अवन्ती खण्ड · अध्याय 341
कनखलेश्वर तीर्थ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.341.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महीपाल तीर्थं कनखलोत्तमम् । गरुडेन तपस्तप्तं पूजयित्वा महेश्वरम् ॥ १ ॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahīpāla tīrthaṁ kanakhalottamam | garuḍena tapastaptaṁ pūjayitvā maheśvaram || 1 ||
श्री मार्कण्डेय जी ने कहा - तत्पश्चात्, हे महीपाल! उत्तम कनखल तीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ गरुड़ ने महेश्वर की पूजा करते हुए तपस्या की थी।
श्लोक 2 (skanda.5.341.2)
दिव्यं वर्षशतं यावज्जातमात्रेण भारत । तपोजपैः कृशीभूतो दृष्टो देवेन शम्भुना ॥ २ ॥
divyaṁ varṣaśataṁ yāvajjātamātreṇa bhārata | tapojapaiḥ kṛśībhūto dṛṣṭo devena śambhunā || 2 ||
हे भारत! जन्म लेते ही सौ दिव्य वर्षों तक तप-जप से क्षीणकाय हुए गरुड़ को देव शम्भु ने देखा।
श्लोक 3 (skanda.5.341.3)
ततस्तुष्टो महादेवो वैनतेयं मनोजवम् । उवाच परमं वाक्यं विनतानन्दवर्धनम् ॥ ३ ॥
tatastuṣṭo mahādevo vainateyaṁ manojavam | uvāca paramaṁ vākyaṁ vinatānandavardhanam || 3 ||
तब महादेव प्रसन्न होकर, मन के समान वेगवान् वैनतेय (गरुड़) से यह परम वचन कहा, जो विनता के आनन्द को बढ़ाने वाला था -
श्लोक 4 (skanda.5.341.4)
प्रसन्नस्ते महाभाग वरं वरय सुव्रत । दुर्लभं त्रिषु लोकेषु ददामि तव खेचर ॥ ४ ॥
prasannaste mahābhāga varaṁ varaya suvrata | durlabhaṁ triṣu lokeṣu dadāmi tava khecara || 4 ||
'हे महाभाग! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; हे सुव्रत! कोई वर माँगो। हे खेचर! मैं तुम्हें तीनों लोकों में दुर्लभ वस्तु प्रदान करूँगा।'
श्लोक 5 (skanda.5.341.5)
गरुड उवाच। इच्छामि वाहनं विष्णोर्द्विजेन्द्रत्वं सुरेश्वर । प्रसन्ने त्वयि मे सर्वं भवत्विति मतिर्मम ॥ ५ ॥
garuḍa uvāca| icchāmi vāhanaṁ viṣṇordvijendratvaṁ sureśvara | prasanne tvayi me sarvaṁ bhavatviti matirmama || 5 ||
गरुड़ ने कहा - 'हे सुरेश्वर! मैं विष्णु का वाहन बनना चाहता हूँ, तथा पक्षियों का राजा बनना चाहता हूँ। आपके प्रसन्न होने पर मेरा यह सब पूर्ण हो - यही मेरी इच्छा है।'
श्लोक 6 (skanda.5.341.6)
श्रीमहेश उवाच। दुर्लभः प्राणिनां तात यो वरः प्रार्थितोऽनघ । देवदेवस्य वाहनं द्विजेन्द्रत्वं सुदुर्लभम् ॥ ६ ॥
śrīmaheśa uvāca| durlabhaḥ prāṇināṁ tāta yo varaḥ prārthito'nagha | devadevasya vāhanaṁ dvijendratvaṁ sudurlabham || 6 ||
श्री महेश ने कहा - 'हे अनघ तात! तुमने जो वर माँगा है, वह प्राणियों के लिए दुर्लभ है - देवाधिदेव का वाहन बनना तथा द्विजेन्द्रत्व अत्यन्त दुर्लभ है।
श्लोक 7 (skanda.5.341.7)
नारायणोदरे सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् । त्वया स कथमूह्येत देवदेवो जगद्गुरुः ॥ ७ ॥
nārāyaṇodare sarvaṁ trailokyaṁ sacarācaram | tvayā sa kathamūhyeta devadevo jagadguruḥ || 7 ||
नारायण के उदर में सचराचर सम्पूर्ण त्रैलोक्य समाया हुआ है - तो तुम उस देवाधिदेव, जगद्गुरु को कैसे धारण कर पाओगे?
