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अवन्ती खण्ड · अध्याय 34

शक्तिभेदतीर्थमाहात्म्य-वर्णनम्

अध्याय 33अध्याय-सूचीअध्याय 35

श्लोक 1 (skanda.5.34.1)

सनत्कुमार उवाच । तीर्थमन्यत्तथा वक्ष्ये शक्तिभेदमिति स्मृतम् । स्कंदस्य च जटाभद्रं चक्रे यत्र पुरा शिवः

sanatkumāra uvāca tīrthamanyattathā vakṣye śaktibhedamiti smṛtam skaṁdasya ca jaṭābhadraṁ cakre yatra purā śivaḥ

सनत्कुमार ने कहा -- अब मैं एक अन्य तीर्थ का वर्णन करता हूँ, जो 'शक्तिभेद' नाम से स्मरण किया जाता है, और जहाँ पूर्वकाल शिव ने स्कन्द की जटाओं को शुभ बनाया था।

श्लोक 2 (skanda.5.34.2)

तारकं च तथा दैत्यं हत्वा यत्र सुरद्विषम् । शक्तिं स्कंदः स्वयं क्रुद्धो निश्चिक्षेप महीतले

tārakaṁ ca tathā daityaṁ hatvā yatra suradviṣam śaktiṁ skaṁdaḥ svayaṁ kruddho niścikṣepa mahītale

-- और जहाँ देव-शत्रु दैत्य तारक का वध कर, स्कन्द ने स्वयं क्रोधित होकर अपनी शक्ति पृथ्वी पर फेंक दी थी।

श्लोक 3 (skanda.5.34.3)

व्यास उवाच । भगवन्ब्रूहि यत्नेन संशयो मे महामुने । कथं स्कंदः समुत्पन्न एतदिच्छामि वेदितुम्

vyāsa uvāca bhagavanbrūhi yatnena saṁśayo me mahāmune kathaṁ skaṁdaḥ samutpanna etadicchāmi veditum

व्यास ने कहा -- हे भगवन्! हे महामुने! यत्नपूर्वक बताइए, मुझे संशय है -- स्कन्द किस प्रकार उत्पन्न हुए, यह मैं जानना चाहता हूँ।

श्लोक 4 (skanda.5.34.4)

सनत्कुमार उवाच । पुरा देवासुरे युद्धे निर्जिता दानवैः सुराः । दिवं त्यक्त्वा दिशो याताः शक्राद्या भयविह्वलाः

sanatkumāra uvāca purā devāsure yuddhe nirjitā dānavaiḥ surāḥ divaṁ tyaktvā diśo yātāḥ śakrādyā bhayavihvalāḥ

सनत्कुमार ने कहा -- पूर्वकाल में देव-असुर युद्ध में दानवों से पराजित होकर, स्वर्ग त्यागकर, भयविह्वल शक्र आदि देव दिशाओं में चले गए।

श्लोक 5 (skanda.5.34.5)

तत्र तु देव राजेन तपसोग्रेण वै मुने । आराधितो महादेवस्त्र्यंबकस्त्रिपुरांतकः

tatra tu deva rājena tapasogreṇa vai mune ārādhito mahādevastryaṁbakastripurāṁtakaḥ

हे मुने! वहाँ देवराज ने उग्र तप से त्रिपुरान्तक त्र्यम्बक महादेव की आराधना की।

श्लोक 6 (skanda.5.34.6)

ततस्तुष्टो महादेवः शक्रस्याभिमुखः स्थितः । उवाच वचनं श्लक्ष्णं वरमिष्टं ददामि ते

tatastuṣṭo mahādevaḥ śakrasyābhimukhaḥ sthitaḥ uvāca vacanaṁ ślakṣṇaṁ varamiṣṭaṁ dadāmi te

तब प्रसन्न महादेव शक्र के समक्ष खड़े होकर मृदु वचन बोले -- 'तुम्हें अभीष्ट वर देता हूँ।'

श्लोक 7 (skanda.5.34.7)

शक्र उवाच । यदि तुष्टोऽसि भगवन्कारुण्यान्मम शंकर । महासेनापतिं देव प्रयच्छ परमेश्वर

śakra uvāca yadi tuṣṭo'si bhagavankāruṇyānmama śaṁkara mahāsenāpatiṁ deva prayaccha parameśvara

शक्र ने कहा -- 'हे भगवन् शंकर! यदि आप कृपापूर्वक मुझसे प्रसन्न हैं, तो हे परमेश्वर! हमें एक महासेनापति प्रदान कीजिए।'

श्लोक 8 (skanda.5.34.8)

हर उवाच । उत्पादयामि देवेषु स्ववीर्यादूर्जितं सुतम् । सेनान्यां च महासेनं सुराणां भयहारकम्

hara uvāca utpādayāmi deveṣu svavīryādūrjitaṁ sutam senānyāṁ ca mahāsenaṁ surāṇāṁ bhayahārakam

हर ने कहा -- 'मैं अपने ही वीर्य से देवताओं में एक बलशाली पुत्र उत्पन्न करूँगा, जो सेनापति होकर देवताओं का भय हरने वाला होगा।'

श्लोक 9 (skanda.5.34.9)

सनत्कुमार उवाच । इत्युक्त्वांतर्दधे देवः सर्वभूतपतिर्हरः । सुतचिंतापरो देवो जगाम च हिमालयम्

sanatkumāra uvāca ityuktvāṁtardadhe devaḥ sarvabhūtapatirharaḥ sutaciṁtāparo devo jagāma ca himālayam

सनत्कुमार ने कहा -- ऐसा कहकर सर्वभूतपति हर अन्तर्धान हो गए; पुत्र की चिन्ता में लीन देव हिमालय को चले गए।

श्लोक 10 (skanda.5.34.10)

देवदारुवने तस्थौ ज्ञानध्यानपरोऽभवत् । ब्रह्मादयोऽपि यं देवं योगिनो ध्यानचिंतकाः

devadāruvane tasthau jñānadhyānaparo'bhavat brahmādayo'pi yaṁ devaṁ yogino dhyānaciṁtakāḥ

वे देवदारुवन में स्थित होकर ज्ञान-ध्यान में लीन हो गए। ब्रह्मा आदि, ध्यानपरायण योगीजन भी जिस देव को --

श्लोक 11 (skanda.5.34.11)

ध्यायंति नियतात्मनः प्राणायामपरा मुने । लिंगमूर्तिश्च यो नित्यं पूज्यते सर्वजंतुभिः

dhyāyaṁti niyatātmanaḥ prāṇāyāmaparā mune liṁgamūrtiśca yo nityaṁ pūjyate sarvajaṁtubhiḥ

-- हे मुने! नियमपूर्वक प्राणायाम में तत्पर होकर ध्याते हैं, और जिनका लिंग-रूप सदा सभी प्राणियों द्वारा पूजित होता है --

श्लोक 12 (skanda.5.34.12)

स ध्यायति किमर्थं तन्न विद्मः परमार्थिनः । वं ध्यानपरे देवे देवी हिमवतो गृहे

sa dhyāyati kimarthaṁ tanna vidmaḥ paramārthinaḥ vaṁ dhyānapare deve devī himavato gṛhe

