अवन्ती खण्ड · अध्याय 340
एरण्डी तीर्थ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.340.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महीपाल एरण्डीतीर्थमुत्तमम् । स्नानमात्रेण तत्रैव ब्रह्महत्या प्रणश्यति ॥ १ ॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahīpāla eraṇḍītīrthamuttamam | snānamātreṇa tatraiva brahmahatyā praṇaśyati || 1 ||
श्री मार्कण्डेय जी ने कहा - तत्पश्चात्, हे महीपाल! उत्तम एरण्डी तीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ केवल स्नान मात्र से ब्रह्महत्या का पाप नष्ट हो जाता है।
श्लोक 2 (skanda.5.340.2)
मासि चाश्वयुजे तत्र शुक्लपक्षे चतुर्दशीम् । उपोष्य प्रयतः स्नातस्तर्पयेत्पितृदेवताः ॥ २ ॥
māsi cāśvayuje tatra śuklapakṣe caturdaśīm | upoṣya prayataḥ snātastarpayetpitṛdevatāḥ || 2 ||
आश्विन मास में, शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को, वहाँ उपवास करके, पवित्र होकर स्नान करके पितृदेवताओं को तर्पण देना चाहिए।
श्लोक 3 (skanda.5.340.3)
पुत्रर्द्धिरूपसम्पन्नो जीवेच्च शरदां शतम् । शिवलोकं मृतो याति नात्र कार्या विचारणा ॥ ३ ॥
putrarddhirūpasampanno jīvecca śaradāṁ śatam | śivalokaṁ mṛto yāti nātra kāryā vicāraṇā || 3 ||
पुत्र, समृद्धि और सौन्दर्य से सम्पन्न होकर मनुष्य सौ शरद ऋतुओं तक जीवित रहता है; और मृत्यु के पश्चात् शिवलोक को जाता है - इसमें कोई विचार करने योग्य बात नहीं है।