श्लोक 8 (skanda.5.341.8)
तेनैव स्थापितश्चेन्द्रस्त्रैलोक्ये सचराचरे । कथमन्यस्य चेन्द्रत्वं भवतीति सुदुर्लभम् ॥ ८ ॥
tenaiva sthāpitaścendrastrailokye sacarācare | kathamanyasya cendratvaṁ bhavatīti sudurlabham || 8 ||
उन्हीं के द्वारा इन्द्र सचराचर त्रैलोक्य पर स्थापित हैं - तो किसी दूसरे को इन्द्रत्व कैसे प्राप्त हो सकता है? यह अत्यन्त दुर्लभ है।
श्लोक 9 (skanda.5.341.9)
तथापि मम वाक्येन वाहनं त्वं भविष्यसि । शङ्खचक्रगदापाणेर्वहतोऽपि जगत्त्रयम् ॥ ९ ॥
tathāpi mama vākyena vāhanaṁ tvaṁ bhaviṣyasi | śaṅkhacakragadāpāṇervahato'pi jagattrayam || 9 ||
फिर भी मेरे वचन से तुम उस शंख-चक्र-गदाधारी के वाहन बनोगे, यद्यपि वे स्वयं तीनों लोकों को धारण करते हैं।
श्लोक 10 (skanda.5.341.10)
इन्द्रस्त्वं पक्षिणां मध्ये भविष्यसि न संशयः । इति दत्त्वा वरं तस्मा अन्तर्धानं गतो हरः ॥ १० ॥
indrastvaṁ pakṣiṇāṁ madhye bhaviṣyasi na saṁśayaḥ | iti dattvā varaṁ tasmā antardhānaṁ gato haraḥ || 10 ||
और तुम निश्चय ही पक्षियों में इन्द्र बनोगे।' उसे यह वर देकर हर अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 11 (skanda.5.341.11)
ततो गते महादेवे ह्युरुणस्यानुजो नृप । आराधयामास तदा चामुण्डां मुण्डमण्डिताम् ॥ ११ ॥
tato gate mahādeve hyaruṇasyānujo nṛpa | ārādhayāmāsa tadā cāmuṇḍāṁ muṇḍamaṇḍitām || 11 ||
हे राजन्! महादेव के चले जाने पर, तब अरुण के अनुज (गरुड़) ने मुण्डमालाधारिणी देवी चामुण्डा की आराधना की।
श्लोक 12 (skanda.5.341.12)
श्मशानवासिनीं देवीं बहुभूतसमन्विताम् । योगिनीं योगसंसिद्धां वसामांसासवप्रियाम् ॥ १२ ॥
śmaśānavāsinīṁ devīṁ bahubhūtasamanvitām | yoginīṁ yogasaṁsiddhāṁ vasāmāṁsāsavapriyām || 12 ||
- जो श्मशानवासिनी, अनेक भूतगणों से युक्त, योगसिद्ध योगिनी, तथा वसा-मांस-मदिरा प्रिय देवी हैं।
श्लोक 13 (skanda.5.341.13)
ध्यातमात्रा तु तेनैव प्रत्यक्षा ह्यभवत्तदा । जालंधरे च या सिद्धिः कौलीने उड्डिशे परे ॥ १३ ॥
dhyātamātrā tu tenaiva pratyakṣā hyabhavattadā | jālaṁdhare ca yā siddhiḥ kaulīne uḍḍiśe pare || 13 ||
उनका ध्यान करते ही वे तत्काल साक्षात् प्रकट हो गईं। जालंधर में, कौलीन में तथा परम उड्डिश में जो सिद्धि है,
श्लोक 14 (skanda.5.341.14)
समग्रा सा भृगुक्षेत्रे सिद्धक्षेत्रे तु संस्थिता । चामुण्डा तत्र सा देवी सिद्धक्षेत्रे व्यवस्थिता ॥ १४ ॥
samagrā sā bhṛgukṣetre siddhakṣetre tu saṁsthitā | cāmuṇḍā tatra sā devī siddhakṣetre vyavasthitā || 14 ||