-- वे स्वयं किसका ध्यान करते हैं, यह हम परमार्थीजन भी नहीं जानते। इस प्रकार देव के ध्यानमग्न रहते हुए, हिमवत के घर में देवी --

श्लोक 13 (skanda.5.34.13)

मध्ये वयसि वर्तंती यासीद्दाक्षायणी सती । पितुर्गेहे निजो देहो यया योगाद्विसर्जितः

madhye vayasi vartaṁtī yāsīddākṣāyaṇī satī piturgehe nijo deho yayā yogādvisarjitaḥ

-- नए यौवन में विद्यमान थीं, जो पहले दाक्षायणी सती थीं, और जिन्होंने अपने पिता के घर में योग से अपना शरीर त्याग दिया था --

श्लोक 14 (skanda.5.34.14)

निमंत्रितो न मे भर्ता इति कोपं चकार या । तां देवीं हिमवान्पूर्वं श्रुत्वा देवर्षिनारदात्

nimaṁtrito na me bhartā iti kopaṁ cakāra yā tāṁ devīṁ himavānpūrvaṁ śrutvā devarṣināradāt

-- क्योंकि 'मेरे पति को नहीं बुलाया गया' यह सोचकर उन्होंने क्रोध किया था। उन देवी के विषय में हिमवान ने पहले देवर्षि नारद से सुनकर --

श्लोक 15 (skanda.5.34.15)

भवभार्या भवित्रीति नान्यं वरमचिंतयत् । तपस्यति च रुद्राय सा सखीभ्यां समन्विता

bhavabhāryā bhavitrīti nānyaṁ varamaciṁtayat tapasyati ca rudrāya sā sakhībhyāṁ samanvitā

-- 'यह भव की पत्नी होगी' यह जानकर अन्य किसी वर का विचार नहीं किया। वे अपनी दो सखियों सहित रुद्र के लिए तप करने लगीं।

श्लोक 16 (skanda.5.34.16)

कथं हि शंकरो देवो मम भर्ता भविष्यति । यावदेवं गतो देवो देवी हिमवतः सुता

kathaṁ hi śaṁkaro devo mama bhartā bhaviṣyati yāvadevaṁ gato devo devī himavataḥ sutā

'शंकर देव मेरे पति कैसे बनेंगे?' -- ऐसा सोचते हुए, जब देव इस प्रकार ध्यानमग्न थे, तब हिमवत की पुत्री देवी --

श्लोक 17 (skanda.5.34.17)

ततः समागता देवाः कृत्वाग्रे बलसूदनम् । जग्मुर्ब्रह्मसदः पुण्यं द्रष्टुं ब्रह्माणम व्ययम्

tataḥ samāgatā devāḥ kṛtvāgre balasūdanam jagmurbrahmasadaḥ puṇyaṁ draṣṭuṁ brahmāṇama vyayam

-- तब देवगण एकत्र होकर, इन्द्र को आगे कर, अविनाशी ब्रह्मा के दर्शन हेतु पुण्य ब्रह्मसदन को गए।

श्लोक 18 (skanda.5.34.18)

ते सुरास्तत्स्तुति कृत्वा वाक्यमेतत्समैरयन् । शरणं भव देवानां दानवैर्विजितात्मनाम्

te surāstatstuti kṛtvā vākyametatsamairayan śaraṇaṁ bhava devānāṁ dānavairvijitātmanām

उन देवताओं ने उनकी स्तुति कर यह वचन एक साथ कहा -- 'दानवों से पराजित-चित्त देवताओं की शरण बनिए।'

श्लोक 19 (skanda.5.34.19)

ततोऽवोचत्सुरान्ब्रह्मा ज्ञातं कार्यं समाहितम् । नैतच्छंभोर्विना वीर्यात्कार्यसिद्धिर्भविष्यति

tato'vocatsurānbrahmā jñātaṁ kāryaṁ samāhitam naitacchaṁbhorvinā vīryātkāryasiddhirbhaviṣyati

तब ब्रह्मा ने देवताओं से कहा -- 'यह कार्य समझ में आ गया है, विचार कर लिया है; शम्भु के वीर्य के बिना यह कार्य सिद्ध नहीं होगा।

श्लोक 20 (skanda.5.34.20)

तथा यतध्वं देवेशं यथा वांछति पार्वतीम् । इत्युक्त्वांतर्दधे ब्रह्मा स्वप्ने लब्धं धनं यथा

tathā yatadhvaṁ deveśaṁ yathā vāṁchati pārvatīm ityuktvāṁtardadhe brahmā svapne labdhaṁ dhanaṁ yathā

अतः ऐसा प्रयत्न करो कि देवेश पार्वती की कामना करें।' ऐसा कहकर ब्रह्मा स्वप्न में प्राप्त धन के समान अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 21 (skanda.5.34.21)

ततो मेरुं समागत्य पुनर्मंत्रं प्रचक्रिरे । तेषामाहेदृशं शक्रस्तुष्टः शंभुः पुरा मम

tato meruṁ samāgatya punarmaṁtraṁ pracakrire teṣāmāhedṛśaṁ śakrastuṣṭaḥ śaṁbhuḥ purā mama

तब वे मेरु पर्वत पर आकर पुनः मन्त्रणा करने लगे। शक्र ने उनसे कहा -- 'पूर्वकाल में मुझसे प्रसन्न होकर शम्भु ने --

श्लोक 22 (skanda.5.34.22)

प्रतिपन्नं च देवेन स्वांगात्सेना पतिं प्रति । तस्मादेवं गते कार्ये कारणं मकरध्वजः

pratipannaṁ ca devena svāṁgātsenā patiṁ prati tasmādevaṁ gate kārye kāraṇaṁ makaradhvajaḥ

-- अपने ही शरीर से सेनापति उत्पन्न करने का वचन दिया था। अतः इस कार्य के सम्पन्न होने का कारण मकरध्वज काम ही है।'

श्लोक 23 (skanda.5.34.23)

इति संचित्य देवेशः काममाहूय सत्वरम् । उवाच वचनं हृद्यं देवाना मनुकंपया

iti saṁcitya deveśaḥ kāmamāhūya satvaram uvāca vacanaṁ hṛdyaṁ devānā manukaṁpayā

ऐसा विचार कर देवेश ने शीघ्र काम को बुलाकर, देवताओं पर अनुकम्पा करते हुए हृदयस्पर्शी वचन कहा --

श्लोक 24 (skanda.5.34.24)

यथा देवो भजेद्देवीं तथा काम विधीयताम् । कारणं महदेतद्वै देवानां समुपस्थितम्

yathā devo bhajeddevīṁ tathā kāma vidhīyatām kāraṇaṁ mahadetadvai devānāṁ samupasthitam

-- 'जिस प्रकार देव देवी को अपनाएँ, वैसा ही करो, हे काम! यह महान कारण देवताओं के लिए उपस्थित हुआ है।'

श्लोक 25 (skanda.5.34.25)

