अवन्ती खण्ड · अध्याय 339
धौतपाप तीर्थ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.339.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। धौतपापं ततो गच्छेद्भृगुतीर्थसमीपतः । वृषेण तु भृगुस्तत्र भूयोभूयो धुतस्ततः ॥ १ ॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| dhautapāpaṁ tato gacchedbhṛgutīrthasamīpataḥ | vṛṣeṇa tu bhṛgustatra bhūyobhūyo dhutastataḥ || 1 ||
श्री मार्कण्डेय जी ने कहा - तत्पश्चात् भृगुतीर्थ के समीप धौतपाप में जाना चाहिए, जहाँ भृगु को वृषभ द्वारा बार-बार हिलाया-धकेला गया था।
श्लोक 2 (skanda.5.339.2)
धौतपापं तु तत्तेन नाम्ना लोकेषु विश्रुतम् । तत्र स्थितो महादेवस्तुष्ट्यर्थं भृगुसत्तमे ॥ २ ॥
dhautapāpaṁ tu tattena nāmnā lokeṣu viśrutam | tatra sthito mahādevastuṣṭyarthaṁ bhṛgusattame || 2 ||
उसी नाम से 'धौतपाप' के रूप में यह संसार में विख्यात हुआ। वहाँ महादेव भृगुश्रेष्ठ को प्रसन्न करने के लिए स्थित हुए।
श्लोक 3 (skanda.5.339.3)
तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा शाठ्येनापि नरेश्वर । मुच्यते सर्वपापेभ्यो नात्र कार्या विचारणा ॥ ३ ॥
tatra tīrthe tu yaḥ snātvā śāṭhyenāpi nareśvara | mucyate sarvapāpebhyo nātra kāryā vicāraṇā || 3 ||
हे नरेश्वर! जो उस तीर्थ में छल से भी स्नान करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है - इसमें कोई विचार करने योग्य बात नहीं है।
श्लोक 4 (skanda.5.339.4)
यस्तु सम्यग्विधानेन तत्र स्नात्वार्चयेच्छिवम् । देवान्पितॄन्समभ्यर्च्य मुच्यते सर्वपातकैः ॥ ४ ॥
yastu samyagvidhānena tatra snātvārcayecchivam | devānpitṝnsamabhyarcya mucyate sarvapātakaiḥ || 4 ||
जो वहाँ सम्यक् विधिपूर्वक स्नान करके शिव की पूजा करता है, और देवताओं तथा पितरों का सम्यक् पूजन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 5 (skanda.5.339.5)
ब्रह्महत्या गवां वध्या तत्र तीर्थे युधिष्ठिर । प्रविशेन्न सदा भीता प्रविष्टापि क्षयं व्रजेत् ॥ ५ ॥
brahmahatyā gavāṁ vadhyā tatra tīrthe yudhiṣṭhira | praviśenna sadā bhītā praviṣṭāpi kṣayaṁ vrajet || 5 ||
हे युधिष्ठिर! ब्रह्महत्या और गोहत्या का पाप उस तीर्थ में सदा भयभीत होकर प्रवेश नहीं कर पाता; और यदि प्रवेश भी कर जाए, तो वहीं नष्ट हो जाता है।
श्लोक 6 (skanda.5.339.6)
युधिष्ठिर उवाच। आश्चर्यभूतं लोकेऽस्मिन्कथयस्व द्विजोत्तम । प्रविशेन्न ब्रह्महत्या यथा वै धौतपाप्मनि ॥ ६ ॥
yudhiṣṭhira uvāca| āścaryabhūtaṁ loke'sminkathayasva dvijottama | praviśenna brahmahatyā yathā vai dhautapāpmani || 6 ||
युधिष्ठिर ने कहा - 'हे द्विजोत्तम! इस संसार के इस आश्चर्य को मुझे बताइए - कि ब्रह्महत्या धौतपाप में क्यों प्रवेश नहीं कर पाती।
