अवन्ती खण्ड · अध्याय 338
केदारेश्वर तीर्थ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.338.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। अतः परं महाराज गच्छेत्केदारसंज्ञकम् । यत्र गत्वा महाराज श्राद्धं कृत्वा पिबेज्जलम् । सम्पूज्य देवदेवेशं केदारोत्थं फलं लभेत् ॥ १ ॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| ataḥ paraṁ mahārāja gacchetkedārasaṁjñakam | yatra gatvā mahārāja śrāddhaṁ kṛtvā pibejjalam | sampūjya devadeveśaṁ kedārotthaṁ phalaṁ labhet || 1 ||
श्री मार्कण्डेय जी ने कहा - तत्पश्चात्, हे महाराज! केदार नामक स्थान में जाना चाहिए। हे महाराज! वहाँ जाकर श्राद्ध करके जल पीना चाहिए। देवाधिदेव की पूजा करके केदार से उत्पन्न फल प्राप्त होता है।
श्लोक 2 (skanda.5.338.2)
युधिष्ठिर उवाच। कथमत्र सुरश्रेष्ठ केदाराख्यः स्थितः स्वयम् । उत्तरे नर्मदाकूले एतद्विस्तरतो वद ॥ २ ॥
yudhiṣṭhira uvāca| kathamatra suraśreṣṭha kedārākhyaḥ sthitaḥ svayam | uttare narmadākūle etadvistarato vada || 2 ||
युधिष्ठिर ने कहा - 'हे सुरश्रेष्ठ! केदार नामक यह स्वयं नर्मदा के उत्तर तट पर कैसे स्थित हुए? इसे विस्तार से बताइए।'
श्लोक 3 (skanda.5.338.3)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। पुरा कृतयुगस्यादौ शङ्करस्तु महेश्वरः । भृगुणाराधितः शप्तः श्रिया च भृगुकच्छके ॥ ३ ॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| purā kṛtayugasyādau śaṅkarastu maheśvaraḥ | bhṛguṇārādhitaḥ śaptaḥ śriyā ca bhṛgukacchake || 3 ||
श्री मार्कण्डेय जी ने कहा - पूर्वकाल में सत्ययुग के आरम्भ में, शंकर महेश्वर की भृगु द्वारा आराधना की गई, और भृगुकच्छ में श्री द्वारा यह स्थान शापित किया गया था।
श्लोक 4 (skanda.5.338.4)
अपवित्रमिदं क्षेत्रं सर्ववेदविवर्जितम् । भविष्यति नृपश्रेष्ठ गतेत्युक्त्वा हरिप्रिया ॥ ४ ॥
apavitramidaṁ kṣetraṁ sarvavedavivarjitam | bhaviṣyati nṛpaśreṣṭha gatetyuktvā haripriyā || 4 ||
'यह क्षेत्र अपवित्र होकर सम्पूर्ण वेदाचार से रहित हो जाएगा' - हे नृपश्रेष्ठ! ऐसा कहकर हरिप्रिया (लक्ष्मी) चली गईं।
श्लोक 5 (skanda.5.338.5)
तपश्चचार विपुलं भृगुर्वर्षसहस्रकम् । वायुभक्षो निराहारश्चिरं धमनिसंततः ॥ ५ ॥
tapaścacāra vipulaṁ bhṛgurvarṣasahasrakam | vāyubhakṣo nirāhāraścciraṁ dhamanisaṁtataḥ || 5 ||
भृगु ने तब एक सहस्र वर्षों तक विपुल तपस्या की, केवल वायु का आहार करते हुए, निराहार, दीर्घकाल तक शिराओं से भरे शरीर वाले।
श्लोक 6 (skanda.5.338.6)