कामो वाक्यं हरेः श्रुत्वा प्रहस्येदमुवाच ह । करिष्ये सर्वमेवं हि सखा मे चेद्भवेन्मधुः

kāmo vākyaṁ hareḥ śrutvā prahasyedamuvāca ha kariṣye sarvamevaṁ hi sakhā me cedbhavenmadhuḥ

हरि का यह वचन सुनकर काम ने हँसते हुए कहा -- 'यह सब मैं करूँगा, यदि मधु मेरा सखा बने।'

श्लोक 26 (skanda.5.34.26)

तस्मिन्क्षणेऽथ शक्रेण कामवाक्यादनंतरम् । समादिष्टो मधुः क्षिप्रं कामस्यानुचरो भव

tasminkṣaṇe'tha śakreṇa kāmavākyādanaṁtaram samādiṣṭo madhuḥ kṣipraṁ kāmasyānucaro bhava

उसी क्षण काम के वचन के तुरन्त बाद शक्र ने मधु को आदेश दिया -- 'तुरन्त काम के सहचर बनो।'

श्लोक 27 (skanda.5.34.27)

लब्ध्वा कामो मधुं मित्रं प्रतस्थे भार्यया सह । कृत्वा सज्यं धनुर्बाणं पौष्पं पाणौ समाहितः

labdhvā kāmo madhuṁ mitraṁ pratasthe bhāryayā saha kṛtvā sajyaṁ dhanurbāṇaṁ pauṣpaṁ pāṇau samāhitaḥ

मधु को मित्र पाकर काम अपनी पत्नी के साथ चल पड़े; अपने पुष्प-धनुष पर बाण चढ़ाकर, समाहितचित्त होकर हाथ में लिए हुए।

श्लोक 28 (skanda.5.34.28)

यत्र देवाधिदेवेशो देवदारुवने स्थितः । नन्दीश्वरः प्रतीहारः कृतध्यानोऽवतिष्ठति

yatra devādhideveśo devadāruvane sthitaḥ nandīśvaraḥ pratīhāraḥ kṛtadhyāno'vatiṣṭhati

जहाँ देवाधिदेवेश देवदारुवन में ध्यानमग्न विराजते थे, जहाँ नन्दीश्वर द्वारपाल बने खड़े थे --

श्लोक 29 (skanda.5.34.29)

चूतवृक्षाश्रितः कामो यावद्बाणं सुमोहनम् । संदधात्यंतरे चास्मिन्देवी प्राप भवाश्रमम्

cūtavṛkṣāśritaḥ kāmo yāvadbāṇaṁ sumohanam saṁdadhātyaṁtare cāsmindevī prāpa bhavāśramam

-- आम्रवृक्ष के आश्रय में स्थित काम जब तक अपने मोहक बाण को चढ़ा ही रहे थे, तभी उधर देवी भव के आश्रम में पहुँच गईं।

श्लोक 30 (skanda.5.34.30)

त्यक्तध्यानव्रतो देवो हृष्टश्चाह्रादचेतनः । ततो विलोकयामास दिशः सर्वाः प्रयत्नतः

tyaktadhyānavrato devo hṛṣṭaścāhrādacetanaḥ tato vilokayāmāsa diśaḥ sarvāḥ prayatnataḥ

ध्यान-व्रत त्यागकर हर्षित, आह्लादचित्त देव ने तत्पश्चात् यत्नपूर्वक सभी दिशाओं में देखा।

श्लोक 31 (skanda.5.34.31)

चूतवृक्षाश्रितं काममपश्यच्च रुषान्वितः । भस्मीकृतस्तृतीयाक्ष्णा वह्निज्वालावता ततः

cūtavṛkṣāśritaṁ kāmamapaśyacca ruṣānvitaḥ bhasmīkṛtastṛtīyākṣṇā vahnijvālāvatā tataḥ

आम्रवृक्ष में छिपे काम को देखकर वे क्रोधित हो गए; और तीसरे नेत्र की अग्निज्वाला से काम भस्म हो गए।

श्लोक 32 (skanda.5.34.32)

देवोऽप्यन्तर्दधे तस्मात्स्थानादाशु गणैः सह । पार्वती विस्मिता साध्वी लज्जिता दुःखिताऽभवत्

devo'pyantardadhe tasmātsthānādāśu gaṇaiḥ saha pārvatī vismitā sādhvī lajjitā duḥkhitā'bhavat

देव भी अपने गणों सहित उस स्थान से तत्काल अन्तर्धान हो गए। साध्वी पार्वती विस्मित, लज्जित और दुःखी हो गईं।

श्लोक 33 (skanda.5.34.33)

हिमवांस्तां समुत्थाप्य निनायाशु निजं गृहम् । गते देवे च देव्यां च कामपत्नी सुदुः खिता

himavāṁstāṁ samutthāpya nināyāśu nijaṁ gṛham gate deve ca devyāṁ ca kāmapatnī suduḥ khitā

हिमवान ने उन्हें उठाकर शीघ्र अपने घर ले लिया। देव और देवी के चले जाने पर, काम-पत्नी रति अत्यन्त दुःखी होकर --

श्लोक 34 (skanda.5.34.34)

भस्मीकृतं पतिं दृष्ट्वा विललाप सुदुःखिता । दृष्ट्वा रतिं सुदुःखार्ता वागुवाचाशरीरिणी

bhasmīkṛtaṁ patiṁ dṛṣṭvā vilalāpa suduḥkhitā dṛṣṭvā ratiṁ suduḥkhārtā vāguvācāśarīriṇī

-- अपने भस्मीभूत पति को देखकर अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगीं। इस प्रकार दुःखार्त रति को देखकर एक अशरीर वाणी बोली --

श्लोक 35 (skanda.5.34.35)

आश्वासयंतीं कृपया सखीमिव सुदुः खिताम् । मा रोदीस्त्वं शुभापांगि तव भर्ता करिष्यति

āśvāsayaṁtīṁ kṛpayā sakhīmiva suduḥ khitām mā rodīstvaṁ śubhāpāṁgi tava bhartā kariṣyati

-- सखी के समान करुणापूर्वक उस दुःखी को समझाते हुए -- 'हे शुभ-नयने! मत रोओ, तुम्हारे पति --

श्लोक 36 (skanda.5.34.36)

सर्वकार्याण्यनंगोपि मित्रकार्यं विधानतः । यदा चायं महादेवः परिणेष्यति पार्वतीम्

sarvakāryāṇyanaṁgopi mitrakāryaṁ vidhānataḥ yadā cāyaṁ mahādevaḥ pariṇeṣyati pārvatīm

-- अनंग होकर भी विधिपूर्वक सब मित्र-कार्य पूर्ण करेंगे। जब यह महादेव पार्वती से विवाह करेंगे --

श्लोक 37 (skanda.5.34.37)

ततः शंभोरनुध्यानात्थास्यति न संशयः । द्वापरांते यदा कृष्णो द्वारकायां निवत्स्यति

tataḥ śaṁbhoranudhyānātthāsyati na saṁśayaḥ dvāparāṁte yadā kṛṣṇo dvārakāyāṁ nivatsyati