श्लोक 7 (skanda.5.339.7)
ब्रह्महत्यासमं पापं भविता नेह किंचन । कथं वा धौतपापे तु प्रविष्टं नश्यते द्विज । एतद्विस्तरतः सर्वं पृच्छामि वद कौतुकात् ॥ ७ ॥
brahmahatyāsamaṁ pāpaṁ bhavitā neha kiṁcana | kathaṁ vā dhautapāpe tu praviṣṭaṁ naśyate dvija | etadvistarataḥ sarvaṁ pṛcchāmi vada kautukāt || 7 ||
यहाँ ब्रह्महत्या के समान कोई पाप नहीं है; तो हे द्विज! धौतपाप में प्रवेश करते ही वह कैसे नष्ट हो जाता है? मैं यह सब विस्तार से पूछता हूँ - कौतूहलवश बताइए।'
श्लोक 8 (skanda.5.339.8)
मार्कण्डेय उवाच। आदिसर्गे पुरा शम्भुर्ब्रह्मणः परमेष्ठिनः । विकारं पञ्चमं दृष्ट्वा शिरोऽश्वमुखसन्निभम् ॥ ८ ॥
mārkaṇḍeya uvāca| ādisarge purā śambhurbrahmaṇaḥ parameṣṭhinaḥ | vikāraṁ pañcamaṁ dṛṣṭvā śiro'śvamukhasannibham || 8 ||
मार्कण्डेय जी ने कहा - सृष्टि के आरम्भ में, पूर्वकाल में, शम्भु ने परमेष्ठी ब्रह्मा के विकृत पंचम सिर को देखा, जो अश्वमुख के समान था -
श्लोक 9 (skanda.5.339.9)
अङ्गुष्ठाङ्गुलियोगेन तच्छिरस्तेन कृन्तितम् । कृत्तमात्रे तु शिरसि ब्रह्महत्याऽभवत्तदा ॥ ९ ॥
aṅguṣṭhāṅguliyogena tacchirastena kṛntitam | kṛttamātre tu śirasi brahmahatyā'bhavattadā || 9 ||
- अंगूठे और अंगुली के संयोग से उन्होंने उस सिर को काट डाला। सिर के कटते ही ब्रह्महत्या का पाप उत्पन्न हो गया।
श्लोक 10 (skanda.5.339.10)
ब्रह्महत्यायुतश्चासीदुत्तरे नर्मदातटे । धुनितं तु यतो राजन्वृषेण धर्ममूर्तिना ॥ १० ॥
brahmahatyāyutaścāsīduttare narmadātaṭe | dhunitaṁ tu yato rājanvṛṣeṇa dharmamūrtinā || 10 ||
वे उत्तर नर्मदातट पर ब्रह्महत्या से युक्त हो गए, जहाँ हे राजन्, धर्ममूर्ति वृषभ ने उन्हें उस पाप से मुक्त कराया।
श्लोक 11 (skanda.5.339.11)
तत्र धौतेश्वरीं देवीं स्थापितां वृषभेण तु । ददर्श भगवाञ्छम्भुः सर्वदैवतपूजिताम् ॥ ११ ॥
tatra dhauteśvarīṁ devīṁ sthāpitāṁ vṛṣabhena tu | dadarśa bhagavāñchambhuḥ sarvadaivatapūjitām || 11 ||
वहाँ भगवान् शम्भु ने वृषभ द्वारा स्थापित, सभी देवताओं द्वारा पूजित देवी धौतेश्वरी का दर्शन किया।
श्लोक 12 (skanda.5.339.12)
दृष्ट्वा धौतेश्वरीं दुर्गां ब्रह्महत्याविनाशिनीम् । तत्र विश्रममाणश्च शङ्करस्त्रिपुरान्तकः ॥ १२ ॥
dṛṣṭvā dhauteśvarīṁ durgāṁ brahmahatyāvināśinīm | tatra viśramamāṇaśca śaṅkarastripurāntakaḥ || 12 ||
ब्रह्महत्या का नाश करने वाली दुर्गा-स्वरूपा धौतेश्वरी को देखकर, त्रिपुरान्तक शंकर वहाँ विश्राम करने लगे -
श्लोक 13 (skanda.5.339.13)
स शङ्करो ब्रह्महत्याविहीनं मेने त्मानं तस्य तीर्थस्य भावात् । सुविस्मितो देवदेवो वरेण्यो दृष्ट्वा दूरे ब्रह्महत्यां च तीर्थात् ॥ १३ ॥