ततः प्रत्यक्षतामागाल्लिङ्गीभूतो महेश्वरः । प्रादुर्भूतस्तु सहसा भित्त्वा पातालसप्तकम् ॥ ६ ॥
tataḥ pratyakṣatāmāgālliṅgībhūto maheśvaraḥ | prādurbhūtastu sahasā bhittvā pātālasaptakam || 6 ||
तब महेश्वर, लिंगरूप धारण कर, साक्षात् प्रकट हुए - सातों पातालों को भेदते हुए सहसा प्रकट हुए।
श्लोक 7 (skanda.5.338.7)
ददर्शाथ भृगुर्देवमौत्पलीं केलिकामिव । स्तुतिं चक्रे स देवाय स्थाणवे त्र्यम्बकेति च ॥ ७ ॥
dadarśātha bhṛgurdevamautpalīṁ kelikāmiva | stutiṁ cakre sa devāya sthāṇave tryambaketi ca || 7 ||
तब भृगु ने उस देव को देखा, मानो क्रीड़ारत उत्पल के समान; उन्होंने उस देव की 'हे स्थाणु, हे त्र्यम्बक' आदि कहकर स्तुति की।
श्लोक 8 (skanda.5.338.8)
एवं स्तुतः स भगवान् प्रोवाच प्रहसन्निव । पुनः पुनर्भृगुं मत्तः किंतु प्रार्थयसे मुने ॥ ८ ॥
evaṁ stutaḥ sa bhagavān provāca prahasanniva | punaḥ punarbhṛguṁ mattaḥ kiṁtu prārthayase mune || 8 ||
इस प्रकार स्तुत होकर भगवान् मानो मुस्कुराते हुए बोले - 'हे भृगु! तुम मुझसे बार-बार क्या माँगना चाहते हो, हे मुने?'
श्लोक 9 (skanda.5.338.9)
भृगुरुवाच। पञ्चक्रोशमिदं क्षेत्रं पद्मया शापितं विभो । उपवित्रमिदं क्षेत्रं सर्ववेदविवर्जितम् । भविष्यतीति च प्रोच्य गता देवी विदं प्रति ॥ ९ ॥
bhṛguruvāca| pañcakrośamidaṁ kṣetraṁ padmayā śāpitaṁ vibho | upavitramidaṁ kṣetraṁ sarvavedavivarjitam | bhaviṣyatīti ca procya gatā devī vidaṁ prati || 9 ||
भृगु ने कहा - 'हे विभो! इस पंचक्रोश क्षेत्र को पद्मा (लक्ष्मी) ने शापित किया - यह क्षेत्र अपवित्र होकर सम्पूर्ण वेदाचार से रहित हो जाएगा - ऐसा कहकर वह देवी स्वर्गलोक को चली गईं।
श्लोक 10 (skanda.5.338.10)
पुनः पवित्रतां याति यथेदं क्षेत्रमुत्तमम् । तथा कुरु महेशान प्रसन्नो यदि शङ्कर ॥ १० ॥
punaḥ pavitratāṁ yāti yathedaṁ kṣetramuttamam | tathā kuru maheśāna prasanno yadi śaṅkara || 10 ||
हे महेशान! हे शंकर! यदि आप प्रसन्न हैं, तो कुछ ऐसा कीजिए कि यह उत्तम क्षेत्र पुनः पवित्रता को प्राप्त हो जाए।'
श्लोक 11 (skanda.5.338.11)
ईश्वर उवाच। केदाराख्यमिदं ब्रह्मंल्लिङ्गमाद्यं भविष्यति । कृत्वेदमादिलिङ्गानि भविष्यन्ति दशैव हि ॥ ११ ॥
īśvara uvāca| kedārākhyamidaṁ brahmanlliṅgamādyaṁ bhaviṣyati | kṛtvedamādiliṅgāni bhaviṣyanti daśaiva hi || 11 ||
ईश्वर ने कहा - 'हे ब्रह्मन्! केदार नाम का यह लिंग आदि लिंग होगा; इसे आदि बनाकर दस अन्य लिंग भी स्थापित होंगे।
श्लोक 12 (skanda.5.338.12)
