदेवेन भाषितम् । प्रहृष्टवदनो भूत्वा तत्रैव संस्थितो द्विजः ॥ ५८ ॥
etacchrutvā bhṛguśreṣṭho devadevena bhāṣitam | prahṛṣṭavadano bhūtvā tatraiva saṁsthito dvijaḥ || 58 ||
देवाधिदेव द्वारा कहे गए इस वचन को सुनकर, भृगुश्रेष्ठ अत्यन्त हर्षित मुख वाले होकर वहीं ब्राह्मणरूप में स्थित हो गए।
श्लोक 59 (skanda.5.337.59)
तिरोभावं गते देवे भृगुः श्रेष्ठो द्विजोत्तमः । स्वमूर्ति तत्र मुक्त्वा तु ब्रह्मलोकं जगाम ह ॥ ५९ ॥
tirobhāvaṁ gate deve bhṛguḥ śreṣṭho dvijottamaḥ | svamūrti tatra muktvā tu brahmalokaṁ jagāma ha || 59 ||
देव के अन्तर्धान हो जाने पर, श्रेष्ठ द्विज भृगु ने अपनी मूर्ति वहीं छोड़कर ब्रह्मलोक को गमन किया।
श्लोक 60 (skanda.5.337.60)
भृगुकच्छस्य चोत्पत्तिः कथिता तव पाण्डव । संक्षेपेण महाराज सर्वपापप्रणाशनी ॥ ६० ॥
bhṛgukacchasya cotpattiḥ kathitā tava pāṇḍava | saṅkṣepeṇa mahārāja sarvapāpapraṇāśanī || 60 ||
हे पाण्डव! हे महाराज! भृगुकच्छ की यह उत्पत्ति-कथा तुम्हें संक्षेप में बताई गई, जो समस्त पापों का नाश करने वाली है।
श्लोक 61 (skanda.5.337.61)
एतत्पुण्यं पापहरं क्षेत्रं देवेन कीर्तितम् । चतुर्युगसहस्रेण पितामहदिनं स्मृतम् ॥ ६१ ॥
etatpuṇyaṁ pāpaharaṁ kṣetraṁ devena kīrtitam | caturyugasahasreṇa pitāmahadinaṁ smṛtam || 61 ||
यह पुण्यमय, पापनाशक क्षेत्र स्वयं देव द्वारा कीर्तित है। चार युगों के एक सहस्र चक्र को पितामह ब्रह्मा का एक दिन कहा गया है।
श्लोक 62 (skanda.5.337.62)
प्राप्ते ब्रह्मदिने विप्रा जायते युगसम्भवः । न पश्यामि त्विदं क्षेत्रमिति रुद्रः स्वयं जगौ ॥ ६२ ॥
prāpte brahmadine viprā jāyate yugasambhavaḥ | na paśyāmi tvidaṁ kṣetramiti rudraḥ svayaṁ jagau || 62 ||
हे ब्राह्मणो! ब्रह्मा के दिन के आने पर, युगों के पुनः उत्पन्न होने पर भी - 'मैंने इस क्षेत्र के समान कुछ नहीं देखा' - ऐसा स्वयं रुद्र ने कहा।
श्लोक 63 (skanda.5.337.63)
यः शृणोति त्विदं भक्त्या नारी वा पुरुषोऽपि वा । स याति परमं लोकमिति रुद्रः स्वयं जगौ ॥ ६३ ॥
yaḥ śṛṇoti tvidaṁ bhaktyā nārī vā puruṣo'pi vā | sa yāti paramaṁ lokamiti rudraḥ svayaṁ jagau || 63 ||
जो कोई इसे भक्तिपूर्वक सुनता है, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, वह परम लोक को प्राप्त होता है - ऐसा स्वयं रुद्र ने कहा।
श्लोक 64 (skanda.5.337.64)
देवखाते नरः स्नात्वा पिण्डदानादिसत्क्रियाम् । यां करोति नृपश्रेष्ठ तामक्षयफलां विदुः ॥ ६४ ॥
devakhāte naraḥ snātvā piṇḍadānādisatkriyām | yāṁ karoti nṛpaśreṣṭha tāmakṣayaphalāṁ viduḥ || 64 ||
हे नृपश्रेष्ठ! देवखात में स्नान करके मनुष्य जो पिण्डदान आदि सत्क्रिया करता है, उसे अक्षयफलदायी माना गया है।
श्लोक 65 (skanda.5.337.65)
य इमं शृणुयाद्भक्त्या भृगुकच्छस्य विस्तरम् । कोटितीर्थफलं तस्य भवेद्वै नात्र संशयः ॥ ६५ ॥
ya imaṁ śṛṇuyādbhaktyā bhṛgukacchasya vistaram | koṭitīrthaphalaṁ tasya bhavedvai nātra saṁśayaḥ || 65 ||
जो कोई इस भृगुकच्छ के विस्तृत वर्णन को भक्तिपूर्वक सुनता है, उसे कोटितीर्थ का फल प्राप्त होता है - इसमें कोई सन्देह नहीं।