अवन्ती खण्ड · अध्याय 342
कालाग्निरुद्र तीर्थ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.342.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। जालेश्वरं ततो गच्छेल्लिङ्गमाद्यं स्वयम्भुवः । कालाग्निरुद्रं विख्यातं भृगुकच्छे व्यवस्थितम् ॥ १ ॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| jāleśvaraṁ tato gacchelliṅgamādyaṁ svayambhuvaḥ | kālāgnirudraṁ vikhyātaṁ bhṛgukacche vyavasthitam || 1 ||
श्री मार्कण्डेय जी ने कहा - तत्पश्चात् जालेश्वर में जाना चाहिए, जो स्वयम्भू का आदि लिंग है, कालाग्निरुद्र नाम से विख्यात, भृगुकच्छ में स्थित।
श्लोक 2 (skanda.5.342.2)
सर्वपापप्रशमनं सर्वोपद्रवनाशनम् । क्षेत्रपापविनाशाय कृपया च समुत्थितम् ॥ २ ॥
sarvapāpapraśamanaṁ sarvopadravanāśanam | kṣetrapāpavināśāya kṛpayā ca samutthitam || 2 ||
यह समस्त पापों को शान्त करने वाला, समस्त उपद्रवों का नाशक है, जो क्षेत्र के पाप को नष्ट करने के लिए कृपापूर्वक उत्पन्न हुआ।
श्लोक 3 (skanda.5.342.3)
पुरा कल्पेऽसुरगणैराक्रान्ते भुवनत्रये । वेदोक्तकर्मनाशे च धर्मे च विलयं गते ॥ ३ ॥
purā kalpe'suragaṇairākrānte bhuvanatraye | vedoktakarmanāśe ca dharme ca vilayaṁ gate || 3 ||
पूर्वकाल में किसी कल्प में, जब त्रिभुवन असुरगणों से आक्रान्त हो गया था, वेदोक्त कर्म नष्ट हो चुके थे, और धर्म विलीन हो गया था -
श्लोक 4 (skanda.5.342.4)
देवर्षिमुनिसिद्धेषु विश्वासपरमेषु च । कालाग्निरुद्रादुत्पन्नो धूमः कालोद्भवोद्भवः ॥ ४ ॥
devarṣimunisiddheṣu viśvāsaparameṣu ca | kālāgnirudrādutpanno dhūmaḥ kālodbhavodbhavaḥ || 4 ||
- जबकि देवर्षि, मुनि और सिद्धगण परम विश्वास रखे हुए थे, तब कालाग्निरुद्र से एक धूम्र उत्पन्न हुआ, जो कालोद्भव अग्नि से उत्पन्न था।
श्लोक 5 (skanda.5.342.5)
धूमात्समुत्थितं लिङ्गं भित्त्वा पातालसप्तकम् । अवटं दक्षिणे कृत्वा लिङ्गं तत्रैव तिष्ठति ॥ ५ ॥
dhūmātsamutthitaṁ liṅgaṁ bhittvā pātālasaptakam | avaṭaṁ dakṣiṇe kṛtvā liṅgaṁ tatraiva tiṣṭhati || 5 ||
उस धूम्र से एक लिंग उत्पन्न हुआ, जिसने सातों पातालों को भेद डाला; दक्षिण दिशा में गड्ढा बनाकर वह लिंग वहीं स्थित हो गया।
श्लोक 6 (skanda.5.342.6)
तत्र तीर्थे नृपश्रेष्ठ कुण्डं ज्वालासमुद्भवम् । यत्र सा पतिता ज्वाला शिवस्य दहतः पुरम् ॥ ६ ॥
tatra tīrthe nṛpaśreṣṭha kuṇḍaṁ jvālāsamudbhavam | yatra sā patitā jvālā śivasya dahataḥ puram || 6 ||
हे नृपश्रेष्ठ! उस तीर्थ में ज्वाला से उत्पन्न एक कुण्ड है, जहाँ वह ज्वाला गिरी थी, जब शिव त्रिपुर नगर को जला रहे थे।
श्लोक 7 (skanda.5.342.7)
तत्रावटं समुद्भूतं धूमावर्तस्ततोऽभवत् । तस्मिन्कुण्डे तु यः स्नानं कृत्वा वै नर्मदाजले ॥ ७ ॥
tatrāvaṭaṁ samudbhūtaṁ dhūmāvartastato'bhavat | tasminkuṇḍe tu yaḥ snānaṁ kṛtvā vai narmadājale || 7 ||
वहाँ एक गड्ढा उत्पन्न हुआ, और उससे धूम्र का एक भँवर उठा। जो कोई उस कुण्ड में, नर्मदाजल में स्नान करता है -
श्लोक 8 (skanda.5.342.8)
कुर्याच्छ्राद्धं पितृभ्यो वै पूजयेच्च त्रिलोचनम् । कालाग्निरुद्रनामानि स गच्छेत्परमां गतिम् ॥ ८ ॥
kuryācchrāddhaṁ pitṛbhyo vai pūjayecca trilocanam | kālāgnirudranāmāni sa gacchetparamāṁ gatim || 8 ||
- पितरों के लिए श्राद्ध करता है, और त्रिलोचन को कालाग्निरुद्र आदि नामों से पूजता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 9 (skanda.5.342.9)
यत्किंचित्कामिकं कर्म ह्याभिचारिकमेव वा । रिपुसंक्षयकृद्वापि सांतानिकमथापि वा । अत्र तीर्थे कृतं सर्वमचिरात्सिध्यते नृप ॥ ९ ॥
yatkiṁcitkāmikaṁ karma hyābhicārikamiva vā | ripusaṅkṣayakṛdvāpi sāntānikamathāpi vā | atra tīrthe kṛtaṁ sarvamacirātsidhyate nṛpa || 9 ||
हे राजन्! कामनापूर्ति के लिए कोई भी कर्म हो, अथवा आभिचारिक कर्म, शत्रुनाश करने वाला अथवा संतानप्राप्ति के लिए किया गया कर्म - इस तीर्थ में किया गया वह सब शीघ्र ही सिद्ध हो जाता है।