sa śaṅkaro brahmahatyāvihīnaṁ mene tmānaṁ tasya tīrthasya bhāvāt | suvismito devadevo vareṇyo dṛṣṭvā dūre brahmahatyāṁ ca tīrthāt || 13 ||
- उन शंकर ने उस तीर्थ के प्रभाव से स्वयं को ब्रह्महत्या से रहित माना; वरेण्य देवाधिदेव अत्यन्त विस्मित हुए, ब्रह्महत्या को उस तीर्थ से दूर रहते देखकर।
श्लोक 14 (skanda.5.339.14)
विधौतपापं महितं धर्मशक्त्या विशेन्न हत्या देवीभयात्प्रभीता । रक्ताम्बरा रक्तमाल्योपयुक्ता कृष्णा नारी रक्तदामप्रसक्ता ॥ १४ ॥
vidhautapāpaṁ mahitaṁ dharmaśaktyā viśenna hatyā devībhayātprabhītā | raktāmbarā raktamālyopayuktā kṛṣṇā nārī raktadāmaprasaktā || 14 ||
धर्मशक्ति से महिमामंडित उस धौतपाप में हत्या (ब्रह्महत्या) देवी के भय से अत्यन्त भयभीत होकर प्रवेश नहीं कर सकी - वह पापरूपिणी रक्तवस्त्रधारिणी, रक्तमाल्यधारिणी, श्यामवर्णा स्त्री रक्त-माला से युक्त थी।
श्लोक 15 (skanda.5.339.15)
मां वाञ्छन्ती स्कन्धदेशं रहस्ये दूरे स्थिता तीर्थवर्यप्रभावात् । संचिन्त्य देवो मनसा स्मरारिर्वासाय बुद्धिं तत्र तीर्थे चकार ॥ १५ ॥
māṁ vāñchantī skandhadeśaṁ rahasye dūre sthitā tīrthavaryaprabhāvāt | saṁcintya devo manasā smarārirvāsāya buddhiṁ tatra tīrthe cakāra || 15 ||
'मैं तुम्हारे स्कन्धदेश का आश्रय चाहती हूँ' - वह इस श्रेष्ठ तीर्थ के प्रभाव से दूर, गुप्त रूप से खड़ी रह गई। मन में इस बात का चिन्तन करके, कामारि देव (शिव) ने वहीं उस तीर्थ में निवास करने का निश्चय किया।
श्लोक 16 (skanda.5.339.16)
विमृश्य देवो बहुशः स्थितः स्वयं विधौतपापः प्रथितः पृथिव्याम् । बभूव तत्रैव निवासकारी विधूतपापनिकटप्रदेशे ॥ १६ ॥
vimṛśya devo bahuśaḥ sthitaḥ svayaṁ vidhautapāpaḥ prathitaḥ pṛthivyām | babhūva tatraiva nivāsakārī vidhūtapāpanikaṭapradeśe || 16 ||
बहुत विचार करके देव स्वयं वहीं स्थित हो गए, तथा स्वयं पृथ्वी पर 'विधौतपाप' के नाम से विख्यात हुए; वे विधूतपाप के निकटवर्ती प्रदेश में स्थायी निवासी बन गए।
श्लोक 17 (skanda.5.339.17)
तदाप्रभृति राजेन्द्र ब्रह्महत्याविनाशनम् । विधौतपापं तत्तीर्थं नर्मदायां व्यवस्थितम् ॥ १७ ॥
tadāprabhṛti rājendra brahmahatyāvināśanam | vidhautapāpaṁ tattīrthaṁ narmadāyāṁ vyavasthitam || 17 ||
तभी से, हे राजेन्द्र! वह विधौतपाप तीर्थ, ब्रह्महत्या का नाशक, नर्मदा में सुस्थापित है।
श्लोक 18 (skanda.5.339.18)
आश्वयुक्शुक्लनवमी तत्र तीर्थे विशिष्यते । दिनत्रयं तु राजेन्द्र सप्तम्यादिविशेषतः ॥ १८ ॥
āśvayukśuklanavamī tatra tīrthe viśiṣyate | dinatrayaṁ tu rājendra saptamyādiviśeṣataḥ || 18 ||