-- तब शम्भु के ही अनुध्यान से वे पुनर्जीवित होंगे, इसमें संशय नहीं। द्वापर के अन्त में जब कृष्ण द्वारका में निवास करेंगे --

श्लोक 38 (skanda.5.34.38)

तत्पुत्रो भविता देही प्रद्युम्नोनाम ते पतिः । इत्युक्ता साऽजहाच्छोकमाकाशाज्जातया गिरा

tatputro bhavitā dehī pradyumnonāma te patiḥ ityuktā sā'jahācchokamākāśājjātayā girā

-- तब वे देहधारी होकर उनके पुत्र, प्रद्युम्न नामक, तुम्हारे पति बनेंगे।' ऐसा कहे जाने पर, आकाश से उठी उस वाणी से वे शोकमुक्त हो गईं।

श्लोक 39 (skanda.5.34.39)

अचिंतयत्तदा देवी उमापि हिमवद्गृहे । कामस्य दहनं तेजः शंभोर्यत्तदनुत्तमम्

aciṁtayattadā devī umāpi himavadgṛhe kāmasya dahanaṁ tejaḥ śaṁbhoryattadanuttamam

तब हिमवत के घर में देवी उमा ने भी सोचा -- 'शम्भु का जो अनुपम तेज काम को जला गया --

श्लोक 40 (skanda.5.34.40)

कथं भर्त्ता भवेद्देवः कामस्योत्थापनं कथम् । नैतत्तपो विना कार्यं क्वचित्कस्यापि सिध्यति

kathaṁ bharttā bhaveddevaḥ kāmasyotthāpanaṁ katham naitattapo vinā kāryaṁ kvacitkasyāpi sidhyati

-- वह देव कैसे पति बनेंगे, और काम का पुनरुत्थान कैसे होगा? यह कार्य तप के बिना किसी का भी कहीं सिद्ध नहीं होता।'

श्लोक 41 (skanda.5.34.41)

एवं संचिंतयित्वाथ सखीभिः सहिता ततः । तपश्चकार सुमहत्पित्रादेशाच्छुभव्रता

evaṁ saṁciṁtayitvātha sakhībhiḥ sahitā tataḥ tapaścakāra sumahatpitrādeśācchubhavratā

ऐसा विचार कर, शुभव्रता उमा ने अपनी सखियों के साथ, पिता की आज्ञा से अत्यन्त महान तप किया।

श्लोक 42 (skanda.5.34.42)

वर्षास्वभ्रावकाशस्था हेमंते जलशायिनी । ग्रीष्मे पंचाग्नितप्तांगी तपस्युग्रे समा स्थिता

varṣāsvabhrāvakāśasthā hemaṁte jalaśāyinī grīṣme paṁcāgnitaptāṁgī tapasyugre samā sthitā

वर्षा में खुले आकाश तले खड़ी रहकर, हेमन्त में जल में शयन करते हुए, ग्रीष्म में पंचाग्नि से शरीर तपाते हुए, वे उग्र तप में सदा स्थित रहीं।

श्लोक 43 (skanda.5.34.43)

तां दृष्ट्वा तपसोपेतां ब्रह्मचारिवया हरः । आजगामाश्रमं देव्याः कृतातिथ्योऽब्रवीदिदम्

tāṁ dṛṣṭvā tapasopetāṁ brahmacārivayā haraḥ ājagāmāśramaṁ devyāḥ kṛtātithyo'bravīdidam

तप में लीन उन्हें देखकर हर ब्रह्मचारी युवक का वेश धारण कर देवी के आश्रम में आए; अतिथि-सत्कार पाकर उन्होंने यह कहा --

श्लोक 44 (skanda.5.34.44)

कृशमध्ये कृशापांगि किमर्थं नवयौवने । तपः करोषि कल्याणि कस्यार्थे कारणं वद

kṛśamadhye kṛśāpāṁgi kimarthaṁ navayauvane tapaḥ karoṣi kalyāṇi kasyārthe kāraṇaṁ vada

-- 'हे कृशकटि, कृश-नयने! नए यौवन में, हे कल्याणी! तुम किसलिए तप कर रही हो? इसका कारण बताओ।'

श्लोक 45 (skanda.5.34.45)

उवाच चोत्तरं सा वै सत्यं च मधुरं तथा । बटो तपःसमारंभः क्रियते शंकरा प्तये

uvāca cottaraṁ sā vai satyaṁ ca madhuraṁ tathā baṭo tapaḥsamāraṁbhaḥ kriyate śaṁkarā ptaye

उन्होंने सत्य और मधुर उत्तर दिया -- 'हे ब्रह्मचारी! यह तप शंकर की प्राप्ति के लिए किया जा रहा है।'

श्लोक 46 (skanda.5.34.46)

विचार्य च हरः श्रुत्वाऽनंदयत्कार्यमात्मनः । उमाभक्तिपरीक्षार्थं शिवं वाचा निनिन्द वै

vicārya ca haraḥ śrutvā'naṁdayatkāryamātmanaḥ umābhaktiparīkṣārthaṁ śivaṁ vācā nininda vai

यह सुनकर हर विचार कर अपने कार्य की सफलता से आनन्दित हुए; परन्तु उमा की भक्ति परखने हेतु उन्होंने वाणी से शिव की निन्दा की।

श्लोक 47 (skanda.5.34.47)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा न सेहे सा गिरेः सुता । गंतुकामामुमां मत्वा तस्मात्स्थानान्महेश्वरः । स्वं वपुर्दर्शयामास त्रिनेत्रं शूलपाणिनम्

tasya tadvacanaṁ śrutvā na sehe sā gireḥ sutā gaṁtukāmāmumāṁ matvā tasmātsthānānmaheśvaraḥ svaṁ vapurdarśayāmāsa trinetraṁ śūlapāṇinam

उनके वे वचन सुनकर गिरिपुत्री उन्हें सह न सकीं। उमा को वहाँ से जाने की इच्छुक जानकर महेश्वर ने अपना त्रिनेत्र, त्रिशूलधारी वास्तविक रूप दिखा दिया।

श्लोक 48 (skanda.5.34.48)

लज्जिताभूद्भवानीशं दृष्ट्वा तस्थावधोमुखी । विजयाथाह योगीन्द्रं प्रार्थ्या चाभिजने त्वियम् । पार्वतीहरणार्थाय यत्नं च प्रकरोम्यहम्

lajjitābhūdbhavānīśaṁ dṛṣṭvā tasthāvadhomukhī vijayāthāha yogīndraṁ prārthyā cābhijane tviyam pārvatīharaṇārthāya yatnaṁ ca prakaromyaham

भवानी उन्हें देखकर लज्जित हो गईं और मुख नीचा किए खड़ी रहीं। तब विजया ने योगीन्द्र से कहा -- 'यह विधिवत वर के योग्य है; मैं पार्वती के वरण हेतु प्रयत्न करती हूँ।'

श्लोक 49 (skanda.5.34.49)

इत्युक्त्वांतर्दधे देवो देव्यागाच्च पितुर्गृहम् । देवीलाभाय सप्तर्षीन्सस्मार स्मरशासनः

ityuktvāṁtardadhe devo devyāgācca piturgṛham devīlābhāya saptarṣīnsasmāra smaraśāsanaḥ