- वह सम्पूर्ण सिद्धि भृगुक्षेत्र में, इस सिद्धक्षेत्र में, संस्थित है। वहाँ देवी चामुण्डा उस सिद्धक्षेत्र में स्थापित हैं।
श्लोक 15 (skanda.5.341.15)
संस्तुता ऋषिभिर्देवैर्योगक्षेमार्थसिद्धये । विनतानन्दजननस्तत्र तां योगिनीं नृप । भक्त्या प्रसादयामास स्तोत्रैर्वैदिकलौकिकैः ॥ १५ ॥
saṁstutā ṛṣibhirdevairyogakṣemārthasiddhaye | vinatānandajananastatra tāṁ yoginīṁ nṛpa | bhaktyā prasādayāmāsa stotrairvaidikalaukikaiḥ || 15 ||
योग-क्षेम की सिद्धि हेतु ऋषियों और देवताओं द्वारा संस्तुत, हे राजन्! विनतानन्दजनक (गरुड़) ने वहाँ भक्तिपूर्वक वैदिक और लौकिक स्तोत्रों द्वारा उस योगिनी को प्रसन्न किया।
श्लोक 16 (skanda.5.341.16)
गरुड उवाच। ओं या सा क्षुत्क्षामकण्ठा नवरुधिरमुखा प्रेतपद्मासनस्था भूतानां वृन्दवृन्दैः पितृवननिलया क्रीडते शूलहस्ता । शस्त्रध्वस्तप्रवीरव्रजरुधिरगलन्मुण्डमालोत्तरीया देवी श्रीवीरमाता विमलशशिनिभा पातु वश्चर्ममुण्डा ॥ १६ ॥
garuḍa uvāca| oṁ yā sā kṣutkṣāmakaṇṭhā navarudhiramukhā pretapadmāsanasthā bhūtānāṁ vṛndavṛndaiḥ pitṛvananilayā krīḍate śūlahastā | śastradhvastapravīravrajarudhiragalanmuṇḍamālottarīyā devī śrīvīramātā vimalaśaśinibhā pātu vaścarmamuṇḍā || 16 ||
गरुड़ ने कहा - ॐ - जो क्षुधा से क्षीण कण्ठ वाली, ताजे रक्त से युक्त मुख वाली, प्रेतों के कमलासन पर विराजमान, भूतगणों के समूहों सहित पितृवन में निवास करने वाली, त्रिशूल हाथ में लिए क्रीड़ा करने वाली हैं; शस्त्रों से ध्वस्त महावीरों के रक्त से टपकते मुण्डमाला रूपी उत्तरीय धारण करने वाली, वीरों की माता, निर्मल चन्द्रमा के समान तेजस्वी देवी चर्ममुण्डा तुम सबकी रक्षा करें।
श्लोक 17 (skanda.5.341.17)
या सा क्षुत्क्षामकण्ठा विकृतभयकरी त्रासिनी दुष्कृतानां मुञ्चज्ज्वालाकलापैर्दशनकसमसैः खादति प्रेतमांसम् । या सा दोर्दण्डचण्डैर्डमरुरणरणाटोपटंकारघण्टैः कल्पान्तोत्पातवाताहतपटुपटहैर्वल्गते भूतमाता । क्षुत्क्षामा शुष्ककुक्षिः खवरतरनरवरैः क्षोदति प्रेतमांसं मुञ्चन्ती चाट्टहासं घुरघुरितरवा पातु वश्चर्ममुण्डा ॥ १७ ॥
yā sā kṣutkṣāmakaṇṭhā vikṛtabhayakarī trāsinī duṣkṛtānāṁ muñcajjvālākalāpairdaśanakasamasaiḥ khādati pretamāṁsam | yā sā dordaṇḍacaṇḍairḍamarurananāṭopaṭaṅkāraghaṇṭaiḥ kalpāntotpātavātāhatapaṭupaṭahairvalgate bhūtamātā | kṣutkṣāmā śuṣkakukṣiḥ khavarataranaravaraiḥ kṣodati pretamāṁsaṁ muñcantī cāṭṭahāsaṁ ghuraghuritaravā pātu vaścarmamuṇḍā || 17 ||