उस तीर्थ में आश्विन शुक्ल नवमी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है; हे राजेन्द्र! सप्तमी से आरम्भ तीन दिन भी विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
श्लोक 19 (skanda.5.339.19)
समुपोष्याष्टमीं भक्त्या साङ्गं वेदं पठेत्तु यः । अहोरात्रेण चैकेन ऋग्यजुःसामसंज्ञकम् ॥ १९ ॥
samupoṣyāṣṭamīṁ bhaktyā sāṅgaṁ vedaṁ paṭhettu yaḥ | ahorātreṇa caikena ṛgyajuḥsāmasaṁjñakam || 19 ||
जो भक्तिपूर्वक अष्टमी को उपवास करके एक ही अहोरात्र में साङ्ग वेद - ऋक्, यजुः और साम - का पाठ करता है,
श्लोक 20 (skanda.5.339.20)
अभ्यसन्ब्रह्महत्याया मुच्यते नात्र संशयः । वृषलीगमनं चैव यश्च गुर्वङ्गनागमः ॥ २० ॥
abhyasanbrahmahatyāyā mucyate nātra saṁśayaḥ | vṛṣalīgamanaṁ caiva yaśca gurvaṅganāgamaḥ || 20 ||
- इस अभ्यास से वह ब्रह्महत्या से मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं। इसी प्रकार वृषली-गमन तथा गुरुपत्नी-गमन का पाप भी -
श्लोक 21 (skanda.5.339.21)
स्नात्वा ब्रह्मरसोत्कृष्टे कुम्भेनैव प्रमुच्यते । वन्ध्या स्त्रीजननी या तु काकवन्ध्या मृतप्रजा ॥ २१ ॥
snātvā brahmarasotkṛṣṭe kumbhenaiva pramucyate | vandhyā strījananī yā tu kākavandhyā mṛtaprajā || 21 ||
- ब्रह्मरस से उत्कृष्ट कुम्भ से स्नान करने पर दूर हो जाता है। बाँझ स्त्री, काकवन्ध्या अथवा जिसकी संतान मर चुकी हो,
श्लोक 22 (skanda.5.339.22)
सापि कुम्भोदकैः स्नाता जीवत्पुत्रा प्रजावती । अपठस्तु नरोपोष्य ऋग्यजुःसामसम्भवाम् ॥ २२ ॥
sāpi kumbhodakaiḥ snātā jīvatputrā prajāvatī | apaṭhastu naropoṣya ṛgyajuḥsāmasambhavām || 22 ||
- ऐसी स्त्री भी उस कुम्भ के जल से स्नान करके जीवित पुत्रों वाली, संतानवती बन जाती है। अनपढ़ मनुष्य उपवास करके ऋक्, यजुः अथवा साम से उत्पन्न -
श्लोक 23 (skanda.5.339.23)
ऋचमेकां जपन्विप्रस्तथा पर्वणि यो नृप । अनृचोपोष्य गायत्रीं जपेद्वै वेदमातरम् ॥ २३ ॥
ṛcamekāṁ japanvipraḥ tathā parvaṇi yo nṛpa | anṛcopoṣya gāyatrīṁ japedvai vedamātaram || 23 ||
- एक ऋचा का, हे राजन्, पर्व के दिन जप कर सकता है। जिसे यह भी न आए, वह उपवास करके वेदमाता गायत्री का जप करे -
श्लोक 24 (skanda.5.339.24)
जपन्नवम्यां विप्रेन्द्रो मुच्यते पापसञ्चयात् । एवं तु कथितं तात पुराणोक्तं महर्षिभिः ॥ २४ ॥
japannavamyāṁ viprendro mucyate pāpasañcayāt | evaṁ tu kathitaṁ tāta purāṇoktaṁ maharṣibhiḥ || 24 ||
- नवमी को उसका जप करने वाला श्रेष्ठ ब्राह्मण संचित पापों से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार, हे तात! महर्षियों द्वारा पुराण में कहा गया यह विवरण तुम्हें बताया गया।
श्लोक 25 (skanda.5.339.25)
धौतपापं महापुण्यं शिवेन कथितं मम । प्राणत्यागं तु यः कुर्याज्जले वाग्नौ स्थलेऽपि वा ॥ २५ ॥