ऐसा कहकर देव अन्तर्धान हो गए, और देवी अपने पिता के घर चली गईं। कामदेव के शासक शिव ने देवी को पाने हेतु सप्तर्षियों का स्मरण किया।

श्लोक 50 (skanda.5.34.50)

प्रणेमुस्तेप्यथागम्य संस्मृताः परमेश्वरम् । ऊचुश्च प्रांज लिपुटाः कुर्म किं शाधि नो भृशम्

praṇemustepyathāgamya saṁsmṛtāḥ parameśvaram ūcuśca prāṁja lipuṭāḥ kurma kiṁ śādhi no bhṛśam

वे भी स्मरण किए जाने पर आकर परमेश्वर को प्रणाम करने लगे और हाथ जोड़कर कहा -- 'हम क्या करें? हमें आदेश दीजिए।'

श्लोक 51 (skanda.5.34.51)

ततोऽब्रवीन्मुनीनीशः समस्तांश्च गिरेर्गृहम् । गत्वा तथा कुरुध्वं मे पार्वती स्याद्यथा प्रिया

tato'bravīnmunīnīśaḥ samastāṁśca girergṛham gatvā tathā kurudhvaṁ me pārvatī syādyathā priyā

तब ईश ने उन सभी मुनियों से कहा -- 'गिरिराज के घर जाकर ऐसा करो कि पार्वती मेरी प्रिया बनें।'

श्लोक 52 (skanda.5.34.52)

तथेति ते प्रतिज्ञाय संकेतं शंभुना समम् । कृत्वा जग्मुः सपत्नीका गिरींद्रस्य निवेशनम्

tatheti te pratijñāya saṁketaṁ śaṁbhunā samam kṛtvā jagmuḥ sapatnīkā girīṁdrasya niveśanam

'ऐसा ही होगा' कहकर उन्होंने शम्भु के साथ संकेत निश्चित कर, अपनी पत्नियों सहित गिरिराज के निवास को प्रस्थान किया।

श्लोक 53 (skanda.5.34.53)

दत्तार्घा भूधरेंद्रेण कृतासन परिग्रहाः । ऊचुरद्रिमुमां यच्छ शंकरायार्थिने प्रियाम्

dattārghā bhūdhareṁdreṇa kṛtāsana parigrahāḥ ūcuradrimumāṁ yaccha śaṁkarāyārthine priyām

भूधरेन्द्र द्वारा अर्घ्य दिए जाने पर, आसन ग्रहण कर उन्होंने पर्वत से कहा -- 'याचक शंकर के लिए अपनी प्रिया कन्या दीजिए।'

श्लोक 54 (skanda.5.34.54)

दत्तेत्युक्ता गिरींद्रेण निरूप्योद्वाहवासरम् । लब्ध्वानुज्ञां समायाता यत्रास्ते स महेश्वरः

dattetyuktā girīṁdreṇa nirūpyodvāhavāsaram labdhvānujñāṁ samāyātā yatrāste sa maheśvaraḥ

'दी गई' -- ऐसा कहकर गिरिराज ने विवाह-दिन निश्चित किया; अनुमति पाकर वे वहाँ आए जहाँ महेश्वर विराजते थे।

श्लोक 55 (skanda.5.34.55)

ऊचुस्ते शंकरं सर्वे दत्ता हिमवता शिवा । कृतकार्याश्च सर्वेऽपि वव्रजुस्ते यथागतम्

ūcuste śaṁkaraṁ sarve dattā himavatā śivā kṛtakāryāśca sarve'pi vavrajuste yathāgatam

उन सबने शंकर से कहा -- 'हिमवत द्वारा शिवा दे दी गई हैं।' अपना कार्य सम्पन्न कर वे सब वापस चले गए जैसे आए थे।

श्लोक 56 (skanda.5.34.56)

चक्रुर्विवाह सामग्रीं ब्रह्मेन्द्रादिसुरास्तदा । वृषासनो जगामाथ नंदीशप्रमुखैर्गणैः

cakrurvivāha sāmagrīṁ brahmendrādisurāstadā vṛṣāsano jagāmātha naṁdīśapramukhairgaṇaiḥ

तब ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवों ने विवाह-सामग्री तैयार की; वृषभवाहन देव नन्दीश आदि गणों सहित चल पड़े।

श्लोक 57 (skanda.5.34.57)

शंखदुंदुभिनादैश्च ब्रह्माद्यैरमरैः सह । प्राप्यागेंद्रालयं हीशः कृतकौतुकमंगलः

śaṁkhaduṁdubhinādaiśca brahmādyairamaraiḥ saha prāpyāgeṁdrālayaṁ hīśaḥ kṛtakautukamaṁgalaḥ

शंख-दुन्दुभि की ध्वनि सहित, ब्रह्मा आदि अमरों के साथ, कौतुक-मंगल विधि सम्पन्न कर ईश पर्वतराज के निवास पहुँचे।

श्लोक 58 (skanda.5.34.58)

विवाह्येमां विधानेन जगाम स्वालयं पुनः । तत्रैकांतरतिर्देवो यावत्तिष्ठति कामवान्

vivāhyemāṁ vidhānena jagāma svālayaṁ punaḥ tatraikāṁtaratirdevo yāvattiṣṭhati kāmavān

विधिवत विवाह कर वे पुनः अपने निवास चले गए। वहाँ देव एकान्त-रति में लीन कामवान रहे --

श्लोक 59 (skanda.5.34.59)

तावत्त्रस्तैः सुरैरग्निः प्रेषितोऽगान्महेश्वरम् । अग्नौ तत्र गते देवो रतिं कृत्वा महेश्वरः

tāvattrastaiḥ surairagniḥ preṣito'gānmaheśvaram agnau tatra gate devo ratiṁ kṛtvā maheśvaraḥ

-- तभी भयभीत देवताओं द्वारा भेजे गए अग्नि महेश्वर के पास गए। अग्नि के वहाँ पहुँचने पर, रतिक्रीड़ा कर रहे महेश्वर ने --

श्लोक 60 (skanda.5.34.60)

निचिक्षेप मुखे वह्नेः स्वरेतो व्रीडितो भृशम् । रेतसा तेन तप्तो ऽग्निर्गंगातोये निक्षिप्तवान्

nicikṣepa mukhe vahneḥ svareto vrīḍito bhṛśam retasā tena tapto 'gnirgaṁgātoye nikṣiptavān

-- अत्यन्त लज्जित होकर अपना वीर्य अग्नि के मुख में डाल दिया। उस वीर्य से संतप्त अग्नि ने उसे गंगा के जल में डाल दिया।

श्लोक 61 (skanda.5.34.61)

हररेतोऽग्निनोद्गीर्णं गंगामध्ये पपात ह । तया तु स्वतटे न्यस्तं दग्धया रुद्ररेतसा

harareto'gninodgīrṇaṁ gaṁgāmadhye papāta ha tayā tu svataṭe nyastaṁ dagdhayā rudraretasā

अग्नि द्वारा उगला गया हर का वह वीर्य गंगा के मध्य में गिर पड़ा; उससे दग्ध होकर गंगा ने उसे अपने ही तट पर रख दिया।