जो क्षुधा से क्षीण कण्ठ वाली, विकृत तथा भयंकर, दुष्टों को त्रस्त करने वाली, ज्वालाओं-सी चमकती दंतपंक्ति से प्रेत-मांस को चबाती हैं; जो भूतमाता अपनी प्रचण्ड भुजाओं में डमरू की झंकार, घण्टों की टंकार तथा प्रलयकाल के तूफानी झोंकों-सी बजती दुन्दुभियों के साथ नृत्य करती हैं; क्षुधा से क्षीण, खोखले उदर वाली, तीक्ष्ण दाँतों से प्रेत-मांस को पीसती हुई, महाहास्य करती हुई, गड़गड़ाती हुई गर्जना करने वाली देवी चर्ममुण्डा तुम सबकी रक्षा करें।
श्लोक 18 (skanda.5.341.18)
या सा निम्नोदराभा विकृतभवभयत्रासिनी शूलहस्ता चामुण्डा मुण्डघाता रणरणितरणझल्लरीनादरम्या । त्रैलोक्यं त्रासयन्ति ककहकहकहैर्घोररावैरनेकैर्नृत्यन्ती मातृमध्ये पितृवननिलया पातु वश्चर्ममुण्डा ॥ १८ ॥
yā sā nimnodarābhā vikṛtabhavabhayatrāsinī śūlahastā cāmuṇḍā muṇḍaghātā raṇaraṇitaraṇajhallarīnādaramyā | trailokyaṁ trāsayanti kakahakahakahairghorarāvairanekairnṛtyantī mātṛmadhye pitṛvananilayā pātu vaścarmamuṇḍā || 18 ||
जो धँसे हुए उदर वाली, संसार के विकृत भय से त्रस्त करने वाली, त्रिशूलधारिणी, मुण्ड का वध करने वाली चामुण्डा, रणभेरी की गूँज से सुशोभित हैं; जो अनेक भयंकर कक-हक-हक ध्वनियों से त्रैलोक्य को त्रस्त करती हुई, मातृगणों के मध्य नृत्य करती हुई, पितृवन में निवास करती हैं - देवी चर्ममुण्डा तुम सबकी रक्षा करें।
श्लोक 19 (skanda.5.341.19)
या धत्ते विश्वमखिलं निजांशेन महोज्ज्वला । कनकप्रसवे लीना पातु मां कनकेश्वरी ॥ १९ ॥
yā dhatte viśvamakhilaṁ nijāṁśena mahojjvalā | kanakaprasave līnā pātu māṁ kanakeśvarī || 19 ||
जो महातेजस्विनी अपने ही अंश से सम्पूर्ण विश्व को धारण करती हैं, स्वर्णिम उद्गम-स्थान में लीन - देवी कनकेश्वरी मेरी रक्षा करें।
श्लोक 20 (skanda.5.341.20)
हिमाद्रिसम्भवा देवी दयादर्शितविग्रहा । शिवप्रिया शिवे सक्ता पातु मां कनकेश्वरी ॥ २० ॥
himādrisambhavā devī dayādarśitavigrahā | śivapriyā śive saktā pātu māṁ kanakeśvarī || 20 ||
हिमाचल से उत्पन्न देवी, जिनका विग्रह ही दया को दर्शाता है, शिवप्रिया, शिव में अनुरक्त - देवी कनकेश्वरी मेरी रक्षा करें।
श्लोक 21 (skanda.5.341.21)
अनादिजगदादिर्या रत्नगर्भा वसुप्रिया । रथाङ्गपाणिना पद्मा पातु मां कनकेश्वरी ॥ २१ ॥
anādijagadādiryā ratnagarbhā vasupriyā | rathāṅgapāṇinā padmā pātu māṁ kanakeśvarī || 21 ||
जो अनादि जगत् की आदि हैं, रत्नगर्भा, धनप्रिया, रथाङ्गपाणि (विष्णु) की पद्मा (लक्ष्मी) - देवी कनकेश्वरी मेरी रक्षा करें।
श्लोक 22 (skanda.5.341.22)
सावित्री या च गायत्री मृडानी वागथेन्दिरा । स्मर्तॄणां या सुखं दत्ते पातु मां कनकेश्वरी ॥ २२ ॥