एकादशमदृश्यं हि क्षेत्रमध्ये भविष्यति । पावयिष्यति तत्क्षेत्रमेकादशः स्वयं विभुः ॥ १२ ॥
ekādaśamadṛśyaṁ hi kṣetramadhye bhaviṣyati | pāvayiṣyati tatkṣetramekādaśaḥ svayaṁ vibhuḥ || 12 ||
क्षेत्र के मध्य में एक ग्यारहवाँ अदृश्य लिंग होगा; वह ग्यारहवाँ, स्वयं शक्तिशाली, उस सम्पूर्ण क्षेत्र को पवित्र करेगा।
श्लोक 13 (skanda.5.338.13)
तथा वै द्वादशादित्या मत्प्रसादात्तु मूर्तितः । वसिष्यन्ति भृगुक्षेत्रे रोगदुःखनिबर्हणाः ॥ १३ ॥
tathā vai dvādaśādityā matprasādāttu mūrtitaḥ | vasiṣyanti bhṛgukṣetre rogaduḥkhanibarhaṇāḥ || 13 ||
इसी प्रकार बारह आदित्य भी, मेरी कृपा से मूर्तिमान् होकर, भृगुक्षेत्र में निवास करेंगे, जो रोग और दुःख का नाश करने वाले होंगे।
श्लोक 14 (skanda.5.338.14)
दुर्गाः ह्यष्टादश तथा क्षेत्रपालास्तु षोडश । भृगुक्षेत्रे भविष्यन्ति वीरभद्राश्च मातरः ॥ १४ ॥
durgāḥ hyaṣṭādaśa tathā kṣetrapālāstu ṣoḍaśa | bhṛgukṣetre bhaviṣyanti vīrabhadrāśca mātaraḥ || 14 ||
इसी प्रकार अठारह दुर्गारूप, तथा सोलह क्षेत्रपाल, वीरभद्रगण और मातृगण भी भृगुक्षेत्र में स्थापित होंगे।
श्लोक 15 (skanda.5.338.15)
पवित्रीकृतमेतद्धि नित्यं क्षेत्रं भविष्यति । नाघमासे ह्युषःकाले स्नात्वा मासं जितेन्द्रियः ॥ १५ ॥
pavitrīkṛtametaddhi nityaṁ kṣetraṁ bhaviṣyati | nāghamāse hyuṣaḥkāle snātvā māsaṁ jitendriyaḥ || 15 ||
इस प्रकार यह क्षेत्र सदा पवित्र रहेगा। जो जितेन्द्रिय होकर माघ मास में प्रातःकाल स्नान करता हुआ,
श्लोक 16 (skanda.5.338.16)
यः पूजयति केदारं स गच्छेच्छिवमन्दिरम् । तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा पित्ॄनुद्दिश्य भारत । श्राद्धं ददाति विधिवत्तस्य प्रीताः पितामहाः ॥ १६ ॥
yaḥ pūjayati kedāraṁ sa gacchecchivamandiram | tasmiṁstīrthe naraḥ snātvā pitṝnuddiśya bhārata | śrāddhaṁ dadāti vidhivattasya prītāḥ pitāmahāḥ || 16 ||
- केदार की पूजा करता है, वह शिवधाम को जाता है। हे भारत! जो मनुष्य उस तीर्थ में स्नान करके पितरों के उद्देश्य से विधिपूर्वक श्राद्ध करता है, उसके पितर प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 17 (skanda.5.338.17)
इति ते कथितं सम्यक्केदाराख्यं सविस्तरम् । सर्वपापहरं पुण्यं सर्वदुःखप्रणाशनम् ॥ १७ ॥
iti te kathitaṁ samyakkedārākhyaṁ savistaram | sarvapāpaharaṁ puṇyaṁ sarvaduḥkhapraṇāśanam || 17 ||
इस प्रकार तुम्हें केदार की यह कथा सम्यक् रूप से विस्तारपूर्वक बताई गई - यह पुण्यकारी, सर्वपापहर तथा सर्वदुःखनाशक है।