श्लोक 62 (skanda.5.34.62)

सप्तर्षीणां च षट्पत्न्यः स्नानार्थं जाह्नवीं ययुः । शीतार्तास्ताः कृतस्नाना दृष्ट्वा तेजस्तटे ज्वलत्

saptarṣīṇāṁ ca ṣaṭpatnyaḥ snānārthaṁ jāhnavīṁ yayuḥ śītārtāstāḥ kṛtasnānā dṛṣṭvā tejastaṭe jvalat

सप्तर्षियों की छह पत्नियाँ स्नान हेतु जाह्नवी को गईं; शीत से पीड़ित उन्होंने स्नान कर तट पर जलता हुआ तेज देखा।

श्लोक 63 (skanda.5.34.63)

मत्वाग्निमिति ताः सर्वास्तपंति स्म यथेच्छया । तपंतीनां च वै तासां तद्बीजसंभव मुने

matvāgnimiti tāḥ sarvāstapaṁti sma yathecchayā tapaṁtīnāṁ ca vai tāsāṁ tadbījasaṁbhava mune

उसे अग्नि मानकर वे सभी अपनी इच्छानुसार उससे तापने लगीं। हे मुने! उनके तापते-तापते उस बीज का सञ्चार --

श्लोक 64 (skanda.5.34.64)

षडाननं समारूढं श्रोणिद्वारेण सत्वरम् । यदान्योन्यमुत्पतितुं शक्ता नाग्निपुरोगमात्

ṣaḍānanaṁ samārūḍhaṁ śroṇidvāreṇa satvaram yadānyonyamutpatituṁ śaktā nāgnipurogamāt

-- षडानन शीघ्र ही उनके गर्भ-द्वार से आरूढ़ हो गया। जब वे पहले प्रवेश किए अग्नि (तेज) के कारण एक-दूसरे से पृथक होने में असमर्थ हुईं --

श्लोक 65 (skanda.5.34.65)

चिंतां जग्मुस्तदा सर्वा मुनित्रासात्ततो भयात् । ततश्च तपसो वीर्यान्निष्कृष्य स्वोदरात्ततः

ciṁtāṁ jagmustadā sarvā munitrāsāttato bhayāt tataśca tapaso vīryānniṣkṛṣya svodarāttataḥ

-- तब वे मुनियों के भय से चिन्तामग्न हो गईं। तब उन्होंने उस तप के तेज को अपने-अपने उदर से निकालकर --

श्लोक 66 (skanda.5.34.66)

षड्भिरेकत्वमापद्य श्वेतपर्वतमस्तके । मध्ये शराणां वै कृत्य निक्षिप्तं वीर्यमुत्तमम्

ṣaḍbhirekatvamāpadya śvetaparvatamastake madhye śarāṇāṁ vai kṛtya nikṣiptaṁ vīryamuttamam

-- छहों ने मिलकर उसे एकरूप कर, श्वेत पर्वत के शिखर पर सरकंडों के बीच वह उत्तम वीर्य स्थापित कर दिया।

श्लोक 67 (skanda.5.34.67)

शुक्लायां प्रतिपद्यासीद्द्वितीयायां समीकृतः । तृतीयायां च साकारः सर्वलक्षणलक्षितः

śuklāyāṁ pratipadyāsīddvitīyāyāṁ samīkṛtaḥ tṛtīyāyāṁ ca sākāraḥ sarvalakṣaṇalakṣitaḥ

शुक्ल प्रतिपदा को वह प्रकट हुआ, द्वितीया को सम रूप में आया, तृतीया को समस्त शुभ लक्षणों से युक्त साकार हो गया।

श्लोक 68 (skanda.5.34.68)

चतुर्थ्यां परिपूर्णांगः षण्मुखो द्वादशेक्षणः । अलंकृतस्तु पंचम्यां षष्ठ्यां च स समुत्थितः

caturthyāṁ paripūrṇāṁgaḥ ṣaṇmukho dvādaśekṣaṇaḥ alaṁkṛtastu paṁcamyāṁ ṣaṣṭhyāṁ ca sa samutthitaḥ

चतुर्थी को उसके अंग पूर्ण हो गए, षड्मुख और द्वादश नेत्रों वाला; पंचमी को वह अलंकृत हुआ, और षष्ठी को पूर्ण रूप से खड़ा हो गया।

श्लोक 69 (skanda.5.34.69)

तेजसा श्वेतताम्रेण तताप स जगत्त्रयम् । जातमित्थं समाकर्ण्य सर्वे शक्रमुखाः सुराः

tejasā śvetatāmreṇa tatāpa sa jagattrayam jātamitthaṁ samākarṇya sarve śakramukhāḥ surāḥ

श्वेत-ताम्र वर्ण के तेज से उसने तीनों लोकों को तपा दिया। उसके इस प्रकार जन्म लेने का समाचार सुनकर शक्र आदि सभी देवगण --

श्लोक 70 (skanda.5.34.70)

समागत्यास्य संस्कारं ब्रह्मा चक्रे यथाविधि । तुष्टेन पार्वतीशेन शक्तिर्दत्ता दृढा शुभा

samāgatyāsya saṁskāraṁ brahmā cakre yathāvidhi tuṣṭena pārvatīśena śaktirdattā dṛḍhā śubhā

-- एकत्र होकर आए, और ब्रह्मा ने उसका संस्कार विधिवत सम्पन्न किया; प्रसन्न पार्वतीपति ने उसे दृढ़, शुभ शक्ति (अस्त्र) प्रदान की।

श्लोक 71 (skanda.5.34.71)

ततो गौर्या मयूरश्च वाहने परिकल्पितः । छागश्चैवाग्निना दत्तः कुक्कुटं सरितां पतिः

tato gauryā mayūraśca vāhane parikalpitaḥ chāgaścaivāgninā dattaḥ kukkuṭaṁ saritāṁ patiḥ

तब गौरी ने उसे वाहन के रूप में मयूर दिया; अग्नि ने बकरा, और नदियों के स्वामी समुद्र ने मुर्गा दिया।

श्लोक 72 (skanda.5.34.72)

शूलेन कृत्तिकाभिश्च वर्धितः पुत्रकाम्यया । ततस्तु प्राप्तसंस्कारो ब्रह्माद्यैरभिनंदितः

śūlena kṛttikābhiśca vardhitaḥ putrakāmyayā tatastu prāptasaṁskāro brahmādyairabhinaṁditaḥ

पुत्र-कामना से कृत्तिकाओं ने अपने शूल-सम स्तनों से उसका पालन-पोषण किया। तत्पश्चात् संस्कार प्राप्त होने पर ब्रह्मा आदि ने उसका अभिनन्दन किया।

श्लोक 73 (skanda.5.34.73)

शक्तिहस्तोऽभिषिक्तस्तु देवसेनासमादृतः । वित्ताधिपेन साह्येन पावकिः पण्मुखों ऽशतः

śaktihasto'bhiṣiktastu devasenāsamādṛtaḥ vittādhipena sāhyena pāvakiḥ paṇmukhoṁ 'śataḥ