dhautapāpaṁ mahāpuṇyaṁ śivena kathitaṁ mama | prāṇatyāgaṁ tu yaḥ kuryājjale vāgnau sthale'pi vā || 25 ||
यह धौतपाप, महापुण्यकारी, स्वयं शिव द्वारा मुझे बताया गया। जो कोई वहाँ जल में, अग्नि में अथवा स्थल पर भी प्राणत्याग करता है,
श्लोक 26 (skanda.5.339.26)
स गच्छति विमानेन ज्वलनार्कसमप्रभः । हंसबर्हिप्रयुक्तेन सेव्यमानोऽप्सरोगणैः ॥ २६ ॥
sa gacchati vimānena jvalanārkasamaprabhaḥ | haṁsabarhiprayuktena sevyamāno'psarogaṇaiḥ || 26 ||
- वह प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी होकर, हंसों और मयूरों से युक्त विमान में, अप्सराओं द्वारा सेवित होकर गमन करता है।
श्लोक 27 (skanda.5.339.27)
शिवस्य परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् । क्रीडते स्वेच्छया तत्र यावच्चन्द्रार्कतारकम् ॥ २७ ॥
śivasya paramaṁ sthānaṁ yatsurairapi durlabham | krīḍate svecchayā tatra yāvaccandrārkatārakam || 27 ||
वह शिव के परम स्थान को प्राप्त करता है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है; वहाँ वह चन्द्र-सूर्य-तारों के रहने तक स्वेच्छा से क्रीड़ा करता है।
श्लोक 28 (skanda.5.339.28)
धौतपापे तु या नारी कुरुते प्राणसंक्षयम् । तत्क्षणादेव सा पार्थ पुरुषत्वमवाप्नुयात् ॥ २८ ॥
dhautapāpe tu yā nārī kurute prāṇasaṅkṣayam | tatkṣaṇādeva sā pārtha puruṣatvamavāpnuyāt || 28 ||
हे पार्थ! धौतपाप में जो स्त्री प्राणत्याग करती है, वह उसी क्षण पुरुषत्व को प्राप्त कर लेती है।
श्लोक 29 (skanda.5.339.29)
अथ किं बहुनोक्तेन शुभं वा यदि वाशुभम् । तदक्षयफलं सर्वं धौतपापे कृतं नृप ॥ २९ ॥
atha kiṁ bahunoktena śubhaṁ vā yadi vāśubham | tadakṣayaphalaṁ sarvaṁ dhautapāpe kṛtaṁ nṛpa || 29 ||
अब अधिक कहने से क्या लाभ? हे राजन्! धौतपाप में किया गया शुभ अथवा अशुभ - सभी कर्म अक्षय फलदायी होते हैं।
श्लोक 30 (skanda.5.339.30)
संन्यसेन्नियमेनान्नं संन्यसेद्विषयादिकम् । फलमूलादिकं चैव जलमेकं न संत्यजेत् ॥ ३० ॥
saṁnyasenniyamenānnaṁ saṁnyasedviṣayādikam | phalamūlādikaṁ caiva jalamekaṁ na saṁtyajet || 30 ||
नियमपूर्वक अन्न का त्याग करना चाहिए, विषयादि का त्याग करना चाहिए, तथा फल-मूल आदि का भी त्याग करना चाहिए - केवल जल का त्याग नहीं करना चाहिए।
श्लोक 31 (skanda.5.339.31)
एवं यः कुरुते पार्थ रुद्रलोकं स गच्छति । तत्र भुक्त्वाखिलान्भोगाञ्जायते भुवि भूपतिः ॥ ३१ ॥
evaṁ yaḥ kurute pārtha rudralokaṁ sa gacchati | tatra bhuktvākhilānbhogāñjāyate bhuvi bhūpatiḥ || 31 ||
हे पार्थ! जो कोई इस प्रकार आचरण करता है, वह रुद्रलोक को जाता है; वहाँ समस्त भोगों को भोगकर वह पृथ्वी पर राजा बनकर जन्म लेता है।