sāvitrī yā ca gāyatrī mṛḍānī vāgathendirā | smartṝṇāṁ yā sukhaṁ datte pātu māṁ kanakeśvarī || 22 ||
जो सावित्री, गायत्री, मृडानी, वाणी तथा इन्दिरा हैं, जो अपना स्मरण करने वालों को सुख प्रदान करती हैं - देवी कनकेश्वरी मेरी रक्षा करें।
श्लोक 23 (skanda.5.341.23)
सौम्यासौम्यैः सदा रूपैः सृजत्यवति या जगत् । परा शक्तिः परा बुद्धिः पातु मां कनकेश्वरी ॥ २३ ॥
saumyāsaumyaiḥ sadā rūpaiḥ sṛjatyavati yā jagat | parā śaktiḥ parā buddhiḥ pātu māṁ kanakeśvarī || 23 ||
जो अपने सदा सौम्य और असौम्य रूपों से जगत् की सृष्टि और रक्षा करती हैं, परा शक्ति, परा बुद्धि - देवी कनकेश्वरी मेरी रक्षा करें।
श्लोक 24 (skanda.5.341.24)
ब्रह्मणः सर्गसमये सृज्यशक्तिः परा तु या । जगन्माया जगद्धात्री पातु मां कनकेश्वरी ॥ २४ ॥
brahmaṇaḥ sargasamaye sṛjyaśaktiḥ parā tu yā | jaganmāyā jagaddhātrī pātu māṁ kanakeśvarī || 24 ||
जो सृष्टिकाल में ब्रह्मा की परम सृजनशक्ति हैं, जगन्माया, जगद्धात्री - देवी कनकेश्वरी मेरी रक्षा करें।
श्लोक 25 (skanda.5.341.25)
विश्वस्य पालने विष्णोर्या शक्तिः परिपालिका । मदनोन्मादिनी मुख्या पातु मां कनकेश्वरी ॥ २५ ॥
viśvasya pālane viṣṇoryā śaktiḥ paripālikā | madanonmādinī mukhyā pātu māṁ kanakeśvarī || 25 ||
जो विश्व के पालन में विष्णु की परिपालिका शक्ति हैं, मुख्य मदोन्मादिनी - देवी कनकेश्वरी मेरी रक्षा करें।
श्लोक 26 (skanda.5.341.26)
विश्वसंलयने मुख्या या रुद्रेण समाश्रिता । रौद्री शक्तिः शिवानन्ता पातु मां कनकेश्वरी ॥ २६ ॥
viśvasaṁlayane mukhyā yā rudreṇa samāśritā | raudrī śaktiḥ śivānantā pātu māṁ kanakeśvarī || 26 ||
जो विश्व के संहार में प्रमुख, रुद्र द्वारा आश्रित रौद्री शक्ति हैं, शिवानन्ता - देवी कनकेश्वरी मेरी रक्षा करें।
श्लोक 27 (skanda.5.341.27)
कैलाससानुसंरूढ कनकप्रसवेशया । भस्मकाभिहृता पूर्वं पातु मां कनकेश्वरी ॥ २७ ॥
kailāsasānusaṁrūḍha kanakaprasaveśayā | bhasmakābhihṛtā pūrvaṁ pātu māṁ kanakeśvarī || 27 ||
कैलास शिखर पर आरूढ़, स्वर्णोद्गम की स्वामिनी, जो पूर्वकाल में भस्म के मध्य ले जाई गई थीं - देवी कनकेश्वरी मेरी रक्षा करें।
श्लोक 28 (skanda.5.341.28)
पतिप्रभावमिच्छन्ती त्रस्यन्ती या विना पतिम् । अबला त्वेकभावा च पातु मां कनकेश्वरी ॥ २८ ॥
patiprabhāvamicchantī trasyantī yā vinā patim | abalā tvekabhāvā ca pātu māṁ kanakeśvarī || 28 ||
जो अपने पति के प्रभाव की कामना करती हैं, पति के बिना व्याकुल हो उठती हैं, अबला होते हुए भी एकनिष्ठ भाव वाली हैं - देवी कनकेश्वरी मेरी रक्षा करें।
श्लोक 29 (skanda.5.341.29)