शक्ति हाथ में लिए, अभिषिक्त होकर, देवसेना के आदर से सम्मानित, धनाधिपति कुबेर की सहायता से, पावकी (अग्निपुत्र), षड्मुख, अपने अंशों में --

श्लोक 74 (skanda.5.34.74)

गांगेयः कार्तिकेयश्च गुहः स्कंद उमासुतः । देवसेनापतिः स्वामी सेनानीश्च शिखिध्वजः

gāṁgeyaḥ kārtikeyaśca guhaḥ skaṁda umāsutaḥ devasenāpatiḥ svāmī senānīśca śikhidhvajaḥ

-- गांगेय, कार्तिकेय, गुह, स्कन्द, उमापुत्र, देवसेनापति, स्वामी, सेनानी और शिखिध्वज --

श्लोक 75 (skanda.5.34.75)

कुमारः शक्तिधारी च तस्य नामानि षोडश । यः पठेन्मानवो भक्त्या बाधा तस्य न जायते

kumāraḥ śaktidhārī ca tasya nāmāni ṣoḍaśa yaḥ paṭhenmānavo bhaktyā bādhā tasya na jāyate

-- कुमार और शक्तिधारी -- ये उनके सोलह नाम हैं। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इनका पाठ करता है, उसे कोई बाधा नहीं होती।

श्लोक 76 (skanda.5.34.76)

एवं जातो महासेनो दानवानां क्षयकरः । कुशस्थल्यां समानीतः शंभुना स्थानकारणात्

evaṁ jāto mahāseno dānavānāṁ kṣayakaraḥ kuśasthalyāṁ samānītaḥ śaṁbhunā sthānakāraṇāt

इस प्रकार जन्मे महासेन दानवों के संहारक बने; शम्भु द्वारा एक स्थान स्थापित करने हेतु उन्हें कुशस्थली लाया गया।

श्लोक 77 (skanda.5.34.77)

अभिषिक्तः स तेनासौ भद्रितः स जटाः पुरा । तेन भद्रजटंनाम देवतीर्थं च कथ्यते

abhiṣiktaḥ sa tenāsau bhadritaḥ sa jaṭāḥ purā tena bhadrajaṭaṁnāma devatīrthaṁ ca kathyate

उनके द्वारा (कार्तिकेय) अभिषिक्त किए गए, और पूर्वकाल में उनकी जटाएँ शुभ (भद्र) बनाई गईं; इसीलिए यह देवतीर्थ 'भद्रजट' नाम से कहा जाता है।

श्लोक 78 (skanda.5.34.78)

कृताभिषेकं लब्धास्त्रं महासेनं महेश्वरः । तमुवाच समधुरं सर्वदेवसमागमे

kṛtābhiṣekaṁ labdhāstraṁ mahāsenaṁ maheśvaraḥ tamuvāca samadhuraṁ sarvadevasamāgame

अभिषेक और अस्त्र प्राप्त कर चुके महासेन से, समस्त देवताओं के समागम में, महेश्वर ने मधुर वचन कहा --

श्लोक 79 (skanda.5.34.79)

रक्षा कार्या त्वया पुत्र सामरस्य शतक्रतोः । देवानां बाधकाः सर्वे निहंतव्याः सुरद्विषः

rakṣā kāryā tvayā putra sāmarasya śatakratoḥ devānāṁ bādhakāḥ sarve nihaṁtavyāḥ suradviṣaḥ

-- 'हे पुत्र! तुम्हें अमरों सहित शतक्रतु की रक्षा करनी है; देवताओं को पीड़ित करने वाले सभी देवशत्रुओं का वध करना है।'

श्लोक 80 (skanda.5.34.80)

इत्थं महोत्सवे जाते दृप्तप्रमथसागरे । मातरोऽन्वागताः सर्वाः पातालतलसंस्थिताः

itthaṁ mahotsave jāte dṛptapramathasāgare mātaro'nvāgatāḥ sarvāḥ pātālatalasaṁsthitāḥ

इस प्रकार महोत्सव होने पर, उल्लसित प्रमथों के सागर में, पाताल-तल में रहने वाली सभी मातृकाएँ भी आ गईं।

श्लोक 81 (skanda.5.34.81)

तासामाहारसंज्ञाभिश्चक्रे नामानि शंकरः । यानि तानि प्रवक्ष्यामि शृणु त्वं मुनिपुंगव

tāsāmāhārasaṁjñābhiścakre nāmāni śaṁkaraḥ yāni tāni pravakṣyāmi śṛṇu tvaṁ munipuṁgava

उनके भोजन-नाम के अनुसार शंकर ने उनके नाम रखे; वे नाम कौन-से हैं, यह मैं बताता हूँ, हे मुनिपुंगव! सुनो।

श्लोक 82 (skanda.5.34.82)

वटभोजनकामा या ज्ञेयास्ता वटमातरः । भुञ्जते चर्पटान्यास्तु ता वै चर्पटमातरः

vaṭabhojanakāmā yā jñeyāstā vaṭamātaraḥ bhuñjate carpaṭānyāstu tā vai carpaṭamātaraḥ

जो वट खाना चाहती थीं, वे वटमातर कहलाईं; जो चर्पट (रोटी) खाती हैं, वे चर्पटमातर कहलाती हैं।

श्लोक 83 (skanda.5.34.83)

क्रीडार्थं शंभुना चाथ प्राप्ता याः पौलभोजने । षण्णवतिमातरः सत्याः सर्वास्ताः पौलमातरः

krīḍārthaṁ śaṁbhunā cātha prāptā yāḥ paulabhojane ṣaṇṇavatimātaraḥ satyāḥ sarvāstāḥ paulamātaraḥ

क्रीड़ा हेतु शम्भु द्वारा लाई गई जो पौल-भोजन में सम्मिलित हुईं, वे सत्य छियानवे मातृकाएँ सभी पौलमातर कहलाईं।

श्लोक 84 (skanda.5.34.84)

सर्वासां दर्शनं पुण्यं ग्रहभूतविनाशनम् । प्रयत्नतः सदा देव्यो द्रष्टव्या मानवैर्मुने

sarvāsāṁ darśanaṁ puṇyaṁ grahabhūtavināśanam prayatnataḥ sadā devyo draṣṭavyā mānavairmune

इन सबका दर्शन पुण्यकारी और ग्रह-भूत का नाश करने वाला है। हे मुने! मनुष्यों को यत्नपूर्वक सदा इन देवियों का दर्शन करना चाहिए।

श्लोक 85 (skanda.5.34.85)

लब्ध्वा शक्तिं महासेनो देवसेनो महाव्रतः । जघान दानवेंद्रं तं तारकं तरसा तदा

labdhvā śaktiṁ mahāseno devaseno mahāvrataḥ jaghāna dānaveṁdraṁ taṁ tārakaṁ tarasā tadā

शक्ति पाकर महाव्रती देवसेनापति महासेन ने वेगपूर्वक उस दानवराज तारक का वध कर दिया।

श्लोक 86 (skanda.5.34.86)

दत्त्वा राज्यं तथेंद्राय स्फीतं निहतकंटकम् । कुशस्थलीं समागम्य तत्र वासं समाचरत्

dattvā rājyaṁ tatheṁdrāya sphītaṁ nihatakaṁṭakam kuśasthalīṁ samāgamya tatra vāsaṁ samācarat

इन्द्र को समृद्ध, कण्टकरहित राज्य सौंपकर वे कुशस्थली आए और वहीं निवास करने लगे।

श्लोक 87 (skanda.5.34.87)

एवं निहत्य दैत्येंद्रं स गांगेयो महाब लः । शक्तिं शिप्राजले मुक्त्वा पातालं च बिभेद सा

evaṁ nihatya daityeṁdraṁ sa gāṁgeyo mahāba laḥ śaktiṁ śiprājale muktvā pātālaṁ ca bibheda sā

इस प्रकार दैत्यराज का वध कर, महाबली गांगेय ने अपनी शक्ति शिप्रा के जल में छोड़ दी, और वह पाताल तक भेद गई।

श्लोक 88 (skanda.5.34.88)

ततो भोगवती व्यास शक्तिभेदेन निर्गता । वंदिता सर्वदेवैश्च मुनिभिश्च तपोधनैः

tato bhogavatī vyāsa śaktibhedena nirgatā vaṁditā sarvadevaiśca munibhiśca tapodhanaiḥ

हे व्यास! तब उस शक्ति-भेदन से भोगवती नगरी प्रकट हुई, जिसे सभी देवताओं और तपोधन मुनियों ने वन्दन किया।

श्लोक 89 (skanda.5.34.89)

पृथिव्यां यानि तीर्थानि समुद्रादिगतानि च । शक्तिभेदे तु न्यस्तानि शतकोटिसहस्रशः

pṛthivyāṁ yāni tīrthāni samudrādigatāni ca śaktibhede tu nyastāni śatakoṭisahasraśaḥ

पृथ्वी पर जो भी तीर्थ हैं, समुद्र आदि तक फैले हुए भी, वे सब शक्तिभेद में सैकड़ों हजारों करोड़ की संख्या में स्थापित हैं।

श्लोक 90 (skanda.5.34.90)

अतोऽतिपुण्यं त्रैलोक्ये कोटितीर्थमुदाहृतम् । ब्रह्मणा स्थापितस्तत्र कोटितीर्थेश्वरः शिवः

ato'tipuṇyaṁ trailokye koṭitīrthamudāhṛtam brahmaṇā sthāpitastatra koṭitīrtheśvaraḥ śivaḥ

इसीलिए त्रिलोक में अत्यन्त पुण्यमय यह कोटितीर्थ कहा गया है। वहाँ ब्रह्मा द्वारा शिव कोटितीर्थेश्वर स्थापित किए गए।

श्लोक 91 (skanda.5.34.91)

कोटितीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा कोटीश्वरं शिवम् । मुच्यते सर्वपापेभ्यो निर्मोकादिव पन्नगः

koṭitīrthe naraḥ snātvā dṛṣṭvā koṭīśvaraṁ śivam mucyate sarvapāpebhyo nirmokādiva pannagaḥ

कोटितीर्थ में स्नान कर शिव कोटीश्वर का दर्शन करने वाला मनुष्य वैसे ही सर्वपापों से मुक्त हो जाता है जैसे सर्प केंचुली से।

श्लोक 92 (skanda.5.34.92)

श्राद्धं करोति यस्तत्र पितृभक्तो नरो मुने । दशानामश्वमेधानां प्राप्नोति सकलं फलम्

śrāddhaṁ karoti yastatra pitṛbhakto naro mune daśānāmaśvamedhānāṁ prāpnoti sakalaṁ phalam

हे मुने! जो पितृभक्त मनुष्य वहाँ श्राद्ध करता है, वह दस अश्वमेध यज्ञों का सम्पूर्ण फल प्राप्त करता है।

श्लोक 93 (skanda.5.34.93)

पितॄनुद्दिश्य यत्किञ्चित्कोटितीर्थे प्रदीयते । तत्सर्वं कोटिगुणितं जायते नात्र संशयः

pitṝnuddiśya yatkiñcitkoṭitīrthe pradīyate tatsarvaṁ koṭiguṇitaṁ jāyate nātra saṁśayaḥ

पितरों के उद्देश्य से कोटितीर्थ में जो कुछ भी, चाहे थोड़ा ही, दिया जाता है, वह सब करोड़गुना हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 94 (skanda.5.34.94)

तत्र तीर्थे नरो यस्तु गां ददाति पयस्विनीम् । सर्वलोकानतिक्रम्य स गच्छेत्प रमां गतिम्

tatra tīrthe naro yastu gāṁ dadāti payasvinīm sarvalokānatikramya sa gacchetpa ramāṁ gatim

उस तीर्थ में जो मनुष्य दूध देने वाली गाय का दान करता है, वह समस्त लोकों को लाँघकर परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 95 (skanda.5.34.95)

यावन्त्यंगेषु रोमाणि तत्प्रसूतिकुलेषु च । तावद्युगसहस्राणि शिवलोके महीयते

yāvantyaṁgeṣu romāṇi tatprasūtikuleṣu ca tāvadyugasahasrāṇi śivaloke mahīyate

उस गाय के अंगों में और उसकी सन्तति के कुलों में जितने रोम हैं, उतने ही हजार युगों तक वह शिवलोक में महिमामण्डित होता है।

श्लोक 96 (skanda.5.34.96)

पौर्णमास्याममावास्यां पश्येच्छक्तिधरं तु यः । नापुत्रो नाधनो रोगी सप्तजन्मसु जायते

paurṇamāsyāmamāvāsyāṁ paśyecchaktidharaṁ tu yaḥ nāputro nādhano rogī saptajanmasu jāyate

जो पूर्णिमा अथवा अमावस्या को शक्तिधारी (कार्तिकेय) का दर्शन करता है, वह सात जन्मों तक न पुत्रहीन, न धनहीन, न रोगी होता है।

श्लोक 97 (skanda.5.34.97)

जलप्रवेशं यः कुर्यात्तत्र तीर्थे नरोत्तमः । सोऽक्षयं लभते लोकं यावच्चन्द्र दिवाकरौ

jalapraveśaṁ yaḥ kuryāttatra tīrthe narottamaḥ so'kṣayaṁ labhate lokaṁ yāvaccandra divākarau

जो श्रेष्ठ मनुष्य उस तीर्थ में जल-प्रवेश करता है, वह चन्द्र-सूर्य के रहने तक अक्षय लोक प्राप्त करता है।

श्लोक 98 (skanda.5.34.98)

वृषोत्सर्गं तु यः कुर्यात्पितृभक्तो नरो मुने । सोऽक्षयं लभते स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्

vṛṣotsargaṁ tu yaḥ kuryātpitṛbhakto naro mune so'kṣayaṁ labhate sthānaṁ yatsurairapi durlabham

हे मुने! जो पितृभक्त मनुष्य वहाँ वृषोत्सर्ग करता है, वह देवताओं के लिए भी दुर्लभ अक्षय स्थान प्राप्त करता है।

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