विश्वसंरक्षणे सक्ता रक्षिता कनकेन या । आ ब्रह्मस्तम्बजननी पातु मां कनकेश्वरी ॥ २९ ॥
viśvasaṁrakṣaṇe saktā rakṣitā kanakena yā | ā brahmastambajananī pātu māṁ kanakeśvarī || 29 ||
जो विश्व की रक्षा में तत्पर हैं, स्वयं स्वर्ण द्वारा रक्षित हैं, ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त समस्त प्राणियों की जननी हैं - देवी कनकेश्वरी मेरी रक्षा करें।
श्लोक 30 (skanda.5.341.30)
ब्रह्मविष्ण्वीश्वराः शक्त्या शरीरग्रहणं यया । प्रापिताः प्रथमा शक्तिः पातु मां कनकेश्वरी ॥ ३० ॥
brahmaviṣṇvīśvarāḥ śaktyā śarīragrahaṇaṁ yayā | prāpitāḥ prathamā śaktiḥ pātu māṁ kanakeśvarī || 30 ||
जिनकी शक्ति से ब्रह्मा, विष्णु और ईश्वर ने शरीर धारण किया, वह प्रथमा शक्ति - देवी कनकेश्वरी मेरी रक्षा करें।
श्लोक 31 (skanda.5.341.31)
श्रुत्वा तु गरुडेनोक्तं देवीवृत्तचतुष्टयम् । प्रसन्ना संमुखी भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह ॥ ३१ ॥
śrutvā tu garuḍenoktaṁ devīvṛttacatuṣṭayam | prasannā saṁmukhī bhūtvā vākyametaduvāca ha || 31 ||
गरुड़ द्वारा कहे गए देवी के इस चतुर्विध स्तोत्र को सुनकर, वे प्रसन्न होकर उसके सम्मुख प्रकट हुईं और यह वचन बोलीं -
श्लोक 32 (skanda.5.341.32)
श्रीचामुण्डोवाच। प्रसन्ना ते महासत्त्व वरं वरय वाञ्छितम् । ददामि ते द्विजश्रेष्ठ यत्ते मनसि रोचते ॥ ३२ ॥
śrīcāmuṇḍovāca| prasannā te mahāsattva varaṁ varaya vāñchitam | dadāmi te dvijaśreṣṭha yatte manasi rocate || 32 ||
श्री चामुण्डा ने कहा - 'हे महासत्त्व! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; इच्छित वर माँगो। हे द्विजश्रेष्ठ! जो तुम्हारे मन को भाए, वह मैं तुम्हें दूँगी।'
श्लोक 33 (skanda.5.341.33)
गरुड उवाच। अजरश्चामरश्चैव अधृष्यश्च सुरासुरैः । तव प्रसादाच्चैवान्यैरजेयश्च भवाम्यहम् ॥ ३३ ॥
garuḍa uvāca| ajaraścāmaraścaiva adhṛṣyaśca surāsuraiḥ | tava prasādāccaivānyairajeyaśca bhavāmyaham || 33 ||
गरुड़ ने कहा - 'आपकी कृपा से मैं अजर, अमर, देवताओं और असुरों के लिए भी अजेय, तथा अन्य किसी के लिए भी अपराजेय बन जाऊँ।
श्लोक 34 (skanda.5.341.34)
त्वया चात्र सदा देवि स्थातव्यं तीर्थसन्निधौ । मार्कण्डेय उवाच। एवं भविष्यतीत्युक्त्वा देवी देवैरभिष्टुता ॥ ३४ ॥
tvayā cātra sadā devi sthātavyaṁ tīrthasannidhau | mārkaṇḍeya uvāca| evaṁ bhaviṣyatītyuktvā devī devairabhiṣṭutā || 34 ||
और हे देवि! आप सदा इसी तीर्थ के समीप विराजमान रहें।' मार्कण्डेय जी ने कहा - 'ऐसा ही होगा' कहकर, देवताओं द्वारा स्तुत वह देवी,
श्लोक 35 (skanda.5.341.35)
जगामाकाशमाविश्य भूतसङ्घसमन्विता । यदा लक्ष्म्या नृपश्रेष्ठ स्थापितं पुरमुत्तमम् ॥ ३५ ॥
jagāmākāśamāviśya bhūtasaṅghasamanvitā | yadā lakṣmyā nṛpaśreṣṭha sthāpitaṁ puramuttamam || 35 ||
- आकाश में प्रवेश करके भूतगणों सहित चली गईं। हे नृपश्रेष्ठ! जब लक्ष्मी द्वारा वह उत्तम नगर स्थापित किया गया,
श्लोक 36 (skanda.5.341.36)
अनुमान्य तदा देवीं कृतं तस्यां समर्पितम् । लक्ष्मीरुवाच। रक्षणाय मया देवि योगक्षेमार्थसिद्धये ॥ ३६ ॥
anumānya tadā devīṁ kṛtaṁ tasyāṁ samarpitam | lakṣmīruvāca| rakṣaṇāya mayā devi yogakṣemārthasiddhaye || 36 ||
तब देवी की सम्मति प्राप्त करके वह नगर उन्हीं को समर्पित कर दिया गया। लक्ष्मी ने कहा - 'हे देवि! इसकी रक्षा के लिए तथा योगक्षेम की सिद्धि हेतु -
श्लोक 37 (skanda.5.341.37)
मातृवत्प्रतिपाल्यं ते सदा देवि पुरं मम । गरुडोऽपि ततः स्नात्वा सम्पूज्य कनकेश्वरीम् ॥ ३७ ॥
mātṛvatpratipālyaṁ te sadā devi puraṁ mama | garuḍo'pi tataḥ snātvā sampūjya kanakeśvarīm || 37 ||
- हे देवि! आप सदा माता के समान मेरे इस नगर का पालन करें।' तत्पश्चात् गरुड़ ने भी वहाँ स्नान करके कनकेश्वरी की पूजा की,
श्लोक 38 (skanda.5.341.38)
तीर्थं तत्रैव संस्थाप्य जगामाकाशमुत्तमम् । तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत्पितृदेवताः ॥ ३८ ॥
tīrthaṁ tatraiva saṁsthāpya jagāmākāśamuttamam | tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayetpitṛdevatāḥ || 38 ||
और वहीं तीर्थ की स्थापना करके वह उत्तम आकाश में चला गया। जो उस तीर्थ में स्नान करके पितृदेवताओं की पूजा करता है,
श्लोक 39 (skanda.5.341.39)
सर्वकामसमृद्धस्य यज्ञस्य फलमश्नुते । गन्धपुष्पादिभिर्यस्तु पूजयेत्कनकेश्वरम् ॥ ३९ ॥
sarvakāmasamṛddhasya yajñasya phalamaśnute | gandhapuṣpādibhiryastu pūjayetkanakeśvaram || 39 ||
वह समस्त कामनाओं से समृद्ध यज्ञ का फल प्राप्त करता है। जो गन्ध-पुष्प आदि से कनकेश्वर की पूजा करता है,
श्लोक 40 (skanda.5.341.40)
तस्य योगैश्वर्यसिद्धिर्योगपीठेषु जायते । मृतो योगेश्वरं लोकं जयशब्दादिमङ्गलैः । स गच्छेन्नात्र सन्देहो योगिनीगणसंयुतः ॥ ४० ॥
tasya yogaiśvaryasiddhiryogapīṭheṣu jāyate | mṛto yogeśvaraṁ lokaṁ jayaśabdādimaṅgalaiḥ | sa gacchennātra sandeho yoginīgaṇasaṁyutaḥ || 40 ||
उसे योगपीठों में योगैश्वर्य की सिद्धि प्राप्त होती है। मृत्यु के पश्चात् वह जयघोष आदि मंगल ध्वनियों के साथ, योगिनीगणों से युक्त होकर योगेश्वर-लोक को जाता है - इसमें कोई संदेह नहीं।